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लिपुलेख-कालापानी पर शेखी बघार अपने ही देश में घिरे बालेन शाह, सुगौली संधि से ब्रिटेन का भी कनेक्शन: जानिए भारत-नेपाल सीमा विवाद के बारे में सब कुछ

       भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दों को लेकर नेपाल PM बालेन शाह ने ब्रिटेन के आगे फैलाया हाथ (साभार: AI)
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर दिया गया बयान नेपाल की राजनीति से लेकर भारत-नेपाल संबंधों तक चर्चा का विषय बन गया है। संसद में सीमा विवाद से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा कि नेपाल केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन (UK) से भी बातचीत कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर भारत ने नेपाल और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसदों ने तर्क दिया कि भारत और नेपाल की खुली सीमा वाले क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि का उपयोग और किसी राज्य द्वारा दूसरे देश की जमीन पर कब्जा करने में बड़ा अंतर है।

दशकों पुरानी खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग खेती, व्यापार और आवागमन के लिए एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। इसलिए इसे अतिक्रमण या कब्जा कहना उचित नहीं है।

इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

हालाँकि बालेन शाह के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा ब्रिटेन के सामने उनका हाथ फैलाकर मदद माँगना था। सवाल उठने लगा कि आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटेन का नाम क्यों आया और नेपाल इस मुद्दे को ब्रिटेन से क्यों जोड़ रहा है। इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर 210 साल पुरानी सुगौली संधि और लिपुलेख-कालापानी विवाद से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटेन का जिक्र क्यों आया?

नेपाल का तर्क है कि सीमा विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। इसलिए नेपाल के कुछ नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड हो सकते हैं जो सीमा विवाद की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट कर सकें।

इसी के तहत बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यंजनकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि यूनाइटेड किंगडम इस विवाद को सुलझाने में कैसे मदद कर सकता है। हालाँकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन ने इस मुद्दे को भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला माना है और किसी तरह की मध्यस्थता में रुचि नहीं दिखाई है।

आलोचकों का कहना है कि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन का नाम लेने से विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा गया।

आखिर क्या है लिपुलेख दर्रा? भारत के पास मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य

लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के करीब स्थित है। भारतीय पक्ष से यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है और तिब्बत के पुरांग (तकलाकोट) क्षेत्र को जोड़ता है।

भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से यह दर्रा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सदियों से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क का रास्ता रहा है। इसके अलावा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। भारत और चीन के बीच होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा के दो प्रमुख मार्गों में से एक लिपुलेख होकर गुजरता है।

हाल ही में भारत और चीन ने 2026 से कैलास मानसरोवर यात्रा फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसी घोषणा के बाद लिपुलेख एक बार फिर चर्चा में आ गया, क्योंकि नेपाल ने इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई और कहा कि विवादित क्षेत्र से जुड़े मामलों पर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।

बालेन शाह सरकार ने दावा किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, इसीलिए वहाँ से गुजरना नेपाल के कानून के खिलाफ है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत और चीन को इस स्थिति से अवगत कराया। बयान में कहा गया कि नेपाल सरकार अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।

नेपाल के इस दावे को लेकर भारत ने कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और एक जैसा रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पारंपरिक मार्ग रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। यह कोई नई बात नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह के एकतरफा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है। भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।”

लिपुलेख विवाद की जड़ क्या है और क्या दावा करता है नेपाल?

भारत और नेपाल के बीच वास्तविक विवाद केवल लिपुलेख दर्रे तक सीमित नहीं है। इसके साथ कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।

इस पूरे विवाद की जड़ काली नदी (महाकाली नदी) के उद्गम स्थल को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच प्राकृतिक सीमा माना गया था। लेकिन समस्या यह है कि दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम को अलग-अलग स्थान मानते हैं।

नेपाल बिना किसी साक्ष्य के दावा करता है कि काली नदी का मूल स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है और कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र में आते हैं।

वहीं भारत ने हमेशा इस दावे का खंडन किया है। भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे स्थित है। भारत के अनुसार, सीमा निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए, जिसके चलते कालापानी, लिपुलेख और आसपास का क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा बनता है।

भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।

सुगौली संधि क्या थी?

लिपुलेख विवाद को समझने के लिए सुगौली संधि को समझना बेहद जरूरी है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में गोरखा साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। इस विस्तार के कारण नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हुआ।
1814 से 1816 के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध लड़ा गया। युद्ध में नेपाल को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए और 4 मार्च 1816 से यह प्रभावी हो गई। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्रों पर दावा छोड़ दिया।
साथ ही यह तय किया गया कि काली नदी दोनों पक्षों के बीच सीमा का काम करेगी। नेपाल आज भी अपने दावों के समर्थन में इसी संधि और ब्रिटिश काल के कई पुराने नक्शों का हवाला देता है। नेपाल का तर्क है कि यदि मूल संधि और शुरुआती नक्शों को आधार बनाया जाए तो कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके हिस्से में आते हैं।

2020 में क्यों बढ़ा था विवाद और क्या है भारत का पक्ष?

लिपुलेख विवाद 2020 में भी सुर्खियों में आया था। भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था। इस सड़क का उद्देश्य कैलास मानसरोवर यात्रियों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच आसान बनाना था। नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया और कहा कि सड़क विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है।
इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया। बाद में नेपाल ने इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दे दी। भारत ने नेपाल की इस कार्रवाई को एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए।

भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक सीमाएँ विरासत में प्राप्त कीं और उसी आधार पर इन क्षेत्रों का प्रबंधन किया जाता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया।

भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मौजूदगी मजबूत की। भारत का यह भी तर्क है कि कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग दशकों से किया जाता रहा है और यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध बेहद गहरे हैं। यही कारण है कि सीमा से जुड़े अधिकांश मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए किया जाता रहा है, लेकिन नेपाल ने एक बार फिर बिना सबूतों के दावा तो ठोका ही साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के बजाय तीसरे देश को भी बेवजह शामिल करने की कोशिश की।(साभार) 

भारत विरोधी बड़बोलेपन के कारण अपने ही देश की संसद में घिरे नेपाल के PM बालेन शाह, चीन प्रेम पर भी सांसदों ने लताड़ा


नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपने पहले संसदीय प्रश्नकाल के दौरान दिए गए बयानों को लेकर विवादों में घिर गए हैं। प्रतिनिधि सभा में सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दों पर उन्होंने ब्रिटेन से मदद माँगी है। बालेन शाह ने यह भी दावा किया कि नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है।

शाह ने कहा, “हमने ना केवल भारत और चीन से बात की है बल्कि ब्रिटेन सरकार से भी संपर्क किया है। हमारा मानना है कि ब्रिटेन को इसमें दिलचस्पी लेनी चाहिए क्योंकि यह विवाद उस दौर का है, जब ब्रिटिश भारत ने इस इलाके को छोड़ा था।”

CPN-UPL की सांसद पद्मा अर्याल के सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा, “प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा नहीं किया है। नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा जमा रखा है। इसका सही तरीका यही होगा कि दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को सुलझा लें।”

पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसद बसाना थापा ने आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री ने बिना किसी तथ्य या सबूत के इतना गंभीर बयान दिया है और यह बयान राष्ट्रीय अखंडता को ठेस पहुँचाएगा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को नुकसान पहुँचाएगा।

चीन का उदाहरण देने पर भी बालेन शाह को सांसदों ने घेरा

इसके अलावा पीएम बालेन शाह को चीन का उदाहरण देने पर भी सांसदों ने घेरा। उन्होंने नेपाल के सबसे कम विकसित देश से विकासशील देश का दर्जा प्राप्त करने में दो साल की देरी के संबंध में सांसदों के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा, “पड़ोसी देश चीन हाल ही में विकासशील से विकसित देश बन गया है।”

सांसदों ने इसे तथ्यों की गलती बताते हुए प्रधानमंत्री बालेन शाह की आलोचना की। सांसद खुशबू ओली ने काउंटर किया कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय निकाय अभी भी चीन को ‘विकासशील देश’ की श्रेणी में रखते हैं।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने दी सफाई

प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत की भूमि पर कब्जा करने वाले बयान को अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया ने कवर किया। सोशल मीडिया पर भी इस बयान की कड़ी आलोचना की गई। इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय से सफाई देते हुए बयान जारी किया गया।

                                                       फोटो साभार: Government of Nepal

बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ और ‘ऑक्युपेशन’ से उनका मतलब उन नागरिकों से था जो सीमा के दूसरी ओर जमीन की खेती करते हैं या वहाँ रह रहे हैं।

नेपाल में लैंड करते टर्किश एयरलाइंस की फ्लाइट में लगी आग: बाल-बाल बचे 289 लोग, Video

                                                                                                               प्रतीकात्मक चित्र (साभार: AI)
नेपाल की राजधानी काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सोमवार (11 मई 2026) को एक बड़ा हादसा टल गया। इस्तांबुल (तुर्की) से काठमांडू आ रही टर्किश एयरलाइंस की फ्लाइट TK-726 के टायर में लैंडिंग के दौरान अचानक आग लग गई। घटना के समय विमान में कुल 289 लोग सवार थे जिनमें 278 यात्री और 11 चालक दल के सदस्य शामिल थे। यात्रियों में संयुक्त राष्ट्र (UN) के कुछ अधिकारी भी मौजूद थे।

आग लगते ही एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी मच गई लेकिन दमकल कर्मियों ने तुरंत मौके पर पहुँचकर आग पर काबू पा लिया। इसके बाद विमान में मौजूद सभी यात्रियों और क्रू मेंबर्स को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है। घटना का एक वीडियो भी सामने आया है।

एयरपोर्ट सुरक्षा के एसपी राजकुमार सिलावल ने बताया कि विमान इस्तांबुल से काठमांडू पहुँचा था और लैंडिंग के दौरान उसके टायर में आग लग गई। फायर इंजन की मदद से स्थिति को तुरंत नियंत्रित कर लिया गया। फिलहाल अधिकारी घटना के कारणों की जाँच कर रहे हैं।

J&K को दिखाया पाकिस्तान का हिस्सा, नॉर्थ ईस्ट को चीन में घुसाया: गलत मैप शेयर करने पर नेपाल एयरलाइंस को गाली पड़ी तो बोले- SORRY, गलती हो गई

    नेपाल एयरलाइंंस ने भारत के J&K को पाकिस्तान और नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाते मैप किया शेयर (साभार: X-Nepal Airlines)
नेपाल में बालेन शाह की सरकार बनने के बाद एक और भारत-विरोधी कारनामे सामने आ रहे हैं। अब नेपाल एयरलाइंस ने नक्शा (मैप) जारी किया, जिसमें पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का और पूरे नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाया गया है। भारत के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एयरलाइन से जवाबदेही माँगी, तब जाकर एयरलाइन ने ऐसा भ्रामक नक्शा दिखाने के लिए माफी माँगी है।

दरअसल, नेपाल की ‘नेपाल एयरलाइंस’ ने 29 अप्रैल 2026 ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट पर अपने फ्लाइट नेटवर्क को दिखाते हुए पूरी दुनिया का एक नक्शा पोस्ट किया। इस नक्शे में सबसे आपत्तिजनक बात थी कि इसमें भारत के अधिकतर हिस्सों को चीन और पाकिस्तान के नक्शे में दिखाया गया।

नक्शे में खासकर पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया, जिस पर भारत के नेटिजन्स भड़क गए। इतना ही नहीं भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे सिक्किम, दार्जीलिंग समेत पूरे नॉर्थ ईस्ट को भी चीन के हिस्से में दिखाया गया। यह देखकर भारत के नेटिजंस और ज्यादा गुस्सा गए।

नेपाल एयरलाइंस पर भारत के नेटिजन्स का फूटा गुस्सा

इस हरकत के बाद नेपाल एयरलाइंस भारत के नेटिजन्स के निशाने पर आ गया। लोगों ने नेपाल एयरलाइंस से जवाबदेही माँगी। ‘एक्स’ पर #NepalAirlines और #JammuKashmir से जुड़े हैशटैग के साथ पोस्ट वायरल होने लगे, जिसमें यूजर्स ने इसे भारत-विरोधी और जानबूझकर किया गया गलत काम बताया।

दिव्या गंडोत्रा ​​टंडन नाम की यूजर ने लिखा, “भारत ने दशकों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। खुली सीमा से लेकर लाखों नेपाली नागरिकों को रोजगार देने तक, व्यापार के लिए भारत के बंदरगाह उपलब्ध कराने से लेकर ईंधन पाइपलाइन, बिजली परियोजनाएँ, आपदा के समय मदद, बुनियादी ढाँचे का निर्माण, स्कॉलरशिप और सैन्य सहयोग तक, भारत हमेशा नेपाल के साथ खड़ा रहा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “लेकिन ऐसे में नेपाल एयरलाइंस की ओर से जारी एक फ्लाइट नेटवर्क मैप ने हैरान कर दिया। इस मैप में जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के साथ दिखाया गया। यह कोई साधारण डिजाइन की गलती नहीं लगती, बल्कि एक गंभीर और संवेदनशील मामला है। जब भारत आज भी नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साझेदार है, तब एक राष्ट्रीय एयरलाइन से ऐसी लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती। यह केवल एक नक्शा नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है, जो कई सवाल खड़े करता है।”

असम के वोकेशनल टीचर्स एसोसिएशन के आधिकारिक हैंडल ने भी आपत्ति जताते हुए लिखा, “भारत कई दशकों से नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साथी रहा है। ऐसे में नेपाल एयरलाइंस द्वारा अपने फ्लाइट मैप में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। यह एक गंभीर गलती है, जिसे सुधारा जाना चाहिए।”

ऐसे ही भोजपुरी स्टार और RJD नेता खेसारी लाल यादव ने भी लिखा, “कोई बता पाएगा की क्या सोच के नेपाल एयरलाइंस भारत के नक्शे में ऐसा छेड़ छाढ़ किया है और वो भी जम्मू कश्मीर को लेकर? ये मामूली बात नहीं है, जानबूझकर किया हुआ काम लगता हैं। इसको चिढ़ाना बोलते हैं।”

‘द दार्जीलिंग क्रोनिकल’ नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “नेपाल एयरलाइंस की नजर में दुनिया कुछ अलग ही है। उनके नक्शे को देखें तो ऐसा लगता है कि भारत का पूरा उत्तर-पश्चिम, पूरा उत्तर-पूर्व, दार्जिलिंग, सिक्किम और यहाँ तक कि म्यांमार का हिस्सा भी चीन में शामिल कर दिया गया है। काठमांडू में आजकल लोग क्या फूँक रहे हैं?”

नेपाल एयरलाइंस ने माँगी माफी

भारत के यूजर्स की कड़ी आलोचना के बाद नेपाल एयरलाइंस ने आखिरकार सार्वजनिक तौर पर माफी माँगी। एयरलाइन ने कहा कि वे अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर हाल ही में साझा किए गए फ्लाइट नेटवर्क मैप में हुई गलती के लिए दिल से माफी माँगते हैं।

यह भी कहा कि इस नक्शे में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लेकर गंभीर त्रुटियाँ थीं, जो नेपाल सरकार या नेपाल एयरलाइंस की आधिकारिक स्थिति को बिल्कुल भी नहीं दर्शाती है।

नेपाल का भारत-विरोधी रुख और बालेन शाह सरकार में उथल-पुथल

नेपाल में नई बालेन शाह सरकार बनने के बाद से ही नेपाल का भारत-विरोधी रुख सामने आता जा रहा है। हाल ही में बालेन शाह सरकार नई भंसार नीति लाई थी, जिसके तहत भारत से लाए जाने वाले 100 से अधिक नेपाली रुपये (लगभग ₹63) के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाई थी, जिसके बाद भी बालेन शाह सरकार का विरोध हुआ था।

यह भी किसी से नहीं छिपा कि बालेन शाह सरकार अपने ही फैसलों से गतिरोध का सामना कर रही है, उनके बड़े-बड़े मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिसके बाद उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ा। कुल मिलाकर नई बालेन शाह सरकार देश को चलाने में असमर्थ साबित हो रही है।

नेपाल :Gen-Z हिंसा मामले में बालेन शाह सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को किया गिरफ्तार

  नेपाल ने नए PM बालेन शाह(बाएँ), पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा (दाएँ) (साभार : News18 & Prabhatkhabar)
नेपाल में शनिवार (28 मार्च 2026) तड़के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को पुलिस ने उनके घरों से गिरफ्तार कर लिया। बालेन शाह के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक एक दिन बाद हुई इस कार्रवाई ने पूरे देश को चौंका दिया है।

यह गिरफ्तारियाँ पिछले साल सितंबर में हुए ‘Gen-Z’ आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और 77 लोगों की मौत के मामले में ‘आपराधिक लापरवाही‘ को लेकर की गई हैं। नेपाल के गृह मंत्री सुधन गुरुंग ने ओली और रमेश लेखक की गिरफ्तारी पर प्रतिक्रिया दी है। सुधन गुरुंग ने कहा, “वादा, वादा होता है। कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। हमने ओली और रमेश लेखक को हिरासत में ले लिया है। यह किसी के खिलाफ प्रतिशोध नहीं है बल्कि न्याय की शुरुआत है।”

कानूनी शिकंजा और चीन की चिंता

दोनों नेताओं पर राष्ट्रीय दंड संहिता की धारा 181 और 182 के तहत केस दर्ज किया गया है, जिसमें दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल हो सकती है। केपी ओली की गिरफ्तारी से चीन की टेंशन भी बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें बीजिंग का करीबी माना जाता है।
आयोग ने सिर्फ नेताओं ही नहीं, बल्कि तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग, गृह सचिव गोकर्ण मणि दवाडी और सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजू अर्याल समेत कई बड़े अफसरों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की है। प्रशासन अब इन हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियों के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हाई अलर्ट पर है।

क्यों हुई गिरफ्तारी?

सितंबर 2025 में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा था। इस आंदोलन में व्यापक हिंसा हुई, संसद जलाई गई और अरबों की संपत्ति स्वाहा हो गई। पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की के जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ओली और रमेश लेखक को दोषी पाया।
रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया जानकारी होने के बावजूद प्रशासन ने लापरवाही बरती, जिससे हालात बेकाबू हुए। शुक्रवार रात कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को लागू करने का फैसला लिया, जिसके बाद कोर्ट से वारंट जारी हुए।

बिहार नए गृह मंत्री की अग्नि परीक्षा : नेपाल की तरह बिहार में थी दंगे भड़काने की साजिश रचने वाली कब होगी गिरफ्तार? करिश्मा अजीज ने किए कई भड़काऊ पोस्ट: 2 राज्यों में दर्ज हुई शिकायत

     नेपाल की फेक वीडियो दिखाकर करिश्मा एजाज बिहार में दंगा फैलाने की साजिश रच रही (साभार :                                                                                                             X_@lkoabhishek & Moneycontrol)
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा अजीज नाम की युवती आजकल पुलिस के लिए पहेली बनी हुई है, जिसने बिहार और उत्तराखंड दो अलग-अलग राज्यों को निशाना बनाया है। करिश्मा अजीज पर इन दोनों राज्यों में आईटी एक्ट और कई गंभीर आरोपों के तहत FIR दर्ज है। इसके बावजूद, करिश्मा अजीज का डिजिटल ऑपरेशन लगातार जारी है, जहाँ उसके सोशल मीडिया अकाउंट से लगातार भ्रामक और विवादित कंटेंट पोस्ट किए जा रहे हैं।

यह पहला मौका है कि गृह मंत्रालय नीतीश कुमार से लेकर बीजेपी के सम्राट चौधरी के हाथ सौंपने के पीछे बहुत बड़ी राजनीति है। कई हादसों में नीतीश कोई कार्यवाही करने में असहाय नज़र आते थे जिस कारण बिहार में माफिया और बाहुबली राज करते रहे, जिसका चुनावों में सामना करना पड़ा। अगर मोदी-योगी-अमित ने मेहनत नहीं की होती बिहार हाथ से निकल जाता। बिहार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी के लिए करिश्मा अज़ीज़ को गिरफ्तार करना शायद किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं। देखना यह है कि ऐसी उपद्रवी महिला को कब गिरफ्तार करते हैं?  

हैरत की बात यह है कि उसका एक्स अकाउंट केवल आठ महीने पुराना है, जिसे मई 2025 में एक्स प्लेटफॉर्म द्वारा वेरीफाई भी कर दिया गया था। वर्तमान में, उसके इस अकाउंट के 19.3 हजार से अधिक फॉलोवर्स हैं और उसके प्रत्येक वीडियो पर 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिलते हैं। उसका ऑपरेशन एक अकाउंट तक सीमित नहीं है, बल्कि वह करिश्मा अजीज के नाम से जुड़े 7 से 8 अतिरिक्त बैकअप अकाउंट्स का पूरा नेटवर्क चला रही है।

साजिश का इतिहास: बिहार से पहले उत्तराखंड को बनाया निशाना

जाँच में सामने आया है कि करिश्मा अजीज की यह भड़काऊ गतिविधि केवल बिहार तक सीमित नहीं थी। उसने सबसे पहले उत्तराखंड को टारगेट किया था। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में धराली आपदा के बाद जब शोक का माहौल था, तब करिश्मा अजीज सहित कुछ अकाउंट्स ने जवानों की मौत और आम नागरिकों की त्रासदी पर अभद्र और सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली टिप्पणियाँ की थीं।

देहरादून के हिंदू संगठनों की शिकायत पर करिश्मा अजीज सहित तीन लोगों के खिलाफ उत्तराखंड में पहली FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद, बिहार विधानसभा चुनाव (2025) समाप्त होने पर उसने बिहार को निशाना बनाया। मुजफ्फरपुर साइबर थाने को इनपुट मिला कि करिश्मा अजीज ने 16 नवंबर की शाम को अपने एक्स हैंडल पर 32 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बिहार चुनाव की मतगणना के बाद युवा सड़क पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।

साइबर थाने के एएसआई दयाल नारायण सिंह ने तुरंत इसकी जाँच की, तो पता चला कि यह वीडियो नेपाल में हुए GenZ जैसे हिंसक प्रदर्शनों का फुटेज था, जिसे बिहार का बताकर जानबूझकर नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद मुजफ्फरपुर में उसके खिलाफ दूसरी FIR दर्ज की गई। मुजफ्फरपुर की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास है।

कानून की गिरफ्त से दूर, मेटा से माँगी गई जानकारी

मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा एजाज का X आईडी @KarishmaAziz_ है। इस पर वह लगातार भ्रामक वीडियो और विवादित कंटेंट पोस्ट कर रही है, लेकिन वह अभी भी कानून की पहुँच से बाहर है। पुलिस जाँच में यह पता चला है कि वह अपनी लोकेशन छिपाने के लिए वीपीएन और प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल कर रही है।

इसके अलावा, वह अलग-अलग अकाउंट्स में अलग-अलग मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी का उपयोग कर रही है, जिससे लोकेशन बार-बार बदल रही है और उसे ट्रेस करने में मुश्किलें आ रही हैं। साइबर DSP हिमांशु कुमार ने पुष्टि की है कि युवती के ID से जुड़ी पूरी जानकारी पाने के लिए मेटा और एक्स को मेल भेजा गया है।

पुलिस फिलहाल एक्स से पूरा डाटा मिलने का इंतजार कर रही है, जिसके बाद ही उसके खिलाफ आगे की बड़ी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि करिश्मा अजीज का यह कृत्य स्पष्ट रूप से बिहार में भी नेपाल जैसा हिंसक विरोध प्रदर्शन का माहौल तैयार करने या उसे उकसाने का प्रयास है, जो जन-शांति भंग करने और समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने वाला गंभीर अपराध है।

BBC की Gen-Z को जगाने की चाह या दंगे भड़काने की बेताबी? भारत भी नेपाल की तरह जले, ऐसा क्यों चाहता है पश्चिमी मीडिया?

     बीबीसी भारत में भी नेपाल की तरह फैलाना चाहता है जेन-जी में हिंसा (फोटो साभार: India Today/AI Dall-E)
2014 में जब से भारत में मोदी सरकार आयी है भारत से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधियों की रोटी-पानी हराम हो गयी है। मोदी सरकार के आने से मुस्लिम कट्टरपंथी और क्रिस्चियन मिशनरीज सत्ताधारियों की छत्रसाया में अपना खेल खेल रहे थे। उनके खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शांति के दुश्मन और अंग्रेजों के दलाल आदि पता नहीं कितने नामों से बदनाम किया जाता था। लेकिन अब जनता खासतौर से हिन्दुओं में चेतना का संचार शुरू होने से भारत विरोधी गैंग बहुत बेचैन है। मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं को डराने "सिर तन से जुदा" गैंग को सड़क पर निकाल देते हैं लेकिन भूल रहे हैं कि अब हिन्दुओं में ईंट का जवाब पत्थर देने के लिए तैयार हो रहा है। और जिस दिन हिन्दू सड़क पर आ गया कोई कट्टरपंथी तो क्या "सिर तन से जुदा" गैंग को पूरे भारत में कहीं छिपने की जगह नहीं मिलेगी। आखिर बर्दास्त की भी एक सीमा होती है। हिन्दू अदालतों के चक्कर में फंसने की बजाए कट्टरपंथियों की तरह सड़क पर ही ऐसा फैसला करेगा अदालतें तक देखती रहेंगी। क्योकि इसकी जिम्मेदार भी हमारी अदालतें होंगी। कन्हैया के कातिलों को क्या अब तक फांसी हुई? क्यों नहीं हुई?


 

खैर, जिस BBC इंडिया के समाचारों को मोदी सरकार के आने से पहले बड़ी प्रमाणिकता से सुना ही नहीं जाता था बल्कि विश्वास भी किया जाता था। अब उसी BBC इंडिया को बेनकाब कर रहा है OpIndia का प्रस्तुत लेख :-             

BBC इंडिया हर कुछ महीनों में कोई ऐसा लेख छापता है, जो पत्रकारिता और मनोवैज्ञानिक जंग के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है। हाल ही में उसने एक लेख छापा, जिसका शीर्षक था “Gen Z उठ रहा है? भारत के नौजवान सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे?” ये लेख उसी पुरानी चाल का नया नमूना है, जिसमें छिपे-छिपे भारत को अस्थिर करने की कोशिश की जाती है।

पहली नजर में ये लेख एक साधारण सवाल उठाता है: भारत का Gen Z, जो इतना बड़ा, बेचैन और इंटरनेट से जुड़ा है, वो नेपाल या बांग्लादेश के नौजवानों की तरह क्रांति क्यों नहीं कर रहा? लेकिन जरा गौर से देखो, तो ये लेख विश्लेषण कम और उकसावा ज्यादा लगता है। ये भारतीय नौजवानों को खुलेआम बगावत करने और पड़ोस के देशों में हो रही अराजकता की नकल करने का न्योता देता है।

BBC की निष्पक्षता का दावा और दंगों की चाहत

खुद को निष्पक्ष बताने वाले BBC का हिंसक विद्रोहों को महिमामंडन करना हैरान करता है। लेख का लहजा ऐसा है, जैसे उसे दुख हो कि भारतीय छात्रों ने अभी तक आगजनी, तोड़फोड़ और सरकार बदलने की कोशिश नहीं की। ये सिर्फ औपनिवेशिक सोच का नतीजा नहीं, जो अपने पुराने गुलाम देश को बिखरते देखना चाहता है ताकि दूर बैठकर नैतिक उपदेश दे सके। ये कुछ ज्यादा सोचा-समझा, वैचारिक और गहरे राजनीतिक है।

उकसावे की कला में माहिर है बीबीसी

BBC का ये लेख प्रोपेगेंडा का उस्ताद है। ये शुरू होता है एशिया के ‘बेचैन’ Gen Z की तारीफ से, जो ’48 घंटों में सरकारें गिरा देते हैं’, जैसे कि संस्थानों का ढहना प्रगति का मेडल हो। फिर आता है भारत से तुलना – भारत के नौजवान ‘बिखरे हुए’, ‘डरे हुए’ और ‘अलग-थलग’ हैं। मतलब साफ है: वे अपने जेनरेशन के फर्ज को निभाने में नाकाम हैं, क्योंकि वे दंगे नहीं कर रहे।

                                                      बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट

लहजा मनोवैज्ञानिक है, विश्लेषणात्मक नहीं। ‘राष्ट्र-विरोधी करार दिए जाने का डर’ और ‘सरकार का विरोध को बदनाम करना’ जैसे शब्द गहरे सोचने के लिए नहीं, बल्कि गिल्ट फील कराने के लिए डाले गए हैं। ये पत्रकारिता नहीं, जो भारतीय नौजवानों के शांत रहने की वजह समझना चाहे। ये विश्लेषण के भेष में उकसावा है, जो शांति को कायरता और संयम को दमन बताता है।

नेपाल का उदाहरण बना BBC का नया जुनून

लेख को प्रेरणा नेपाल से मिली है, जहाँ सितंबर 2025 में तथाकथित ‘Gen Z क्रांति’ ने केपी ओली की सरकार गिरा दी। BBC इसे फिल्मी अंदाज में बयान करता है, जैसे कोई ऐतिहासिक नौजवानी वीरता का पल हो।
लेकिन इस चमक के पीछे भयानक सच है। नेपाल के विद्रोह में करीब 20 लोग मरे, पूर्व प्रधानमंत्रियों के घर जला दिए गए, मंत्रियों पर हमले हुए और सिंह दरबार जैसे ऐतिहासिक स्थलों में तोड़फोड़ हुई। सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ा और देश अब सैन्य शासन की कगार पर है।
लेकिन BBC इस अराजकता को ‘सफलता’ बताता है, एक ऐसा ‘उदाहरण’ जिसे भारत के नौजवानों को नकल करना चाहिए। लेख ये नहीं बताता कि नेपाल के प्रदर्शनकारी खुद हिंसा से अलग हो गए थे, कहते हुए कि उनके आंदोलन को बाहरी तत्वों ने हाईजैक कर लिया। लेकिन BBC ये क्यों बताएगा? क्योंकि उसका मकसद जानकारी देना नहीं, बल्कि ये विचार बोना है कि भारत का ‘बेचैन’ Gen Z नेपाल के दंगाइयों के ‘वीरतापूर्ण’ नक्शेकदम पर चले।

सेलेक्टिव तरीके से पुरानी बातों को नजरअंदाज करता है बीबीसी

BBC भारत के पुराने सड़क आंदोलनों को जैसे अन्ना हजारे आंदोलन से लेकर CAA विरोध तक, बड़े प्यार से याद करता है, जैसे कि वो असहमति का स्वर्ण युग हो। लेकिन इन विरोधों से हुई खून-खराबा, तबाही और सामुदायिक टकराव पर BBC चुप्पी साध लेता है।

CAA विरोध में भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति जलाई, सड़कें रोकीं, और दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मरे। BBC जिन ‘छात्र नेताओं’ को अब रोमांटिक बनाता है, वे गाँधीवादी सत्याग्रही नहीं, बल्कि दंगे भड़काने के आरोपित कट्टरपंथी थे।

ऐसे आंदोलनों को ‘नोबल’ बताकर और आज के समय में ऐसे विद्रोहों की कमी पर अफसोस जताकर, BBC असल में अराजकता की कमी को मिस कर रहा है। उसे वो दौर याद आता है, जब भारत को ‘अस्थिर’ और ‘दमनकारी’ दिखाया जा सकता था- ऐसी हेडलाइंस जो लंदन के न्यूज़रूम में ज्यादा बिकती हैं, बनिस्पत ‘भारत 8% की दर से बढ़ रहा है।’

‘राष्ट्र-विरोधी’ का झाँसा

लेख में ‘राष्ट्र-विरोधी’ शब्द एक चालाक हथियार है। BBC के फ्रेम में, इस डर ने भारतीय नौजवानों को सड़कों पर उतरने से रोक रखा है। ये चतुराई है, जो राष्ट्रवाद को तानाशाही और असहमति को वीरता से जोड़ देती है।

लेकिन सच ये है कि भारतीय नौजवान समझदार हो गए हैं। उन्होंने देखा है कि ‘एक्टिविज्म’ को कैसे स्वार्थी ताकतें हथियार बना लेती हैं। शाहीन बाग की सुनियोजित नाकेबंदी से लेकर विदेशी फंडिंग वाले NGOs, जो छात्र आंदोलनों के भेष में काम करते हैं, Gen Z खामोश नहीं है क्योंकि वो डर गया है। वो खामोश है क्योंकि वो समझदार हो गया है।

उन्हें पता है कि बसें जलाने से नौकरियाँ नहीं मिलतीं, पत्थर फेंकने से भ्रष्टाचार नहीं रुकता, और सरकार गिराने से बेहतर कल की गारंटी नहीं मिलती। भारत का Gen Z स्टार्टअप बना रहा है, कोड लिख रहा है, फिल्में बना रहा है, दुनिया घूम रहा है, न कि बाहरी कठपुतलियों के इशारे पर सियासी ड्रामे में अपनी ताकत बर्बाद कर रहा है।

लोगों का सड़कों पर उतरना बीबीसी को पसंद

जब BBC उमर खालिद की जेल या जामिया टकराव का जिक्र करता है, तो ये कोई शैक्षिक संदर्भ नहीं, बल्कि भावनात्मक ट्रिगर है। वो ‘क्रूर सरकारी दमन’ की याद को फिर से जगाना चाहता है और 2019 को अधूरी कहानी के रूप में पेश करना चाहता है।

लेख का छिपा संदेश साफ है: “तुमने अपने सीनियर्स के साथ क्या हुआ देखा। क्या तुम वापस नहीं लड़ना चाहते?” ये पत्रकारिता नहीं, भावनात्मक छेड़छाड़ है।

BBC यूनिवर्सिटी प्रोटेस्ट कल्चर के ‘खोने’ का मातम मनाता है, लेकिन असल में वो इस बात का दुख मना रहा है कि मोदी सरकार ने कैंपस अनुशासन बहाल कर दिया और शिक्षण संस्थानों को सियासी संगठनों के हवाले होने से रोक दिया।

भारत के कैंपस वैचारिक भटकाव के मैदान से बदलकर इनोवेशन के हब बन गए हैं। ये बदलाव, जाहिर है, BBC को बर्दाश्त नहीं, जो अपने भारतीय नौजवानों को गुस्सैल, बेकार और सिस्टम-विरोधी देखना पसंद करता है।

Gen Z बिखरा हुआ या आजाद? BBC का दोहरा रवैया

लेख में BBC भारत की विविधता को कमजोरी बताता है, कहता है कि नौजवान जाति, भाषा और क्षेत्र में बंटे होने की वजह से एकजुट नहीं हो पाते। लेकिन यही विविधता जब काम आए, तो इसे ‘जीवंत बहुसंस्कृतिवाद’ कहा जाता है।

नेपाल या बांग्लादेश में एकरूपता की वजह से बड़े पैमाने पर मूवमेंट आसान है। लेकिन भारत में विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की आत्मा है। BBC इसे ‘बिखराव’ कहता है। भारतीय इसे संघवाद कहते हैं।

BBC का ‘राष्ट्रीय युवा विद्रोह’ की चाहत उसकी औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है, जो एकरूपता, एकजुटता और अराजकता को संकट के रूप में दिखाना चाहती है।

भारत की स्थिरता है पश्चिम की समस्या

BBC का असली दुख भारत के नौजवानों से नहीं, भारत की स्थिरता से है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका पश्चिमी मीडिया के लिए इसलिए काम के हैं, क्योंकि वे अस्थिर हैं और ‘विदेशी लोकतंत्रों’ के रूप में पढ़े जा सकते हैं। लेकिन 37 करोड़ Gen Z वालों वाला भारत, जो बिना टूटे संवैधानिक व्यवस्था के साथ चल रहा है, उनकी कहानी को बिगाड़ देता है।

2024 समेत हर चुनाव दिखाता है कि भारतीय नौजवान निराश नहीं, बल्कि समझदार हैं। बीजेपी को युवाओं का मजबूत समर्थन मिलता है, न कि डर की वजह से, बल्कि कामकाज, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याण, राष्ट्रवाद और डिजिटल सशक्तिकरण की वजह से। इसलिए BBC का ये दावा कि नौजवान ‘राजनीति से बचते हैं’ ये खोखला लगता है।

भारतीय नौजवान सड़क के आंदोलनों से डिजिटल और चुनावी एक्टिविज्म की ओर बढ़ गए हैं, जहाँ उनकी आवाज ज्यादा मायने रखती है और उनके विरोध को पेशेवर अराजकतावादी हाईजैक नहीं कर सकते।

मोदी फैक्टर है BBC के असली दुख की वजह

BBC के मातम का असली केंद्र समाजशास्त्र नहीं, बल्कि राजनीति है। BBC, The Guardian और The New York Times जैसे पश्चिमी संस्थान नरेंद्र मोदी को दो चीजों के लिए कभी माफ नहीं कर पाए: पहला, भारत की हिंदू सभ्यता की पहचान को बिना शर्मिंदगी के सामने लाने के लिए… और दूसरा- इसे लोकतांत्रिक तरीके से, वोट के जरिए करने के लिए।

जब मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया, तो ये सिर्फ धार्मिक समारोह नहीं था; ये सभ्यता का सुधार था। इसने दुनिया को बताया कि भारत अब अपनी आस्था के लिए माफी नहीं माँगेगा, न ही धर्मनिरपेक्षता को हिंदू पहचान की अनुपस्थिति के रूप में परिभाषित करेगा। BBC की नजर में ये पाप था।

उनका वैश्विक दृष्टिकोण बाइनरी पर चलता है: बहुसंख्यक यानी दमनकारी, राष्ट्रवाद यानी फासीवाद, स्थिरता यानी तानाशाही। तो जब भारत के नौजवान इन बाइनरी को ठुकराकर प्रगति को चुनते हैं, तो BBC का वैचारिक तंत्र घबरा जाता है।

पश्चिमी मीडिया का बगावतों से मोह

पश्चिमी मीडिया का ग्लोबल साउथ के विद्रोहों को कवर करने का तरीका कुछ परेशान करने वाला है। वे दूर से क्रांतियों की तारीफ करते हैं और जब धूल जम जाती है तो गायब हो जाते हैं।

अरब स्प्रिंग से लेकर श्रीलंका के विरोधों तक, पश्चिमी मीडिया ने ‘युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों’ को शेर की तरह पेश किया और जब ये देश अस्थिरता, महँगाई या गृहयुद्ध में फंस गए, तो वे खुद खिसक गए।

अब वे नया खेल का मैदान ढूँढ रहे हैं और अपनी विशाल युवा आबादी के साथ भारत उनके लिए सबसे बड़ा ईनाम है।

इसलिए BBC का लेख पत्रकारिता कम और भर्ती का पोस्टर ज्यादा लगता है- “अपने पड़ोसियों को देखो। क्या तुम उनके जैसे नहीं बनना चाहते?”

लेकिन भारतीय अब आसानी से बेवकूफ नहीं बनते। उन्होंने देखा है कि ये ‘नेताविहीन’ आंदोलन लोकतंत्र में नहीं, बल्कि अव्यवस्था में खत्म होते हैं।

असली Gen Z क्रांति: खामोश, डिजिटल और निर्णायक

भारत का Gen Z सड़कों पर उतरकर इतिहास रचने की जरूरत नहीं समझता। उनकी क्रांति शांत लेकिन गहरी है- स्टार्टअप्स में, सिविक टेक में, डिजिटल गवर्नेंस में और अपनी पहचान पर नए गर्व में। वे दिल्ली की सड़कों पर नारे लगाने की बजाय अगला आधार कोड कर रहे हैं। वे हाईवे पर टायर जलाने की बजाय टियर-3 शहरों से डॉलर कमा रहे हैं।

ये भारतीय असहमति का नया चेहरा है-रचनात्मक, जो विनाशकारी नहीं है। और यही वो चीज है, जो BBC को परेशान करती है- एक ऐसी पीढ़ी, जिसे कट्टरपंथी बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ प्रेरित किया जा सकता है।

BBC क्यों चाहता है कि भारत में खून बहे

जब BBC लिखता है कि भारत का Gen Z ‘सतर्क लेकिन बगावती नहीं’ है, तो ये तारीफ नहीं, बल्कि शिकायत है। वो चाहता है टूटे शीशों, आँसू गैस और तिरंगे से रंगे अशांति के फुटेज, जो भारत को फिर से अस्थिरता का देश दिखा सकें।

क्योंकि BBC के लिए मोदी के नेतृत्व में शांत, आत्मविश्वास से भरा और आत्मनिर्भर भारत सबसे बड़ा दुःस्वप्न है। वो एक हिंदू-बहुसंख्यक लोकतंत्र को समझ नहीं पाता, जो अपनी आस्था के लिए माफी माँगे बिना फलता-फूलता है, सड़कों के वीटो को तोड़ता है और पश्चिमी नैतिक उपदेशों के सामने झुकने से इनकार करता है।

वही BBC जो काठमांडू में आगजनी की तारीफ करता है, उसे दिल्ली में ‘लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति’ कहेगा, जब तक कि आग उनके अपने दूतावासों के करीब न पहुँच जाए।

राहुल गाँधी और BBC का कनेक्शन

दिलचस्प बात ये है कि BBC का उकसावा अकेले नहीं गूँजा। नेपाल में केपी ओली की सरकार गिरने के कुछ ही दिनों बाद, राहुल गाँधी ने अचानक भारत के Gen Z के लिए नया प्यार जाहिर किया, जिसे सिर्फ सियासी मौकापरस्ती ही कहा जा सकता है।

X पर गाँधी ने ऐलान किया कि ‘Gen Z संविधान बचाएगा और वोटर फ्रॉड रोकेगा,’ और फिर उनकी पार्टी ने एक अजीब ‘Gen Z गान’ लॉन्च किया– एक रैप सॉन्ग, जो गुस्से और बगावत को रोमांटिक बनाता है और इसे “युवा भारत की आवाज” बताता है।

BBC की शिकायत और कॉन्ग्रेस की इस नई चाल के बीच सटीक तालमेल देखना मुश्किल नहीं। BBC भारतीय नौजवानों को डरे हुए पीड़ितों के रूप में दिखाता है; राहुल गाँधी उन्हें नारों, गानों और बनावटी गुस्से से ‘जगाने’ की कोशिश करते हैं। एक वैचारिक जमीन तैयार करता है, दूसरा सियासी स्क्रिप्ट देता है।

ये तालमेल इत्तेफाक नहीं बल्कि एक इकोसिस्टम का हिस्सा है। दोनों का मकसद एक है: भारत के नौजवानों को सुधार की बजाय विद्रोह करने, बहस की बजाय तोड़ने के लिए उकसाना। BBC कहानी लिखता है; कॉन्ग्रेस उसे बढ़ावा देती है, इस उम्मीद में कि सोशल मीडिया की चिंगारी सड़कों पर आग बन जाए।

भारत की शांति, उसके मौजूदा नेतृत्व में भरोसा

लेकिन अब तक भारतीय नौजवानों ने लोकतंत्र और मौजूदा नेतृत्व में भरोसा दिखाया है। ये सिर्फ भरोसा नहीं, उससे कहीं ज्यादा है।
भारत के लोकतंत्र की खूबी उसकी आवाज में नहीं, बल्कि उसके संयम में है। एक अरब लोगों का एक साथ रहना, बहस करना और अपनी राजधानी को जलाए बिना वोट करना कमजोरी नहीं, सभ्यता है।
BBC को शाहीन बाग जैसा कुछ और चाहिए, लेकिन भारत आगे बढ़ चुका है। मोदी सरकार ने भागीदारी के विचार को सड़क विद्रोहों से डिजिटल सशक्तिकरण और नीतिगत जुड़ाव तक बदल दिया है। और भारत का नौजवान ‘दबाया’ हुआ नहीं है, बल्कि उस देश को बनाने में व्यस्त है, जिस पर BBC को शक करना पसंद है।
तो… बीबीसी जी, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि Gen Z अपनी नियति हासिल करने में ‘नाकाम’ हो रहा। बाल्कि वो अपने लक्ष्यों की ओर खामोशी से बढ़ रहा है। यही खामोशी बीबीसी को हजम नहीं हो रही।
यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।(साभार) 

नेपाल की ‘कुमारी देवी’ परंपरा, कैसे चुनते हैं ‘तलेजु देवी’ का अवतार: जानिए किन कठिन परीक्षाओं के बाद 2 साल की आर्यतारा बनीं नई ‘जीवित देवी’

           नेपाल में 2 साल 8 महीने की आर्यतारा शाक्य बनीं नई 'जीवित देवी' (फोटो साभार: HimalayanTimes)
नेपाल के काठमांडू में दो साल आठ महीने की आर्यतारा शाक्य को नेपाल की नई कुमारी यानि नई ‘जीवित देवी’ के रूप में चुना गया। मंगलवार (30 सितंबर 2025) को आर्यतारा को उनके घर से तलेजु भवानी मंदिर में ले जाया गया। इस दौरान बच्ची के माता-पिता भावुक हो गए क्योंकि अब देवी घर से दूर मंदिर में विराजमान रहेंगी।

आर्यतारा ने पूर्ववर्ती कुमारी, तृष्णा शाक्य का स्थान लिया। परंपरा के अनुसार, मौजूदा कुमारी जैसे ही किशोरावस्था में प्रवेश करती है तो उन्हें सामान्य मनुष्य माना जाने लगता है। देवी चुने जाने वाले दिन आर्यतारा को उनके पिता गोद में उठाकर कुमारी घर लेकर आए। इस दौरान भव्य समारोह आयोजित किया गया। जहाँ हजारों लोग कुमारी की एक झलक पाने के लिए कतार में खड़े रहे।

अष्टमी तिथि को हुए इस समारोह में आर्यतारा कुमारी की औपचारिक पूजा की गई। कुमारी को आशीर्वाद के साथ घर से विदा कर काठमांडू के ऐतिहासिक कुमारी घर में स्थायी रूप से बैठाया गया। यह परिवार के लिए सम्मान की बात मानी जाती है क्योंकि कुमारी का परिवार समाज में प्रतिष्ठित हो जाता है।

कौन है ‘जीवित देवी’?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई कुमारी का पूरा नाम आर्यतारा शाक्य है, जिनकी उम्र केवल दो साल आठ महीने है। वे शाक्य वंश के नेवार समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। ये वही समुदाय है, जो कुमारी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। आर्यतारा के पिता का नाम अनंत शाक्य, माता का नाम प्रतिष्ठा शाक्य है। उनकी एक बहन भी है, जिसका नाम पारमिता शाक्य है।

कैसे चुनी जाती हैं ‘जीवित देवी’?

नेपाल की इस परंपरा में कुमारी का सार्वजनिक रूप से चयन किया जाता है। इनमें नेवार समुदाय के शाक्य वंश की बालिकाओं का ही चयन होता है और यहा भी जरूरी है कि वे काठमांडू की मूल निवासी हो।

कुमारी बनने के लिए बालिकाओं में 32 गुण होने जरूरी हैं। इनमें 12 मानदंडों पर परीक्षा सफल करनी होती है। इनमें शारीरीक मानदंड में सुंदरता पर खास ध्यान दिया जाता है, जैसे चेहरा, दाँत, आँखें और त्वचा पर किसी प्रकार के दाग-धब्बे नहीं होने चाहिए या बच्ची के शरीर पर कोई घाव का निशान न हो।

आध्यात्मिक और व्यवहार संबंधी मानदंड पूरा करने के लिए बच्ची में निडर, शांत स्वभाव, दैवीय गुण होने जरूरी हैं। पारंपरिक अनुष्ठानों और ज्योतिष परीक्षणों के जरिए भी योग्य लड़की चुनी जाती है। आमतौर पर 2 से 4 साल की आयु की बच्ची का ही चयन कुमारी के रूप में किया जाता है। कुमारी बनने के बाद मासिक धर्म तक पहुँचने पर वह ‘देवी’ का रूप त्याग देती हैं और सामान्य जीवन में लौट आती हैं।

कुमारी चुने जाने के लिए ये मानदंड सदियों से चले आ रहे हैं। हालाँकि, आधुनिक समय में कुछ बदलाव और चर्चाएँ रही हैं, जिसमें कुमारी चुने जाने पर निजी शिक्षा लेने, टीवी देखने और कुछ आधुनिक सुविधाएँ पाने का अधिकार मिला है।

‘जीवित देवी’ बनने की परीक्षा

बच्ची को ‘जीवित देवी’ बनने के लिए कठिन परीक्षा से गुजरना होता है। इससे बच्ची की देवी के रूप में साहस और अन्य गुणों को परखा जाता है। परीक्षा के दौरान बच्ची को बलि दिए गए भैंसो और रक्त में नाचते हुए नकाबपोश पुरुषों को दिखाया जाता है। इस दौरान अगर डर का कोई भी लक्षण बच्ची में दिखता है तो उसे अयोग्य माना जाता है। चूँकि बच्ची को तलेजु का अवतार माना जाएगा इसीलिए बच्ची का साहसी होना महत्वपूर्ण है।

कुमारी चुने जाने के बाद बच्ची को माता-पिता का घर छोड़ना होता है। देवी का रूप बने रहने तक बच्ची को मंदिर में स्थायी रूप से विराजित किया जाता है, यहाँ खास कुमारी घर की व्यवस्था की जाती है। जहाँ देवी आम लोगों को दर्शन देती हैं। कुमारी के परिवार को बेटी से मिलने की अनुमति नहीं होती है। केवल साल में 13 बार सार्वजनिक आयोजनों में जाने के वक्त माता-पिता उनसे मिल सकते हैं।

‘जीवित देवी’ का रूप

कुमार तलेजु देवी का रूप मानी जाती हैं। इसीलिए कुमारी चुने जाने पर उन्हें हमेशा लाल वस्त्र पहनने हैं। बच्ची पूरी तरह से देवी धारण कर रहेंगी। बालों में चोटी बाँधती है और उनके माथे पर तीसरी आँख बनी होती है। नई जीवित देवी की पूजा हिंदू और बौद्ध धर्म के लोग करते हैं।
यह परंपरा 500 से 600 वर्ष पुरानी है जो मल्ल राजाओं के समय शुरू हुई। हालाँकि, सदियों से चली आ रही परंपरा में समय-समय पर बदलाव होते गए हैं। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल सरकार ने अब सेवानिवृत्त कुमारियों को लगभग 110 डॉलर (भारतीय रुपए में 9765.80) की छोटी मासिक पेंशन भी प्रदान करनी शुरू कर दी है, जो सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से थोड़ा अधिक है।

पूर्व ‘जीवित देवी’ कौन हैं?

मंगलवार (30 सितंबर 2025) को ही पूर्व कुमारी जीवित देवी के रूप से सेवानिवृत्त हुई हैं। इस दौरान भव्य यात्रा निकालकर उन्हें वापस घर ले जाया गया। पूर्व कुमारी का नाम तृष्णा शाक्य है, जो साल 2017 में जीवित देवी चुनी गई थीं। अब 11 साल की आयु में तृष्णा शाक्य ने आम मनुष्य के जीवन में लौट गई हैं।

‘नेपाल जैसे लगा दो धामी के घर को आग’: UKSSSC पेपर लीक की आड़ में Gen-Z वाली आग से देवभूमि सुलगाने की साजिश, कौन बना रहा है व्हॉट्सएप ग्रुप्स से हिंसक माहौल?

UKSSSC पेपर लीक प्रदर्शन में नेपाल वाले हाल की साजिश, नेताओं को जिंदा जलाने की दे डाली धमकी ( फोटो साभार: Dainik Jagran/ TrueMediaHouse)

उत्तराखंड के देहरादून में UKSSSC पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है। इस प्रदर्शन में बेरोजगार युवा प्रदेश की धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। जहाँ कट्टरता की वही सीमापार हुई जैसे साल 2020 के दौरान दिल्ली दंगो में हुई थी। देहरादून में चल रहे प्रदर्शन में भी वही ‘आजादी’ के नारे लगाए गए। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

 पेपर लीक पर सड़कों पर उतरने वाले है तो बेरोजगार युवा और इन युवाओं की माँग मामले में CBI जाँच कराए जाने की है। जबकि धामी सरकार पहले ही पेपर लीक मामले में SIT गठन के आदेश दे चुकी है। इससे साफ है कि प्रदर्शन अब सिर्फ पेपर लीक मामले में जाँच की माँग तक सीमित नहीं है बल्कि हिंदुओं के विरोध और उत्तराखंड में नेपाल और बांग्लादेश जैसी स्थित बनाने की साजिश है।

नेपाल-बांग्लादेश-श्रीलंका जैसी हिंसा फैलाने की साजिश के सबूत

उत्तराखंड में UKSSSC पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन से नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात बनाने के सबूत भी ऑपइंडिया को मिले हैं। प्रदर्शन से संबंधित कुछ कुछ व्हाट्सऐप ग्रुप के चैट्स के स्क्रीनशॉट्स मिले हैं। इन चैट्स में युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काया जा रहा है, ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा हाल ही में नेपाल में हुआ और पिछले साल बांग्लादेश और तीन साल पहले श्रीलंका में हुआ।

नीचे दिखाया गया स्क्रीनशॉट ‘प्रदेश युवा संगठन उत्तराखंड क्रांति दल’ नाम से व्हाट्सऐप ग्रुप का है। जो युवाओं को नेपाल के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए भड़का रहा है। इस व्हाट्सऐप ग्रुप पर चैट्स में लिखा गया, “धामी के घर पर आग लगा दो जैसा नेपाल में हुआ।”

                                        व्हाट्सऐप पर युवाओं को भड़काने वाले ग्रुप का स्क्रीनशॉट

इस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन युवाओं से संदेश भेजते हैं, जिसमें लिखा है, “भाई लोगों सभी मिलकर मारते हैं धामी को, नेपाल वाला इतिहास दोहराया जाए।”

                                       व्हाट्सऐप पर युवाओं को भड़काने वाले ग्रुप का स्क्रीनशॉट

इससे साफ है कि शिक्षा और बेरोजगारी के खिलाफ देहरादून में चल रहा प्रदर्शन आम युवाओं का नहीं है। बल्कि यह वही सोची-समझी साजिश के तहत नेपाल के Gen Z की तरह ही युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश है। लेह में भी यूँ ही प्रदर्शन के बीच हिंसा फैल गई। इससे ये बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि उत्तराखंड में व्हाट्सऐप ग्रुप पर Gen Z को भड़काने वाले आखिर कौन हैं?

प्रदर्शन में नेपाल की तरह नेताओं को जिंदा जलाने की धमकी

ऐसा ही एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें प्रदर्शन में शामिल युवती हिंदुओं का विरोध के साथ ही भारत में नेपाल जैसे हालात बनने की चेतावनी भी देती है। उसने साफ शब्दों में सीएम पुष्कर धामी के मरने की भी धमकी दे डाली और कहा कि उन्हें बचाने खराब मौसम के चलते हेलीकॉप्टर भी नहीं आएँगे।

इस वीडिया में मीडिया से बातचीत में युवती कहती है, “जिस दिन युवाओं ने नेपाल जैसी हालत कर दी और मौसम खराब रहा तो इन्हें लेने तो हेलीकॉप्टर लेने भी नहीं आएँगे। जैसे बांग्लादेश और नेपाल में हेलीकॉप्टर ने नेताओं को उठाया था। हम दुआ करेंगे कि मौसम इतना खराब रहे कि जिंदा जलाया जाए। युवा जाग चुका है।”

हिंदू धर्म का अपमान करते हुए युवती ने कहा, “सरकार सिर्फ हिंदू धर्म का आगे बढ़ाती है। जैसे बलिदानी सैनिक तिरंगे में लिपटता है वैसे ही इन नेताओं को भगवा में लिपटकर भेजो तब औकात पता चलेगी। युवाओं को जगना होगा, गाँव में भगवा घुसने ही नहीं दिया जाए।”

उत्तराखंड में नकल जिहाद बर्दाश्त नहीं: CM पुष्कर धामी

पेपर लीक मामले ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने भी सख्त रुख अपनाया है। सीएम ने कहा कि उत्तराखंड में नकल जिहाद की कोशिश को कभी कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा, कोचिंग और नकल माफिया एक होकर राज्य में नकल जिहाद छेड़ने और अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। सीएम ने कहा कि जब तक उनकी सरकार सभी नकल माफियाओं को मिट्टी में नहीं मिला देती, तब तक चैन से नहीं बैठेगी।

पेपर लीक करने वाला खालिद हरिद्वार से गिरफ्तार

UKSSSC पेपर लीक का साजिशकर्ता खालिद मलिक को उत्तराखंड पुलिस ने हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस खालिद मलिक को देहरादून लाने की तैयारी कर रही है। जाँच के दौरान पता चला कि आदर्श बाल सदन इंटर कॉलेज बहादरपुर जट परीक्षा केंद्र से पेपर लीक हुआ था।

अवलोकन करें:-

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केंद्र में कुल 18 कमरे थे, लेकिन 3 कमरों में जैमर (रेडियो फ्रीक्वेंसी पर सिग्नल भेजने वाला टूल) नहीं थे और खालिद मलिक उसी 3 कमरों में से किसी एक में बैठकर परीक्षा दे रहा था। खालिद ने एक डिवाइस का इस्तेमाल करते हुए प्रश्न पत्र अपनी बहन साबिया को भेजा, जिसने इसे प्रोफेसर सुमन चौहान तक पहुँचाया। खालिद की दूसरी बहन हीना और प्रोफेसर सुमन चौहान पुलिस हिरासत में हैं।