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बंगाल में Khela HoBe: ममता के गुंडों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का फूटा गुस्सा; जागे रहे रात भर; CJI बोले- हमें पता है उपद्रवी कौन? बेशर्म INDI गठबंधन खामोश क्यों?

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने राज्य सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट, कोलकाता हाईकोर्ट और चुनाव आयोग बार-बार पश्चिम बंगाल सरकार को डांट-फटकार लगा रहे हैं। राज्य सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। अदालत और संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों के नाफरमानी सरकार की आदत बनती जा रही है। न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से लेकर अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने तक हर स्तर पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया। लेकिन विधानसभा चुनावों में हार को लेकर डरी ममता सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें नौ घंटे भूखे बंधक बनाकर रखा गया। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।

बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना

दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।  

सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी


सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।

कोर्ट रूम LIVE-सीजेआई सूर्यकांत ने ममता सरकार को जमकर लगाई फटकार 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से थे।
CJI: क्या आपने देखा है कि क्या हुआ है?
कपिल सिब्बल: मुझे एक रिपोर्ट (मालदा वाली) मिली है… मैंने इसे पढ़ा है।
मेनका गुरुस्वामी: ये एक गैरराजनीतिक विरोध प्रदर्शन था।
CJI: हम इसे राजनीतिक नहीं बनाना चाहते।
तुषार मेहता: यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है!
CJI: रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था। मुझे रात में मौखिक रूप से आदेश देने पड़े। खाना और पानी तक नहीं लेने दिया गया।
जस्टिस बागची: जिन व्यक्तियों को अब कानून-व्यवस्था सौंपी गई है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना होगा। कृपया पूछताछ करें… राज्य के ऐसे नेता हैं जिन्हें एक स्वर में बोलना चाहिए… हम यहां विशेष अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हैं।
गोपाल एस: हम सुरक्षा बढ़ाएंगे।
तुषार मेहता: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अब राज्य पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी।
जस्टिस बागची: हम इसे चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं।
गोपाल एस: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने अब सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने कहा है कि वे विरोध जारी रखेंगे।
पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल: हम सभी जानते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की रक्षा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग को विरोधी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए।
CJI: मिस्टर एडवोकेट जनरल, अब आप हमें मजबूर कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, आपके राज्य में आप में से हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हमने कभी इतना ध्रुवीकृत राज्य नहीं देखा। यहां तक कि अदालती आदेशों के पालन में भी राजनीति झलकती है। क्या आपको लगता है कि हमें नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? कम से कम मैं रात 2 बजे तक सब कुछ मॉनिटर कर रहा था!
‘अगर विरोध अराजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या यह उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर पहुंचें और देखें कि क्या हो रहा है? कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया। रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था।’

मालदा घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सात आदेश

  • CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। एजेंसी सीधे कोर्ट को रिपोर्ट देगी।
  • चीफ सेक्रेटरी, DGP, DM, SSP को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
  • सभी जिम्मेदार अधिकारियों को 6 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश।
  • चुनाव आयोग (ECI) को कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें।
  • जहां-जहां जज काम कर रहे हैं, वहां सुरक्षा बढ़ाएं।
  • जिस गेस्ट हाउस में जज रुके हैं, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
  • जहां SIR का काम चल रहा है, वहां एक बार में सिर्फ 5 लोगों को ही जाने की अनुमति होगी।
7 अधिकारी, 9 घंटे रहे बंधक, 6 पॉइंट में जानिए सारा मामला
  • 1. सुबह 10 बजे; प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में जुड़ते गए, विरोध प्रदर्शन किया। एक अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में इकठ्ठा होते गए। फिर वे BDO ऑफिस के करीब गए, यहां प्रदर्शन करने लगे।
    2. दोपहर 2 बजे; न्यायिक अधिकारी मालदा के BDO ऑफिस पहुंचे। दोपहर 2 बजे के करीब 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर मालदा के माताबारी स्थित BDO ऑफिस पहुंचे। ये सभी अधिकारी SIR प्रोसेस से जुड़ा काम देख रहे थे।
    3. शाम 6 बजे; वोटर लिस्ट में नाम कटने को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी बाहर जमा। इलेक्शन ऑब्जर्वर के ऑफिस पहुंचने की सूचना मिलते ही हजारों स्थानीय लोग बाहर जमा हो गए। उन्होंने SIR में नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन किया।
    4. शाम 7 बजे; प्रदर्शनकारियों की ऑफिस के अंदर जाने की मांग। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि वे अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना चाहते हैं। जिससे इनकार कर दिया गया।
    5. रात 11 बजे; पुलिस सुरक्षा में अधिकारी निकाले गए, गाड़ी रोकने की कोशिश। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।
    6. रात 12 बजे; न्यायिक अधिकारी की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, ईंट से हमला। जिस गाड़ी से न्यायिक अधिकारियों को बाहर निकाला गया। उस गाड़ी पर प्रदर्शनकारियों ने ईंट से हमला किया। गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए।
अब 4 पॉइंट में मालदा में वोटर लिस्ट में जुड़ा पूरा विवाद
  • 1. यह मामला क्या है? दस्तावेजों में गड़बड़ियां, काफी समय से अनुपस्थिति और तकनीकी त्रुटियों के चलते SIR के बाद मालदा सहित राज्य के कई सीमावर्ती जिलों में हजारों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। तभी से स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।
    2. यह कितने गांवों से जुड़ा है? मालदा जिले में 100 से ज्यादा गांवों की मतदाता सूची इस संशोधन से प्रभावित हुई है।
    3. SIR में हर गांव से कितने लोगों के नाम काटे गए? यह आंकड़ा प्रशासन ने जारी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न सूत्रों और ग्राम पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार शिलालमपुर कालियाचक-2 से 427 लोगों के नाम हटाए गए। कुछ अन्य गांवों में 50 से 200 तक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबर है। हालांकि जिन नामों को हटाया गया है, उनकी समीक्षा जारी है।
    4. नाम क्यों काटे गए?
    • दस्तावेजों में गड़बड़ी: SIR की सुनवाई के दौरान जमा किए गए दस्तावेजों को कई मामलों में ‘अप्रमाणित’ या ‘अपर्याप्त’ माना गया।
    • लंबे समय से अनुपस्थिति: कुछ मामलों में यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति उस पते पर स्थायी रूप से नहीं रहते (विशेषकर प्रवासी मजदूर)।
    • तकनीकी व प्रक्रियागत त्रुटियां: डिजिटल डाटाबेस अपडेट के दौरान एक ही व्यक्ति का नाम दो बार होना या जन्मतिथि में गलती जैसी वजहों से भी नाम हटे।
सीजेआई भड़के और कहा कि फिजूल की आपत्तियां ना उठाएं
इससे पपहले पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने ऐसी दलील दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए। टीएमस सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फिजूल की आपत्तियां न उठाएं यह सिर्फ ओरिएंटेशन है। दरअसल, टीएमसी सांसद ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन पर सवाल उठाया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब तक करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि हर दिन लगभग 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने पत्र में CJI को बताया कि सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग (ECI) ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं।
ममता ने ‘खेला होबे’ से किया इशारा, राज्य में डर का राज – भाजपा
राज्य के अंदर की बिगड़ी स्थिति को संभाल पाने में विफल रहने पर टीएमसी मालदा की घटना की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह पर डालने की बेशर्मी भी कर रही है। टीएमसी के मुताबिक शाह लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बार-बार विफल रहे। इससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरी ओर भाजपा ने कहा कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में डर का राज कायम कर रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर लिखा-‘मालदा के कालियाचक में हिंसक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए गए। आवाजाही ठप हो गई और सत्ता की जगह डर का राज छा गया। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले कहा था- खेला होबे। क्या उनका इशारा इसी ओर था?’ बता दें कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई थी। इसमें 7.04 करोड़ वोटर के नाम थे। लगभग 60 लाख नाम न्यायिक जांच के दायरे में रखे गए। इन्हें वोटर लिस्ट में रखने या हटाने पर फैसले के लिए 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम की टाइमलाइन
• 2 अप्रैल 2026: Supreme Court of India ने मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” बताया और राज्य के मुख्य सचिव, DGP, मालदा DM और SP को नोटिस जारी किया।
• 1 अप्रैल 2026: मालदा के कालियाचक में SIR मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी थीं, को दोपहर से रात तक BDO कार्यालय में घेरकर रखा गया। पुलिस और CAPF की मदद से देर रात अधिकारियों को निकाला गया।
• 31 मार्च 2026: Supreme Court of India ने कहा कि लगभग 60 लाख दावे और आपत्तियां SIR प्रक्रिया में आई हैं, जिनमें से 47.3 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। अदालत ने बाकी मामलों को 7 अप्रैल तक पूरा करने का निर्देश देने के साथ ही कहा की फालतू की आपत्तियां ना लगाएं।
• 30 मार्च 2026: TMC ने मांग की कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कारण सार्वजनिक किए जाएं और अपील की प्रक्रिया को जिला स्तर से नीचे BDO स्तर तक ले जाया जाए।
• 28 मार्च 2026: Election Commission of India ने SIR मामलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 24 जिलों में अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। बाद में Supreme Court of India ने इन ट्रिब्यूनलों को ताजा दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति भी दी।
• मार्च 2026 के दूसरे और तीसरे सप्ताह: Murshidabad, Malda, Nadia और सीमावर्ती जिलों में कथित रूप से मतदाता सूची से नाम कटने के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, धरना और राजनीतिक टकराव बढ़े।
10 मार्च 2026: Supreme Court of India ने SIR में लगे न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को फटकार लगाई और कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों की ईमानदारी पर संदेह करना उचित नहीं है।
• मार्च 2026 की शुरुआत: टीएमसी के लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। Murshidabad, Malda और सीमावर्ती जिलों में सबसे ज्यादा दावे और आपत्तियां दर्ज हुईं।
• 27 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने TMC की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक अधिकारियों को दिए जा रहे ECI के प्रशिक्षण मॉड्यूल पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी किसी दबाव में नहीं आएंगे।
• 26 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 530 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की। इन्हें विभिन्न जिलों में दावे, आपत्तियां और मतदाता सूची की जांच की जिम्मेदारी दी गई।
• 22 फरवरी 2026: SIR में “logical discrepancy” वाले मामलों की संख्या को लेकर नया विवाद सामने आया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कितने मामलों को न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा जाएगा।
• 20 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने Calcutta High Court को सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR कार्य में लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच “trust deficit” है।
• 17 फरवरी 2026: Election Commission of India ने राज्य सरकार को SIR में हुई कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और FIR दर्ज करने के निर्देशों के पालन के लिए अंतिम समयसीमा दी।
 16 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही, कर्तव्य में चूक और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
• 10 फरवरी 2026: Election Commission of India ने घोषणा की कि SIR से जुड़े दावे और आपत्तियों की सुनवाई 21 फरवरी तक पूरी होगी और अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
• 3 फरवरी 2026: Mamata Banerjee ने Supreme Court of India और चुनाव आयोग के सामने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि इसको लेकर वह कोई ठोस तथ्य नहीं दे पाईं।
• 12 जनवरी 2026: Mamata Banerjee ने Election Commission of India को अपना पांचवां पत्र भेजा और आरोप लगाया कि AI आधारित डिजिटाइजेशन और सॉफ्टवेयर त्रुटियों की वजह से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिह्नित किए जा रहे हैं।
• जनवरी 2026 के पहले सप्ताह: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेज जांच का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। सीमावर्ती जिलों, विशेषकर Murshidabad, Malda और Nadia में शुरुआत से ही सबसे ज्यादा विवाद सामने आए।

नुपूर शर्मा के समय के लाडले, रोहिंग्या घुसपैठियों की बात आई तो हो गए विलेन: CJI सूर्यकांत के खिलाफ वामपंथियों का ओपन लेटर दोगलई का अप्रतिम नमूना

                     रोहिंग्या मुस्लिम और CJI सूर्यकांत (फाइल फोटो, साभार- UNCHR/Bar&bench)
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने 2 दिसंबर 2025 को रोहिंग्या शरणार्थियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने रोहिंग्याओं को ‘अवैध घुसपैठिए’ करार देते हुए कहा कि क्या देश में सीमा तोड़कर घुसने वालों को ‘रेड कार्पेट वेलकम’ देना चाहिए?

यह टिप्पणी रोहिंग्या हेबियस कॉर्पस याचिका पर आई, जिसमें 5 रोहिंग्या हिरासत में लापता होने का मामला उठाया गया था और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सरकार ने उन्हें शरणार्थी घोषित नहीं किया है, तो उन्हें रखने का कोई दायित्व नहीं है और अवैध प्रवेश करने वालों को भोजन, आश्रय या शिक्षा का अधिकार नहीं मिल सकता।​

पूर्व जजों और वकीलों की आपत्ति

पूर्व जजों, वकीलों और कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने 4-5 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत को खुला पत्र लिखा, जिसमें टिप्पणियों को ‘अनकॉन्शिएनेबल’ और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध बताया।

पत्र में कहा गया कि रोहिंग्याओं को ‘टनल खोदकर घुसने वाले घुसपैठिए बताना उनके मानवीय अधिकारों का अपमान है। उन्होंने अनुच्छेद 21 का हवाला दिया जिसके तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को सभी को प्रदान करता है, भले ही वे विदेशी हों।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने ये भी कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ न्यायिक पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और गरीबी का हवाला देकर शरणार्थियों के अधिकारों को नकारना खतरनाक मिसाल है।​

रोहिंग्याओं के समर्थक

भारत में रोहिंग्याओं के लिए वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के साथ कुछ एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और कुछ सिविल सोसाइटी संगठन काम करते हैं। ये रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (आरओएचआरइनग्या) जैसे संगठने के तले उन्हें शिक्षा, राहत और कानूनी सहायता देने तक की पैरवी करते हैं।

यूएनएचसीआर, एमनेस्टी इंटरनेशनल और रिफ्यूजी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानते हैं और भारत में उनके हिरासत और निर्वासन का विरोध करते हैं।

वामपंथी समूह रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानते हैं और भारत की निर्वासन नीति को मोदी सरकार का ‘इस्लामोफोबिक’ रुख बताते हैं, जबकि राष्ट्रवादी इसे अवैध घुसपैठ से जोड़ते हैं। 2018 में गृह मंत्रालय द्वारा रोहिंग्या समर्थकों की सूची में पूर्व राजदूत, वकील, प्रोफेसर और संगठन जैसे वर्किंग ग्रुप ऑन अल्टरनेटिव स्ट्रैटजीज शामिल थे।​

रोहिंग्या संकट का इतिहास और भारत की नीति

रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय म्यांमार के रखाइन राज्य से है, जहाँ 2017 के बाद जातीय सफाए के कारण 40,000 से अधिक भारत पहुँचे, हालाँकि भारत उन्हें अवैध प्रवासी मानता है।

सरकार ने उन्हें निर्वासित करने की योजना बनाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई, लेकिन 2018 में कोर्ट ने निर्वासन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। भारत ने गैर-हस्तक्षेप सिद्धांत अपनाया है, लेकिन बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद रोहिंग्या विरोध बढ़ा।​

क्या है शरणार्थी होने की परिभाषा

भारत की विदेशी नागरिकों के लिए शरणार्थी होने का दावा करने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (2011, संशोधित 2019) अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मानी जाती है। इस प्रक्रिया में शरणार्थी को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे नस्ल, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता, जातीय पहचान, किसी सामाजिक समूह की सदस्यता या राजनीतिक विचारों के आधार पर उत्पीड़न का सच में डर हो। यह परिभाषा प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत की घरेलू नीतियों के बीच सामंजस्य को दर्शाती है।

पत्र में हस्ताक्षर करने वालों का कहना है कि भारत में लंबे समय से शरणार्थियों को प्रवासी (migrants) से अलग एक विशिष्ट श्रेणी के रूप में मान्यता देने की परंपरा रही है। देश ने पहले भी तिब्बतियों, श्रीलंकाई तमिलों और ऐतिहासिक रूप से 1970-71 में पूर्वी पाकिस्तान से उत्पीड़न के कारण भागकर आए लाखों लोगों को मानवीय संरक्षण प्रदान किया है।

नुपूर शर्मा मामले में वामपंथी प्रोपेगेंडा का दोहरा मापदंड

2022 में नुपूर शर्मा विवाद पर जस्टिस सूर्यकांत ने उन्हें ‘आग लगाने वाली जीभ’ कहा था, जिसे वामपंथी और उदारवादी समूहों ने जमकर सराहा था। लेकिन अब रोहिंग्या टिप्पणी पर वे इसी जस्टिस सूर्यकांत का विरोध कर रहे हैं।

नुपूर मामले में कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों को वामपंथियों ने मोदी सरकार पर हमले के रूप में इस्तेमाल किया। अब वही लोग सीजेआई की रोहिंग्या टिप्पणियों को ‘डीह्यूमनाइजिंग’ बता रहे हैं। यह दोगलापन सोशल मीडिया पर सामने आया, तो लोगों ने इसे हिपोक्रेसी करार दिया।