Showing posts with label angry. Show all posts
Showing posts with label angry. Show all posts

बंगाल में Khela HoBe: ममता के गुंडों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का फूटा गुस्सा; जागे रहे रात भर; CJI बोले- हमें पता है उपद्रवी कौन? बेशर्म INDI गठबंधन खामोश क्यों?

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने राज्य सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट, कोलकाता हाईकोर्ट और चुनाव आयोग बार-बार पश्चिम बंगाल सरकार को डांट-फटकार लगा रहे हैं। राज्य सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। अदालत और संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों के नाफरमानी सरकार की आदत बनती जा रही है। न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से लेकर अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने तक हर स्तर पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया। लेकिन विधानसभा चुनावों में हार को लेकर डरी ममता सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें नौ घंटे भूखे बंधक बनाकर रखा गया। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।

बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना

दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।  

सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी


सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।

कोर्ट रूम LIVE-सीजेआई सूर्यकांत ने ममता सरकार को जमकर लगाई फटकार 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से थे।
CJI: क्या आपने देखा है कि क्या हुआ है?
कपिल सिब्बल: मुझे एक रिपोर्ट (मालदा वाली) मिली है… मैंने इसे पढ़ा है।
मेनका गुरुस्वामी: ये एक गैरराजनीतिक विरोध प्रदर्शन था।
CJI: हम इसे राजनीतिक नहीं बनाना चाहते।
तुषार मेहता: यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है!
CJI: रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था। मुझे रात में मौखिक रूप से आदेश देने पड़े। खाना और पानी तक नहीं लेने दिया गया।
जस्टिस बागची: जिन व्यक्तियों को अब कानून-व्यवस्था सौंपी गई है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना होगा। कृपया पूछताछ करें… राज्य के ऐसे नेता हैं जिन्हें एक स्वर में बोलना चाहिए… हम यहां विशेष अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हैं।
गोपाल एस: हम सुरक्षा बढ़ाएंगे।
तुषार मेहता: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अब राज्य पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी।
जस्टिस बागची: हम इसे चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं।
गोपाल एस: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने अब सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने कहा है कि वे विरोध जारी रखेंगे।
पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल: हम सभी जानते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की रक्षा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग को विरोधी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए।
CJI: मिस्टर एडवोकेट जनरल, अब आप हमें मजबूर कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, आपके राज्य में आप में से हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हमने कभी इतना ध्रुवीकृत राज्य नहीं देखा। यहां तक कि अदालती आदेशों के पालन में भी राजनीति झलकती है। क्या आपको लगता है कि हमें नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? कम से कम मैं रात 2 बजे तक सब कुछ मॉनिटर कर रहा था!
‘अगर विरोध अराजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या यह उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर पहुंचें और देखें कि क्या हो रहा है? कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया। रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था।’

मालदा घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सात आदेश

  • CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। एजेंसी सीधे कोर्ट को रिपोर्ट देगी।
  • चीफ सेक्रेटरी, DGP, DM, SSP को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
  • सभी जिम्मेदार अधिकारियों को 6 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश।
  • चुनाव आयोग (ECI) को कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें।
  • जहां-जहां जज काम कर रहे हैं, वहां सुरक्षा बढ़ाएं।
  • जिस गेस्ट हाउस में जज रुके हैं, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
  • जहां SIR का काम चल रहा है, वहां एक बार में सिर्फ 5 लोगों को ही जाने की अनुमति होगी।
7 अधिकारी, 9 घंटे रहे बंधक, 6 पॉइंट में जानिए सारा मामला
  • 1. सुबह 10 बजे; प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में जुड़ते गए, विरोध प्रदर्शन किया। एक अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में इकठ्ठा होते गए। फिर वे BDO ऑफिस के करीब गए, यहां प्रदर्शन करने लगे।
    2. दोपहर 2 बजे; न्यायिक अधिकारी मालदा के BDO ऑफिस पहुंचे। दोपहर 2 बजे के करीब 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर मालदा के माताबारी स्थित BDO ऑफिस पहुंचे। ये सभी अधिकारी SIR प्रोसेस से जुड़ा काम देख रहे थे।
    3. शाम 6 बजे; वोटर लिस्ट में नाम कटने को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी बाहर जमा। इलेक्शन ऑब्जर्वर के ऑफिस पहुंचने की सूचना मिलते ही हजारों स्थानीय लोग बाहर जमा हो गए। उन्होंने SIR में नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन किया।
    4. शाम 7 बजे; प्रदर्शनकारियों की ऑफिस के अंदर जाने की मांग। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि वे अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना चाहते हैं। जिससे इनकार कर दिया गया।
    5. रात 11 बजे; पुलिस सुरक्षा में अधिकारी निकाले गए, गाड़ी रोकने की कोशिश। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।
    6. रात 12 बजे; न्यायिक अधिकारी की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, ईंट से हमला। जिस गाड़ी से न्यायिक अधिकारियों को बाहर निकाला गया। उस गाड़ी पर प्रदर्शनकारियों ने ईंट से हमला किया। गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए।
अब 4 पॉइंट में मालदा में वोटर लिस्ट में जुड़ा पूरा विवाद
  • 1. यह मामला क्या है? दस्तावेजों में गड़बड़ियां, काफी समय से अनुपस्थिति और तकनीकी त्रुटियों के चलते SIR के बाद मालदा सहित राज्य के कई सीमावर्ती जिलों में हजारों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। तभी से स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।
    2. यह कितने गांवों से जुड़ा है? मालदा जिले में 100 से ज्यादा गांवों की मतदाता सूची इस संशोधन से प्रभावित हुई है।
    3. SIR में हर गांव से कितने लोगों के नाम काटे गए? यह आंकड़ा प्रशासन ने जारी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न सूत्रों और ग्राम पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार शिलालमपुर कालियाचक-2 से 427 लोगों के नाम हटाए गए। कुछ अन्य गांवों में 50 से 200 तक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबर है। हालांकि जिन नामों को हटाया गया है, उनकी समीक्षा जारी है।
    4. नाम क्यों काटे गए?
    • दस्तावेजों में गड़बड़ी: SIR की सुनवाई के दौरान जमा किए गए दस्तावेजों को कई मामलों में ‘अप्रमाणित’ या ‘अपर्याप्त’ माना गया।
    • लंबे समय से अनुपस्थिति: कुछ मामलों में यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति उस पते पर स्थायी रूप से नहीं रहते (विशेषकर प्रवासी मजदूर)।
    • तकनीकी व प्रक्रियागत त्रुटियां: डिजिटल डाटाबेस अपडेट के दौरान एक ही व्यक्ति का नाम दो बार होना या जन्मतिथि में गलती जैसी वजहों से भी नाम हटे।
सीजेआई भड़के और कहा कि फिजूल की आपत्तियां ना उठाएं
इससे पपहले पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने ऐसी दलील दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए। टीएमस सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फिजूल की आपत्तियां न उठाएं यह सिर्फ ओरिएंटेशन है। दरअसल, टीएमसी सांसद ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन पर सवाल उठाया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब तक करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि हर दिन लगभग 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने पत्र में CJI को बताया कि सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग (ECI) ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं।
ममता ने ‘खेला होबे’ से किया इशारा, राज्य में डर का राज – भाजपा
राज्य के अंदर की बिगड़ी स्थिति को संभाल पाने में विफल रहने पर टीएमसी मालदा की घटना की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह पर डालने की बेशर्मी भी कर रही है। टीएमसी के मुताबिक शाह लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बार-बार विफल रहे। इससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरी ओर भाजपा ने कहा कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में डर का राज कायम कर रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर लिखा-‘मालदा के कालियाचक में हिंसक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए गए। आवाजाही ठप हो गई और सत्ता की जगह डर का राज छा गया। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले कहा था- खेला होबे। क्या उनका इशारा इसी ओर था?’ बता दें कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई थी। इसमें 7.04 करोड़ वोटर के नाम थे। लगभग 60 लाख नाम न्यायिक जांच के दायरे में रखे गए। इन्हें वोटर लिस्ट में रखने या हटाने पर फैसले के लिए 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम की टाइमलाइन
• 2 अप्रैल 2026: Supreme Court of India ने मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” बताया और राज्य के मुख्य सचिव, DGP, मालदा DM और SP को नोटिस जारी किया।
• 1 अप्रैल 2026: मालदा के कालियाचक में SIR मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी थीं, को दोपहर से रात तक BDO कार्यालय में घेरकर रखा गया। पुलिस और CAPF की मदद से देर रात अधिकारियों को निकाला गया।
• 31 मार्च 2026: Supreme Court of India ने कहा कि लगभग 60 लाख दावे और आपत्तियां SIR प्रक्रिया में आई हैं, जिनमें से 47.3 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। अदालत ने बाकी मामलों को 7 अप्रैल तक पूरा करने का निर्देश देने के साथ ही कहा की फालतू की आपत्तियां ना लगाएं।
• 30 मार्च 2026: TMC ने मांग की कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कारण सार्वजनिक किए जाएं और अपील की प्रक्रिया को जिला स्तर से नीचे BDO स्तर तक ले जाया जाए।
• 28 मार्च 2026: Election Commission of India ने SIR मामलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 24 जिलों में अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। बाद में Supreme Court of India ने इन ट्रिब्यूनलों को ताजा दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति भी दी।
• मार्च 2026 के दूसरे और तीसरे सप्ताह: Murshidabad, Malda, Nadia और सीमावर्ती जिलों में कथित रूप से मतदाता सूची से नाम कटने के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, धरना और राजनीतिक टकराव बढ़े।
10 मार्च 2026: Supreme Court of India ने SIR में लगे न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को फटकार लगाई और कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों की ईमानदारी पर संदेह करना उचित नहीं है।
• मार्च 2026 की शुरुआत: टीएमसी के लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। Murshidabad, Malda और सीमावर्ती जिलों में सबसे ज्यादा दावे और आपत्तियां दर्ज हुईं।
• 27 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने TMC की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक अधिकारियों को दिए जा रहे ECI के प्रशिक्षण मॉड्यूल पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी किसी दबाव में नहीं आएंगे।
• 26 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 530 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की। इन्हें विभिन्न जिलों में दावे, आपत्तियां और मतदाता सूची की जांच की जिम्मेदारी दी गई।
• 22 फरवरी 2026: SIR में “logical discrepancy” वाले मामलों की संख्या को लेकर नया विवाद सामने आया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कितने मामलों को न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा जाएगा।
• 20 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने Calcutta High Court को सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR कार्य में लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच “trust deficit” है।
• 17 फरवरी 2026: Election Commission of India ने राज्य सरकार को SIR में हुई कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और FIR दर्ज करने के निर्देशों के पालन के लिए अंतिम समयसीमा दी।
 16 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही, कर्तव्य में चूक और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
• 10 फरवरी 2026: Election Commission of India ने घोषणा की कि SIR से जुड़े दावे और आपत्तियों की सुनवाई 21 फरवरी तक पूरी होगी और अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
• 3 फरवरी 2026: Mamata Banerjee ने Supreme Court of India और चुनाव आयोग के सामने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि इसको लेकर वह कोई ठोस तथ्य नहीं दे पाईं।
• 12 जनवरी 2026: Mamata Banerjee ने Election Commission of India को अपना पांचवां पत्र भेजा और आरोप लगाया कि AI आधारित डिजिटाइजेशन और सॉफ्टवेयर त्रुटियों की वजह से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिह्नित किए जा रहे हैं।
• जनवरी 2026 के पहले सप्ताह: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेज जांच का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। सीमावर्ती जिलों, विशेषकर Murshidabad, Malda और Nadia में शुरुआत से ही सबसे ज्यादा विवाद सामने आए।

राष्ट्रीय एकता यानि जातिगत घिनौनी सियासत का नंगा नाच; अब ‘सन ऑफ मल्लाह’ ने महागठबंधन में फंसाया महापेच! आधी रात को तेजस्वी-मुकेश की मुलाकात के बाद VIP नाराज

जब भी चुनाव होते हैं सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष सभी मुस्लिम और जातियों के मकड़जाल में उल्छे नज़र आते बड़ी-बड़ी बातें करते हैं राष्ट्रीय एकता का। लगता है किसी भी पार्टी को secularism की ABC तक नहीं आती, अगर आती होगी तो जाति के नाम पर जनता को पागल नहीं बनाया जाता। इस कटु सच्चाई को कुर्सी की भूखी पार्टियों और जनता को भी समझना होगा। रेवड़ियां बांट जनता को पागल बनाया जा रहा है। जब जातिगत घिनौनी सियासत करनी है फिर किसी की जाति से बुलाने पर कानून क्यों?   
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर खींचतान खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी 25 सीटों की मांग पर अड़े हैं, जबकि RJD ने केवल 14 सीटों का ऑफर दिया है। इस ऑफर के साथ तेजस्वी यादव के साथ देर रात हुई मुलाकात के बाद मुकेश सहनी सख्त नाराज हैं। रात दो बजे के बाद जब मुकेश सहनी बैठक से निकले, तो उनके चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। सहनी ने मीडिया से कोई बात तक नहीं की और सीधे अपने आवास लौट गए। तब से लेकर अब तक उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सहनी अब अपनी पार्टी की अगली रणनीति बना रहे हैं। यदि महागठबंधन से बातचीत पटरी पर नहीं बैठी तो वे अपनी पार्टी के 40 उम्मीदवारों को विधानसभा में उतारने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मुकेश सहनी इस बार अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने के मूड में हैं। उनका कहना है कि सहनी का मल्लाह और निषाद समाज की राजनीति में वोट बैंक है और सहनी उसी को लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

हमारे जनाधार और मेहनत का सम्मान होना चाहिए-सहनी
मुकेश सहनी और तेजस्वी यादव के बीच देर रात राजधानी पटना में एक अहम बैठक हुई। तेजस्वी यादव के आवास पर करीब 2 बजे रात तक दोनों नेताओं के बीच बातचीत चली। बताया जा रहा है कि बैठक का माहौल शुरुआत में सकारात्मक था, लेकिन सीट शेयरिंग पर चर्चा आते ही टकराव बढ़ गया। तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखने की बात कहते हुए वीआईपी को 14 सीटें देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन मुकेश सहनी ने साफ कहा कि ‘हमारे जनाधार और मेहनत का सम्मान होना चाहिए, 25 से कम सीट पर VIP चुनाव नहीं लड़ेगी।’ इसके अलावा सहनी ने सरकार बनने के बाद उसमें डिप्टी सीएम पद की भी डिमांड की। बताते हैं कि तीन डिप्टी सीएम के फार्मूले में सहनी को सैट किया जा सकता है, इस पर तेजस्वी ने स्वीकृति दी, लेकिन ज्यादा सीटें देने पर उन्होंने मना कर दिया।

अब ‘सन ऑफ मल्लाह’ सहनी बना रहे नई रणनीति
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख और ‘सन ऑफ मल्लाह’ के नाम से मशहूर मुकेश सहनी इसके बाद अब खुलकर अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक मुकेश सहनी किसी भी हालत में 25 सीटों से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने उन्हें सिर्फ 14 सीटों का ऑफर दिया है। रात दो बजे के बाद जब मुकेश सहनी बैठक से निकले, तो उनके चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। सहनी ने मीडिया से कोई बात नहीं की और सीधे अपने आवास लौट गए. तब से लेकर अब तक उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सहनी अब इस पर मन बना रहे हैं कि यदि तेजस्वी यादव ने उन्हें महागठबंधन में 25 सीटें नहीं दीं, तो वे अपनी पार्टी के 40 उम्मीदवारों को सियासी मैदान में उतारेंगे।

महागठबंधन की बैठक टली, RJD की आपात मीटिंग
महागठबंधन की एक अहम बैठक प्रस्तावित थी, जिसमें सीट शेयरिंग पर अंतिम सहमति बनने की उम्मीद थी। लेकिन VIP की नाराज़गी के चलते यह बैठक फिलहाल टाल दी गई है। अब RJD ने अपनी आपात बैठक बुलाई है, जिसमें तेजस्वी यादव पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ आगे की रणनीति तय करेंगे। मुकेश सहनी की नाराजगी महागठबंधन के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई है। पहले भी वे NDA और महागठबंधन के बीच पाला बदल चुके हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर NDA के साथ तालमेल किया था, लेकिन बाद में फिर विपक्षी खेमे के करीब आ गए। महागठबंधन के नेताओं को यह भी चिंता सता रही है कि यदि सहनी फिर एनडीए के पाले में जाते हैं तो उनका पूरा खेल बिगड़ सकता है।

VIP का बिफरना गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव से निराश होकर मुकेश सहनी इस बार अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने के पूरे-पूरे मूड में हैं। उनका कहना है कि मल्लाह और निषाद समाज में उनकी भारी पैठ है। बिहार की सियासत में निषाद और मल्लाह भी एक बड़ा वोट बैंक है और सहनी उन्हीं को लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। VIP के रुख से महागठबंधन के अन्य घटक दलों में भी असमंजस की स्थिति है। कांग्रेस और वाम दल पहले ही अपने हिस्से को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। अब VIP का बिफरना गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘सन ऑफ मल्लाह’ अपने लिए मनचाही सीटें हासिल करते हैं या एक बार फिर ‘VIP’ पार्टी की किस्मत की नाव किसी नए किनारे लगती है।

महागठबंधन पर दबाव बनाने की सहनी की रणनीति
हालांकि मुकेश सहनी के इस रुख को महागठबंधन पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि सहनी अपनी दो प्रमुख मांगों पर अड़े हुए थे, जिसके कारण सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा अटकी हुई है।
1. 25 सीटों की मांग: वीआईपी प्रमुख महागठबंधन में अपने कोटे के लिए 25 विधानसभा सीटों की मांग पर मजबूती से खड़े थे, जिसे RJD और अन्य सहयोगियों द्वारा अत्यधिक माना जा रहा था।
2. उपमुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी: सहनी की दूसरी बड़ी जिद यह थी कि उन्हें महागठबंधन की ओर से उपमुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया जाए।
सूत्रों का कहना है कि उप मुख्यमंत्री पद पर तो महागठबंधन में सहमति बन सकती है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर मामला अटका हुआ है। नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाने के बावजूद भी सीट बंटवारे की घोषणा न होने से महागठबंधन में पहले से ही तनाव था, और अब मुकेश सहनी का ‘नॉट रिचेबल’ हो जाना गठबंधन की एकता के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि सीटों पर देरी से उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर बुरा असर पड़ रहा है।

लालू और तेजस्वी पर आंखे तरेरने लगी है कांग्रेस

उधर कांग्रेस भी महागठबंधन की कमजोर कड़ी होने के बावजूद लालू-तेजस्वी पर आंखे तरेर रही है। आलाकमान की शह पर कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव को भी भाव नहीं दे रहे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना पहुंच चुके हैं। लेकिन उन्होंने जानबूझकर लालू और तेजस्वी से मुलाकात नहीं की। इससे महागठबंधन पर महा-संकट आने के आसार नजर आने लगे हैं। यदि दो-तीन दिन में सियासी पेच ना सुलझा तो दरार और बढ़ सकती है। दूसरी ओर पहली बार चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर भी विवादों में घिर गए हैं। उनकी जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही पीके पर पैसे लेकर सीटें बांटने के आरोप लगाए हैं। ऐन चुनाव से पहले ऐसी पोल खुलने के बीच मानहानि मामले में नोटिस ने पीके की टेंशन और बढ़ा दी है।

राहुल के पीछे लग तेजस्वी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी
दरअसल, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा के दौरान अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली थी। इस यात्रा में राहुल गांधी 17 दिनों तक बिहार में रहे। तेजस्वी ने ही राहुल को लीड करने का मौका दिया और वे पहली बार राहुल गांधी के पीछे-पीछे घूमे। तेजस्वी ने यात्रा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इससे बिहार में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस की कुछ सांसें चलने लगीं। राहुल गांधी को गुमान हो गया कि यह सब उनकी वजह से है। इसलिए इसके बाद से कांग्रेस अब आरजेडी को आंखे दिखाने लगी है। तेजस्वी के सीएम फेस पर भी एतराज जताने के बाद अब कांग्रेस ने सीट बंटवारा के लिए राजद को अल्टीमेट तक दे दिया है। यदि दो-तीन दिन में दोनों दलों में सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस अपनी पहली सूची जारी कर सकती है। कांग्रेस ने पहले 15 उम्मीदवारों की सूची बना ली है। यदि कांग्रेस आम सहमति के पहले लिस्ट जारी कर देती है तो महागठबंधन पर महा-संकट के बादल छा सकते हैं।

कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू-तेजस्वी को नहीं दे रहे भाव
कांग्रेस ने भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतकर सबसे कमजोर प्रदर्शन किया हो। इसके बावजूद वह अगले माह होने वाले चुनाव के लिए राजद की आंख में आंख मिला कर बात कर रही है। यही वजह है कि कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव और तेजस्वी को भी भाव नहीं दे रहे। हाइकमान के आदेश पर अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना आए। लेकिन उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी से मुलाकात करने की जरूरत ही नहीं समझी। भूपेश बघेल ने तो सीधे-सीधे तेजस्वी यादव को चुनौती ही दे डाली। उन्होंने कहा, तेजस्वी खुद को अपनी ओर से सीएम फेस बता रहे हैं, लेकिन सीएम का चेहरा उनकी पार्टी का हाईकमान घटक दलों की सहमति से तय करेगा।

महागठबंधन उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से चुनाव पर असर
चुनाव के लिए पहले चरण के नामांकन की शुरुआत 10 अक्टूबर से हो चुकी है। लेकिन 10 अक्टूबर तक महागठबंधन का सीट बंटवारा फाइनल नहीं हो सका है। संभावित प्रत्याशियों में इसको लेकर रोष है कि पिछली बार उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से तैयारी का समय नहीं मिला था। पहले चरण के चुनाव के नामांकन की अंतिम तारीख से एक दिन पहले प्रत्याशियों के नाम घोषित किये गये। कांग्रेस ने आंतरिक गुटबाजी और संभावित असंतोष से निपटने के लिए यह देरी की थी। लेकिन इस कोशिश में उम्मीदवारों को हड़बड़ी में आधी अधूरी तैयारी के साथ चुनाव में उतरना पड़ा। टिकट को लेकर भी असंतोष था। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता केके तिवारी ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर टिकट वितरण में धांधली का आरोप लगाया था। उन्होंने चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं की जांच कराये जाने की मांग की थी।

उत्तराखंड : मौलाना को नहीं कबूल UCC, क्योंकि मामू की बेटी को नहीं बना सकते बेगम: कहा- इस्लाम हमारी रगों में घुसा है, इसे हम नहीं छोड़ सकते…

                   UCC के बाद चचेरी-ममेरी बहन से निकाह नहीं हो सकता है (फोटो साभार: Grok AI)
उत्तराखंड के मौलाना समान नागरिक संहिता (UCC) कानून से नाखुश हैं। सगे रिश्तों में निकाह करने पर UCC में लगाई गई पाबंदी को लेकर मौलाना गुस्सा हैं। मौलानाओं का कहना है कि यह मुस्लिमों की हैसियत कम करने का प्रयास है। उन्होंने दावा किया है कि UCC उन पर लादा जा रहा है।

पत्रकार अदिति त्यागी से बातचीत करते हुए मौलानाओं ने यह बातें कही हैं। इसका वीडियो अब वायरल है। इस वीडियो में मौलाना कहता है, “UCC लागू करने से पहले उलेमा से राय ली गई थी, अलग जगह-जगह पर मीटिंग हुई थी। हमने इन बैठक में साफ़ कर दिया था कि इस्लाम हमारी रगों में घुसा है और इसे हम नहीं छोड़ सकते।”

आगे मौलाना ने कहा, “उसमे एक कानून बनाया है कि मामू की लड़की और फूफी की लड़की से निकाह नहीं कर सकते लेकिन हमारी शरीयत में इसकी इजाजत है। किसी ने अपनी बीवी को तलाक दिया है तो उसे (महिला) 3 महीने इद्दत करनी है, इसमें यह खत्म कर दिया गया है… यह शरीयत के भीतर दखल है। हम ये नहीं बर्दाश्त कर सकते।”

मौलाना ने कहा कि अगर राय ली गई तो मानी क्यों नहीं गई। मौलाना ने दावा किया UCC कानून उन पर लादा गया है और यही करना था तो राय लिए जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मौलाना ने दावा किया कि इस्लाम पूरा मजहब है और इसमें कोई शक नहीं बचा है।

उत्तराखंड में पास किए गए UCC कानून में शादी, तलाक और विरासत को लेकर कई नियम बनाए गए हैं। इनमें विशेष तौर पर शादी को लेकर स्पष्ट नियम हैं कि किस रिश्ते में शादी हो सकती है और किसके अंतर्गत शादी मानी नहीं जाएगी।

किन रिश्तों में नहीं हो सकता निकाह

UCC के अंतर्गत किन रिश्तों में निकाह को कानूनी रूप से निषिद्ध किया गया है, इसे आप नीचे दी गई सूची से समझ सकते हैं। ये सूची बताती है कि UCC लागू होने के बाद पुरुष किन महिलाओं और महिलाएँ किन पुरुषों से विवाह नहीं कर सकेंगी।
कोई भी पुरुष इन महिलाओं से विवाह नहीं कर सकेगाकोई भी महिला इन पुरुषों से विवाह नहीं कर सकेगी
बहनभाई
भांजीभांजा
भतीजीभतीजा
मांचाचा/ताऊ
मामीससुर
चाचीसाला/साडू
चचेरी बहनसौतेला भाई
फुफेरी बहनसौतेला भाई
मौसेरी बहनमौसेरा भाई
पत्नी की बहनपत्नी का भाई
सौतेली मांसौतेला पिता
सौतेली बहनसौतेला भाई
नानीदादा
सौतेली नानीसौतेला दादा
पत्नीपतिव्रता
सौतेली पत्नीसौतेला पतिव्रता
माता की बहनपत्नी का पिता (ससुर)
माता की सौतेली बहनसौतेला ससुर
दादीनाना
सौतेली दादीसौतेला नाना
पिता की सौतेली नानीसौतेला पतिव्रता (माता का सौतेला पतिव्रता)
नाती की नानीमाता का दादा
पिता की सौतेली पत्नीमाता का सौतेला दादा
पत्नी की सौतेली बहनसौतेला बेटा
पत्नी की पत्नीपोता
बहू (विधवा)बेटा का ससुर
नातिननाती
पोतीबेटी का ससुर
पोते की सौतेली बहूपोते का ससुर
बेटे की सासबेटी का ससुर
पत्नी की विधवासास का ससुर
बेटे की विधवाबेटी का ससुर
पत्नी की विधवानाती का ससुर
नाती की विधवानाना का नाना

 इन सभी रिश्तों में किए गए विवाह को UCC के अंतर्गत वैध रिश्ते नहीं माना जाएगा। गौरतलब है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत यह बंदिशें पहले से देश की बहुसंख्यक आबादी पर लागू थीं। अब यह उत्तराखंड के भीतर पूरी जनता पर और हर समुदाय पर लागू होंगी।

नव्वा (नौंवी) फेल आदमी हैं। क्रिकेट खेलने गए तो वहाँ पानी ढोते थे… प्रशांत किशोर ने बताई तेजस्वी यादव की ‘पहचान’

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर इन दिनों पदयात्रा पर हैं। इस दौरान वो लोगों के बीच जाकर उनसे बात करके उन्हें जात-पात से ऊपर उठकर वोट करने को कहते हैं। हाल में उन्होंने इसी क्रम में बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भी टिप्पणी की।

उन्होंने 16 नवंबर 2023 को बयान देते हुए कहा कि तेजस्वी यादव की पहचान क्या है? वो नव्वा (नौंवी) फेल आदमी हैं। क्रिकेट खेलने गए तो वहाँ पानी ढोते थे। कौन सा ऐसा बड़ा पराक्रम कर दिया। लालू के लड़के हैं इसलिए सब लोग जानते हैं।

नव्वा (नौंवी) फेल को वोट देने वाले शिक्षित भी किसी अशिक्षित से कम नहीं। चलो तेजस्वी नव्वा (नौंवी) फेल है, तो क्यों जनता ने उसे वोट दिया? क्या अशिक्षित शिक्षित पर राज करेगा? जब जनता ही ऐसे लोगों को अपना नेता मानेगी किसी को दोष देना व्यर्थ है? जेल जाने से पहले लालू यादव द्वारा अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री को बनाना बिहार के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं था, यानि जो मुख्यमंत्री शपथ तक न पढ़ सके, क्या मुख्यमंत्री पद का घोर अपमान नहीं था? जिस प्रदेश का मुख्यमंत्री ही अशिक्षित हो प्रदेश का क्या चलाएगा? 

पत्रकारों से बात करते हुए वह बोले- इन लोगों को क्या मतलब है इन चीजों से। गया उलूल-जुलूल बकवास किया, लोगों को जाति धर्म में बाँटा… पैसा वसूल करके लोगों को धर्म में बाँटा। जाति के नाम पर लोग गरीबी में मजबूरी में वोट दे देते हैं। उसके बाद नेता बनकर ज्ञान दे रहा है।

प्रशांत किशोर ने तेजस्वी यादव के जीडीपी वाले बयान पर इतनी तल्ख प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अभी आपने कुछ दिन पहले देखा होगा कि महाज्ञानी उपमुख्यमंत्री ने कहा कि जीडीपी तो सबसे ज्यादा बिहार की है। प्रशांत किशोर बोले- “तेजस्वी को तो यही नहीं पता कि जीडीपी क्या है? बिना कागज देखे अगर वो इसकी परिभाषा बता दें तो हम ये काम छोड़कर तेजस्वी यादव का झंडा ले लेंगे। या बिना कागज देखे जीडीपी की फुल फॉर्म ही लिख दें तो हम मान जाएँगे।” इसके बाद उन्होंने तेजस्वी पर नौंवी फेल वाली टिप्पणी की।

प्रशांत किशोर का बयान आने के बाद शुक्रवार (17 नवंबर 2023) को लालू प्रसाद यादव की बेटी ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी और अपना गुस्सा जाहिर किया। रोहिणी आचार्य ने अपने ट्वीट में लिखा- “ये है कौन? इसको कोई पहचानता भी है। ये भी किसी को बाबू जी बना ले, ताकि किसी का राजनीतिक वारिस बन सके। ये जो कह रहा है वो अपना बाप अपनी दुकानदारी एवं अपने फायदे के हिसाब से समय-समय पर बदलते रहता है।”

रोहिणी आगे लिखती हैं- “कभी मोदी-शाह इसके बाबू जी, कभी पवन वर्मा-नीतीश कुमार इसके बाबू जी। कभी राहुल गाँधी इसके बाबूजी, कभी अभिषेक बनर्जी इसके बाबूजी, कभी जगन रेड्डी इसके बाबूजी तो कभी स्टालिन इसके बाबूजी…अभी फिर से इसने सबसे पहले वालों को अपना बाप बना रखा है सिर्फ नाम नहीं उजागर कर पा रहा है। भाजपा की दलाली करता है इसलिए मीडिया की कृपा दृष्टि इस पर बना रहता है। वरना गली का कुत्ता भी इसको भाव ना दे और चला है तेजस्वी पर कीचड़ उछालने।”

तेजस्वी यादव के अलावा प्रशांत किशोर ने राहुल गाँधी पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा-राजीव गांधी के लड़के हैं राहुल गाँधी इसलिए वह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं।
आपके बाबू जी की पार्टी है तो कोई भी नेता बन जाएगा। बाबूजी की दुकान है तो कोई भी जाकर बैठ जाएगा और मालिक हो जाएगा। इसमें आपकी योग्यता क्या है?

G20 समिट के बाद बौखलाया चीन, कहा – भारत ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ा दिया, हमारे हितों को पहुँचा दिया नुकसान

                                      G20 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों से पस्त हुआ चीन,
भारत द्वारा जी20 के शिखर सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेजबानी की तारीफ पूरी दुनिया में हो रही है। लेकिन, चीन के एक थिंक-टैंक ने भारत पर G20 शिखर सम्मेलन का इस्तेमाल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करने का आरोप लगाया है। थिंक-टैंक ने कहा कि भारत ने शिखर सम्मेलन में अपने हितों के मुद्दों को उठाकर और चीन विरोधी कामों को अंजाम देकर चीन के साथ धोखा किया है।

इस थिंक-टैंक का कहना है कि भारत ने विवादित क्षेत्रों (कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश) में जी-20 की बैठकों का आयोजन करके उन क्षेत्रों पर अपने कब्जे की मान्यता लेने की कोशिश की है।

चीन को हुई तकलीफ की मुख्य वजह

G-20 सम्मेलन के पहले दिन भारत ने इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर का ऐलान किया। इस प्रोजेक्ट में मध्य पूर्व और यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका भी अहम साझीदार है। इस कॉरिडोर को चीन के BRI (बेल्ट एन्ड रोड) के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। पीएम मोदी ने कहा कि आने वाले समय में भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच आर्थिक एकीकरण का प्रभावी माध्यम होगा। यह पूरे विश्व में कनेक्टिविटी और विकास को सस्टेनेबल दिशा प्रदान करेगा।
इस बात से चीन को इतनी मिर्ची लगी है कि वो बौखला गया है। चीनी सरकार भले ही सीधे तौर पर कुछ नहीं बोल रही हो, लेकिन वो अपने कथित थिंक-टैंक्स के माध्यम से भारत को धमकाने की कोशिश कर रही है।

अपना एजेंडा बढ़ा रहा भारत : चीनी थिंक-टैंक

‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट के मुताबिक, चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेम्परेरी इंटरनेशनल रिलेशंस नाम के एक थिंक-टैंक ने अपने लेख में कहा कि भारत ने “जी20 के मंच का इस्तेमाल अपने स्वयं के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया है, जो वैश्विक मुद्दों पर सहयोग की बजाय विभाजन को बढ़ावा देने के लिए है।” थिंक-टैंक ने कहा कि चीन विरोधी मुद्दों को उठाकर भारत ने “जी20 की एकता को तोड़ा और चीन के हितों को नुकसान पहुँचाया।”

अपने मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा चीन!

थिंक-टैंक का लेख स्पष्ट रूप से राजनीतिक विचारों से प्रेरित है। चीन अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड और दक्षिण चीन सागर में आक्रामक व्यवहार के लिए बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है। भारत पर G20 को कमजोर करने का आरोप लगाकर, चीनी सरकार अपने स्वयं के मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है।
वैसे, लेख तथ्यात्मक रूप से भी गलत है। उदाहरण के लिए, यह दावा करता है कि भारत “चीन की कीमत पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।” हालाँकि, उसने अपने इन दावों के समर्थन में कोई सबूत नहीं रखा है।

इस चीनी थिंक टैंक के दावों के उलट भारत ने जी20 शिखर सम्मेलन में निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया:

1-जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैश्विक कार्रवाई को बढ़ावा देना
2-वैश्विक आर्थिक विकास को बढ़ावा देना
3-आतंकवाद और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों के खिलाफ वैश्विक सहयोग को मजबूत करना
4-अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना
5-स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सामाजिक सेवाओं में निवेश को बढ़ावा देना

भारत जी-20 का जिम्मेदार सदस्य

G20 शिखर सम्मेलन ने भारत की वैश्विक नेतृत्व की स्थिति को मजबूत किया है। भारत हमेशा से जी20 का एक जिम्मेदार सदस्य रहा है और उसने हमेशा वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया है। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है और वह चीनी आक्रामकता का विरोध करेगा।

राजस्थान : कांग्रेस को अब ‘भारत माता की जय’ से भी चिढ़, जयपुर बैठक में चले लात-घूँसे

भारत माता की जय के नारों से नाराज हुई कांग्रेस पर्यवेक्षक आराधना मिश्रा (फोटो साभार: X/ @KumariDiya)
कांग्रेस ने विपक्षी दलों का जो गुट बनाया है उसका नाम INDIA रखा है। लेकिन, उसके खुद के नेता हों या सहयोगी दल के, उनकी ​भारत और हिंदू घृणा बाहर आ ही जाती है। एक ओर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि सनातन धर्म को खत्म करने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता आराधना मिश्रा ‘भारत माता की जय’ से भड़क गईं।

भारत माता के जयकारे राजस्थान के जयपुर में आदर्श नगर ब्लॉक कांग्रेस की 4 सितंबर 2023 को हुई बैठक में लगे। लेकिन आराधना मिश्रा इससे नाराज हो गईं। उन्होंने इसे अनुशासनहीनता बताया। कहा कि नारे लगाने तो कांग्रेस जिंदाबाद कहो। इस बैठक में कांग्रेसियों के बीच आपस में ही लात-घूँसे भी चले।

राजस्थान में इसी साल चुनाव होने हैं। आराधना मिश्रा बतौर पर्यवेक्षक बैठक में मौजूद थीं। उन्हें मोना तिवारी के नाम से भी जाना जाता है। वे उत्तर प्रदेश की रामपुर खास से कांग्रेस की विधायक हैं। उनके पिता वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी हैं। तिवारी राज्यसभा के लिए राजस्थान से ही चुने गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को जयपुर के आदर्श नगर ब्लॉक के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मीटिंग बुलाई गई थी। मीटिंग में कांग्रेस पर्यवेक्षक आराधना मिश्रा और जिलाध्यक्ष आर आर तिवारी भी मौजूद थे। कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान गुलाम मुस्तफा को ब्लॉक अध्यक्ष बनाए जाने का कांग्रेस नेता अफजल ने विरोध किया। उन्होंने गुलाम मुस्तफा को पूर्व भाजपाई बताया। इसके बाद दोनों पक्षों में तनातनी हो गई।

दोनों पक्षों में लात-घूँसे चलने की भी खबर है। मारपीट में घायल कार्यकर्ताओं ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस ने कांग्रेस नेता गुलाम मुस्तफा सहित 4 लोगों पर FIR दर्ज की है। चोटिल लोगों की तरफ से ब्लॉक अध्यक्ष गुलाम मुस्तफा व उनके 3 साथियों के खिलाफ केस दर्ज करववया गया है। इस पूरे विवाद के पीछे आदर्श नगर के कॉन्ग्रेस विधायक रफीक खान के समर्थकों और विरोधियों का मनमुटाव बताया जा रहा है। फ़िलहाल पुलिस पूरे मामले की जाँच कर रही है।

बताया जा रहा है कि इसी बवाल के बीच कुछ कार्यकर्ताओं ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। इससे आराधना मिश्रा भड़क गईं। कार्यकर्ताओं से केवल कांग्रेस जिंदाबाद के नारे लगाने को कहा।

राजस्थान के राजसमंद से भाजपा सांसद दिया कुमारी ने इस हंगामे का वीडियो शेयर किया है। उन्होंने लिखा है, “देश का अपमान करना कांग्रेस की आदत बन चुकी है। जयपुर में भारत माता के जयकारे लगाने को कांग्रेस पर्यवेक्षक आराधना मिश्रा अनुशासनहीनता बता रही हैं। मैं, मेरा और अहंकार समाहित घमंडिया कांग्रेस का असली चेहरा सामने आ चुका है।”

जज साहब और मोदी विरोधियों को मणिपुर मामले में ही गुस्सा क्यों आया? बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली के मामलों में गुस्सा क्यों नहीं आता! देखिए वीडियोस

                                                                                                   साभार 
हिन्दुओं की श्रीमद्भागवत गीता में लिखा है "विनाश काले, विपरीत बुद्धि" जो विपक्षियों से लेकर कोर्ट तक स्पष्ट दिखाई दे रहा है, अब अगर कोई नास्तिक न माने तो सामने वाले कसूर नहीं। विपक्ष ने मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने से पहले ठंठे दिमाग से काम लेते, लेकिन लगता है विपक्ष के दिमाग नाम की कोई चीज़ नहीं। चुपचाप मणिपुर पर चर्चा कर लेते, जो उनके लिए हितकारी था। परन्तु उनको तो स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारनी थी, किसी और का क्या दोष? जब अविश्वास पर चर्चा होगी, जो विपक्ष के लिए जरुरत से कहीं अधिक घातक होगी। शोर बहुत दूर तक जायेगा, जिसकी गूंज से 2024 तो क्या 2029 में भी नहीं बच पाएंगे। वीणा के तारों को छेड़ा है तो आनंद लो। ये अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार नहीं, नरेंद्र मोदी की सरकार है, जो चर्चा में विपक्ष की जन विरोधी, सनातन विरोधी और अन्य कई विरोधियों को उजागर न कर दे। 

मणिपुर किसने जलाया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को खराब करने और भारत को अस्थिर करने के लिए मणिपुर में फेक न्यूज फैलाया गया और उसके बाद दो समुदायों के बीच भड़की नफरत ने मणिपुर को हिंसा की आग में झोंक दिया गया। फेक न्यूज न फैले इसके लिए राज्य सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया और करीब-करीब हालात पर काबू पा लिया गया। लेकिन जिन ताकतों ने पीएम मोदी की छवि खराब करने का ठेका ले रखा है उन्हें राज्य में शांति बहाली गले से नहीं उतरी। फिर उन्होंने एक वीडियो वायरल कर दिया। इसी तरह की वीडियो और तस्वीरें बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली से भी आते रहे हैं। लेकिन मणिपुर मामले को लेकर जिस तरह जज साहब को गुस्सा आया और सक्रियता दिखाई वही सक्रियता और गुस्सा बंगाल और अन्य राज्यों में हो रही घटनाओं पर नहीं दिखाई दी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गैर बीजेपी शासित राज्यों को देखते समय उनका लेंस बदल जाता है? भारतवर्ष की हजारों बेटियां रेप और गैंगरेप की शिकार हैं। न्याय का इंतजार कर रही हैं लेकिन आपको इस पर गुस्सा क्यों नहीं आता जज साहब? क्यों बलात्कार के मामलों में जल्द सुनवाई कर न्याय सुनिश्चित नहीं किया जाता?

ब मैतेई मारे जा रहे थे तब वह चुप थे, कुकी मुद्दे पर जाग गए


मणिपुर में जब तक हिन्दू मैतेई आदिवासी मारे जा रहे थे, उनकी औरतों का रेप हो रहा था, उनके गांव जलाए जा रहे थे। करीब 50 हज़ार हिन्दू मैतेई आदिवासी पलायन कर गए, शरणार्थी शिविरों में जीवन बसर रह रहे हैं तब जज साहब आंख बंद करके सो रहे थे। तब जज साहब ये सब नहीं दिखाई दिया लेकिन जैसे ही ईसाई कुकी विद्रोहियों और कम्युनिस्ट मारे जाने लगे अचानक उनकी आंख खुल गई।

फेक न्यूज से फैली थी मणिपुर हिंसा

मणिपुर हिंसा की शुरुआत एक फेक न्यूज से हुई थी। मणिपुर में एक फोटो वायरल किया गया था, जिससे एक समुदाय इतना भड़क गया कि देखते ही देखते इस हिंसा की आग पूरे मणिपुर में फैल गई। मणिपुर में एक महिला के शव की तस्वीरें वायरल हुई थी। बताया गया था कि ये तस्वीर मैतेई समुदाय के एक महिला की है, जिसके साथ रेप की घटना को अंजाम दिया गया है। इसका आरोप कुकी समुदाय के लोगों पर लगाया गया था। इस फेक न्यूज के फैलते ही मैतेई समुदाय के लोगों में आक्रोश फूट पड़ा। इसके बाद 4 मई को हमलावर बड़ी संख्या में एक गांव में घुसे और हमला कर दिया।

सिर्फ मणिपुर क्यों, बंगाल-राजस्थान-झारखंड का दर्द क्यों नहीं दिखता?
बंगाल हिंसा के दौरान महिलाओं के साथ गैंगरेप की घटनाएं सामने आईं। कितने परिवार काल की भेंट चढ़ गए। राजस्थान में एक परिवार के कई लोगों को जिंदा जला दिया गया। तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान नहीं लिया। बीते दिनों बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। क्या बंगाल पंचायत चुनाव हिंसा पर उसे यह महसूस नहीं हुआ कि स्वत: संज्ञान लेना चाहिए जबकि मृतकों का यह आंकड़ा दिल्ली दंगों से भी ज्यादा है।

मणिपुर घटना पर गुस्सा तो झारखंड पर चुप्पी क्यों?
मणिपुर की घटना पर कोर्ट को गुस्सा आ रहा है तो झारखंड पर चुप्पी क्यों? झारखंड में एक महिला को निर्वस्त्र कर पूरे गांव में घुमाया गया और जूते-चप्पलों से पीटा गया।

राजस्थान में रेप की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं
मणिपुर में जो हुआ वो अमानवीय, शर्मनाक और अतिशीघ्र कठोरतम दण्ड लायक़ है। कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना भी ठीक है। पर यही कोर्ट राजस्थान जहां रोज़ रेप हो रहे हैं एक बार भी स्वतः संज्ञान नहीं लेता… क्यों? क्या राजस्थान की मां, बहन, बेटियां अलग है?

गुस्सा होने के बजाय सिस्टम में बदलाव क्यों नहीं करते?
जज साहब, आप गुस्सा होने के बजाय जल्दी फैसले सुनाने का प्रबंध क्यों नहीं करते? आप गुस्सा होने के बजाय कुछ ऐसा क्यों नहीं करते कि अदालत के चक्कर काटते हुए आदमी की चप्पलें न घिसें? आप गुस्सा होने के बजाय आम आदमी को तारीख पर तारीख देने के सिस्टम में बदलाव क्यों नहीं करते?

गुस्सा होने के बजाय बलात्कारियों को फांसी पर लटकाएं
जज साहब, आप गुस्सा होने के बजाय बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने का आदेश क्यों नहीं देते? जज साहब, निर्भया के बलात्कारियों के बाद किसी भी अन्य बलात्कारी को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया ?

श्रद्धा के 35 टुकड़े हुए, तब गुस्सा नहीं आया
जज साहब आप गुस्सा हो रहे हैं न। जब दिल्ली में श्रद्धा के 35 टुकड़े कर दिए गए तब तो गुस्सा नहीं आया। दिल्ली की ही अदालत ने श्रद्धा के 35 टुकड़े करने वाले आफताब को फांसी पर लटकाने का फैसला देने के बजाय उसे गर्म कपड़े और किताबें देने का निर्देश दिया था। आपको तब तो गुस्सा नहीं आया था।

गुस्सा करने वाले जज साहब आपको याद है न ?
2021 में बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा में 7 हजार महिलाओं के साथ अत्याचार हुआ। फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने यह बात कही थी। लेकिन आप न तो गुस्सा हुए और न ही सजा सुनाई।

बंगाल चुनाव के बाद 60 साल की बुजुर्ग से हुआ गैंगरेप
बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद 60 साल बुजुर्ग महिला का उनके पोते के सामने घर में घुसकर गैंगरेप किया गया था। आपको गुस्सा क्यों नहीं आया? अगर आया तो अभी तक उन हैवानों को तारीख पर तारीख देने के बजाय फांसी की सजा क्यों नहीं सुनाई ?

बंगाल में 17 साल की नाबालिग किशोरी से गैंगरेप
बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद 17 साल की नाबालिग किशोरी को घर से घसीटकर जंगल ले जाया गया जहां उसके साथ 5 लोगों ने गैंगरेप किया, आपको गुस्सा क्यों नहीं आया? अगर गुस्सा आया तो अभी तक फांसी की सजा क्यों नहीं सुनाई ?

बंगाल में नाबालिग किशोरी के साथ जन्मदिन पार्टी में गैंगरेप


नादिया में नाबालिग किशोरी के साथ टीएमसी नेता के बेटे की जन्मदिन पार्टी में गैंगरेप किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई जिस पर ममता बनर्जी ने कहा कि ये तो लव अफेयर था। इस पर आपको गुस्सा क्यों नहीं आया जज साहब? अगर आया तो उन हैवानों को अभी तक फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया?

बंगाल के हावड़ा में महिला को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया
8 जुलाई को बंगाल के हावड़ा में TMC नेताओं ने एक महिला के कपड़े फाड़े, उसके शरीर को नोंचा और निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया। इस आपको गुस्सा क्यों नहीं आया?

साक्षी को साहिल ने चाकुओं से गोद दिया, आपको गुस्सा नहीं आया
दिल्ली में साक्षी को साहिल ने चाकुओं से गोदकर, पत्थर से कुचलकर मार डाला। क्या आपको इस पर गुस्सा नहीं आया जज साहब? अगर आया तो सारे प्रमाण सामने होने के बाद भी अभी तक साहिल को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया?

सर तन से जुदा पर आपको गुस्सा नहीं आया जज साहब?
कन्हैयालाल, उमेश कोल्हे, निशांक राठौर, प्रवीण नेत्तारू, शानू पांडेय की हत्या की हत्या हो गई। सर तन से जुदा पर आपको गुस्सा नहीं आया जज साहब? अगर आया तो सारे प्रमाण सामने होने के बाद भी इनके हैवानों को अभी तक फांसी क्यों नहीं दी गई?

अजमेर रेप कांड पर भी आपको गुस्सा नहीं आता
जज साहब, 90 के दशक में अजमेर रेप कांड हुआ था। 250 से ज्यादा बेटियों का रेप और गैंगरेप किया गया था। 30 साल बाद भी एक भी बलात्कारी को फांसी नहीं हुई है। क्या आपको इस पर गुस्सा नहीं आता जज साहब?

छत्तीसगढ़ में दलित युवकों ने किया निर्वस्त्र प्रदर्शन, आपको वो भी नहीं दिखा


छत्तीसगढ़ में फर्जी कास्ट सर्टिफिकेट के आधार करीब 267 लोग सरकारी पदों पर नौकरी कर रहे हैं। 3 साल पहले ही इन्हें बर्खास्त करने का आदेश जारी हुआ, लेकिन वे अब भी नौकरी कर रहे हैं और भूपेश बघेल सरकार इन पर कार्रवाई नहीं कर रही है। इसके विरोध में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सड़कों पर अनुसूचित जाति और जनजाति (एससी-एसटी) समूह के युवाओं ने निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया। आपको इस पर भी गुस्सा नहीं आया।

तीस्ता सीतलवाड़ के लिए रात में खुल गया सुप्रीम कोर्ट


जज साहब, तीस्ता सीतलवाड़ के लिए सुप्रीम कोर्ट रात में खुल गया। आम नागरिकों के लिए इतनी तत्परता से अदालत के द्वार कब खुलेंगे? गुजरात दंगे से जुड़े झूठे सबूत देने के मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने 1 जुलाई 2023 को तथाकथित सोशल एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ की नियमित जमानत खारिज कर दी और तुरंत उन्हें सरेंडर करने के लिए कहा। हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देने वाली सीतलवाड़ की याचिका 1 जुलाई 2023 को ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई और उस पर उसी दिन सुनवाई भी शुरू हो गई। जमानत देने पर दो जजों के बीच असहमति हो गई। इसके बाद उसी दिन मामले की सुनवाई के लिए तीन जजों की बेंच का गठन कर दिया गया। तीस्ता सीतलवाड़ की याचिका पर रात 9.15 बजे सुनवाई हुई और उन्हें यह कहते हुए जमानत दे दी गई कि एक हफ्ते के लिए जमानत देने से कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा। जज साहब, आम आदमी को समझाइए न आसमान कब टूटता है।

देश की अदालतों में 5 करोड़ मामले लंबित
जज साहब, देश की अदालतों में 5 करोड़ मामले लंबित हैं। इस पर आपको गुस्सा नहीं आता। देश में न्याय प्रणाली ठप्प पड़ी हुई है और अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 14 जुलाई 2023 को पांच करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। न्यायपालिका के सभी तीन स्तर जिला अदालतें, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मामलों के निपटारों की संख्या अपेक्षा से कम रहा है। 20 जुलाई 2023 को राज्यसभा में जानकारी दी गई कि देश की अलग-अलग अदालतों में लंबित मामले पांच करोड़ का आंकड़ा पार कर गए हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि 5.02 करोड़ से अधिक मामले अलग-अलदालतों में हैं। ये सभी मामले जिनमें सुप्रीम कोर्ट, 25 हाई कोर्ट और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट में 69 हजार से अधिक मामले पेंडिंग
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंटीग्रेटेड केस मैनेजमेंट से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 1 जुलाई 2023 तक सुप्रीम कोर्ट में 69,766 मामले लंबित हैं। वहीं राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) की बात करें तो 14 जुलाई 2023 तक हाईकोर्ट में 60 लाख 62 हजार 953 मामले लंबित हैं। इसके अलावा जिला और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की कुल संख्या 4 करोड़ 41 लाख 35 हजार 357 हैं। जज साहब, सुप्रीम कोर्ट में 69,766 मामले लंबित हैं, इस पर आपको गुस्सा नहीं आता। इस पर भी कभी गुस्सा निकालिए न। 

अवलोकन करें:-

जैसे आज मणिपुर के Video से विचलित है देश, वैसे ही कभी तस्वीरों से सन्न रह गया था अजमेर: चौगुने पैसे मे

‘घरों पर लेटर लगा बताते थे आज किसकी होगी हत्या’: अब ‘कश्मीर फाइल्स’ की वेब सीरीज, पीड़ित खुद बताए

जज साहब सेलेक्टिव मामलों पर गुस्सा होने का ठप्पा न लगवाएं
जज साहब, अगर आपको सच में गुस्सा आ रहा है न तो एक काम कीजिए। रेप के जिन मामलों में सीधे प्रमाण उपस्थित हैं, उनको तारीख पर तारीख देने के बजाय फैसला सुनाइए, बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाइए। जिस दिन नियमित अंतराल पर बलात्कारी फांसी पर झूलने लग जाएंगे, बहन-बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी, निर्वस्त्र कर उनकी परेड निकालने की हिम्मत कोई नहीं कर पाएगा। अगर ऐसा नहीं होगा तो लोग यही समझेंगे कि जज साहब को भी नेताओं की तरह सेलेक्टिव मामलों पर गुस्सा आता है।