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हरामफरमोश सलमान रुश्दी को उसके ही toolkit ‘दोस्त’ कर रहे गुमराह, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत में कम नहीं हुई है : इतिहास के ‘सच’ को सामने लाना छेड़छाड़ नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सलमान रुश्दी ( फोटो साभार-toi)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कट्टरपंथियों में भी कट्टरपंथी’ और मोदी समर्थकों को टोडीज करने वाले सलमान रुश्दी एक बार फिर भारत सरकार पर ‘आजादी’ के नाम पर अमेरिका में बैठ कर आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके ‘दोस्तों’ से भारत में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को लेकर बात होती है, तो पता चलता है कि उनके बोलने की आजादी सीमित है।

रुश्दी मियां जब 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' नहीं होने पर इतना बहुत कुछ मोदी के खिलाफ इतनी बकवासें की जा रही है। फिर भी बकवास करते हो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' नहीं शर्म करो। किसी भी विदेशी मेहमान के भारत पर toolkit मैदान में आकर उपद्रव करता है। अगर यही काम तुम्हारे किसी मुस्लिम मुल्क होता हंगामा करने वालों का पता भी नहीं चलता। 

लेकिन उनके दोस्त ये नहीं बताते हैं कि भारत में ‘प्रेस की आजादी’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ ही है कि मोदी सरकार के हर काम पर संसद के अंदर और बाहर बहस होती है। टीवी डिबेट होते हैं और हर किसी को बोलने की आजादी होती है। सोशल मीडिया मोदी विरोधियों के पोस्ट से भरा रहता है। देश में हर बुरे काम के लिए मोदी को जिम्मेदार बताया जाता है। 

यही वजह है कि बिहार चुनाव से पहले जब दिल्ली ब्लास्ट हुआ तो लोगों ने इसे आतंकी घटना मानने में मुँह सिल लिए। कई दिनों तक मुस्लिम आतंकी मॉड्यूल को लेकर खुलासे हुए। एनआईए ने कई सबूत रखे और 3000 किलो अमोनियम नाइट्रेट जमा करने के सबूत दिये, एके-47 जैसे हथियार बरामद किए। लेकिन कांग्रेस और आरजेडी ने तो इसे चुनाव में वोट पाने के लिए ध्रुवीकरण कह कर गला फाड़ते ही रहे, बाकी विपक्षी पार्टियों ने भी उनका साथ दिया। इस मामले का पूरा खुलासा होने के बावजूद किसी भी पार्टी ने माफी नहीं माँगी।

पीएम मोदी ने खुद कहा है कि उनके हर काम को सांप्रदायिकता के नजरिए से देखा जाता है और आलोचना की जाती है। प्रधानमंत्री मोदी की हर सामाजिक कल्याण की योजनाएँ सभी धर्मों और जातियों के लिए है। ऐसा नहीं है कि किसी को नाम, जाति, धर्म के आधार पर रोका जाता है। लेकिन देश से घुसपैठियों को हटाने को लेकर अगर मोदी सरकार गंभीर है तो इसमें आपत्ति क्या है।

क्या देश से रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना गलत है? देश में साजिश के तहत डेमोग्राफी बदलाव हो रहा है। हिमाचल, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों से लेकर सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफी बदलने की कोशिश हो रही है। इन पर एक्शन लेना क्या गलत है।

पीएम मोदी ने 2022 में हटवाई थी बैन

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के बाद विवादों में आए लेखक सलमान रुश्दी की किताब 36 साल बाद पीएम मोदी ने ही बैन हटवाई थी। पूर्व पीएम राजीव गाँधी की सरकार ने साल 1988 में इस पर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगाया था। उस वक्त कांग्रेस सरकार प्रचंड बहुमत के बाद भी मुस्लिम वोट बैंक की खातिर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पीएम मोदी ने कुछ मुस्लिम संगठनों जैसे ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड के विरोध के बावजूद द सेटनिक वर्सेज से प्रतिबंध उठा लिया। इसके बाद इस किताब की भारत में जबरदस्त बिक्री हुई।

भारत में मौखिक तौर पर प्रतिबंध का ये कारनामा कांग्रेस सरकार ने किया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सरकार कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाई कि इस किताब पर कभी प्रतिबंध भी लगा था। इसके बावजूद रुश्दी जैसे बुद्धिजीवियों को कॉन्ग्रेस ‘लोकतांत्रिक’ नजर आती है।

क्या कहा सलमान रुश्दी ने

ताजा मामला सलमान रुश्दी के एक इंटरव्यू के बाद सामने आया है। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर एक बार फिर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाया है। ये इंटरव्यू ब्लूमबर्ग में 5 दिसंबर 2025 को छपा है। ये इंटरव्यू मिशल हुसैन ने लिया है।

इंटरव्यू में पीएम मोदी को लेकर पूछे गए सवाल पर सलमान रुश्दी ने कहा है कि पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर जैसे लोग भारत में परेशान हैं क्योंकि उन्हें पूरी ‘आजादी’ नहीं है।

ये पहला मौका नहीं है जब सलमान रुश्दी ने पीएम मोदी की आलोचना की हो। 2014 से पीएम बनने के बाद से उन्होंने कई मौकों पर पीएम मोदी की आलोचना की है। यहाँ तक प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर चिंता जताई थी और कहा था कि बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता की अभिव्यक्ति औ साहित्यिक गतिविधियों की आजादी खतरे में पड़ जा सकती है।

रुश्दी के मुताबिक उनके कई दोस्त, जो भारत में ही रहते हैं, उनसे बात होती है और ये जानकारी उन्होंने दी है। इस दौरान उन्होंने नायपॉल का जिक्र किया और कहा कि मोदी सरकार इतिहास से छेड़छाड़ कर रही है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों का कहना है कि उनकी सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है और प्रेस, सिविल सोसाइटी ग्रुप्स और राजनीतिक विरोधियों पर कार्रवाई की है। फिर भी, चुनाव होते हैं, भारतीय मीडिया आउटलेट्स को पब्लिश करने के लिए परमिशन की जरूरत नहीं होती है और बुनियादी अधिकारों की संवैधानिक गारंटी लागू रहती है।

रुश्दी के मुताबिक, ऐसा लगता है कि देश का इतिहास फिर से लिखने की इच्छा है, असल में हिंदुओं को अच्छा, मुसलमानों को बुरा कहना गलत है। यह विचार कि भारत एक हिंदू सभ्यता है जो मुसलमानों के आने से घायल हो गई है। इसे साबित करने के लिए बहुत एनर्जी लगी है। वी.एस. नायपॉल ने एक बार इसे ‘घायल सभ्यता’ कहा था।

सलमान रुश्दी उन पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने ‘डिवाइन इन चीफ ‘ लिखने वाले पत्रकार आतिश तासीर की OCI रद्द करने पर मोदी सरकार को पत्र लिखा था।

दादरी हत्याकांड और पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के भारत में विरोध जैसी घटनाओं पर नाराज होकर अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल समेत 40 साहित्यकारों ने अपना सम्मान लौटाया, तो सलमान रुश्दी ने भी उनका साथ दिया और सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराया।

मोदी सरकार के खिलाफ जब भी मौका मिला, रुश्दी ने अपनी आवाज बुलंद की। मोदी विरोधी हर प्रोपेगेंडा का उन्होंने समर्थन किया। फिर भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की कमी उन्हें भारत में नजर आती है। मोदी सरकार में भारत में बोलने की आजादी इतनी है कि हर कोई अपनी बात बेखौफ कह सकता है, चाहे वह मोदी समर्थक हो या मोदी विरोधी।

‘हम तय करेंगे रोहिंग्या- शरणार्थी हैं या घुसपैठिए’ : मोदी सरकार के ‘ऑपरेशन पुशबैक’ के बीच आया सुप्रीम कोर्ट

क्या मानवाधिकार ने सुप्रीम कोर्ट को सब्जी मंडी समझा हुआ है? विदेशी फण्ड पर पल रहे ये मानवाधिकार वालों की क्या विदेशों से घुसपैठियों को निकाले जाने के खिलाफ कोर्ट में जाने की हिम्मत है? उत्तर एक ही मिलेगा नहीं, क्योकि किसी ने माँ का दूध ही नहीं पिया। अगर पिया होता तो जिस तरह अमेरिका ने अवैध रूप से घुसे भारतीयों को निकाला है, क्या वह मानवाधिकार में नहीं आता? आखिर सुप्रीम कोर्ट ऐसे मुकदमों को पहली ही तारीख पर ख़ारिज क्यों नहीं करती? सुप्रीम कोर्ट को इन मानवाधिकार वालों से पूछना चाहिए कि क्या वे खुद अवैध रूप से किसी भी विदेश में रह सकते हैं?        
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (31 जुलाई 2025) को कहा कि वह यह तय करेगा कि भारत में रह रहे अवैध रोहिंग्या ‘शरणार्थी’ माने जाएँगे या ‘अवैध घुसपैठिए’। कोर्ट में रोहिंग्या से जुड़े कई मामलों की सुनवाई हो रही है। जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और एन. कोटिश्वर सिंह की तीन जजों की पीठ ने 
कहा कि यह मामला अब तीन दिनों तक विस्तार से सुना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जिन प्रमुख मुद्दों पर विचार करने की बात कही, वे हैं:

  1. क्या रोहिंग्या लोगों को ‘शरणार्थी’ घोषित किया जा सकता है? अगर हाँ, तो उन्हें किस प्रकार की सुरक्षा और अधिकार मिलेंगे?
  2. अगर रोहिंग्या अवैध रूप से भारत में घुसे हैं, तो क्या भारत सरकार और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें कानून के अनुसार देश से बाहर निकाला जाए?
  3. अगर रोहिंग्या को अवैध घुसपैठिया मान भी लिया जाए, तो क्या उन्हें अनिश्चित समय तक हिरासत में रखा जा सकता है? या फिर उन्हें कुछ शर्तों के साथ जमानत दी जानी चाहिए?
  4. जो रोहिंग्या हिरासत में नहीं हैं और शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं, क्या उन्हें पीने का पानी, स्वच्छता, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ मिल रही हैं? क्या यह सब संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के अनुसार है?

अवैध रोहिंग्याओं को निर्वासित कर रहा भारत

भारत सरकार ने देश में अवैध रूप से घुसे रोहिंग्या मुस्लिमों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर निकालने (डिपोर्ट) की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार का कहना है कि ये अवैध रोहिंग्या देश की कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और डेमोग्राफी के लिए खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से केंद्र सरकार लगातार इन्हें पहचान कर वापस भेजने की कोशिश कर रही है।
हालाँकि सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ कुछ विदेशी फंडिंग पाने वाले मानवाधिकार संगठन और NGO सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। उन्होंने रोहिंग्याओं को भारतीय नागरिकों के बराबर अधिकार देने और उनकी देश से वापसी रोकने की माँग की।
लेकिन मई 2025 में, जब सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई हुई तो अदालत ने स्पष्ट और संतुलित रुख अपनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस माँग को खारिज कर दिया जिसमें वे चाहते थे कि इस मामले को तुरंत प्राथमिकता के साथ सुना जाए। कोर्ट ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और सरकार की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अवैध घुसपैठियों के मामले में कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से गंभीरता जरूरी है।

गैर सरकारी संगठन उन अवैध रोहिंग्याओं की करना चाहते हैं रक्षा जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हैं खतरा

याचिकाकर्ता चाहते हैं कि भारत सरकार रोहिंग्या मुस्लिमों के मामले में ‘मानवीय दृष्टिकोण’ अपनाए, लेकिन यह भी सच है कि कई अवैध रोहिंग्या नागरिक गंभीर आपराधिक गतिविधियों, जैसे मानव तस्करी में शामिल पाए गए हैं। ये अवैध प्रवासी उस देश के संसाधनों पर दावा ठोक रहे हैं, जिसकी आबादी पहले से ही बहुत बड़ी है।

 फिर भी, तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इनके पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि रोहिंग्या धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में फैल गए हैं। इनमें से कई लोगों ने फर्जी आधार कार्ड और अन्य स्थानीय पहचान पत्र भी बना लिए हैं, जिसका फायदा उन्हें तुष्टिकरण की राजनीति से मिला।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के आँकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर 2024 तक भारत में 95,000 से ज्यादा रोहिंग्या मुस्लिम रह रहे हैं। इनमें से लगभग 22,500 लोग शरणार्थी और शरण की माँग करने वाले हैं। इन्हें संयुक्त राष्ट्र ने ‘राज्यविहीन’ माना है।

भारत अवैध रोहिंग्याओं को रखने के लिए कानूनी रूप से नहीं है बाध्य

1951 शरणार्थी सम्मेलन (Refugee Convention) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो यह तय करती है कि शरणार्थी किसे कहा जाता है और इस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की शरणार्थियों और शरण की माँग करने वालों के प्रति क्या जिम्मेदारियाँ होती हैं। इस संधि के अनुसार, किसी भी देश को शरणार्थियों को उस देश में वापस नहीं भेजना चाहिए जहाँ उन्हें उत्पीड़न या खतरा हो सकता है।

हालाँकि, भारत ने इस 1951 सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए भारत इस संधि के नियमों से कानूनी रूप से बँधा नहीं है। इसका मतलब यह है कि भारत को शरणार्थियों को अपने देश में रखना जरूरी नहीं है और वह अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुस्लिमों को निर्वासित कर सकता है।

संविधान संसद को नागरिकता पर निर्णय लेने का देता है अधिकार

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट अब रोहिंग्या शरणार्थियों की कानूनी स्थिति से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा है, लेकिन इस विषय पर निर्णय लेने का असली अधिकार संसद के पास है। संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता से जुड़े सभी मामलों, जैसे नागरिकता प्राप्त करना, छोड़ना और समाप्त करना आदि के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
नागरिकता से जुड़े कानूनों को लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है। संसद ने भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया है, जो नागरिकता प्राप्त करने, छोड़ने और नागरिकता वापस लेने से जुड़े नियम तय करता है। हालाँकि रोहिंग्या शरणार्थी, जो अवैध रूप से भारत में आए हैं, इस कानून के अंतर्गत नहीं आते।
भारत सरकार का यह स्पष्ट रुख है कि रोहिंग्या लोग अवैध प्रवासी हैं और उन्हें देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए सरकार उन्हें वापस भेज रही है। सरकार का यह मानना है कि अगर ऐसे तत्वों को भारत में रहने दिया गया, तो यह देश की कानून-व्यवस्था और लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। ऐसे गंभीर मामलों का निर्णय संसद जैसे संस्थान के हाथ में होना चाहिए, क्योंकि यह जनता के प्रति जवाबदेह होता है।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को अपने हाथ में लिया है, तो यह उम्मीद की जाती है कि वह केवल कानूनी तर्कों और सूखी व्याख्या तक सीमित न रहकर, देश और जनता के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखेगा।

बिहार : वोटर लिस्ट में मिले घुसपैठियों के नाम, बांग्लादेश-नेपाल-म्यांमार से आकर बनाई फर्जी पहचान: EC सबको करेगा बाहर, राज्य में कुल 7.89 करोड़ वोटर

                            बेगूसराय में SIR करते चुनाव आयोग से जुड़े कर्मी (फोटो साभार: FB/BIHARCEO)
बिहार में चल रही विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) ने एक बड़ी खोज की है। उन्होंने चुनावी सूची में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से आए कई लोगों के नाम पाए हैं। चुनाव आयोग के सूत्रों ने रविवार (13 जुलाई 2025) को बताया कि जाँच के बाद इन नामों को अंतिम सूची से हटाया जा सकता है। यह खबर ऐसे समय आई है जब बिहार में मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाने का काम जोरों पर है।

सूत्रों के मुताबिक, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोगों के नाम 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित होने वाली अंतिम चुनावी सूची में शामिल नहीं किए जाएँगे। लेकिन यह फैसला 1 अगस्त 2025 के बाद ठीक से जाँच करने के बाद ही लिया जाएगा। अभी तक चुनाव आयोग ने ऐसे कितने मतदाताओं की संख्या नहीं बताई है।

यह पता चला है कि बीएलओ घर-घर जाकर लोगों से नामांकन फॉर्म बाँट रहे थे और इकट्ठा कर रहे थे। यह फॉर्म उन मतदाताओं के लिए हैं जो 24 जून 2025 तक वोटर के रूप में रजिस्टर्ड हो चुके हैं। बिहार में कुल करीब 7.89 करोड़ वोटर हैं। यह पूरी प्रक्रिया मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के लिए चलाई जा रही है।

एसआईआर के टाइमलाइन के अनुसार, लोग अपनी नागरिकता और जन्म तिथि साबित करने वाले दस्तावेज 25 जुलाई तक जमा कर सकते हैं। अगर कोई 25 जुलाई तक दस्तावेज नहीं दे पाता, तो उसके पास 30 अगस्त तक का समय है, जब दावे और आपत्तियाँ दाखिल करने की आखिरी तारीख है। 1 अगस्त को ड्राफ्ट सूची प्रकाशित होगी, जिसमें शामिल होने के लिए नामांकन फॉर्म जमा करना जरूरी है। अगर फॉर्म बिना दस्तावेज के जमा किया गया, तो 30 अगस्त तक दस्तावेज देकर अंतिम सूची में नाम शामिल करवाया जा सकता है।

इसके लिए इन दस्तावेजों की आवश्यकता होगी-

  • मान्यता प्राप्त बोर्ड या विवि द्वारा निर्गत शैक्षिक प्रमाण पत्र
  • जाति प्रमाण पत्र
  • राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी)
  • पासपोर्ट
  • राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकार द्वारा तैयार पारिवारिक रजिस्टर
  • बैंक, डाकघर, एलआईसी आदि द्वारा 1 जुलाई 1987 के पूर्व निर्गत किया गया कोई भी प्रमाण पत्र
  • वन अधिकार प्रमाण पत्र
  • नियमित कर्मचारी या पेंशनभोगी कर्मियों का पहचान पत्र
  • स्थाई निवास प्रमाण पत्र
  • सरकार की कोई भी भूमि या मकान आवंटन का प्रमाण पत्र
  • सक्षम प्राधिकार द्वारा निर्गत जन्म प्रमाण पत्र
विपक्षी पार्टियों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह अभियान गरीबों और प्रवासी मजदूरों को वोट से वंचित करने की साजिश है। वे दावा करते हैं कि कई गरीब लोग दस्तावेज जमा करने में मुश्किल महसूस करते हैं, जिससे उनका नाम सूची से कट सकता है। चुनाव आयोग ने कहा है कि यह सिर्फ सही मतदाताओं को सुनिश्चित करने के लिए है, ताकि फर्जी नाम न रहें।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार जैसे बड़े राज्य में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहते हैं। नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोग अक्सर सीमा पार करके भारत में रहते हैं और काम करते हैं। लेकिन वोटर बनने के लिए भारतीय नागरिकता जरूरी है। अगर जाँच में साबित हो गया कि ये लोग विदेशी हैं, तो उनके नाम हटाए जाएँगे। चुनाव आयोग ने लोगों से अपील की है कि वे समय पर दस्तावेज जमा करें, ताकि कोई समस्या न आए।

‘ऑपरेशन पुश बैक’ : भारत ने सीमा पार ढकेले 1000+ घुसपैठिए, मोदी सरकार के एक्शन पर बांग्लादेश का रोना छूटा: छूटे बांग्लादेशी सेना के पसीने

                                                   ऑपरेशन पुश बैक (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
भारत में बांग्लादेशी-रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ मोदी सरकार ने ऑपरेशन पुश-बैक चलाया हुआ है। इस ऑपरेशन के तहत त्वरित कार्रवाई करते हुए घुसपैठियों को उनके मुल्क चुन-चुनकर वापस भेजा रहा है। करीबन 1000+ बांग्लादेशी अब तक वापस भेजे जा चुके हैं। इसी तरह रोहिंग्याओं पर भी सरकार सख्त है। जाहिर ये कार्रवाई इस्लामी कट्टरपंथियों को और उन लोगों को पसंद नहीं आ रही जिन पर एक्शन हो रहा है। इसी क्रम में भारतीय सेना और सरकार दोनों को बदनाम करने के प्रयास भी पूरे हैं।

मोदी सरकार की इस कार्यवाही से कांग्रेस और विपक्ष भी बौखलाया हुआ है। इसलिए पाकिस्तान पर आतंकवादियों के विरुद्ध लड़ाई में हुए नुकसान का हिसाब मांग भड़ास निकाली जा रही है। इतना ही नहीं घुसपैठियों को देश-निकाला करने से इनका वोटबैंक भी डगमगा रहा है। इन्हीं घुसपैठियों के दम आन्दोलनजीवी फलफूल रहे थे। CAA विरोध में बने शाहीन बागों में हुए जमावड़ों में 90% संख्या इन्हीं घुसपैठियों की होती थी।    

हाल में डेली स्टार ने एक खबर प्रकाशित जी है जिसमें उन लोगों के दुखड़ा बताया गया जिन्हें पकड़कर भारत से वापस भेजा गया। इनमें एक 41 साल की सेलिना बेगम का जिक्र है। बताया गया है कि सेना ने हरियाणा से पकड़ा था। वहाँ वह मजदूरी करती थी। बाद में उन्हें त्रिपुरा सीमा के नजदीक फेनी नदी में कमर पर खाली बोतलें बाँधकर फेंक दिया और वो पूरी रात नदी में बस तैरती रहीं। अंत में उन्हें उनके बांग्लादेश सीमा गार्ड ने बचाया। उनके मुताबिक उनके साथ उनकी बच्चियाँ भी थीं।

रिपोर्ट में दिखाया गया है कि कैसे भारतीय प्रशासन ने उन्हें प्रताड़ना दी। उन्हें भूखे रखकर अपनी कैद में रखा और फिर सीमा पार फेंक दिया। इसमें बीजीबी (बांग्लादेश बॉर्ड गार्ड) के महानिदेशक मेजर जनरल मोहम्मद अशरफज्जमां सिद्दीकी का कहना है कि वो बार-बार ऐसी घटना का विरोध कर रहे हैं, मगर फिर भी ऐसा हो रहा है। बीएसएफ उनकी सुन रही है।

इसी रिपोर्ट के मुताबिक 7 मई तक करीबन 1053 लोगों को सीमा पार वापस भेजा गया है। इनमें खगराछारी में 111 लोगों को, कुरीग्राम में 84 लोगों को, सिलहट में 103 लोगों को, मौलवीबाजार में 331 लोगों को, हबीगंज में 19 लोगों को, सुनामगंज में 16 लोगों को, दिनाजपुर में दो लोगों को, चपैनवाबगंज में 17 लोगों को, ठाकुरगाँव में 19 लोगों को, पंचगढ़ में 32 लोगों को, लालमोनिरहाट में 75 लोगों को, चुआडांगा में 19 लोगों को, झेनैदाह में 42 लोगों को, कुमिला में 13 लोगों को, फेनी में 39 लोगों को, सतखीरा में 23 लोगों को और मेहरपुर में 30 लोगों को सीमा पार कर भेजा गया है।

ऑपरेशन पुश बैक से क्या समस्या

दिलचस्प बात ये है कि जिस ऑपरेशन पुश बैक के नाम पर मोदी सरकार को घेरने का प्रयास हो रहा है और ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे इससे मानवाधिकार हनन हो रहा है, वही मीडिया ये नहीं बता रहा है कि कैसे ये बांग्लादेशी भारत में चोरी-छिपे अवैध रूप से घुसे और उसके पास इन्होंने फर्जी आधार कार्ड, पहचान पत्र बनवाकर यहाँ सालों तक रहते रहे। अब जब इनके विरुद्ध कोई सरकार आई है और एक्शन ले रही है तो समस्या ये है कि ऐसा क्यों हो रहा है। क्यों देश में अवैध रूप से घुसे लोगों पर दया नहीं दिखाई जा रही है या उन्हें उन्हें डिटेंशन सेंटर में अच्छा भोजन क्यों नहीं कराया जा रहा।

क्या है ऑपरेशन पुश बैक?

‘ऑपरेशन पुश-बैक’ भारत सरकार की एक नई रणनीति है, जिसका उद्देश्य पूर्वी सीमा पर पकड़े जाने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं से त्वरित रूप से निपटना है। ये वे लोग हैं जो कई वर्षों से अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं।
इस ऑपरेशन के तहत अब उस पारंपरिक प्रक्रिया जैसे पुलिस को सौंपना, FIR दर्ज करना, अदालत में पेश करना, मुकदमा चलाना और फिर निर्वासन प्रोटोकॉल के तहत वापस भेजना को किनारे कर दिया गया है। अब भारतीय सुरक्षाबल घुसपैठियों को तुरंत सीमा पार बांग्लादेश की ओर धकेल रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है ताकि समय और संसाधनों की बचत हो और अवैध घुसपैठ पर तुरंत प्रभाव डाला जा सके।

376 मर्द, 284 औरत… राजस्थान में 1000+ बांग्लादेशी-रोहिंग्या पकड़े गए : हरियाणा में 237 घुसपैठिए ‘बंगाली’ बनकर काम कर रहे थे

                      रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई जारी (फोटो साभार: IDR)
राजस्थान और हरियाणा में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। राजस्थान में 30 अप्रैल 2025 से शुरू हुए विशेष अभियान में अब तक 1,000 से ज्यादा घुसपैठिए पकड़े गए हैं, जबकि हरियाणा के तीन जिलों- नूहँ, झज्जर और हाँसी में 237 बांग्लादेशी नागरिक हिरासत में लिए गए हैं। इनमें से कई ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए खुद को भारत का नागरिक बताने की कोशिश की थी। अब घुसपैठियों को खास प्लेन से पश्चिम बंगाल भेजा जा रहा है, जहाँ से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) इन्हें बांग्लादेश और म्यांमार वापस भेजेगा।

राजस्थान में पकड़े गए घुसपैठियों में 341 बच्चे, 284 महिलाएँ और 376 पुरुष शामिल हैं। राजस्थान में सबसे ज्यादा घुसपैठिए सीकर जिले से पकड़े गए हैं, जहाँ 394 लोग हिरासत में हैं। जयपुर (218), अलवर (103), कोटपूतली-बहरोड़ (117) और भिवाड़ी (67) जैसे जिलों में भी बड़ी संख्या में घुसपैठिए पकड़े गए।

बनवा लिए थे फर्जी निवास प्रमाण पत्र

जाँच में पता चला कि ये लोग फर्जी आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और निवास प्रमाण पत्र बनवाकर राजस्थान के मूल निवासी होने का दावा कर रहे थे। कई महिलाएँ घरेलू सहायिका के रूप में काम कर रही थीं, जबकि पुरुष ईंट भट्टों, खान मजदूरी, कबाड़ बीनने और बेलदारी जैसे कामों में लगे थे। कुछ के खिलाफ चोरी और अन्य अपराधों के मामले भी सामने आए हैं।
राजस्थान सरकार ने 8 मई 2025 को केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर हर जिले में विशेष टास्क फोर्स और होल्डिंग सेंटर बनाए। इन सेंटरों में घुसपैठियों को अस्थायी रूप से रखा जा रहा है। 15 मई 2025 को 148 लोगों का पहला जत्था विशेष विमान से पश्चिम बंगाल भेजा गया। अगले कुछ दिनों में और लोगों को भेजने की तैयारी है। गृह विभाग इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रख रहा है ताकि कोई चूक न हो।

हरियाणा में भी अवैध घुसपैठियों के खिलाफ अभियान

हरियाणा के मेवात इलाके में अब तक 237 से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ा जा चुका है। इनमें से नूहँ जिले में पुलिस ने 125 बांग्लादेशियों को पकड़ा, जो बिना वैध दस्तावेजों के ईंट भट्टों पर काम कर रहे थे। झज्जर के भदानी गाँव में 47 और हाँसी में 26 घुसपैठिए हिरासत में लिए गए। 12 मई को भी हाँसी में 39 लोग पकड़े गए थे। इनमें से कई ने खुद को बंगाली मजदूर बताकर भट्टा मालिकों को गुमराह किया था।
पुलिस अब उन मालिकों पर भी कार्रवाई की योजना बना रही है, जो बिना दस्तावेज जाँच के अवैध मजदूरों को काम दे रहे हैं। नूहँ पुलिस ने स्थानीय कारोबारियों से कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन कराने की अपील की है।

’43 रोहिंग्या औरतों-बच्चों-बुजुर्गों को समंदर में फेंक दिया’: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- किसने देखा, कहाँ है सबूत?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (16 मई 2025) को रोहिंग्या शरणार्थियों के कथित तौर पर म्यांमार भेजे जाने की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया कि भारत सरकार ने बच्चे, औरतें, बुजुर्ग और कैंसर जैसे गंभीर बीमारियों से पीड़ित 41 रोहिंग्याओं को जबरदस्ती म्यांमार भेज दिया।

याचिका में दावा किया गया है कि इन लोगों को अंडमान ले जाकर समुद्र में फेंक दिया गया। जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने इस याचिका पर सवाल उठाए और इसे ‘बड़ी खूबसूरती से गढ़ी कहानी’ बताया। कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई पक्का सबूत नहीं है, सिर्फ हवा-हवाई और बिना आधार वाले दावे किए गए हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी।

 रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस सूर्या कांत ने याचिकाकर्ता के वकील से सख्त लहजे में कहा, “हर दिन आप नई-नई कहानी लेकर आते हैं। इस कहानी का आधार क्या है? बहुत खूबसूरती से बनाई गई कहानी! कोई सबूत तो दिखाइए।” कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई वीडियो या गवाह है जो इन दावों को साबित कर सके। याचिकाकर्ता की तरफ से सीनियर वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने बताया कि दिल्ली में मौजूद याचिकाकर्ताओं को फोन कॉल से यह खबर मिली। उन्होंने कहा कि म्यांमार के तट से टेप रिकॉर्डिंग मौजूद है और सरकार इसकी जाँच कर सकती है। लेकिन जस्टिस कांत ने सवाल किया कि दिल्ली में बैठा याचिकाकर्ता अंडमान की घटना को कैसे सच साबित कर सकता है।

कोर्ट ने इस याचिका को 31 जुलाई 2025 को सुनवाई के लिए एक दूसरे रोहिंग्या मामले के साथ जोड़ दिया, जो तीन जजों की बेंच के सामने है। कोर्ट ने फौरन सुनवाई और निर्वासन रोकने की याचिकाकर्ता की माँग को खारिज कर दिया। गोंसाल्वेस ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (UN-OHCHR) की एक रिपोर्ट का जिक्र किया, जिसमें इस मामले की जांच शुरू होने की बात थी। इस पर जस्टिस कांत ने कहा कि वे इस रिपोर्ट पर तीन जजों की बेंच में बात करेंगे और याचिकाकर्ता को यह रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा। उन्होंने आगे कहा, “बाहर बैठे लोग हमारे देश की संप्रभुता को चुनौती नहीं दे सकते।”

जस्टिस कांत ने यह भी बताया कि 8 मई को तीन जजों की बेंच ने ऐसी ही एक याचिका में निर्वासन (डिपोर्टिंग) रोकने से मना कर दिया था। उस सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि अगर रोहिंग्याओं को भारत में रहने का हक नहीं है, तो उन्हें कानून के मुताबिक निर्वासित किया जाएगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब देश मुश्किल वक्त से गुजर रहा है, तब ऐसी ‘काल्पनिक कहानियाँ’ सामने लाई जा रही हैं। गोंसाल्वेस ने कोर्ट से रोहिंग्याओं के मानवाधिकारों की रक्षा की गुहार लगाई और बताया कि देश में 8000 रोहिंग्या UNHCR कार्ड के साथ मौजूद हैं।

याचिका में दावा था कि दिल्ली पुलिस ने बायोमेट्रिक डेटा लेने के बहाने रोहिंग्याओं को हिरासत में लिया, उन्हें बसों और वैन में ले जाया गया, फिर पोर्ट ब्लेयर भेजकर नौसेना के जहाजों पर हाथ-पैर बाँधकर समुद्र में छोड़ दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने माँग की कि निर्वासित लोगों को वापस भारत लाया जाए, उन्हें रिहा किया जाए और आगे से UNHCR कार्ड वालों को गिरफ्तार न किया जाए।

100 रोहिंग्या को बांग्लादेश की सीमा में छोड़ा, 40 को अंडमान से समुद्र में किया रवाना, 78 घुसपैठियों को सुंदरबन से खदेड़ा: बचाने को सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालने वालों पर कब होगी कार्यवाही?

                        सुंदरबन में भेजे गए घुसपैठिए (साभार: The Bangladesh Standard)
भारत में पाकिस्तान से जारी तनाव के बीच बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों पर कार्रवाई जारी है। भारत ने इन्हें गिरफ्तार करने के बाद वापस भी भेजना चालू कर दिया है। ऐसी ही एक कार्रवाई में असम के एक डिटेंशन कैम्प से रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को वापस बांग्लादेश भेजा गया है। कुछ रोहिंग्याओं को अंडमान निकोबार से समुद्र के रास्ते भी भेजा गया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने राज्य के एक डिटेंशन कैंप से घुसपैठियों के भेजे जाने की पुष्टि की है। इस मामले में रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थक सुप्रीम कोर्ट भी पहुँच गए हैं।

जिस तरह सरकार ने कश्मीर में आतंकियों को संरक्षण देने वालों पर कार्यवाही की थी उसी तरह की कार्यवाही होनी चाहिए। कौन से कानून या संविधान में घुसपैठियों को बचाने के लिए लिखा है? अदालतें भी ऐसी याचिकाएं क्यों स्वीकार करती हैं?  

डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, असम के मटिया डिटेंशन कैम्प में रखे गए 102 रोहिंग्या को बांग्लादेश के रास्ते भेजा गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि उन्हें पहले बसों में भर कर त्रिपुरा ले जाया गया और इसके बाद बांग्लादेश में भेज दिया गया। मटिया कैम्प असम के गोलपाड़ा जिले में हैं और देश का सबसे बड़ा डिटेंशन कैम्प है।

इस कार्रवाई की पुष्टि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल ही में की थी। शनिवार (9 मई, 2025) को CM सरमा ने कहा था कि मटिया कैम्प में अब मात्र 30-40 लोग बचे हैं और बाकी को बांग्लादेश में वापस भेज दिया गया है।

उन्होंने कहा, “अब मटिया में केवल वही लोग हैं जिन्हें विदेशी घोषित किया जा चुका और उनका मुकदमा चल रहा है। उनके अलावा कैम्प से बाकी सभी लोग बांग्लादेश वापस चले गए हैं। यह भारत सरकार द्वारा किया गया एक ऑपरेशन था। असम ने भी इसमें हिस्सा लिया था।”

उन्होंने आगे बताया, “देश के अलग-अलग हिस्सों में पहचाने गए लोगों के साथ-साथ असम में घुसपैठिए के रूप में पहचाने गए लोगों को भी वापस धकेल दिया गया है। रोहिंग्या भी वापस चले गए हैं… मटिया अब लगभग मुक्त हो गया है और 30-40 लोग बचे हैं।”

सरमा ने बताया कि अब कानूनी दांवपेंच से छुटकारा पाने को उन्हें बॉर्डर से ही वापस भेज दिया जाएगा। उन्होंने कहा, “पहले हम उन्हें हिरासत में लेते थे, मामला दर्ज करते थे, अदालत में पेश करते थे और जेल में डाल देते थे। लेकिन अब हमने फैसला किया है कि हम उन्हें अंदर नहीं लाएँगे और उन्हें सीमा से ही वापस खदेड़ देंगे।”

वहीं डेक्कन हेराल्ड की ही रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली पुलिस ने भी रोहिंग्या और बांग्लादेशियों के खिलाफ ऑपरेशन चालू कर रखा है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली पुलिस ने 40 रोहिंग्या घुसपैठियों को पकड़ कर अंडमान के रास्ते समुद्र में छोड़ दिया हैं ताकि वह म्यांमार वापस पहुँच सकें। रिपोर्ट में बताया गया कि यह कार्रवाई 7 मई, 2025 को की गई।

इस कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालाँकि, इसको लेकर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पड़ गई है। रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थन में मोहम्मद इस्माइल ने यह याचिका दायर की है। मोहम्मद इस्माइल ने दावा किया है कि दिल्ली पुलिस ने 43 रोहिंग्या को बायोमेट्रिक जानकारी लेने के नाम पर अपने साथ लिया और बाद में उन्हें अंडमान के रास्ते समुद्र में भेज दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को लेकर अभी कोई आदेश नहीं दिए हैं। इस पर सुनवाई 31 जुलाई, 2025 को होनी है। एक और रिपोर्ट में बताया गया है कि BSF ने 78 बांग्लादेशी घुसपैठियों को सुंदरबन के जंगल में छोड़ दिया है और उन्हें बांग्लादेशी सुरक्षाबलों ने बरामद किया है।

रोहिंग्या-बांग्लादेशी नहीं ले पाएँगे दिल्ली में मुफ्त राशन और फ्री की बिजली, रेखा गुप्ता सरकार बनाएगी डाटा हब


दिल्ली सरकार ने सरकारी योजनाओं में हो रही धाँधली से बचने के लिए यूनिफाइड डेटा हब (UDH) बनाने करने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य लाभार्थियों का एक रिकॉर्ड बनाना है। इसमें तमाम विभागों से डेटा इकट्ठा किया जाएगा। इससे यह पता लग सकेगा कि केवल पात्र लोग ही योजनाओं का लाभ लें।

काफी समय से दिल्ली में यह मांग की जा रही है कि झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों के आधार कार्डों की गंभीरता से पुष्टि की जाए। इन लोगों ने सिर्फ दिल्ली ही नहीं दिल्ली से बाहर बंगाल और राजस्थान आदि राज्यों में भी आधार कार्ड बनवाकर सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। उदाहरण पूनम(काल्पनिक) ने दिल्ली में हिन्दू के नाम से आधार कार्ड और वोटर कार्ड बनवाया रखा है लेकिन दिल्ली से बाहर मुस्लिम नाम परवीन(काल्पनिक) के नाम से आधार कार्ड बनवा रखा है। ये बहुत बड़ा जाल है जिसका भंडाभोड़ होना बहुत जरुरी है। 

दूसरे, BPL कार्ड धारकों की भी आर्थिक स्थिति की जाँच होनी चाहिए। ताकि जरूरतमंद लोगों को सरकारी सहायता का लाभ मिल सके। भीख मांगना कोई मजबूरी नहीं एक व्यापार है। यह आरोप नहीं कटु सत्य है। एक भिखारिन जो सिर्फ शाम को ही भीख मांगती थी उसकी 2 टैक्सियां किराये पर चल रही थी और जब उसका निकाह हुआ तो महावीर वाटिका दरिया गंज में शानदार दावत और कार दहेज़ में। इतना ही नहीं, बेरोजगारी के दिनों में रजिस्ट्री करने वाले बाबू से पूछा कि सुबह मनीऑर्डर की खिड़की पर भिखारियों की ही लम्बी लाइन देखता हूँ। इस पर बाबू ने जवाब दिया “बेटा जिसने एक महीने जामा मस्जिद पोस्ट ऑफिस ड्यूटी दे दी वह कभी किसी भिखारी को एक पैसा नहीं देगा, जिसका अनुभव सेवानिर्वित होने के लगभग 2 साल के बाद उपरोक्त भिखारिन से हुआ। वेतनभोगी और व्यापारी पर तो हर कोई हाथ डाल देता है लेकिन इन पर नहीं। आज एक रिक्शा चालक से लेकर ठेला चलाने वाला भी हर महीने 20 से लेकर 25/30,000 रूपए कमा रहा है।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बजट 2025-26 के भाषण में भी इसका जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार वेरिफिकेशन प्रकिया शुरु करेगी, जिससे सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र दिल्लीवासियों तक पहुँच सके। इस डाटा से फ्री बिजली या मुफ्त राशन जैसी चीजें भी घुसपैठियों को नहीं मिलेंगी।

उन्होंने यह भी कहा था इस बात को भी सुनिश्चित किया जाएगा कि दिल्ली से बाहर से आने वाले लोग या रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए इस योजनाओं का लाभ न ले सकें। अधिकारियों के अनुसार, यह डेटा हब सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा विकसित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य नागरिक-केंद्रित शासन को बढ़ाने के लिए डिजिटल स्तर पर रिकॉर्ड एकत्र करना होगा।

बीजेपी सरकार जल्द ही ‘दिल्ली यूनिफाइड सिटीजन डेटा प्लेटफ़ॉर्म’ विकसित करने के लिए एक टेंडर भी जारी करेगी।

क्या सुप्रीम कोर्ट रोहिंग्या घुसपैठियों को संरक्षण के लिए है? रोहिंग्या पर सब हुए दरियादिल: सुप्रीम कोर्ट चाहता है इनके बच्चों को पढ़ाए सरकार; क्या घुसपैठियों की वोट से पप्पू यादव संसद पहुंचा है?

                               रोहिंग्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट (साभार: इंडिया टुडे/लीगल इंडिया)
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार(12 फरवरी 2025) को कहा कि बच्चों की शिक्षा के मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और यह बात रोहिंग्या के बच्चों पर भी लागू होती है। दरअसल, ‘रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ नाम के एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए सुविधाओं की माँग की है। इनमें बच्चों की मुफ्त शिक्षा भी शामिल है। वहीं, पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने रोहिंग्या मुस्लिमों को नागरिकता देने की माँग की है। संविधान की शपथ लेने वाले क्या घुसपैठियों को संरक्षण की पैरवी करेंगे? 

पप्पू यादव अगर तुम्हे रोहिंग्या इतने प्यारे है तो किसी भी इस्लामिक देश में ले जाकर दिखाओ? उसी दिन सारी नेतागिरी करनी भूल जाओगे। जिन रोहिंग्यों को कोई इस्लामिक मुल्क अपने मुल्क में कदम तक नहीं रखने दे रहा उन्हें यहाँ कुर्सी के भूखे बेशर्म नेता छाती पीट रहे हैं। फिर बकवास करते फिरते हैं कि हम संविधान की रक्षा के लिए हैं। पप्पू यादव जैसे नेताओं देश के साथ खिलवाड़ मत करो।   

पप्पू यादव ने कहा कि देश में रोहिंग्या-रोहिंग्या होते रहता है। पूरी दुनिया में इनकी संख्या सिर्फ 17 लाख है। उन्होंने कहा कि जो लोग भारत में लंबे समय से रह रहे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जानी चाहिए। इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल 2025 पर पप्पू यादव ने कहा, “मैं इमिग्रेशन बिल का समर्थन करता हूँ, लेकिन पिछले 10-12 सालों में क्या वे यह पता लगा पाए हैं कि हमारे देश में कितने अप्रवासी हैं? वे सिर्फ़ वोट बैंक के लिए रोहिंग्याओं की बात करते हैं… सरकार को उन लोगों को नागरिकता देनी चाहिए जो लंबे समय से यहां रह रहे हैं…।”

रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव द्वारा दायर याचिका में कोर्ट से ये निर्देश देने की माँग की गई थी कि रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों को स्कूल में प्रवेश और सरकारी लाभ दिया जाए। इसके लिए आधार कार्ड अनिवार्यता और उनकी नागरिकता की स्थिति की परवाह ना की जाए। इस मामले पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने की।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने पीठ के समक्ष कहा कि रोहिंग्या शरणार्थी एक निराशाजनक स्थिति का सामना कर रहे हैं। इस पर न्यायालय ने कहा, “हमें छात्रों और उनके माता-पिता के बारे में बताएँ। वे कहां रह रहे हैं? हमें घर का नंबर, परिवारों की सूची, उनके रहने के सबूत दें। हमें पंजीकरण संख्या आदि दिखाएँ। हम देखेंगे कि क्या किया जा सकता है।”

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता एनजीओ को निर्देश दिया था कि वह कोर्ट को बताए कि दिल्ली में रोहिंग्या शरणार्थी कहाँ-कहाँ बसे हुए हैं और उन्हें क्या-क्या सुविधाएँ मिली हुई हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ को स्कूलों और अस्पतालों में प्रवेश से वंचित रखा जाता है, क्योंकि उनके पास आधार कार्ड नहीं है।

कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा, “वे शरणार्थी हैं, जिनके पास UNHCR (शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त) कार्ड हैं और इसलिए उनके पास आधार कार्ड नहीं हो सकते। लेकिन, आधार कार्ड के अभाव में उन्हें सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है।” उन्होंने बताया कि रोहिंग्या शाहीन बाग और कालिंदी कुंज में झुग्गियों में और खजूरी खास में किराए के मकानों में रह रहे हैं।

इस एनजीओ द्वारा दायर याचिका में केंद्र और दिल्ली सरकारों को निर्देश देने की माँग की गई है कि वे रोहिंग्या बच्चों को आधार कार्ड या भारतीय नागरिकता न होने के बावजूद मुफ्त शिक्षा दें। जनहित याचिका में आगे माँग की गई थी कि इन रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ को सरकार द्वारा पहचान पत्र माँगे बिना कक्षा 10, 12 और स्नातक सहित सभी परीक्षाओं में भाग लेने की अनुमति दी जाए।

बंगाल : सियालदह में अवैध रूप से घुसे 3 रोहिंग्या मुसलमान, 20-20 हजार रूपए देकर बनवाए फर्जी दस्तावेज

                                            रोहिंग्या मुस्लिम (साभार: वीडियो स्क्रीनशॉट)
पश्चिम बंगाल बांग्लादेशी और म्यांमार के रोहिंग्या घुसपैठियों का जंक्शन बन गया है। पुलिस ने कोलकाता के सियालदह रेलवे स्टेशन से तीन रोहिंग्या मुस्लिमों को गिरफ्तार किया है। ये तीनों अवैध रूप से घुसे हैं और वे जम्मू-कश्मीर या नई दिल्ली में अपने परिचितों के पास जा रहे थे। इसके पहले वे बांग्लादेश के शरणार्थी कैंप में रह रहे थे। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने मामले की जाँच NIA से कराने की माँग की है।

गिरफ्तार लोगों में 2 महिलाएँ और एक पुरुष हैं। घुसपैठियों की पहचान नूर फातिमा, सबू पानेकर और अब्दुल रहमान के रूप में हुई है। दोनों महिलाओं की उम्र 18 साल से कम बताई जा रही है। दरअसल, सियालदह पुलिस स्टेशन के कर्मियों को स्टेशन परिसर में तीनों की गतिविधियों पर संदेह हुआ। इसके बाद उनके पहचान दस्तावेज माँगे तो उनकी असली पहचान उजागर हुई।

तीनों घुसपैठिए आपस में रिश्तेदार हैं और म्यांमार के रखाइन प्रांत के निवासी हैं। ये सभी बिना वीजा और वैध दस्तावेजों के अवैध रूप से भारत में घुसे हैं। उसने बताया कि पश्चिम बंगाल की एक खुली सीमा से से तीनों भारत में घुसे थे। इसके बाद वे शनिवार (18 जनवरी 2025) की सुबह ट्रेन से सियालदह स्टेशन पहुँचे थे और यहाँ से वे दिल्ली या जम्मू-कश्मीर जाने वाले थे। यहाँ उन्हें पकड़ लिया गया।

म्यांमार में हिंदुओं एवं बौद्धों के खिलाफ हिंसा करने वाले इस्लामी आतंकी समूहों के खिलाफ वहाँ की सेेना की कार्रवाई के बाद मुस्लिम वहाँ से भाग रहे हैं। इस दरम्यां ये तीनों भी भागकर बांग्लादेश के शरणार्थी शिविर में ठहरे। इसके बाद वहाँ एक एजेंट को प्रति व्यक्ति 20,000 देकर बिना दस्तावेज के अवैध रूप से भारत की सीमा में घुस आए।

जाँच अधिकारी पता कर रहे हैं कि वे भारत में किन संपर्कों के जरिए घुसे और किसके पास जाने वाले थे। पुलिस ने उनका भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि किनकी मदद से वे अवैध रूप से भारत की सीमा पार करने में कामयाब रहे थे। जाँच अधिकारी महिला तस्करी और आतंकवाद के ऐंगल से भी इस मामले की जाँच कर रही है।

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने इस मामले में NIA जाँच की माँग की है। भाजपा ने सोशल मीडिया साइट X पर लिखा, “ये अवैध अप्रवासी पहले म्यांमार से भागकर बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में बालूखाली कैंप में रह रहे थे। वे किसी एजेंट को कुछ रकम देकर भारत में घुस आए। वे कोलकाता से नई दिल्ली जाकर बसने की योजना बना रहे थे। उन्होंने कैमरे पर स्वीकार किया है कि वे नई दिल्ली में बसे कई रोहिंग्याओं को जानते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, मैं दिल्ली के माननीय उपराज्यपाल से आग्रह करता हूँ कि वे वहाँ रोहिंग्याओं के बसने के मामले की जाँच NIA और दिल्ली पुलिस से करवाएँ कि पश्चिम बंगाल दिल्ली की ओर जाने वाले ऐसे लोगों के लिए सुरक्षित मार्ग कैसे बन गया है। ED को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के तहत अवैध भुगतान और प्राप्तियों के मामले की भी जाँच करनी चाहिए, जो इस तरह के अवैध सीमा अतिक्रमण को सुविधाजनक बना रहे हैं।”

सुवेंदु अधिकारी ने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश सीमा पर 600 किलोमीटर के क्षेत्र में बाड़ नहीं लगाई गई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को ज़मीन उपलब्ध नहीं कराई है। उन्होंने एक सोशल मीडिया यूजर को जवाब देते हुए कहा, “ममता बनर्जी से पूछिए कि वह यहाँ 600 किलोमीटर क्षेत्र में बाड़ लगाने के लिए BSF को ज़मीन क्यों नहीं दे रही हैं।”

उत्तर प्रदेश : 52000 फर्जी सर्टिफिकेट… बांग्लादेशियों-पाकिस्तानियों को बसाने के लिए: रायबरेली के 11 गाँवों में मिला ‘असली’ दिखने वाला जन्म प्रमाण पत्र, मोहम्मद जीशान और रियाज समेत 4 गिरफ्तार

रायबरेली में मिले पाकिस्तानी, नेपाली और बांग्लादेशी नागरिकों के 52 हजार से ज्यादा फर्जी जन्म प्रमाण पत्र (चित्र साभार- Newstrack & AFP)
उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में 18 जुलाई 2024 में हजारों रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के जन्म प्रमाण पत्रों को बनाने का खुलासा हुआ था, तब इस मामले में जाँच बिठा दी गई थी जो अब पूरी हो चुकी है। कुल 52 हजार से अधिक प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं। इस फर्जीवाड़े में भारत के कई राज्यों सहित पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक के लोगों के प्रमाण पत्र शामिल हैं। शासन ने इन सभी फर्जी प्रमाण पत्रों को निरस्त करने का ऐलान किया है।

प्रमाण पत्र सिर्फ निरस्त ही नहीं किये जाएं, इन्हें बनवाने वाले नेता और अधिकारियों को भी नामजद किया जाए। क्योकि कोई अधिकारी बिना किसी नेता के संरक्षण मिले बिना इस काम को नहीं कर सकता।  

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फर्जी जन्म प्रमाण पत्रों से सलोन ब्लॉक के कुल 11 गाँव बुरी तरह प्रभावित हैं। इन 11 गाँवों को मिला कर कुल 52,594 जन्म प्रमाण पत्र फर्जी निकले हैं। ये जन्म प्रमाण पत्र बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, केरल व पंजाब राज्यों के साथ बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल तक के नागरिकों के नाम पर बनाए गए थे। उप-निदेशक पंचायती राज सास्वत आनंद सिंह ने इन सभी फर्जी प्रमाणपत्रों को निरस्त करने के आदेश दिए हैं।

इसी के साथ जिले के DPRO को भविष्य में जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने में खास सावधानी बरतने के निर्देश मिले हैं। जाँच में पता चला है कि कई गाँवों में तो जालसाजों ने एक ही दिन के अंदर 500 से लेकर 1000 तक फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बना डाले थे जबकि एक कंप्यूटर से 24 घंटे में 100 प्रमाणपत्र से अधिक नहीं निकल सकते हैं। माना जा रहा है कि एक ही आईडी और पासवर्ड से एक दिन में इतने ज्यादा प्रमाण पत्र बनाने के लिए कई प्रदेशों में बैठे साजिशकर्ताओं ने मिल कर काम किया था।

जिन 11 गाँवों में फर्जी जन्म प्रमाण पत्र पाए गए हैं जिसमें सबसे अधिक प्रभावित पाल्हीपुर है। यहाँ 13707 फर्जी प्रमाण पत्र पाए गए हैं। दूसरे नंबर पर नुरुद्दीनपुर है जहाँ मिले प्रमाण पत्रों की संख्या 10151 है। तीसरा नंबर पृथ्वीपुर का है। यहाँ 9393 फर्जी प्रमाण पत्र मिले हैं। इसके अलावा सांडा सैदन में 4897, माधौपुर निनैया में 3746, लहुरेपुर में 3780, गढ़ी इस्लामनगर में 2255, औनानीश में 1665, गोपालपुर उर्फ अनंतपुर में 225 और दुबहन में 2 फर्जी प्रमाण पत्र खोजे गए हैं।

इस फर्जीवाड़े का मुख्य आरोपित मोहम्मद जीशान है जो रायबरेली के ही सलोन का निवासी है। उसके साथ साजिश में शामिल रियाज, सुहेल खान और वीडीओ विजय सिंह यादव को भी दबोच लिया गया है। मामले की जाँच में ATS के साथ NIA को भी लगाया गया है। जाँच एजेंसियाँ इस फर्जीवाड़े में शामिल अन्य आरोपितों की मिलीभगत की पड़ताल में जुटी हैं।

मामले का खुलासा तब हुआ जब जुलाई 2024 में कुछ गाँवों की आबादी से अधिक जन्म प्रमाण पत्र बना डाले गए। शुरुआत में इस साजिश की भनक गाँवों के कई प्रधानों तक को नहीं लगी थी। खुद को पाक-साफ दिखाने के लिए विजय यादव ने ही इस फर्जीवाड़े की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई थी। पुलिस की जाँच में यह आया कि विजय यादव ने अपना सरकारी CUG नंबर जीशान को दे रखा था। इसी नंबर पर हर जन्म प्रमाण को एप्रूवल देने वाली OTP आती थी। 

बांग्लादेशी-रोहिंग्या बदल रहे मुंबई की डेमोग्राफी, TISS की रिपोर्ट से घुसपैठ पर छिड़ी बहस

                                                 अवैध घुसपैठिया मुस्लिम (साभार: Bing AI)
बांग्लादेश और म्यामांर से आने वाले अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों का घुसपैठ मुंबई में बड़े पैमाने पर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक बदलाव ला रहा है। इसके कारण साल 2051 तक इस महानगर में हिंदू आबादी घटकर 54 प्रतिशत से भी कम हो जाएगी। मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने अपनी एक खोजपरक रिपोर्ट में ये भयावह बातें कही हैं।

ज्वलंत प्रश्न यह है कि घुसपैठियों का मुद्दा चुनावों में ही क्यों खड़ा होता है? इतने वर्षों तक इस गंभीर मुद्दे पर कार्यवाही नहीं होती? घुसपैठियों को संरक्षण देने वाले कौन नेता और पार्टियां है, क्यों नहीं उन पर कार्यवाही होती? बॉर्डर केंद्र सरकार के अधीन होने के बावजूद घुसपैठ होना केंद्र सरकार पर ही प्रश्नचिन्ह लगा कोई बड़ी बात नहीं। आतंकवादियों का बराबर आना और उनके पास हथियारों का होना भी केंद्र सरकार की कार्यशैली और कार्यक्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।     

TISS ने ‘मुंबई में अवैध आप्रवासी: सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण’ शीर्षक 118 पृष्ठों की अपनी अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ राजनीतिक संस्थाएँ अपने वोट बैंक की राजनीति के लिए इन अवैध अप्रवासियों का इस्तेमाल कर रही हैं। अवैध रूप से आने वाले आप्रवासी मुंबई में आसानी से वोटर कार्ड पा जा रहे हैं और मतदान कर रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के दशकों में मुंबई में भारी डेमोग्राफिक बदलाव हुए हैं। साल 1961 में मुंबई की हिंदू आबादी 88 प्रतिशत थी, जो घटकर साल 2011 में 66 प्रतिशत रह गई। वहीं, इस दौरान मुस्लिम आबादी 8 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई। एक अनुमान के मुताबिक, साल 2051 तक यहाँ हिंदुओं की संख्या 54 प्रतिशत रह जाएगी, जबकि मुस्लिम 30 प्रतिशत से अधिक हो जाएँगे।

रिपोर्ट के अनुसार, एक जटिल नेटवर्क बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्याओं की घुसपैठ में मदद करता है। अवैध आप्रवासियों की आमद ‘वोट बैंक की राजनीति’ को बढ़ावा देती है। जाली दस्तावेजों के ज़रिए वोटर कार्ड बनवाकर चुनावों में घुसपैठियों की भागीदारी हो जाती है। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि मुंबई के 12 विधानसभा क्षेत्रों में आप्रवासी आबादी बहुसंख्यक है, जो मतदान पैटर्न को प्रभावित करती है।

घुसपैठियों की बढ़ती संख्या के कारण देश में वोट बैंक की राजनीति और आश्रय राजनीति की शुरुआत होती है। इसके कारण देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ-साथ देश की अखंडता को भी नुकसान पहुँचता है। घुसपैठियों की संख्या ने मूल निवासियों की संस्कृति एवं उनके अस्तित्व के लिए भी खतरा उत्पन्न कर दिया है। यह सामाजिक एवं आर्थिक के साथ-साथ राजनैतिक भी है।

अध्ययन में शामिल महिलाओं में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की तस्करी की गई थी और वो देह व्यापार में लगी हुई थीं। इनमें से 40 प्रतिशत आप्रवासी महिलाएँ बांग्लादेश स्थित अपने घर पैसे भेज रही हैं। यह रकम 10,000 रुपए से लेकर 1,00,000 रुपए मासिक तक है। इतना ही नहीं, ये आप्रवासी महानगर की बुनियादी ढाँचे पर भार भी बढ़ा रहे हैं। अवैध आप्रवासियों के कारण झुग्गियों में भारी भीड़ बढ़ी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि गोवंडी, कुर्ला और मानखुर्द जैसी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में घुसपैठियों की भीड़ के कारण बिजली और पानी की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया है। इससे सोशल वेलफेयर को खतरा हो रहा है। पहले से ही भारी दबाव वाले मुंबई में बुनियादी ढाँचों पर असहनीय दबाव पड़ रहा है। इसका सबसे अधिक प्रभाव स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और स्वच्छता जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, घुसपैठियों के कारण इन बुनियादी सेवाओं तक स्थानीय निवासियों की पहुँच कम हो गई है। आप्रवासियों की बढ़ती संख्या ने स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ा दिया है। बांग्लादेशी मुस्लिमों और रोहिंग्याओं द्वारा बेहद कम दर पर काम किया जाता है। इससे स्थानीय श्रमिकों के वेतन पर असर पड़ा है। उनमें नाराजगी बढ़ाती है। इसका फायदा राजनीतिक दल उठाते हैं।

इतना ही नहीं, आप्रवासी के कारण स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर आर्थिक असमानताएँ भी बढ़ी हैं, जिसके कारण सामाजिक तनाव और हिंसक झड़पें लगातार बढ़ रही हैं। साल 1965 से मुंबई में बढ़ रही घुसपैठियों की संख्या के कारण पर मराठी पहचान पर संकट बढ़ा है। स्थानीय लोगों में अपनी संस्कृति को लेकर भी असुरक्षा बढ़ती हैं। इसके कारण समाज में तनाव और सामाजिक विभाजन बढ़ा है।

रिपोर्ट के ‘सारांश, निष्कर्ष और निहितार्थ’ शीर्षक में कहा गया है कि मुंबई में अवैध मुस्लिम घुसपैठ से जुड़ी चुनौतियों के कारण बुनियादी क्षेत्रों की स्थिति चरमरा गई है। बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्याओं की घुसपैठ को कम करने के लिए प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप लागू करने की सख्त जरूरत है। इन चुनौतियों में शहर में सुरक्षा, रोजगार, चिकित्सा और सामुदायिक स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण हैं।

TISS के असिस्टेंट प्रोफेसर सौविक मंडल का कहना है कि यह एक चिंताजनक स्टडी है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिये आप्रवासी के तौर पर मुंबई में बसे हुए हैं। ये हवाई रास्ते से नहीं, बल्कि बॉर्डर पार करके आए हैं। उन्होंने कहा, “हमने तरीका समझा तो पाया की पहले परिवार का कोई सदस्य आता है, फिर पूरा परिवार। इस तरह अवैध तरीके से गाँव बसाया जाता है। ये डार्क नेटवर्क की तरह काम करता है।”

इस मुद्दे पर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में आयोजित एक सेमिनार में प्रमुख अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने कहा कि अवैध आप्रवासन एक वैश्विक मुद्दा है, जो दुनिया भर में राजनीति, सुरक्षा और जनसांख्यिकी को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि स्थिति ऐसी हो गई कि आज चुनाव अवैध आप्रवासन के विषय पर लड़े जा रहे हैं।

ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला देते हुए सान्याल ने अनियंत्रित जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणामों के बारे में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद से लाहौर और कराची जैसे शहर कैसे नाटकीय रूप से बदल गए हैं और वहाँ हिंदू एवं सिख आबादी में गिरावट आई है। उन्होंने आगे कहा, “आज बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों को दैनिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।”

सेमिनार में JNU की वीसी शांतिश्री पंडित ने अवैध आप्रवासन के जोखिमों को पहचानने का आग्रह किया। उन्होंने घुसपैठ के खतरों को लेकर कहा, “बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा भारत को दिए गए संवैधानिक अधिकार और महिलाओं के अधिकार खतरे में पड़ जाएँगे, क्योंकि जो लोग आते हैं वे उस संविधान को स्वीकार नहीं करते हैं। वे भारत के संविधान से ऊपर अपना कानून चाहते हैं।”

वहीं, TISS प्रो वीसी शंकर दास ने घुसपैठ से भाषा और संस्कृति पर उत्पन्न खतरों के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अवैध आप्रवासन केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसमें कट्टरपंथ के जोखिम भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “भारत और बांग्लादेश में एजेंटों के बीच एक बड़ी साँठ-गाँठ है।” उन्होंने कहा कि कुछ एजेंट अपंजीकृत एनजीओ या मजहबी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं।

जिस देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम, उसने अपनी जमीन पर रोहिंग्या मुस्लिमों को उतरने नहीं दिया: लकड़ी की नाव में 140 थे सवार, बोले स्थानीय- ये जहाँ भी गए, वहाँ फैलाई अशांति; भारत में बेगैरत पार्टियां अपनी कुर्सी की खातिर उनको संरक्षण दे रहे हैं ; क्या यही संविधान कहता है?

  इडोनेशिया के तट से नवंबर 2023 में भी लौटाए गए थे रोहिंग्या, ये तस्वीर UN ने जारी की थी। (फाइल फोटो:         UNHCR/Amanda Jufrian)
भारत में मुस्लिम आबादी इसलिए नहीं बढ़ रही कि इनके द्वारा ज्यादा बच्चे पैदा किये जा रहे है, जबकि असली सच्चाई यह कि बढ़ती पाकिस्तान और बांग्लादेशी घुसपैठ और दूसरे रोहिंग्यों को देश की प्रतिष्ठा दांव पर लगा संविधान की दुहाई देने वालों द्वारा अपनी कुर्सी बचाने के लिए इनको संरक्षण देना। देश में CAA विरोध प्रदर्शन हुए, किसके लिए? कौन लोग शामिल थे इन प्रदर्शनों में? 90%रोहिंग्या, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी घुसपैठियों का जमावड़ा था, जिन्हे बाकि 10% आयोजकों और उनके समर्थकों द्वारा सुरक्षा दी जा रही थी। इन प्रदर्शनों में फलों का आहार, बिरयानी आदि का बंटना और
 दूसरे, यह विरोध केवल मुस्लिम बहुल इलाकों में ही क्यों हुआ? यह ऐसा षड़यंत्र था जिसे आम हिन्दू नहीं समझ पाया। 

क्या हिन्दुओं ने इन पार्टियों से पूछने की हिम्मत की क्या विश्व के किसी भी मुस्लिम या गैर-मुस्लिम देश में घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण दिया जाता है? लेकिन भारत में कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां संविधान की दुहाई देकर देश को घोर संकट में डाल रही है। इस कटु सच्चाई को हर हिन्दू को गंभीरता लेना होगा। सरकारों पर इन घुसपैठियों को बाहर धक्का देने के लिए दबाव बनाना पड़ेगा और भारतीय मुसलमानों को भी रोहिंग्यों के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा। हिन्दुओं के साथ रहने में उनको ज्यादा आराम है लेकिन रोहिंग्यों के रहने पर हिन्दुओं से कहीं ज्यादा इन रोहिंग्यों से होगी, ये नहीं सोंचे की आखिर हैं तो मुसलमान ही। अगर ऐसा होता कोई मुस्लिम देश इनको अपने देश में रखने में डरता नहीं।   

इंडोनेशिया के आचे प्रांत के तट पर 140 रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों का एक समूह पहुँचा, लेकिन स्थानीय मछुआरा समुदाय के लोगों ने उन्हें जमीन पर कदम रखने ही नहीं दिया। इस घटना की वजह से तनाव की स्थिति बनी, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह, जिनमें ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, मलेशिया की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था। स्थानीय समुदाय ने सुरक्षा और शांति के नाम पर उनका विरोध किया और उन्हें नाव से उतरने नहीं दिया।

एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना इंडोनेशिया के उत्तरी प्रांत आचे के दक्षिणी हिस्से में लाबुहान हाजी के पास की है। 140 भूखे और थके हुए रोहिंग्या मुस्लिमों ने लकड़ी की नाव में सवार होकर बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से लगभग दो हफ्ते की समुद्री यात्रा की थी। इस दौरान तीन लोगों की मौत हो गई थी। जब यह नाव आचे के तट से लगभग 0.60 किलोमीटर दूर पहुँची, तो स्थानीय मछुआरों और निवासियों ने उनका विरोध किया।

स्थानीय मछुआरा समुदाय के मुखिया मोहम्मद जबल ने साफ तौर पर कहा कि उनका समुदाय इन्हें उतरने की अनुमति इसलिए नहीं देगा क्योंकि पहले के अनुभवों के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिम जहाँ भी गए हैं, वहाँ स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष और अशांति फैलाने की स्थिति उत्पन्न हुई है। जबल ने कहा, “हमने उन्हें खाना दिया, लेकिन हम यह नहीं चाहते कि यहाँ वही समस्या हो, जो अन्य स्थानों पर हुई है।”

अपने विरोध को जताने के लिए मछुआरों ने समुद्र के किनारे बड़ा बैनर लगाया है, जिसमें लिखा है, “साउथ आचे रीजेंसी के लोग इस क्षेत्र में रोहिंग्या शरणार्थियों के आगमन को अस्वीकार करते हैं।” स्थानीय लोगों का विरोध इसलिए भी है कि जहाँ-जहाँ रोहिंग्या मुस्लिम पहुँचे हैं, वहाँ संघर्ष और अशांति फैली है।

आचे पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह 9 अक्टूबर को बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से रवाना हुआ था और उनका मूल लक्ष्य मलेशिया पहुँचना था। इस यात्रा के दौरान, नाव पर सवार कुछ यात्रियों ने कथित तौर पर दूसरे देशों में पहुँचने के लिए पैसे भी दिए थे। हालाँकि, जब नाव इंडोनेशिया पहुंची, तब तक नाव पर कुल 216 लोग सवार थे, जिनमें से 50 लोग इंडोनेशिया के रियाउ प्रांत में उतर चुके थे। स्थानीय निवासियों ने हालाँकि घुसपैठियों को खाना दिया और संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के उच्चायुक्त ने भी भोजन सामग्री प्रदान की, लेकिन उन्हें जमीन पर कदम रखने की अनुमति नहीं दी गई।

सरकारी अधिकारियों द्वारा 11 रोहिंग्या मुस्लिमों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, क्योंकि उनकी तबियत बिगड़ चुकी थी। ये लोग लम्बी यात्रा के कारण कमजोर हो चुके थे, जिसमें अधिकतर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे। हालाँकि, स्थानीय मछुआरों और पुलिस के विरोध के कारण बाकी घुसपैठियों को वापस नाव पर ही रहना पड़ा। आचे पुलिस ने मानव तस्करी के संदेह में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि इन तीनों ने रोहिंग्या मुस्लिमों से पैसा लेकर उन्हें दूसरे देशों में पहुँचाने का वादा किया था।

रोहिंग्या मुस्लिमों का म्यांमार से पलायन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा 2017 में किए गए क्रूर आतंकवाद विरोधी अभियानों के बाद, करीब 740,000 रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को लंबे समय से व्यापक भेदभाव और अत्याचार का सामना करना पड़ा है, और वहाँ की सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से भी इनकार कर दिया है।

इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया जैसे अन्य देशों की तरह संयुक्त राष्ट्र के 1951 शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए इन्हें शरणार्थियों को स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है। इंडोनेशिया की आबादी में 87% लोग मुस्लिम मजहब से हैं, लेकिन वो लगातार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस भेजता रहा है।

बीते साल नवंबर 2023 में 250 लोगों से भरी नाव को भी वापस समंदर में लौटा दिया गया था, जिसके बारे में बात में आशंकाएँ जताई कि गई वो नाव दुर्घटना का शिकार हो गई। वहीं, मार्च 2024 में भी इंडोनेशिया के अधिकारियों और स्थानीय मछुआरों ने आचे के तट पर एक नाव से 75 लोगों को बचाय था, क्योंकि वो विरोध प्रदर्शन की वजह से वो नाव तट पर नहीं आ सकी थी और दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, उस घटना में नाव पलटने से 67 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें से कई महिलाएँ और बच्चे थे।

पुणे के एक गाँव को बांग्लादेशियों ने बना रखा था ठिकाना, फर्जी दस्तावेजों के साथ 21 गिरफ्तार: त्रिपुरा में 3 रोहिंग्या पकड़े गए, जा रहे थे हैदराबाद


महाराष्ट्र के पुणे स्थित रंजनगाँव में अवैध रूप से रह रहे 21 बांग्लादेशी नागरिकों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। वहीं, त्रिपुरा पुलिस ने 3 रोहिंग्या मुस्लिम और 2 बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। पुणे पुलिस ने 10 अवैध घुसपैठियों को कोर्ट में पेश किया, जहाँ अदालत ने उन्हें 24 अक्तूबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है। इनके पास से पैन-वोटर कार्ड सहित कई फर्जी दस्तावेज मिले हैं। 

इनके पैन कार्ड, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज किन अधिकारियों ने किन नेताओं के कहने पर बनाए? जब तक इन लोगों पर भी कार्यवाही नहीं होगी गैंग का पता नहीं चलेगा। इनसे सारी जानकारी लेकर इन्हे जेल में रखने की बजाए देश से बाहर किया जाना चाहिए।  

पुणे ग्रामीण एसपी पंकज देशमुख ने कहा, “कल रंजनगाँव एमआईडीसी पुलिस स्टेशन में हमने एक अपराध दर्ज किया। पूछताछ के बाद हमें पता चला कि वे रंजनगाँव इलाके में अवैध रूप से रह रहे थे। इसलिए हमने एक अपराध दर्ज किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें कोर्ट ले जाया गया है। कोर्ट ने 24 अक्टूबर तक 10 ऐसे आरोपियों की पुलिस हिरासत मंजूर की है।”

उन्होंने कहा, “हम पता लगा रहे हैं कि वे कितने समय से भारत में हैं। प्रारंभिक जाँच से पता चलता है कि वे 6 महीने से लेकर 10 साल से ये देश में रहे हैं। हम पता लगा रहे हैं कि इस देश में रहने का उनका मकसद क्या है। उनमें से कई लोग श्रम गतिविधि में लिप्त हैं और उन्हें मजदूरी कर रहे हैं। इसलिए, उनकी वास्तविक स्थिति पर टिप्पणी करना अभी बहुत प्रारंभिक है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमने उनके पास से मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज जब्त किए हैं। इसके अलावा, कई लोगों के पास से अवैध रूप से रह रहे लोगों के बारे में भी जानकारी मिली है। हम इस पहलू की भी जाँच कर रहे हैं कि क्या कोई संगठित रैकेट या एजेंट है, जो बांग्लादेशी नागरिकों को हमारे देश में लाकर स्थापित कर रहा है।”

कहा जा रहा है कि आरोपितों में 15 पुरुष, 4 महिलाएँ और 2 ट्रांसजेंडर व्यक्ति शामिल हैं। इन आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 336(2), 336(3), 338, 340(2) और भारतीय पासपोर्ट अधिनियम 1920 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामले की आगे की जाँच जारी है।

दरअसल, खुफिया सूचना के आधार पर पुणे पुलिस ने रजनगाँव में सोमवार (21 अक्टूबर 2024) को सर्च ऑपरेशन चलाया था और इन्हें गिरफ्तार किया था। पुलिस अधीक्षक पंकज देशमुख ने कहा, “उनमें से नौ के पास फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड थे और उनमें से एक के पास वोटर आईडी कार्ड भी था। बांग्लादेशी नागरिक के पास वोटर आईडी कार्ड था, उसने इसे गुजरात से हासिल किया था।”

एसपी ने कहा कि ये सभी या तो पैदल चलकर सीमा पार करते हुए पश्चिम बंगाल में यहाँ आए या फिर नावों से समुद्री मार्ग से अवैध रूप से यहाँ पहुँचे। उन्होंने कहा, “इनमें से कुछ के बच्चे भी हैं, जिनकी उम्र तीन साल से पाँच साल के बीच है। भारत में घुसने के बाद ये गुजरात और मुंबई चले गए। कुछ दिन पहले ये पुणे आए हैं।” उन्होंने कहा कि जाँच चल रही है और 2-3 दिन में यह बात स्पष्ट हो जाएगी।

जिन लोगों को पुलिस ने पकड़ा है, उनके नाम हैं- अजमुल शरत खान उर्फ ​​हासिफ खान (50) मोहम्मद अकबर अजीज अकबर सरदार (32) शफीकुल अलीमिया शेख (20) हुसैन मुखिद शेख (30) तारिकुल अतियार शेख (38) मोहम्मद उमर फारूक बाबू उर्फ ​​बाबू बुख्तियार शेख (32) शाहीन शाहजान शेख ( 44) मोहम्मद हुसैन शेख (32) रऊफ अकबर दफादार (35) इब्राहिम काजोल शेख (35) फरीद अब्बास शेख (48) मोहम्मद सद्दाम अब्दुल सखावती (35) मोहम्मद अब्दुल हबीब रहमान सरदार (32) आलिमिया तोहकील शेख (60) मोहम्मद इसराइल फकीर (35) फ़िरोज़ा मुताक़ीन शेख़ (20) लिपिया हसमुख मुल्ला (32) सलमा मलिक रोशन मलिक (23) हिना मुल्ला जुल्फिकार मुल्ला (40) सोनदीप उर्फ ​​काजोल बासुदीप विशेष (30) येनूर शाहदता मुल्ला (25)।

त्रिपुरा में बांग्लादेशी और रोहिंग्या गिरफ्तार

वहीं, त्रिपुरा की राजधानी अगरतला रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा एजेंसियों ने मंगलवार (22 अक्टूबर 2024) की सुबह तीन रोहिंग्या मुस्लिम और दो बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) के प्रभारी अधिकारी तपस दास ने कहा कि उन्हें सूचना मिली कि कुछ रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिक त्रिपुरा से बाहर जाने के लिए अगरतला रेलवे स्टेशन पर आएँगे।
दास ने कहा, “सूचना के आधार पर जीआरपी, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और बीएसएफ के जवान सादे कपड़ों में स्टेशन पर इंतजार कर रहे थे। जब वे लोग पहुँचे तो हमने उनमें से पाँच को हिरासत में लिया। शुरू में उन्होंने भारतीय नागरिक होने का दावा किया, लेकिन पूछताछ के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि उनमें से तीन रोहिंग्या और दो बांग्लादेशी हैं। वे अवैध रूप से राज्य में घुसे थे।”
तपस दास ने आगे बताया कि पूछताछ में पता चला कि रोहिंग्या नागरिक हैदराबाद जाने वाले थे, जबकि बांग्लादेशी नागरिक मुंबई जाने की योजना बना रहे थे। उन्होंने कहा, “हमने उनके पास से बांग्लादेशी मुद्रा, दस्तावेज और कुछ मोबाइल फोन जब्त किए हैं। हम उन्हें अदालत में पेश करके आगे की पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड माँगेंगे।”

हरियाणा : मनोहर लाल खट्टर साहब नुहुं में रोहिग्यों ने मदरसा कैसे बना लिया? मुख्यमंत्री रहते तुम और तुम्हारा प्रशासन क्या कर रहा था? जवाब दो ! घुसपैठ कर हरियाणा में बसे ही नहीं हैं रोहिंग्या मुस्लिम, चला रहे मदरसे भी: मौलवी बोले- हम ब्लैक में म्यांमार से आए

रोहिंग्या और नूहं का मदरसा (साभार: ऑर्गेनाइजर वीडियो)
हरियाणा के मुस्लिम बहुत मेवात क्षेत्र के नूहं में बाहर से आए हुए रोहिंग्या मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी अवैध रूप से रह रही है। ये सभी म्यामांर से अवैध रूप से भारत में आए और यहाँ से नूहं में स्थापित हो गए। इन अवैध घुसपैठियों के रहने वाले अस्थायी आवास बनाया गया है। ये सभी साल 2016 में ही भारत आ गए थे और तभी से यहाँ रह रहे हैं। इनमें रहने के साथ-साथ मदरसा भी संचालित किया जा रहा है।

दरअसल, ऑर्गनाइजर ने हरियाणा विधानसभा चुनावों के दौरान इन अवैध घुसपैठियों से बात की थी। इसका वीडियो अब जारी किया गया है। ऑर्गेनाइजर की ओर से पत्रकार शुभी विश्वकर्मा ने यहाँ मदरसे में पढ़ाने वाले मौलाना और यहाँ पढ़ने वाले बच्चों से बात की। यहाँ पढ़ाने वाले यूनुस ने कहा कि यहाँ 400 रोहिंग्या रहते हैं। हालाँकि, उनकी जुबानी ये संख्या है, लेकिन वास्तविक संख्या कितनी है, ये किसी को नहीं पता।

ये वही क्षेत्र है, जहाँ से हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरन कॉन्ग्रेस नेता मामन खान से रिकॉर्ड जीत हासिल की है। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में उन्हें एकतरफा मत मिले। चुनाव प्रचार के दौरान मामन यहाँ के हिंदुओं को धमकाते हुए कहा था कि जिन लोगों ने मुस्लिमों के खिलाफ अन्याय किया है, उन्हें कॉन्ग्रेस की सरकार बनते ही मेवात छोड़ना पड़ेगा। मामन का नाम 2023 के मेवात दंगों में आया था।

नूहं के नांगली गाँव में पत्रकार पहुँचे। यहाँ बाँस आदि से छप्पर के रूप में एक अस्थायी ढाँचा बनाया गया है, जिस पर लिखा है ‘मदरसा इस्लामिया दारूल उलूम इल्यासिया’। ये ढाँचा एक बड़े भूभाग पर बनाया गया है। इसमें नमाजी टोपी पहने हुए बहुत सारे बच्चे और किशोर दिखाई देते हैं। इसमें जियाउर रहमान नाम के एक व्यक्ति है, जो खुद को मौलवी बताता है।

रहमान कहता है कि वह नहूँ में रहता है कि मदरसे में बच्चों को पढ़ाने के लिए वह गाँव में आता है। रहमान खुद भी म्यामांर (बर्मा) का रहने वाला है। रहमान ने बताया कि साल 2016 से यह मदरसा चल रहा है। यहाँ पढ़ने वाले सारे बच्चे म्यामांर के ही है। मदरसे में ही बच्चों को खाना भी मिलता है। रात में रहते भी हैं। उसने बताया कि यहाँ कभी रेड नहीं पड़ी और ना ही किसी ने पूछा कि वे कहाँ के रहने वाले हैं।

 रहमान ने बताया कि उसे भारत में किसी तरह का खतरा नहीं है, क्योंकि वह यहाँ मेहमान के हिसाब से रह रहा है। बर्मा से आया और व्यक्ति मोहम्मद यूनुस नाम का मिला। उसने बताया कि वह बच्चों को अरबी और अंग्रेजी पढ़ाता है। यूनुस ने बताया कि यहाँ रहने वाले रोहिंग्या मुस्लिमों की आबादी लगभग 400 है। यूनुस ने बताया कि भारत में आने के लिए उन सबों के पास कुछ भी नहीं है।

यूनुस ने कहा, “ना हमारे पास पासपोर्ट है, ना वीजा है। हम कैसे-कैसे करके यहाँ आ गए, यह बहुत मुश्किल काम है। हम ब्लैक में आ गए।” ब्लैक से संभवत: यहाँ पैसे देकर अवैध तरीके से घुसपैठ करने से संबंधित है। यूनुस ने बताया कि वह बांग्लादेश बॉर्डर के जरिए भारत में घुसा। उन्होंने कहा कि वहाँ कुछ लोग उसे मिले, जिन्होंने उसे बॉर्डर पार कराया और वहाँ से वह बंगाल में रहने लगा।

यूनुस ने बताया कि बॉर्डर पार कराने वालों ने कुछ लोगों से पैसा भी लिया और कुछ लोगों को बिना पैसे का ही बॉर्डर पार करा दिया। यूनुस ने बताया कि वह उसके साथ अधिकांश लोग म्यामांर में लड़ाई शुरू होने के बाद 2016 में भारत में आए। उसका कहना है कि कुछ लोग तो भारत में साल 2012 में ही आ गए थे और तभी वे यहाँ रह रहे हैं। यूनुस का दावा है कि उसके पास UN का रिफ्यूजी कार्ड है।

हालाँकि, जब पत्रकारों ने उससे रिफ्यूजी कार्ड दिखाने के लिए कहा तो वह बोला कि वह घर पर है और घर कहीं और है। यूनुस ने बताया कि इलाके में कुछ भी होता है तो उसे खबर कर दिया जाता है कि घर से बाहर नहीं निकलना है। यूनुस ने बताया कि म्यामांर से भागे हुए रोहिंग्या हैदाराबाद, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में रह रहे हैं।

इस मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों से जब पूछा गया कि वे पढ़ाई करके क्या करेंगे तो 99 प्रतिशत ने कहा कि वे हाफिज बनेंगे और अल्लाह की सेवा करेंगे। इन बच्चों को जाकिर नाईक के बारे में अच्छे से पता है। लगभग 12 साल के एक बच्चे ने कहा कि जाकिर नाईक इसलिए अच्छा लगता है, क्योंकि वह लोगों को दीन (इस्लाम) के रास्ते पर लाता है। यानी लोगों का इस्लाम में धर्मांतरण कराता है।

किशोर ने कहा कि जो अल्लाह को नहीं मानता है कि वह दोजख की आग में जलेगा। एक छोटे से बच्चे ने कलमा पढ़ कर सुनाया और कहा कि इसका मतलब है कि अल्लाह के सिवा और कोई भगवान नहीं है। यही बात एक किशोर ने भी कहा है। हालाँकि, बच्चे हर शब्द बोलने से पहले अपने मौलवी या हाफिज की तरफ देख रहे थे। जाहिर है कि वो काफी सोचकर बोल रहे थे।

दरअसल, इस मदरसे में पढ़ाने वाले यूनुस ने दावा किया कि रोहिंग्या मुस्लिम UN के रिफ्यूजी कार्ड पर भारत में आकर रह रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ वह कह रहा है कि बांग्लादेश सीमा के जरिए पैसे देकर कुछ लोगों की सहायता से भारत में घुसा था। इस तरह की विरोधाभासी बातें संदेह पैदा करती है। अगर यूनुस स्वयं स्वीकार करता है कि यहाँ 400 रोहिंग्या रहते हैं तो वास्तविक संख्या कितनी होगी, इसकी सही जानकारी शायद ही किसी को होगी।


बौद्ध देश म्यांमार ने ड्रोन हमला कर बिछा दी 200 रोहिंग्या मुस्लिमों की लाशें: बांग्लादेश में घुसपैठ की कर रहे थे कोशिश

                                   म्यांमार ने ड्रोन से खदेड़-खदेड़ कर रोहिंग्यों की बिछाई लाशें
जहाँ एक तरफ भारत में कई रोहिंग्या घुसपैठिए दर्जी दस्तावेज बना कर बैठे हुए हैं और विभिन्न प्रकार के अपराधों में भी लिप्त पाए जाते हैं, वहीं पड़ोसी देश म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर वार किया जा रहा है। बांग्लादेश में अराजकता का माहौल है, शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर मुल्क से भागना पड़ा। उसके बाद नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया है। इसी बीच मुफीद माहौल देख कर म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम बांग्लादेश में घुसपैठ करने लगे।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सीमा के पास ही म्यांमार ने इन रोहिंग्या मुस्लिमों की लाशें बिछा दी। उनके रिश्तेदार अपनों के शवों को ढूँढ रहे हैं। ये घटना सोमवार (5 अगस्त, 2024) की बताई जा रही है, जिसका खुलासा अब हुआ है। इस घटना के 4 गवाह सामने आए हैं। इस हमले में एक गर्भवती महिला और उसकी 2 साल की बेटी की भी मौत हो गई। म्यांमार में जुंटा सेना और बागियों की झड़प के बीच रखाइन में ये पहला बड़ा हमला है। इस घटना के लिए ‘अराकान आर्मी’ को जिम्मेदार बताया जा रहा है।

हालाँकि, उसने और म्यांमार की सेना दोनों ने इस घटना से खुद को अलग कर लिया है। मृतकों के स्पष्ट आँकड़े अब तक सामने नहीं आए हैं। वीडियो में देखा गया कि दलदली क्षेत्र में लाशें बिछी हुई हैं और आसपास उनके सूटकेस और बैग्स के अलावा अन्य सामानों के ढेर लगे हुए हैं। वहाँ से बच कर निकले कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने 70 लाशें देखी हैं, जबकि कुछ ने 200 का आँकड़ा दिया है। घटना म्यांमार के तटीय शहर माउंगडॉ के पास की है। मोहम्मद इलियास ने बताया कि उसकी गर्भवती पत्नी और 2 साल की बेटी मारी गई।

ड्रोन का इस्तेमाल कर गोलियाँ बरसाई गईं। कई लोग बचने के लिए जमीन पर लेट गए। 28 वर्षीय शमशुद्दीन अपनी पत्नी और नए जन्मे बच्चे के साथ किसी तरह बच निकला, उसने बताया कि लोग दर्द से कराह रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और बांग्लादेश की मीडिया का कहना है कि दोनों देशों की सीमा निर्धारित करने वाली नाफ़ नदी में भाग रहे रोहिंग्या मुस्लिमों की नाव भी डूब गई, जिसमें कई मरे। UN ने कहा कि उसे इन घटनाओं का पता है, लेकिन कितने लोग मरे हैं वो इसकी पुष्टि नहीं कर सकता। म्यांमार से अब तक 7.30 लाख रोहिंग्या भाग चुके हैं।