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उत्तर प्रदेश : वैश्विक मंच तक पहुँची अवधी व्यंजनों की महक, UNESCO की ‘क्रिएटिव सिटीज’ सूची में शामिल हुआ लखनऊ

नेस्को क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ की उपाधि पाने वाला भारत का दूसरा शहर बना लखनऊ (साभार: दैनिक भास्कर, अमृत विचार)
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को अपनी समृद्ध और विविध पाक कला परंपरा के लिए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की ‘क्रिएटिव सिटीज’ सूची में शामिल किया गया है। UNESCO की महानिदेशक ऑड्रे अजोले ने इस साल 58 नए शहरों को ‘रचनात्मक शहरों’ के नेटवर्क का हिस्सा बनाया, जिनमें लखनऊ को ‘पाक कला’ श्रेणी में चुना गया है।

यह घोषणा शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को उज्बेकिस्तान के समरकंद में हुई यूनेस्को की 43वीं जनरल कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘वर्ल्ड सिटीज डे 2025’ पर की गई। उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि लखनऊ की इस उपलब्धि के पीछे पर्यटन विभाग की मेहनत रही, जिसने शहर के नामांकन का प्रस्ताव तैयार कर जनवरी 2025 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को भेजा था।

मंत्रालय द्वारा जरूरी समीक्षा किए जाने के बाद भारत सरकार ने मार्च में इसे UNESCO के पास भेजा, जिसके चलते शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को लखनऊ को यह सम्मान मिला। भारत के यूनेस्को में स्थायी प्रतिनिधिमंडल ने इस उपलब्धि को देश के लिए गर्व का क्षण बताया और जानकारी दी कि ‘वर्ल्ड सिटीज डे’ के अवसर पर लखनऊ को ‘यूनेस्को क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ नामित किया गया है।

लखनऊ के स्वादिष्ट व्यंजनों को मिला वैश्विक सम्मान

यह सम्मान लखनऊ की समृद्ध अवधी पाक परंपरा, चाट, कबाब, बिरयानी और मिठाइयों जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की वैश्विक पहचान का प्रतीक है। इससे पहले भारत से केवल हैदराबाद को यह सम्मान प्राप्त था और अब लखनऊ इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल होने वाला दूसरा भारतीय शहर बन गया है।

UNESCO ने बताया कि इस सम्मान का उद्देश्य उन शहरों को प्रोत्साहित करना है जो रचनात्मकता (क्रिएटिवीटी) और संस्कृति को सतत विकास का आधार बनाते हैं। संगठन की महानिदेशक अजोले ने कहा कि रचनात्मक शहर यह साबित करते हैं कि संस्कृति और क्रिएटिव उद्योग न केवल आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देते हैं बल्कि सामाजिक सामंजस्य और स्थानीय विकास के भी सशक्त माध्यम हैं।

UNESCO का क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क (UCCN) वर्ष 2004 में शुरू किया गया था, ताकि ऐसे शहरों को जोड़ा जा सके जो संस्कृति के माध्यम से समावेशी और सतत विकास को आगे बढ़ाते हैं। यह नेटवर्क उन पहलों को प्रोत्साहित करता है जो रोजगार के अवसर बढ़ाने, सांस्कृतिक जीवन्तता बनाए रखने और सामाजिक एकता को सशक्त करने में सहायक हैं।

सीएम योगी बोले- ऐतिहासिक उपलब्धि

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। सीएम योगी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के यशस्वी मार्गदर्शन में भारत की परंपरा, संस्कृति और मूल्यों को वैश्विक पटल पर निरंतर नई पहचान और प्रतिष्ठा प्राप्त हो रही है।” उन्होंने आगे लिखा, “इस ऐतिहासिक उपलब्धि की प्रदेश वासियों को हार्दिक बधाई!”

विश्वभर के शहरों ने रचनात्मकता से बढ़ाया अपनी सांस्कृतिक पहचान का मान

लखनऊ के अलावा इस साल संगीत, डिजाइन, फिल्म, पाककला और साहित्य जैसी विभिन्न श्रेणियों में कई अन्य शहर भी शामिल किए गए हैं, जिनमें संगीत के लिए केन्या का किसुमु और अमेरिका का न्यू ऑरलियंस, डिजाइन के लिए सऊदी अरब का रियाद, पाक कला के लिए पुर्तगाल का मातोसिन्होस और इक्वाडोर का कुएनका शामिल हैं।

वहीं फिल्म के लिए मिस्र के गीजा, वास्तुकला के लिए फिनलैंड के रोवेनेमी, मीडिया कला के लिए इंडोनेशिया के मलंग और साहित्य के लिए ब्रिटेन के एबरिस्टविथ को शामिल किया गया है। अगला वार्षिक सम्मेलन वर्ष 2026 में मोरक्को के एस्सौइरा शहर में आयोजित किया जाएगा, जिसे 2019 में संगीत श्रेणी में यूनेस्को की सूची में स्थान मिला था।

दीपावली पर दीप ना जलाने का ज्ञान देने वाले हिन्दू विरोधी ‘अखिलेशुद्दीन’ इस्लाम या ईसाई मजहब कब कबूल कर रहे हो या कर लिया है? क्रिसमस को बता रहे आदर्श

                                                                                                                साभार: AI- Chatgpt
मुलायम सिंह ने निहत्ते रामभक्तों पर गोली चलवा दी और बेटा अखिलेश उर्फ़ ‘अखिलेशुद्दीन’ दीपावली पर दीये नहीं जलाने पर ज्ञान देकर लगता है अखिलेश ने इस्लाम या ईसाई मजहब कबूल लिया है? अगर क्रिसमस तुम्हारा आदर्श है तो क्या ईसाई मजहब कबूल कर लिया है? जिसका DNA ही हिन्दू विरोधी हो शंका होना स्वाभाविक है। राममन्दिर विरोध से लेकर अब दीपावली पर दीप जलाने का विरोध करने पर समाजवादी पार्टी में शामिल हिन्दुओं पर भी शंका होती है। आखिर इस राम विरोधी समाजवादी पार्टी को हिन्दू किस लालच में वोट देते हैं? क्या समाजवादी पार्टी को वोट देने वाले हिन्दू भी राम विरोधी हैं?    
 
https://www.facebook.com/reel/1321142609661144   
जहाँ देशभर में दीपावली पर खुशी का माहौल है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव को इससे चिढ़ हो रही है। उनकी ये चिढ़ इस बार दीपावली पर जलने वाले दीयों को लेकर है। इतना ही नहीं उनके बयान से यह भी साफ है कि ईसाइयों का त्योहार क्रिसमस उन्हें ज्यादा पसंद है लेकिन हिंदू त्योहार दीपावली पर दीया जलाना उनके लिए पैसों की बर्बादी है।

यह अखिलेश यादव ने खुद कहा है। लखनऊ में धनतेरस (18 अक्टूबर 2025) पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने कहा, “मैं प्रभु राम के नाम पर एक सुझाव देना चाहता हूँ। क्रिसमस के समय कई महीनों तक शहर जगमगा जाते हैं। उन्हीं से सीख लो बस क्यों खर्चा करना बार-बार दीयों और मोमबत्ती का। इस सरकार से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? इसे तो हटा देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यहाँ और भी खूबसूरत रोशनियाँ हों…”

सोशल मीडिया पर अखिलेश के बयान का विरोध

दीपावली पर अखिलेश यादव का यह सुझाव हिंदू त्योहारों के प्रति घृणा को दर्शाता है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी दीपावली मनाने वाले हिंदू लोगों ने अखिलेश के बयान का विरोध किया। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि लगता है अखिलेश यादव हिंदू भी नहीं है।

वहीं कई लोगों ने अखिलेश यादव को ‘अखिलेशुद्दीन’ नाम दे दिया और कहा कि ‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या ही आशा की जा सकती है।?

एक्स/ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा, “अब अखिलेश यादव को दीयों और मोमबत्तियों से दिक्कत हो गई है। आज उत्तरप्रदेश वालों को सोचना है ये ईसाई है या मुस्लिम?”

अन्य यूजर ने लिखा, “एक से बढ़कर एक नेता देखे पर इन के जैसा कोई नहीं जो खुद ही अपना स्टैंड क्लियर नहीं कर पाए। आखिर PDA के नाम पर लोगों को गुमराह कर झूठी तसल्ली दे अपना राजनीतिक करियर बनाने में माहिर नेता जी ब्राह्मणों, क्षत्रियों और सर्वणों का विरोध करते करते हिन्दुओं का अभी अपमान करने लगे। एक तरफ कुम्हार जाति के हमारे भाई बहन सालभर मेहनत कर दिवाली के उत्सव के लिए दीपक बनाते हैं तो दूसरी ओर यह महोदय क्रिसमस का उदाहरण देकर झालर लटकाने को बोलते हैं। अब सनातन धर्म के लोग क्रिसमस से सलाह लें… ?”

एक एक्स यूजर ने तर्क दिया, “उसी तरह हर साल ईद पर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जाती है? अगर आपने एक बार कर लिया तो क्या ये काफी नहीं है? पैसे बचाएँ और शायद एक मासूम जानवर भी। हर साल क्रिसमस पर पेड़ क्यों काटे जाते हैं?”

जाहिर है कि अखिलेश यादव के दीया जलाने पर पैसा बर्बाद करने वाले बयान से हिंदू धर्म के लोग नाखुश हैं। क्योंकि उन्हें दीपावली पर दीया जलाने का महत्व मालूम है। जो शायद सपा सुप्रीमो हिंदू होने के बावजूद नहीं जानते। तो अखिलेश यादव को जान लेना चाहिए कि दीपोत्सव का महत्व सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर पर भी जुड़ा है।

दीया जलाने का महत्व

दीपोत्सव की परंपरा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आत्म-चेतना और सामाजिक आर्थिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

बतौर प्रतीय यह दर्शाती है कि अंधकार पर प्रकाश, ज्ञान पर अज्ञान, असत्य परसत्य की विजय संभव है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदू परंपरा में दीपक को ‘आत्मा की ज्योति’ और ‘ईश्वर के दर्शन’ का माध्यम माना गया है। दीपक का उजाला न सिर्फ बाहरी बनाए हुए अंधकार को मिटाता है बल्कि भीतरी विचारों, भाव- निराशा और नकारात्मकता के अंधेरे को भी रोशन करता है।

इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दीया उन हजारों परिवारों की आजीविका का आधार भी बन गया है जो दीपावली जैसे त्योहारों के समय इस काम में जुटते हैं। इसका उदाहरण अयोध्या में हर साल होने वाले दीपत्सव से भी समझा जा सकता है। दीपावली के लिए स्थानीय कुम्हार परिवारों को दीये बनाने के बड़े ऑर्डर्स मिलते हैं।

दीया बनाने से रोजगार

वहीं दीपावली पर अयोध्या दीपोत्सव में हर साल बनने वाला विश्व रिकॉर्ड इस साल 2025 में भी बरकरार रहेगा। पिछले साल 26 लाख से अधिक दीयों का रिकॉर्ड अब 29 लाख दीये जलकर टूटेगा। यह केवल दीपावली पर लोगों की आस्था नहीं बल्कि इससे रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि साल 2017 से दीपोत्सव के बाद से उनका जीवन बदल गया। जहाँ पहले कु्म्हार परिवार दीपावली पर केवल 20 हजार कमाते थे, उनकी आय अब लाखों में पहुँच गई है। देशभर में भी छोटे-छोटे गाँवों में सैंकड़ों परिवार दीया बनाने के कारण ही सहज आजीविका जुटा रहे हैं।

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी उत्पाद पर जोर दे रहे हैं। दीपावली पर भी पीएम मोदी ने अपील की, “स्वदेशी अपनाएँ और इसे हर घर और बाजार का मंत्र बनाएँ।” पीएम मोदी की अपील से दीपावली के बाजार पर भी खासा असर देखने को मिला है। रंग-बिरंगे सजे बाजारों में दीपावली पर सारा सामान स्वदेशी है, जिसे खरीदने के लिए लोग भी उत्साहित नजर आ रहे हैं।

क्रिसमस पर पेड़ों का कटान

वहीं अखिलेश यादव के पसंदीदा त्योहार क्रिसमस पर लाखों पेड़ों को काटा जाता है, जो पर्यावरण और समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव डालती है। हर साल क्रिसमस पर पेड़ों को सजाने का चलन है और ये पेड़ या तो असली होते हैं या फिर प्लास्टिक के। प्राकृतिक क्रिसमस ट्री उगाने के लिए बड़े पैमाने पर कैमिकल फर्टिलाइजर्स और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, जिससे इकोसिस्टम पर गहरा असर पड़ता है।

इसके अलावा, इन पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों के घर नष्ट होते हैं, जिससे बायोडायवर्सिटी को नुकसान होता है। कटे हुए पेड़ जब लैंडफिल में जाते हैं तो वे कार्बड डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन प्रभावित होता है। वहीं आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री भी पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं क्योंकि ये प्लास्टिक से बने होते हैं, जो नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और लैंडफिल में वर्षों तक बने रहते हैं।

इसके साथ ही क्रिसमस पर आर्टिफिशयल लाइटों को दीपोत्सव से तुलना करने वाले अखिलेश यादव जान लें कि ये लाइट बिजली की खपत बढ़ाते हैं वहीं दीप जलाने से बिना बिजली का उपयोग करे संसार जगमग हो जाता है।

अखिलेश यादव का दोगलापन

शायद अब अखिलेश यादव को दीपावली पर दीपोत्सव का महत्व समझ आ जाए। या शायद वे यहाँ भी आँख मींच लें। क्योंकि अखिलेश यादव साल 2024 में दीपावली पर दी गई शुभकामनाओं से तो लगता है कि उन्हें दीपोत्सव को थोड़ा बहुत ज्ञान तो जरूर है।

या फिर पिछली बार जो ट्वीट किया थो वो सिर्फ दिखावा था अखिलेश यादव? और इस बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में मन की बात निकाल दी। दीपावली पर अखिलेश यादव ने आसानी से दीपोत्सव न करने का सुझाव दे डाला। लेकिन ये सुझाव अखिलेश यादव को ईद, क्रिसमस या किसी अन्य धर्म के त्योहारों पर याद नहीं आते है क्या?

असल में उनका टारगेट अयोध्या में विश्व रिकॉर्ड दीपोत्सव है। उन्हें चिड़ है कि अयोध्या में बड़े संख्या में दीप जलाए जा रहे हैं, जिससे देश के नहीं बल्कि विदेशों के लोग भी जुड़ रहे हैं। अखिलेश यादव ने दीपावली पर जहरीला बयान देकर साफ कर दिया है कि अगर उनकी सरकार आती है तो उनके लिए दीपोत्सव का कोई महत्व नहीं है। हिंदू त्योहार दीपावली को पश्चिमी देशों में मनाए जाने वाले क्रिसमस से तुलना करना अखिलेश यादव की एक भद्दी हिंदू-विरोधी राजनीति के अलावा कुछ और नहीं है।

उत्तर प्रदेश : अयोध्या में बाबरी के बदले मस्जिद बनाने के मंसूबों पर NOC भारी: सुप्रीम कोर्ट की कृपा से ‘खैरात’ में मिली जमीन तो चंदा खूब वसूला, लेआउट प्लान नहीं हुआ पास

                                               अयोध्या मस्जिद का प्रस्तावित डिजाइन (फोटो- टीवी9)
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने जमीन दे दी लेकिन 5 साल बाद भी उस पर काम ठप पड़ा है। मस्जिद के लिए बने ट्रस्ट ने चंदा तो जुटाया लेकिन सरकारी विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) नहीं ले सका। अब NOC ना होने के चलते इसके लेआउट प्लान को भी अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) ने खारिज कर दिया है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय पत्रकार ओम प्रकाश सिंह द्वारा दाखिल RTI में सामने आया कि विभिन्न सरकारी विभागों का अनिवार्य NOC ना होने के चलते ADA ने यह प्लान खारिज किया है।

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक अयोध्या फैसले में राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था। साथ ही, मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया था।

इसके बाद 3 अगस्त 2020 को तत्कालीन जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने अयोध्या के पास धन्नीपुर गाँव में पाँच एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को हस्तांतरित कर दी। इसके बाद मस्जिद निर्माण के लिए बनाए गए ट्रस्ट ने 23 जून 2021 को ADA में लेआउट प्लान की मंजूरी हेतु आवेदन दायर किया था।

RTI के जवाब में ADA ने स्वीकार किया कि मस्जिद ट्रस्ट ने 4 लाख रुपए आवेदन और जाँच शुल्क के रूप में जमा किए। ADA के मुताबिक, मस्जिद निर्माण के लिए लोक निर्माण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नागरिक उड्डयन, सिंचाई एवं राजस्व विभाग, नगर निगम, जिलाधिकारी कार्यालय और अग्निशमन विभाग की NOC माँगी गई थी।

मस्जिद ट्रस्ट के सचिव ने क्या कहा?

मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन ने कहा कि उन्हें अग्निशमन विभाग की ओर से आपत्तियाँ आई थीं। अग्निशमन विभाग की साइट जाँच में पाया गया कि प्रस्तावित मस्जिद और अस्पताल भवन की ऊँचाई को देखते हुए अप्रोच रोड की चौड़ाई कम से कम 12 मीटर होनी चाहिए। जबकि मौके पर दोनों मार्ग छह मीटर से ज्यादा चौड़े नहीं पाए गए और मुख्य सड़क महज चार मीटर चौड़ी निकली थी।

हुसैन ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए जमीन देने का आदेश दिया और उत्तर प्रदेश सरकार ने हमें जमीन दी। इसके बाद भी आवश्यक NOC क्यों नहीं मिलीं और ADA ने प्लान को क्यों खारिज किया, यह समझ से बाहर है।”

उन्होंने आगे कहा कि अग्निशमन विभाग की आपत्ति के बारे में उन्हें जानकारी है लेकिन बाकी किसी भी विभाग की आपत्ति को लेकर उन्हें कुछ जानकारी नहीं है। बकौल हुसैन, RTI के जवाब से स्थिति स्पष्ट हो गई है और अब हम आगे की कार्रवाई करेंगे।

इस बीच अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है और यह पूरे होने के चरण में है। तो दूसरी और मस्जिद परियोजना लापरवाहियों के चलते अभी तक अधर में ही अटकी हुई है। जो लोग शताब्दियों तक कथित ढांचे को मस्जिद बताते हुए लड़ रहे थे, उनके लिए मस्जिद की प्राथमिकता कितनी है, यह 5 जमीन आवंटन के 5 वर्ष बाद स्पष्ट हो जाता है।

सैमसंग अब नोएडा में करेगा लैपटॉप मैनुफैक्चरिंग का काम, हर साल 60-70 हजार प्रोडक्ट होंगे तैयार: ‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगी धार, इंजीनियर्स को रोजगार

             सैमसंग ने नोएडा में शुरू की लैपटॉप मैन्युफैक्चरिंग, भारत में मैन्युफैक्चरिंग विस्तार की बड़ी शुरुआत
दक्षिण कोरिया की इलेक्ट्रॉनिक्स दिग्गज कंपनी Samsung ने भारत में अपने मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स का विस्तार करते हुए नोएडा स्थित प्लांट में लैपटॉप बनाना शुरू कर दिया है। यह कदम भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत देश को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।

PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, “सैमसंग ने अपने मैन्युफैक्चरिंग पोर्टफोलियो का विस्तार किया है और नोएडा फैक्ट्री में लैपटॉप बनाने जा रहा है। कंपनी भविष्य में और डिवाइसेज भी भारत में बनाने की योजना बना रही है।”

 नोएडा में यह फैक्ट्री 1996 में स्थापित हुई थी और तभी से भारत में सैमसंग की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के रूप में काम कर रही है। यहाँ पहले से ही फीचर फोन, स्मार्टफोन, वियरेबल्स और टैबलेट्स बनाए जाते हैं। अब लैपटॉप निर्माण की शुरुआत से कंपनी का फोकस भारत में अपने प्रोडक्ट्स की रेंज बढ़ाने पर है।

यह प्लांट हर साल 120 मिलियन स्मार्टफोन बनाने की क्षमता रखता है और दुनियाभर में सैमसंग का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माण केंद्र है (पहला दक्षिण कोरिया में है)। सैमसंग, भारत से स्मार्टफोन एक्सपोर्ट करने वाली दूसरी सबसे बड़ी कंपनी भी है, वहीं पहले नंबर पर Apple है।

जनवरी 2024 में सैमसंग के मोबाइल एक्सपीरियंस (MX) बिजनेस के प्रमुख टीएम रोह ने कहा था कि नोएडा प्लांट में लैपटॉप बनाने की तैयारी चल रही है। अब यह निर्माण शुरू होने जा रहा है और इस लाइन में हर साल करीब 60,000 से 70,000 लैपटॉप बनाए जा सकेंगे।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सैमसंग की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा, “सैमसंग भारत में उन्नत तकनीकी डिवाइसेज का निर्माण बढ़ा रहा है। यह भारत की प्रतिभा और नवाचार से प्रेरित है।”

हाल ही में उन्होंने Samsung Southwest Asia के CEO जेबी पार्क और कॉर्पोरेट वाइस प्रेसिडेंट एसपी चुन से भी मुलाकात की थी और कंपनी की भारत में भूमिका को सराहा।

भारत में सैमसंग का रिसर्च यूनिट 7,000 से ज्यादा इंजीनियरों को रोजगार देता है, जिससे यह साफ होता है कि कंपनी भारत के टेक इकोसिस्टम में लंबे समय तक निवेश करना चाहती है।

भारत सरकार ने अगस्त 2023 में लैपटॉप इंपोर्ट पर रोक लगाई थी, जिसे बाद में रजिस्ट्रेशन सिस्टम में बदला गया, ताकि देश में ही लैपटॉप निर्माण को बढ़ावा दिया जा सके।

हालाँकि Acer, HP, Lenovo और Asus जैसी कंपनियाँ सरकार की Production Linked Incentive (PLI) योजना का फायदा उठा रही हैं, लेकिन Samsung ने इस योजना में भाग नहीं लिया है। इसके बजाय, कंपनी अपने दम पर भारत में निर्माण क्षमता बढ़ा रही है।

भारत में लैपटॉप बनाकर, सैमसंग अब चीन और वियतनाम से होने वाले आयात पर निर्भरता घटाएगा, जिससे आयात शुल्क में बचत के माध्यम से उपभोक्ताओं के लिए लागत कम होने की संभावना है। 

वर्तमान में सैमसंग भारत के स्मार्टफोन मार्केट में दूसरा सबसे बड़ा ब्रांड है (मूल्य और वॉल्यूम दोनों में)। साथ ही यह टैबलेट पीसी मार्केट में 15% शेयर रखता है। हालाँकि अब तक लैपटॉप मार्केट में इसकी खास मौजूदगी नहीं रही है। यह कदम उस खाली जगह को भरने की दिशा में है।

सैमसंग अब MSI जैसी कंपनियों की कतार में शामिल हो गया है, जिसने हाल ही में चेन्नई में लैपटॉप बनाना शुरू किया है।

अयोध्या राम मंदिर : सरकार से लिया केवल 1 रूपया, लेकिन टैक्स में दे दिए 396 रूपए करोड़: अब तक 2150 करोड़ रूपए लगे; जामा मस्जिद, निजामुद्दीन दरगाह और अजमेर शरीफ से टैक्स कब वसूला जाएगा?


रामभक्तों के सदियों के आंदोलन के बाद अयोध्या में बना राम मंदिर जून, 2025 तक पूरी तरह से तैयार हो जाएगा। राम मंदिर का निर्माण हिन्दू समाज के सहयोग से हुआ है और इसमें सरकार से कोई मदद नहीं ली गई है। मंदिर ने इसके बावजूद सैकड़ों करोड़ का टैक्स भी सरकार को जमा किया है।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की एक बैठक में महामंत्री चम्पत राय ने कई जानकारी दी हैं। उन्होंने बताया है कि मंदिर निर्माण का 96% काम पूरा हो चुका है। यह जून, 2025 तक पूरा होगा। मंदिर की दीवाल का काम 60% पूरा हो चुका है। इसके भी जल्द पूरा किए जाने की आशा है।

चम्पत राय ने जानकारी दी है कि मंदिर निर्माण के लिए अब तक 2150 करोड़ रूपए खर्च किए जा चुके हैं। यह पैसा हिन्दुओं ने जमा किया है। राम जन्मभूमि ट्रस्ट के लिए आगे लगने वाली लागत भी इसी फंड से लगाई जाएगी। राम मंदिर ट्रस्ट को हिन्दुओं ने निर्माण के लिए 3500 करोड़ रूपए से अधिक दान में दिए थे।

मंदिर निर्माण के लिए राज्य या केंद्र सरकार से कोई भी आर्थिक सहायता नहीं ली गई है। सरकार ने सांकेतिक रूप से मंदिर निर्माण के लिए 1 रूपया दिया था। यहाँ तक कि जन्मभूमि क्षेत्र के भीतर जो निर्माण कार्य सरकारी एजेंसियाँ कर रही हैं, उसका भी पैसा मंदिर ट्रस्ट ही दे रहा है।

मंदिर क्षेत्र में रामकथा संग्रहालय, विश्रामगृह और तीन प्रवेश द्वार बनाने के लिए उत्तर प्रदेश भवन निर्माण निगम को ट्रस्ट ने 200 करोड़ रूपए का भुगतान किया है। राम मंदिर निर्माण से हिन्दुओं का सदियों की प्रतीक्षा तो पूरी हुई ही है, सरकार के खजाने को भी मोटा फायदा हुआ है।

ट्रस्ट के महामंत्री चम्पत राय के अनुसार, अभी तक वह 396 करोड़ रूपए का टैक्स सरकार को अलग-अलग मदों में दे चुके हैं। इसमें GST से लेकर स्टाम्प ड्यूटी तक शामिल है।

चम्पत राय ने बताया है कि 272 करोड़ रूपए GST, 39 करोड़ रूपए TDS, 5 करोड़ रूपए अयोध्या विकास प्राधिकरण को नक्शे पास के लिए, 29 करोड़ रूपए जमीन खरीद पर स्टांप ड्यूटी, 14 करोड़ रूपए  लेबर सेस, 7.4 करोड़ रूपए ESIC, 4 करोड़ रूपए बीमा, 10 करोड़ रूपए बिजली बिल और 14.9 करोड़ रुपए अलग-अलग राज्यों को रॉयल्टी के रूप में दिए गए हैं।

राम मंदिर में श्रद्धालु दान भी खूब कर रहे हैं। श्रद्धालु राम मंदिर को 944 किलोग्राम चाँदी भेंट कर चुके हैं। ट्रस्ट इन्हें चाँदी की ईंटों के रूप में बदल कर जमा कर रहा है। सोने के भी काफी आभूषण प्राप्त हुए हैं। श्रद्धालुओं ने मंदिर में मुकुट, कुंडल एवं बाकी कई आभूषण दिए हैं।

अयोध्या में राम मंदिर बनाने का निर्णय 9 नवम्बर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट का गठन किया था। राम मंदिर का नींव पूजन 5 अगस्त, 2020 को हुआ था। इसके बाद मंदिर बना चालू हुआ। 22 जनवरी, 2024 को मंदिर में श्रीराम की बाल प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। 

राम मंदिर द्वारा करोडो रूपए का टैक्स देने पर हिन्दुओं में चर्चा जोरों पर शुरू हो चुकी है कि दिल्ली की जामा मस्जिद और निजामुद्दीन दरगाह और अजमेर में चिश्ती की मजार पर आने वाले चढ़ावे पर कब टैक्स वसूला जाएगा? आखिर एकतरफा कानून कब तक?    

उत्तर प्रदेश : मुलायम सरकार ने वापस लिए संभल दंगों से जुड़े केस? आदेश की कॉपी सोशल मीडिया में वायरल, पीड़ित बोले- दोबारा हो जाँच

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले राज्य में कब दंगा हो जाए कुछ पता नहीं होता था। राज्य में सरकार चाहे कांग्रेस की हो या समाजवादी पार्टी की, दंगों में पीड़ित हिन्दू ही होता था। मुसलमान और मुस्लिम कट्टरपंथी 2002 गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को पानी पी-पीकर कोसते हैं। लेकिन दंगे की जड़ को भूल जाते हैं। दूसरे, 2002 से पहले गुजरात भी दंगों में उत्तर प्रदेश से पीछे नहीं था। लेकिन 2002 दंगों में नरेंद्र मोदी ने दंगाइयों को नहीं बख्शा, यही असली वजह है कि मुस्लिम कट्टरपंथी और छद्दम धर्म-निरपेक्ष की चादर ओढे ढोंगी मोदी को कोसते रहते हैं। दंगाइयों को ठिकाने की वही नीति योगी आदित्यनाथ ने अपनाई हुई है, जिसने गंगा-जमुना तहजीब और सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को प्रताड़ित करने वालों की नींद, रोटी और पानी पीना तक हराम हो गया है। हिन्दू खुलकर अपना कोई त्यौहार तक नहीं मना पाते थे। पास में मुसलमानों का मौहल्ला होने के कारण होली तक खेलना दुष्कर था। 

दूसरे, गुजरात दंगों पर मोदी को कोसने वाले अक्ल से पैदल मुसलमानों को कांग्रेस राज में हुए ईद-उल-फितर के दिन मलियाना दंगों को क्यों भूल जाते हैं? गुजरात दंगों को कट्टरपंथियों साबरमती ट्रेन में जिन्दा राम कारसेवकों को जिन्दा जलाये जाने पर हुए थे, लेकिन मलियाना में जो भयानक दंगा हुआ उसे अक्ल से पैदल नहीं भूलते। फिर भी ये कांग्रेस के तलवे चाटते रहते हैं।              
साल 1978 में उत्तर प्रदेश के संभल में हुए दंगों के मामले एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उस समय की मुलायम सिंह यादव सरकार ने कथित तौर पर दंगों से जुड़े आठ केस वापस ले लिए थे, जिसके बाद अब एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। 

2024 चुनावों में संविधान बचाने की दुहाई देने वालों जवाब दो कि "क्या दंगाइयों के केस वापस लेने की संविधान इजाजत देता है? संविधान की धज्जियाँ किसने उड़ाई? यानि चोर मचाये शोर।  

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पत्र 1993 में तत्कालीन विशेष सचिव (जस्टिस) आरडी शुक्ला द्वारा मुरादाबाद डीएम को भेजा गया था, जिसमें 16 मामलों में से आठ को वापस लेने का आदेश था। हालाँकि, मुरादाबाद प्रशासन ने पत्र की पुष्टि नहीं की है।

                                     संभल 1978 दंगों से जुड़ा कथित पत्र वायरल (फोटो साभार: न्यूज18)

इन मामलों में रिजवान, मुनाजिर, मिंजार और इरफान जैसे लोग मुख्य आरोपित थे। इन दंगों में आरोप था कि मुस्लिम दंगाइयों ने हिंदू व्यापारियों को लूटा और कई हिंदुओं की हत्या की। मामले में मुआवजे को लेकर भी पीड़ितों में नाराजगी है, क्योंकि उन्हें जो मुआवजा मिला था, वह बहुत कम था।

अब दंगा पीड़ित हिंदू समुदाय के लोग मुलायम सिंह यादव सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगा रहे हैं और योगी सरकार से इन दंगों की फिर से जाँच करने की माँग कर रहे हैं। वे न्याय की उम्मीद में हैं कि दोषियों को सजा मिल सके।

उत्तर प्रदेश : वीडियो कॉल पर बीवी का आइब्रो देख भड़के मोहम्मद सालिम ने सऊदी अरब से फोन पर ही दे दिया तीन तलाक

       आइब्रो बनवाने से नाराज कानपुर के मोहम्मद सालिम (दाएँ) ने अपनी बीवी को सऊदी अरब से दिया तीन तलाक
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से 3 तलाक का एक मामला सामने आया है। सऊदी अरब में कमाने गए एक व्यक्ति ने फोन करके अपनी बीवी को तीन तलाक दे दिया। तलाक की वजह पीडिता द्वारा आईब्रो बनवा है। पीड़िता ने अपने शौहर सहित ससुराल के कुल 5 लोगों पर दहेज़ के लिए प्रताड़ना देने का भी आरोप लगाया है। पुलिस ने इस मामले में मंगलवार (31 अक्टूबर 2023) को FIR दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है।

यह मामला कानपुर के बादशाही नाका थाना क्षेत्र का है। यहाँ रहने वाली पीड़िता का निकाह 17 जनवरी 2023 को प्रयागराज के फूलपुर इलाके के मोहम्मद सालिम से हुआ था। इस निकाह में लड़की के घर वालों ने अपनी हैसियत के मुताबिक दहेज दिया था और बारात की अच्छे से आवभगत की थी। आरोप है कि लड़की पक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद पीड़िता की सास मुज़फ़्फ़री, ननद रुखसार और देवर साकिब व सैफ दहेज़ से संतुष्ट नहीं थे।

शिकायत में पीड़िता ने बताया है कि उनके शौहर सहित ससुराल के बाकी तमाम लोग दहेज में कार की माँग कर रहे थे। निकाह के 3 माह बाद पीड़िता के शौहर मोहम्मद सालिम कमाने के लिए सऊदी अरब चला गया। इसके बाद पीड़िता के ससुराल के बाकी सदस्य उसे खाने-पीने के अलावा पहनने और ओढ़ने के लिए भी परेशान करने लगे। ससुराल वालों की करतूतों को पीड़िता ने सहा और अपने शौहर के घर लौटने पर सब ठीक हो जाने की उम्मीद बनाए रखी।

पीड़िता ने आरोप लगाया है कि उसकी ससुराल के बाकी सदस्य उनके शौहर को भड़काते थे। साथ ही पीड़िता को आए दिन तलाक देने की धमकी भी दी जाती रही। इस बीच 4 अक्टूबर 2023 को पीड़िता के शौहर ने रात लगभग 9:30 पर IMO एप के जरिए वीडियो कॉल की। थोड़ी देर की बातचीत में मोहम्मद सालिम ने पीड़िता पर उसकी मर्जी के खिलाफ आइब्रो बनवाने का आरोप लगाया। पीड़िता की कोई सफाई काम नहीं आई और आखिरकार आरोपित शौहर ने फोन पर उसे तीन तलाक दे दिया।

शिकायत के अंत में पीड़िता ने महज एक साल में ही बेसहारा हो जाने की दलील दी और पुलिस से आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता ने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज करवाई है। तहरीर के आधार पर मोहम्मद सालिम, मुजफ़्फ़री, रुखसार, साकिब और सैफ को नामजद आरोपित बनाया है। सभी पर दहेज़ अधिनियम व तीन तलाक कानून के तहत कार्रवाई की गई है।

आइब्रो बनवाना अजाब का सबब

ऑपइंडिया ने इस मामले में पीड़िता से बात की। पीड़िता ने बताया कि अब वो दुबारा अपनी ससुराल नहीं जाना चाहती। पीड़िता के पिता की मौत हो चुकी है और भाई बाहर कमाने गए हैं। वो अब अपनी माँ के साथ मायके में कुल 4 बहनों के साथ रह रही है। पीड़ित परिवार को आर्थिक संकट से भी गुजरना पड़ रहा है। मोहम्मद सालिम सऊदी अरब में रहकर गाड़ी चलाने का काम करता है।
महिला का कहना है कि उसका शौहर आइब्रो बनवाना गुनाह समझता था और इसे अजाब बताया। सालिम अपनी बीवी को हर बात के लिए टोका करता था। पीड़िता ने कहा कि उसने आइब्रो नहीं बनवाया था, इसके बावजूद इसका आरोप लगाकर उसके शौहर ने फोन पर तीन तलाक दे दिया।

उत्तर प्रदेश : BSP के पूर्व सांसद शाहिद अख़लाक़ के बेटे दानिश ने लड़की से किया रेप, पीड़िता बोली- और भी हिंदू लड़कियों को फँसा रखा है

पूर्व बसपा सांसद शाहिद अख़लाक़ के बेटे दानिश के खिलाफ रेप की शिकायत (चित्र साभार- @RajuSharmajour1 ट्विटर)
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में बसपा के पूर्व सांसद शाहिद अखलाक के बेटे दानिश पर रेप का आरोप लगा है। दिल्ली की रहने वाली एक हिन्दू लड़की ने शुक्रवार (25 अगस्त 2023) को दानिश के खिलाफ शादी का झाँसा देकर दुष्कर्म करने की शिकायत दर्ज करवाई है। आरोपित पर लड़की को जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुक्रवार को एक लड़की मेरठ के SSP ऑफिस में शिकायत लेकर पहुँची। खुद को दिल्ली की रहने वाली बताते हुए लड़की ने कहा कि कुछ समय पहले उसके इंस्टाग्राम पर दानिश कुरैशी नाम के एक युवक ने मैसेज किया था। थोड़े समय की चैटिंग के बाद दोनों के बीच फोन नंबर की लेन-देन हुई और फिर बातचीत होने लगी। पीड़िता का आरोप है कि दानिश ने खुद को कुँवारा बताया और अपने झाँसे में ले लिया।

दानिश 20 अगस्त को लड़की से मिलने के लिए दिल्ली के हौजखास इलाके में आया। यहाँ उसने खुद को पूर्व सांसद शाहिद अखलाक का बेटा बताया। 2 दिनों के बाद यानी 22 अगस्त को दानिश अख़लाक़ ने लड़की को मेरठ के देहरादून-दिल्ली रोड पर स्थित होटल क्रोम का पता देकर वहाँ मिलने के लिए बुलाया। पीड़िता का कहना है कि होटल में उससे कोई पहचान पत्र नहीं लिया गया। जब वह होटल पहुँची तो मैनेजर ने उसको एक कमरे में भेज दिया।

शिकायत के अनुसार, कुछ देर बाद वहाँ दानिश आया और बातचीत करने लगा। इसी दौरान उसने शराब पीनी शुरू कर दी। शराब पीने के बाद दानिश ने पीड़िता का रेप किया। लड़की रोने लगी तो दानिश ने शादी का वादा करके उसे चुप करा दिया। यहीं नहीं, इसी होटल में आरोपित ने पीड़िता का नहाते हुए वीडियो भी बना लिया। शक होने पर पीड़िता ने दानिश का मोबाइल चेक किया और वीडियो डिलीट कर दिया।

दानिश का मोबाइल चेक करने के दौरान ही पीड़ित युवती को उसके शादीशुदा होने की जानकारी मिली। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि दानिश के फोन की चैटिंग में उसने देखा कि वह कई हिंदू लड़कियों के संपर्क में है। इन सब लड़कियों को वह ऐसे ही बात करके धोखा दे रहा है।

इस घटना से पीड़िता खुद को ठगा महसूस करने लगी। इसके बाद उसने मामले में शिकायत दर्ज करवाई। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। पीड़िता ने मीडिया को दिए गए बयान में यह भी बताया कि उसे धोखा दिया गया है। उसने कहा कि दानिश ने उसे हर सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर दिया है और कॉल भी नहीं उठा रहा है।

शिकायत के बाद पुलिस ने मामले का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। हिन्दू संगठनों ने शाहिद अख़लाक़ के बेटे दानिश पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। एक हिन्दू संगठन के पदाधिकारी सचिन सिरोही ने कहा कि शाहिद अख़लाक़ के परिवार का इतिहास साल 1990 से कलंकित रहा है। सचिन का कहना है कि दानिश अख़लाक़ एक बार बंदूक के साथ पकड़ा गया था, जिसे मेरठ पुलिस ने खिलौना बता दिया था।

दानिश के अब्बा मोहम्मद शाहिद अख़लाक़ मांस के कारोबारी हैं। वो बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर साल 2004 में सांसद भी रह चुके हैं। शाहिद पर साल 2009 में कमेला (कसाईघर) को लेकर 24 अन्य लोगों के साथ केस भी दर्ज हो चुका है।


मुरादाबाद को मुस्लिम बहुल बनाने के लिए 30,000 बांग्लादेशी को घुसाया… फिर दंगों में 83 मौतें: केंद्र+राज्य की कांग्रेस सरकार का No Action – 496 पन्नों की रिपोर्ट

        मुरादाबाद के 1980 दंगों से पहले साजिशन बसाए गए थे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए (चित्र साभार- ऑर्गेनाइजर)
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 8 अगस्त 2023 को साल 1980 में हुए मुरादाबाद दंगों की जाँच रिपोर्ट पेश की। इस दंगे में कम से कम 83 लोगों की हत्या हुई थी और 112 अन्य घायल हो गए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश एमपी सक्सेना के एक सदस्यीय पैनल ने इन दंगों पर 496 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की है। जस्टिस सक्सेना की इस रिपोर्ट में दंगों के असल कारणों और उससे हुए नुकसान का जिक्र किया गया था।

तब केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों में ही कांग्रेस की सरकार थी। इस रिपोर्ट में हिंसा के दौरान वहाँ मौजूद न सिर्फ मुस्लिम और हिन्दुओं बल्कि तब तैनात पुलिस अधिकारियों का भी हवाला दिया गया है। दंगे के दौरान दर्ज हुए 6 हिंदुओं की गवाही का भी इस रिपोर्ट में उल्लेख है।

मुरादाबाद दंगों की रिपोर्ट के हर बयान में यह साफ़ है कि नरसंहार की योजना पहले से ही बनाई गई थी। 1980 में हुए इन दंगों के चश्मदीदों में से एक संतोष सरन ने अपनी लिखित गवाही में कहा है कि हिंसा की वजह वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति थी।

दंगे 13 अगस्त 1980 में भड़के थे। अपनी गवाही में संतोष सरन ने खुलासा किया है कि दंगे भड़कने से पहले 30,000 से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सोची समझी साजिश के तहत लाकर बसाया गया था। इन्हें मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल गाँवों में रखा गया था।

दंगों की प्रमुख वजह संतोष सरन ने जिले की डेमोग्राफी बदलने की साजिश बताया। सरन के अनुसार 1947 में मिली आजादी के समय मुरादाबाद मुस्लिम बहुल था। तब शहर की आबादी में 52 प्रतिशत मुस्लिम और 48% हिन्दू थे। लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद कई मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, जिस वजह से आज़ादी के बाद मुरादाबाद हिन्दू बहुल हो गया था। तब यहाँ 52 हिन्दू और 48 प्रतिशत मुस्लिम हो गए थे।

चश्मदीद सरन ने बताया कि कांग्रेस शासन में धीरे-धीरे मुरादाबाद में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों की लगातार घुसपैठ करवाई गई। इस वजह से एक बार फिर शहर की जनसांख्यिकी बदल गई। इन्हीं अवैध घुसपैठियों को स्थानीय मुस्लिमों ने हिंदुओं के खिलाफ भड़काया।

आरोप यह भी है कि तत्कालीन राज्य और केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इन अवैध घुसपैठियों पर कोई एक्शन नहीं लिया। चश्मदीद के मुताबिक कालांतर में इन्हीं अवैध मुस्लिम घुसपैठियों का दबदबा बढ़ता गया और मुरादाबाद में सांप्रदायिक हिंसा होना बहुत आम बात हो गई।

पिछली रिपोर्ट में एक अन्य चश्मदीद दयानंद गुप्ता की गवाही का जिक्र किया गया था। दयानंद के मुताबिक हिंसा की शुरुआत 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह से हुई थी। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने पुलिस अधिकारियों और दलित समुदाय के वाल्मीकि लोगों पर बेवजह हमला किया था। इसके अलावा न्यायमूर्ति सक्सेना के नेतृत्व में हुई जाँच की रिपोर्ट में भाजपा, RSS व अन्य हिन्दू संगठनों को क्लीन चिट दी गई है।

इसी रिपोर्ट में हिंसा के लिए मुस्लिम लीग के कुछ राजनैतिक लोगों की सांप्रदायिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया गया था और बताया गया कि दंगो की वजह बना सांप्रदायिक उन्माद मुस्लिम लीग और कांग्रेस नेताओं द्वारा रची गई साजिश का परिणाम था। ‘मुरादाबाद में ईद की नमाज के दौरान ईदगाह में सुअर घुसने’ के आरोपों को भी इस रिपोर्ट में पूरी तरह से खारिज किया गया है।

साल 1980 के मुरादाबाद दंगों पर जस्टिस सक्सेना की 496 पन्नों की रिपोर्ट मई 1983 में ही तैयार कर दी गई थी। हालाँकि इतने साल बीत जाने के बाद भी इस रिपोर्ट को एक विभाग से दूसरे सरकारी विभाग तक घुमाया जाता रहा। इसी के साथ पिछले लगभग 4 दशकों में इस जाँच रिपोर्ट को कोई न कोई बहाना बना कर कम से कम 14 बार दबाया गया था।

अवलोकन करें:-

उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में

योगी सरकार से पहले पहले किसी भी सरकार ने इसे सार्वजानिक नहीं किया। आखिरकार योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में UP में चल रही भाजपा सरकार ने 43 साल पुराने इस मामले को खोलने का फैसला लिया है। इसी साल मई में राज्य कैबिनेट ने न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने का फैसला किया और मंगलवार 8 अगस्त को यह रिपोर्ट यूपी विधानसभा में पेश हुई।

कुरान पर गलत तथ्यों के साथ एक छोटी सी डॉक्यूमेंट्री बनाओ और देखो क्या होता है… हाईकोर्ट की ‘आदिपुरुष’ के निर्माताओं को फटकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण (I&B) मंत्रालय और ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC)’ को नोटिस जारी करते हुए ‘आदिपुरुष’ फिल्म को लेकर जवाब माँगा है। फिल्म के आपत्तिजनक दृश्यों और डायलॉग्स को लेकर 2 PIL दायर की गई है, जिस पर दोनों संस्थाओं को उच्च न्यायालय ने एफिडेविट दायर करने के लिए कहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सेंसर बोर्ड द्वारा इस फिल्म को सर्टिफाई करना एक बड़ा ब्लंडर था और इसने बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएँ आहत की हैं।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस श्रीप्रकाश सिंह ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए फिल्म निर्माताओं की मानसिकता पर सवाल उठाया और कहा कि कुरान या बाइबिल जैसे पवित्र ग्रंथों को ऐसे नहीं छुआ जाना चाहिए और न ही उनसे छेड़छाड़ किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने माना कि ‘आदिपुरुष’ में जिस तरह से रामायण के किरदारों को दिखाया गया है, स्वाभाविक है कि लोगों की भावनाएँ आहत हुई होंगी। जजों ने कहा कि दिन प्रतिदिन ऐसी घटनाएँ बढ़ती ही जा रही हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि हाल के दिनों में ऐसी कई फ़िल्में आई हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक बनाया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूछा कि अगर हमने अभी अपना मुँह बंद कर लिया तो पता है क्या होगा? जजों ने एक फिल्म के दृश्य को याद किया, जिसमें भगवान शिव को त्रिशूल लेकर दौड़ते हुए दिखाया गया था और उनका मजाक बनाया गया था। कोर्ट ने पूछा कि अब ये सब दिखाया जाएगा? साथ ही कहा कि जब फ़िल्में कारोबार करती हैं तो निर्माता कमाते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “मान लीजिए कभी आपने कुरान पर कोई छोटी सी डॉक्यूमेंट्री बना दी, जिसमें आपने कुछ गलत दिखा दिया। तब देखिए क्या-क्या होता है। ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ये किसी एक धर्म के बारे में नहीं है। संयोग से ये मामला रामायण से जुड़ा हुआ है, न्यायपालिका तो हर धर्म का है। किसी भी धर्म को खराब तरीके से नहीं दिखाया जाना चाहिए। मुख्य चिंता ये है कि कानून व्यवस्था को बनाए रखा जाना चाहिए।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये टिप्पणियाँ की हैं, लेकिन फ़िलहाल कोई निर्णय नहीं सुनाया है। जजों ने कहा कि ये चीजें मीडिया में भी आ जाएँगी। हाईकोर्ट ने पूछा कि जैसा फिल्म में दिखाया गया है, धार्मिक किरदारों को कोई ऐसा सोच सकता है? खासकर जिस तरह के कपड़े इन किरदारों को पहनाया गया है, उस पर भी हाईकोर्ट ने सवाल उठाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भगवान राम, लक्ष्मण या माँ सीता का सम्मान करने वाले कभी इस फिल्म को नहीं देख सकते।


‘ज्ञानवापी ढाँचे की जगह भव्य शिव मंदिर जल्द’: इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष को झटका


हिन्दुओं के विभिन्न धार्मिक स्थलों को मुक्त कराने के लिए अदालत में लड़ाई लड़ रहे हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब वाराणसी के ज्ञानवापी ढाँचे की जगह पर भव्य शिव मंदिर बनेगा। बताते चलें कि ज्ञानवापी ढाँचा (Gyanvapi Masjid) मामले में भी हरिशंकर जैन (Hari Shankar Jain) हिंदू पक्ष के वकील हैं। वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार (31 मई 2023) को ढाँचा परिसर में स्थित माता श्रृंगार गौरी पूजा को लेकर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति को खारिज कर दिया।

भगवान विश्वेश्वर के मंदिर को तोड़कर मुगल आक्रांता औरंगजेब (Mughal Invader Aurangzeb) द्वारा बनवाए गए ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर वकील जैन ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि वह दिन दूर नहीं जब वर्तमान ढाँचे को हटा दिया जाएगा और हम (हिंदू समुदाय) वहाँ एक भव्य शिव मंदिर का निर्माण करेंगे।”

वकील हरिशंकर जैन ने कहा, “353 साल से हिंदू जनता संघर्ष कर रही है और चाहती है कि वहाँ से ढाँचा हटे और भगवान भोलेनाथ प्रकट हों। वहाँ भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गए हैं। उनकी भी साइंटिफिक जाँच होगी और मालूम पड़ जाएगा कि वहाँ पर शिवजी हैं।

ज्ञानवापी ढाँचे की जाँच को लेकर उन्होंने आगे कहा, “हमने पूरे-के-पूरे परिसर की वैज्ञानिक जाँच के लिए प्रार्थना-पत्र दिया है और उससे साबित हो जाएगा कि पूरा परिसर हिंदुओं का है। भगवान भोलेनाथ चाहते हैं कि मंदिर बने और हम उसी तरफ आगे बढ़ रहे हैं।”

 वाराणसी के ज्ञानवापी ढाँचा परिसर में ही माता श्रृंगार स्थित हैं। इनकी पूजा करने को लेकर राखी सिंह के नेतृत्व में 5 महिलाओं ने कोर्ट से अनुमति माँगी थी। हालाँकि, मस्जिद पक्ष से जुड़े अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने इसका विरोध करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High court) ने याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया।

इस अर्जी के खारिज होते ही माता श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की माँग वाली अर्जी पर सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। अब वाराणसी की जिला कोर्ट माता श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की माँग वाली याचिका पर सुनवाई करेगी।हाईकोर्ट के इस फैसले को मुस्लिम पक्ष के लिए बहुत बड़ा झटका माना जाता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर की एकल पीठ ने इस मामले में 23 दिसंबर 2022 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। दिसंबर में ही इस मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी थी। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने जिला जज वाराणसी के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिला जज की अदालत ने मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया था।

अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने अपनी अर्जी में कहा था कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के उपबंधों के तहत अदालत को वाद सुनने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कमेटी की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

दरअसल, रेखा सिंह एवं अन्य महिलाओं ने माता श्रृंगार गौरी की हर दिन पूजा करने की इजाजत कोर्ट से माँगी थी। इसके बाद कोर्ट के आदेश पर परिसर का सर्वे हुआ था। सर्वे के दौरान ढाँचे के तहखाने में कई हिंदू प्रतीक मिले। इसके साथ ही एक शिवलिंग भी मिला। मुस्लिम पक्ष इसे फव्वारा बताता आ रहा है।

इसके बाद 18 अगस्त 2021 को इन महिलाओं ने ज्ञानवापी परिसर में माता श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश, भगवान हनुमान समेत मौजूद अन्य देवताओं की रोजाना पूजा की इजाजत माँगने के लिए कोर्ट पहुँची। अभी यहाँ साल में एक बार ही पूजा होती है। अब हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष की आपत्ति खारिज होने के बाद परिसर में स्थित भगवानों की नियमित पूजा पर सुनवाई होगी।

मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने का नहीं दिया फरमान’: ज्ञानवापी पर मस्जिद कमेटी की दलील, कहा- परिसर में शिवलिंग नहीं फव्वारा है

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के पूरे सर्वे की माँग के विरोध में अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने वाराणसी कोर्ट में एप्लीकेशन दायर की है। इस एप्लीकेशन में न केवल हिंदुओं की याचिका का विरोध किया गया बल्कि औरंगजेब के आतंक को धो-पोंछने का प्रयास भी हुआ है। इसमें कहा गया है औरंगजेब निर्दयी नहीं था और उसने आदि विशेश्वर मंदिर को नहीं तोड़ा था।

हिंदुओं ने पूरे विवादित ढाँचे के एएसआई सर्वे के लिए याचिका डाली थी। इसमें उन्होंने कहा था भगवान आदि विशेश्वर मंदिर को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़ दिया था। बाद में राजा टोंडल ने सन् 1580 में इसका दोबारा निर्माण कराया।

कमेटी ने अब इसी याचिका का विरोध करते हुए कहा है दो काशी विश्वनाथ मंदिरों की कोई अवधारणा है ही नहीं। इसके अलावा उन्होंने ‘आक्रमणकारी’ शब्द के प्रयोग पर भी आपत्ति जताई। कमेटी ने इसे हिंदू और मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाने का एक प्रयास बताया।

एप्लीकेशन में कहा गया, “जमीन पर जो मस्जिद आलमगिरी/ज्ञानवापी मस्जिद है वो हजारों सालों से है। वह कल भी मस्जिद था और अब भी मस्जिद ही है। वाराणसी के मुसलमान या पड़ोसी जिलों के मुसलमान, अधिकार के नाते और बिन किसी पाबंदी के नमाज पंजगाना और नमाज जुमा और नमाज इदान यहाँ अदा कर रहे हैं।”

कमेटी यह भी मानने से इनकार करती है कि विवादित ढाँचे के परिसर में कोई शिवलिंग बरामद हुआ है। उनका अब भी यही कहना है कि वो एक फव्वारा है। वो कोर्ट से माँग करते हैं कि हिंदू श्रद्धालुओं की याचिका को खारिज कर दिया जाए।

मालूम हो कि अप्रैल 2021 में वाराणसी के सिविल जज ने विवादित ढाँच की एएसआई जाँच के लिए ऑर्डर पास किया था। इसपर मुस्लिमों ने इलाहाबाद कोर्ट में याचिका लगाई। मामला की सुनवाई हुई और दलीलों के बाद फैसला रिजर्व रख लिया गया। मस्जिद कमेटी का कहना है कि ऐसी स्थिति में एएसआई सर्वे का निर्देश नहीं दिया जा सकता है।

हिंदुओं ने वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से याचिका देते हुए माँग उठाई है कि विवादित ढाँचे का पूरा सर्वे ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल होते हुए होना चाहिए। इस पर कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से और यूपी सरकार को आपत्ति जाहिर करने के लिए 19 मई का समय दिया। अब मामले में एप्लीकेशन दायर हो गई है। मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई है।

औरंगजेब नहीं था क्रूर…कितना सच?

इस एप्लीकेशन में मस्जिद कमेटी ने दावा किया है कि औरंगजेब ने भगवान विशेश्वर के मंदिर को नहीं तोड़ा। जबकि इतिहास की किताबों में यह विदित है कि सन् 1669 CE में काशी विश्वनाथध मंदिर पर औरंगजेब ने हमला किया था। उसने मंदिर को तुड़वाकर ज्ञानवापी मस्जिद बनाया। इसके प्रमाण अब भी विवादित ढाँचों के खंबों में देखने को मिल जाते हैं।
हिंदू श्रद्धालु जिस काशी विश्वनाथ परिसर में आज पूजा करते हैं वो ज्ञानवापी मस्जिद के सामने हैं। इसे महान अहिल्या बाई होल्कर ने इंदौर में 1780 में बनवाया था। मासिर-ई-आलमगिरी में इस बात का उल्लेख मिलता है कि अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया था जिसमें काफिरों के स्कूल और मंदिर तोड़ने का आदेश दिया गया था। इसके अलावा इस फरमान के बारे में वाराणसी गजेटियर में भी पढ़ने को मिलता है जो 1965 में प्रकाशित हुआ था।

उत्तर प्रदेश : योगी आदित्यनाथ ने क्यों खोली 43 साल पुरानी मुरादाबाद के दंगों की फाइल ?

भारत ने स्वतन्त्रता पूर्व से और स्वतन्त्रता मिलने के बाद से आज तक साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त नहीं हुआ। और न ही जनता दंगों के असली दोषियों को पहचान सकी और जिसने ऐसा साहस किया आरोपी उन्ही लोगों को सांप्रदायिक करार कर देते हैं और भ्रमित जनता भी आरोपियों को ही धर्म-निरपेक्ष और जन हितैषी मानती आई है। लेकिन मकड़जाल का भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पटापेक्ष करना शुरू कर दिया है। तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी को मुस्लिम विरोधी मानने वालों को चाहे वह किसी मजहब से हो, आंखें खोलनी चाहिए। खून चाहे हिन्दू का बहे या मुसलमान का बहता बेगुनाह का। योगी द्वारा मुरादाबाद दंगे की 43 वर्ष पूर्व हुए दंगे की फाइल खोलने से असली दंगाइयों को बेनकाब करने का कठोर कदम उठाया है। 
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने एक बयान जारी करके मुरादाबाद के दंगों की पूरी घटना से देश को अवगत करवाया है। पूर्व डीजीपी बृजलाल ने कहा कि 13 अगस्त 1980 में मुरादाबाद में ईद के दिन नमाज पढी जा रही थी। पुलिस सुरक्षा में लगी हुई थी। इसी दौरान दलित बस्ती से एक सुअर आकर नमाज में व्यवधान डालता है। इसके बाद पुलिस वालों और मुसलमानों के बीच में कहासुनी शुरू होती है जो बाद में एक दंगे का रूप ले लेती है।

लेकिन पूर्व डीजीपी बृजलाल ने एक अहम बात ये बताई कि मुरादाबाद के एसपी और डीएम के सामने ही एडीएम स्तर के एक प्रभारी को मुसलमानों की भीड़ ने ईंट पत्थरों से मार मार कर कुचल डाला, यानी लिंचिंग कर डाली। ये दंगा इसके बाद भी रुका नहीं, पुलिस पर पथराव किया गया, फोर्स की राइफलें लूट ली गईं और चौकी में आग लगा दी गई, दंगा पूरे 4 महीने तक चला।

पूर्व डीजीपी बृजलाल के बयान में एक अहम बात ये भी सामने आई कि दंगा का प्लैनर मुस्लिम लीग का एक प्रदेश पदाधिकारी था । ये वही जिन्ना की मुस्लिम लीग है  जिसने देश का बंटवारा करवाया था । ये एक और प्रमाण है कि गांधी और नेहरू देश से उन मुस्लिम लीग के लोगों को भी बाहर नहीं निकाल सके जो देश के बंटवारे में शामिल थे।

इस दंगे की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस सक्सेना को नियुक्त किया गया था। जस्टिस सक्सेना ने इस पर अपनी रिपोर्ट तैयार की थी लेकिन इस रिपोर्ट को ना तो कांग्रेस सरकार ने टेबल किया, ना ही एसपी सरकार ने टेबल किया और ना ही बीएसपी सरकार ने टेबल किया। लेकिन 43 सालों के बाद योगी आदित्यनाथ ने मुरादाबाद दंगों की फाइल को टेबल करने का फैसला किया है जिसके बाद यूपी की राजनीति में हड़कंप मच गया है।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर योगी आदित्यनाथ ने इस रिपोर्ट को टेबल करने का फैसला क्यों किया? दरअसल इस दंगे की शुरुआत की मुख्य वजह दलित-मुस्लिम संघर्ष था। दरअसल मुरादाबाद के इसी इलाके के अंदर एक दलित लड़की का मुसलमानों ने किडनैप कर लिया था। बाद में उस लडकी को छुड़वाया गया और इसके बाद उसकी किसी दलित लड़के से शादी तय कर दी गई थी लेकिन जैसे ही बारात गांव के पास आई तो बारात पर मुसलमानों ने पत्थरबाजी कर दी। इस घटना से पहले ही तनाव की पृष्ठभूमि तैयार थी और जब नमाज के दौरान जानवर दलित बस्ती से आकर घुस गया तो ये भीषण दंगा हो गया।

यानी इस रिपोर्ट के बाहर आने से भीम मीम की बेबुनियाद और आधारहीन विचारधारा का पतन होगा। इसके साथ ही हिंदुत्व का एजेंडा सेट होगा। कांग्रेस पार्टी भी इसमें एक्सपोज होगी। 

सबसे बड़ी बात ये है कि इस मामले में आधिकारिक रूप से मरने वालों का आकंड़ा 400 के करीब था। लेकिन अनाधिकारिक रूप से कुछ स्रोत ये भी कहते हैं कि दंगे में करी 2500 लोग मारे गए थे। और इसमें कुछ लोग पीएससी की भी भूमिका होने का दावा करते हैं। उस वक्त यूपी में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और वी पी सिंह मुख्यमंत्री थे । ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी बात ये है कि इस रिपोर्ट के जारी होने से पूरे देश के अंदर कांग्रेस की पोल खुलेगी औऱ उसको मुसलमानों के सामने भी जवाब देना पडेगा और ये स्थिति बीजेपी के लिए काफी लाभदायक बन जाएगी।

1857 की क्रांति के महानायक धन सिंह कोतवाल के नाम गाजियाबाद मेरठ एक्सप्रेसवे का नाम पर रखने की मांग

मेरठ ( विशेष संवाददाता )1857 की क्रांति के नायक धनसिंह कोतवाल शोध संस्थान के तत्वावधान में यहां चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के  अप्लाइड साइंस ऑडिटोरियम सभागार में एक  संगोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें 1857 की क्रांति के नायक धनसिंह कोतवाल सहित उन सभी क्रांतिकारियों को याद किया गया, जिन्होंने उस समय मां भारती के गुलामी के बंधनों को काटने के लिए अपने शौर्य और साहस का प्रदर्शन करते हुए अपना बलिदान किया था। इस अवसर पर मेरठ गाजियाबाद एक्सप्रेस वे का नाम धन सिंह कोतवाल के नाम पर रखने  तथा दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे की परतापुर इंटरचेंज पर बनने वाले चौराहे का नाम क्रांति नायक धन सिंह कोतवाल चौक रखकर वहां एक बड़ा क्रांति द्वार बनाने की मांग एक बार फिर से उठाई गई।

 इस अवसर पर  कार्यक्रम के अध्यक्ष राज्यसभा के यशस्वी ऊर्जावान सांसद श्री विजय पाल सिंह तोमर ने कहा कि धनसिंह कोतवाल हम सब के गौरव हैं। उनके कारण ही यह भूमि आज सभी के लिए नमन करने योग्य बन गई है। उन्होंने कहा कि धन सिंह कोतवाल और उनके साथियों ने 1857 की क्रांति के माध्यम से देश को नई राह दिखाई थी। जिस पर चलते हुए अनेक क्रांतिकारी बलिदानी शहीद हुए । उसी के परिणाम स्वरूप एक देश को आजादी मिली। उन्होंने कहा कि धन सिंह कोतवाल जी  की संघर्ष गाथा को जीवंत बनाए रखने के लिए सरकार से वह जो भी संभव हो सकेगा, कराने का प्रयास करेंगे  मैं मेरठ एक्सप्रेसवे के प्रतापपुर इंटरचेंज पर बनने वाले चौराहे का नाम क्रांति नायक धन सिंह कोतवाल चौक रखने की मांग का समर्थन करता हूं और सरकार से आग्रह करूंगा कि इस चौराहे का नाम क्रांति नायक धन सिंह कोतवाल चौक रखकर वहां एक बड़ा क्रांति धार बनाया जाए उस क्रांति द्वार पर उस समय के सभी क्रांति नायकों के नाम अंकित कराए जाएं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला पंचायत अध्यक्ष गौरव चौधरी गौरव चौधरी ने अपने उद्बोधन में कहा कि मैं सौभाग्यशाली हूं कि मैंने श्री धन सिंह कोतवाल जी के गांव के पास ही जन्म लिया है आज हम धन सिंह कोतवाल जैसे वीर बलिदानी के कारण ही खुली हवा में सांस ले रहे हैं जहां भी धन सिंह कोतवाल से संबंधित कोई कार्य कराने के लिए मुझसे समाज आदेश करेगा मैं उस कार्य करने को अपना सौभाग्य मानूंगा.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नकुड़ के विधायक मुकेश चौधरी ने इस अवसर पर कहा कि क्रांतिकारी धन सिंह कोतवाल की वह अपनी विधानसभा में एक विशाल प्रतिमा स्थापित कराएंगे। जिससे कि आने वाली पीढ़ियों को नई प्रेरणा मिलती रहे। उन्होंने कहा कि धनसिंह कोतवाल ने अपने समय में साहसिक निर्णय लेकर अंग्रेजों को देश से भगाने का संकल्प लिया और इसके लिए अपना बलिदान करने में भी उन्हें तनिक संकोच नहीं हुआ। धन सिंह कोतवाल जी के नाम पर  गाजियाबाद मेरठ एक्सप्रेस वे का नाम रखने के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इसके लिए वह जनता के साथ हैं। भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता डॉ राकेश कुमार आर्य ने इस अवसर पर कहा कि धन सिंह कोतवाल रामप्यारी गुजरी, जोगराज सिंह गुर्जर और हरवीर सिंह गुलिया जैसे क्रांतिकारियों के रास्ते पर चलते हुए अपने समय में बहुत ही बलिदानी भावना से ओतप्रोत थे। सरकार को चाहिए कि मेरठ गाजियाबाद एक्सप्रेस वे का नाम धन सिंह कोतवाल राजमार्ग रखा जाए। श्री दिवाकर बिधूड़ी ने इस अवसर पर कहा कि हमें धन सिंह कोतवाल और उनके साथियों के क्रांतिकारी जीवन पर घमंड है ।आज समय आ गया है जब हम उनके  जीवन पर की गई शोध को राष्ट्रीय इतिहास में स्थान दिलाएं।

इस अवसर पर डॉ मामराज सिंह, नरेंद्र गुर्जर, हरिओम बैंसला, प्रोफेसर नवीन चंद्र गुप्ता , डॉ यतेंद्र कटारिया, श्रीमती सिम्मी भाटी प्रवक्ता डॉ पूनम चौधरी नरेश पाल सिंह श्री देवेश चंद्र शर्मा, डॉ पूनम ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सभी वक्ताओं ने जहां धन सिंह कोतवाल के राष्ट्रवादी व्यक्तित्व और कृतित्व का जमकर गुणगान किया वहीं सरकार से यह मांग भी की कि आने वाली पीढ़ी को धन सिंह कोतवाल के बारे में विशेष जानकारी देने के लिए पाठ्यक्रम में उन्हें सम्मिलित किया जाए।  धनसिंह कोतवाल के वंशज एवं शोध संस्थान के चेयरमैन तस्वीर सिंह चपराना ने भविष्य के कार्यक्रमों की रूपरेखा एवं कार्यक्रम का सफल संचालन किया.

कार्यक्रम में मुख्य रूप से चेयरमैन जबर सिंह जी, पूर्व जीएम बृजपाल सिंह चौहान जी, पूर्व एसपी रमेश जी, पूर्व डीएसपी बले सिंह जी,पूर्व डीएसपी राजेंद्र जी, रोबिन गुर्जर जी, नरेश गुर्जर जी , देवेंद्र गुर्जर जी, प्रधानाचार्य नरेश जी, प्रधानाचार्य नवल सिंह जी ,मैडम सिम्मी भाटी जी, डॉक्टर पूनम जी, डॉ नवीन चंद्र गुप्ता जी, डॉ विवेक गुप्ता जी, डॉ विपिन त्यागी जी ,प्रधानाचार्य नवल सिंह जी डॉ अशोक कुमार जी, गुलवीर पार्षद जी ,सतीश मावी जी, सिम्मी भाटी जी ,मंजू ठाकुर जी, अंशिका ,गौतम प्रजापति जी, सुंदर सिंह पठानपुरा जी, प्रधान धर्मेंद्र, प्रधानतिलक राज सिंह, लव कुश शास्त्री, आदि ने बड़ी संख्या में प्रतिभाग किया.

उत्तर प्रदेश : मेढक मन्दिर के नाम से चर्चित देवों के देव महादेव का मन्दिर


भगवान शिव सबके प्रिय है चाहे भूत पीशाच ही क्यों न हो, वे हमेशा सर्पों से घिरे रहते हैं। 
उनके मंदिर में नंदी भी विराजमान रहते हैं। लेकिन दुनिया का एक ऐसा इकलौता मंदिर भी है जहां भगवान शिव के साथ मेंढक का भी वास है।
जी हां, शिव जी का एक मंदिर ऐसा भी है, जिसकी रक्षा बरसाती मेंढक करता है। हैरानी की बात ये है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा करने की सख्त मनाही है और मंदिर के आस पास रहने वाले लोग भी श्री हरी विष्णु की आराधना करने से कतराते है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के ओयल गाँव में है ये मंदिर और इस मंदिर की खासियत ये है कि मंदिर के बाहर एक विशालकाय मेढ़क की मूर्ति बनी हुई है।
गांव के लोंगों का मानना है कि ये मूर्ति कोई आम मूर्ति नहीं है बल्कि भगवान शिव की रक्षा करने वाली मूर्ति है। इस मंदिर में रोजाना भगवान शिव के साथ साथ इस बरसाती मेढ़क की भी पूजा होती है। यहां पर लोग पूजा करने के लिए दूर से भी आते है।
इस मंदिर के बारे में वैसे तो कई सारी मान्यताएं है कि इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति इस मेढ़क पर सवार है जो कि देखने में बहुत ही वास्तविक लगती है।
इस अद्भुत मंदिर के चर्चे काफी दूर दूर तक है। इसके दर्शन करने से गांव वालों के दुख दूर हो जाते है. ऐसा गांव वालों का मानना है।
इस मंदिर में भगवान शिव का मंदिर होने के बावजूद इस मंदिर को शिव मंदिर के नाम से कोई नहीं जानता है। जीं हां इस मंदिर को मेढ़क मंदिर के नाम से जाना है। इस वजह से ही इस मंदिर को खास कहा जाता है।
इस मंदिर को पूजने वाले लोग शिव को पूजते है क्योंकि वो शिव को अपना आराध्य मानते है। तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण मनमोह लेती है।
इसी कारण ये मंदिर औरों से अलग है। इस मंदिर को वास्तु को ध्यान में रखते हुए स्थापित किया गया है।