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बेचे जाने और लीज पर देने का अंतर भूल बैठे हैं अखिलेश यादव, JPNIC ‘बिक गया’ या सिर्फ लीज पर गया?

योगी सरकार द्वारा लखनऊ के JPNIC को लीज पर देने के फैसला को अखिलेश ने सरकार पर इसे बेचने का आरोप लगाया है। फोटो साभार- ChatGPT

लखनऊ के गोमतीनगर में खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, यानी JPNIC एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज तक ठीक से जनता के काम नहीं आ पाया और अब योगी सरकार ने तय किया है कि इसका बचा-खुचा निर्माण और आगे का संचालन निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार की दलील सीधी है, परिसर भी पूरा हो जाएगा, और रखरखाव का बोझ भी खजाने पर नहीं पड़ेगा।

बस यही ऐलान होते ही अखिलेश यादव मैदान में कूद पड़े। उनका कहना है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है, निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्ति ठिकाने लगाई जा रही है।

अब सवाल उठता है कि क्या वाकई JPNIC बिक गया? क्या इसकी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम हो गई? जिस प्रोजेक्ट को लेकर आज इतना हंगामा है, उसके निर्माण में खर्च को लेकर खुद CAG ने क्या पाया था? इन सबका जवाब जानने के लिए कहानी को शुरू से पकड़ना होगा।

जानिए, JPNIC है क्या चीज

गोमतीनगर की करीब 18-20 एकड़ ज़मीन पर बना यह एक बड़ा सा बहुउद्देशीय परिसर है, जिसे शुरू से ही एक आधुनिक कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर सोचा गया था। नक्शे में एक स्टेट लेवल कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों के बैठने लायक हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा एक म्यूजियम ब्लॉक, सब कुछ शामिल था। मतलब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि आयोजनों, सम्मेलनों और खेल गतिविधियों के लिए बना एक पूरा कॉम्प्लेक्स।

इसकी नींव 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी थी। तब लागत आंकी गई थी 265.59 करोड़ रूपए लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह आंकड़ा भी बढ़ता गया और नवंबर 2016 आते-आते संशोधित लागत पहुँच गई 864.99 करोड़ रूपए तक। CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी यही दो आँकड़े दर्ज हैं, शुरुआती 265.59 करोड़ रूपए और संशोधित 864.99 करोड़ रूपए।

यहीं से यह कहानी सिर्फ ‘एक अधूरी इमारत’ की नहीं रह जाती, यह सार्वजनिक पैसे के हिसाब-किताब और जवाबदेही की कहानी बन जाती है।

लागत तीन गुने से भी ज्यादा कैसे बढ़ी

निर्माण की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को दी गई थी। मार्च 2013 में जब लागत 265.59 करोड़ रूपए तय हुई, उसके कुछ ही महीनों बाद मई 2013 में LDA ने काम एक ठेकेदार को सौंप दिया 149.60 करोड़ रूपए में जो अनुमानित लागत से करीब 12.35 फीसदी ज्यादा था।

फिर धीरे-धीरे प्रोजेक्ट में बदलाव जुड़ते गए। जैसे, शुरुआती डिज़ाइन में हेलिपैड का कोई ज़िक्र नहीं था। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड की शर्तों के चलते छत पर हेलिपैड जोड़ना पड़ा, और इसके लिए नींव में 600 मिमी की जगह 1,000 मिमी वाले पाइल इस्तेमाल करने पड़े। अब यह बदलाव अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं, निर्माण के दौरान ऐसे फेरबदल होते रहते हैं। असली सवाल इस काम पर चुकाई गई दर को लेकर उठा।

CAG ने उंगली उठाई

ऑडिट में सामने आया कि 1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक 2013 की लागू दर के हिसाब से यह सिर्फ 8,201.40 रूपए प्रति मीटर बनती थी। कुल 24,680 मीटर के इस काम पर यह छोटा-सा अंतर जुड़कर करीब 1.41 करोड़ रूपए का ‘अनुचित लाभ’ ठेकेदार की जेब में गया और उतनी ही रकम का घाटा सरकारी खजाने को हुआ। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में ‘undue benefit’ कहा गया है।

यह कोई विपक्ष का लगाया आरोप नहीं बल्कि खुद देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है।

योगी सरकार ने गड़बड़ियों की जाँच कराई

2017 में सरकार बदली और योगी आदित्यनाथ ने JPNIC के खर्चों पर आई रिपोर्ट के आधार पर जाँच कराई जिससे काम रुक गया। इसके बाद बरसों तक यह विशाल परिसर लगभग सुनसान पड़ा रहा। आखिरकार 2025 में सरकार ने फैसला लिया कि इसे फिर से LDA के जिम्मे किया जाए, ताकि अधूरा काम पूरा हो सके और कोई संचालन मॉडल तय हो।

अब हुआ क्या

अगस्त 2026 में योगी कैबिनेट ने JPNIC को निजी क्षेत्र के जरिए चलवाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के एक संयुक्त उपक्रम को चुना गया।

अब यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि ‘बेचना’ और ‘लीज पर देकर चलवाना’, दोनों एक चीज नहीं हैं। सरकार ने न तो JPNIC की जमीन बेची है, न ही इसकी सरकारी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम की है। जो व्यवस्था बनी है वह लीज और सहभागिता की है और कंपनी को संचालन का अधिकार मिलेगा, मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। जैसे कि म्यूजियम ब्लॉक, जो LDA के नियंत्रण में ही रहने वाला है।

अखिलेश यादव का यह कहना कि JPNIC ‘बेच दिया गया’ सरासर उनकी सरकार के विरोध और खुद असफल होने की कुंठा का प्रतीक है। यह बिक्री नहीं लंबी अवधि की लीज पर निजी संचालन की व्यवस्था है।

निजी कंपनी को बदले में करना क्या होगा

अब इस फैसले का वह हिस्सा जो अक्सर नारेबाजी में दब जाता है। JPNIC अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है, इसमें इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी हैं, जिन पर करीब 200 से 250 करोड़ रूपए और खर्च होने का अंदाजा है और यह खर्च सरकार नहीं, निजी ऑपरेटर अपनी जेब से उठाएगा।

इसके अलावा कंपनी को LDA को शुरुआत में 10.11 करोड़ रूपए का अपफ्रंट प्रीमियम और 25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी। संचालन शुरू होते ही हर साल 6 करोड़ रूपए का भुगतान होगा, जिसमें हर वर्ष 5 फीसदी की बढ़ोतरी भी जुड़ी है।

यानी सालों से अधूरा पड़ा जो परिसर सरकार खुद पूरा नहीं करवा पाई, उसे अब पूरा करने, चलाने और संभालने के लिए निजी पैसा लगाया जा रहा है।

पहले लगे 821.74 करोड़ रूपए का क्या होगा

एक और अहम पहलू है जो अक्सर बहस में छूट जाता है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक करीब 821.74 करोड़ रूपए जारी हो चुके हैं। यह रकम सरकार ने LDA को दी थी और अब इसे एक ‘ट्रांसफर्ड लोन’ माना जा रहा है, जिसे LDA को अगले 30 सालों में वापस चुकाना होगा।

मतलब सरकार का मौजूदा मॉडल सिर्फ ‘कंपनी को सौंप दो’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पहले खर्च हो चुके पैसे की वसूली, बाकी निर्माण, आगे के संचालन का खर्च और JPNIC को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, ये सारी चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं।

अखिलेश को नहीं पता बेच देने और लीज पर देने फर्क

विपक्ष का काम ही है सवाल पूछना और इस मायने में अखिलेश यादव का सरकार पर निशाना साधना कोई अटपटी बात नहीं। लेकिन जब आरोप ‘संपत्ति बेचने’ जैसा गंभीर हो, तो तथ्य और राजनीतिक भाषा में फर्क करना ज़रूरी हो जाता है।

तथ्य यह है कि JPNIC की शुरुआत खुद अखिलेश सरकार के दौर में हुई। तथ्य यह भी है कि इसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर CAG के रिकॉर्ड के मुताबिक 865 करोड़ रूपए तक पहुँच गई। तथ्य यह भी कि CAG ने पाइल के काम में दर के हेरफेर से 1.41 करोड़ के नुकसान की आपत्ति दर्ज की।

यह भी सच है कि 2017 के बाद जाँच बैठी, काम बरसों रुका रहा और आखिरकार 2025-26 में सरकार ने इसे LDA के जरिए फिर से पटरी पर लाने और निजी भागीदारी से संचालित करने का रास्ता चुना जिसके एवज में उसे प्रीमियम, गारंटी और नियमित लीज आय मिलेगी।

इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो सीधे ‘JPNIC बेच दिया गया’ कह देना पूरे मामले को बहुत ज्यादा सरल बना देना है।

’97 हजार करोड़’ वाली रिपोर्ट का JPNIC से क्या नाता है

अखिलेश सरकार के दौर के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर 2018 में एक और CAG रिपोर्ट सामने आई थी, जिसका ज़िक्र अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। 2014 से मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े 97,906.27 करोड़ रूपए के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे और CAG ने कहा था कि इससे धन के दुरुपयोग का जोखिम पैदा होता है।

असली सवाल बेचने का नहीं, इस्तेमाल में लाने का है

पिछले करीब दस साल से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अधूरे वादे की तरह खड़ा रहा है और सैकड़ों करोड़ खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अब सरकार इसका संचालन मॉडल बदलने जा रही है।

बहस सिर्फ इस एक लाइन पर टिकी है कि ‘JPNIC बेच दिया गया’, तो मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह दावा टिकता नहीं दिखता। मामला बिक्री का नहीं, लंबी लीज और निजी भागीदारी से चलाए जाने का है।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस प्रोजेक्ट की लागत 265 करोड़ से बढ़कर 865 करोड़ तक पहुँच गई, जिसके निर्माण में CAG ने ठेकेदार को दिए गए 1.41 करोड़ के अनुचित फायदे पर आपत्ति जताई और जो सालों तक अधूरा पड़ा रहा, उसी को अब पूरा कराने के लिए सरकार निजी पैसे का सहारा ले रही है।

कार्यकर्ताओं को राम मंदिर-पौधरोपण का मुद्दा देकर खुद विदेश घूमने निकले अखिलेश : क्या UP चुनाव के लिए यही है आपकी राजनीति?

                                                            (AI तस्वीर साभार: Dall-e)
कहते हैं, “नेतृत्व की असली पहचान चुनावी मंच पर नहीं, मुश्किल समय में होती है।” जब जनता सवाल पूछ रही हो, सरकार फैसले ले रही हो और राजनीति अपने सबसे गर्म दौर में हो, तब यह भी देखा जाता है कि नेता मैदान में खड़ा है या हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सोशल मीडिया से राजनीति कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस समय राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जाँच कर रही है, पौधरोपण अभियान को लेकर बडे़ स्तर पर सक्रिय है। ऐसे वक्त में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव विदेश दौरे पर हैं। ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव निजी दौरे पर अमेरिका गए हैं, और वहाँ से लंदन की यात्रा कर वापस भारत लौटेंगे।

सांसद प्रियंका चतुर्वेदी का अखिलेश पर हमला 

राज्य सभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि, राम मन्दिर दान चोरी का मास्टर माइंड टिन्नू यादव तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी का पुराना कार्यकर्ता निकला जो अपने आका के कहने पर हिन्दूओं की आस्था पर चोट कर रहा था।
और ये सब पता चला टिन्नू यादव और अखिलेश यादव की 980 बार हुई फोन कॉल से.. वाह रे सपाई भड़वो बाप ने राम भक्तों पर गो**ली चलवाई और बेटे ने रामभक्तों का चन्दा ही चुरा लिया यानी दोनों ही बाप बेटे ने हिन्दूओं के साथ खेला किया है। ध्यान रहे..
जो अखिलेश राम मन्दिर से चोरी करवा सकता है वो 2027 में CM बनने के बाद राम मन्दिर को तुड़वा भी सकता हैं।

ये वही अखिलेश यादव हैं, जो अपनी विदेश यात्रा के ठीक एक दिन पहले अपनी राजनीति चमकाने के लिए मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम से मिलते हैं। उससे पहले योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को ‘भ्रष्टाचार’ बता देते हैं और अपने हिस्से का जनता को बरगलाकर खुद गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने विदेश चले जाते हैं।

हजारों किलोमीटर दूर से सोशल मीडिया पर राजनीति कर रहे अखिलेश यादव

दिलचस्प बात यह है कि विदेश जाने से पहले अखिलेश यादव अपनी सोशल मीडिया टीम को ठीक ढंग से समझाकर गए हैं। तभी तो उत्तर प्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर पहुँचने के बाद भी अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट बंद नहीं हो रहे हैं। उनकी टीम योगी सरकार को घेरते हुए हर घंटे पोस्ट शेयर कर रही है।

अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट भी योगी सरकार के बड़े पौधरोपण अभियान को निशाना बनाने वाली है। इस पोस्ट में उन्होंने अपना पुराना आरोप दोहराते हुए पूरे अभियान को ‘भ्रष्टारोपण’ अभियान बताया। इसके साथ उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंच पर पौधरोपण करते हुए एक वीडियो भी साझा किया।

इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने जैसे अभियान पर राजनीतिक हमला करते हुए उन्होंने इसे ‘एनकाउंटर’ तक कह दिया।

पहले भी राजनीति छोड़ विदेश घूमने गए समाजवादी पार्टी के मुखिया

यह पहली बार नहीं है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़ अचानक अखिलेश यादव विदेश घूमने निकल गए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश यात्रा पर रहे। पार्टी ने हर बार इन दौरों को निजी बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इनकी टाइमिंग पर चर्चा जरूर हुई।

जून 2018 में अखिलेश यादव परिवार के साथ एक विदेशी छुट्टी पर रवाना हुए थे। उस समय समाजवादी पार्टी उपचुनावों में मिली सफलता के बाद विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी। वहीं, लखनऊ के सरकारी बंगले को खाली करने और उसमें नुकसान के आरोपों को लेकर भी उनकी राजनीति के केंद्र में चर्चा हो रही थी। ऐसे समय में उनके विदेश जाने को लेकर सवाल भी उठे थे।

और 2020 में जब हाथरस कांड पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ था। कॉन्ग्रेस से लेकर विपक्षी दलों के नेता लगातार हाथरस पहुँच रहे थे। लेकिन उस समय अखिलेश यादव विदेश में थे।

2025 में संसद के बजट सत्र के आसपास भी अखिलेश यादव परिवार के साथ लंदन टूर पर गए थे। तब तक 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी कर चुकी थी और अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके थे। इस समय जब देश में राजनीति करनी चाहिए थी, तब वह जश्न मनाने विदेश में थे।

यानी न तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया, न प्रदेश में किसी मुद्दे पर सक्रियता से भाग लिया और न ही खुद पर आए आरोपों का जवाब देने की उन्हें फुरसत मिली क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश घूमने में व्यस्त थे।

आज राम मंदिर पर सिर्फ तीन लोग बोल रहे हैं।
1:-पहले कांग्रेसी जिन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी कि अयोध्या में किसी भी कीमत पर राम मंदिर ना बने अपने बड़े-बड़े वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर रोकने के लिए लगा दिया और राम को काल्पनिक पात्र बताया था.. कोर्ट में एफिडेविट दिए कांग्रेस ने.*
2:- दूसरा समाजवादी पार्टी जिन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा राम भक्तों की अयोध्या में.. हत्या करवा दी पूरा सरयू खून से लाल करवा दिया..सरयू मै घायलों को बोरी में डालकर फेंका था मुलायम सरकार ने। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक आजम खान को पार्टी और सरकार में नंबर दो बना दिया ।और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के अध्यक्ष जफरयाब जिलानी को कैबिनेट मंत्री का प्रोटोकॉल दिया*
3:- तीसरा आम आदमी पार्टी जिसका सबसे बड़ा नेता केजरीवाल कहता था कि मेरी नानी ने कहा है कि राम मंदिर भूलकर भी मत जाना क्योंकि राम कभी ऐसे मंदिर में नहीं रह सकते जो मस्जिद तोड़कर बनी है । और इसी AAP का मनीष सिसोदिया जो कहता था कि राम मंदिर नहीं बनना चाहिए वहां यूनिवर्सिटी बननी चाहिए।*
इनकी राजनीतिक लालसा तो देखिए आज यह तीनों कैटेगरी के हिंदूद्रोही इस तरह से हिंदुओं को भरमा रहे हैं जैसे यही सबसे बड़े राम भक्त हो..।*
इसका कारण कोई राम भक्त और सनातनी विचारधारा, हिंदुत्व की विचारधारा नहीं है सिर्फ एक ही मकसद है कि हिंदुओं को और ज्यादा कैसे बांटे?कैसे इनको एक से दो फिर दो से चार से चार से आठ करें... इनका यही मकसद है कि हिंदू समाज को कैसे तोड़ा जाए... सिर्फ अपने वोट के हित के लिए सिर्फ अपनी राजनीति एजेंडा के लिए... जिन लोगों ने कभी भी राम मंदिर के समर्थन भी नहीं किया.. चंदा देना तो बहुत दूर की बात... आज वह लोग बात करते हैं राम मंदिर की!!*

अखिलेश, तेजस्वी, राहुल… सब विदेश में बैठकर चमका रहे राजनीति

एक तरफ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में सत्ता हथियाने का ख्वाब बुन रहे हैं, दूसरी तरफ हर जरूरी मौकों पर विदेश यात्राएँ पर घूमने निकल पड़ते हैं। उन्होंने राम मंदिर चंदा चोरी के नाम पर हिंदुओं को जगाने का ढोंग कर, दलित छात्रा की हत्या पर अपने मतलब की राजनीति कर और पौधरोपण जैसे पॉजिटिव काम को भ्रष्टाचार बताकर, अपने समर्थकों को झुनझुना थमा दिया है और अब उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि इसे बजाना कैसे हैं?

अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी विदेश यात्रा पर सवाल उठे हों। अलग-अलग समय पर अन्य विपक्षी नेता भी यही करते आए हैं। उदाहऱण के लिए, तेजस्वी यादव, जो फिलहाल यूरोप में है, वहीं बैठकर पटना के बंटी यादव हत्याकांड के पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर लेते हैं। राहुल गाँधी भी तीन हफ्ते से यूरोप घूम रहे हैं, जिसके चलते कॉन्ग्रेस के खुद के ‘छात्रों की गूँज’ जैसे कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं।

तो इसीलिए यह सोच-विचार करना जरूरी है कि किस नेता को असल में जनता के मुद्दों की फिक्र है और किसे नहीं है। जहाँ एक ओर योगी सरकार राम मंदिर चढ़ावे की निष्पक्ष जाँच कर रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग को खत्म करने के लिए पौधरोपण कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश का विपक्ष विदेश घूमने में व्यस्त है।

संविधान के दो ही बड़े रक्षक है, पहला नंबर राहुल गांधी है जो अपनी अधिकांश सभाओं एवं पद यात्राओं में एक लाल रंग की पुस्तक होती है उसी को हाथ में लहराते हुए ,चाहे उन्होंने उस पुस्तक को खोल कर पढ़ा हो या नहीं, बह लाल किताब को बह भारत का संविधान कहते है, उसकी रक्षा का बह प्रण लेते दिखते है जब उनके नेहरू गांधी परिवार ने उस संविधान को अपने हिसाब से दसियों बार तोड़ा एवं बदला है।
दूसरे संविधान के रक्षक समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव है, जो 10 साल से सत्ता से बाहर रहकर ऊब चुके है। उन्हें भी राहुल गांधी की तरह संविधान से बहुत प्यार है। उनके एवं उनके पिताश्री के शासन काल में जिस तरह से दूसरे समुदाय के तुष्टिकरण के लिए अपनी सरकार आते ही
उन अपराधियों को छोड़ दिया गया जिन पर बहुत ही गंभीर आरोप थे । अतीक अहमद, मुख्तयार अंसारी एवं उनके गुर्गो के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। फिरौती, जवारदस्त हफ्ता वसूली करने बालों पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं। महिलाओं के अंदर घर से बाहर निकलने पर उनके परिजनों को भय, बच्चियां स्कूल जाने से भी डरती थी, बही लोग अब संविधान की रक्षा की बात कर रहे है।

अखिलेश यादव ने फैलाया ‘नोटों के निजीकरण’ का झूठ, पॉलिमर शीट खरीदने के टेंडर पर गढ़ी कहानी: भूल गए UPA के दौर में विदेश से आता था करेंसी पेपर

                                            नोटों के निजीकरण पर अखिलेश का फर्जी दावा
विपक्ष का धरातल में जाने का मुख्य कारण झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना है। अब तक जितने भी मुद्दों को विपक्ष ने उछाला सबके सब धराशाही हो गए। एक बात जो ध्यान देने वाली है कि राममन्दिर चढ़ावे में चोरी का मामला है यह चुनाव तक खींचेगा क्योकि उम्मीद की जा रही है कि अखिलेश और कुछ विपक्षी भी लपेटे में आएंगे। जो उत्तर प्रदेश में थाली में सजाकर योगी आदित्यनाथ को सत्ता सौंपने का काम करेगी।  

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाया है कि क्या भाजपा सरकार में अब भारतीय बैंक नोटों का भी निजीकरण किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी एक टेंडर का हवाला दिया है।

इस टेंडर में नोटों की छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाली ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए कंपनियों से आवेदन माँगे गए हैं। इसे आधार बनाकर अखिलेश यादव ने X पर लिखा, “कमीशनखोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था।”

उन्होंने लिखा, “भ्रष्ट BJP राज में अब नोटों का भी प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा क्या? कमीशनख़ोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था। जब देश की मुद्रा ही आत्मनिर्भर नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था और देश आत्मनिर्भर कैसे होगा? अब क्या सरकार भी आउटसोर्सिंग पर दे दी जाएगी?”

अखिलेश ने लिखा, “इतने बड़े और संवेदनशील कार्य के लिए इतना छोटा कंजूसीभरा टेंडर निकालने के पीछे, कहीं चुपके से औपचारिकता पूरा करने का कोई गलत मंसूबा तो नहीं है। लगता है सेटिंग पहले ही हो चुकी है, दिखाने को ख़ानापूर्ति की जा रही है। भाजपा सरकार नहीं, मुनाफाखोरों की भागीदार है।”

जिस टेंडर का अखिलेश यादव जिक्र कर रहे हैं, वह 17 जुलाई 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी किया गया एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) है। इसमें भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए उपयुक्त ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए आवेदन माँगे गए हैं। अखिलेश यादव का यह दावा कि इससे बैंक नोटों का निजीकरण हो रहा है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

यह टेंडर केवल BRBNMPL द्वारा एक विशेष प्रकार के कच्चे माल यानी बेस सब्सट्रेट की खरीद के लिए जारी किया गया है। इसका भारतीय मुद्रा की छपाई, डिजाइन, सुरक्षा फीचर्स या नोट जारी करने का अधिकार किसी निजी कंपनी को देने से कोई संबंध नहीं है। भारतीय नोटों की छपाई पहले की तरह ही केवल RBI के नियंत्रण वाली प्रेसों में होती रहेगी।

इनमें BRBNMPL की मैसूर और सालबोनी स्थित प्रेसें तथा सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) की नासिक और देवास स्थित प्रेसें शामिल हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से पॉलिमर आधारित बैंक नोट लाने की संभावना पर विचार कर रहा है। खासकर छोटे मूल्य के नोटों के लिए क्योंकि वे जल्दी गंदे हो जाते हैं और उनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं। जून 2026 में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव शुरुआती चरण में है और केंद्रीय बैंक इसके फायदे और नुकसान का अध्ययन कर रहा है। भविष्य में ऐसा निर्णय होने पर भी नोटों की छपाई इन्हीं सरकारी प्रेसों में होगी, किसी निजी कंपनी के पास नहीं जाएगी।

 भारत में अभी पॉलिमर नोट जारी नहीं किए जाते और इसलिए यहाँ पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने वाली कोई कंपनी भी नहीं है। दुनिया के केवल कुछ ही देश पॉलिमर नोट जारी करते हैं। जैसे सामान्य कागज वाले नोटों के लिए इस्तेमाल होने वाले कॉटन पेपर में सुरक्षा फीचर पहले से शामिल होते हैं, वैसे ही पॉलिमर शीट में भी निर्माण के दौरान सुरक्षा फीचर जोड़े जाते हैं। इसलिए यह एक विशेष प्रकार का उत्पाद है जिसे दुनिया की केवल कुछ कंपनियाँ ही बनाती हैं। इसी कारण BRBNMPL ने योग्य कंपनियों से वैश्विक स्तर पर एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) माँगा है।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, रोमानिया और वियतनाम जैसे कई देशों ने अपने सभी या अधिकांश मूल्य वर्ग के लिए पॉलिमर बैंक नोट अपनाए हैं। लेकिन ये देश भी इन नोटों के लिए जरूरी विशेष ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट खुद नहीं बनाते। ये शीट कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों से खरीदी जाती हैं। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी ऑस्ट्रेलिया की CCL Secure है।

इसकी बेस फिल्म इसकी सहयोगी कंपनी Innovia Films तैयार करती है। इसके बाद CCL Secure उस पर ओपैसिफिकेशन लेयर और संबंधित केंद्रीय बैंक की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा फीचर जोड़ती है। दूसरी बड़ी कंपनी ब्रिटेन की De La Rue है जो अपना Safeguard पॉलिमर सब्सट्रेट बनाती है और तैयार बैंक नोट भी छापती है। दुनिया के केंद्रीय बैंक और उनकी नोट छापने वाली प्रेसें इन विशेष कंपनियों से तैयार पॉलिमर शीट खरीदती हैं। वे इन्हें खुद नहीं बनातीं।

अखिलेश यादव जहाँ पॉलिमर शीट के आयात को बैंक नोटों का निजीकरण बता रहे हैं तो वहीं हकीकत यह है कि भारत में भी हाल तक कागज वाले नोट आयातित सुरक्षा कागज पर ही छपते थे। RBI लंबे समय तक जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से आयातित करेंसी पेपर पर निर्भर था।

हालाँकि, होशंगाबाद की सिक्योरिटी पेपर मिल से कुछ घरेलू उत्पादन होता था लेकिन आत्मनिर्भरता को बड़ी मजबूती तब मिली जब मैसूर में बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने काम शुरू किया। SPMCIL और BRBNMPL के इस संयुक्त उपक्रम ने 2016 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। इससे भारत की उत्पादन क्षमता काफी बढ़ी और मेक इन इंडिया पहल के तहत आयातित बैंक नोट पेपर पर निर्भरता काफी कम हुई।

इसका मतलब यह है कि जब केंद्र में अखिलेश यादव की पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी, तब भारत विदेशी देशों से आयात किए गए कागज पर बैंक नोट छाप रहा था।

यह टेंडर भविष्य में इस्तेमाल हो सकने वाली नई सामग्री की जाँच और तैयारी की एक सामान्य प्रक्रिया है और यह पूरी तरह RBI की निगरानी में होगी। आयातित शीट का इस्तेमाल ₹10 और ₹20 के नोटों के सीमित पायलट प्रोजेक्ट के लिए किया जाएगा। इससे बैंक नोटों के निजीकरण या मुद्रा पर सरकार के नियंत्रण में किसी तरह की कमी का कोई संकेत नहीं मिलता।

दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल भारत में डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में नकदी का इस्तेमाल होता है। इसलिए यदि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव लागू होता है तो बड़ी मात्रा में पॉलिमर शीट की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में विदेशी कंपनियाँ भारतीय निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर भारत में ही उत्पादन इकाइयाँ लगाने में रुचि लेंगी।

जहाँ तक अखिलेश यादव के इस आरोप का सवाल है कि इतने महत्वपूर्ण काम के लिए बहुत छोटा विज्ञापन जारी किया गया, तो आजकल टेंडर विज्ञापन इसी तरह प्रकाशित किए जाते हैं। विस्तृत निविदा दस्तावेज और सभी शर्तें संबंधित विभाग या एजेंसी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाती हैं जबकि अखबारों में केवल छोटा-सा विज्ञापन देकर वेबसाइट का पता बताया जाता है। इससे खर्च कम रहता है क्योंकि बड़े अखबारी विज्ञापनों पर ज्यादा पैसा खर्च होता है। इस विज्ञापन में भी इच्छुक कंपनियों से कहा गया है कि वे EOI दस्तावेज, पात्रता मानदंड और अन्य जानकारी के लिए www.brbnmpl.co.in पर जाएँ।

टीएमसी के बाद अब INDI गठबंधन में भी टूट, उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ और समाजवादी पार्टी में भी टूट


जो काम मोदी सरकार-3 को 400 सांसद होने पर करना था वही काम होने जा रहा है 240 सांसदों के होते। As you sow you will reap यानि हिन्दी में जो बोया वही काटो यानि कांग्रेस ने जो बोया वही आज INDI गठबंधन को काटना पड़ रहा है। इतिहास में झाँकने पर मालूम होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर बीजेपी तत्कालीन भारतीय जनसंघ तक जितनी भी पार्टियां है सभी कांग्रेस से निकली है। जनसंघ वर्तमान बीजेपी जैसी पार्टियां तो अपना अस्तित्व बनाने में सफल रही और कुछ सिर्फ क्षेत्रीय पार्टी। 
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सत्ताधारी महागठबंधन में शामिल दलों की एकजुटता की चूलें हिलाकर रख दी हैं। संसद के उच्च सदन की दूसरी सीट पर प्रियंका गांधी के करीबी कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की करारी शिकस्त के बाद सत्ताधारी महागठबंधन यानी INDI ब्लॉक की दीवारें पूरी तरह दरकती दिख रहीं हैं। इस चुनावी मुकाबले ने गठबंधन के भीतर चल रहे अविश्वास का एक ऐसा ‘एनकाउंटर’ किया है, जिसके जख्म के निशान अब मुख्यमंत्री आवास की दीवारों पर नजर आ रहे हैं। चुनाव के इस लिटमस टेस्ट में बुरी तरह जख्मी नजर आ रही कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल(RJD) और वामपंथी दल माले(CPI-ML) पर खुलेआम क्रॉस वोटिंग और भितरघात का आरोप मढ़ा है। वहीं राजद ने भी अब पलटवार करते हुए कांग्रेस को ही असली ‘गद्दार’ बता दिया है और उसे गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की मांग तेज कर दी है।
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार बैजनाथ मिश्रा का मानना है कि यह चुनाव परिणाम महज एक सीट की हार नहीं, बल्कि महागठबंधन के भीतर आपसी भरोसे का पूरी तरह अंत है। ऐसे में चुनाव के बाद घायल अवस्था में पड़ी कांग्रेस के नेता जहां तल्ख तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं राजद भी पूरी तरह आक्रामक है। राजद के राष्ट्रीय महासचिव भोला प्रसाद यादव ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी खुद की अंदरूनी कलह और कमजोरी को छिपाने के लिए सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ रही है। उन्होंने कहा कि जो दल अपने विधायकों को संभाल नहीं सकता, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
खैर, जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक कांग्रेस ने जितनी पार्टियों में टूट और विधान सभाओं को भंग किया ऐसा कभी नहीं हुआ। आज अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी वही काम कर रही है क्योकि बीजेपी को पास कराना है महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को पारित करवाना जिसके लिए जरुरत है संसद में दो-तिहाई बहुमत। 
पार्टी छोड़कर आने वाले किसी भी विधायक से लेकर सांसद तक किसी को बीजेपी अपनी पार्टी में शामिल करने की बजाए अपनी सहयोगी पार्टियों की तरफ हस्तांतरण किया जा रहा है।    
देश में विपक्ष की सियासत इस समय दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन के एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर राज्यों के सियासी गलियारों तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची भगदड़ ने भारतीय दलबदल विरोधी कानून की गलियों और राजनीतिक शुचिता के दावों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के दूसरी छोटी पार्टी में विलय के बाद अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 सांसदों की बगावत सुर्खियों में है। इसको लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत तो गालीगलौज तक पर उतर आए हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुनबे में टूट की सुगबुगाहट आ रही है। ये महज छिटपुट सियासी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे एक गहरे ढांचागत बदलाव का संकेत हैं। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि मजबूत दिखाई देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले भी अब अंदरूनी अंतर्विरोधों और एनडीए की राष्ट्रवादी राजनीति के आकर्षण के कारण ढह रहे हैं।

ममता के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी सांसदों का विलय
इस पूरे राजनीतिक भूचाल की शुरुआत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से हुई, जहां भाजपा ने टीएमसी को रोंदकर सरकार बनाई। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

उद्धव गुट को एक और झटका: शिवसेना की बगावत
दूसरी ओर महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा और अब लोकसभा स्तर पर पार्टी को एक और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। पार्टी के छह प्रमुख सांसदों, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना के बागी रुख ने उद्धव ठाकरे खेमे की रीढ़ तोड़ दी है। इस टूट ने पार्टी नेतृत्व की उस संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके लिए कभी बाल ठाकरे की शिवसेना जानी जाती थी।

हताशा से भरे सांसद संजय राउत गाली गलौज पर उतरे
शिवसेना उद्धव गुट के इन सांसदों के गुट ने अभी किस पार्टी में विलय किया है, यह तो साफ नहीं हुआ है, लेकिन इस बिखराव की तल्खी तब खुलकर सामने आ गई जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना आपा खो बैठे। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज पर उतर आए। राउत का यह गुस्सा और तीखे आरोप दरअसल उस लाचारी और हताशा को दर्शाते हैं, जो एक समय महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र रहे दल के भीतर अपनी जमीन खिसकने के कारण पैदा हुई है। गाली-गलौज की यह राजनीति बताती है कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

समाजवादी पार्टी पर भी मंडरा रहे हैं बड़ी टूट के बादल
संसद के इस दलबदल चक्र की तपिश अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के इस सनसनीखेज दावे ने यूपी की सियासत में खलबली मचा दी है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 26 सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं और उनके भीतर गहरी फूट पड़ चुकी है। राजनीति में इस तरह के दावों को अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है। समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में चार सांसद हैं। ऐसे में 25 सांसदों के टूटने की खबरों से पार्टी में हड़कंप की स्थिति बन गई है और सांसदों को रोकने के रणनीति बनाई जा रही है।

‘सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस चर्चा को हवा दे दी है। मौर्य का यह कहना कि’सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’, दरअसल सपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है। यह बयान दिखाता है कि सत्ता पक्ष विपक्ष के किलों में लगी दरारों को भांप चुका है और केवल सही वक्त का इंतजार कर रहा है। अखिलेश यादव के लिए अपने इस बड़े कुनबे को एकजुट रखना आने वाले दिनों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कमजोर पड़ता क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व और केंद्रीय सत्ता का आकर्षण
इन तीनों राज्यों के घटनाक्रमों को अगर एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के क्षेत्रीय दल इस समय एक बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। जब तक ये दल सत्ता में रहते हैं या मजबूत दिखते हैं, तब तक इनका अंतर्विरोध दबा रहता है। लेकिन जैसे ही चुनावी हार या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, वैसे ही सांसदों और विधायकों का मोहभंग होने लगता है। टीएमसी, शिवसेना और सपा जैसी पार्टियों का ढांचा अक्सर एक ही परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। ऐसे में जब जमीनी स्तर पर नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो महत्वाकांक्षी नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगने लगता है। केंद्रीय सत्ता का संरक्षण और उसके साथ मिलने वाले लाभ इन सांसदों को अपनी मूल पार्टी की विचारधारा को छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल आत्ममंथन करें कि ऐसी नौबत क्यों आई
संजय राउत के बयानों और विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह भी साफ है कि विपक्ष की राजनीति में अब गरिमापूर्ण संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है। जब कोई नेता या सांसदों का समूह पार्टी छोड़ता है, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई। इसके विपरीत, बागी नेताओं को गद्दार घोषित करना, उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और व्यक्तिगत कीचड़ उछालना अब एक आम चलन बन गया है। यह रवैया राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति और दलबदल की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उसे निजी दुश्मनी और गाली-गलौज के स्तर पर ले जाना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।

दलों ने आंतरिक लोकतंत्र नहीं सुधारा तो भविष्य और चुनौतीपूर्ण
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का यह खेल उस आम मतदाता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो किसी पार्टी की विचारधारा, उसके घोषणापत्र और उसके नेता का चेहरा देखकर अपना वोट देता है। जब चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ या दबाव में आकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाता है, तो जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था कम होने लगती है। टीएमसी, शिवसेना और संभावित रूप से सपा के भीतर चल रहा यह घटनाक्रम यह चेतावनी है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी अंदरूनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं सुधारा और जनमत का सम्मान नहीं किया, तो उनके लिए आने वाला भविष्य और चुनौतीपूर्ण होगा। सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कीमत पर पाई गई सत्ता लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

क्या है दलबदल विरोधी कानून का लक्ष्मण रेखा
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू दलबदल विरोधी कानून मूल रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वार्थी पाला-बदल को रोकने के लिए बनाया गया था, जिसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में व्हिप (पार्टी निर्देश) के उल्लंघन में मतदान करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त की जा सकती है; हालांकि, इस कानून की सबसे बड़ी कानूनी खिड़की इसके ‘विभाजन और विलय’ संबंधी प्रावधानों में छिपी है, जिसके मुताबिक यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ मिलकर एक अलग गुट बनाते हैं और किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में अपने गुट का आधिकारिक रूप से विलय कर लेते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई लागू नहीं होती और उनकी सांसदी या विधायकी पूरी तरह सुरक्षित रहती है। जैसा कि हाल ही में टीएमसी के 20 सांसदों ने किया।

अखिलेश यादव सरकार में केवल मुसलमानों का कल्याण


उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति किसी से छिपी नहीं है। सपा ने खुद को हमेशा अल्पसंख्यकों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के बीच अपना जनाधार बनाए रखने के लिए पार्टी ने अपने विभिन्न कार्यकालों में अनेक योजनाओं के केंद्र बिंदु में मुस्लिमों को ही रखा। यहां तक कि कई योजनाओं तो उन्होंने सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही शुरू कीं। मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के कार्यकाल तक अल्पसंख्यक कल्याण को राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया गया। यही कारण है कि भाजपा सहित अन्य दल अक्सर समाजवादी पार्टी पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” की राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं।

सपा ने चार कार्यकाल में मुस्लिमों में ही पहचान बनाई

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार चार प्रमुख कार्यकालों में सत्ता में रही। मुलायम सिंह यादव 1989-91, 1993-95 और 2003-07 के बीच मुख्यमंत्री रहे, जबकि अखिलेश यादव ने 2012 से 2017 तक राज्य की कमान संभाली। इन अवधियों में मुस्लिम समुदाय की शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगार, मदरसा आधुनिकीकरण, अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्थान और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई योजनाएं लागू की गईं। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने अल्पसंख्यक कल्याण को अपनी राजनीति और शासन की केंद्रीय धुरी बनाए रखा। छात्रवृत्ति, मुस्लिम लड़कियों के लिए आर्थिक सहायता, मदरसा आधुनिकीकरण, उर्दू शिक्षा और आरक्षण की मांग जैसी पहलों ने मुस्लिम समुदाय के बीच पार्टी की मजबूत पहचान बनाई। दूसरी ओर, इन्हीं नीतियों को विपक्ष ने “मुस्लिम तुष्टिकरण” करार दिया।

कब्रिस्तानों की चारदीवारी योजना: वोट बैंक के लिए कब्जे 

अखिलेश यादव सरकार के सबसे चर्चित फैसलों में से एक राज्यभर के कब्रिस्तानों की चारदीवारी का निर्माण था। वर्ष 2012-13 के बजट में इसके लिए विशेष प्रावधान किया गया। सरकार का तर्क था कि भूमि विवादों और अतिक्रमण को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों कब्रिस्तानों की चारदीवारी के लिए एक हजार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। विपक्ष ने इसे खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण बताया। यह योजना मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय रही और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक इसका राजनीतिक प्रभाव देखने को मिला। सपा सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मो. आजम खां के पास था। उन्होंने ही कब्रिस्तानों की चारदीवारी के निर्माण की योजना चलाई। इस योजना पर पांच साल में 1200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जबकि हकीकत यह है कि कई जिलों में योजना पर काम ही नहीं हुआ। जहां काम हुआ भी वहां भी घपले की शिकायतें हैं।

लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू शिक्षा और उर्दू सॉफ्टवेयर को बढ़ावा

अखिलेश यादव सरकार ने लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू सॉफ्टवेयर शामिल करने की घोषणा की। रामपुर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा था कि विद्यार्थियों को दिए जाने वाले लैपटॉप में हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध कराया जाएगा। मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे उर्दू भाषा के संरक्षण और डिजिटल युग में उसके विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना।

सच्चर समिति के तहत मुस्लिमों को सरकारी नौकरी में आरक्षण की पैरवी

दिसंबर 2012 में समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सत्ता में आने पर सपा विधि विषेशज्ञों की राय लेकर केरल तथा आंध्र प्रदेश की तर्ज पर मुसलमानों को इतना आरक्षण देगी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएंगे। हालांकि यह नीति पूरी तरह लागू नहीं हो सकी, लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच इसे सपा की राजनीतिक प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया गया।

‘हमारी बेटी उसका कल’: मुस्लिम लड़कियों के लिए सबसे चर्चित योजना

10 दिसंबर 2012 को रामपुर में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने “हमारी बेटी उसका कल” योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत हाईस्कूल उत्तीर्ण अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को 30,000 रुपये की एकमुश्त सहायता दी जाती थी। इसका उद्देश्य लड़कियों की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को विवाह संबंधी सहायता देना था। योजना का सबसे बड़ा लाभ मुस्लिम छात्राओं को मिला। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है। प्रारंभिक चरण में लगभग 14,000 लड़कियों को इसका लाभ मिला। बाद में यह संख्या और बढ़ी। सरकार ने इस योजना के लिए लगभग 250 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। “हमारी बेटी उसका कल” योजना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका तक दाखिल हुई थी।

 वोट बैंक को साधने के लिए 84 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव में लगभग 84 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। सपा के 42 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी होकर विधानसभा पहुंचे थे। उस चुनाव में कुल 63 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे थे, जिनमें सबसे अधिक सपा के थे। 15 मार्च 2012 को बनी पहली अखिलेश यादव सरकार में कुल 48 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इनमें 9 मुस्लिम मंत्री शामिल थे।
प्रदेश में हज यात्रियों के लिए सुविधाओं का विस्तार
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखिलेश सरकार ने हज यात्रियों की सुविधा के लिए लखनऊ हज हाउस और अन्य व्यवस्थाओं का विस्तार किया। हज प्रशिक्षण शिविरों, आवास और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर दिया गया। गाजियाबाद में 1886 हज यात्रियों के रुकने के लिए बनाए गए हज हाउस में शासन ने 51.16 करोड़ रुपये खर्च किए। 11 साल में बनकर तैयार हुए इस हज हाउस शिलान्यास 30 मार्च 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम ¨सिंह ने किया था और उद्घाटन उनके पुत्र व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 5 सितंबर 2016 को किया। नगर विकास मंत्री आजम खान ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के हज पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए जाने के लिए व्यवस्था की गई है।

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 : ममता की तरह धमकाने पर उतरे अखिलेश यादव, कहा- सरकार बनी तो करेंगे सख्त कार्रवाई: एनकाउंटर्स को बताया फर्जी

जिस तरह बंगाल में ममता बनर्जी मुसलमानों का डर दिखाकर हिन्दुओं को धमका रही थी, ठीक उसी रास्ते पर अखिलेश यादव चल निकले हैं। योगी आदित्यनाथ से पहले उत्तर प्रदेश में जो जंगल राज था उसी की वापसी करने की तैयारी की जा रही है। जो पुलिस समाजवादी पार्टी के मंत्री की भैंस ढूंढने कानून व्यवस्था को छिन बिन्न कर रखा था वही वापस लाने पुलिस को धमकाना शुरू कर दिया है। जब सत्ता से 10 साल दूर रहने की इतनी तड़प हो रही है कि पुलिस अधिकारियों को धमका रहे हैं हिन्दुओं का क्या होगा? क्या हिन्दू योगी राज से पहले की तरह समाजवादी पार्टी के राज में अपने त्यौहारों को खुलकर नहीं मना सकेंगे? बंगाल की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं को ही नहीं बल्कि सभी धर्मों को समाजवादी पार्टी के खिलाफ लामबंद होना होगा।  
चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने सत्ता के बिना किस तरह बिलबिला रहे हैं कि प्रदेश में सत्ताभोग नहीं तो चलो संसद पहुँच कर राजशाही करो। ऐसे नेताओं को ना ही देश की चिंता है और ना ही जनता की इन्हे चाहिए विलासिता जीवन और तिजोरी भरने का साधन।  
देखिए सोशल मीडिया पर वायरल ‎ये है असली रुप इन कांग्रेसी,सपा,आरजेडी,टीएमसी और अन्य पारिवारिक पार्टी का।
‎हिंदुओं के वोट पाने के लिए 2014 के बाद से हमें मजबूरन पूजा करने मंदिरों में जाना पड़ रहा है। लेकिन उससे आप कोई गलतफहमी मत पाल लेना कि हम अब बदल गए हैं, खुदा कसम हम वही है और वही रहेंगे जो 2014 पहले हुआ करते थे।
‎देखिए न, हम जो भी तोड़फोड़ करते हैं हिंदुओं में ही करते हैं मुसलमानों को जातियों में बांटकर आपस में लड़ाने का काम ना हम तब करते थे और न आज कर रहे हैं, ऐसा गंदा काम करने की बात तो हम कभी सोचते भी नहीं
। 2027 में रहम मेरे ऊपर ही करना किसी और पर नहीं,आपको खुदा का वास्ता  
आज राज्य की जनता योगी मॉडल अपनाने की मांग कर रही है, और समाजवादी पार्टी और INDI गठबंधन हिन्दुओं को जातियों में बाँट राज करने की हिमाकत कर रहे हैं। मुसलमानों को भी सोंचना होगा कि जो अपने धर्म का नहीं किसी दूसरे के मजहब नहीं हो सकता। अगर हिन्दुओं को ये लोग बांट रहे हैं तो बदनाम मुसलमान भी हो रहा है।   
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब धमकाने पर उतर आए हैं। अखिलेश यादव ने कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर बयान देते हुए धमकी दी है कि प्रदेश में उनकी सरकार बनती है तो जिन अधिकारियों ने फर्जी एनकाउंटर किए हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इसके साथ ही अखिलेश यादव ने रोजगार के मुद्दे पर योगी सरकार और केंद्र की BJP सरकार पर आरोप लगाया कि युवाओं को नौकरी देने के मोर्चे पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में आने पर उनकी पार्टी बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी।

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी उन्होंने वादा किया कि समाजवादी सरकार बनने पर एंबुलेंस व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा और गरीबों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर तथा मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। अखिलेश ने पेट्रोल-डीजल में कथित मिलावट का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे लोगों की गाड़ियों को नुकसान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश : किस ‘शर्त’ पर चुनावों में सपा के समर्थन को तैयार हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, क्यों हिंदू विरोधी अतीत को दे रहे हैं ‘क्लीनचिट’?

      स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आरती करतीं डिंपल यादव और अखिलेश यादव (फोटो साभार: X/Dimple Yadav)
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव निकट आ रहे हैं, सनातन को अपमानित करने वाली समाजवादी पार्टी ने कालनेमि बन हिन्दुओं को गुमराह करने साधु-संतों की शरण में जाना शुरू कर दिया है। हिन्दू यह भी नहीं भुला कि किस तरह समाजवादी नेता रामायण के पृष्ठ फाड़ रहे थे, सनातन के विरुद्ध बयानबाज़ी कर रहे थे और आज सत्ता पाने उसी सनातन की शरण में जा रही है। लेकिन हिन्दुओं को इन सनातन विरोधियों से बंगाल की तरह दूरी बनानी होगी।       
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गौहत्या पर प्रतिबंध की माँग को लेकर निकाली जा रही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्ठी यात्रा’ लगातार चर्चाओं में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल उठ रहे थे कि इसे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। अब अखिलेश यादव के एक बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने शुक्रवार (12 जून 2026) को एटा में कहा कि शंकराचार्य भी PDA हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट बँटवारे को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पूजनीय शंकराचार्य जी भी पीड़ित, दुखी, अपमानित हो रहे हैं इस सरकार में। वह भी PDA हो गए हैं, इसलिए हम उनके साथ हैं।” अखिलेश यादव के इस बयान और यात्रा में सपा नेताओं के शामिल होने पर उठ रहे सवालों को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने ऑपइंडिया से बात की है।

गलफहमी ना पालें अखिलेश: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

3 मई 2026 से शुरू हुई इस 81 दिवसीय यात्रा को लेकर संजय पांडेय ने कहा कि यात्रा को लेकर जनता का रुख सकारात्मक है और यात्रा के बाद से मुस्लिम और ईसाई भी समर्थन में आ गए हैं। वहीं, अखिलेश यादव के बयान पर उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कुछ भी अखिलेश जी ने बयान दिया है कि महाराज जी PDA का हिस्सा हो गए हैं, तो ये उनकी गलतफहमी है। महाराज जी सिर्फ सनातन धर्म के हैं। वो किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा, “अगर PDA अभी यह घोषणा कर दे कि सरकार बनने पर गाय को ‘राज्य माता’ घोषित किया जाएगा और गौकशी पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी, तो उन्हें शंकराचार्य जी का समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा। वे और उनके समर्थक PDA के साथ खड़े होंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया तो शंकराचार्य जी का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।”

संजय पांडेय ने कहा, “यह किसी विशेष दल का समर्थन करने का मामला नहीं है। अगर बीजेपी, कॉन्ग्रेस या PDA कोई भी दल अपने घोषणा पत्र में गाय को राज्य माता घोषित करने और गोकशी बंद कराने का लिखित व सार्वजनिक वादा करेगा तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं बल्कि गौ माता के प्राणों की रक्षा का है।”

सपा-कांग्रेस के नेताओं के यात्रा में शामिल होने पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी यात्रा को उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। दरअसल, उनकी यात्रा के मंचों पर सपा और कांग्रेस के नेता खूब नजर आ रहे हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख सरकार को लेकर गोरक्षा के विषय से आगे बढ़कर आक्रामक नजर आ रहा है।

कुछ दिनों पहले उनकी यात्रा जब इटावा के सैफई पहुँची तो उनके मंच पर अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव नजर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला था। इस बारे में भी संजय पांडेय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख स्पष्ट किया है।

संजय पांडेय ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल वाले आ रहे हैं तो वो सनातनी ही हैं। जब मुस्लिम समर्थन कर रहे हैं, गौ माता को राष्ट्र माता बोल रहे हैं जबकि उनके धर्म में पशु माना जाता है। तो जब वो तैयार हो गए हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हिंदू अगर आ रहा है, तो उसका स्वागत है। उसमें भाजपा के भी लोग आएँ, उनके लिए भी कोई रोक नहीं है।”

‘सपा के हिंदू विरोधी अतीत’ से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा, “शंकराचार्य जी महाराज, परंपरा से जुड़े हुए हैं और सपा की सच्चाई भी इनको मालूम है। सपा जहाँ गड़बड़ है, सपा जो गलत कर रही है धर्म विरोधी, तो सपा का भी विरोध रहेगा। अभी जब राजकुमार भाटी ने बयान दिया था ब्राह्मणों और धर्म के खिलाफ तो महाराज श्री ने उनकी भी निंदा की थी और कहा था कि समाजवादी पार्टी को जनता ठीक कर देगी।”

उन्होंने कहा, “जितना धर्म के अंश में वह काम करेंगे, उतना ही शंकराचार्य जी का उनके साथ समर्थन रहेगा, आशीर्वाद रहेगा। जो भी अधर्म करेगा, यहाँ तक कि हम शिष्य भी अगर अधर्म करेंगे तो हम लोग को वह मार के भगा देंगे। शंकराचार्य जी को केवल शास्त्र और धर्म से मतलब है और किसी से कोई उनका और मतलब नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसकी मूर्खता है।”

वहीं, मजहबी आधार पर आरक्षण की माँग करने वाली पार्टियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने हर तरह के आरक्षण का विरोध करने की बात कही हैं। उन्होंने कहा, “हम लोग तो किसी आधार पर आरक्षण नहीं चाहते हैं। किसी भी मजहब या किसी भी तरह से, आरक्षण से हम लोग का देश नष्ट ही हो जाएगा। शंकराचार्य जी का मानना है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए।”

मुलायम से अखिलेश यादव तक आतंकियों को बचाने समाजवादी पार्टी की नापाक कोशिशें


समाजवादी राजनीति का केवल कहने और दिखाने के लिए दर्शन सामाजिक न्याय, पिछड़ों की आवाज़ और लोकतांत्रिक संघर्ष है, लेकिन वास्तविकता में पार्टी के नेताओं की करनी इससे ठीक उलट है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! यही कारण है कि पीएम से लेकर सीएम तक और अन्य बीजेपी नेता लगातार चुनावी मंचों से सपा पर आतंकियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। सपा के कई फैसलों और बयानों ने बार-बार यह धारणा बनी कि उसने आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा। अदालतों की फटकार, सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल और आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की कोशिशें सपा की राजनीति पर अब भी सबसे बड़े सवालिया निशान हैं।

तुष्टिकरण के लिए आतंकियों के पोषक बने समाजवादी पार्टी के नेता
सबसे बड़ा प्रश्न केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का है जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिश की गई, सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए और कई बार आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाया गया। अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई मामलों में सरकार की मंशा पर तीखी टिप्पणियां करनी पड़ीं। यही घटनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में “तुष्टिकरण बनाम राष्ट्र सुरक्षा” की सबसे बड़ी बहस के रूप में सामने आती हैं।

आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
19 फरवरी 2022
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।

अयोध्या राम मंदिर हमले के आरोपियों पर नरमी का आरोप
14 फरवरी 2022
यूपी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी ने आरोप लगाया कि जब अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुकदमों को वापस लेने वाली फाइल पर साइन किए थे। बीजेपी ने इसे “राष्ट्र और आस्था दोनों के खिलाफ अपराध” बताया। यह आरोप इसलिए और गंभीर बना क्योंकि अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। आतंकवाद के ऐसे मामलों में नरमी दिखाना सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा दाग बन गया। काबिले जिक्र है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर में स्थित अस्थायी राम मंदिर पर आतंकी हमला 5 जुलाई 2005 को हुआ था।

अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
12 जुलाई 2021
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?

अखिलेश सरकार द्वारा आतंकवाद मामलों को वापस लेने की कोशिश
12 दिसंबर 2013
यूपी की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन मामलों की समीक्षा शुरू की, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे थे। सरकार ने करीब 14 आतंकवाद मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इनमें गोरखपुर ब्लास्ट, लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे गंभीर मामले शामिल थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह कदम न्याय व्यवस्था को कमजोर करने और कट्टरपंथी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसा है। बाद में अदालतों ने कई मामलों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए मुकदमे वापस लेने की अनुमति नहीं दी।

आतंकी खालिद मुजाहिद के परिजनों को सपा सरकार में मुआवजा!
31 मई 2013
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित वाराणसी और फैजाबाद के अदालत परिसरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी खालिद मुजाहिद अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया था। दरअसल, खालिद की मौत के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दी गई मुआवजे की राशि को परिवार ने लेने से ही इनकार कर दिया था। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव-2014 में जहां एक खास वर्ग के मुस्लिमों की नाराजगी का भय सता रहा है तो वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस निर्णय को मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने कहा कि सपा सरकार आतंकवाद के आरोपियों के प्रति इतनी नरम थी कि उसने प्रशासनिक मशीनरी पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण ने यह धारणा और मजबूत की कि सपा आतंकवाद के मामलों में हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के बजाय आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल और आतंकियों के प्रति सहानुभूति
19 सितंबर 2008
दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों को मार गिराया गया था। उस समय पूरे देश में आतंकवादी हमलों का भय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मुलायम सिंह यादव ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग की। दरअसल, सपा आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर एक विशेष वोट बैंक को साधना चाहती थी। जिस समय देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता चाहता था, उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अविश्वास खड़ा करना सपा की राजनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

वाराणसी ब्लास्ट आरोपी वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास
7 मार्च 2006
वाराणसी सीरियल ब्लास्ट में निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। लेकिन अखिलेश सरकार ने इस मामले के आरोपी वलीउल्लाह सहित कुछ आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कदम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि क्या सरकार आतंकवादियों को “पद्मभूषण” देना चाहती है? अदालत की यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक बन गई कि सरकार का कदम कितना विवादास्पद माना गया। आलोचकों ने कहा कि सपा सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जगह उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगी थी।

आतंकवादियों के प्रति फर्जी मुकदमे का सपा का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी ने कई बार यह तर्क दिया कि आतंकवाद के मामलों में कुछ युवकों को झूठा फंसाया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इस तर्क के जरिए आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा किया गया। जब अदालतों में कई आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत हुए और सजा भी हुई, तब सपा की राजनीतिक लाइन पर और सवाल उठे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा ने “निर्दोष” का नैरेटिव बनाकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की। यहां तक कि सपा सरकार को अदालतों से फटकार मिली। फिर भी उसने आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की नापाक कोशिशें कीं। समाजवादी पार्टी के कई बयानों ने यह धारणा और मजबूत हुई कि उसने हमेशा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरण और तुष्टिकरण के चश्मे से देखा।

हिन्दू विरोधी समाजवादी पार्टी : मुलायम से अखिलेश तक मुसलमानों को खुश रखने हिन्दुओं को गोली और गाली

जिस पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह से लेकर वर्तमान सर्वेसर्वा अखिलेश यादव हिन्दू होते हुए जब सिर्फ सत्ता की खातिर मुस्लिम वोटबैंक को खुश रखने जब सनातन पर ही हमलावर हो सकते हैं किसी और के क्या हो सकते हैं? हैरानी होती है समाजवादी पार्टी को वोट देने वाले हिन्दुओं पर चाहे वह किसी भी जाति से हों, जो हिन्दू विरोधी पार्टी को वोट देते हैं। जाति से पहले धर्म आता है जब धर्म ही नहीं रहेगा जाति क्या करेगी? सनातन को गाली देना और हिन्दुओं को जातियों में बांटकर राज करने की मंशा रखने वालों से जनहित की कामना करना अंधे कुएं में चीखने से कम नहीं।    
समाजवादी पार्टी ने वर्षों तक खुद को समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का चेहरा बताने की कोशिश की, लेकिन हकीकत में उसकी राजनीति का सबसे बड़ा सच हमेशा हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण ही रहा। मुलायम सिंह यादव के दौर में अयोध्या में कारसेवकों पर चली गोलियां केवल फायरिंग नहीं थीं, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था पर सीधा हमला था। “परिंदा भी पर नहीं मार सकता” जैसे अहंकारी बयान से लेकर राम मंदिर आंदोलन को सांप्रदायिक उन्माद बताने तक, सपा ने हमेशा हिंदू भावनाओं को संदेह और शत्रुता की नजर से देखा। समय बदला, चेहरे बदले, लेकिन सोच नहीं बदली। अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी वही राजनीति नए रूप में सामने आती रही है। कभी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, कभी कुंभ और कांवड़ यात्रा पर तंज, तो कभी रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेताओं पर नरम रुख…यह सब बताता है कि अखिलेश यादव की भी राजनीति में हिंदू आस्था के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि वोट बैंक का गुणा-भाग ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है।

हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के दौर में कारसेवकों पर गोलियां चली थीं, तो आज सपा नेताओं के बयानों से हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां चलाई जाती हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं द्वारा रामचरितमानस को बकवास कहना हो या सनातन परंपराओं को कटघरे में खड़ा करना, सपा नेतृत्व हर बार या तो चुप दिखाई दिया या बचाव की मुद्रा में खड़ा नजर आता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का बहुसंख्यक समाज बार-बार सपा की राजनीति को नकारता रहा है। जनता समझ चुकी है कि जो पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए बहुसंख्यकों की आस्था को चोट पहुंचाने में संकोच नहीं करती, वह समाज को जोड़ने नहीं, बांटने की राजनीति करती है। यही वजह है कि सपा को सत्ता से बेदखली का दर्द बार-बार झेलना पड़ा और हिंदू समाज का अविश्वास उसके साथ लगातार गहराता चला गया।

समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने हिंदुओं का, उनकी आस्था का और सनातन संस्कृति का विरोध और अपमान किया

कांवड़ यात्रा के नाम पर ध्रुवीकरण — अखिलेश यादव
जुलाई 2025
कांवड़ यात्रा मार्गों पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि सपा हमेशा कांवड़ यात्रा और सनातन परंपराओं को राजनीतिक चश्मे से देखती है।

मंदिरों पर कब्जा कर रही BJP – अखिलेश यादव
मई 2025
बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन विवाद पर अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा “मंदिरों पर अप्रत्यक्ष कब्जा” कर रही है। भाजपा नेताओं ने कहा कि सपा मंदिर प्रशासन को लेकर भ्रम फैलाकर धार्मिक राजनीति कर रही है।

गौशाला को ‘दुर्गंध’ बताने पर अखिलेख के खिलाफ मोर्चा खोला
2 अप्रैल 2025
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को घेरने की तैयारी कर ली है। दरअसल अखिलेश यादव ने पिछले दिनों कन्नौज में कहा था कि भाजपा वाले दुर्गंध पसंद करते हैं इसलिए गौशाला बना रहे हैं। हम सुगंध पसंद कर रहे थे इसलिए इत्र पार्क बना रहे थे। भाजपा ने दुर्गंध के मुद्दे को गाय और गौशाला का अपमान बताते हुए यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

राम लला की प्राण प्रतिष्ठा BJP-RSS का राजनीतिक कार्यक्रम बताया
11 जनवरी 2024
मुलायम सिंह यादव ने राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया था और अब उनके पुत्र राम मंदिर के विरोध पर उतर आए हैं। राम लला मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर अखिलेश यादव ने दूरी बनाते हुए कहा कि वह इसमें नहीं जाएंगे। उन्होंने इस भव्य-दिव्य राम जन्मभूमि न्यास के कार्यक्रम को बीजेपी और आरएसएस का कार्यक्रम बताया। सपा द्वारा इस कार्यक्रम को “राजनीतिक आयोजन” कहने के बाद भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा राम मंदिर आंदोलन से आज भी असहज है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने से इनकार
9 जनवरी 2024
विश्व हिंदू परिषद के प्रतिनिधि जब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण देने पहुंचे, तब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कहते हुए निमंत्रण लेने से इनकार कर दिया कि “हम उन्हें नहीं जानते, जो निमंत्रण देने आए हैं।” इस घटना के बाद भाजपा ने उन पर राम मंदिर आंदोलन और सनातन आस्था का अपमान करने का आरोप लगाया।

राम मंदिर का उद्घाटन मार्केटिंग इवेंट है – एसटी हसनसमाजवादी पार्टी राम मंदिर का शुरू से ही विरोध करती आ रही है और इसमें अड़ंगे डालने में लगी है। अब समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता ने एसटी हसन ने राम मंदिर के उद्घाटन को भाजपा का एक ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ और ‘मार्केटिंग इवेंट’ करार दे दिया। दूसरी ओर सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने अक्सर राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों या हिंदू धर्मगुरुओं पर तंज कसते हुए उन्हें पाखंडी या राजनीतिक फायदे के लिए काम करने वाला बताया है।

सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने हिंदू धर्म को धोखा बताया
28 अगस्त 2023
सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस प्रकरण के बाद दिए बयान से बवाल मच गया। हिंदू धर्म को धोखा बतानेवाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान की चारों तरफ निंदा होने लगी है। अयोध्या के साधु-संतों ने भी बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य बौखला गए हैं। उनको बोलने का ज्ञान नहीं है और स्वामी प्रसाद मौर्य ऊटपटांग बोलते हैं।

सपा समर्थकों ने पावन रामचरितमानस की प्रतियां जलाईं
29 जनवरी 2023
स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थन में कुछ लोगों द्वारा रामचरितमानस की प्रतियां जलाने का वीडियो वायरल हुआ। इस घटना के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेताओं के बयानों ने धार्मिक उन्माद पैदा किया। (Reddit)

रामचरितमानस बकवास है – स्वामी प्रसाद मौर्य
24 जनवरी 2023
रामचरितमानस विवाद के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि “यह सब बकवास है।” इस बयान के बाद संत समाज, अखाड़ा परिषद और कई हिंदू संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किए। भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेतृत्व जानबूझकर सनातन ग्रंथों को निशाना बना रहा है। समाजवादी पार्टी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि रामचरितमानस की कुछ चौपाइयां दलितों और पिछड़ों का अपमान करती हैं। उन्होंने मांग की कि “आपत्तिजनक हिस्सों को हटाया जाए या किताब पर प्रतिबंध लगाया जाए।” इस बयान के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुईं।

भगवा राजनीति देश के लिए खतरा — मुलायम सिंह यादव
अप्रैल 2009
लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान लखनऊ में बोलते हुए मुलायम सिंह यादव ने भाजपा और हिंदुत्व राजनीति पर हमला किया। यादव ने भगवा राजनीति को देश के लिए खतरा बता दिया। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री को घेरते हुए इसे हिंदू धार्मिक पहचान को कट्टरवाद से जोड़ने की कोशिश बताया।

देश मिथकों से नहीं विकास से चलता है – अमर सिंह
सितंबर 2007
रामसेतु विवाद के दौरान नई दिल्ली में समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने कहा कि “देश मिथकों से नहीं, विकास से चलता है।” रामसेतु पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के हलफनामे के बीच, रामसेतु को मिथक बताने वाला यह बयान बड़ा विवाद बन गया।

राम मंदिर आंदोलन ने देश बांटा – मुलायम सिंह यादव
अगस्त 2003
मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राम मंदिर आंदोलन ने “देश को बांटने का काम किया।” विश्व हिंदू परिषद और रामभक्त संगठनों ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान बताया।

अयोध्या की पूरी जमीन ही विवादित, निर्माण का अधिकार नहीं
27 फरवरी 2003
लोकसभा में बोलते हुए सपा सांसद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अयोध्या की पूरी जमीन विवादित है। जब तक इसका फैसला नहीं हो जाता तब तक किसी भी पक्ष को कोई भी निर्माण कार्य करने का अधिकार नहीं है और न किया जा सकता है। न ही हमारी पार्टी करने देगी।

साधु-संतों को ‘राजनीतिक एजेंट’ बताने पर विवाद
वर्ष 1995
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य सपा नेताओं ने अपने बयान में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई संतों और महंतों को “भाजपा के राजनीतिक एजेंट” कहा। संत समाज ने इसका तीखा विरोध किया। सपा नेता रामगोपाल यादव ने भाजपा पर राम के नाम के राजनीतिकरण और पेटेंट का आरोप लगाया था।

सपा राज में हनुमानगढ़ी के पास कारसेवकों पर गोलियां बरसाईं
2 नवंबर 1990
समाजवादी पार्टी के राज में अयोध्या की गलियों में एक बार फिर कारसेवकों की भारी भीड़ जुटी और हनुमानगढ़ी के पास पहुंचने पर सुरक्षा बलों ने दूसरी बार गोलियां बरसाईं। जोश और जुनून से भरे हजारों कारसेवकों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कोठारी बंधुओं समेत कई कारसेवकों की मौत हुई। हिंदू संगठनों ने इसे रामभक्तों पर दमन बताया। तब मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि देश की एकता के लिए हमें मस्जिद को बचाना पड़ा।
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मुलायम सरकार में अयोध्या में गोली कांड
30 अक्टूबर 1990
अयोध्या में हजारों की संख्या में कारसेवक बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे और बैरिकेडिंग तोड़कर आगे निकलने लगे। तब मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाने का आदेश दिया था, जिसमें कई कारसेवक मारे गए थे। राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई। यह घटना आज भी सपा के खिलाफ हिंदू विरोध का सबसे जीवंत उदाहरण है।