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तरुण हत्याकांड में नहीं मिली 2 मुस्लिम नाबालिगों को बेल, कोर्ट ने खारिज की याचिका


दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हुई तरुण भुटोलिया की हत्या के मामले में कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने इस मामले में शामिल दो नाबालिग आरोपितों की जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इनकी रिहाई से इलाके की शांति भंग हो सकती है और न्याय की प्रक्रिया में बाधा आ सकती है।

कश्मीर से लेकर अब तक हुई पत्थरबाज़ी में एक बात खासतौर पर देखने को मिलती है कि बच्चे और महिलाएं आगे होती है ताकि उनको नासमझ मासूम आदि कहकर अपनी करतूत पर पर्दा डाल दिया जाए। अभी रामलीला ग्राउंड दिल्ली में अवैध निर्माण हटाने गए सरकारी कर्मचारियों पर की गयी पत्थरबाज़ी को बाहरी लोगों द्वारा क्षेत्र का माहौल बिगड़ने की बातों से गुमराह किया गया लेकिन गिरफ्तार हुए सभी स्थानीय कोई बाहरी नहीं। 

द्वारका स्थित बोर्ड ने 8 अप्रैल 2026 को अपने आदेश में कहा कि उत्तम नगर में अभी भी सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है। ऐसे ‘संवेदनशील’ माहौल में आरोपितों को रिहा करना खतरनाक हो सकता है।

कोर्ट ने साफ किया कि मामले की जाँच अभी शुरुआती दौर में है, कई आरोपित फरार हैं और कुछ अहम सबूत मिलने बाकी हैं। ऐसे में बाहर आने पर आरोपित जाँच को प्रभावित कर सकते हैं।

यह दुखद घटना 4 मार्च 2026 यानी होली के दिन हुई थी। विवाद तब शुरू हुआ जब तरुण के परिवार की एक बच्ची ने छत से गुब्बारा फेंका, जिसका पानी नीचे खड़ी एक पड़ोसी महिला पर गिर गया।

हिंदू परिवार ने तुरंत माफी भी माँगी, लेकिन मुस्लिम महिला के पक्ष ने करीब 15-20 लोगों को बुला लिया। जब हिंदू युवक तरुण बाइक से घर लौट रहा था, तब इस्लामी भीड़ ने उसे घेर लिया।

हमलावरों ने लोहे की रॉड, ईंट और पत्थरों से तरुण को बेरहमी से पीटा। परिजनों के मुताबिक, जब तरुण सड़क पर गिर गया, तब उसके सीने पर भारी पत्थर से वार किया गया। अस्पताल में इलाज के दौरान तरुण की मौत हो गई।

‘सर तन से जुदा’ का नारा भारत की संप्रभुता-अखंडता को खुली चुनौती: इलाहाबाद हाई कोर्ट


बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ नारे को भारत की संप्रभुता, अखंडता और भारतीय न्याय व्यवस्था के खिलाफ बताते हुए सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा नारा न केवल कानून के शासन को चुनौती देता है, बल्कि लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत एक संवैधानिक देश है जहाँ सजा का निर्धारण कानून करता है, न कि कोई भीड़। इसी आधार पर कोर्ट ने बरेली हिंसा का आरोपि रिहान की जमानत याचिका खारिज कर दी।

कानून और देश के खिलाफ नारा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा, चाहे कोई अकेला व्यक्ति लगाए या कोई भीड़, यह सीधे तौर पर कानून की ताकत को चुनौती देता है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे नारे लोगों को हिंसा और हथियार उठाने के लिए उकसाते हैं, जिससे देश की एकता और सुरक्षा को खतरा होता है।

कोर्ट ने बताया कि इसी कारण ऐसा नारा लगाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध है। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि कोई भी नारा जो कानून की प्रक्रिया के बाहर मौत की सजा की वकालत करता है, वह सीधे तौर पर भारतीय कानूनी व्यवस्था के अधिकार को चुनौती देता है।

नारों का धार्मिक और आपराधिक अंतर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में समझाया कि अलग-अलग धर्मों में बोले जाने वाले नारों का उद्देश्य क्या होता है और कब वे गलत माने जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर ये नारे ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए होते हैं।

कोर्ट के अनुसार, इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे नारे श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक हैं। इन्हें खुशी, आस्था और धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बोला जाता है, इसलिए अपने आप में ये किसी भी तरह से अपराध नहीं हैं।

हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन्हीं नारों का इस्तेमाल किसी दूसरे धर्म के लोगों को डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के मकसद से किया जाए, तो वह अपराध की श्रेणी में आ जाता है। कोर्ट ने कहा कि नारे तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक उनका उपयोग गलत इरादे और कानून व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के लिए न किया जाए।

कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कुरान या इस्लाम के किसी भी प्रामाणिक मजहबी ग्रंथ में कहीं नहीं मिलता। अदालत के अनुसार, इस नारे को इस्लाम से जोड़ना गलत है, क्योंकि इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है।

                                                  कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने अपने जीवन में अपमान और तकलीफ सहने के बावजूद हमेशा दया, करुणा और क्षमा का रास्ता चुना। उन्होंने कभी भी किसी के खिलाफ हिंसा करने या सिर कलम करने की बात नहीं कही।

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि पैगंबर के नाम पर हत्या या हिंसा की बात करना उनके आदर्शों के खिलाफ है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी सोच पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का पालन नहीं, बल्कि उनका अपमान है।

‘सर तन से जुदा’ नारे की जड़ें कहाँ से जुड़ी हैं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस नारे की पृष्ठभूमि पर भी विस्तार से बात की। कोर्ट ने बताया कि अविभाजित भारत में ईशनिंदा से जुड़ा कानून वर्ष 1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था, ताकि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले मामलों को रोका जा सके।

कोर्ट ने कहा कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसी कानून में बदलाव किए और उसमें ईशनिंदा के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान जोड़ दिया। कोर्ट के अनुसार, ‘सर तन से जुदा’ का नारा वहीं से पैदा हुआ और धीरे-धीरे पाकिस्तान से भारत समेत अन्य देशों में फैल गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ असामाजिक तत्व इस नारे का इस्तेमाल धार्मिक भावना के नाम पर राज्य की सत्ता को चुनौती देने और दूसरे समुदायों में डर का माहौल बनाने के लिए कर रहे हैं, जो पूरी तरह गलत और कानून के खिलाफ है।

बरेली हिंसा और जमानत याचिका खारिज

यह पूरा मामला सितंबर में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है, जहाँ इत्तेफाक मिन्नत काउंसिल (INC) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर भीड़ जमा हुई थी। आरोप है कि इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए, पुलिस पर हमला हुआ और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया।

आरोपित रिहान ने जमानत माँगते हुए खुद को निर्दोष बताया था, लेकिन कोर्ट ने केस डायरी के सबूतों को देखते हुए कहा कि आरोपित रिहान उस अवैध भीड़ का हिस्सा था जिसने न केवल आपत्तिजनक नारे लगाए बल्कि सार्वजनिक शांति को भी भंग किया। साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी।

मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही दिन मार दिए चौक्के छक्के: ऐसे लोग सेना में रहने लायक नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश से इनकार करने वाले ईसाई सैनिक की बर्खास्तगी रखी बरकरार, कहा- यह अनुशासनहीनता है


     
मुख्य न्यायधीश सूर्यकान्त ने पहले ही दिन 17 केसों कर क्या लम्बित मुकदमों को जल्दी निपटाने का संकेत है? दूसरे, यह कहना कि इमरजेंसी केस में ही किसी मुक़दमे की तुरन्त सुनवाई होने की बात कहकर शायद दलाल वकीलों पर कुठाराघात किया है। रजिस्ट्रार को भी लगता है सख्त इशारा दे दिया है। चर्चा है कि मुख्य न्यायधीश सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट की हो रही बदनामी को बचाने सख्त कदम उठा रहे हैं। यह भी उम्मीद की जा रही है कि जमानत पर खुले घूम रहे नेताओं की जमानत पर भी कुछ सख्त कदम उठाने पर विचार चल रहा है। देखते हैं भविष्य के गर्भ में क्या है? 
भारतीय सेना में अनुशासन और एकता को सबसे ऊपर रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (24 नवंबर 2025) को लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने धार्मिक परेड में शामिल होने से इनकार करने पर की गई अपनी बर्खास्तगी को गलत बताया था।

कमलेसन एक ईसाई अधिकारी हैं और उन्होंने दावा किया था कि उन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए मजबूर किया गया जबकि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। उनकी ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि वह होली और दीपावाली जैसे कार्यक्रमों में हमेशा शामिल होते रहे हैं, बस उन्होंने अपने धार्मिक विश्वास के कारण मंदिर के सबसे अंदर वाले हिस्से में जाने से मना किया था।

कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सेना में इस प्रकार का व्यवहार ‘गंभीर अनुशासनहीनता’ माना जाएगा और केवल इसी कारण अधिकारी को नौकरी से हटाया जा सकता था।

 चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने नौकरी से बर्खास्त हुए सैमुअल कमलेसन को खारिज करते हुए कहा, ‘”वह कैसा संदेश दे रहे हैं? यह एक आर्मी ऑफिसर की बड़ी अनुशासनहीनता है। उसे नौकरी से निकाल देना चाहिए था। इस तरह के झगड़ालू लोग मिलिट्री में रहने के लायक हैं?”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक अधिकारी का कर्तव्य है कि वह अपने सैनिकों का नेतृत्व उदाहरण बनकर करे और यदि वह स्वयं पीछे हट जाए तो सैनिकों का मनोबल टूटता है। जस्टिस बागची ने यह भी बताया कि एक स्थानीय ईसाई पादरी ने साफ कहा था कि किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में प्रवेश करना ईसाई धर्म के खिलाफ नहीं है, इसलिए इसे जरूरी धार्मिक अधिकार नहीं कहा जा सकता।

संविधान का अनुच्छेद 25 केवल उन धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण देता है जो धर्म का मूल हिस्सा हों, न कि व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्याओं को। यह मामला 3rd कैवेलरी रेजिमेंट से जुड़ा है, जिसमें सिख, जाट और राजपूत स्क्वाड्रन होते हैं। कई बार समझाने के बावजूद कमलेसन ने अपनी व्यक्तिगत धारणा को आदेश से ऊपर रखा, जिससे यूनिट की एकजुटता पर असर पड़ा।

अंत में कोर्ट ने सजा कम करने का अनुरोध भी ठुकरा दिया और साफ कर दिया कि भारतीय सेना में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ एक-दूसरे के धर्म से अलग रहना नहीं बल्कि सबकी आस्था का सम्मान करते हुए साथ खड़े रहना है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह फैसला सेना में मजबूत संदेश देगा।

क्या था मामला?

यह मामला एक ईसाई सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन का है। उन्होंने अपनी रेजिमेंट के मंदिर में प्रवेश करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। इस कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और 5 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सुना गया था।

कांग्रेस ने बिहार में SIR से जुड़ी 89 लाख शिकायतें देने का किया दावा: पूर्वी चंपारण-सुपौल DM ने बताया बेबुनियाद, कहा- न कोई शपथ पत्र, न आरोपों का प्रमाण मिला

पवन खेड़ा (बाएँ), चुनाव आयोग (बीच में), राहुल गाँधी (दाएँ), (साभार : lawandotherthings, bhaskarassets & tribuneindia)
बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान करीब 65 लाख नामों के हटाए जाने पर कांग्रेस ने दावा किया कि उसने चुनाव आयोग को 89 लाख शिकायतें दी हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि एक भी फॉर्म आधिकारिक रूप से जमा नहीं कराया गया है।

इसके अलावा चुनाव आयोग ने कहा कि राहुल गाँधी ने ना तो कोई शपथ पत्र दिया और ना ही अपने आरोपों का प्रमाण। ऐसे में बार-बार चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर खुद की ही फजीहत कराने में अब कांग्रेस को काफी मजा आ रहा है।

फर्जी आँकड़ों का दावा, बिना प्रक्रिया अपनाए

कॉन्ग्रेस ने जब यह कहा कि उसने 89 लाख शिकायतें दर्ज करवाई हैं, तो यह सुनकर सभी चौंक गए। पार्टी के नेता पवन खेड़ा और राजेश राम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस दावे को पूरे आत्मविश्वास से रखा। उन्होंने कहा कि पार्टी के पास शिकायतों की रसीदें भी मौजूद हैं और यह सब चुनाव आयोग को सौंपा गया है।

पवन खेड़ा ने अपने बयान में कहा कि 20,000 से अधिक बूथों पर 100 से ज्यादा नाम काटे गए। कई बूथों पर महिलाओं के नाम 70 फीसदी तक हटाए गए। पवन खेड़ा ने इसे एक ‘पैटर्न‘ बताया। पवन खेड़ा ने यह भी कहा कि BLOs के जरिए आवेदन इकट्ठा कर DEO को सौंपे गए हैं।

पूर्वी चंपारण और सुपौल DM ने दावों को झूठलाया

लेकिन अगले ही दिन पूर्वी चंपारण के DM ने खुद कांग्रेस के पोस्ट पर जवाब देते हुए बताया कि बिहार में 1 अगस्त 2025 को जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित हुई, उस पर कांग्रेस की ओर से न तो फॉर्म 6 (नाम जोड़ने के लिए) और न ही फॉर्म 7 (नाम हटाने पर आपत्ति) में कोई आवेदन जमा हुआ है।

इसके अलावा कांग्रेस के इसी पोस्ट पर सुपौल के DM ने भी जवाब में कहा कि अब तक बिहार में कांग्रेस पार्टी के किसी भी जिला अध्यक्ष द्वारा अधिकृत किसी बूथ लेवल एजेंट (BLA) ने 1 अगस्त 2025 को जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में किसी भी नाम को लेकर ना तो नाम जोड़ने का फॉर्म (फॉर्म 6) भरा है और न ही किसी नाम पर आपत्ति (फॉर्म 7) दर्ज कराई है और ये सब तय फॉर्मेट में होना चाहिए था।

ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि 89 लाख शिकायतों का यह आँकड़ा आखिर आया कहाँ से? और अगर वाकई शिकायतें थीं तो वो किसको दी गईं, और कैसे दी गईं?

राहुल गाँधी का आरोप भी खोखला, आयोग को नहीं मिला कोई शपथ पत्र

कांग्रेस के इस दावे की अगुवाई राहुल गाँधी खुद कर रहे थे। राहुल गाँधी ने दावा किया कि बड़े पैमाने पर विपक्षी मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और यह लोकतंत्र की हत्या है। लेकिन जब चुनाव आयोग ने उनसे शपथ पत्र और प्रमाण माँगा, तो राहुल गाँधी चुप हो गए।

निर्वाचन आयोग ने खुद कहा है कि राहुल गाँधी की तरफ से कोई शपथ पत्र नहीं दिया गया। ना तो कोई आधिकारिक दस्तावेज, ना डेटा और न ही किसी तरह का ठोस प्रमाण। यानी जो भी बातें राहुल मंच से बोलते रहे, वो सिर्फ भाषण तक सीमित रहीं। कानूनन ना तो कोई कार्रवाई की गई और न ही किसी स्तर पर कांग्रेस ने प्रक्रिया का पालन किया।

शिकायतें तो छोड़िए, अनुमति भी नहीं माँगी राहुल ने

एक और फजीहत तब हुई जब यह खबर चली कि राहुल गाँधी को पटना के गाँधी मैदान में रुकने की अनुमति नहीं दी गई। कांग्रेस ने इसे लेकर भी प्रशासन पर सवाल उठाए। लेकिन जब पटना जिला प्रशासन ने स्पष्टीकरण जारी किया, तो कांग्रेस का यह आरोप भी झूठा निकला।

प्रशासन ने साफ किया कि न राहुल गाँधी और न ही कांग्रेस की ओर से रात रुकने की कोई अनुमति माँगी गई थी। जो दो अनुमतियाँ माँगी गई थीं, वो सभा और रैली के लिए थी, जो दे दी गई थी।

कोर्ट ने खोल दिए कांग्रेस के ‘भगवा आतंकवाद’ के धागे, कहा- मालेगाँव ब्लास्ट पर थ्योरी तो गढ़ ली, पर सबूत एक भी नहीं; अभिनव भारत, कर्नल ने दिए RDX, साध्वी प्रज्ञा की बाइक…

                                पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित - (फाइल, फोटो साभार: First Post)
मालेगाँव ब्लास्ट केस में आये फैसले ने कांग्रेस समर्थिक यूपीए के साथ-साथ मीडिया को भी बेनकाब कर दिया। आज जो मीडिया फैसले को लेकर कांग्रेस पर प्रहार कर रही है, ये वही मीडिया है जो उस समय कांग्रेस के इशारे पर "हिन्दू और भगवा आतंकवाद" को खूब प्रचारित कर रही थी। कोई खोजी पत्रकार सच्चाई सामने लाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका, जिस वजह से हिन्दू चुपचाप अपने आपको अपमानित होते बर्दाश्त करता रहा। समय बड़ा बलवान होता है। सारे पासे पलट गए। जो सबके सामने है। कल तक कांग्रेस के इशारे पर 
"हिन्दू और भगवा आतंकवाद" का शोर मचाने वाली मीडिया आज कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर रही है।   

मुंबई की स्पेशल एनआईए कोर्ट ने 31 जुलाई को 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपितों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल हैं।

स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा और सबूतों में कई असंगतियाँ हैं। कोर्ट ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर होनी चाहिए।

यह फैसला 17 साल पुराने केस में आया है, जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी विवादास्पद रहा है। ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। कोर्ट ने विक्टिम्स के लिए मुआवजे का भी ऐलान किया है।

मालेगाँव ब्लास्ट में कोई सबूत नहीं पेश कर पाया अभियोजन पक्ष

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने में कई गलतियाँ कीं। उन्होंने कहा, “पूरी जाँच के बाद यह साफ है कि अभियोजन कोई ठोस सबूत लाने में विफल रहा है। सबूतों में कई असंगतियाँ हैं, इसलिए सभी आरोपितों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।”

जज ने आगे जोड़ा, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं की जा सकती। यहाँ सबूतों की कमी है, इसलिए बरी करना जरूरी है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से ‘हिंदू आतंकवाद’ के आरोप को खारिज किया, जो अभियोजन की मुख्य थ्योरी थी। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि यह ब्लास्ट ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की साजिश थी और इसमें हिंदू आतंकवाद शामिल है। लेकिन कोई सबूत नहीं मिला कि आरोपित हिंदू आतंकवाद में लिप्त थे। आतंकवाद किसी धर्म से जुड़ा नहीं है। नैतिकता से फैसला नहीं लिया जा सकता; सबूत जरूरी हैं। यहाँ साजिश साबित नहीं हुई, इसलिए हिंदू आतंकवाद जैसी कोई अवधारणा यहाँ लागू नहीं होती।”

जज ने अभियोजन के दावों को एक-एक करके तोड़ा। उन्होंने कहा, “अभियोजन ने सात आरोपितों के बीच साजिश का आरोप लगाया, लेकिन कोई मीटिंग, कॉल रिकॉर्ड या प्लानिंग का सबूत नहीं पेश किया। सबूत असंगत हैं और पुलिस ने घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया, जिससे फॉरेंसिक जाँच प्रभावित हुई।”

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर क्या कहा कोर्ट ने?

फैसले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ लगे आरोपों को विस्तार से खारिज किया गया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन का मुख्य दावा था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल साध्वी ठाकुर की थी, जिस पर बम बंधा था। लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने बाइक के चेसिस का पूरा सीरियल नंबर रिकवर नहीं किया। इसलिए, यह साबित नहीं होता कि बाइक उनकी थी।”
जज ने आगे कहा, “इसके अलावा, साध्वी ठाकुर ने ब्लास्ट से दो साल पहले संन्यास ले लिया था और सभी भौतिक चीजें त्याग दी थीं। ऐसे में बाइक उनके पास कैसे हो सकती है? अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह फेल रहा।”
कोर्ट ने ठाकुर के संन्यासी जीवन पर भी टिप्पणी की, जिसमें कहा गया, “उन्होंने दो साल पहले सब छोड़ दिया था, इसलिए मटेरियल संपत्ति से उनका कोई लेना-देना नहीं था। आरोप बेबुनियाद हैं।”

कर्नल पुरोहित के खिलाफ आरोप भी हुए धराशाई

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर लगे गंभीर आरोपों को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। जज ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि पुरोहित ने कश्मीर से आरडीएक्स मँगवाया और बम असेंबल किया। लेकिन कोई सबूत नहीं – न गवाह, न डॉक्यूमेंट। यह आरोप निराधार है।”
फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस पर बात करते हुए जज लाहोटी ने बताया, “पुरोहित और आरोपित अजय रहीरकर के बीच पैसे के लेन-देन हुए थे, क्योंकि वे अभिनव भारत के पदाधिकारी थे। लेकिन यह पैसा पुरोहित ने अपने घर की निर्माण और एलआईसी पॉलिसी पर खर्च किया, न कि किसी आतंकी गतिविधि पर। अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि पैसा गलत काम में लगा। इसलिए, कोई केस नहीं बनता।”

अन्य आरोपितों पर कोर्ट का रुख

कोर्ट ने बाकी आरोपितों मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहीरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ भी सबूतों की कमी बताई। जज ने कहा, “इन सभी के बीच कोई साजिश साबित नहीं हुई। अभियोजन ने मीटिंग्स या प्लानिंग के सबूत नहीं दिए। एक आरोपित सुधाकर द्विवेदी ने तो दावा किया कि कोई ब्लास्ट हुआ ही नहीं, जिसके बाद अभियोजन ने 100 से ज्यादा विक्टिम्स की जाँच की, लेकिन फिर भी केस कमजोर रहा।”

विक्टिम्स और मुआवजे पर फैसला

कोर्ट ने ब्लास्ट के विक्टिम्स को न्याय देते हुए मुआवजे का ऐलान किया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि छह लोग मारे गए, जो कोर्ट मानता है। लेकिन घायलों की संख्या 101 बताई गई, जबकि कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हेराफेरी पाई गई। इसलिए सिर्फ 95 घायलों को मान्यता दी जाती है।”
मुआवजे पर उन्होंने आदेश दिया, “मारे गए छह लोगों के परिवारों को 2 लाख रुपये प्रत्येक और 95 घायलों को 50,000 रुपये प्रत्येक मुआवजा मिलेगा। यह राज्य सरकार देगी। विक्टिम्स को न्याय मिलना चाहिए, भले ही आरोपित बरी हों।”

क्या था पूरा मामला, जो 17 साल तक चला

यह केस 29 सितंबर 2008 को हुआ था, जब मालेगाँव के एक चौराहे पर रमजान के दौरान ब्लास्ट हुआ। मुस्लिम बहुल इलाके में मोटरसाइकिल पर रखे आईईडी से विस्फोट हुआ था। महाराष्ट्र एटीएस ने शुरुआती जाँच की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया। एटीएस ने जिन 12 लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी शामिल थे। एटीएस ने दावा किया था कि यह विस्फोट अभिनव भारत संगठन की साजिश का हिस्सा था।
इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे।
साल 2010 में जाँच एनआईए को सौंपी गई। एनआईए ने 2016 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और एमसीओसीए हटाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि कुछ आरोपितों के खिलाफ सबूत कम हैं। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने सात आरोपितों पर ट्रायल का आदेश दिया, जबकि तीन को डिस्चार्ज कर दिया। ट्रायल दिसंबर 2018 में शुरू हुआ, जिसमें 323 गवाहों की जाँच हुई। 34 गवाह होस्टाइल हो गए और 30 से ज्यादा मर चुके थे। अप्रैल 2024 में अंतिम बहस खत्म हुई और 19 अप्रैल को फैसला रिजर्व किया गया।
अभियोजन की तरफ से स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अविनाश रसल थे, जबकि आरोपितों की तरफ से कई वकील, जैसे जेपी मिश्रा (ठाकुर और रहीरकर), पासबोला समेत अन्य (उपाध्याय), फड़के और बाबर (पुरोहित), रंजीत सांगले (द्विवेदी), और पुनालेकर समेत अन्य (चतुर्वेदी) ने अपनी दलीलें पेश की।

कोर्ट ने अभियोजन की कमियाँ की उजागर

जज ने पुलिस और अभियोजन की कई कमियों पर उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “पुलिस ने घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया, जिससे सबूत खराब हुए। फॉरेंसिक जाँच में गड़बड़ियाँ हैं। गवाहों की मौत और होस्टाइल होना भी केस को कमजोर किया। कुल मिलाकर अभियोजन का केस असंगत है।”
फिर से हिंदू आतंकवाद पर जज साहब ने दोहराया। “टेररिज्म का कोई धर्म नहीं। लेकिन यहाँ प्रॉसीक्यूशन ने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी बनाई, जो सबूतों पर नहीं टिकी। नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सबूत जरूरी हैं, और यहाँ सबूत नहीं हैं। इसलिए, सभी आरोपितों को बरी किया जाता है।”
एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत साँगले ने कहा, “ये साबित नहीं हुआ कि ब्लास्ट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी। घायलों के सर्टिफिकेट नकली थे। डीजी एटीएस को आदेश दिया गया है कि वो जाँच करें कि ये नकली सर्टिफिकेट किसने बनाए। सुधाकर चतुर्वेदी के घर पर रखा गया आरडीएक्स की भी जाँच डीजी एटीएस को करने को कहा गया है। सभी आरोपितों को यूएपीए और दूसरी धाराओं से बरी कर दिया गया है। अभियोजन यूएपीए के तहत आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा।”
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एक साध्वी को पोर्न दिखाने, अंडा खिलाने, निर्वस्त्र करने वाले पुरुष पुलिस वालों को दंड कब? रात भर
फैसला खत्म होने पर कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। आरोपित खुश दिखे, प्रॉसीक्यूशन वाले निराश। यह पूरा फैसला दिखाता है कि कानून सबूतों पर चलता है, नैतिकता पर नहीं। जज साहब ने हर बयान को विस्तार से दिया, ताकि कोई शक न रहे।

वजीरिस्तान में भारत ने नहीं किया कोई हमला, पाकिस्तानी फौज सिर्फ झूठ बोल रही: विदेश मंत्रालय ने बयान जारी करके दिया इस्लामी मुल्क को जवाब; तालिबान गुट ने ली जिम्मेदारी


भारत ने शनिवार (28 जून 2025) को पाकिस्तान की ओर से लगाए गए आरोप को खारिज कर दिया है। पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाते हुए वजीरिस्तान में हुए हमले के लिए भारत को दोषी ठहराया था।

दरअसल, शनिवार (28 जून) को खैबर पख्तूनख्वा के उत्तरी वजीरिस्तान जिले के मीर अली क्षेत्र के खड्डी गाँव में एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से लदे वाहन को बम निरोधक इकाई के माइन रेसिस्टेंट एम्बुश प्रोटेक्टेड (MRAP) वाहन से टकरा दिया था। इस हमले में 13 पाकिस्तानी फौजियों की मौत हो गई थी। वहीं 24 अन्य लोग घायल हा गए थे। इसका आरोप पाकिस्तान ने भारत पर लगाया था। जिसे भारत ने खारिज कर दिया है।

शनिवार को उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान में एक सैन्य काफिले को निशाना बनाकर किए गए आत्मघाती बम विस्फोट में 13 सैनिक मारे गए थे। हमले में दर्जनों लोग घायल भी हो गए थे। सूत्रों के मुताबिक, उत्तरी वजीरिस्तान जिले के खड्डी इलाके में आज सुबह एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से लदे वाहन को बम निरोधक इकाई के माइन-रेसिस्टेंट एम्बुश प्रोटेक्टेड (एमआरएपी) वाहन से भिड़ा दिया।

भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने बयान जारी करते हुए कहा, “हमने पाकिस्तान फौज का आधिकारिक बयान देखा है जिसमें भारत पर वजीरिस्तान हमले का आरोप लगाया गया है। हम इस आरोप को पूरी तरह से खारिज करते हैं और इसकी घोर निंदा करते हैं। यह आरोप केवल ध्यान भटकाने की कोशिश है।” 

विस्फोटकों से लदे वाहन की सैन्य काफिले से टक्कर
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के उत्तरी वजीरिस्तान जिले में एक स्थानीय सरकारी अधिकारी ने कहा कि एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से लदे वाहन की सैन्य काफिले से टक्कर करवा दी। विस्फोट में 13 सैनिक मारे गए। इसके अलावा 10 सैन्यकर्मी और 19 नागरिक घायल हो गए। यह क्षेत्र तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के निशाने पर रहता है। घटना की जिम्मेदारी हाफिज गुल बहादुर समूह के एक उप-गुट उसुद अल-हरब ने ली है। बावजूद इसके पाकिस्तान ने इस हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया है। हाल के महीनों में यह उत्तरी वजीरिस्तान में सबसे घातक घटनाओं में से एक है, जिसमें गंभीर सुरक्षा चिंताएं खड़ी की हैं।

तालिबान गुट ने ली जिम्मेदारी, फिर भी भारत पर आरोप

इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान तालिबान के एक प्रमुख गुट—हाफिज गुल बहादुर समूह—की आत्मघाती शाखा ने ली है। बावजूद इसके, पाकिस्तानी सेना और इस्लामाबाद स्थित अधिकारियों ने विदेशी हाथ की बात उठाते हुए अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर आरोप लगाया। नई दिल्ली ने इन आरोपों को “दुर्भावनापूर्ण और बेबुनियाद” बताया है।

हमले से नागरिकों को भी नुकसान

स्थानीय पुलिस अधिकारियों के मुताबिक विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि आसपास के दो घरों की छतें ढह गईं, जिससे छह बच्चे घायल हो गए. घटनास्थल पर तबाही का मंजर था और आसपास के लोग दहशत में आ गए।

पाकिस्तान की रणनीति पर सवाल

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान, खासकर उसकी सेना, अक्सर अपनी आंतरिक सुरक्षा विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की रणनीति अपनाती है। हाफिज गुल बहादुर समूह जैसे संगठनों की सक्रियता और जिम्मेदारी स्वीकारने के बावजूद भारत पर उंगली उठाना इस्लामाबाद की राजनीतिक नीयत पर सवाल खड़े करता है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान के इस “सस्ती साजिश” वाले दावे को सिरे से खारिज करता है और उम्मीद करता है कि इस्लामाबाद अपनी ज़मीन पर मौजूद आतंकियों से निपटने पर ध्यान दे, न कि दूसरों को दोष देने पर।

निकाले जाएँ CM केजरीवाल के कॉल रिकॉर्ड्स : NCW का आदेश; विभव कुमार की जमानत याचिका ख़ारिज, सुनवाई में YouTuber ध्रुव राठी का भी जिक्र

AAP की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ मारपीट के मामले में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के PA रहे विभव कुमार की जमानत अर्जी ख़ारिज कर दी है। जस्टिस सुशिल अनुज त्यागी ने ये फैसला सुनाया। 18 मई, 2024 को विभव कुमार को गिरफ्तार किया गया था और उसे 5 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया था। 24 मई को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। आरोप है कि उसने स्वाति मालीवाल के पेट, छाती, पाँव और प्राइवेट पार्ट पर प्रहार किया।

वहीं दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया कि इस घटना का वीडियो फुटेज CCTV से गायब है। पुलिस ने आशंका जताई है कि इसके पीछे कुछ तकनीकी कारण भी हो सकता है, वहीं ये जानबूझकर किया गया भी हो सकता है। दिल्ली पुलिस की तरफ से बताया गया कि विभव कुमार को अरविंद केजरीवाल के PA के पद से हटाए जाने के बावजूद CM आवास में सब उससे आदेश ले रहे थे, ये दिखाता है कि वो प्रभावशाली है। वहीं स्वाति मालीवाल ने कोर्ट को बताया कि उन्हें जान से मार डालने और बलात्कार की धमकियाँ मिल रही हैं।

उन्होंने बताया कि ध्रुव राठी द्वारा इस घटना पर वीडियो बनाने के बाद ये सब हो रहा है। स्वाति मालीवाल का कहना है कि अगर विभव कुमार बाहर आता है तो उन्हें और उनके परिवार को खतरा है। इस फैसले के बाद विभव कुमार अब दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख करेगा। AAP ने अपने एक बयान में ये जानकारी दी है। उधर NCW (राष्ट्रीय महिला आयोग) ने दिल्ली पुलिस को इस मामले में जुड़े लोगों के कॉल रिकार्ड्स निकालने को कहा है।

दिल्ली के CM और AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल के कॉल रिकॉर्ड्स भी खँगाले जाएँगे। संस्था ने कहा कि ये सूचना मिली है कि स्वाति मालीवाल के CM आवास पहुँचते ही विभव कुमार को फोन कॉल कर के बुलाया गया, ऐसे में ये पता लगाया जाना ज़रूरी है कि किसके आदेश पर ऐसा हुआ। पुलिस कमिश्नर को NCW अध्यक्ष रेखा शर्मा ने पत्र भेजा है। साथ ही स्वाति मालीवाल को धमकी देने वालों के खिलाफ 3 दिन के भीतर कार्रवाई कर रिपोर्ट सौंपने के लिए भी कहा गया है।

ऋषि-मुनियों के देश भारत को इस्लामिक देशों के संगठन में क्यों शामिल कराना चाहतीं थीं इंदिरा गाँधी? हिन्दुओं आंखें खोलो और सनातन विरोधियों के विरुद्ध लामबंध हो


G20 शिखर सम्मेलन की सफल अध्यक्षता के बाद वैश्विक स्तर पर पर भारत की एक अलग ही छवि बनकर सामने आई है। दुनियाभर के दिग्गज नेता भारत और पीएम मोदी की तारीफ कर चुके हैं। यही नहीं, भारत को G7 में शामिल करने की चर्चा हो रही है। लेकिन, एक वक्त स्थिति ऐसी भी थी कि भारत इस्लामी देशों के संगठन में शामिल होना चाहता था।

पहले ही मुग़ल आक्रांता भारतीय संस्कृति को बहुत धूमिल कर चुके थे, तो क्या इंदिरा गाँधी भारत को मुस्लिम संगठन बनाकर ऋषि-मुनियों की इस तभोभूमि को भी नष्ट करना चाहती थी? इंदिरा गाँधी के इस प्रयास के लिए इस परिवार की पृष्ठभूमि को गंभीरता से देख समस्त सनातन विरोधियों को अपनी आंखे और दिमाग को खोलनी होंगी। यही कारण है कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण नीति पर काम करती रही है। सेकुलरिज्म के पाखंड से हिन्दुओं को पागल बनाया जाता रहा है। इस कटु सच्चाई को समस्त हिन्दू समाज को समझनी होगी। भारत में सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक जिन्दा है जब तक हिन्दू है, परिणाम दुनिया में सामने है, जहां-जहां मुस्लिम बहुसंख्यक होता जा रहा है, हिन्दुओं द्वारा निकाली जाने वाली शोभा यात्राओं पर होते हमले। क्या इसी का नाम सेकुलरिज्म है? क्या इसी का नाम गंगा-जमुनी तहजीब है?   

GHIYASUDDIN GHAZI (Name changed to GANGA DHAR to escape British army).he settled near
Nehru is derived from the word "neher" which means canal in Hindi,he titled himself NEHRU means who lived near the neher or river......

His son was
MOTI LAL NEHRU

दरअसल, साल 1969 में इस्लामिक देशों ने ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (OIC)’ नामक अपना एक संगठन बनाने का फैसला किया था। इसमें शामिल होने के लिए कई देशों में होड़ मची हुई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस होड़ में भारत भी शामिल था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने औपचारिक तौर पर इस संगठन में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। लेकिन, पाकिस्तान के विरोध के बाद भारत इस्लामिक देशों के संगठन का हिस्सा नहीं बन पाया था।

एक दौर वह था जब भारत इस्लामिक देशों के संगठन में शामिल होना चाहता था। वहीं प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत का एक दौर ऐसा भी आया जब OIC ने खुद भारत को ‘विशिष्ट अतिथि’ के रूप में आमंत्रित किया था। इसके बाद तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भारत के प्रतिनिधि के रूप में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) गई थीं।

यही नहीं, अब OIC में सबसे अधिक दबदबा रखने वाले सऊदी अरब के साथ प्रधानमंत्री वन-टू-वन मीटिंग कर रहे हैं। G20 के बाद सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिल सलमान बिन अब्दुलअजीज अल साउद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। इसमें दोनों देशों के बीच ग्रिड कनेक्टिविटी के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर हुआ है। इसके तहत समुद्र के नीचे बिजली ट्रांसमिशन लाइन डालकर भारत और सऊदी अरब के बीच पावर ग्रिड बनाया जाएगा।

क्या है OIC

1969 में मुस्लिम देशों ने अपना स्वयं का अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने का फैसला लिया था। इस संगठन को लेकर कहा गया था कि यह मुस्लिम देशों की आवाज उठाएगा। इसे ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉन्फ्रेंस नाम दिया गया था। हालाँकि, बाद में साल 2011 में इसका नाम बदलकर ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानी इस्लामिक सहयोग संगठन रख दिया गया है। यह संगठन 57 इस्लामिक देशों का संगठन है। इस्लाम के खिलाफ होने वाली किसी भी छोटी सी छोटी गतिविधि के खिलाफ आवाज उठाता है।

क्या हुआ था भारत के साथ

वापस साल 1969 में लौटें तो इस्लामिक देशों के संगठन बनने की पहली बैठक मोरक्को में हुई थी। इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने मोरक्को में भारत के राजदूत गुरबचन सिंह को बातचीत करने का नेतृत्व सौंपा था। पूर्व विदेश सचिव जेएन दीक्षित लिखते हैं कि जैसे ही इंदिरा गाँधी को एहसास हुआ कि इस्लामी देशों की बैठक में बातचीत करने में सिख को भेजना एक गलती है, उन्होंने अपनी गलती सुधारते हुए फकरूद्दीन अली अहमद के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल मोरक्को भेज दिया। लेकिन, यह प्रतिनिधिमंडल मोरक्को नहीं पहुँच पाया।
वास्तव में इंदिरा गाँधी खुद इस्लामिक देशों के संगठन में शामिल होने के लिए खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने एक सिख को हटाकर मुस्लिम को भेजने का फैसला किया था। यदि OIC चार्टर की शुरुआती पंक्तियों को देखें तो पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाला भारत इस्लामिक देशों के साथ ‘उठने-बैठने’ को कितना अधिक बेताब था। दरअसल, चार्टर की शुरुआत में ही लिखा था, “अल्लाह के नाम पर, सबसे दयालु हम इस्लामी सहयोग संगठन के सदस्य देश हैं। एकता और भाईचारे के इस्लामी मूल्यों के हिसाब से चलने और दुनिया में इस्लाम की भूमिका को पुनर्जीवित करने हेतु प्रयास करने के लिए दृढ़ निश्चय करते हैं।”
अब सवाल यह है कि जब भारत OIC का सदस्य बन इस्लाम का काम करने को बेताब था फिर सदस्य कैसे नहीं बन पाया। दरअसल, तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान को जब पता चला कि भारत OIC में शामिल होने जा रहा है, तो वह भड़क गए और बीमारी का बहाना बनाकर मोरक्को से जाने की धमकी दे दी। पाकिस्तान की धमकी के बाद इस्लामिक देशों के पास एक ही विकल्प था – या तो भारत या फिर पाकिस्तान।
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The Story of Two Lals--Motilal & Jawaharlal
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The Story of Two Lals--Motilal & Jawaharlal
Jawahar Lal Nehru Moti Lal Nehru SOMETIME back I used to receive a pamphlet titled “ SHAKTI SANDESH ” published from Calcutta a...

फिर क्या था, इस्लामिक देशों ने इस्लाम के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान को OIC का सदस्य बना दिया। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो शायद अच्छा होता। लेकिन, इस्लामिक देशों ने पाकिस्तान से माफी माँगी और फिर हर बात का दोष भारत पर मढ़ दिया। खासतौर से भारतीय राजदूत पर जो कि एक सिख थे। यही नहीं, भारत को चालाक, धोखेबाज कहते हुए प्रतिनिधिमंडल को बैठक में जाने से भी रोक दिया।

‘ज्ञानवापी ढाँचे की जगह भव्य शिव मंदिर जल्द’: इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष को झटका


हिन्दुओं के विभिन्न धार्मिक स्थलों को मुक्त कराने के लिए अदालत में लड़ाई लड़ रहे हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब वाराणसी के ज्ञानवापी ढाँचे की जगह पर भव्य शिव मंदिर बनेगा। बताते चलें कि ज्ञानवापी ढाँचा (Gyanvapi Masjid) मामले में भी हरिशंकर जैन (Hari Shankar Jain) हिंदू पक्ष के वकील हैं। वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार (31 मई 2023) को ढाँचा परिसर में स्थित माता श्रृंगार गौरी पूजा को लेकर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति को खारिज कर दिया।

भगवान विश्वेश्वर के मंदिर को तोड़कर मुगल आक्रांता औरंगजेब (Mughal Invader Aurangzeb) द्वारा बनवाए गए ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर वकील जैन ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि वह दिन दूर नहीं जब वर्तमान ढाँचे को हटा दिया जाएगा और हम (हिंदू समुदाय) वहाँ एक भव्य शिव मंदिर का निर्माण करेंगे।”

वकील हरिशंकर जैन ने कहा, “353 साल से हिंदू जनता संघर्ष कर रही है और चाहती है कि वहाँ से ढाँचा हटे और भगवान भोलेनाथ प्रकट हों। वहाँ भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गए हैं। उनकी भी साइंटिफिक जाँच होगी और मालूम पड़ जाएगा कि वहाँ पर शिवजी हैं।

ज्ञानवापी ढाँचे की जाँच को लेकर उन्होंने आगे कहा, “हमने पूरे-के-पूरे परिसर की वैज्ञानिक जाँच के लिए प्रार्थना-पत्र दिया है और उससे साबित हो जाएगा कि पूरा परिसर हिंदुओं का है। भगवान भोलेनाथ चाहते हैं कि मंदिर बने और हम उसी तरफ आगे बढ़ रहे हैं।”

 वाराणसी के ज्ञानवापी ढाँचा परिसर में ही माता श्रृंगार स्थित हैं। इनकी पूजा करने को लेकर राखी सिंह के नेतृत्व में 5 महिलाओं ने कोर्ट से अनुमति माँगी थी। हालाँकि, मस्जिद पक्ष से जुड़े अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने इसका विरोध करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High court) ने याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया।

इस अर्जी के खारिज होते ही माता श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की माँग वाली अर्जी पर सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। अब वाराणसी की जिला कोर्ट माता श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की माँग वाली याचिका पर सुनवाई करेगी।हाईकोर्ट के इस फैसले को मुस्लिम पक्ष के लिए बहुत बड़ा झटका माना जाता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर की एकल पीठ ने इस मामले में 23 दिसंबर 2022 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। दिसंबर में ही इस मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी थी। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने जिला जज वाराणसी के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिला जज की अदालत ने मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया था।

अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने अपनी अर्जी में कहा था कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के उपबंधों के तहत अदालत को वाद सुनने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कमेटी की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

दरअसल, रेखा सिंह एवं अन्य महिलाओं ने माता श्रृंगार गौरी की हर दिन पूजा करने की इजाजत कोर्ट से माँगी थी। इसके बाद कोर्ट के आदेश पर परिसर का सर्वे हुआ था। सर्वे के दौरान ढाँचे के तहखाने में कई हिंदू प्रतीक मिले। इसके साथ ही एक शिवलिंग भी मिला। मुस्लिम पक्ष इसे फव्वारा बताता आ रहा है।

इसके बाद 18 अगस्त 2021 को इन महिलाओं ने ज्ञानवापी परिसर में माता श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश, भगवान हनुमान समेत मौजूद अन्य देवताओं की रोजाना पूजा की इजाजत माँगने के लिए कोर्ट पहुँची। अभी यहाँ साल में एक बार ही पूजा होती है। अब हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष की आपत्ति खारिज होने के बाद परिसर में स्थित भगवानों की नियमित पूजा पर सुनवाई होगी।

अविवाहित रिपोर्टर गई अफगानिस्तान में हो गई गर्भवती: महिला पत्रकार को एंट्री देने से न्यूजीलैंड का इनकार

रिपोर्टिंग के दौरान गर्भवती हुई पत्रकार अफगानिस्तान में शरण लेने को हुई मजबूर (फोटो साभार: शार्लोट बेलिस का ट्विटर हैंडल )
न्यूजीलैंड (New Zealand) की पत्रकार शार्लोट बेलिस (Charlotte Bellis) अफगानिस्तान में फँस गई हैं। वह गर्भवती हैं, इसके बावजूद न्यूजीलैंड सरकार ने कोरोनो महामारी प्रतिबंधों का हवाला देते हुए उनकी वापसी का आपातकालीन आवेदन खारिज कर दिया है।

गर्भवती पत्रकार ने बताया कि उसके देश ने वापसी का आवेदन ठुकरा दिया है। इसकी वजह से उन्हें तालिबान (Taliban) से मदद माँगने को मजबूर होना पड़ा। बेलिस ने ‘द न्यूजीलैंड हेराल्ड’ (The New Zealand Herald) में एक कॉलम लिखकर सबको अपनी आपबी​ती बताई। शनिवार (29 जनवरी 2022) को प्रकाशित कॉलम में उन्होंने लिखा, “अजीब विडंबना है कि पहले मैंने महिलाओं के प्रति बर्बरता दिखाने को लेकर तालिबान से सवाल पूछा था, लेकिन अब मैं यही सवाल अपनी सरकार से पूछ रही हूँ।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बेलिस अल-जज़ीरा में बतौर संवाददाता काम करती थीं, जो कतर में स्थित है। बेलिस पिछले साल अल जजीरा के लिए काम करते हुए उन्हें अफगानिस्तान से तालिबान और अमेरिकी सैनिकों की वापसी से जुड़ी खबरों को दे रही थीं। अपने कॉलम में बेलिस ने कहा कि वह सितंबर में कतर लौटीं तो उन्हें पता चला कि वह अपने साथी और फ्रीलांस फोटोग्राफर जिम ह्यूलेब्रोक के साथ रहते हुए गर्भवती हो गई थीं।

जिम ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के लिए काम कर रहे थे। बेलिस मई में एक बच्ची को जन्म देने वाली हैं। चूँकि, कतर में विवाहेतर यौन संबंध अवैध हैं, इससे बेलिस को लगा कि कतर छोड़ने में ही उनकी भलाई है। इसके बाद उन्होंने नागरिकों की वापसी से जुड़ी लॉटरी-शैली प्रणाली के जरिए बार-बार न्यूजीलैंड वापस जाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

इसके बाद बेलिस ने नवंबर 2021 में अल जजीरा से इस्तीफा दे दिया और युगल ह्यूलेब्रोक के मूल देश बेल्जियम चली गईं, लेकिन वह वहाँ ज्यादा समय तक नहीं रह सकीं, क्योंकि वह वहाँ की निवासी नहीं थी। इस जोड़े के पास रहने के लिए सिर्फ अफगानिस्तान का वीजा था। इसके बाद बेलिस ने तालिबान के वरिष्ठ लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि अगर वह अफगानिस्तान लौटती हैं, तो वह ठीक रहेंगी।