नेपाल की फेक वीडियो दिखाकर करिश्मा एजाज बिहार में दंगा फैलाने की साजिश रच रही (साभार : X_@lkoabhishek & Moneycontrol) मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा अजीज नाम की युवती आजकल पुलिस के लिए पहेली बनी हुई है, जिसने बिहार और उत्तराखंड दो अलग-अलग राज्यों को निशाना बनाया है। करिश्मा अजीज पर इन दोनों राज्यों में आईटी एक्ट और कई गंभीर आरोपों के तहत FIR दर्ज है। इसके बावजूद, करिश्मा अजीज का डिजिटल ऑपरेशन लगातार जारी है, जहाँ उसके सोशल मीडिया अकाउंट से लगातार भ्रामक और विवादित कंटेंट पोस्ट किए जा रहे हैं।
यह पहला मौका है कि गृह मंत्रालय नीतीश कुमार से लेकर बीजेपी के सम्राट चौधरी के हाथ सौंपने के पीछे बहुत बड़ी राजनीति है। कई हादसों में नीतीश कोई कार्यवाही करने में असहाय नज़र आते थे जिस कारण बिहार में माफिया और बाहुबली राज करते रहे, जिसका चुनावों में सामना करना पड़ा। अगर मोदी-योगी-अमित ने मेहनत नहीं की होती बिहार हाथ से निकल जाता। बिहार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी के लिए करिश्मा अज़ीज़ को गिरफ्तार करना शायद किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं। देखना यह है कि ऐसी उपद्रवी महिला को कब गिरफ्तार करते हैं?
हैरत की बात यह है कि उसका एक्स अकाउंट केवल आठ महीने पुराना है, जिसे मई 2025 में एक्स प्लेटफॉर्म द्वारा वेरीफाई भी कर दिया गया था। वर्तमान में, उसके इस अकाउंट के 19.3 हजार से अधिक फॉलोवर्स हैं और उसके प्रत्येक वीडियो पर 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिलते हैं। उसका ऑपरेशन एक अकाउंट तक सीमित नहीं है, बल्कि वह करिश्मा अजीज के नाम से जुड़े 7 से 8 अतिरिक्त बैकअप अकाउंट्स का पूरा नेटवर्क चला रही है।
साजिश का इतिहास: बिहार से पहले उत्तराखंड को बनाया निशाना
जाँच में सामने आया है कि करिश्मा अजीज की यह भड़काऊ गतिविधि केवल बिहार तक सीमित नहीं थी। उसने सबसे पहले उत्तराखंड को टारगेट किया था। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में धराली आपदा के बाद जब शोक का माहौल था, तब करिश्मा अजीज सहित कुछ अकाउंट्स ने जवानों की मौत और आम नागरिकों की त्रासदी पर अभद्र और सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली टिप्पणियाँ की थीं।
देहरादून के हिंदू संगठनों की शिकायत पर करिश्मा अजीज सहित तीन लोगों के खिलाफ उत्तराखंड में पहली FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद, बिहार विधानसभा चुनाव (2025) समाप्त होने पर उसने बिहार को निशाना बनाया। मुजफ्फरपुर साइबर थाने को इनपुट मिला कि करिश्मा अजीज ने 16 नवंबर की शाम को अपने एक्स हैंडल पर 32 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बिहार चुनाव की मतगणना के बाद युवा सड़क पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।
साइबर थाने के एएसआई दयाल नारायण सिंह ने तुरंत इसकी जाँच की, तो पता चला कि यह वीडियो नेपाल में हुए GenZ जैसे हिंसक प्रदर्शनों का फुटेज था, जिसे बिहार का बताकर जानबूझकर नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद मुजफ्फरपुर में उसके खिलाफ दूसरी FIR दर्ज की गई। मुजफ्फरपुर की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास है।
कानून की गिरफ्त से दूर, मेटा से माँगी गई जानकारी
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा एजाज का X आईडी @KarishmaAziz_ है। इस पर वह लगातार भ्रामक वीडियो और विवादित कंटेंट पोस्ट कर रही है, लेकिन वह अभी भी कानून की पहुँच से बाहर है। पुलिस जाँच में यह पता चला है कि वह अपनी लोकेशन छिपाने के लिए वीपीएन और प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल कर रही है।
इसके अलावा, वह अलग-अलग अकाउंट्स में अलग-अलग मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी का उपयोग कर रही है, जिससे लोकेशन बार-बार बदल रही है और उसे ट्रेस करने में मुश्किलें आ रही हैं। साइबर DSP हिमांशु कुमार ने पुष्टि की है कि युवती के ID से जुड़ी पूरी जानकारी पाने के लिए मेटा और एक्स को मेल भेजा गया है।
पुलिस फिलहाल एक्स से पूरा डाटा मिलने का इंतजार कर रही है, जिसके बाद ही उसके खिलाफ आगे की बड़ी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि करिश्मा अजीज का यह कृत्य स्पष्ट रूप से बिहार में भी नेपाल जैसा हिंसक विरोध प्रदर्शन का माहौल तैयार करने या उसे उकसाने का प्रयास है, जो जन-शांति भंग करने और समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने वाला गंभीर अपराध है।
मुरादाबाद का मंदिर और मूर्तियाँ (फोटो साभार: Jagran) जिस तरह उत्तर प्रदेश में दबे या दबाए गए मन्दिरों का मिलना शुरू हुआ है सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सबको आंखें और दिमाग को खोलकर बोलना होगा कि किस तरह सनातन विरोधियों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक सनातन को दबाने का दुस्साहस किया था। उन्हें नहीं मालूम था कि कभी समय चक्र भी घुमेगा और जब घुमेगा इनके कुकर्म सामने आएंगे। जनता को सच्चाई से मीलों दूर रख तुष्टिकरण कर अपनी तिजोरियां भर मालपुए खाते रहे। आज सच्चाई का सूर्य उदय होने से इन तुष्टिकरण करने वालों की नींद ही नहीं रोटी तो क्या पानी पीना भी मुश्किल हो रहा है। यही कारण है कि जनता को संविधान और लोकतंत्र खतरे में का डर बैठा अपनी बंद होती दुकानों को खुला रखने का प्रयास किया जा रहा है।
सनातन विरोधियों को इतना ज्ञान होना चाहिए कि मूर्ति कोई पत्थर का टुकड़ा या रोड़ा नहीं होती। जब उसकी मन्त्रों से प्राणप्रतिष्ठा की जाती है वह एक मूर्ति बन जाती है, अगर तुष्टिकरण करते उस मूर्ति को किसी भी आकार में दबा दिया जाता है, कभी न कभी वही मूर्ति अपना प्रभाव दिखाने लगती है। वह मुर्दा नहीं बन जाती कि जमीन में दफ़न कर दिया, कुछ समय बाद मिट्टी में मिल जाएगा, मूर्खो वह भगवान/देवी की मूर्ति है कोई पत्थर का टुकड़ा/रोड़ा नहीं।
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक मुस्लिम बहुल इलाके में हिन्दू मंदिर मिला है। यह मंदिर पिछले लगभग 4 दशक से बंद पड़ा था। इस मंदिर में शिवलिंग कई खंडित मूर्तियाँ भी मिली हैं। इसमें कोई जा ना पाए, इसके लिए दीवार भी बना दी गई थी। प्रशासन ने अब दीवाल तोड़कर मंदिर का जीर्णोद्धार चालू कर दिया है। मंदिर 1980 में हुए भीषण दंगों के बाद बंद कर दिया गया था। तब यहाँ के पुजारी की हत्या कर उन्हें आग में झोंक दिया गया था।
परदादा ने बनवाया, पोते ने हटवाया कब्जा
मुरादाबाद में यह मंदिर झब्बू का नाला इलाके में मिला है। यहाँ अधिकांश आबादी मुस्लिमों की है। इस मंदिर को लेकर पुजारी के परपोते सेवाराम ने डीएम से शिकायत की थी। उन्होंने शिकायत में बताया था कि मंदिर को उनके परदादा भीमसेन ने बनवाया था और इसके बाद उनका ही परिवार इसमें पूजा करता था। उन्होंने कहा था कि 1980 के दंगे में इस मंदिर को बंद करके प्रवेश द्वार पर दीवाल बनवा दी गई थी और अब यहाँ लोग नहीं जाते। उन्होंने मंदिर को खोलने की माँग करते हुए स्थानीय लोगों के साथ प्रदर्शन भी किया था।
खंडित मूर्तियाँ, बनवा दी पार्किंग
इसके बाद सोमवार (30 दिसम्बर, 2024) को यहाँ मुरादाबाद नगर निगम और प्रशासन की टीम दल-बल के साथ पहुँची। उसने मंदिर की दीवाल तोड़ी। इसके बाद यहाँ इकट्ठा हुई मिट्टी को हटाया गया। मंदिर का स्वरूप इसके बाद दिखा। यहाँ दीवाल पर बनाई हुई बजरंग बली की प्रतिमा मिली। यहाँ से शिवलिंग भी है जिसके पास लेकिन नंदी की मूर्ति थी। माँ दुर्गा और काली की प्रतिमाएँ खंडित थी। जो मूर्तियाँ दीवाल में बनवाई गई थीं उनको भी तोड़ दिया गया था। मंदिर में तीन फीट का पक्का फर्श बनवा दिया गया था। यहाँ की जमीन पर अब पार्किंग चलती थी।
प्रशासन ने मंदिर की खुदाई करवाई है और फर्श तुड़वाया है। अंदर से काफी बड़ा मंदिर सामने आया है। प्रशासन अब मंदिर का जीर्णोद्धार करवा रहा है। यहाँ जल्द ही काम पूरा कर पूजा चालू करवा दी जाएगी। स्थानीय हिन्दुओं को अपना मंदिर वापस पाकर प्रसन्नता है लेकिन इससे कड़वी यादें भी ताजा हो गई हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर शिकायत देने वाले सेवाराम इसके वापस मिलने और बुरी हालत देख कर रो पड़े। उन्होंने बताया कि उनके परदादा भीमसेन ने इस मंदिर के निर्माण के जमीन दी थी।
किन्नर ने उठा रखा था पूजा का बीड़ा
तब इस झब्बू का नाला इलाके में हिन्दू आबादी बसा करती थी। सेवाराम ने बताया कि उनके दादा गंगासरन यहाँ पूजा करते थे। 1980 में जब मुरादाबाद में ईद के बाद भीषण दंगा भड़का तो यह इलाका हिन्दुओं से खाली हो गया। सेवाराम ने आरोप लगाया कि दंगाइयों ने उनके दादा गंगासरन को मार दिया और उनकी लाश आग में झोंक दी। इससे उनका शव तक नहीं मिला। इसी के साथ मंदिर बंद हो गया और यहाँ दीवाल बना दी गई। इलाके से धीमे-धीमे सारे हिन्दू चले गए। तब से यह मंदिर बंद था।
यहाँ कुछ समय पहले एक हिन्दू किन्नर आकर बसी थीं। उनका नाम मोहिनी किन्नर है। मोहिनी किन्नर ने बताया कि उनसे मंदिर की यह हालत देखी नहीं गई और उन्होंने बाहर के हिस्से में रंगाई पुताई करवाई। इसके लिए भी पुलिस की मदद लेनी पड़ी थी। मोहिनी किन्नर ने बताया कि वह यहाँ रोज दिया बाती करती थीं और साथ ही दिवाली पर मंदिर की दीवाल कि सजावट करवाती थीं। अब वह और सेवाराम का परिवार अपने मंदिर को वापस पाकर काफी प्रसन्न हैं।
1980 के दंगे में मरे थे 83 लोग
यह मंदिर जिस 1980 के दंगे के बाद बंद किया गया था। उसमें 83 लोग मारे गए थे। 13 अगस्त 1980 को यह दंगा हुआ था। इसको लेकर 2023 में जाँच रिपोर्ट योगी सरकार ने सार्वजनिक की थी। इससे पहले तक दंगे की रिपोर्ट को इसलिए दबा कर रखा गया था क्योंकि इससे असल जिम्मेदार लोगों की पहचान हो जाती। मुरादाबाद में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दो बड़े खिलाड़ी थे। मुस्लिम लीग की जमात का नेतृत्व शमीम अहमद और हामिद हुसैन उर्फ अज्जी और उनके समर्थक कर रहे थे, जो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम लीग को फिर से खड़ा करना चाहते थे।
वहीं, कांग्रेसी हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी की अगुवाई में काम कर रहे थे। इस रिपोर्ट में हिंदू पक्ष के 6 लोगों के लिखित बयान दर्ज हैं, जिसमें साफ-साफ लिखा है कि ये हिंसा अचानक नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित थी। मुरादाबाद में भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष हरिओम शर्मा का भी बयान इस रिपोर्ट में दर्ज है, जिन्होंने कहा था कि ये हिंसा बहुत बड़ी साजिश का महज एक हिस्सा भर ही थी। इस हिंसा के लिए मुस्लिम पक्ष को बाहरी देशों, इस्लामी संगठनों जैसे मुस्लिम लीग, जमीयत उलेमा-ए-हिंसा और तबलीगी-ए-इस्लाम ने फंडिंग की थी।
इसके दंगे से तीन महीने पहले से ही कई हिंसक घटनाएँ हो रही थीं। गहराए तनाव का फायदा मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं ने 13 अगस्त 1980 को ईद के दिन उठाया। उन्होंने अपने समर्थकों के माध्यम से सुअरों वाली घटना को अंजाम दिया और पूरे मुरादाबाद को दंगों की चपेट में धकेल दिया। भाजपा नेता हरिओम शर्मा ने उस दिन को याद करते हुए बयान में बताया है कि ईद के मौके पर ईदगाह के पास लगाए गए शिविरों में मुस्लिमों की भीड़ ने आग लगा दी।
इसमें उन 2 शिविरों को छोड़ दिया गया, जिन्हें मुस्लिम लीग चला रही थी। उस दौरान मुस्लिम लीग के नेता अपने शिविरों (कैंप) के पास ही थे, जबकि उन्हें नमाज में शामिल होना था। इस बात से साफ है कि वो दंगों के प्रति पहले से जानते थे और सारी साजिश उनकी रची हुई थी। हालाँकि, इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि ईदगाह में सुअर गए थे। इतना नहीं, इसके अलावा एक और अफवाह फैलाई गई कि पुलिस ने सैकड़ों मुस्लिमों को ईदगाह के अंदर मार दिया है।
मुस्लिमों ने अफवाह उड़ाकर संभल में तोड़े थे मंदिर (प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: AI/ Dall-E) 16 दिसंबर 2024 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभल में दंगों का इतिहास गिनाते हुए कहा था कि इनमें 209 हिंदुओं की हत्या की गई। दंगों में हिंदुओं की मौत के इस आँकड़े की पुष्टि संभल जिला प्रशासन की इंटरनल रिपोर्ट भी करती है।
ऑपइंडिया के पास मौजूद इस रिपोर्ट से पता चलता है कि 1976 में भड़के दंगों में 5 हिंदुओं की हत्या की गई थी। उस समय हालात पर काबू पाने के लिए 7 दिनों तक कर्फ्यू लगाना पड़ा था। दंगे हिंदू व्यक्ति द्वारा मौलवी की हत्या की अफवाह फैलाकर भड़काई गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार 29 फरवरी 1976 को मुस्लिमों ने अफवाह उड़ाई कि पेतिया गाँव के अर्धविक्षिप्त राजकुमार सैनी ने हमारे मौलवी को मार दिया है, जबकि मस्जिद कमेटी के झगड़े में एक मुस्लिम ने ही मौलवी को मारा था। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने मंजर शफी और अताउल्ला ततारी की अगुवाई में सूरजकुंड और मानस मंदिर को तोड़ दिया। इसके बाद सरथल चौकी पर मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने किशनलाल का घर जलाने की कोशिश की। हिंदुओं के प्रतिरोध के बाद वे पत्थरबाजी कर भाग खड़े हुए। इसी दौरान सोतीपुरा के हरि सिंह और कोटीपूर्वी मोहल्ले के राकेश वैश्य की हत्या की गई।
इसके बाद 24 अप्रैल 1976 को कोटपूर्वी मोहल्ले में कल्लू के घर भयानक विस्फोट हुआ। इलाज के दौरान उसके बेटे सलाम की मौत हो गई। इसकी प्रतिक्रिया में सरायतरीन के मोहल्ला लाल मस्जिद के पास बुजुर्ग कामता प्रसाद की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इसके अलावा जयचंद रस्तोगी की गोली मारकर हत्या की गई। इसके अलावा एक अन्य हिंदू की हत्या की गई थी, जिसके नाम का उल्लेख इस रिपोर्ट में नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि इन मामलों में जब दोषी 20-22 मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया तो संतुलन बनाने के लिए इतने ही ‘निर्दोष’ हिंदुओं को भी प्रशासन ने गिरफ्तार किया था।
ये दंगे जब हुए थे उसी समय शफीकुर्रहमान बर्क भी उभर रहा था। संभल में 1978 में जो सबसे भीषण दंगा हुआ था, उसमें बर्क की खासी भूमिका थी। 1976 के दंगों के दौरान मुस्लिम दंगाइयों की अगुवाई करने वाला मंजर शफी भी 1978 के दंगों के समय सक्रिय था। उस समय इसने एक हिंदू शिक्षक की बेटी और पत्नी को अगवा कर लिया था। शिक्षक की बेटी को रेप के बाद छोड़ा गया था, जबकि उनकी पत्नी को हिंदुओं ने बचा लिया था। इस घटना के बारे में हम अपनी पिछली रिपोर्ट में बता चुके हैं। हम बता चुके हैं कि कैसे 1978 के दंगों के बाद हरिहर मंदिर में शफीकुर्रहमान बर्क ने हिंदुओं का प्रवेश बंद करवाया था।
प्रशासन ने यह रिपोर्ट संभल में हुए दंगों पर तैयार की है। इससे पता चलता है कि दंगों के कारण संभल में धीरे-धीरे हिंदुओं की आबादी कम होती जा रही है। देश की स्वतंत्रता के समय संभल नगरपालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी जो आज घटकर 15-20% रह गई है। उस समय मुस्लिम 55% थे। आज वे बढ़कर 80-85 प्रतिशत हो गए हैं।
संभल से 2 खातूनों के साथ गिरफ्तार दंगाइयों के घर से मिला है दोधार वाला हथियार उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को जामा मस्जिद का सर्वे करने गई प्रशासनिक टीम पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया था। इस हमले में अब तक चार लोगों की मौत हो चुकी है। 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं जिसमें से कुछ की हालत गंभीर है। पुलिस ने दबिश दे कर कई उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं। शहर में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। 2 थानों को मिला कर अब तक कुल 5 FIR दर्ज हुई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ,अब तक संभल में कुल 4 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इसमें 3 मृतकों के नाम नईम, बिलाल और नोमान हैं। इन सभी को पत्थरबाजी में शामिल बताया जा रहा है। मिल रही जानकारी के मुताबिक, इसमें से 2 लोगों को 315 बोर की गोली लगी है। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस 315 बोर की गोली का इस्तेमाल नहीं करती है। पुलिस की पिस्टल या रायफल में से कोई भी हथियार इस बोर का नहीं होता है।
हिंसा के बाद से पुलिस लगातार दबिश दे रही है। अब तक 20 से अधिक हमलावरों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें 2 महिलाएँ भी शामिल हैं। इन हमलावरों के घरों से हथियार भी बरामद हुए है। इसमें एक नए टाइप का भी हथियार है जिसमें दोनों तरफ से धार बनी हुई है। इन सभी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और गैंगस्टर एक्ट में कार्रवाई की जाएगी। हिंसा में शामिल तमाम अन्य लोगों की भी पहचान कर गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।
SP आईपीएस कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया कि जिले की संभल तहसील क्षेत्र में एक दिन के लिए इंटरनेट सेवाएँ बाधित की गईं हैं। जिले में किसी भी बाहरी व्यक्ति अथवा नेता के बिना प्रशासनिक अनुमति के आवागमन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कक्षा 12 तक के स्कूलों को भी सोमवार तक के लिए बंद कर दिया गया है। इस घटना पर मुरादाबाद परिक्षेत्र के कमिश्नर IAS आंजनेय सिंह ने मृतकों के परिजनों से पूछा है कि उनके घर का सदस्य पत्थरबाजी करने क्यों गया था?
मुरादाबाद मंडल कमिश्नर आंजनेय कुमार सिंह जी ने ऐसे सवाल उठाए, जो हर दंगे पर पूछे जाने चाहिए थे, लेकिन कभी पूछे नहीं गए। क्या दंगा करते हुए मारे गए लोगों के परिवार जिम्मेदारी नहीं लेंगे कि उनके सदस्य दंगा करने क्यों गए थे? पढ़ाई या नौकरी के लिए शहर को आग लगाने के इरादे से निकले थे pic.twitter.com/r5SCmgZgJA
आंजनेय सिंह ने यह भी कहा कि पुलिस पर पत्थर के साथ गोलियाँ भी बरसाई गईं हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस की तरफ से आँसू गैस के गोले छोड़े गए हैं। लगाए जा रहे आरोपों के संबंध में जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आगे बताया कि पूरी रिकार्डिंग पुलिस के पास मौजूद है। उन्होंने कहा कि पत्थरबाज कोई धर्म-पुण्य का काम करने नहीं गए थे। जिले में फ़िलहाल के लिए ईंट और गिट्टी आदि की खरीदारी पर रोक लगा दी गई है।
जिले के सभी निवासियों को साफ़ हिदायत दी गई है कि अगर उनकी छतों पर कोई भी पत्थर और ज्वलनशील पदार्थ मिला तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। नगर पालिका को भी निर्देश मिला है कि सड़क पर बिखरे किसी भी सामान को फ़ौरन जब्त करे। इस हिंसा में लगभग 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनका इलाज करवाया जा रहा है। एक घायलों में SP के PRO और DSP अनुज विश्नोई भी शामिल हैं। एक कांस्टेबल के सिर में गंभीर चोट लगी है।
इस पूरे मामले में अब तक कुल 4 FIR दर्ज हुई हैं। इसमें से 3 FIR कोतवाली संभल जबकि एक अन्य नखासा थाने में हुई है। कोतवाली संभल में घायल SDM, SHO और 2 सब इंस्पेक्टरों की तहरीर पर मुकदमे दर्ज किए गए है। वहीं नखासा थाने में भी एक केस पुलिस की तहरीर पर दर्ज हुआ है। यहाँ हमलावरों ने पुलिस पर पत्थर फेंके थे। इसी दौरान पुलिस की एक बाइक को भी जला दिया गया था।
ब्रिटेन में तीन बच्चियों की हत्या के बाद कई शहर हिंसा से झुलस रहे हैं। स्थानीय समय के अनुसार, शनिवार (3 अगस्त) की रात को कुछ उपद्रवियों ने कई शहरों में सड़कों पर दुकानों को आग लगा दी। यह देश में 13 साल में सबसे बड़ा दंगा बताया जा रहा है। दरअसल, हिंसा की यह आग तब भड़की जब उत्तर-पश्चिमी इंग्लैंड में तीन बच्चियों की चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई। इसके कई वीडियो सामने आए हैं।
साउथपोर्ट में सोमवार (29 जुलाई 2024) को टेलर स्विफ्ट थीम वाली डांस क्लास में तीन लड़कियों- 6 वर्षीय बेबे किंग, 7 वर्षीय एल्सी डॉट स्टैनकॉम्ब और 9 वर्षीय एलिस डेसिल्वा अगुइआर की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इसके 6 दिन के बाद ब्रिटेन के कम-से-कम नौ शहरों में हिंसा शुरू हो गई है। शुरू में अफवाह फैली की कि इस घटना को प्रवासी लोगों ने अंजाम दिया है।
बच्चियों की हत्या के विरोध में 22 प्रमुख कस्बों और शहरों में ‘एनफ इज एनफ’ यानी ‘बस बहुत हो गया’ का प्रदर्शन निकाला गया। प्रदर्शन के दौरान हजारों पुलिसकर्मी तैनात रहे। लोगों में अंदर ही अंदर गुस्सा पनपता रहा और आखिरकार शनिवार को ब्रिटेन के लिवरपूल, मैनचेस्टर, सुंदरलैंड, पोर्ट्समाउथ, हल, ब्लैकपूल, ब्रिस्टल, बेलफास्ट स्टोक, नॉटिंघम और लीड्स में दंगा भड़क उठा।
इस दौरान दंगाइयों दुकानों में जमकर लूटपाट और तोड़फोड़ की। सामानों को सड़कों पर फेंक दिया और दुकानों में आग लगा दी। दंगाइयों ने जूते की दुकानों से लेकर शराब की दुकानों तक, किसी को भी नहीं छोड़ा। सड़कों पर लगी हुई स्ट्रीट लाइटों में भी तोड़फोड़ की। खंभों को उखाड़ने की कोशिश की और बैरिकेटिंड को ध्वस्त कर दिया। पुलिस ने लगभग 200 दंगाइयों को गिरफ्तार किया है।
Crazy scenes in Belfast, Northern Ireland right now at the protest against mass-migration.
British and Irish nationalists standing together on one side with British and Irish flags.
— Expordia | Global Breaking News (@expordia) August 3, 2024
उत्तरी आयरलैंड के बेलफ़ास्ट में जारी प्रदर्शनों के बीच पागलपन भरे दृश्य भी देखने को मिले। सामने आए वीडियो में साफ दिख रहा है कि प्रदर्शन के दौरान एक तरफ़ ब्रिटिश और आयरिश राष्ट्रवादी ब्रिटिश और आयरिश झंडे लेकर खड़े दिखाई दिए तो दूसरी तरफ़ फ़िलिस्तीनी और एंटीफ़ा झंडे लिए प्रदर्शनकारी दिखाई दिए। इस वीडियो को लोग सोशल मीडिया पर जमकर शेयर कर रहे हैं।
हिंसा को देखते हुए ब्रिटेन की सरकार ने आपातकालीन बैठक बुलाई है और हिंसा को नियंत्रित करने पर चर्चा की। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठी चार्ज किया है। इसमें कई लोग घायल हो गए हैं। भीड़ में 18 से लेकर 58 साल तक के लोग शामिल हैं। हत्या को लेकर विरोध मार्च आगे भी प्रस्तावित है, जिसको लेकर पुलिस प्रशासन सतर्क है।
दरअसल, इस सप्ताह सबसे पहला दंगे साउथपोर्ट में हमलावर की पहचान की अफवाह को लेकर भड़का था। यह अफवाह फैलाई गई कि हमलावर एक प्रवासी था। हालाँकि, पुलिस ने बताया कि संदिग्ध व्यक्ति कार्डिफ़ में पैदा हुआ था। इसके बाद हिंसा को शांत करने के प्रयास में जज ने 17 वर्षीय संदिग्ध की पहचान उजागर करने का फ़ैसला सुनाया।
इसके बाद बुधवार (31 जुलाई) को मर्सीसाइड शहर में चाकू से हमला करने वाले किशोर के रूप में एक्सेल मुगनवा रुदाकुबाना का नाम सामने आया। दरअसल, न्यायाधीश ने उसके 18वें जन्मदिन से कुछ दिन पहले उसकी रिपोर्टिंग पर से प्रतिबंध हटा दिए थे। बता दें कि 18 वर्ष से कम आयु के लोगों के नाम का खुलासा करने की इजाजत नहीं है।
दंगे के दौरान कई गाड़ियों को आग लगा दी गई (चित्र साभार: AshleaSimonBF/X & TPointUK/X) भारत में राज करते ब्रिटेन ने Divide & Rule की नीति का बीजारोपण किया था, वह आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है, जिस कारण भारत में कभी जाति के नाम पर तो कभी मजहब के नाम पर दंगे होते रहते हैं, लेकिन वही दंगे का जहर आज ब्रिटेन में फैलता दिखाई दे रहा है। इतिहास लिखा नहीं जाता दोहराया जाता है। कल तक जो देश भारत में साम्प्रदायिक दंगे होने पर मजाक बनाते थे, धीरे-धीरे वही देश इस आग में जलने शुरू हो चुके है। इस सन्दर्भ में अपने बुजुर्गों की बताई एक बात दिमाग में आ गयी। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने या यूँ कहिये गुरुद्वारा शीश गंज के निकट लाला हरदयाल लाइब्रेरी है। जब लाला हरदयालICS उपाधि के लिए परीक्षा में एक प्रश्न 'How British ruled over India' का 300 शब्दों में उत्तर देना था, लेकिन हरदयाल ने केवल 3 शब्दों "Divide & Rule"में उत्तर देने पर ब्रिटिश सरकार ने कहा था कि 'सरकार आपको ICS उपाधि तो नहीं देगी, लेकिन आप आज से Lala Hardayal MA Kayastha के नाम से जाने जाओगे। यानि आज ब्रिटेन उसी आग में जलने की राह पर चल निकला था।
ऐसे में एक ज्वलंत प्रश्न आता है कि जब कोई मुस्लिम देश फिलिस्तीनियों और रोहिंग्यों को अपने देश में रखने को तैयार नहीं, फिर गैर-मुस्लिम देशों में इनके समर्थकों के साथ सख्ती से पेश क्यों नहीं आया जाता? सभी गैर-मुस्लिम देशों के लिए ब्रिटेन का लीड्स एक मिसाल है। सरकार जब तक इनको मिलने वाली हर सरकारी सुविधा से महरूम नहीं करेंगे, इस तरह के उपद्रव रुकने का नाम नहीं लेंगे।
ब्रिटेन के शहर लीड्स में दंगे भड़क गए हैं। प्रवासी दंगाइयों ने एक इलाके में जम का उत्पात मचाया और पुलिस की गाड़ियों तोड़ आग लगा दी। उन्होंने कुछ वाहनों में आग लगा दी। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है। दंगे का कारण एक समुदाय और सरकारी एजेंसी के बीच का विवाद बताया जा रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लीड्स के हेयर हिल्स इलाके में यह दंगा गुरुवार (18 जुलाई, 2024) को चालू हुआ। दंगे की स्थिति शाम 5 बजे से ही बना चालू हो गई थी। इसके बाद दंगाइयों ने पुलिस की एक गाड़ी को पलट दिया और एक बस को आग लगा दी। पथराव होने की भी सूचना है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में दिखता है कि भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं और दंगा कर रहे हैं। वह पुलिस की गाड़ियों में तोड़फोड़ कर रहे है, इस बीच पुलिस यहाँ से गायब नजर आती है। इन दंगों के बीच यहाँ के नवनिर्वाचित सांसद मोतिन अली भी देखे गए हैं।
Riots have erupted in Harehills, Leeds tonight after Social Services took children away from a Roma Gypsy family, with a police car overturned and a bus now set on fire.
Britain needs to stop importing people with an alien culture and value system. Enough is enough. pic.twitter.com/QJ4NKPaEUy
बताया गया है कि दंगे का कारण यहाँ रहने वाले लोगों के बच्चों को उनसे अलग करने का प्रयास रहा। ब्रिटेन में बच्चों की देखरेख करने वाली चाइल्ड केयर एजेंसी इस इलाके से बच्चों को बाल देखभाल गृह में ले जाना चाहती थी। इस इलाके में रहने वाले लोग इसके खिलाफ थे।
जब गुरुवार को एजेंसी ने यह प्रयास किया तो बच्चों के अभिभावक भड़क गए और एजेंसी के खिलाफ प्रदर्शन चालू कर दिया। इसके बाद यहाँ दंगा और तोड़फोड़ चालू हो गई। दरअसल, इस इलाके में ब्रिटेन के बाहर से आए शरणार्थी रहते हैं, इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।
इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी ना होने के कारण इनके बच्चों को अच्छी देखभाल ना मिल पाने का शक ब्रिटेन की चाइल्ड केयर एजेंसी को है। इसीलिए वह इन बच्चों को उनके माता-पिता से अलग करके अपने साथ रखना चाहती है। अभिभावक और कई मामलों में बच्चे, इसके लिए तैयार नहीं हैं।
I am appalled at the shocking scenes and attacks on police vehicles & public transport in Leeds tonight. Disorder of this nature has no place in our society.
My thanks go to West Yorkshire police for their response. I am being kept regularly updated.
लीड्स में हुए दंगों के बाद यहाँ भारी पुलिस बल और अग्निशमन दस्ते भेजे गए। स्थानीय नेताओं ने भी इस इलाके का दौरा करके लोगों को शांत रहने की अपील की। ब्रिटेन की गृह मंत्री यवेत्ते कूपर ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “मैं आज रात लीड्स में पुलिस वाहनों और सार्वजनिक परिवहन पर हुए चौंकाने हमलों से स्तब्ध हूँ। इस तरह की अव्यवस्था का हमारे समाज में कोई स्थान नहीं है। मैं वेस्ट यॉर्कशायर पुलिस को उनकी कार्रवाई के लिए धन्यवाद देती हूँ। मैं लगातार अपडेट ले रही हूँ।”
अजीत अंजुम के YouTube चैनल पर नीलू व्यास थॉमस ने बता दिया क्या है विपक्ष का प्लान
नरेंद्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से देश विरोधियों ताकतों में खलबली को उनके हाथों की कठपुतली बने भारत के विपक्ष में मच रही बेचैनी से समझा जा सकता है। भारतीय विपक्ष से कहीं अधिक नींद हराम जॉर्ज सोरोस, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और कुछ गल्फ देश अपना बजा बजने से पहले इस कोशिश में है कि इन बिकाऊ लोगों को नोटों के बंडल देकर भारत में ही उत्पात मचवा दो। ये समय है जनता को ऐसे उपद्रवियों से सतर्क रहने की जरुरत है। जनता को पहले से अधिक जागरूक रहने की जरुरत है।
YouTuber अजीत अंजुम के चैनल पर खुद को पत्रकार बताने वाली नीलू थॉमस व्यास ने कुछ ऐसे दावे किए हैं, जो डराने वाले हैं। खुद को ‘मॉब लिंचिंग’ का विरोधी बता कर मॉब को गाली देने वाला गिरोह अब लोकतंत्र की बजाय भीड़तंत्र पर भरोसा दिखा रहा है, अराजकता के लिए समाज को सुलगा रहा है। ये कोई नई बात नहीं है, शाहीन बाग़ और किसान आंदोलन को देखें या राहुल गाँधी द्वारा विदेश में दिए गए बयानों को भी देखें तो स्पष्ट पता चलता है कि इसके पीछे एक पैटर्न है।
मंगलवार (4 जून, 2024) को लोकसभा चुनाव की मतगणना होनी है और इसकी पूरी संभावना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौट कर आएँगे। सारा विपक्ष चुनाव घोषित होने के पहले से जानता है, लेकिन मतदान की रस्म तो करनी ही थी, परिणाम से पहले ही विपक्ष मातम में डूबकर अपने अआप्को नेता-जनहितैषी बताने वाले जनता को परेशान करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है।
विपक्ष ने INDI गठबंधन तो बनाया, लेकिन नीतीश कुमार की JDU, जयंत चौधरी की RLD और ओमप्रकाश राजभर की SBSP गठबंधन से बाहर निकल आई। ममता बनर्जी की TMC भी लगभग बाहर ही है। विपक्षी नेताओं में तेजस्वी यादव को छोड़ कर शायद ही किसी को जमीन की ख़ाक छानते हुए देखा गया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 200 से अधिक रैली-रोड शो किए और 80 से अधिक मीडिया संस्थानों को इंटरव्यू दिया।
नीलू व्यास थॉमस इस वीडियो में कह रही हैं कि विपक्ष के जितने भी मतगणना एजेंट्स होंगे उन सबको प्रशिक्षण दिया जा रहा है, एग्जिट पोल्स से कैसे निपटा जाए इसकी भी तैयारी की जा रही है। उनका कहना है कि इसके अलावा एक बड़े जन-आंदोलन की तैयारी की जा रही है, अगर वोटों की चोरी पकड़ी जाती है तो इसे लेकर कोर्ट भी जाया जा सकता है और चुनाव भी रद्द कराया जा सकता है। यानी, इसका सीधा मतलब है कि विपक्ष लोकतंत्र के इस महापर्व को ख़ारिज कर देगा।
अजीत अंजुम के चैनल पर ये नीलू व्यास हैं जिनका पूरा नाम नीलू व्यास थॉमस है
बता रही हैं कि इस बार यदि भाजपा जीतेगी तो कोशिश होगी कि चुनाव ही ख़ारिज करवा दिया जाए, इसके लिये “इंडिया” की बैठक 1 जून को बुलाई गई है pic.twitter.com/dgZBoZ6p84
शाहीनबाग,दिल्लीदंगा,किसान आन्दोलन जैसा कुछ बड़ा षड्यंत्र करने का खेल जवाहरभवन में रचा जा रहा है क्या?निर्वाचनप्रणाली,EVMको नकारने की यह खतरनाक प्लानिंग लगती है!सरकार ऐसे तत्वों पर गिद्धदृष्टि रखे।यदि कोई हिंसात्मक आन्दोलन की आहट भी हो तो देखते ही गोली मारने के निर्देश दिए जाय।
— BHUWANCHANDRA PANERU (@BhuwanchandraP) May 30, 2024
पोलिंग एजेंट को क्या प्रशिक्षण दिया जा रहा है? हो सकता है कि जिस तरह बिहार के छपरा में मतदान के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की बेटी और वहाँ से RJD प्रत्याशी रोहिणी आचार्य ने पहुँच कर हिंसा भड़का दी और 2 लोग मारे गए, ठीक उसी तरह का माहौल काउंटिंग सेंटरों पर भी बना दिया जाए। अगर ऐसा है तो सुरक्षा बलों को बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है। पोलिंग एजेंट्स को हिंसा भड़काने की ट्रेनिंग दी जा रही हो सकती है, उन्हें ये सिखाया जा रहा होगा कि तनाव कैसे पैदा किया जाए।
इसके लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कैसे करना है, इसमें विपक्ष पारंगत है। सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो डाले जाएँगे, कहीं कुछ तकनीकी गड़बड़ी भी हुई तो उसे कुछ ऐसा बड़ा बना कर दिखाया जाएगा जैसे देश भर में EVM हैक कर लिए गए हों और मतगणना करने वाले कर्मचारियों को परेशान किया जाएगा। मतगणना वाले दिन सोशल मीडिया पर ऐसे प्रपंच को रोकने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। पोलिंग एजेंट्स कौन हैं, इसकी पहले से ही जाँच हो जानी चाहिए।
दूसरी बड़ी बात नीलू व्यास थॉमस कहती हैं कि Exit Polls से कैसे निपटा जाए, इसकी भी तैयारी चल रही है। बता दें कि शनिवार (1 जून, 2024) की शाम को अंतिम व 7वें चरण का मतदान समाप्त होने के साथ ही सभी टीवी चैनल और सर्वे करने वाले संस्थान अपना-अपना एग्जिट पोल जारी करेंगे और बताएँगे कि किस पार्टी को संभावित कितनी सीटें आ सकती हैं। स्पष्ट है, विपक्ष को नज़र आ रहा है कि इसमें भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त करते हुए दिखाया जाएगा क्योंकि जमीनी हालात भी यही है।
विपक्ष को इसका पूरा अंदाज़ा है कि उसकी हार हो रही है। TV चैनलों पर उनके प्रवक्ता एग्जिट पोल्स के दौरान ‘थेथरई’ करेंगे, मुद्दों को घुमाएँगे और भड़काऊ बातें करेंगे। सवाल कुछ और होगा, बौखलाहट में जवाब कुछ और दिया जाएगा। मीडिया संस्थानों के आँकड़ों को देख कर उन्हें ‘गोदी मीडिया’ बताया जाएगा। जिस तरह से प्रतिष्ठित पत्रकारों के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ‘चमचा’ और ‘चमची’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, महिलाओं तक को नीचा दिखा रहे हैं, उससे साफ़ है कि उनके प्रवक्ता एग्जिट पोल्स वाले दिन क्या करेंगे।
तीसरी बड़ी बात जो नीलू व्यास थॉमस ने कही है, वो ये है कि इस चुनाव को न्यायपालिका के दरवाजे तक भी ले जाया जा सकता है। ये भी कोई नई बात नहीं है। आप देखिए, अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने से लेकर राफेल लड़ाकू विमान सौदा तक, हर मामले को विपक्ष सुप्रीम कोर्ट तक लेकर गया। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ फ्रांस के साथ हुए राफेल सौदे पर मोदी सरकार को क्लीन-चिट दी, बल्कि अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने वाले फैसले को भी बरकरार रखा।
AAP के अरविंद केजरीवाल और JMM के हेमंत सोरेन जैसे नेताओं को जेल हुई, इन सबको अदालत के आदेश के बाद ही न्यायिक हिरासत में भेजा गया। इसके बाद अब न्यायपालिका पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए गए हैं। ध्यान दीजिए, ये आज से नहीं हो रहा। राम मंदिर का फैसला जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने नवंबर 2019 में सुनाया था, तभी से सुप्रीम कोर्ट का बॉयकॉट किया जा रहा है। ‘बाबरी ज़िंदा है’ वाले ट्रेंड इसी मुहिम का हिस्सा हैं।
चौथी और सबसे अधिक खतरनाक बात जो नीलू थॉमस ने कही है, वो है ‘जन-आंदोलन’ की। विपक्ष के लिए जन-आंदोलन क्या होता है? 3 महीने तक शाहीन बाग़ की खातूनों द्वारा दिल्ली को बंधक बना कर रखा। 1 साल तक ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर दिल्ली की सीमाओं पर कब्ज़ा कर के रखना। शाहीन बाग़ से कारोबारियों को 200 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, जबकि ‘किसान आंदोलन’ से उत्तर भारत के राज्यों को प्रतिदिन 500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
शाहीन बाग़ उपद्रव के जरिए मुस्लिमों को भड़काया गया देश भर में CAA के खिलाफ झूठ फैला-फैला कर, ‘किसान आंदोलन’ का इस्तेमाल जाटों और सिखों को भड़काने के लिए किया गया। तभी ‘किसान आंदोलन’ को खालिस्तानियों ने हाईजैक कर लिया। गणतंत्र दिवस के दिन लाल किला पर चढ़ कर खालिस्तानी झंडा फहरा दिया गया, राष्ट्रध्वज तिरंगे का अपमान हुआ। वहीं शाहीन बाग़ के बाद दिल्ली में दंगे हुए, जिसने 50 से अधिक लोगों की जान ले ली। मंदिरों-स्कूलों को निशाना बनाया गया।
किसी भी देश के महाशक्ति बनने की पहली शर्त है – वहाँ के समाज का संपन्न होना। लोगों के पास पैसा ही नहीं होगा, तो देश महाशक्ति कैसे बनेगा। यही कारण है कि आन्दोलनों के नाम पर बार-बार राष्ट्रीय राजधानी को बंधक बनाया जाता है क्योंकि इससे एक तीर से 2 निशान साधते हैं – पहला, मीडिया की फुटेज खूब मिलती है, और दूसरा, कारोबारियों को अधिक घाटा होता है। कारोबार जितना घटेगा, सरकार को उतनी परेशानी होगी और विपक्ष को उतनी ही ख़ुशी मिलेगी।
‘जन-आंदोलन’ का अर्थ क्या है राहुल गाँधी के लिए? याद कीजिए, मई 2022 में लंदन में एक कन्क्लेव को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा था कि भाजपा ने पूरे भारत में केरोसिन तेल छिड़क रखा है और एक चिंगारी से पूरे देश में आग लग जाएगी। उन्होंने भारत में ध्रुवीकरण और मीडिया पर भाजपा के प्रभाव का दावा करते हुए कहा था कि भारत फ़िलहाल सही स्थान पर नहीं है। सोचिए, विदेश जाकर अपने देश के संबंध में इस तरह की बातें करने के पीछे और क्या मकसद रहा होगा?
अब आगे क्या साजिश है? 120 संगठनों, जो खुद को नागरिक संगठन बताते हैं, उन्होंने चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करते हुए भविष्यवाणी कर दी है कि मतगणना वाले दिन गड़बड़ी होगी। चुनाव आयोग को बदनाम करने के लिए इनलोगों ने 6 घंटे बैठक की, आगे और भी बैठकों की योजना है। ‘सिविल सोसाइटी’ के नाम पर अब दंगों की साजिश है। मतदान के सारे आँकड़े जारी किए जा रहे हैं, फिर भी झूठ बोला जा रहा है कि चुनाव आयोग डेटा नहीं दे रहा।
इन संगठनों में विपक्ष के नेता शामिल हैं, पूर्व अधिकारियों को इसमें रखा गया है। ये वही वर्ग है जो खुद को ‘बुद्धिजीवी’ बता कर कुछ भी बक देता था और लोग इनका यकीन कर लेते थे। अब इन्हें कोई नहीं सुन रहा। ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबरों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बार-बार ‘तानाशाह’ बताया जाना इसी क्रम का हिस्सा है। जन-कल्याणकारी योजनाओं, इंफ़्रास्ट्रक्चर के कार्यों और विदेश में भारत की चमकती छवि को दबाने के लिए कुछ तो नकारात्मकता फैलानी होगी, विपक्ष यही करने में लगा हुआ है।
कुछ लोगों का मत है कि मुख़्तार अंसारी की मौत से आतंक के अध्याय का भी अंत हो गया लेकिन एक दूसरा मत यह भी है कि बेशक योगी जी का अभियान चल रहा है आतंकी और माफियाओं को ख़त्म करने के लिए पर आतंक और माफिया कमजोर हो सकते हैं ख़त्म होने में काफी समय लगेगा, क्योकि जब तक भारत में कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां मुस्लिम तुष्टिकरण करती रहेंगी, शायद ख़त्म न भी हो। मुख़्तार की मौत पर विधवा विलाप उस समय कहाँ मर गए थे, जब इसने गुंडागर्दी का आतंक मचा उत्तर प्रदेश को दहलाया हुआ था। कितनी गोदें सुनी कर दी थी, ना जाने कितनी महिलाओं का सिंदूर मिटा दिया था।
लेखक
अतीक अहमद और अशरफ की मौत के बाद उनके गैंग के गुर्गे फिर से एक्टिव हैं। 2 दिन पहले अतीक के बेटे अली अहमद समेत 8 लोगों पर बालू व्यापारी ने 10 लाख की रंगदारी मांगने का मामला दर्ज किया है।अतीक की बीवी शाइस्ता परवीन फरवरी से गायब है। वो कहीं छुपी हुई कोई नेक काम तो कर नहीं रही होगी? अतीक गैंग के रहते आतंक कैसे ख़त्म माना जा सकता है।
फिर, मुख़्तार अंसारी के परिवार के कई सदस्यों पर मुक़दमे चल रहे हैं -
-बीवी अफ़सा पर 11 मुक़दमे दर्ज हैं - (धोखाधड़ी और गैंगस्टर एक्ट में);
-भाई सिबगतुल्ला पर 3 मुक़दमे हैं - (जानलेवा मामले);
-भाई अफजल पर 7 मुक़दमे;
-बेटे अब्बास के खिलाफ 8 मुक़दमे और पुत्रवधु निखत पर भी एक मुकदमा है;
-बेटे उमर पर 6 आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं।
इसके अलावा मुख्तार अंसारी पर सुप्रीम कोर्ट भी मेहरबान रहा है। उसके एक केस में वर्षों के बाद मिली 7 साल की सजा पर सुप्रीम कोर्ट में रोक लगा दी और सजा सुनाने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस दिनेश कुमार सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया था जबकि वो वरीयता में बहुत पीछे थे। यह भी याद रखना चाहिए कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में 12 जजों ने मुख़्तार के मामले में हाथ डालने से मना कर दिया था।
एक केस में मुख़्तार और उसके भाई अफजाल की 4 साल की सजा में “दोषसिद्धि” पर रोक लगा कर संसद सदस्यता बहाल कर दी।
मुख़्तार अंसारी की मौत पर अखिलेश यादव बहुत बिलबिला रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि “सुप्रीम कोर्ट जज की निगरानी में संदिग्ध मौतों की जांच होनी चाहिए। हर किसी को सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। आज के समय में राज्य “सरकारी अराजकता” के दौर में चल रहा है”।
अखिलेश को मुख़्तार अंसारी बहुत प्रिय इसलिए था क्योंकि वह अखिलेश के पिता मुलायम सिंह का लाड़ला था जो 29 अगस्त, 2003 से 13 मई, 2007 तक मुख्यमंत्री थे। मुलायम सिंह तो कारसेवकों पर गोलियां बरसाने वाले बदमाश CM थे, उन्होंने 2004 में डिप्टी एसपी शैलेन्द्र सिंह पर मुख़्तार के खिलाफ कार्रवाई करने पर मुकदमा दर्ज कर दिया था। इसके अलावा 14 अक्टूबर, 2005 को मऊ में मुलायम राज में भयंकर दंगे कराए थे।
अखिलेश और विपक्ष और मुख़्तार अंसारी के परिवार को योगी प्रशासन पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाने और मौत के लिए जिम्मेदार कहते हुए 10 बार सोचना चाहिए। योगी जी यदि किसी विरोधी के लिए कुछ बुरा करना चाहते तो कोरोना काल में आजम खान कोरोना के इलाज के दौरान निपटा दिया गया होता लेकिन 2 बार बीमार होने पर भी उसे कुछ नुकसान नहीं हुआ।
लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि मुख़्तार अंसारी की मौत का भी बखेड़ा खड़ा करके और उसे “शहीद’ साबित करते हुए अखिलेश और विपक्ष की नज़र “मुस्लिम वोटों” पर ही हैं।
उत्तराखंड के हल्द्वानी में हुए दंगों का मुख्य साजिशकर्ता अब्दुल मलिक गिरफ्तार कर लिया गया है। क्षेत्र में स्थिति नियंत्रण में है और पुलिस व सुरक्षा एजेंसियाँ अब दंगाइयों की धर-पकड़ में लग गई है। बनभूलपुरा में 5 दंगाइयों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें एक समाजवादी पार्टी के एक नेता का भाई है, 2 निवर्तमान पार्षद हैं और एक खनन कारोबारी भी शामिल है। इस हिंसा के मुख्य साजिशकर्ताओं में एक अब्दुल मलिक का नाम सामने आया, जिसे दिल्ली से गिरफ्तार किया गया है।
अब्दुल मलिक हिंसा के बाद से फरार हो गया था। 75 से अधिक लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। हिंसा में जिन महिलाओं को आगे किया गया था, उन्हें भी चिह्नित किया जा रहा है। 19 नामजद और 5000 अज्ञातों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोपित जावेद सिद्दीकी का भाई अब्दुल मतीन सपा का उत्तराखंड प्रदेश प्रभारी है। लाइन नंबर 16 का पार्षद महबूब आलम और लाइन नंबर 14 इंद्रानगर निवासी जीशान परवेज पार्षद हैं।
वहीं खनन कारोबारी अरशद अय्यूब लाइन नंबर 12 में रहता है। असलम चौधरी डेयरी संचालक है और लाइन नंबर 3 में उसका घर है। ये सब वो हैं जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पाँचों को रिमांड पर लेकर उनसे पूछताछ की जा रही है। अब्दुल मलिक ने ही मलिक बगीचा पर अवैध कब्ज़ा कर के निर्माण करवाया था, जहाँ स्थित अवैध मस्जिद-मदरसे को ध्वस्त करने प्रशासन आया तो हिंसा भड़की। इस कार्रवाई का सबसे ज्यादा विरोध अब्दुल मलिक ही कर रहा था।
फरार अब्दुल मलिक को पकड़ने के लिए पुलिस दबिश दे रही थी, जिसमें अब सफलता मिली है। उसके खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा डालने, जमीन पर कब्ज़ा करने, लोगों को भड़काने और साजिश रचने समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। उसने ही अवैध मदरसे और नमाज स्थल का निर्माण करवाया था। नगर निगम ने 8 महीने पहले भी मलिक का बगीचा नाम स्थान पर अवैध निर्माण तोड़े थे। यहाँ छोटे-छोटे प्लॉट बना कर बेच दिए गए, मकान खड़ा कर दिया गया।
हल्द्वानी के बनभूलपुरा में बवाल का #Mastermind अब्दुल मलिक पकड़ा गया
28 दिसंबर, 2023 को सिटी मजिस्ट्रेट ऋचा सिंह से किसी ने अवैध कब्जे और निर्माण की शिकायत की थी। फिर नगर आयुक्त तक बात पहुँची। नगर आयुक्त गणेश भट्ट के नेतृत्व में 28 दिसंबर को ही अतिक्रमण हटाया गया था। नमाज स्थल और मदरसा हटाने की तैयारी शुरू की गई, बात उच्च न्यायालय तक पहुँची। जब नगर निगम की टीम पहुँची तो हिंसा हो गई। अब्दुल मलिक की गिरफ़्तारी के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी 2 टीमें भेजी गई थीं।
विधायक संजीव झा और अखिलेशपति त्रिपाठी (फोटो साभार: हिंदुस्तान)
दिल्ली की राऊज एवेन्यू अदालत ने दंगा भड़काने और पुलिस पर हमला करने के मामले में 12 सितंबर, 2022 को आम आदमी पार्टी (AAP) के दो विधायकों को दोषी करार दिया है। कोर्ट ने 7 साल पुराने मामले की सुनवाई के दौरान AAP विधायक अखिलेशपति त्रिपाठी और संजीव झा व 15 अन्य लोगों को दोषी ठहराया है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को होगी। इसी सुनवाई में सज़ा का भी ऐलान किया जाएगा।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले 7 सितंबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि पुलिस की ओर से पेश किए गए सबूतों व गवाहों से साफ है कि दोनों AAP विधायक न केवल दंगाई भीड़ में शामिल थे बल्कि नारेबाजी कर भीड़ को भड़काने का काम भी किया था। इन दोनों विधायकों के उकसाने के बाद ही भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की थी।
यह पूरा मामला 20 फरवरी, 2015 का है। इस मामले में जब एक बेक़ाबू भीड़ ने दिल्ली के बुराड़ी पुलिस स्टेशन पर हमला करते हुए पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया था। ये सभी दंगाई पुलिस से गिरफ्तार किए गए दो लोगों को छोड़ने की माँग कर रहे थे। इस हमले में हवलदार भारत रतन, मोहन लाल और कॉन्स्टेबल बाबू सहित कई जवान घायल हुए थे।
फिर एक बार AAP का घिनौना चेहरा हुआ जग जाहिर!
AAP के 2 MLA को कोर्ट ने दंगा भड़काने और पुलिस के साथ मारपीट करने में दोषी करार दिया।
आम आदमी पार्टी के दो विधायकों को दोषी करार दिए जाने के बाद भाजपा अरविंद केजरीवाल की पार्टी पर हमलावर है। दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा, “फिर एक बार AAP का घिनौना चेहरा हुआ जग जाहिर हुआ है। AAP के 2 विधायकों को कोर्ट ने दंगा भड़काने और पुलिस के साथ मारपीट करने में दोषी करार दिया है। ऐसे ही दंगाइयों-गुंडों का आप गढ़ बन गई है। अरविंद केजरीवाल संविधान की धज्जियाँ उड़ाने वाले इन लोगों को पार्टी और विधायक पद से तुरंत बरख़ास्त करो।”
दंगा भड़काने के आरोपित अखिलेशपति त्रिपाठी दिल्ली की मॉडल टाउन सीट से विधायक हैं। जबकि दूसरे आरोपित संजय झा दिल्ली के ही बुराड़ी से विधायक हैं। इन दोनों AAP विधायकों के आलवा कोर्ट ने बलराम झा, श्याम गोपाल गुप्ता, किशोर कुमार, ललित मिश्रा, जगदीश चंद्र जोशी, नरेंद्र सिंह रावत, नीरज पाठक, राजू मलिक, अशोक कुमार, रवि प्रकाश झा, इस्माइल इस्लाम, मनोज कुमार, विजय प्रताप सिंह, हीरा देवी और यशवंत को भी दोषी ठहराया है।
नैरेटिव, आज के अर्थ में कह लीजिए कि चर्चा का एंगल तय करना। दुनिया भर में भले ही आग लग जाए, लेकिन अगर 4 लोगों के पास नैरेटिव सेट करने की ताकत है तो वो ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि कोई इस आग की चर्चा ही न करे। या फिर वो ये भी फैला सकते हैं कि ये आग नहीं, पानी है। नैरेटिव की ताकत ये होती है कि अपवाद सामान्य लगने लगता है और जो रोज होता है, उसे अपवाद की श्रेणी में डाल दिया जाता है। हमने ‘पीके (2014)’ जैसी फिल्मों में महादेव के अपमान को बर्दाश्त नहीं किया होता तो आज ऐसी नौबत ही नहीं आती।
नूपुर शर्मा वाला मामला देख लीजिए। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि नूपुर शर्मा ने जो कहा वो सही है या गलत, वो इस्लाम की पवित्र पुस्तकों में लिखा है या नहीं। चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि जाकिर नाइक ने अगर यही बात कही तो उसकी बात पर हंगामा क्यों नहीं हुआ। चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि नूपुर शर्मा ने शिवलिंग का मजाक बनाए जाने वाले बयानों के जवाब में ऐसा कहा। चर्चा का विषय ये होना चाहिए था कि उनके ऐसा कहने के पहले महादेव को लोगों ने क्या-क्या कहा। चर्चा इस पर नहीं होती टीवी डिबेट के दौरान नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर लगने पर क्यों लगे? ज्ञानवापी में सर्वे का आर्डर देने वाले जज को धमकियां दी जाने पर नैरेटिव सेट करने वाले चुप्पी साधे रहते हैं, विरोध नहीं करते। लेकिन हिन्दू मुंह में दही जमाए बैठा रहा, जबकि कट्टरपंथी और छद्दम धर्म-निरपेक्षी सच को अपमान बताने में सफल होकर ज्ञानवापी, मथुरा और अन्य विवादित स्थलों से ध्यान हटाने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। ज्ञानवापी, मथुरा और अन्य विवादित मुद्दों पर सबने चुप्पी साध ली जाती है। सरकार, सुरक्षा एजेंसीज, पुलिस, एंकरों और हिन्दुओं को इन नैरेटिव सेट करने वालों के षड्यंत्र को समझना होगा।
लेकिन, चर्चा इस पर होने लगी कि नूपुर शर्मा ने पैगंबर मुहम्मद का अपमान कर दिया। उन्हें पहले ही दोषी ठहरा दिया गया, चैनल को वीडियो हटाने पर मजबूर करते हुए उससे स्पष्टीकरण जारी करने करवाया गया, मुस्लिम मुल्कों के सरकारों पर दबाव डाल कर आपत्तियाँ जारी करवाई गईं, क़तर जैसे मुल्कों ने भारतीय राजदूत को तलब किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने वालों के दबाव में भाजपा ने ‘गुडविल’ दिखाते हुए अपने दो प्रवक्ताओं को निलंबित भी कर दिया। जिसने इन कट्टरपंथियों की चालों को बल दे दिया। किसी टीवी तो क्या सरकार ने यह पूछने का साहस नहीं किया कि नूपुर क्या इस्लाम या पैगम्बर को गाली दी? नूपुर के कथन और हदीस में जो लिखित है, उसमे फर्क है? यदि नहीं, फिर अपमान कैसे?
देखिए इस वीडियो में एक मौलाना कट्टरपंथियों से क्या ज्वलंत प्रश्न कर रहा है। क्या इस मौलाना के खिलाफ फतवा होगा? क्या इस मौलाना का सर तन से जुदा करने की मांग होगी? नैरेटिव सेट करने वाले और इनके चुंगल में फंस एंकरिंग करने वाले और नूपुर के विरुद्ध प्रदर्शनकारियों को ध्यान से सुनना चाहिए।
मामला यहाँ थम जाना चाहिए था। यद्यपि इससे मुस्लिम कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ा कि वो इस्लामी मुल्कों और इस्लामी मुल्कों के संगठनों से दबाव डलवा कर भारत में कुछ भी करा सकते हैं, लेकिन फिर भी मामला यहाँ रुक जाना चाहिए था। नूपुर शर्मा के कथन में कितने प्रतिशत की सच्चाई है, डर से इसकी चर्चा नहीं हुई – लेकिन, फिर भी इस कार्रवाई के बाद सब ख़त्म हो जाना चाहिए था। शिवलिंग का मजाक बनाने वालों पर कहीं कोई ,लेकिन हिन्दुओं के ही ज़हर का घूँट पीने के बाद नूपुर शर्मा मामले को थम जाना चाहिए था।
लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। प्रयागराज में नाबालिगों को आगे कर के दंगे हुए। राँची में पुलिस पर हमला किया गया। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जुमे की नमाज के बाद हिंसा हुई। नवीं मुंबई में बुर्कानशीं महिलाएँ सड़क पर उतरीं। आम लोग निशाना बने। पुलिसकर्मी घायल हुए। जम्मू कश्मीर में युट्यूबर ने VFX के माध्यम से नूपुर शर्मा का सिर कलम करने का वीडियो भी दिखा दिया। AIMIM सांसद ने उन्हें फाँसी दिए जाने की बात कह डाली।
नैरेटिव का खेल देखिए। शिवलिंग के अपमान वाले और भगवान महादेव पर अश्लील टिप्पणी वाले सैकड़ों बयान और मीम्स शेयर करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और ये चर्चा का विषय तक नहीं बना, लेकिन मुहम्मद जुबैर के एक वीडियो शेयर करने से पूरे भारत में दंगे हुए और इस्लामी मुल्कों ने हमारी सरकार पर दबाव बनाया। नैरेटिव सेट करने वालों ने नूपुर शर्मा के कथन की सत्यता पर चर्चे को गौण कर दिया। दंगों को विरोध प्रदर्शन कह दिया, हिंसा को शांतिपूर्ण मार्च कह दिया और पत्थरबाजी करने वालों पर चुप्पी साध ली।
Welcome to the Islamic Republic of India where, when you look up, there is an effigy of yours swaying gently from a cable, and when you look down, there is a freshly dug trench smelling of damp earth waiting for you. Welcome.
जबकि, होना क्या चाहिए था? दुनिया भर में ये चर्चा होनी चाहिए थी कि राँची में थाना प्रभारी का सिर फोड़ने वाले कौन लोग थे? चर्चा ये होनी चाहिए थी कि अपनी महिलाओं-बच्चों को हिंसा में कौन आगे कर रहा है? चर्चा ये होनी चाहिए थी कि मंदिर में पूजा के बाद लोग प्रसाद लेकर निकलते हैं, लेकिन मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद लोग हाथों में पत्थर लिए बाहर क्यों आते हैं? बहस का बिंदु ये होना चाहिए था कि नूपुर शर्मा के पुतले को दरगाह के पास फाँसी के फंदे पर लटका कर तालिबानी मानसिकता का खुलेआम प्रदर्शन भारत जैसे लोकतंत्र में क्या स्थान रखता है।
चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि नूपुर शर्मा की तस्वीर पर पेशाब करने वाले बच्चों के परिवार वाले कौन हैं। बहस का विषय ये होना चाहिए था कि एक डच सांसद को नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर हत्या की धमकियाँ मिलने लगती हैं। मीडिया में ख़बरें ये होनी चाहिए थीं कि नवीन जिंदल को सिर कलम करने की धमकियों के कारण परिवार सहित दिल्ली से पलायन को मजबूर होना पड़ा। बातचीत इस पर होनी चाहिए थी कि नवीन जिंदल को उनके पूरे परिवार का सिर कलम करने की धमकी देने वाले कौन लोग हैं।
उदाहरण के लिए नैरेटिव की ताकत देखिए। सबा नकवी शिवलिंग के खिलाफ बयान देती हैं। उन पर FIR दर्ज होती है तो महिला पत्रकारों का संगठन एक लंबा-चौड़ा बयान जारी कर के इसे ‘महिला’ और ‘मीडिया’ पर हमले का रूप देता है। ये अलग बात है कि इस संस्था की ही कई पत्रकार इसके विरोध में उतर आती हैं। लेकिन, कहीं भी बयान में शिवलिंग के अपमान की चर्चा नहीं की जाती। इसे गौण कर दिया जाता है। ये नैरेटिव में फिट नहीं बैठता।
लेकिन, नूपुर शर्मा के मामले में यही महिला होने वाली बात की चर्चा तक नहीं की जाती। कुछ मुस्लिम बच्चे हँसी-ठहाके लगाते हुए अपने प्राइवेट पार्ट्स बाहर निकाल कर एक महिला की तस्वीर पर पेशाब करते हैं, लेकिन नैरेटिव में फिट न बैठने के कारण इस पर चर्चा नहीं होती। ऐसा दर्जनों बार हुआ है। अर्णब गोस्वामी को महाराष्ट्र पुलिस केवल आलोचना के लिए गिरफ्तार कर ले तो एडिटर्स गिल्ड चूँ तक नहीं करता, बंगाल में पत्रकार मारे जाते हैं तो आह नहीं निकलती, लेकिन प्रोपेगंडा गिरोह के पत्रकार झूठ फैलाएँ और एक FIR भी दर्ज हो जाए तो लंबा-चौड़ा बयान आ जाता है।
जैसे आज किसी के पुतले को फाँसी पर लटकाना आम हुआ है, कल को अफगानिस्तान की तरह हिन्दुओं को लटकाना आम हो जाएगा। भारत के इतिहास में ऐसा हो चुका है। हिन्दुओं के कटे हुए सिरों से पहाड़ बनाए जा चुके हैं, 2000 भालों पर सिखों के कटे हुए सिर लेकर मुग़ल बादशाह को पेश किया जा चुका है, हिन्दू महिलाओं को थोक में सेक्स स्लेव बनाया जा चुका है और ये सब कुछ इस्लामी शासनकाल में ही हुआ है। फिर इस्लामी भीड़ हावी हो रही है, इसकी कोई गारंटी तो है नहीं कि ऐसा नहीं होगा।
हिन्दुओं को नैरेटिव सेट करने की ताकत रखनी होगी
हिन्दुओं को नैरेटिव सेट करने की ताकत रखनी होगी। एक घटना को अपने एंगल से पेश करने के लिए 10 विदेशी भाषाओं में अनुवाद कर के ट्विटर ट्रेंड चलाना होगा। हर देश के राजनेताओं को टैग कर के सही स्थिति बतानी होगी। प्रोपेगेंडा फैला रहे विदेशी संगठनों को तस्वीरों-वीडियोज के जरिए चुप कराना होगा। जब झूठ 100 बार बोलने से सच प्रतीत हो सकता है तो सच 10 बार बोलने से ताकतवर सच क्यों नहीं बनेगा? नैरेटिव सेट कीजिए।
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नूपुर शर्मा के खिलाफ झूठ फैलाने वाले जुबैर पर FIR करने से मुंबई पुलिस का इनकार: पवार पर पोस्ट करने
दंगों की बात नहीं हो रही अब भी, जहाँ दंगाइयों पर पुलिस ने कार्रवाई की है उसकी बात हो रही, क्योंकि नैरेटिव को यही चाहिए। उनका नैरेटिव कहता है कि 100 पत्थर अगर कोई इस्लामी कट्टरपंथी मारता है तो उसकी बात मत करो, लेकिन उसे शांत करने के लिए पुलिस एक लाठी उसे लगा दे तो इसको पूरी दुनिया में फैला दो। सीजे वर्लमैन जैसे लोग यही कर रहे। ऐसे ही झूठ फैलता है। ये किसे नहीं पता कि दंगाइयों को शांत करने के लिए पुलिस बल प्रयोग करने को मजबूर होती है, लेकिन ये ऐसा दबाव बनाने की क्षमता रखते हैं कि अगली बार से पुलिस उनका फूल-मालाओं से स्वागत करने लगे।