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बंगाल में Khela HoBe: ममता के गुंडों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का फूटा गुस्सा; जागे रहे रात भर; CJI बोले- हमें पता है उपद्रवी कौन? बेशर्म INDI गठबंधन खामोश क्यों?

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने राज्य सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट, कोलकाता हाईकोर्ट और चुनाव आयोग बार-बार पश्चिम बंगाल सरकार को डांट-फटकार लगा रहे हैं। राज्य सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। अदालत और संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों के नाफरमानी सरकार की आदत बनती जा रही है। न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से लेकर अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने तक हर स्तर पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया। लेकिन विधानसभा चुनावों में हार को लेकर डरी ममता सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें नौ घंटे भूखे बंधक बनाकर रखा गया। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।

बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना

दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।  

सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी


सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।

कोर्ट रूम LIVE-सीजेआई सूर्यकांत ने ममता सरकार को जमकर लगाई फटकार 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से थे।
CJI: क्या आपने देखा है कि क्या हुआ है?
कपिल सिब्बल: मुझे एक रिपोर्ट (मालदा वाली) मिली है… मैंने इसे पढ़ा है।
मेनका गुरुस्वामी: ये एक गैरराजनीतिक विरोध प्रदर्शन था।
CJI: हम इसे राजनीतिक नहीं बनाना चाहते।
तुषार मेहता: यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है!
CJI: रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था। मुझे रात में मौखिक रूप से आदेश देने पड़े। खाना और पानी तक नहीं लेने दिया गया।
जस्टिस बागची: जिन व्यक्तियों को अब कानून-व्यवस्था सौंपी गई है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना होगा। कृपया पूछताछ करें… राज्य के ऐसे नेता हैं जिन्हें एक स्वर में बोलना चाहिए… हम यहां विशेष अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हैं।
गोपाल एस: हम सुरक्षा बढ़ाएंगे।
तुषार मेहता: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अब राज्य पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी।
जस्टिस बागची: हम इसे चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं।
गोपाल एस: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने अब सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने कहा है कि वे विरोध जारी रखेंगे।
पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल: हम सभी जानते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की रक्षा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग को विरोधी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए।
CJI: मिस्टर एडवोकेट जनरल, अब आप हमें मजबूर कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, आपके राज्य में आप में से हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हमने कभी इतना ध्रुवीकृत राज्य नहीं देखा। यहां तक कि अदालती आदेशों के पालन में भी राजनीति झलकती है। क्या आपको लगता है कि हमें नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? कम से कम मैं रात 2 बजे तक सब कुछ मॉनिटर कर रहा था!
‘अगर विरोध अराजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या यह उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर पहुंचें और देखें कि क्या हो रहा है? कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया। रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था।’

मालदा घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सात आदेश

  • CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। एजेंसी सीधे कोर्ट को रिपोर्ट देगी।
  • चीफ सेक्रेटरी, DGP, DM, SSP को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
  • सभी जिम्मेदार अधिकारियों को 6 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश।
  • चुनाव आयोग (ECI) को कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें।
  • जहां-जहां जज काम कर रहे हैं, वहां सुरक्षा बढ़ाएं।
  • जिस गेस्ट हाउस में जज रुके हैं, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
  • जहां SIR का काम चल रहा है, वहां एक बार में सिर्फ 5 लोगों को ही जाने की अनुमति होगी।
7 अधिकारी, 9 घंटे रहे बंधक, 6 पॉइंट में जानिए सारा मामला
  • 1. सुबह 10 बजे; प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में जुड़ते गए, विरोध प्रदर्शन किया। एक अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में इकठ्ठा होते गए। फिर वे BDO ऑफिस के करीब गए, यहां प्रदर्शन करने लगे।
    2. दोपहर 2 बजे; न्यायिक अधिकारी मालदा के BDO ऑफिस पहुंचे। दोपहर 2 बजे के करीब 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर मालदा के माताबारी स्थित BDO ऑफिस पहुंचे। ये सभी अधिकारी SIR प्रोसेस से जुड़ा काम देख रहे थे।
    3. शाम 6 बजे; वोटर लिस्ट में नाम कटने को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी बाहर जमा। इलेक्शन ऑब्जर्वर के ऑफिस पहुंचने की सूचना मिलते ही हजारों स्थानीय लोग बाहर जमा हो गए। उन्होंने SIR में नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन किया।
    4. शाम 7 बजे; प्रदर्शनकारियों की ऑफिस के अंदर जाने की मांग। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि वे अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना चाहते हैं। जिससे इनकार कर दिया गया।
    5. रात 11 बजे; पुलिस सुरक्षा में अधिकारी निकाले गए, गाड़ी रोकने की कोशिश। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।
    6. रात 12 बजे; न्यायिक अधिकारी की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, ईंट से हमला। जिस गाड़ी से न्यायिक अधिकारियों को बाहर निकाला गया। उस गाड़ी पर प्रदर्शनकारियों ने ईंट से हमला किया। गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए।
अब 4 पॉइंट में मालदा में वोटर लिस्ट में जुड़ा पूरा विवाद
  • 1. यह मामला क्या है? दस्तावेजों में गड़बड़ियां, काफी समय से अनुपस्थिति और तकनीकी त्रुटियों के चलते SIR के बाद मालदा सहित राज्य के कई सीमावर्ती जिलों में हजारों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। तभी से स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।
    2. यह कितने गांवों से जुड़ा है? मालदा जिले में 100 से ज्यादा गांवों की मतदाता सूची इस संशोधन से प्रभावित हुई है।
    3. SIR में हर गांव से कितने लोगों के नाम काटे गए? यह आंकड़ा प्रशासन ने जारी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न सूत्रों और ग्राम पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार शिलालमपुर कालियाचक-2 से 427 लोगों के नाम हटाए गए। कुछ अन्य गांवों में 50 से 200 तक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबर है। हालांकि जिन नामों को हटाया गया है, उनकी समीक्षा जारी है।
    4. नाम क्यों काटे गए?
    • दस्तावेजों में गड़बड़ी: SIR की सुनवाई के दौरान जमा किए गए दस्तावेजों को कई मामलों में ‘अप्रमाणित’ या ‘अपर्याप्त’ माना गया।
    • लंबे समय से अनुपस्थिति: कुछ मामलों में यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति उस पते पर स्थायी रूप से नहीं रहते (विशेषकर प्रवासी मजदूर)।
    • तकनीकी व प्रक्रियागत त्रुटियां: डिजिटल डाटाबेस अपडेट के दौरान एक ही व्यक्ति का नाम दो बार होना या जन्मतिथि में गलती जैसी वजहों से भी नाम हटे।
सीजेआई भड़के और कहा कि फिजूल की आपत्तियां ना उठाएं
इससे पपहले पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने ऐसी दलील दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए। टीएमस सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फिजूल की आपत्तियां न उठाएं यह सिर्फ ओरिएंटेशन है। दरअसल, टीएमसी सांसद ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन पर सवाल उठाया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब तक करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि हर दिन लगभग 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने पत्र में CJI को बताया कि सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग (ECI) ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं।
ममता ने ‘खेला होबे’ से किया इशारा, राज्य में डर का राज – भाजपा
राज्य के अंदर की बिगड़ी स्थिति को संभाल पाने में विफल रहने पर टीएमसी मालदा की घटना की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह पर डालने की बेशर्मी भी कर रही है। टीएमसी के मुताबिक शाह लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बार-बार विफल रहे। इससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरी ओर भाजपा ने कहा कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में डर का राज कायम कर रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर लिखा-‘मालदा के कालियाचक में हिंसक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए गए। आवाजाही ठप हो गई और सत्ता की जगह डर का राज छा गया। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले कहा था- खेला होबे। क्या उनका इशारा इसी ओर था?’ बता दें कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई थी। इसमें 7.04 करोड़ वोटर के नाम थे। लगभग 60 लाख नाम न्यायिक जांच के दायरे में रखे गए। इन्हें वोटर लिस्ट में रखने या हटाने पर फैसले के लिए 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम की टाइमलाइन
• 2 अप्रैल 2026: Supreme Court of India ने मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” बताया और राज्य के मुख्य सचिव, DGP, मालदा DM और SP को नोटिस जारी किया।
• 1 अप्रैल 2026: मालदा के कालियाचक में SIR मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी थीं, को दोपहर से रात तक BDO कार्यालय में घेरकर रखा गया। पुलिस और CAPF की मदद से देर रात अधिकारियों को निकाला गया।
• 31 मार्च 2026: Supreme Court of India ने कहा कि लगभग 60 लाख दावे और आपत्तियां SIR प्रक्रिया में आई हैं, जिनमें से 47.3 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। अदालत ने बाकी मामलों को 7 अप्रैल तक पूरा करने का निर्देश देने के साथ ही कहा की फालतू की आपत्तियां ना लगाएं।
• 30 मार्च 2026: TMC ने मांग की कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कारण सार्वजनिक किए जाएं और अपील की प्रक्रिया को जिला स्तर से नीचे BDO स्तर तक ले जाया जाए।
• 28 मार्च 2026: Election Commission of India ने SIR मामलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 24 जिलों में अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। बाद में Supreme Court of India ने इन ट्रिब्यूनलों को ताजा दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति भी दी।
• मार्च 2026 के दूसरे और तीसरे सप्ताह: Murshidabad, Malda, Nadia और सीमावर्ती जिलों में कथित रूप से मतदाता सूची से नाम कटने के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, धरना और राजनीतिक टकराव बढ़े।
10 मार्च 2026: Supreme Court of India ने SIR में लगे न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को फटकार लगाई और कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों की ईमानदारी पर संदेह करना उचित नहीं है।
• मार्च 2026 की शुरुआत: टीएमसी के लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। Murshidabad, Malda और सीमावर्ती जिलों में सबसे ज्यादा दावे और आपत्तियां दर्ज हुईं।
• 27 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने TMC की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक अधिकारियों को दिए जा रहे ECI के प्रशिक्षण मॉड्यूल पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी किसी दबाव में नहीं आएंगे।
• 26 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 530 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की। इन्हें विभिन्न जिलों में दावे, आपत्तियां और मतदाता सूची की जांच की जिम्मेदारी दी गई।
• 22 फरवरी 2026: SIR में “logical discrepancy” वाले मामलों की संख्या को लेकर नया विवाद सामने आया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कितने मामलों को न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा जाएगा।
• 20 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने Calcutta High Court को सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR कार्य में लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच “trust deficit” है।
• 17 फरवरी 2026: Election Commission of India ने राज्य सरकार को SIR में हुई कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और FIR दर्ज करने के निर्देशों के पालन के लिए अंतिम समयसीमा दी।
 16 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही, कर्तव्य में चूक और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
• 10 फरवरी 2026: Election Commission of India ने घोषणा की कि SIR से जुड़े दावे और आपत्तियों की सुनवाई 21 फरवरी तक पूरी होगी और अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
• 3 फरवरी 2026: Mamata Banerjee ने Supreme Court of India और चुनाव आयोग के सामने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि इसको लेकर वह कोई ठोस तथ्य नहीं दे पाईं।
• 12 जनवरी 2026: Mamata Banerjee ने Election Commission of India को अपना पांचवां पत्र भेजा और आरोप लगाया कि AI आधारित डिजिटाइजेशन और सॉफ्टवेयर त्रुटियों की वजह से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिह्नित किए जा रहे हैं।
• जनवरी 2026 के पहले सप्ताह: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेज जांच का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। सीमावर्ती जिलों, विशेषकर Murshidabad, Malda और Nadia में शुरुआत से ही सबसे ज्यादा विवाद सामने आए।

मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही दिन मार दिए चौक्के छक्के: ऐसे लोग सेना में रहने लायक नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश से इनकार करने वाले ईसाई सैनिक की बर्खास्तगी रखी बरकरार, कहा- यह अनुशासनहीनता है


     
मुख्य न्यायधीश सूर्यकान्त ने पहले ही दिन 17 केसों कर क्या लम्बित मुकदमों को जल्दी निपटाने का संकेत है? दूसरे, यह कहना कि इमरजेंसी केस में ही किसी मुक़दमे की तुरन्त सुनवाई होने की बात कहकर शायद दलाल वकीलों पर कुठाराघात किया है। रजिस्ट्रार को भी लगता है सख्त इशारा दे दिया है। चर्चा है कि मुख्य न्यायधीश सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट की हो रही बदनामी को बचाने सख्त कदम उठा रहे हैं। यह भी उम्मीद की जा रही है कि जमानत पर खुले घूम रहे नेताओं की जमानत पर भी कुछ सख्त कदम उठाने पर विचार चल रहा है। देखते हैं भविष्य के गर्भ में क्या है? 
भारतीय सेना में अनुशासन और एकता को सबसे ऊपर रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (24 नवंबर 2025) को लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने धार्मिक परेड में शामिल होने से इनकार करने पर की गई अपनी बर्खास्तगी को गलत बताया था।

कमलेसन एक ईसाई अधिकारी हैं और उन्होंने दावा किया था कि उन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए मजबूर किया गया जबकि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। उनकी ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि वह होली और दीपावाली जैसे कार्यक्रमों में हमेशा शामिल होते रहे हैं, बस उन्होंने अपने धार्मिक विश्वास के कारण मंदिर के सबसे अंदर वाले हिस्से में जाने से मना किया था।

कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सेना में इस प्रकार का व्यवहार ‘गंभीर अनुशासनहीनता’ माना जाएगा और केवल इसी कारण अधिकारी को नौकरी से हटाया जा सकता था।

 चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने नौकरी से बर्खास्त हुए सैमुअल कमलेसन को खारिज करते हुए कहा, ‘”वह कैसा संदेश दे रहे हैं? यह एक आर्मी ऑफिसर की बड़ी अनुशासनहीनता है। उसे नौकरी से निकाल देना चाहिए था। इस तरह के झगड़ालू लोग मिलिट्री में रहने के लायक हैं?”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक अधिकारी का कर्तव्य है कि वह अपने सैनिकों का नेतृत्व उदाहरण बनकर करे और यदि वह स्वयं पीछे हट जाए तो सैनिकों का मनोबल टूटता है। जस्टिस बागची ने यह भी बताया कि एक स्थानीय ईसाई पादरी ने साफ कहा था कि किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में प्रवेश करना ईसाई धर्म के खिलाफ नहीं है, इसलिए इसे जरूरी धार्मिक अधिकार नहीं कहा जा सकता।

संविधान का अनुच्छेद 25 केवल उन धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण देता है जो धर्म का मूल हिस्सा हों, न कि व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्याओं को। यह मामला 3rd कैवेलरी रेजिमेंट से जुड़ा है, जिसमें सिख, जाट और राजपूत स्क्वाड्रन होते हैं। कई बार समझाने के बावजूद कमलेसन ने अपनी व्यक्तिगत धारणा को आदेश से ऊपर रखा, जिससे यूनिट की एकजुटता पर असर पड़ा।

अंत में कोर्ट ने सजा कम करने का अनुरोध भी ठुकरा दिया और साफ कर दिया कि भारतीय सेना में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ एक-दूसरे के धर्म से अलग रहना नहीं बल्कि सबकी आस्था का सम्मान करते हुए साथ खड़े रहना है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह फैसला सेना में मजबूत संदेश देगा।

क्या था मामला?

यह मामला एक ईसाई सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन का है। उन्होंने अपनी रेजिमेंट के मंदिर में प्रवेश करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। इस कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और 5 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सुना गया था।

जूता कांड : ‘न झुकूँगा-न डरूँगा, खजुराहो जाकर अनशन करूँगा’: CJI पर जूता फेंकने वाले वकील बोले- भगवान ने 100 करोड़ लोगों में से मुझे चुना, Video

                               राकेश किशोर (बाएँ) और CJI गवई (दाएँ) (फोटो साभार- ANI/MInt)
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने भगवान विष्णु पर विवादित टिप्पणी कर जो फूस में चिंगारी छोड़ी है उसे शांत करने में कितने मुख्य न्यायाधीशों को झुलसना पड़ेगा यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर विवाद और नूपुर शर्मा केस से सोशल मीडिया पर एक बात बहुत गरमाई हुई है कि हिन्दुओं के संयम की अग्नि परीक्षा मत लो। "सिर तन से जुदा" नारे को समर्थन देने पर क्या कार्यवाही की? कन्हैया लाल के कातिलों को अब तक क्यों नहीं फांसी हुई? है सुप्रीम कोर्ट के पास कोई जवाब? बस सनातन के विरुद्ध सारे कानून और दलाल वकीलों की बहार आ जाती है?       

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को कार्यवाही के दौरान CJI पर जूता फेंकने के आरोपित वरिष्ठ वकील राकेश किशोर ने अब कहा, ”मैं बेहद गौरवान्विंत हूँ कि भगवान ने इसके काम के लिए 100 करोड़ हिंदुओं में से सिर्फ मुझे चुना, मैं न झुकूँगा न डरूँगा, भगवान विष्णु के लिए खजुराहो जाकर अनशन करूँगा। मेरी तैयारी पूरी है इसके लिए मुझे भगवान से आदेश प्राप्त हो गया है।“

घटना से बाद से ही हम आरोपित वकील का इंटरव्यू करने के प्रयास में थे लेकिन तीसरे दिन (गुरुवार 9 अक्टूबर) आरोपित वकील डॉ. राकेश किशोर से उनके मयूर विहार स्थित आवास पर मुलाकात हुई इससे पहले सोसायटी के गेट पर सुरक्षाकर्मी ने पूरी जाँच पड़ताल और वकील से बात कराने के बाद ही हमें अंदर जाने दिया।

दरवाजे पर घँटी बजाने पर बाहर आए वकील डॉ. राकेश किशोर ने जालीदार गेट के अंदर से पूरा परिचय और उद्देश्य जानने के बाद ही हमें अंदर बुलाया। इसके बाद उनकी पत्नी और वहाँ पहले से मौजूद एक उनके दोस्त ने हमारी पूरी पड़ताल के बाद ही कैमरे पर हमसे बात करने के लिए तैयार हुए।

हाल चाल पूछने पर वकील डॉ. राकेश किशोर अपनी जान पर खतरा बताते हुए कहते हैं कि कुछ लोग हमेशा सर तन से जुदा करने में दिलचस्पी रखते हैं। मुझ पर कभी भी अटैक हो सकता है मुझे लगातार धमकियाँ मिल रही हैं हो भी सकता है कि सनातन की आवाज हमेशा के लिए बंद हो जाए। मैंने डर के कारण बाहर जाना यहां तक कि बाहर टहलना भी बंद कर दिया है, लेकिन भगवान पर भरोसा रखते हुए एक शेर सुनाते हैं…

फानूस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे,

वो चिराग क्या बुझे जिसकी हिफाजत खुदा करे।।

आगे डॉ. किशोर कहते हैं कि भगवान के आदेश से मैं खजुराहो अनशन के लिए जा रहा हूँ तैयारी पूरी कर ली है। अपने भगवान विष्णु की प्रतिमा को फिर से स्थापित कराने के लिए मैं जान भी देने के लिए तैयार हूँ। इस जन्म में यह काम नहीं हुआ तो एक-दो जन्म लेकर करूँगा।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कथन-करनी में अंतर आ गया है। नुपूर शर्मा की जिंदगी आज तबाह हो गई है। वो अंडर ग्राउंड है। वो कहाँ है उसका परिवार कहाँ है किसी को नहीं पता ऐसी जिंदगी कौन जीना चाहेगा? ये सब एक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के कारण हुआ। कोर्ट ने नुपूर शर्मा को तो फटकार लगा दी, लेकिन जिन लोगों ने सर तन से जुदा की धमकी दी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। वो(नुपूर शर्मा) बेचारी मर-मर के जी रही है। उधर कन्हैयालाल की हत्या करके हत्यारों ने वीडियो बनाया, लेकिन उसके हत्यारे आज भी आजाद घूम रहे हैं।

इससे साफ है कि बात सनातन की कोर्ट में आती है तो जज साहब टिप्पणी करते हैं और बात जब सर तन से जुदा वालों की आती है तो चुप्पी साध लेते हैं। हिम्मत है तो दूसरे लोगों के लिए टिप्पणी करके देखिए, लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि इस देश में सनातन की आज ये जो हालत है वह इसलिए कि हम सनातन के अपमान पर आज तक चुप रहे और सिर्फ लेख लिखते रहे कभी कोई कदम नहीं उठाया।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा, “वो(मुस्लिम) गजवा ए हिंद की तैयारी कर रहे हैं। वह भारत को ईरान की तरह बनाना चाहते हैं। इसकी एक झलक मैंने अपनी आँखों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और झारखंड में देखी है। 1947 में मुस्लिम देशों की संख्या 10-12 थी लेकिन आज उनकी संख्या 57 हो गई है। ये अब देश के युवाओं की चिंता है कि अगर कल को भागना पड़े तो वह भारत से कहाँ जाएँगे?”

माफ करने पर CJI को नहीं कहूँगा शुक्रिया

‘जूता कांड’ के बाद CJI बीआर गवई द्वारा खुद को माफ करने पर डॉ. किशोर कहते हैं, “मैं उन्हें शुक्रिया अदा नहीं करूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे इसलिए माफ किया है कि वह नवंबर माह में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद वह मेरी तरह सामान्य वकील हो जाएँगे। जब मैं अपना केस लड़ते हुए इनसे कोर्ट में सवाल करूँगा तो वह मेरे सवालों का सामना नहीं कर पाएँगे। उन्हें पता है कि मैं एक ईमानदार हूँ और मैं इनकी(CJI) की कलई खोल सकता हूँ। हालाँकि मुझे फँसाने और गिरफ्तार किए जाने के लिए नए तरीके से प्रयास हो रहे हैं। मेरे खिलाफ कर्नाटक में भी मुकदमा लिखवाया गया है, लेकिन मैं इनसे डरने वाला नहीं हूँ। मैं गिरफ्तारी देने के लिए तैयार हूँ।”

भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई पर कोर्ट में फेंका जूता


सुप्रीम कोर्ट में सोमवार(अक्टूबर 6, 2025) को भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई पर जूता उछालने के मामले में आरोपी वकील के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री का बयान सामने आया है। उन्होंने पुलिस को हिरासत में लिए गए वकील के खिलाफ एक्शन नहीं लेने के निर्देश दिए है। 
 

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को CJI के डाइस के पास एक वकील ने उन पर जूता उछालने की कोशिश की है। हालांकि इस दौरान वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने आरोपी वकील को रोक लिया। इस दौरान आरोपी वकील सनातन सनातन धर्म का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान के नारे भी लगाए. अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री का बयान आया है।

 
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने पुलिस को आदेश देते हुए कहा कि आरोपी वकील के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। जिसके बाद माना जा रहा है कि पुलिस अब जल्द ही हिरासत में लिए गए आरोपी वकील को छोड़ देगी। वहीं इस पूरे मामले में भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई आरोपी वकील को पहले ही माफ कर चुके हैं। आरोपी वकील की पहचान राकेश किशोर के रूप में हुई है। दिल्ली पुलिस के दो डीसीपी उससे पूछताछ कर रहे हैं। 

CJI बोले- उन्हें फर्क नहीं पड़ता, उन्हें माफ करता हूं

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई एक मामले की सुनवाई कर रहे थे। इस दौरान ही एक वकील चीफ जस्टिस के पास पहुंच गया और अपना जूता निकालकर उनकी तरफ उछालने की कोशिश की। तभी वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने वकील को पकड़ लिया। इसके बाद वकील ने कोर्ट में नारेबाजी शुरू की दी है। इससे कुछ देर तक कोर्ट की कार्यवाही बाधित रही। वहीं इस घटना को लेकर चीफ जस्टिस ने उन्हें ऐसी घटनाओं से फर्क नहीं पड़ता है। मैं उन्हें माफ करता हूं।

अवलोकन करें:-

सुप्रीम कोर्ट की बेंच में CJI गवई एक बौद्ध और दूसरा जज अगस्टीन मसीह, एक ईसाई, फिर हिंदू भगवान विष्ण
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में CJI गवई एक बौद्ध और दूसरा जज अगस्टीन मसीह, एक ईसाई, फिर हिंदू भगवान विष्ण
 

क्या है पूरा मामला?

पूरा मामला खजुराहो के जवारी मंदिर से जुड़ा है। पिछले दिनों चीफ जस्टिस ने इस मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। इतना ही नहीं सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस अपने दिए गए बयानों को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनका विरोध शुरू हो गया था।

मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं

सोशल मीडिया पर विरोध होने के बाद चीफ जस्टिस बीआर गवई ने इस मामले में अपना पक्ष रखा था। उन्होंने कहा कि था कि ‘किसी ने मुझे बताया कि मैंने जो टिप्पणियां की थीं, उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल किया गया है. मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं।’

विजयादशमी पर CJI गवई की माँ ने दिखाई हिंदूघृणा, बताया सामाजिक चेतना को नुकसान पहुँचाने वाला त्योहार

     CJI बीआर गवई की माता ने RSS कार्यक्रम का निमंत्रण ठुकराते हुए पत्र लिखा ( फोटो साभार: NagpurToday)
महाराष्ट्र के अमरावती जिले में 5 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक कार्यक्रम होना है। यह कार्यक्रम विजयादशमी और संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई की माँ कमलताई गवई को भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।

लेकिन कमलताई गवई ने निमंत्रण ठुकरा दिया है। खुद को ‘आंबेडकरवादी’ बताते हुए हिंदू विरोधी भावनाओं का इजहार भी किया है। संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का दावा करने वाली मीडिया रिपोर्टों को खारिज करते हुए कमलताई गवई ने मराठी में एक पत्र लिखा है।

 पत्र में खुद को आंबेडकरवादी विचारधारा में ओत-प्रोत और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध बताया है। उन्होंने लिखा है कि वह किसी भी परिस्थिति में RSS के कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगी। साथ ही कहा है कि किसी हिंदू त्यौहार के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने से ‘सामाजिक चेतना को नुकसान’ होगा।

कमलताई गवई ने पत्र में लिखा है, “महाराष्ट्र के अमरावती स्थित श्रीमती नरसम्मा महाविद्यालय मैदान में 5 अक्टूबर को शाम 6:30 बजे होने वाले RSS के विजयादशमी कार्यक्रम में मेरे शामिल होने के बारे में हाल ही में प्रकाशित खबरें पूरी तरह से झूठी हैं। आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रेरित दादा साहेब गवई चैरिटेबल ट्रस्ट की संस्थापक अध्यक्ष और भारतीय संविधान के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता के कारण मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊँगी या उसका समर्थन करूँगी। विश्वास दिलाती हूँ कि मैं किसी भी तरह से सामाजिक चेतना को कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।”

कमलताई गवई ने कहा है कि विजयादशमी का हिंदू संस्कृति में महत्व है। लेकिन उनके जैसे बौद्धों के लिए ‘अशोक विजयादशमी’ या मौर्य सम्राट अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाने और हिंसा का त्याग करना स्मरणोत्सव है। हालाँकि, यह उल्लेख करना जरूरी है कि इतिहासकारों का एक वर्ग और यहाँ तक कि पुरातात्विक साक्ष्य भी संकेत देते हैं कि अशोक का बौद्ध धर्म में परिवर्तन कलिंग युद्ध से पहले का है।

कमलताई गवई ने मीडिया में आई उन खबरों की कड़ी निंदा की और उन्हें ‘RSS का प्रोपेगेंडा’ बताया। जबकि ज्यादातर रिपोर्ट्स में सिर्फ इतना कहा गया था कि RSS ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की माता को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित किया है, न कि उन्होंने उसमें शामिल होने की सहमति दी है।

उन्होंने कहा, “मैं महाराष्ट्र और पूरे भारत के लोगों से अपील करती हूँ कि इस बात पर ध्यान दें। विजयादशमी हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण है लेकिन हमारे लिए धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस है, जिसे अशोक विजयादशमी भी कहा जाता है, जो कि सबसे ज्यादा मायने रखता है। मैं हाल ही में प्रकाशित खबरों को गलत जानकारी मानती हूँ और लोगों से आग्रह करती हूँ कि ऐसे सामाजिक दृष्टिकोण से भटकाने वाले प्रोपेगेंडा का शिकार न हों। मैं अपने सभी आंबेडकरवादी साथियों से कहती हूँ कि इस बात को समझें और मुझ पर भरोसा रखें। मेरी अनुमति या लिखित सहमति के बिना इस खबर को फैलाना RSS की साजिश है। मैं इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं करती।”

कमलताई के दूसरे बेटे ने RSS कार्यक्रम में जाने का किया दावा

हालाँकि, कमलताई की तीखी प्रतिक्रिया के तुरंत बाद उनके दूसरे बेटे ने दावा किया कि वह RSS के कार्यक्रम में शामिल होंगी। रिपब्लिकन पार्टी के नेता और कमलताई के बेटे डॉ. राजेंद्र गवई ने एक वीडियो जारी कर कहा कि कमलताई RSS के कार्यक्रम में जरूर शामिल होंगी और उन्होंने खुद भी निमंत्रण स्वीकार कर लिया है।

दिवंगत पूर्व राज्यपाल आरएस गवई ने दीक्षाभूमि स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बेटे डॉ. राजेंद्र गवई वर्तमान में स्मारक समिति के सदस्य हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कमलताई गवई की शुरुआती प्रतिक्रिया कि वह RSS द्वारा आयोजित किसी भी कार्यक्रम या विजयादशमी जैसे हिंदू त्योहार मनाने वाले किसी भी कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होंगी- क्योंकि वह और उनका परिवार ‘आंबेडकरवादी विचारधारा’ और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं- मानो भारतीय संविधान बौद्धों या ‘आंबेडकरवादियों’ को RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने या हिंदू त्योहार मनाने से रोकता हो।

  1981 में RSS कार्यक्रम में शामिल आरएस गवई, साथ में भय्याजी सहस्रबुद्धे, बालासाहेब देवरस और बाबासाहेब पथाडे।

हालाँकि उनके दिवंगत पति रामकृष्ण सूर्यभान गवई, जिन्हें दादासाहेब गवई के नाम से भी जाना जाता है और जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के वरिष्ठ नेता थे। वे साल 1981 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।

आरएस गवई, बाबासाहेब अंबेडकर के करीबी सहयोगी थे और नागपुर स्थित दीक्षाभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष भी रहे। साल 1998 में वे रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर अमरावती लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद 2006 से 2011 तक, जब केंद्र में कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। उस वक्त वे बिहार, सिक्किम और केरल के राज्यपाल रहे।

साल 2009 में केरल के राज्यपाल रहते हुए आरएस गवई ने मुख्यमंत्री अच्युतानंदन की अगुवाई वाली राज्य कैबिनेट की सिफारिश को दरकिनार कर दिया और CBI को कम्युनिस्ट नेता और वर्तमान में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ SNC-लावालिन भ्रष्टाचार मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। उस समय केरल में कॉन्ग्रेस-UDF विपक्ष में थी। वहीं केंद्र की कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार ने राज्यपाल गवई के इस फैसले का स्वागत किया।

CJI भूषण रामकृष्ण गवई ने खुद बताया कि उनके पिता दादासाहेब गवई कॉन्ग्रेस पार्टी से 40 साल से भी ज्यादा समय तक जुड़े रहे। वे कॉन्ग्रेसस के समर्थन से सांसद और विधायक भी रहे। CJI गवई के भाई राजेंद्र गवई, जो रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं, वे भी कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए हैं।

इधर कमलताई गवई के पत्र ने विवाद खड़ा कर दिया। कुछ दिन पहले CJI बीआर गवई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु पर की गई टिप्पणी से देशभर में नाराजगी फैली। यह मामला 16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने आया, जिसकी अध्यक्षता CJI गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह कर रहे थे।

याचिकाकर्ता राकेश दलाल, जो भगवान विष्णु के भक्त हैं, ने अदालत में कहा कि मूर्ति की पुनर्स्थापना सिर्फ पुरातत्व का मामला नहीं है बल्कि यह आस्था, सम्मान और हिंदुओं के अपने देवी-देवताओं की संपूर्ण रूप में पूजा करने के मूल अधिकार से जुड़ा है।

लेकिन CJI गवई ने इस याचिका को खारिज करते हुए हिंदू आस्था को लेकर कुछ अनावश्यक और तंज भरी बातें कह दीं। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका है। जाओ, अब खुद भगवान से कहो कि कुछ करें। तुम कहते हो कि भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो तो जाओ और प्रार्थना करो।”

‘CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को लगाई लताड़, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI के ‘एक्शन’ पर उठा रहे थे सवाल

                           कपिल सिब्बल को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार ( फोटो साभार: Bar and Bench)
आज मोबाइल युग से चिट्ठी लिखने का युग था। जब मन अपने किसी भी रिश्तेदार या परिचित को पत्र लिख लेटर बॉक्स में डालने चले जाते/जाती, लेकिन पोस्टकार्ड आदि लेने के लिए डाकखाने में लम्बी लाइन में लगना पड़ता था। लेकिन कपिल सिबल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को ही पोस्टऑफिस बना डाला। और लोग समझते हैं कि देखो कितने बड़े वकील हैं। दरअसल अगर इनकी सेटिंग नहीं हो तो इनसे बढ़िया वकील तो किसी भी जिला कोर्ट का समझदार वकील होता है। अगर इस वकील गैंग की सेटिंग नहीं हो, हर केस जीत नहीं सकते। यशवंत वर्मा के घर मिले/जले नोट बहुत कुछ चीख-चीखकर कह रहा है। जाँच तो उन जजों की भी होने चाहिए जिन्होंने देर रात सीतलवार और आतंकियों के लिए अदालत खोली।      
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को फटकार लगाई। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि CJI को पोस्ट ऑफिस मत समिझए, जो सिर्फ फाइलें आगे बढ़ाते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया है।

30 जुलाई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “भारत के CJI का काम केवल पोस्ट ऑफिस की तरह चिट्ठी भेजना नहीं है। अगर उनके पास किसी जज के गलत आचरण का सबूत है तो वे उसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करना उनका अधिकार है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ जस्टिस यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। जिसमें उन्होंने आंतरिक जाँच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में CJI संजीव खन्ना की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश की गई थी। सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने की।

इस दौरान कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इन-हाउस कमेटी के जज की बर्खास्तगी की सिफारिश करना गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 124 के तहत ही महाभियोग प्रक्रिया हो सकती है। सिब्बल ने कहा कि ऐसा करके CJI संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं, यह ‘अस्वीकार्य’ है। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लताड़ लगाई।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा के रवैए पर भी प्रश्न उठाए। कोर्ट ने कहा, “आप जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं लेकिन पहले भी उठाए जा सकते थे, इसलिए आपका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता और आपका आचरण बहुत कुछ कहता है। आप नहीं चाहते कि यहाँ कुछ भी उजागर हो। संसद को फैसला करने दीजिए। हम यह क्यों तय करें कि यह आपका पैसा है या नहीं? यह आंतरिक समिति का काम नहीं था।”

साथ ही जस्टिस दत्ता ने इन-हाउस रिपोर्ट पर कहा कि यह केवल शुरुआती जाँच का निष्कर्ष है और CJI की सिफारिश केवल एक ‘सलाह’ है। कोर्ट ने कहा कि निष्कासन केवल संसद की प्रक्रिया के अनुसार हो सकता है, इन-हाउस रिपोर्ट के अनुसार बिल्कुल भी नहीं हो सकता।

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही अपने किसी वरिष्ठ को सूचना दी थी।

दुबे ने एक और धागा खोल दिया: कांग्रेस ने एक ऐसे व्यक्ति को CJI बना दिया, जिनके पास कानून की डिग्री भी नहीं थी

निशिकांत दुबे ने रहस्योघाटन कर विपक्ष, कांग्रेस और सुप्रीम कोर्ट की रातों की नींद ही हराम कर दी है। बिना लॉ की डिग्री के बिना सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाना तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट जजों और सरकार ने न्यायपालिका का मजाक बना दिया था।  
न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को लेकर जारी बहस के बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने एक और बड़ा खुलासा किया है। कांग्रेस राज के काले कारनामे को सामने लाते हुए उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ‘क्या आपको पता है कि 1967-68 में भारत के मुख्य न्यायाधीश कैलाशनाथ वांचू जी ने क़ानून की कोई पढ़ाई नहीं की थी।’

इसके साथ ही बीजेनी नेता दुबे कांग्रेस काल के एक और काले कारनामे का खुलासा करते हुए लिखा कि ‘कांग्रेस के संविधान बचाओ की एक मजेदार कहानी,असम में बहरुल इस्लाम साहिब ने कांग्रेस की सदस्यता 1951 में ली,तुष्टिकरण के नाम पर कांग्रेस ने उन्हें 1962 में राज्यसभा का सदस्य बना दिया,छह साल बाद दुबारा 1968 में राज्य सभा का सदस्य सेवाभाव के लिए बनाया,इनसे बड़ा चमचा कॉग्रेस को नज़र नहीं आया राज्यसभा से बिना इस्तीफ़ा दिलाए हाईकोर्ट का जज 1972 में बना दिया,फिर 1979 में असम हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बना दिया,बेचारे 1980 में रिटायर हो गए,लेकिन यह तो कांग्रेस है जनवरी 1980 में रिटायर हुए जज को दिसंबर 1980 में सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया,1977 में इंदिरा गांधी जी के उपर लगे सभी भ्रष्टाचार के केस इन्होंने तन्मयता से ख़त्म कर दिए ,फिर ख़ुश होकर कांग्रेस ने इन्हें 1983 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर कर कॉग्रेस से राज्यसभा का तीबारा सदस्य 1983 में ही बना दिया ।मैं कुछ नहीं बोलूँगा?’

निशिकांत दुबे की ओर से किए गए खुलासे के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में ये खबर सुर्खियों में है। वकालत की डिग्री ना होते हुए भी सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठाए जाने को लेकर लोग सवाल कर रहे हैं कि जब वांचू ने कानून की पढ़ाई नहीं की, तब उन्हें उच्च न्यायिक पदों पर कैसे नियुक्त किया गया। खुलासे के बाद संविधान बचाओ का नारा लगाने वाले कांग्रेसी नेता निशाने पर आ गए हैं। लोग सोशल मीडिया पर कांग्रेस पर तंज कस रहे हैं। आप भी देखिए सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है…

 

एक गैर कानूनी काम करने के बाद सुप्रीम कोर्ट का फिर एक और टेस्ट ; केजरीवाल की जेल से बाहर रहने की मनघडंत कहानी; डॉक्टर 3 लाख में बिक गया पुणे में साबित हुआ; केजरीवाल ने कितने में खरीदा?

सुभाष चन्द्र

जिस तरह एक साजिश के तहत केजरीवाल को जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अंतरिम जमानत दी थी बिना जमानत मांगे और सब नियमों को ताक पर रख कर, उसी वक्त लग रहा था कोई script लिखी गई है कि जेल वापसी से पहले केजरीवाल कोई नाटक करेगा और जेल से बाहर रहने की साजिश करेगा। 

केजरीवाल की नानी ने भागवत गीता का उपदेश नहीं बताया कि 'विनाश काल विपरीत बुद्धि' यानि जेल से जमानत लेने से पटकथा लिखनी शुरू हो गयी थी। सोने पर सुहागा 'शीश महल में मालीवाल कांड'।

 

केजरीवाल ने जो कहानी गढ़ी है उस पर कोई भी विश्वास नहीं कर सकता। केजरीवाल ने कहा है कि हिरासत में रहने के दौरान उसका 6-7 किलो वजन कम हुआ (इसे जेल अधीक्षक से प्रमाणित किया जाना चाहिए क्योंकि मुझे ध्यान पड़ता है इसका वजन शायद एक किलो कम हुआ था) और अचानक कम हुए वजन व सेहत संबंधी दिक्कतों को देखते हुए उसे पीइटी-सीटी स्कैन(PET CT scan) सहित कई जांच कराने की जरूरत है। उसने मैक्स हॉस्पिटल के डॉक्टर की सलाह सुप्रीम कोर्ट में जमा कराइ है। उसने यह भी कहा है कि डॉक्टर ने पूरे शरीर का  पीइटी-सीटी स्कैन कराने को कहा है जिससे किसी तरह के कैंसर न होना सुनिश्चित हो, और उसे होल्टर मॉनीटर भी पहनना होगा।

जेल जाने पर केजरीवाल का AIIMS से जाँच करवानी चाहिए, मेडिकल रिपोर्ट में फर्क आने पर डॉक्टर पर कार्यवाही करनी चाहिए।  

कल पुणे में सामने आया है कि डॉक्टर ने 2 जवानों को गाड़ी से कुचलने वाले नाबालिग का खून का सैंपल ही बदल दिया जिसके एवज में उसे 3 लाख रुपए मिले। यानी डॉक्टर 3 लाख में बिक गया और जब केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत manage कर ली तो डॉक्टर की रिपोर्ट तो किसी भी कीमत पर बनवा सकता है। 

इतनी गंभीर बीमारियां बता रहा है और भरी गर्मी में चुनाव प्रचार कर रहा है। कैंसर टेस्ट का मतलब है कुछ तो शंका होगी और लेशमात्र भी ऐसा हो सकता तो उसका चुनाव प्रचार में जाना संभव ही नहीं है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 

आज उनके वकील सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए और कल ही केजरीवाल की याचिका पर सुनवाई करने की गुहार लगाई। लेकिन जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस विश्वनाथन की बेंच ने तुरंत सुनवाई करने से मना करते हुए कहा कि केजरीवाल की गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई पूरी कर चुका है और फैसला 17 मई को सुरक्षित कर लिया है और अब हम इस याचिका पर कुछ नहीं कर सकते, आप CJI के पास जाएं, वे ही इसे listing के लिए आदेश दे सकते हैं।

सिंघवी गिड़गिड़ाता रहा कि बस 7 दिन की medical extension है यह कोई स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं है। सिंघवी साहब यह कोई 7 दिन की बात नहीं है, इतने दिनों के बाद तो आपका खरीदा हुआ डॉक्टर और टेस्ट करने को कहेगा और फिर इलाज बता कर कहेगा bed rest चाहिए 15 दिन का। किसे बेवकूफ बना रहे हो?

आखिर “शेर” को क्या हुआ जी, जमानत पर बाहर आने के बाद पार्टी ने नारा लगाया था।

“जेल के ताले टूट गए, केजरीवाल जी छूट गए", "मोदी जी जा रहे हैं, केजरीवाल जी आ रहे हैं" और "देखो देखो कौन आया, शेर आया शेर आया"।

चीफ जस्टिस को चाहिए , वे इसे 2 जून को surrender करने के लिए कहें और यह भी आदेश दिया जाए कि जो कुछ भी टेस्ट या medical advice AIIMS के डॉक्टर कहेंगे, वह कराये जाएंगे। केजरीवाल अभी जमानत पर है जिसका मतलब है अभी जेल में ही है और स्वतः बिना जेल अधीक्षक की अनुमति वो कोई डॉक्टर की सलाह नहीं ले सकता।

Supreme Court is once again on Test - देखते हैं फेल होता है या पास?

सुप्रीम कोर्ट नियम कायदे से चलना चाहिए या धकापेल से

सुभाष चन्द्र 

यह चर्चा करने का मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि लोगों को इस बात के लिए जागरूक किया जाए कि देश की सर्वोच्च अदालत को नियम कायदों से चलना चाहिए न कि धकापेल और जजों की मनमर्जी से। कभी कभी लगता है जैसे अदालत नियमों से नहीं चल रही बल्कि सिक्का उछाल कर काम किया जा रहा है। 

मार्च, 2023 में OROP में बकाए के भुगतान के संबंध में अटॉर्नी जनरल Venkataramani ने सरकार का एक नोट Sealed Cover में यह कहते हुए दिया कि मामला संवेदनशील है तो चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने सरकार की ऐसी तैसी फेर दी और फटकार मारते हुए कहा - 

"We will not take any confidential documents or sealed covers, and am personally averse to this. There has to be transparency in court. This is about implementing the orders. What can be the secrecy here?" he said, adding that he wanted to put an end to "the sealed cover business". 

"If the Supreme Court follows it, High Courts will also follow"

The Chief Justice further called sealed covers 'completely against' settled judicial principles”

जबकि सत्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं अनेक मामलों में सरकार या खुद अपनी ही गठित की गई समितियों से Sealed Cover में रिपोर्ट लेता रहा है और CJI चंद्रचूड़ की बेंच ने अडानी की रिपोर्ट भी ऐसे ही जमा करने की अनुमति दी थी। फिर कौन से Settled judicial principles मीलॉर्ड ने बता दिए। दरअसल OROP मामले में  मकसद सरकार को जलील करने का था।

अब दूर मत जाइए, कल CJI चंद्रचूड़ की संविधान पीठ ने चुनाव आयोग को निर्देश दिए हैं कि पार्टियों को मिले चंदे का 30 सितंबर, 2023 तक का ब्यौरा Sealed Cover में अदालत में पेश करे। कहां गया अब Settled judicial principles जिसके अंतर्गत चंद्रचूड़ ने बात की थी कि सब कुछ खुले में दिया जाना चाहिए। 

किसी भी फैसले की Review Petition की सुनवाई वह बेंच बंद कमरे में करती है जिसने Original Judgement दिया हो लेकिन PLMA फैसले के खिलाफ Review Petition की सुनवाई करने के लिए तत्कालीन चीफ जस्टिस रमना ने घोषणा की थी कि उसकी सुनवाई खुले में होगी।

यानी जब मर्जी बंद कमरे में सुनवाई होगी और जब मर्जी सुनवाई खुले में की जाएगी - यह दोहरा रवैया चलाने  का क्या मतलब है। एक बार फैसला कीजिए कि या तो सुनवाई in camera होगी या खुले में होगी।

इसके अलावा, जिस मर्जी मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट खुद कर लेता है और जिस मर्जी को पहले हाई कोर्ट भेजने के आदेश दे देता है। अक्सर जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट स्वयं सुनता है लेकिन कांग्रेस-चीन के MOU के राष्ट्र सुरक्षा से जुड़े मामले को सुप्रीम कोर्ट ने खुद न सुन कर याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट ले जाने के लिए कह दिया था और यहां तक धमकी दी थी कि यदि उनकी बाते गलत हुईं तो मुकदमा चलाया जाएगा। ऐसी धमकी किसी याचिकाकर्ता को कभी देते देखा नहीं गया।

इसके विपरीत राघव चढ़ा के राज्यसभा से निलंबन के मामले की सुनवाई हाई कोर्ट भेजने की बजाय स्वयं करने का फैसला CJI चंद्रचूड़ ने कर लिया और सुनवाई शुरू कर दी। इसी तरह  मुंबई में बैठे तुषार गांधी की मुजफ्फरनगर में एक टीचर द्वारा एक मुस्लिम बच्चे की पिटाई के मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजने की बजाय सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं सुनवाई शुरू कर दी और उत्तर प्रदेश सरकार को  निर्देश भी दे दिए। 

ऐसे दोहरे मापदंड अपना कर सर्वोच्च अदालत गलत परम्पराएं डाल रहा है जो न्यायोचित नहीं है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट को कुछ नियम कायदों से चलना चाहिए, धकापेल से नहीं।