साझे की हांड़ी हमेशा बीच चौक पर ही फूटती है, जो लोकसभा 2024 चुनाव में INDI गठबंधन के नाम से बनी हांड़ी अब 2025 में बिहार विधान सभा चुनाव में फूटती दिख रही है। अभी कुछ ही दिन पहले कांग्रेस युवराज राहुल गाँधी ने बिहार के मुस्लिम क्षेत्रों में पिकनिक मनाई थी। यानि जमीन तेजस्वी की और भीड़ RJD की मजे ले गया युवराज राहुल। लेकिन अपना मुस्लिम वोट लुटवाकर बिहार के युवराज तेजस्वी को बहुत देर में होश आया।
बिहार चुनावी साल में है। राजनीतिक यात्राओं/सभाओं का मौसम है। बयानों की बाढ़ है। इसी में बहकर आया है तेजस्वी यादव का एक बयान है। उनका कहना है कि बिहार की सभी 243 सीटों पर उनका चेहरा चुनाव लड़ रहा है।
एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, इस बार तेजस्वी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। चाहे बोचहां हो या मुजफ्फरपुर। तेजस्वी लड़ेगा। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि मेरे नाम पर वोट दें।
लालू प्रसाद यादव की पारिवारिक पार्टी राजद चाहती है कि इस बार चुनाव में INDI गठबंधन तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर उतरे। कांग्रेस, लेफ्ट सहित राजद के अन्य छोटे सहयोगी इससे कन्नी काट रहे हैं।
तेजस्वी यादव के नाम से क्यों डर रहा INDI गठबंधन
इसका एक कारण यह बताया जाता है कि कांग्रेस को लगता है कि तेजस्वी यादव के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में जाने पर उसे अगड़ों का जो छिटपुट वोट बिहार में मिल रहा है, वह भी उसके हाथ से निकल जाएगी। साथ ही यह भी बताया जाता है कि सहयोगी दल तेजस्वी यादव के नाम पर मुहर नहीं लगाकर, ज्यादा से ज्यादा सीट देने के लिए राजद पर दबाव बढ़ाना चाहते हैं।
इसी बौखलाहट में तेजस्वी यादव ने ‘तेजस्वी बिहार के सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा’ का दंभ भरा है। पर इस फेर में वे भूल गए नाम या चेहरा, केवल कुछ शब्द भर नहीं होते हैं। केवल तस्वीर ही नहीं होती है। नाम और चेहरा, इतिहास और जनता की स्मृतियों का प्रतीक भी होते हैं।
जिस नाम और चेहरा से तेजस्वी यादव को राजद की बागडोर मिली है, उसका इतिहास कुछ ऐसा है, उसकी स्मृतियाँ बिहार के लोगों के मस्तिष्क में कुछ इस तरह अंकित है, कि वह नाम और चेहरा को तेजस्वी यादव के लिए बोझ बना देती है। ऐसे में यह बयान न केवल INDI गठबंधन के भीतर चल रहे द्वंद्व को उजागर करता है, बल्कि बिहार के लोगों के भीतर उस डर को भी पैदा करता है, जिससे पीछा छुड़ाकर वे यहाँ तक पहुँचे हैं।
बिहार को डराता है तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा
बिहार से ही आने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में 2019 के आम चुनावों से पहले एक प्रजेंटेशन का हवाला देते हुए लिखा है, “इस प्रजेंटेशन में सवाल हुआ- अगर आप (दो बड़े उद्योपतियों का नाम लिया गया, जिसमें एक भगोड़ा है तो दूसरा लंबे समय तक जेल में रहा, जिनके नाम का खुलासा करना उचित नहीं होगा) इनका नाम लेते हैं तो आपके जेहन में क्या छवि आती है? जवाब था- फ्रॉड की। लेकिन जब नरेंद्र मोदी का नाम लेते हैं तो क्या जवाब होता है? एक ऐसा नेता जो कोई भी बड़ा निर्णय ले सकता है, चाहे विकास के एजेंडे पर हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा।”
ऐसे ही यदि आपसे यह पूछा जाए कि तेजस्वी यादव का नाम सुनते ही या फोटो देखते ही आपके जेहन में क्या छवि आती है? जाहिर है आपको लालू-राबड़ी का जंगलराज याद आ जाएगा।
राजद के सालों तक सत्ता से बाहर रहने के बाद भी, तेजस्वी को नए दौर का युवा नेता बताए जाने के बाद भी, उस जंगलराज उसका डर ऐसा है कि लोगों को लगता है कि उनके सत्ता में आने से अपराध का तंत्र फिर से मजबूत होगा।
- तेजस्वी यादव का चेहरा बिहार के लोगों को उस दौर की याद दिलाता है, जब अपहरण उद्योग में बदल गया था। जब लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन करने को मजबूर कर दिए गए। जब देश के अन्य राज्य विकास की दौड़ में शामिल हो रहे थे तो जातिवाद और भ्रष्टाचार ने बिहार को कैद कर रखा था।
- तेजस्वी यादव की राजनीति ‘MY समीकरण’ पर ही टिकी है। यह न केवल उनकी राजनीतिक जमीन को सीमित करता है, बल्कि यह समीकरण बहुसंख्यक जनता के लिए असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है।
- तेजस्वी यादव राजनीतिक तौर पर आज जहाँ हैं, वहाँ राजनीति में घिस-घिस कर नहीं पहुँचे हैं। वे वंशवाद की देन हैं। बिहार के लोगों पर राजद की ओर से थोपे गए हैं। क्रिकेटर से नेता बनने की अपनी यात्रा में उनके पास गिनाने/दिखाने के लिए ऐसा कुछ भी ठोस नहीं है जो उनके नाम और चेहरा से उभरने वाली छवि को बदल दे।
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