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फिर पनौती साबित हुए अखिलेश यादव और तेजस्वी; जिन-जिन दलों के लिए प्रचार, दिया समर्थन, सबका बैठ गया भट्ठा

      अखिलेश और तेजस्वी ने जिसका किया प्रचार, अंत में हारी वहीं पार्टी, BJP ने किया बेहतरीन प्रदर्शन (साभार: AI)
"जहां जहां पांव पड़े कम्बख्त के, वहीं बंटाधार", कहावत चरितार्थ हो रही है अखिलेश और तेजस्वी यादव पर। युगों-युगों प्राचीन जिस सनातन का विरोध अन्य मजहब तो क्या कालनेमि हिन्दू भी कर रहे हैं। इन कालनेमि हिन्दुओं को नहीं मालूम कि हिन्दुओं ग्रंथ राजनीति ही नहीं जीवनशैली भी सिखाते हैं। 
देखिए महाभारत का सन्देश जिसे सिर्फ हिन्दुओं को नहीं हर उस सनातन विरोधी को भी गंभीरता से लेना होगा : महाभारत का सार सिर्फ़ नौ लाइनों में समझें, जिसमें पाँच लाख श्लोक हैं....
आप किसी भी धर्म के हों, चाहे आप औरत हों या मर्द, चाहे आप गरीब हों या अमीर, चाहे आप अपने देश में हों या विदेश में,
संक्षेप में...
अगर आप इंसान हैं, तो महाभारत के ये 9 अनमोल मोती ज़रूर पढ़ें और समझें....
1. अगर आप समय रहते अपने बच्चों की बेवजह की मांगों और इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं करेंगे, तो आप ज़िंदगी में लाचार हो जाएँगे... 'कौरव'
2. आप कितने भी ताकतवर क्यों न हों, अगर आप अधर्म का साथ देंगे, तो आपकी ताकत, हथियार, हुनर और आशीर्वाद सब बेकार हो जाएँगे... 'कर्ण'
3. अपने बच्चों को इतना बड़ा न बनाएँ कि वे अपने ज्ञान का गलत इस्तेमाल करके पूरी तबाही मचा दें...   'अश्वत्थामा'
4. कभी ऐसे वादे न करें कि आपको अधर्मियों के आगे झुकना पड़े...  'भीष्म पितामह'
5. अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल *धन, शक्ति, अधिकार और गलत लोगों का साथ आखिर में पूरी बर्बादी की ओर ले जाता है... 'दुर्योधन'
6. कभी भी सत्ता की बागडोर किसी अंधे व्यक्ति को मत दो, यानी जो स्वार्थ, धन, घमंड, ज्ञान, मोह या वासना में अंधा हो, क्योंकि वह बर्बादी की ओर ले जाएगा... 'धृतराष्ट्र'
7. अगर ज्ञान के साथ समझदारी है, तो आप ज़रूर जीतेंगे... 'अर्जुन'
8. धोखा आपको हर मामले में सफलता नहीं दिलाएगा... 'शकुनि'
9. अगर आप नैतिकता, नेकी और कर्तव्य को सफलतापूर्वक बनाए रखते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकती।   'युधिष्ठिर'
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सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः    
चुनावी राजनीति में बयान देना, माहौल बनाना और जीत का दावा करना आम बात है, लेकिन जब यही दावे लगातार अलग-अलग राज्यों में दोहराए जाएँ और हर बार नतीजे उसके उलट आएँ, तो मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। वह यह दिखाता है कि आपका बोलना सही नहीं है क्योंकि आप कर कुछ पा नहीं रहे और ‘पनौती’ साबित हो रहे सो अलग। पिछले कुछ चुनावों में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ यही होता नजर आ रहा है।

दोनों नेताओं ने खुद को विपक्षी राजनीति के अहम चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने बंगाल से लेकर तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार तक अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दलों के समर्थन में न सिर्फ प्रचार किया, बल्कि बार-बार दावा कर विपक्षी पार्टियों के लिए जीत लगभग तय बताई।

हालाँकि जब वास्तविक नतीजे सामने आए तो लगभग हर जगह पर तस्वीर इतनी उलट थी कि इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे। इस पूरे सिलसिले को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह सिर्फ हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गैप की कहानी है जो राजनीतिक दावों और जमीनी नतीजों के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है।

बंगाल: ममता को लेकर किया ‘एक अकेली लड़ जाएगी’ का दावा, जीती BJP

इस पैटर्न की सबसे ताजा कड़ी पश्चिम बंगाल में देखने को मिली। यहाँ अखिलेश यादव ने खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में सोशल मीडिया पर लिखा, “एक अकेली लड़ जाएगी, जीतेगी और बढ़ जाएगी।” यह बयान महज औपचारिक समर्थन नहीं था, बल्कि भविष्यवाणी जैसा था। इसमें संदेश साफ था कि ममता बनर्जी के लिए कोई चुनौती नहीं है और उनकी जीत तय है।

हालाँकि जैसे ही मतगणना के रुझान सामने आने लगे, यह दावा जमीनी हकीकत से टकराता नजर आया। पश्चिम बंगाल में BJP ने इतिहास रच दिया। बीजेपी ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार को 15 साल के बाद उखाड़ फेंका है। यहाँ बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली है।

तमिलनाडु: ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ का नारा लगातीं तेजस्वी की रैलियाँ पर वोट पर नहीं पड़ा असर

तमिलनाडु में तेजस्वी यादव की सक्रियता इस पूरे पैटर्न का अगला बड़ा उदाहरण है। तेजस्वी ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ के लिए खूब पसीना बहाया था। उन्होंने एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए उन इलाकों में प्रचार किया जहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी और मजदूरों की संख्या अधिक है।

उनके भाषणों में ‘सामाजिक न्याय’ और ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ की बात प्रमुखता से उठाई गई। यह स्थानीय राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश के साथ एक सोची-समझी रणनीति थी।

रैलियों में थोड़ी-बहुत भीड़ भी दिखी, मीडिया कवरेज भी मिला, लेकिन जब नतीजों के रुझान आए तो यह साफ हो गया कि यह रणनीति अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाई। जिन सीटों पर तेजस्वी ने विशेष ध्यान दिया था, वहाँ भी DMK गठबंधन पिछड़ता नजर आया।

कई जगह मुकाबला AIADMK और TVK के बीच सिमट गया, जिससे यह संकेत मिला कि स्थानीय मुद्दे और एंटी-इंकम्बेंसी की लहर, बाहरी प्रचार से कहीं ज्यादा प्रभावी रही। यानी मंच पर जो भीड़ दिखाने की कोशिश हो रही थी, वह वोट में तब्दील नहीं हो सकी। आँकड़ों की बात करें तो TVK ने अब तक 36 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए मजबूत बढ़त बना ली है और 72 सीटों पर आगे चल रही है।

दूसरी ओर सत्तारूढ़ DMK ने 17 सीटों पर जीत हासिल की है और 45 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ने अब तक 1 सीट पर जीत दर्ज की है और 4 सीटों पर आगे है, जबकि AIADMK ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की और वह 30 सीटों पर आगे चल रही है।

दिल्ली: अखिलेश यादव का ’70 में 70 हार जाएगी भाजपा’ वाला दावा, लेकिन हकीकत उलट

दिल्ली में अखिलेश यादव ने अरविंद केजरीवाल के साथ रोड शो करते हुए कहा था कि भाजपा सभी 70 सीटें हार सकती है और आम आदमी पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी। यह बयान चुनावी भाषण से आगे बढ़कर एक तरह की पूरी चुनावी तस्वीर पेश करता था, जहाँ इनकी ओर से तो मुकाबला लगभग खत्म माना जा रहा था।

हालाँकि दिल्ली की राजनीति इतनी सीधी नहीं होती। हर सीट पर अलग समीकरण, स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव और संगठन की ताकत चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। दिल्ली में BJP ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के किले को ढहाते हुए अपनी सरकार बनाई। यहाँ BJP ने लगभग 40 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया।

हरियाणा: इतिहास रचने का दावा और नतीजों में अचानक बदलाव

हरियाणा में भी अखिलेश यादव ने INDI गठबंधन को लेकर बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि विपक्ष की एकजुटता भाजपा को हराकर नया इतिहास लिख सकती है।

शुरुआती रुझानों में कॉन्ग्रेस की बढ़त ने इस दावे को कुछ समय के लिए सही साबित किया, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदल गई। भाजपा ने बढ़त बनाई और निर्णायक जीत दर्ज की।

यह बदलाव यह दिखाने के लिए काफी था कि चुनावी रणनीति सिर्फ शुरुआती माहौल पर नहीं टिकी होती, बल्कि अंत तक संगठन ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यहाँ विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

महाराष्ट्र: विपक्षी उम्मीदों के बीच सत्ता पक्ष की मजबूत वापसी

महाराष्ट्र में भी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीतिक लाइन विपक्षी एकजुटता के जरिए सत्ता परिवर्तन का दावा करने वाली रही। अलग-अलग मंचों और बयानों में यह लगातार कहा गया कि राज्य में सत्ता के खिलाफ माहौल है और गठबंधन मिलकर चुनावी तस्वीर बदल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में भी वही पैटर्न दिखा जो दूसरे राज्यों में नजर आया।

लेकिन जब मतदान और उसके बाद के रुझान सामने आए, तो तस्वीर दावों से अलग नजर आई। बीजेपी और उसके सहयोगियों के गठबंधन ने 288 में से करीब 235 सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत हासिल किया। अकेले बीजेपी ने 130 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। अंततः यह साफ हुआ कि सिर्फ राजनीतिक संदेश और मंचीय भाषण चुनाव नहीं जिताते।

बिहार: सबसे मजबूत गढ़ में सबसे बड़ी हार

इस पूरे पैटर्न का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक उदाहरण बिहार है। यहाँ तेजस्वी यादव खुद चुनावी लड़ाई के केंद्र में थे और अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में सक्रिय थे। ‘वोटर अधिकार यात्रा’, एमवाई समीकरण और PDA फॉर्मूले के जरिए यह दावा किया गया कि इस बार सत्ता परिवर्तन तय है, लेकिन जब नतीजे सामने आए, तो यह पूरा नैरेटिव बिखर गया।

NDA ने प्रचंड जीत हासिल की जबकि महागठबंधन लगभग 40 सीटों पर सिमट गया। यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक झटका था जिसने यह दिखा दिया कि जमीन पर वोटर का मूड उस नैरेटिव से पूरी तरह अलग था जो बनाया जा रहा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह हार उसी राज्य में हुई जहाँ तेजस्वी यादव की सबसे मजबूत पकड़ मानी जाती है।

दावों और नतीजों के बीच बढ़ती दूरी

अगर इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ होता है कि एक ही तरह का पैटर्न बार-बार दोहराया जा रहा है। जहाँ अखिलेश और तेजस्वी जाते हैं, वहाँ माहौल बनता है, दावे किए जाते हैं, जीत की तस्वीर पेश की जाती है। लेकिन जब नतीजे आते हैं, तो वही तस्वीर बदल जाती है।

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति आज भी चर्चा में रहती है, लेकिन हालिया चुनावी नतीजे यह दिखाते हैं कि उनके दावों और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

जब एक ही कहानी बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार जैसे अलग-अलग राज्यों में दोहराई जाए, तो इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता। अब अखिलेश और तेजस्वी यादव को अपनी ‘जीत की भविष्यवाणी’ करने वाली रणनीति में बदलाव लाने पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जरूर है।

राष्ट्रीय एकता यानि जातिगत घिनौनी सियासत का नंगा नाच; अब ‘सन ऑफ मल्लाह’ ने महागठबंधन में फंसाया महापेच! आधी रात को तेजस्वी-मुकेश की मुलाकात के बाद VIP नाराज

जब भी चुनाव होते हैं सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष सभी मुस्लिम और जातियों के मकड़जाल में उल्छे नज़र आते बड़ी-बड़ी बातें करते हैं राष्ट्रीय एकता का। लगता है किसी भी पार्टी को secularism की ABC तक नहीं आती, अगर आती होगी तो जाति के नाम पर जनता को पागल नहीं बनाया जाता। इस कटु सच्चाई को कुर्सी की भूखी पार्टियों और जनता को भी समझना होगा। रेवड़ियां बांट जनता को पागल बनाया जा रहा है। जब जातिगत घिनौनी सियासत करनी है फिर किसी की जाति से बुलाने पर कानून क्यों?   
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर खींचतान खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी 25 सीटों की मांग पर अड़े हैं, जबकि RJD ने केवल 14 सीटों का ऑफर दिया है। इस ऑफर के साथ तेजस्वी यादव के साथ देर रात हुई मुलाकात के बाद मुकेश सहनी सख्त नाराज हैं। रात दो बजे के बाद जब मुकेश सहनी बैठक से निकले, तो उनके चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। सहनी ने मीडिया से कोई बात तक नहीं की और सीधे अपने आवास लौट गए। तब से लेकर अब तक उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सहनी अब अपनी पार्टी की अगली रणनीति बना रहे हैं। यदि महागठबंधन से बातचीत पटरी पर नहीं बैठी तो वे अपनी पार्टी के 40 उम्मीदवारों को विधानसभा में उतारने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मुकेश सहनी इस बार अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने के मूड में हैं। उनका कहना है कि सहनी का मल्लाह और निषाद समाज की राजनीति में वोट बैंक है और सहनी उसी को लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

हमारे जनाधार और मेहनत का सम्मान होना चाहिए-सहनी
मुकेश सहनी और तेजस्वी यादव के बीच देर रात राजधानी पटना में एक अहम बैठक हुई। तेजस्वी यादव के आवास पर करीब 2 बजे रात तक दोनों नेताओं के बीच बातचीत चली। बताया जा रहा है कि बैठक का माहौल शुरुआत में सकारात्मक था, लेकिन सीट शेयरिंग पर चर्चा आते ही टकराव बढ़ गया। तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखने की बात कहते हुए वीआईपी को 14 सीटें देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन मुकेश सहनी ने साफ कहा कि ‘हमारे जनाधार और मेहनत का सम्मान होना चाहिए, 25 से कम सीट पर VIP चुनाव नहीं लड़ेगी।’ इसके अलावा सहनी ने सरकार बनने के बाद उसमें डिप्टी सीएम पद की भी डिमांड की। बताते हैं कि तीन डिप्टी सीएम के फार्मूले में सहनी को सैट किया जा सकता है, इस पर तेजस्वी ने स्वीकृति दी, लेकिन ज्यादा सीटें देने पर उन्होंने मना कर दिया।

अब ‘सन ऑफ मल्लाह’ सहनी बना रहे नई रणनीति
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख और ‘सन ऑफ मल्लाह’ के नाम से मशहूर मुकेश सहनी इसके बाद अब खुलकर अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक मुकेश सहनी किसी भी हालत में 25 सीटों से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने उन्हें सिर्फ 14 सीटों का ऑफर दिया है। रात दो बजे के बाद जब मुकेश सहनी बैठक से निकले, तो उनके चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। सहनी ने मीडिया से कोई बात नहीं की और सीधे अपने आवास लौट गए. तब से लेकर अब तक उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सहनी अब इस पर मन बना रहे हैं कि यदि तेजस्वी यादव ने उन्हें महागठबंधन में 25 सीटें नहीं दीं, तो वे अपनी पार्टी के 40 उम्मीदवारों को सियासी मैदान में उतारेंगे।

महागठबंधन की बैठक टली, RJD की आपात मीटिंग
महागठबंधन की एक अहम बैठक प्रस्तावित थी, जिसमें सीट शेयरिंग पर अंतिम सहमति बनने की उम्मीद थी। लेकिन VIP की नाराज़गी के चलते यह बैठक फिलहाल टाल दी गई है। अब RJD ने अपनी आपात बैठक बुलाई है, जिसमें तेजस्वी यादव पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ आगे की रणनीति तय करेंगे। मुकेश सहनी की नाराजगी महागठबंधन के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई है। पहले भी वे NDA और महागठबंधन के बीच पाला बदल चुके हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर NDA के साथ तालमेल किया था, लेकिन बाद में फिर विपक्षी खेमे के करीब आ गए। महागठबंधन के नेताओं को यह भी चिंता सता रही है कि यदि सहनी फिर एनडीए के पाले में जाते हैं तो उनका पूरा खेल बिगड़ सकता है।

VIP का बिफरना गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव से निराश होकर मुकेश सहनी इस बार अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने के पूरे-पूरे मूड में हैं। उनका कहना है कि मल्लाह और निषाद समाज में उनकी भारी पैठ है। बिहार की सियासत में निषाद और मल्लाह भी एक बड़ा वोट बैंक है और सहनी उन्हीं को लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। VIP के रुख से महागठबंधन के अन्य घटक दलों में भी असमंजस की स्थिति है। कांग्रेस और वाम दल पहले ही अपने हिस्से को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। अब VIP का बिफरना गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘सन ऑफ मल्लाह’ अपने लिए मनचाही सीटें हासिल करते हैं या एक बार फिर ‘VIP’ पार्टी की किस्मत की नाव किसी नए किनारे लगती है।

महागठबंधन पर दबाव बनाने की सहनी की रणनीति
हालांकि मुकेश सहनी के इस रुख को महागठबंधन पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि सहनी अपनी दो प्रमुख मांगों पर अड़े हुए थे, जिसके कारण सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा अटकी हुई है।
1. 25 सीटों की मांग: वीआईपी प्रमुख महागठबंधन में अपने कोटे के लिए 25 विधानसभा सीटों की मांग पर मजबूती से खड़े थे, जिसे RJD और अन्य सहयोगियों द्वारा अत्यधिक माना जा रहा था।
2. उपमुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी: सहनी की दूसरी बड़ी जिद यह थी कि उन्हें महागठबंधन की ओर से उपमुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया जाए।
सूत्रों का कहना है कि उप मुख्यमंत्री पद पर तो महागठबंधन में सहमति बन सकती है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर मामला अटका हुआ है। नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाने के बावजूद भी सीट बंटवारे की घोषणा न होने से महागठबंधन में पहले से ही तनाव था, और अब मुकेश सहनी का ‘नॉट रिचेबल’ हो जाना गठबंधन की एकता के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि सीटों पर देरी से उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर बुरा असर पड़ रहा है।

लालू और तेजस्वी पर आंखे तरेरने लगी है कांग्रेस

उधर कांग्रेस भी महागठबंधन की कमजोर कड़ी होने के बावजूद लालू-तेजस्वी पर आंखे तरेर रही है। आलाकमान की शह पर कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव को भी भाव नहीं दे रहे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना पहुंच चुके हैं। लेकिन उन्होंने जानबूझकर लालू और तेजस्वी से मुलाकात नहीं की। इससे महागठबंधन पर महा-संकट आने के आसार नजर आने लगे हैं। यदि दो-तीन दिन में सियासी पेच ना सुलझा तो दरार और बढ़ सकती है। दूसरी ओर पहली बार चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर भी विवादों में घिर गए हैं। उनकी जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही पीके पर पैसे लेकर सीटें बांटने के आरोप लगाए हैं। ऐन चुनाव से पहले ऐसी पोल खुलने के बीच मानहानि मामले में नोटिस ने पीके की टेंशन और बढ़ा दी है।

राहुल के पीछे लग तेजस्वी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी
दरअसल, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा के दौरान अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली थी। इस यात्रा में राहुल गांधी 17 दिनों तक बिहार में रहे। तेजस्वी ने ही राहुल को लीड करने का मौका दिया और वे पहली बार राहुल गांधी के पीछे-पीछे घूमे। तेजस्वी ने यात्रा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इससे बिहार में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस की कुछ सांसें चलने लगीं। राहुल गांधी को गुमान हो गया कि यह सब उनकी वजह से है। इसलिए इसके बाद से कांग्रेस अब आरजेडी को आंखे दिखाने लगी है। तेजस्वी के सीएम फेस पर भी एतराज जताने के बाद अब कांग्रेस ने सीट बंटवारा के लिए राजद को अल्टीमेट तक दे दिया है। यदि दो-तीन दिन में दोनों दलों में सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस अपनी पहली सूची जारी कर सकती है। कांग्रेस ने पहले 15 उम्मीदवारों की सूची बना ली है। यदि कांग्रेस आम सहमति के पहले लिस्ट जारी कर देती है तो महागठबंधन पर महा-संकट के बादल छा सकते हैं।

कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू-तेजस्वी को नहीं दे रहे भाव
कांग्रेस ने भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतकर सबसे कमजोर प्रदर्शन किया हो। इसके बावजूद वह अगले माह होने वाले चुनाव के लिए राजद की आंख में आंख मिला कर बात कर रही है। यही वजह है कि कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव और तेजस्वी को भी भाव नहीं दे रहे। हाइकमान के आदेश पर अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना आए। लेकिन उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी से मुलाकात करने की जरूरत ही नहीं समझी। भूपेश बघेल ने तो सीधे-सीधे तेजस्वी यादव को चुनौती ही दे डाली। उन्होंने कहा, तेजस्वी खुद को अपनी ओर से सीएम फेस बता रहे हैं, लेकिन सीएम का चेहरा उनकी पार्टी का हाईकमान घटक दलों की सहमति से तय करेगा।

महागठबंधन उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से चुनाव पर असर
चुनाव के लिए पहले चरण के नामांकन की शुरुआत 10 अक्टूबर से हो चुकी है। लेकिन 10 अक्टूबर तक महागठबंधन का सीट बंटवारा फाइनल नहीं हो सका है। संभावित प्रत्याशियों में इसको लेकर रोष है कि पिछली बार उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से तैयारी का समय नहीं मिला था। पहले चरण के चुनाव के नामांकन की अंतिम तारीख से एक दिन पहले प्रत्याशियों के नाम घोषित किये गये। कांग्रेस ने आंतरिक गुटबाजी और संभावित असंतोष से निपटने के लिए यह देरी की थी। लेकिन इस कोशिश में उम्मीदवारों को हड़बड़ी में आधी अधूरी तैयारी के साथ चुनाव में उतरना पड़ा। टिकट को लेकर भी असंतोष था। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता केके तिवारी ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर टिकट वितरण में धांधली का आरोप लगाया था। उन्होंने चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं की जांच कराये जाने की मांग की थी।

बिहार की हर सीट पर तेजस्वी का चेहरा चुनाव लड़ रहा है… गईल भैंस पानी में

साझे की हांड़ी हमेशा बीच चौक पर ही फूटती है, जो लोकसभा 2024 चुनाव में INDI गठबंधन के नाम से बनी हांड़ी अब 2025 में बिहार विधान सभा चुनाव में फूटती दिख रही है। अभी कुछ ही दिन पहले कांग्रेस युवराज राहुल गाँधी ने बिहार के मुस्लिम क्षेत्रों में पिकनिक मनाई थी। यानि जमीन तेजस्वी की और भीड़ RJD की मजे ले गया युवराज राहुल। लेकिन अपना मुस्लिम वोट लुटवाकर बिहार के युवराज तेजस्वी को बहुत देर में होश आया।    
बिहार चुनावी साल में है। राजनीतिक यात्राओं/सभाओं का मौसम है। बयानों की बाढ़ है। इसी में बहकर आया है तेजस्वी यादव का एक बयान है। उनका कहना है कि बिहार की सभी 243 सीटों पर उनका चेहरा चुनाव लड़ रहा है।

एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, इस बार तेजस्वी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। चाहे बोचहां हो या मुजफ्फरपुर। तेजस्वी लड़ेगा। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि मेरे नाम पर वोट दें।

लालू प्रसाद यादव की पारिवारिक पार्टी राजद चाहती है कि इस बार चुनाव में INDI गठबंधन तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर उतरे। कांग्रेस, लेफ्ट सहित राजद के अन्य छोटे सहयोगी इससे कन्नी काट रहे हैं।

तेजस्वी यादव के नाम से क्यों डर रहा INDI गठबंधन

इसका एक कारण यह बताया जाता है कि कांग्रेस को लगता है कि तेजस्वी यादव के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में जाने पर उसे अगड़ों का जो छिटपुट वोट बिहार में मिल रहा है, वह भी उसके हाथ से निकल जाएगी। साथ ही यह भी बताया जाता है कि सहयोगी दल तेजस्वी यादव के नाम पर मु​हर नहीं लगाकर, ज्यादा से ज्यादा सीट देने के लिए राजद पर दबाव बढ़ाना चाहते हैं।

इसी बौखलाहट में तेजस्वी यादव ने ‘तेजस्वी बिहार के सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा’ का दंभ भरा है। पर इस फेर में वे भूल गए नाम या चेहरा, केवल कुछ शब्द भर नहीं होते हैं। केवल तस्वीर ही नहीं होती है। नाम और चेहरा, इतिहास और जनता की स्मृतियों का प्रतीक भी होते हैं।

जिस नाम और चेहरा से तेजस्वी यादव को राजद की बागडोर मिली है, उसका इतिहास कुछ ऐसा है, उसकी स्मृतियाँ बिहार के लोगों के मस्तिष्क में कुछ इस तरह अंकित है, कि वह नाम और चेहरा को तेजस्वी यादव के लिए बोझ बना देती है। ऐसे में यह बयान न केवल INDI गठबंधन के भीतर चल रहे द्वंद्व को उजागर करता है, बल्कि बिहार के लोगों के भीतर उस डर को भी पैदा करता है, जिससे पीछा छुड़ाकर वे यहाँ तक पहुँचे हैं।

बिहार को डराता है तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा

बिहार से ही आने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में 2019 के आम चुनावों से पहले एक प्रजेंटेशन का हवाला देते हुए लिखा है, “इस प्रजेंटेशन में सवाल हुआ- अगर आप (दो बड़े उद्योपतियों का नाम लिया गया, जिसमें एक भगोड़ा है तो दूसरा लंबे समय तक जेल में रहा, जिनके नाम का खुलासा करना उचित नहीं होगा) इनका नाम लेते हैं तो आपके जेहन में क्या छवि आती है? जवाब था- फ्रॉड की। लेकिन जब नरेंद्र मोदी का नाम लेते हैं तो क्या जवाब होता है? एक ऐसा नेता जो कोई भी बड़ा निर्णय ले सकता है, चाहे विकास के एजेंडे पर हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा।”

ऐसे ही यदि आपसे यह पूछा जाए कि तेजस्वी यादव का नाम सुनते ही या फोटो देखते ही आपके जेहन में क्या छवि आती है? जाहिर है आपको लालू-राबड़ी का जंगलराज याद आ जाएगा।

राजद के सालों तक सत्ता से बाहर रहने के बाद भी, तेजस्वी को नए दौर का युवा नेता बताए जाने के बाद भी, उस जंगलराज उसका डर ऐसा है कि लोगों को लगता है कि उनके सत्ता में आने से अपराध का तंत्र फिर से मजबूत होगा।

  • तेजस्वी यादव का चेहरा बिहार के लोगों को उस दौर की याद दिलाता है, जब अपहरण उद्योग में बदल गया था। जब लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन करने को मजबूर कर दिए गए। जब देश के अन्य राज्य विकास की दौड़ में शामिल हो रहे थे तो जातिवाद और भ्रष्टाचार ने बिहार को कैद कर रखा था।
  • तेजस्वी यादव की राजनीति ‘MY समीकरण’ पर ही टिकी है। यह न केवल उनकी राजनीतिक जमीन को सीमित करता है, बल्कि यह समीकरण बहुसंख्यक जनता के लिए असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है।
  • तेजस्वी यादव राजनीतिक तौर पर आज जहाँ हैं, वहाँ राजनीति में घिस-घिस कर नहीं पहुँचे हैं। वे वंशवाद की देन हैं। बिहार के लोगों पर राजद की ओर से थोपे गए हैं। क्रिकेटर से नेता बनने की अपनी यात्रा में उनके पास गिनाने/दिखाने के लिए ऐसा कुछ भी ठोस नहीं है जो उनके नाम और चेहरा से उभरने वाली छवि को बदल दे।
इसके उलट नीतीश कुमार ने भले समय-समय पर साझेदार बदले हैं, लेकिन मोटे तौर पर उनकी छवि ऐसे नेता की है जिसने बिहार के लोगों को अपराध और भय से छुटकारा दिलाया है। बिजली, सड़क, शिक्षा के क्षेत्र में सुधार किए हैं।
वहीं तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा, जिस विरासत और परिवार से जुड़ा है, उसकी राजनीति को लोग अपराध और भ्रष्टाचार से अलग कर नहीं देख पाते हैं। यही कारण है कि यदाकदा तेजस्वी यादव अपने भाषणों में भले रोजगार-विकास जैसी बातें कर लें, लेकिन जनता उन्हें उसी पुरानी राजनीति का उत्तराधिकारी मानती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी ने बिहार में विकास की नई आकांक्षाओं को पैदा किया है। ऐसे तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा इन आकांक्षाओं के दफन हो जाने का भय पैदा करता है।
अवलोकन करें:-
बिहार : सरकार बनने से पहले ही लूट शुरू : ‘माई-बहिन’ के नाम पर 200-200 रूपए वसूल रही RJD, तेजस्वी यादव समेत 4
बिहार में एक कहावत है- एक बेर साँप काटलक, दोसर बेर रस्सी देखिते कँपलौं। यानी भयावह अनुभव झेल चुके लोग उस तरह की किसी भी स्थिति की आहट से ही काँप उठते हैं। असल में तेजस्वी यादव वह ‘रस्सी’ हैं, जो जनता को ‘साँप’ की याद दिलाती है। ऐसे में सभी 243 सीट पर अपना नाम और चेहरा होने का उनका दंभ भरना, उस भयावह अतीत की याद दिलाता है जिसकी कल्पना मात्र से ही बिहार सिहरने लगता है।

बिहार : सरकार बनने से पहले ही लूट शुरू : ‘माई-बहिन’ के नाम पर 200-200 रूपए वसूल रही RJD, तेजस्वी यादव समेत 4 पर बिहार में FIR

                माई-बहिन योजना के तहत महिलाओं को सरकार बनने पर 2500/रूपए माह देने का वादा किया है
बहुत पुरानी कहावत है "चोर चोरी से हेराफेरी से न जाए", आखिर चारा घोटाले के आरोपी लालू यादव का बेटा तेजस्वी यादव कैसे पीछे रहे। लग गए अभी से लूटमार करने। अगर बिल्ली भाग्यो छीका टूट गया यानि सत्ता हाथ आ गयी बाप की तर्ज पर लूटमार यानि पूत के पांव पालने में ही दिख गए।  

बिहार में RJD की माई-बहिन मान योजना के नाम पर महिलाओं के साथ ठगी किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। दरभंगा जिले में गुड़िया देवी नामक से 2500 रुपए हर महीने मिलने का लालच देकर 200 रुपए की ठगी की गई है। पुलिस ने महिला की शिकायत पर इस मामले में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत 4 नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

माई-बहिन योजना के नाम पर महिलाओं को कैसे ठगा?

ऑपइंडिया ने इस मामले में पीड़िता गुड़िया देवी से बातचीत की है। गुड़िया देवी आशा कार्यकर्ता हैं और पशुपालन का काम करती हैं। उन्होंने इस पूरी घटना को सिलसिलेवार तरीके से बताया है। उन्होंने बताया कि 2-3 दिन पहले RJD का एक कार्यकर्ता उनके पास आया था और उसने माई-बहिन योजना का फॉर्म भरने को कहा था।

गुड़िया देवी ने हमें बताया, “एक आदमी आया और RJD कार्यकर्ता बोलकर हमसे जानकारी माँगने लगा। कहने लगा कि माई-बहिन योजना का फॉर्म भरवा लीजिए, आपको अगले महीने से 2500 रुपए, हर महीने मिलने शुरू हो जाएँगे।”

उन्होंने बताया, “उसने हमसे हमारा मोबाइल लिया और आधार कार्ड व बैंक खाता माँगा। उसने फॉर्म भरने के बाद OTP आने की बात कही थी।” गुड़िया ने आगे बताया, “इसके बाद उसने कहा कि आपको इस फॉर्म के 200 रुपए देने होंगे।”

जब गुड़िया ने उसे ऑनलाइन पैसे देने की बात कही तो युवक ने इनकार कर दिया। इसके बाद गुड़िया ने उसे 200 रुपए नकद दिए जिन्हें लेते ही वह चला गया। कुछ देर बाद जब गुड़िया के पति मिथलेश घर आए तो उन्होंने इसकी जानकारी अपने पति को दी।

गुड़िया ने कहा, “मेरे पति यह बात सुनकर गुस्सा हो गए कि यह फ्रॉड हो सकता है। उन्होंने इस मामले की शिकायत पुलिस में देने को कहा जिसके बाद हमने तेजस्वी यादव और अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत दी।”

‘अब धमका रहे RJD के लोग, बाहर जाने में भी लग रहा डर’

गुड़िया ने बताया कि शिकायत देने के बाद अब RJD के लोग उन्हें शिकायत वापस लेने के लिए धमका रहे हैं। गुड़िया ने कहा, “मैं आशा वर्कर का काम करती हूँ और मुझे घर से बाहर जाना पड़ता है। अब मुझे घर से बाहर निकलने में भी डर लगा रहा है कि कहीं हमारे ऊपर कोई हमला ना कर दे।”

गुड़िया ने अपनी शिकायत में कहा, “घर आए लोगों ने मुझसे और महिलाओं को बुलाने कहा था और सभी महिलाओं से आधार कार्ड, मोबाइल नंबर और 200 रुपया देने को कहा था।”

                                                               गुड़िया द्वारा दी गई शिकायत

शिकायत नहीं लेंगे वापस: गुड़िया के पति

गुड़िया के पति मिथलेश ऑटो चालक हैं। मिथलेश ने ऑपइंडिया से कहा, “मैं ऑटो चलाता हूँ तो बाहर रहना होता है। मुझे भी बाहर जाने में खतरा है, लोगों का दबाव भी है लेकिन अब शिकायत वापस नहीं लेंगे।”

उन्होंने गुस्से भरे लहजे में कहा, “अगर गुंडों से डरकर शिकायत वापस लेनी होती तो शिकायत क्यों ही करते।” उनका कहना है कि उन्हें आधार कार्ड के नंबर माँगने पर शक हुआ था और इससे फ्रॉड होने का पूरा खतरा था।

वहीं, पीड़ित परिवार का कहना है कि गाँव के अन्य लोगों के साथ भी ऐसा फ्रॉड किया गया है लेकिन वो डरे हुए हैं और डर से बाहर आकर अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं।

FIR में तेजस्वी के अलावा किसका नाम?

दरभंगा जिले के सिंघवाड़ा थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 (4), 3 (4) के तहत पुलिस ने FIR दर्ज की है। पुलिस ने इसमें नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के साथ-साथ मशकुर अहमद उस्मानी (पूर्व प्रत्याशी जाले विधान सभा), संजय यादव (सांसद राज्यसभा) और ऋषि मिश्रा (पूर्व विधायक जाले) को आरोपित बनाया है।

FIR में गुड़िया के हवाल से लिखा गया है, “पति (मिथलेश) के बताने पर हम लोगों को पता चला की हम लोग ठगे गए है और उसके पीछे RJD के बड़े कद्दावर नेता का हाथ है उनके ही द्वारा मासूम जनता को ठगने की योजना बनाई गई है।”

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR का हिस्सा

पुलिस ने क्या बताया?

ऑपइंडिया ने इस मामले में सिंघवाड़ा थाने के SHO बसंत कुमार से भी बात की है। बंसत कुमार ने बताया कि FIR दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी गई है। उनका कहना है कि जल्द से इससे जुड़े लोगों से पूछताछ की जाएगी। पुलिस को इस मामले में और पीड़ित मिलने का भी शक है।

पहले भी मिली हैं माई-बहिन योजना को लेकर शिकायतें

बिहार में इस योजना के लॉन्च होने के बाद से ही यह विवादों में है। कभी इसे लेकर RJD-कॉन्ग्रेस में राजनीति रस्सा-कशी की शिकायतें मिलीं तो कहीं लोगों को बरलाए जाने के आरोप लगे हैं। इससे पहले सामने आया था कि आरजेडी और कॉन्ग्रेस ने माई बहिन मान योजना के फॉर्म भरवाने के लिए जिन लोगों को काम पर लगाया है, उनके पास कोई अथॉरिटी नहीं है।

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जिस तरह कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में महिलाओं को ‘धोखा’ दिया था, वैसी ही RJD की तैयारी : माई-बहिन योज
जिस तरह कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में महिलाओं को ‘धोखा’ दिया था, वैसी ही RJD की तैयारी : माई-बहिन योज
 

ये लोग बिहार में लोगों के पास जाकर उनसे आधार कार्ड माँग रहे थे, NDA के नेताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। जिसके बाद यह योजना लगातार विवादों में है। इसे बीजेपी के नेताओं ने बड़ा घोटाला बताया है।

‘बह@$द, तुम आओ सा$, लतखोरी ठीक कर दूँगा’: बिहार के जिस जंगलराज ने सत्येंद्र दुबे को मार डाला, अब उसी जंगलराज की ‘पैदाइश’ पप्पू यादव का NHAI अधिकारी को धमकाने का ऑडियो वायरल

        पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव (बाएँ), मृतक सत्येंद्र दुबे की प्रोफाइल (फोटो साभार : Aajtak & indiatimes)
क्या आपको राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के इंजीनियर सत्येंद्र दुबे याद हैं। दुबे की हत्या इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि वो बिहार में सड़कों के निर्माण में भ्रष्टाचार को लेकर काफी सख्त थे। अब एक ऑडियो सामने आया है जिसमें में पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव NHAI के ही एक अधिकारी को धमकाते हुए सुनाई दे रहे हैं।

इस वीडियो में पप्पू यादव NHAI अधिकारी पर एक एंबुलेंस ड्राइवर को नौकरी पर रखने का दवाब डाल रहे हैं। पप्पू यादव अधिकारी को धमकती देते हुए कहते की 2 मिनट में ‘लतखोरी’ खत्म कर दूँगा। जब अधिकारी उनके सासंद होने का हवाला देते हुए मर्यादित तरीके से बात करने की गुजारिश करते हैं, तब भी सासंद का लहजा नहीं बदलता है। वे अपने लोगों से इस अधिकारी के घर के बारे में पूछते हुए सुनाई देते है।

पप्पू यादव के वायरल ऑडियो में क्या हैं।

इस वायरल ऑडियों की पुष्टि ऑपइंडिया नहीं करता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह ऑडियों कब का है। इसमें पप्पू यादव NHAI अधिकारी को धमकाते हुए सुनाई देते हैं। फोन पर आते ही पप्पू यादव कहते है शेखर जी पप्पू यादव… NHAI अधिकारी जब कहते हैं, ‘हाँ’, तब पप्पू यादव कहते हैं कि इतना लूज मत होईये, हाँ… टाइट रहिए। फिर पप्पू यादव NHAI अधिकारी को कहते हैं एंबुलेंस में ड्राइवर थे मनीष को रख लो यार। जब अधिकारी कहते हैं कि हमारे अंदर का चीज नहीं है, तब पप्पू यादव भड़क जाते हैं और गुस्सा करते हुए कहते ‘जो है उसको रखो’।

इसके बाद अधिकारी सासंद से कहते हैं कि ‘हम कहाँ से रखें’। आग बबूला हुए पप्पू यादव अधिकारी से पूछते हैं कि ‘अभी कहाँ हो’। अधिकारी जवाब देते हैं कि ‘दिल्ली में हैं’। पप्पू यादव अधिकारी से कहते हैं कि ‘लतखोरी’ और जो ‘पैसा इधर-उधर करते हो’ 2 मिनट में खत्म हो जाएगी। इसके बाद पप्पू यादव अपने आसपास खड़े लोगों से पूछते हैं ‘घर कहाँ है इस साले का’। पीछे खड़े लोग बताते हैं कि पूर्णिया में है हॉस्पिटल में हैं। पप्पू यादव पूछते हैं ‘हॉस्पिटल में क्या काम करता है’।

पप्पू यादव इसके बाद अधिकारी से पूछते है ‘कब आ रहे हैं इधर’। अधिकारी जवाब देते हुए कहते हैं ‘हम काहें आप को बोले’। पप्पू यादव 2 से 3 बार कहते हैं कि ‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या’। और अधिकारी उन्हें याद दिलाते हैं कि ‘आप सांसद है, तहजीब से बात कीजिए’। फिर पप्पू यादव गाली देते हुए बोलते है ‘बह@$द तुम्हारा दिमाग खराब है क्या’, तुम आओ सा$, तुम्हारा इलाज करवाकर सही करते हैं। लेकिन फिर भी अधिकारी कहते रहते हैं कि ‘आप सांसद है तमीज में बात कीजिए।’ इतने में पीछे से आवाज आती है कि ‘आने दो इसको’। पप्पू यादव और NHAI अधिकारी का ऑडियो क्लिप भी आप सुन सकते हैं।

क्या था सतेंद्र दुबे मामला?

इस ऑडियो के वायरल होने के बाद, कई लोगों को सत्येंद्र दुबे की याद आई। सत्येंद्र दुबे एक ईमानदार इंजीनियर थे जो NHAI के तहत काम कर रहे थे। सत्येंद्र दुबे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ PMO को पत्र लिखा था। पर वो गलती कर बैठे, पत्र में अपना नाम लिख दिया। सरकार की तरफ से उनकी पहचान उजागर कर दी। और फिर हुआ वही, जो बिहार के ‘जंगलराज’ में अक्सर होता था। बिहार के गया में सर्किट हाउस में 27 नवंबर 2003 को सत्येंद्र दुबे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

इस घटना ने देश भर में इंजीनियरों के बीच डर पैदा कर दिया था कि ईमानदारी से काम करने पर उन्हें भी इसी तरह का अंजाम भुगतना पड़ सकता है। हालाँकि, इस मामले में मुख्य आरोपित उदय मल्लाह को पकड़ा गया, लेकिन सत्येंद्र दुबे के भाई का मानना है कि असली अपराधी अभी भी बाहर हैं और सीबीआई ने इस मामले को ठीक से नहीं सुलझाया।

पप्पू यादव खुद को कांग्रेस का बताते हैं और हाल ही में उन्होंने तेजस्वी यादव को जननायक बताया है। बिहार में जंगलराज अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है। इनकी सरकार बनने के बाद क्या ही होगा। 90 से 2015 का दौर देखकर समझ सकते हैं। खुद को ‘गरीबों का मसीहा’ के तौर पर प्रचार करते हुए पप्पू यादव जी, लालू यादव के उसी जंगलराज की उपज है।

16 दिन, 23 जिले, 1300 किमी, 67 विधानसभा… ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से पहाड़ (बिहार) खोदने निकले थे राहुल गाँधी, चुहिया ने तेजस्वी यादव को कुतरा; तेजस्वी के मुद्दों का गायब होना


बिहार में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा 16 दिन तक चली और अब खत्म हो चुकी है। ये यात्रा बिहार के 23 जिलों, 1300 किलोमीटर और 67 विधानसभा सीटों से होकर गुजरी। वैसे तो इस यात्रा का मकसद था बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोट चोरी का मुद्दा उठाकर जनता का समर्थन हासिल करना और इंडी गठबंधन को मजबूत करना। लेकिन नतीजा उल्टा रहा।

इस यात्रा की अगुवाई करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी न तो जनता का भरोसा जीत पाई गया, न ही गठबंधन के भीतर एकजुटता दिख पाई। यात्रा के दौरान विवाद, आपसी मतभेद और स्थानीय लोगों की उदासीनता ने इसे चर्चा का विषय बना दिया। आइए, इस यात्रा के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।

वोटर अधिकार यात्रा का मकसद और उसकी विफलता

राहुल गाँधी ने वोटर अधिकार यात्रा की शुरुआत सासाराम से की थी, जिसमें आरजेडी नेता तेजस्वी यादव उनके साथ थे। इसका लक्ष्य था वोट चोरी को बड़ा मुद्दा बनाना और बिहार की जनता को यह बताना कि उनके वोटिंग अधिकार खतरे में हैं। साथ ही इंडी गठबंधन को एकजुट दिखाकर तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना भी इसका उद्देश्य था। लेकिन ये दोनों ही लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।

स्थानीय लोगों ने इस यात्रा को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट संजय कौशिक कहते हैं, “यात्रा का सबसे बड़ा नुकसान मुद्दे के चयन में हुआ। वोट चोरी का मुद्दा बिहार की जनता के बीच गूँज नहीं सका। लोग SIR (स्पेशल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन) को जरूरी मानते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि वोटर लिस्ट में बाहरी लोग, घुसपैठिए और मृत वोटरों के नाम हटाए जाने चाहिए।” इस वजह से राहुल गाँधी को स्थानीय समर्थन नहीं मिला।

राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा की कवरेज ऑपइंडिया ने भी की। इस दौरान हमारी टीम ने लोगों से बातचीत की। लोगों ने राहुल गाँधी की इस यात्रा तो न सिर्फ खारिज किया, बल्कि उन्होंने बिहार SIR को बेहद जरूरी बताया। स्थानीय लोग तो घुसपैठियों की समस्या से परेशान भी दिखे।

यात्रा का रूट मैप भी मुस्लिम बहुल इलाकों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, ताकि इस समुदाय को इंडी गठबंधन की ओर आकर्षित किया जा सके। सासाराम, रोहतास से निकली यात्रा औरंगाबाद, गया, वजीरगंज, शेखपुरा, मुंगेर से होकर भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल होते हुए दरभंगा, सीतामढ़ी, बेतिया, फिर गोपालगंज, छपरा, भोजपुर होते हुए पटना में खत्म हुई। लेकिन यह रणनीति भी कारगर नहीं रही। आरा जैसे इलाकों में वामपंथी दलों को जोड़ा गया, लेकिन वहाँ भी भीड़ जुटाने में नाकामी मिली।

गठबंधन में खटास और तेजस्वी की छवि पर असर

इंडी गठबंधन में शामिल आरजेडी को उम्मीद थी कि यह यात्रा तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जिससे तेजस्वी की छवि को नुकसान हुआ। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट नचिकेता नारायण कहते हैं, “राहुल गाँधी ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से बचकर गठबंधन की अंदरूनी खटास को उजागर कर दिया।”

इसके अलावा आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीट बँटवारे को लेकर भी तनाव सामने आया। यात्रा से पहले चर्चा थी कि कॉन्ग्रेस को महागठबंधन में 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यात्रा के बाद लगता है कि कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीटें हासिल कर सकती है। फिर भी जमीनी स्तर पर इसका कोई खास फायदा नहीं दिखता।

विवादों ने डुबोई वोटर अधिकार यात्रा की नैया

यात्रा के दौरान कई विवादों ने इसे और कमजोर किया। सबसे बड़ा विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के शामिल होने पर हुआ। स्टालिन 27 अगस्त को मुजफ्फरपुर में यात्रा में शामिल हुए। लेकिन उनकी पार्टी डीएमके के नेताओं के पुराने बयान लोगों को याद आ गए।

डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने बिहार और यूपी के लोगों को ‘टॉयलेट साफ करने वाला’ कहा था, जबकि स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन धर्म को बीमारी बताया था। बीजेपी प्रवक्ता प्रभात मालाकार ने कहा, “यह यात्रा बिहार और बिहारियों के अपमान की यात्रा थी। राहुल और तेजस्वी उन लोगों के साथ घूमे, जिन्होंने बिहार के डीएनए पर सवाल उठाए।”

दूसरा बड़ा विवाद दरभंगा में हुआ, जहाँ मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कहे गए। मोहम्मद रिजवी को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया और बीजेपी ने इसे पूरे देश में मुद्दा बनाया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम दौरे में कहा, “राहुल गाँधी को पीएम मोदी और उनकी दिवंगत माँ के लिए कहे गए अपशब्दों पर माफी माँगनी चाहिए।” खुद पीएम मोदी ने भी इस मुद्दे को जनता के सामने रखा। ऐसे में इस विवाद ने यात्रा की साख को और नुकसान पहुँचाया।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार का रोल सीमित, बैकफुट पर रहे

यात्रा में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को भी शामिल किया गया, लेकिन इनका रोल भी विवादों से अछूता नहीं रहा। पप्पू यादव को पूर्णिया में इस्तेमाल किया गया, लेकिन बाद में उन्हें मंच पर जगह तक नहीं दी गई। पटना में वे मंच के पीछे बैठे दिखे, जबकि उन्होंने तेजस्वी यादव को ‘जननायक’ तक कह दिया था। कन्हैया कुमार शुरुआत में यात्रा में दिखे, लेकिन बाद में गायब हो गए।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसों को अभी भी आरजेडी कबूल करने को तैयार नहीं है। ऐसे में आरजेडी ने इन दोनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, जिससे गठबंधन में आपसी अविश्वास की खाई और गहरी हो गई।

तेजस्वी के मुद्दों का गायब होना

आरजेडी को उम्मीद थी कि इस यात्रा से तेजस्वी यादव को बिहार में इंडी गठबंधन का फ्रंट चेहरा बनाया जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा। सारा फुटेज खा गए राहुल गाँधी। इसकी वजह से कॉन्ग्रेस और आरजेडी के बीच मतभेद भी सामने आ गई कि राहुल गाँधी तेजस्वी यादव पर हावी हो गए। इसकी वजह से यात्रा के समापन को बदल दिया गया और बेहद निराशा भरे माहौल में पटना में यात्रा को खत्म कर दिया गया।

बिहार में एक वर्ग है- जिसने सिर्फ जंगल राज की कहानियों को पढ़ा है, उस समय के बारे में सिर्फ सुना है, उन्होंने जंगलराज को जिया नहीं है। मतदाताओं के ऐसे वर्ग ने 20 सालों से नीतीश कुमार को ही सत्ता में बने देखा है। जंगलराज को न जानने वाले इस मतदाता वर्ग में एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर बना हुआ था। यही वर्ग मजबूरी के विकल्प के तौर पर तेजस्वी यादव की तरफ भी देख रहे थे। 2020 में भी देख रहे थे, अभी भी देख रहे हैं।

यही वजह है कि तेजस्वी यादव कलम, रोजगार इन सब चीजों की बात भी करते थे। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अपने वोट चोरी का जो फर्जी एजेंडा थोप दिया। उससे तेजस्वी यादव के मुद्दे खो गए। साफ है – कॉन्ग्रेस के वोट चोरी के एजेंडे ने तेजस्वी के इन मुद्दों को दबा दिया।

इन सब की वजह से जो नए मतदाताओं के बीच कलम-रोजगार जैसे मजबूरी के मुद्दों के बीत तेजस्वी उभर रहे थे, वो सब भी तेजस्वी और इंडी गठबंधन के हाथों से फिसल गए। नचिकेता नारायण कहते हैं, “कॉन्ग्रेस खुद को RJD के बराबर खड़ा करने में कामयाब रही। इसके अलावा उसे बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। वोट चोरी का मुद्दा लोगों ने नकार दिया। यात्रा के दौरान दिखाए गए सबूत या तो गलत निकले या जनता ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।”

क्या मिला इंडी गठबंधन को?

यात्रा से इंडी गठबंधन को मिला-जुला फायदा हुआ। कॉन्ग्रेस के लिए यह संगठन को मजबूत करने का मौका था। संजय कौशिक कहते हैं, “बिहार में कॉन्ग्रेस का संगठन लगभग खत्म हो चुका था। इस यात्रा ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूँकी।” लेकिन वोटों में इसका कितना फायदा होगा, यह साफ नहीं है।
आरजेडी के लिए यात्रा फायदे का सौदा नहीं रही। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “RJD के लिए यह यात्रा फायदे का सौदा साबित नहीं हुई। उसे इकलौता फायदा मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोकने का मिला। रणनीतिक रूप से उसे नुकसान ही हुआ।” हालाँकि, नचिकेता नारायण का मानना है कि राहुल और तेजस्वी की केमिस्ट्री से सीट बँटवारे और वोट ट्रांसफर में आसानी हो सकती है।
भाकपा (माले) जैसी छोटी पार्टियों को इस यात्रा से कुछ फायदा हुआ। पार्टी के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य पूरे 16 दिन राहुल के साथ दिखे, जिससे उनकी पार्टी की अहमियत बढ़ी।

क्या बदला बिहार का सियासी माहौल?

यात्रा के रूट में शामिल 67 विधानसभा सीटों में से 2020 में एनडीए ने 39 सीटें जीती थीं, जबकि कॉन्ग्रेस को सिर्फ 9 सीटें मिली थीं। राहुल गाँधी के सामने इन सीटों पर एनडीए की मजबूती को तोड़ने की चुनौती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यात्रा के समापन में पटना के गाँधी मैदान में बड़ी रैली की योजना थी, लेकिन भीड़ न जुटने की वजह से इसे रोडशो में बदल दिया गया। राहुल गाँधी जल्दी ही बिहार से निकल गए।

खोया ज्यादा, पाया कम

कुल मिलाकर इस यात्रा से पहले जो चर्चा थी कि इंडी गठबंधन में कॉन्ग्रेस को 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी, वो इस यात्रा के बाद बदल गया है। अब लगता है कि शायद कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीट झटक ले। हालाँकि इस यात्रा से ये भी साफ हो गया है कि कॉन्ग्रेस भले ही कुछ सीटें इंडी गठबंधन में ज्यादा ले ले, लेकिन जमीन पर उसका कोई फायदा नहीं मिलने वाला। क्योंकि सालों तक विपक्ष में रहने के बावजूद न तो कॉन्ग्रेस के पास कोई मुद्दा है और न ही आरजेडी के पास। ऐसे में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा का जमीन पर कोई खास फर्क पड़ा हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं दिखता है।

मोदी ने खेल दिया भावात्मक कार्ड जो ले डूबेगा कांग्रेस और RJD ही नहीं INDI गठबंधन को; यह गुंडागर्दी एक सोंची-समझी हरकत; मुसलमान से गाली दिलवाना दंगा करने की साज़िश थी क्या?


जिस बात की उम्मीद थी कि 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा से वापस आकर कांग्रेस और आरजेडी के मंच से माँ को दी गयी गाली पर अपने गुस्से से INDI गठबंधन को मुंह तोड़ जवाब देंगे जो सितम्बर 2 को वह बात सामने आ गयी। यह कहना कि जिस समय मंच से माँ को गाली दी जा रही थी उस समय राहुल और तेजस्वी मंच पर नहीं थे। लेकिन जब मंच पर पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसों को चढ़ने नहीं दिया जाता वह गालीबाज कैसे चढ़ा? यानि यह गुंडागर्दी एक सोंची-समझी हरकत है। इतना ही मुसलमान से गाली दिलवाना दंगा करने की साज़िश थी क्या? अगर राहुल भारत में बांग्लादेश बनाना चाहते है तो यह उनकी भयंकर भूल है। अगर ऐसी गुंडागर्दी हुई कांग्रेस तो क्या INDI गठबंधन की भी उलटी गिनती शुरू हो जाएगी। अभी भी समय है कि 
INDI गठबंधन में शामिल पार्टियां कांग्रेस और RJD से दूरी बना लें।

  

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार, 02 सितंबर को बिहार राज्य जीविका निधि साख सहकारी संघ लिमिटेड का वर्चुअल माध्यम से शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन भावुकता से भरा रहा। दरअसल में दरभंगा में कांग्रेस-आरजेडी की वोटर अधिकार यात्रा के दौरान पीएम मोदी की दिवंगत मां को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। इसका जिक्र करते हुए भावुक प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सिर्फ उनकी मां को नहीं, बल्कि देश की हर मां-बहन-बेटी का अपमान है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘बिहार वो धरती है जहां मातृशक्ति का सम्मान सर्वोपरि रहा है। यहां गंगा मइया, कोसी मइया, गंडकी मइया, पुनपुन मइया की पूजा होती है। जानकी जी जैसी बेटियां इसी धरती की गौरव हैं। ऐसे समृद्ध परंपरा वाले बिहार में कुछ दिनों पहले जो हुआ, उसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। बिहार में आरजेडी-कांग्रेस के मंच से मेरी मां को गालियां दी गईं। ये गालियां सिर्फ मेरी मां के लिए नहीं। ये देश की हर मां-बहन-बेटी के लिए थीं।’

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मां के जीवन संघर्षों को याद करते हुए भावुक अंदाज में कहा कि मेरी मां ने मुझे देश की सेवा के लिए आशीर्वाद देकर विदा किया था। वो खुद गरीबी में रहीं, कभी आराम नहीं किया। उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी उन्हें गालियां दी गईं। क्या यही कांग्रेस-आरजेडी के संस्कार हैं?

 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जो लोग शाही परिवारों में पैदा होते हैं, उन्हें एक गरीब की सफलता और संघर्ष समझ में नहीं आता। ये लोग सोचते हैं सत्ता उनकी विरासत है। उन्होंने कहा कि एक गरीब मां की तपस्या, उसके बेटे की पीड़ा ये शाही खानदानों में पैदा हुए युवराज नहीं समझ सकते। ये नामदार लोग तो सोने-चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं। इसलिए जब एक गरीब मां का बेटा प्रधानमंत्री बनता है, तो वो इसे गाली देने लगते हैं।

प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए कहा कि कभी मुझे नीच कहा गया, कभी गंदी नाली का कीड़ा, तो कभी जहर वाला सांप। गाली देकर इनकी नामदार वाली सोच बार-बार उजागर हो रही है। और इसी सोच की वजह से ये लोग अब मेरी स्वर्गीय मां को भी अपने मंच से गालियां दिलवाने लगे हैं।

उन्होंने कहा किआरजेडी-कांग्रेस जैसे दल कभी महिलाओं को सशक्त नहीं देखना चाहते। जब एक गरीब घर की महिला आत्मनिर्भर बनती है तो इन्हें बर्दाश्त नहीं होता। महिला आरक्षण का विरोध करते हैं, आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का भी अपमान करते हैं। उन्होंने कहा कि आरजेडी के दौर में महिलाओं की सुरक्षा पर सबसे बड़ा खतरा था और आज भी उनकी मानसिकता नहीं बदली है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आरजेडी के शासनकाल में बिहार में सबसे ज्यादा अत्याचार महिलाओं पर ही हुए। हत्याएं, फिरौती, बलात्कार आम बात थी। महिलाएं घर से निकलने से डरती थीं। आज भी वही मानसिकता इन दलों में देखी जा सकती है। आरजेडी को हटाने और बार-बार हराने में बिहार की आप सभी महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। इसीलिए, आरजेडी हो या कांग्रेस, ये लोग आज सबसे ज्यादा महिलाओं के प्रति बौखलाए हुए हैं।

अपने भाषण के अंत में पीएम मोदी ने कहा कि महिलाओं के प्रति घृणा और नफरत की इस राजनीति पर लगाम जरूरी है। देशवासियों को सोचने की जरूरत है कैसी भाषा बोली जा रही है। बिहार की जनता के सामने, मां को गाली देने वालों से कहना चाहता हूं कि मोदी तो उन्हें माफ कर सकता है, लेकिन भारत की धरती मां के अपमान को नहीं भूलेगी। जहां भी आरजेडी और कांग्रेस के नेता जाएं, हर गली-मोहल्ले से एक ही आवाज उठनी चाहिए। ‘मां को गाली नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे’। ‘इज्ज़त पर वार नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे’।