यह खबर देश के हर नागरिक के लिए बेहद विचारणीय है। अयोध्या के धन्नीपुर में बनने वाली प्रस्तावित भव्य मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय से उतने पैसे भी नहीं मिले, जितने की उम्मीद की जा रही थी। सुनने में शायद यह बात अजीब लगे लेकिन हकीकत में यह हँसने की नहीं बल्कि गहराई से सोचने की बात है। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि एक खास समुदाय की सोच में कितना कट्टरपंथ और जिद्द बसी है।
Secularism का चोला ओढे पहने घूम रहे हिन्दुओं से लेकर राज्य/केन्द्र सरकारें, पुलिस और सुप्रीम कोर्ट को आंखें खोलनी चाहिए। राममन्दिर बनने के बाद से शोभायात्राओं पर होने वाली पत्थरबाज़ी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। ये सब सुनियोजित षड़यंत्र है। भड़काऊ नारेबाजी, डीजे बजाना आदि victim card से ज्यादा कुछ नहीं। इनसे सख्ती से यह पूछना चाहिए कि इतना पत्थर कहाँ से/कब आया और किसके कहने पर?
ये मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली दूसरी जगह पर एक भव्य मस्जिद, अस्पताल या लाइब्रेरी बनाने के लिए अपनी जेब से पैसा देने को तैयार नहीं हैं। वे आज भी इसी बात पर अड़े हैं कि राम जन्मभूमि की वही जमीन उनकी थी और वे उसी जमीन के मोह में फँसे हैं। यह मानसिकता केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में वक्फ की हर संपत्ति और विवादित ढांचे पर उनकी इसी सोच को बयाँ करती है।
क्यों औंधे मुँह गिरी भव्य मस्जिद की योजना?
साल 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया, तो उसके बाद सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दी थी। इस जमीन पर मुस्लिम ट्रस्ट ने बहुत बड़ा प्लान बनाया था। उन्होंने सोचा था कि यहाँ एक शानदार और भव्य मस्जिद बनेगी। साथ ही, लोगों की भलाई के लिए 300 बेड का एक बड़ा अस्पताल, एक बढ़िया लाइब्रेरी और एक बड़ा लंगर (कम्युनिटी किचन) भी तैयार किया जाएगा। पूरा नक्शा और तैयारी एकदम पक्की थी।
लेकिन असलियत में हुआ इसके ठीक उलटा। खुद मुस्लिम समाज के लोगों ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इससे अपना मुँह मोड़ लिया। अपनों के इस तरह साथ छोड़ने की वजह से यह बड़ा और खूबसूरत प्लान पूरी तरह ठप हो गया। अब संस्था के बड़े अधिकारियों का कहना है कि वे यहाँ कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सिर्फ एक बहुत छोटी सी मस्जिद बनाएँगे। इस छोटी मस्जिद को खड़ा करने के लिए भी कम से कम 3 से 5 करोड़ रुपए चाहिए, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी समाज से सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए का ही चंदा मिल पाया है।
मजहबी किताबों की उल्टी व्याख्या और जमीन का मोह
देखिए, मस्जिद के लिए चंदा न मिलने की असली वजह यह बिल्कुल नहीं है कि लोगों के पास पैसे खत्म हो गए हैं। इसके पीछे असल में एक गहरी मजहबी और राजनीतिक सोच काम कर रही है। इस पुरानी और कट्टरपंथी सोच में जीत और हार का पैमाना हमारे आज के रक्षा विज्ञान से बिल्कुल अलग है। इस मानसिकता में लोग तब तक खुद को हारा हुआ मानते ही नहीं, जब तक कि उनके कब्जे से जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी हमेशा के लिए न चला जाए। सीधा सा नियम समझ लीजिए… इनके लिए किसी भी तरह जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखना ही सबसे बड़ी जीत है।
इस अजीब जिद के पीछे कुछ कट्टरपंथी विचारकों की अपनी तरह से की गई व्याख्या है। जैसे, कुरान के सूरा अल-बकरा की आयत 191 में एक जिक्र आता है कि ‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो।’ शुरुआत में यह बात सिर्फ मक्का की जमीन को वापस पाने के लिए कही गई थी, लेकिन समय के साथ कट्टरपंथी सोच के लोगों ने इसे पूरी दुनिया की जमीनों से जोड़ दिया। उनकी सोच यह बन गई कि जो जमीन एक बार ‘दार-अल-इस्लाम’ यानी इस्लामिक शासन के नीचे आ गई, वह हमेशा के लिए उन्हीं की हो गई। उसे किसी भी गैर-मुस्लिम के हाथ में जाने देना ये अपनी सबसे बड़ी मजहबी हार मानते हैं। यही वजह है कि इतिहास में सदियों पहले स्पेन (अंडालूसिया) में हुई अपनी हार का रोना ये लोग आज भी रोते हैं।
वक्फ संपत्तियों पर अवैध दावा और जमीन हड़पने की वही पुरानी नीति
यही रवैया हमें वक्फ बोर्ड और बाकी जमीनी विवादों में भी साफ देखने को मिलता है। इनकी सोच बहुत सीधी है, जिस भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर एक बार हक जता दिया या जिसे अपना मान लिया, उसे फिर किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है। उसे छोड़ना ये अपनी नाक कटने जैसा या अपनी हार मानते हैं।
यही वजह है कि जब भी सरकार या अदालतें वक्फ की जमीनों की जाँच करने या उनके नियमों को सुधारने की कोशिश करती हैं, तो ये लोग तुरंत विरोध में खड़े हो जाते हैं और हंगामा शुरू कर देते हैं। इनके लिए जमीन हाथ से जाने का सीधा मतलब है अपनी ताकत का कम होना। पुरानी सोच के मुताबिक, जो जमीन एक बार इनके कब्जे में आ गई, उसे किसी और को देना ये अपनी सबसे बड़ी हार समझते हैं। इसी चक्कर में ये अदालती फैसलों को भी मन से स्वीकार नहीं कर पाते और हर जगह कोई न कोई नया विवाद खड़ा रखते हैं।
प्रशासनिक पेंच और अब सरकारी सहायता पर टिकी निगाहें
अयोध्या के धन्नीपुर में इस काम के समय पर शुरू न होने की वजह सिर्फ पैसों की कमी ही नहीं थी, बल्कि इस मस्जिद को बनाने वाले ट्रस्ट की अपनी कमियाँ भी थीं। सरकारी दफ्तर से नक्शा पास कराने और उसकी फीस जमा करने जैसे कागजी कामों में ही इस ट्रस्ट ने बहुत लंबा समय खराब कर दिया। छोटे-छोटे तकनीकी कामों को भी ये लोग समय पर नहीं संभाल पाए।
अब जब मुस्लिम समाज के लोगों ने इस बड़े प्रोजेक्ट को पूरी तरह नकार दिया है और चंदा देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो ये लोग अंदर ही अंदर एक नया रास्ता ढूँढ रहे हैं। ट्रस्ट के लोगों की बातों से अब ऐसा लग रहा है कि जब अपनों से कोई मदद नहीं मिली, तो इनकी नजरें सरकार की तरफ टिक गई हैं। अब ये जुगाड़ लगाने में जुटे हैं कि कैसे भी करके सरकारी मदद या विकास का पैसा मिल जाए, ताकि किसी तरह इनकी इज्जत बच सके।
एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ खोखली जिद
अगर आप इस पूरे मामले को ध्यान से देखें, तो यह एक तरफ भारत के गौरव और हमारे भव्य राम मंदिर के शानदार निर्माण को दिखाता है। वहीं दूसरी तरफ, यह कुछ लोगों की पुरानी और जिद से भरी सोच की पोल भी खोलता है। एक तरफ जहाँ देश-विदेश से करोड़ों हिंदुओं ने अपनी मर्जी से दिल खोलकर चंदा दिया और राम मंदिर का सपना पूरा कर दिखाया, वहीं दूसरी तरफ सिर्फ जिद और कट्टरपंथ के चक्कर में मुस्लिम समाज अपनी ही इस नई मस्जिद के लिए थोड़ी सी रकम भी जमा नहीं कर पाया।
चाहे वाराणसी का ज्ञानवापी मामला हो, धार की भोजशाला का विवाद हो या फिर वक्फ कानून में सुधार की बात… हर जगह सिर्फ जमीन पर अपना कब्जा जमाए रखने की यह मानसिक लड़ाई साफ दिखती है। अयोध्या के धन्नीपुर की मस्जिद का इतना बड़ा प्लान अचानक बहुत छोटा हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। जब तक लोग सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक सिर्फ विरोध और जिद के दम पर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले के बीच दान की गणना करने वाले 23 कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। कर्मचारियों के काम पर नहीं पहुँचने के कारण गुरुवार (9 जुलाई 2026) को केवल 13 गणनाकर्मियों से चढ़ावे की गिनती कराई गई। अचानक हुए इस घटनाक्रम से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, भारतीय स्टेट बैंक और कर्मचारियों की व्यवस्था करने वाली एजेंसी के सामने परेशानी खड़ी हो गई है।
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्तीफा देने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि पहले मंदिर में चढ़ावे की गणना दो शिफ्टों में होती थी। प्रत्येक कर्मचारी से करीब छह घंटे काम लिया जाता था। चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद कई कर्मचारियों को हटा दिया गया और सुरक्षा के मद्देनजर दोनों शिफ्टों का काम एक ही शिफ्ट में कर दिया गया। इसके बाद कर्मचारियों की ड्यूटी सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक, यानी नौ घंटे कर दी गई।
कर्मचारी का दावा है कि पहले सभी को 14,755 रुपए मासिक वेतन मिलता था लेकिन बाद में इसे घटाकर अलग-अलग कर दिया गया। किसी कर्मचारी को 8,000 रुपए तो किसी को 11,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाने लगे। महीने में मिलने वाली छुट्टियों की संख्या भी कम कर दी गई है।
जुलाई 8 को शाम काम समाप्त होने के बाद कर्मचारियों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। उन्होंने काम के घंटे, वेतन और छुट्टियों की व्यवस्था पहले की तरह करने की माँग रखी। एसबीआई की तुलसी उद्यान शाखा के अधिकारियों और सैनिक सिक्योरिटी के सुपरवाइजर जयराम यादव से भी शिकायत की गई लेकिन माँगें स्वीकार नहीं हुईं। इसके बाद 23 कर्मचारियों ने हस्ताक्षरयुक्त सामूहिक इस्तीफा और मांगपत्र सौंप दिया।
जुलाई 9 की सुबह इस्तीफा देने वाला कोई कर्मचारी काम पर नहीं पहुँचा तो बैंक, ट्रस्ट और एजेंसी के अधिकारी सक्रिय हो गए। बैंक के अनुसार केवल 13 कर्मचारियों ने गणना की जिससे काम प्रभावित हुआ है। नए कर्मचारियों की भर्ती की तैयारी है लेकिन चोरी के मामले के बाद पूरी तरह सत्यापन के बिना किसी को नियुक्त नहीं किया जा सकता।
वहीं, बैंक के एक कर्मचारी ने दावा किया कि कर्मचारियों को हटाया गया है और अब इतने कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है। इसी बीच ट्रस्ट के कार्यवाहक महासचिव कृष्ण मोहन ने अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास से मुलाकात की। करीब एक घंटे चली इस बैठक को भी इस्तीफा प्रकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
बाबरी मस्जिद के नाम पर मुसलमानों ने करोड़ों रूपए फूंक दिए। ईरान को मदद देने 18 करोड़ इकठे करने वाला मुसलमान अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिली जमीन पर मस्जिद बनाने के लिए किसी मुस्लिम मुल्क से मदद नहीं मिल रही। भारत का इस्लामिक कट्टरपंथी भारत की तरह उम्माह और दूसरे मुस्लिम संगठनों को भी बेवकूफ समझता है। वो भी समझता है कि आज की तारीख में भारत का मुसलमान इतना गरीब नहीं कि मस्जिद के लिए खैरात/जकात देने की हैसियत नहीं। राममन्दिर बनकर तैयार हो गया लेकिन इस्लामी हाथ में कटोरा लिए घूम रहा है।
अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धन्नीपुर में बनने वाली मस्जिद परियोजना का पूरा ढांचा ही ध्वस्त हो गया है। भव्य राम मंदिर के निर्माण पर तमाम तरह की बयानबाजी करने वाले और राम विरोधियों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि अब मुस्लिम समुदाय की बेरुखी और चंदे के महासंकट के कारण इस मस्जिद का आकार बेहद छोटा कर दिया गया है।
इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) ने अस्पताल और लाइब्रेरी जैसी बड़ी योजनाओं को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया है। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में 5 एकड़ जमीन आवंटित की थी। यह जगह राम मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर लखनऊ-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।
इस जमीन पर पहले एक बेहद भव्य मस्जिद बनाने का बड़ा दावा किया गया था। इस परियोजना में मुख्य मस्जिद के साथ-साथ एक 300 बिस्तरों का मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, एक समृद्ध केंद्रीय पुस्तकालय और कम्युनिटी किचन बनाने का पूरा खाका तैयार था। लेकिन खुद मुस्लिम समुदाय ने ही इस परियोजना से पूरी तरह मुँह मोड़ लिया। अपनों की इस भारी बेरुखी के कारण अब यह पूरा भव्य प्रोजेक्ट औंधे मुँह गिर गया है।
चंदे की भारी किल्लत, तिजोरी में नहीं बचा पैसा
जो लोग भव्य राम मंदिर को लेकर आए दिन मीडिया में बड़ी-बड़ी बयानबाजी करते थे, आज उनके खुद के प्रोजेक्ट के लिए चंदे का बड़ा अकाल पड़ गया है। फाउंडेशन के सचिव अतहर हुसैन ने साफ किया कि अब इस जगह पर केवल एक ‘छोटी मस्जिद’ का निर्माण किया जाएगा।
इस छोटी सी मस्जिद को बनाने के लिए भी कम से कम 3 करोड़ से 5 करोड़ रुपए के फंड की जरूरत है। लेकिन असलियत यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी फाउंडेशन अब तक सिर्फ 1.5 करोड़ रुपए का ही चंदा जुटा पाया है। यह रकम इस योजना के लिए पूरी तरह नाकाफी साबित हुई है, जिसके कारण ट्रस्ट को घुटने टेकने पड़े हैं।
खुद के फायदे के लिए सरकारी फंड के इस्तेमाल पर टिकी निगाहें
मुस्लिम समुदाय से अपेक्षित चंदा और सहयोग न मिलने के कारण अब ट्रस्ट की हालत खराब है। सूत्रों के अनुसार, चंदा इकट्ठा करने में नाकाम रहने के बाद अब अंदरखाने सरकारी सहायता और फंड को अपने तरीके से इस्तेमाल करने की जुगत लगाई जा रही है।
आईआईसीएफ के अध्यक्ष जुफर अहमद फारूकी ने खुद माना कि समुदाय की ओर से इस प्रोजेक्ट को लेकर भारी उदासीनता और अरुचि देखी जा रही है। लोगों ने इस काम के लिए बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाई, जिससे चंदे का यह संकट खड़ा हुआ है।
प्रशासनिक लेटलतीफी और नक्शे का पेंच
परियोजना के समय पर शुरू न हो पाने के पीछे केवल पैसों की कमी ही नहीं थी। ट्रस्ट की प्रशासनिक और तकनीकी कमियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार रहीं। अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) से मस्जिद और पूरे परिसर का नक्शा पास कराने की प्रक्रिया में ट्रस्ट को लंबा वक्त लग गया।
शुरुआत में इस 5 एकड़ की जमीन के लैंड यूज (भू-उपयोग) को बदलने में पेंच फँसा। इसके बाद विकास शुल्क (डेवलपमेंट चार्ज) के रूप में एक बड़ी सरकारी राशि जमा करने की तकनीकी बाध्यता सामने आई। हालाँकि बाद में विकास प्राधिकरण ने इस नक्शे को मंजूरी दे दी थी, लेकिन तब तक बजट का संकट इतना बढ़ गया कि ट्रस्ट जमीन पर कोई भी काम शुरू नहीं कर सका।
एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ बदहाली
अयोध्या का यह विवाद दशकों पुराना रहा है। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पूरे देश में बड़े दंगे हुए थे, जिसमें करीब 2,000 लोग मारे गए थे। इसके बाद साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी जमीन का मालिकाना हक हिंदुओं को सौंपते हुए भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को पूरा करते हुए उस पवित्र स्थान पर एक बेहद भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले इस मंदिर का भव्य उद्घाटन भी किया था।
राम मंदिर को लेकर छिड़ा ताजा राजनीतिक घमासान
एक तरफ जहाँ मस्जिद का काम पूरी तरह ठप हो चुका है, वहीं राम मंदिर का प्रबंधन भी इस समय राजनीतिक हमलों का सामना कर रहा है। मंदिर के चंदे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के कुछ आरोपों के बाद हाल ही में इसके प्रबंधन और नेतृत्व में बड़ा फेरबदल किया गया है।
उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसे देखते हुए विपक्षी दल इस मामले को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तमाम विवादों के बीच, मस्जिद का भव्य सपना टूटना और इसका आकार बेहद छोटा होना अब सबसे बड़ी सच्चाई बन चुका है।
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के बाद ट्रस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाया सबूत (फोटो साभार : Aajtak) राममन्दिर चढ़ावे की चोरी का जब से मुद्दा उठा है मीडिया विपक्ष द्वारा प्रायोजित खबरे प्रसारित कर सनातन विरोधी एजेंडा चलाकर अपनी TRP बढ़ाने में लगी रही। लेकिन कल(जुलाई 6) को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सबको बेनकाब कर दिया है। अभी जितनी परतें खुलेंगी सारे राम विरोधी चारों खाने चित होंगे। लेकिन इतनी मुस्तैदी से अजमेर शरीफ में हुए घोटाले पर चर्चा करने किसी ने माँ का दूध नहीं पिया। सिर्फ अजमेर शरीफ ही नहीं जितनी भी दरगाहें और मस्जिदें कोई ऐसी नहीं जहाँ घोटाला नहीं हो।
अयोध्या के राम मंदिर में दान का सामान गायब होने के आरोपों पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने करारा जवाब दिया है। ट्रस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में 5 करोड़ रुपए की सोने की रामचरितमानस, चाँदी की ईंटें और भगवान के चरण चिन्ह सबके सामने रख दिए।
कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने साफ कहा कि दान का एक-एक सामान पूरी तरह सुरक्षित है और चोरी की बातें झूठी हैं। दान में मिली सभी 2800 वस्तुओं का रजिस्टर गोविंद देव जी ने दिखाया। पूर्व IAS अधिकारी एस लक्ष्मीनारायणन ने आरोप लगाया था कि उनकी दी हुई सोने की रामचरितमानस गायब है।
इसकी कीमत करीब 5 करोड़ रुपए है। ट्रस्ट ने इस विवाद को खत्म करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस कीमती रामचरितमानस को सबके सामने रख दिया। साथ ही भगवान के सोने के चरण चिन्ह, हार और काकभुशुंडि को भी मीडिया को दिखाया गया।
दान में मिली सभी 2800 वस्तुओं का रजिस्टर गोविंद देव जी ने दिखाया।
साथ में सभी का प्रदर्शन भी किया ये पीड़ादायक लेकिन फिर भी
लेकिन आप देखते रहिए नए नए सनातनी बनने का नाटक करने वाला विपक्ष अभी भी लगातार मंदिर और न्यास को अपमानित करता रहेगा
— Shivam Tyagi (Modi Ka Parivar) (@ShivamSanghi12) July 6, 2026
SIT जाँच में सच आया सामने
सोशल मीडिया पर अफवाहें उड़ने के बाद स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने इस मामले की जाँच की। जाँच की शुरुआती रिपोर्ट में सामने आया कि श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई करीब 38 किलो और 22.5 किलो चाँदी की ईंटें ट्रस्ट के रिकॉर्ड में बिल्कुल सही सलामत दर्ज हैं।
जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, दान में मिली चाँदी की ईंटों को बाद में गला दिया गया था। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए ‘सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिन्टिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ भेजा गया था। इसका पूरा कानूनी रिकॉर्ड मौजूद है। इसी तरह मुंबई के कारोबारी और सिंधी समाज द्वारा दी गई 200 किलो चाँदी भी ट्रस्ट के पास पूरी तरह सुरक्षित पाई गई है।
चंपत राय का इस्तीफा मंजूर, नए चेहरे शामिल
राम मंदिर परिसर में करीब 3 घंटे तक ट्रस्ट की अहम बैठक चली। इस बैठक में महामंत्री चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। अब कृष्ण मोहन को अंतरिम महामंत्री बनाया गया है। बैठक में कुल 9 में से 7 स्थाई सदस्य मौजूद थे, लेकिन इसमें चंपत राय और अनिल मिश्रा शामिल नहीं हुए।
ट्रस्ट की अगली बैठक 22 जुलाई को बुलाई गई है। तब तक SIT की फाइनल रिपोर्ट भी आ जाएगी। इस अगली बैठक में मंदिर के लिए नए प्रशासनिक अधिकारियों, नए पदाधिकारियों और कुछ नए न्यासियों की नियुक्ति पर आखिरी फैसला लिया जाएगा।
मंदिर से चंदा चोरी करके लवकुश ने बनाया करोड़ों का महल, अब चलेगा बुलडोजर (फोटो साभार : X_@Bhupend29375158) प्रभु श्रीराम के चढ़ावे की चोरी करने वालों को यह सोंचना था कि उत्तर प्रदेश में अब मुलायम सिंह/अखिलेश यादव की नहीं योगी आदित्यनाथ की सरकार है। जहां अपराध भी जितनी मुस्तैदी से होता है उसी मुस्तैदी से योगी का बुलडोज़र भी हरकत में आने को तड़पने लगते हैं। चोर खेल तो खेल गए लेकिन प्रभु श्रीराम के प्रकोप से नहीं बच सकते। प्रभु ने सैकड़ों वर्ष संघर्ष किया। अब उनको भव्य स्थान मिलने पर जो चढ़ावा आया उसमे चोरी। कोई चोर और इनके आका किसी भूल में नहीं रहे। प्रभु जब अपने आशीर्वाद से देते हैं तो झोलियां छोटी पड़ जाती हैं, लेकिन छल से उनके भंडारे को लूटने वालों(किसी बीमारी, बेटी की शादी या फिर किसी असहाय स्थित आदि में कोई सहायता नहीं मिलने पर स्थिति ठीक होने पर वापस करने की शर्त पर क्षमा) को क्षमा नहीं दंड देते हैं।
चोरों को 80 के दशक में संजीव कुमार की बहुचर्चित फिल्म "यही है जिन्दगी" में घर के मन्दिर से शर्त के साथ चोरी करने पर प्रभु किस रूप में वापस लेते हैं प्राणी को पता तक नहीं होता। दूसरे, आज सनातन विरोधियों की क्या हालत हो रही है, उसे देख कर भी अगर किसी की आंखें नहीं खुलती उस हालत में कोई कुछ नहीं कर सकता।
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोपित लवकुश मिश्रा पर अब प्रशासन का बड़ा हंटर चलने वाला है। लवकुश मिश्रा की पत्नी के नाम पर बन रहे एक करोड़ से ज्यादा के आलीशान मकान को अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी ने ढहाने को नोटिस थमा दिया है।
परिवार के पास जवाब देने के लिए सिर्फ एक हफ्ते का समय मिला है, वरना मकान पर सीधे बुलडोजर चला दिया जाएगा। राम मंदिर में हुए इस महा-घोटाले के बाद राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अंदर भी आपसी लड़ाई शुरू हो गई है। ट्रस्ट के ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास महाराज ने खुलकर इस पर नाराजगी जताई है।
महंत दिनेंद्र ने इसके लिए सीधे तौर पर ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी गोपाल राव को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया कि गोपाल राव राम परंपरा को नहीं मानते हैं और उन्हीं की लापरवाही के कारण इतनी बड़ी चोरी हुई।
— Bhupendra Tiwari (@Bhupend29375158) July 2, 2026
20 हजार की नौकरी और डेढ़ करोड़ का निवेश
चोरी के आरोपित लवकुश मिश्रा की असलियत देखकर हर कोई हैरान है। वह महज 20 हजार रुपए की नौकरी करता था। लेकिन उसने अयोध्या के शहादतगंज इलाके में जयपुरिया स्कूल के पास करीब डेढ़ करोड़ रुपए का निवेश कर डाला। उसने अक्टूबर 2025 में अपनी पत्नी सुप्रिया मिश्रा के नाम पर 25 लाख रुपए की जमीन खरीदी थी। इसके बाद उसने वहाँ बड़ी तेजी से आलीशान मकान बनवाना शुरू कर दिया।
पड़ोसियों के मुताबिक लवकुश इस मकान को बनाने में अब तक 80 से 90 लाख रुपए पानी की तरह बहा चुका है। यह तीन मंजिला मकान अगले 3-4 महीनों में बनकर तैयार होने वाला था। इस मकान के पहले फ्लोर पर एक बड़ा किचन, चार कमरे और बकायदा लिफ्ट लगाने की जगह छोड़ी गई थी। दूसरे फ्लोर पर पाँच कमरे बनाए जा रहे थे और तीसरे फ्लोर को भी खड़ा करने की पूरी तैयारी थी।
अयोध्या पर विपक्षियों के षड्यंत्र का खुलासा😲
राम मंदिर चंदा चोरी अयोध्या तो एक बहाना है
काशी मथुरा और भोजशाला निशाना है
राम नाम की लूट है लूट रहे सब धूर्त वो भी राम के अब हो गए जो कहते थे राम कथा है झूठ pic.twitter.com/faUfsYPbv6
— Dilip Kumar Singh (@DilipKu24388061) July 1, 2026
पुलिस रेड के बाद से पूरा परिवार फरार
राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का खुलासा होने के बाद पुलिस ने लवकुश के घर पर छापेमारी की थी। पुलिस ने वहाँ से 14 लाख 25 हजार रुपए कैश बरामद किए थे। लवकुश की गिरफ्तारी होते ही उसका पूरा परिवार घर पर ताला लगाकर फरार हो गया है। फिलहाल वहाँ चल रहा निर्माण कार्य पूरी तरह से बंद है और प्रशासन अब उसकी पूरी संपत्ति की कुंडली खंगाल रहा है।
मीडिया को अपनी TRP की चिंता तो नेताओं को अपने वोटबैंक की। पुरुषोत्तम श्रीराम मन्दिर में चढ़ावे में हुई चोरी पर मीडिया और विपक्ष ने फर्श से लेकर अर्श तक को सर पर उठा रखा है। इनमें से कोई ईमानदारी से बताए क्या किसी मजहबी जगह पर घोटाले नहीं। दिल्ली के ही एक स्थानीय मुस्लिम ने कई बार मस्जिदों और दरगाहों में हो रहे घोटाले को सरकार और वक़्फ़ बोर्ड के सामने लाने की कोशिश की जबकि वक़्फ़ बोर्ड तो क्या सभी जानते हैं लेकिन किसी की हिम्मत नहीं। राममन्दिर की तरह जिस दिन दूसरे मजहबों पर हाथ डाला सबकी आंखें फटी रह जाएँगी। चोरी चोरी ही है चाहे वह मंदिर में हो या मस्जिद में।
— banwari Maheshwari (@banwariMaheshw1) June 26, 2026
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और हैंडलिंग में कथित गड़बड़ी का मामला अब जाँच के सबसे अहम दौर में पहुँच गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर इस मामले में FIR दर्ज हुई है। इसके बाद पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 आरोपितों को गिरफ्तार किया। आरोप है कि मंदिर में आने वाले दान की गिनती, रखरखाव और उससे जुड़ी व्यवस्था में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुईं।
यह मामला पहली बार 7 जून को सामने आया था। इसके बाद यूपी सरकार ने 13 जून को SIT का गठन किया। SIT ने 23 जून को एडिशनल चीफ सेक्रेटरी गृह संजय प्रसाद को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। इसी रिपोर्ट के दो दिन बाद कार्रवाई तेज हुई और मंदिर से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपितों में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जानेंगे कि ये 8 लोग कौन हैं इन पर क्या आरोप हैं।
FIR की कॉपी का एक हिस्सा
रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव
रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित चेहरा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का पूर्व ड्राइवर बताया जाता है और VHP के कारसेवकपुरम से भी जुड़ा रहा है। बताया गया है कि मंदिर की व्यवस्थाओं में उसका हस्तक्षेप रहता था और दानपात्रों की निगरानी से लेकर उन्हें बेसमेंट तक पहुँचाने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका थी।
आरोप है कि दानपात्रों की चाबियाँ भी उसी के पास रहती थीं और ट्रस्ट के लोगों से करीबी होने के कारण वह मनमाने तरीके से काम करता था। FIR और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी शुरुआती चरण में चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी हुई और उससे अयोध्या व आसपास के जिलों में संपत्तियाँ बनाने के आरोप लगे। हालाँकि, टिन्नू यादव ने कैश काउंटिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया है और आरोपों के पीछे कुछ ‘जलने वाले लोगों‘ को जिम्मेदार बताया है।
रामशंकर मिश्रा
रामशंकर मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप है। यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने बेटे अनुकल्प मिश्रा और दामाद लवकुश मिश्रा को भी चढ़ावा गिनने के काम में लगवाया।
पुलिस के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रामशंकर मिश्रा अन्य आरोपितों के साथ मिलकर दान की रकम में कथित हेराफेरी करते थे और कैश सॉर्टिंग प्रक्रिया के दौरान CCTV फुटेज में भी दिखे। जाँच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने तय वित्तीय प्रक्रिया को दरकिनार करने में भूमिका निभाई और लंबे समय तक कथित गड़बड़ी को आसान बनाया।
अनुकल्प मिश्रा
अनुकल्प मिश्रा, रामशंकर मिश्र का बेटा है और वह भी दान की रकम गिनने और संभालने की प्रक्रिया में शामिल था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अयोध्या के मिल्कीपुर क्षेत्र के बसावन गाँव का निवासी है। उसका संबंध ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा से भी बताया गया है।
अनुकल्प की ड्यूटी चढ़ावा गिनने के काम में लगती थी। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि कैश काउंटिंग के दौरान रकम में कथित हेराफेरी की गई और अनुकल्प के घर से चोरी की रकम बरामद होने का दावा भी किया गया है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि CCTV फुटेज और बरामदगी के आधार पर उसकी भूमिका की जाँच की जा रही है।
लवकुश मिश्रा
लवकुश मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम का हिस्सा था। आरोप है कि चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी के बाद उसके निपटान यानी ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी लवकुश पर थी। कहा गया है कि उसने मंदिर से चोरी कर करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है।
शुरुआती जाँच में उसके घर से रकम बरामद होने के दावे सामने आए थे। कुछ रिपोर्ट्स में उसके घर से करीब 12 लाख रुपए कैश मिलने की बात कही गई है। जाँच एजेंसियाँ इस रकम के स्रोत की जाँच कर रही हैं और आरोप है कि वह अनुकल्प मिश्रा के साथ मिलकर दान की रकम की हेराफेरी में सक्रिय रूप से शामिल था।
अविनाश शुक्ला
अविनाश शुक्ला को मंदिर की व्यवस्था और दान की रकम से जुड़ी प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति बताया गया है। रिपोर्ट्स में उसे मंदिर का अटेंडेंट या काउंटिंग टीम से जुड़ा सदस्य बताया गया है। आरोप है कि वह दान की रकम को सुरक्षित तरीके से काउंटिंग रूम तक पहुँचाने और गिनती की प्रक्रिया में शामिल था।
पुलिस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि वह उस कथित सिंडिकेट का अहम सदस्य था, जिस पर चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी का आरोप है। उसके बैंक खाते से करीब 5 लाख रुपए बरामद होने की चर्चा भी रिपोर्ट्स में सामने आई है। उस पर दान की रकम के कथित दुरुपयोग और उससे संपत्ति बनाने के आरोप लगाए गए हैं।
मनीष कुमार यादव
मनीष कुमार यादव, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का भतीजा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह टिन्नू यादव के छोटे भाई बलराम यादव का बेटा है। पुलिस के हवाले से कहा गया है कि मनीष मंदिर में दान की रकम गिनने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल था।
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसके घर से भी चोरी की रकम बरामद हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान उसके घर से करीब 36 लाख रुपए नकद मिलने का दावा किया गया है। जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह रकम कहाँ से आई और इसका संबंध कथित गबन से किस तरह जुड़ता है।
सुभाष चंद्र श्रीवास्तव
सुभाष चंद्र श्रीवास्तव पूर्व बैंक कर्मचारी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें राम मंदिर में कैश काउंटिंग स्टाफ का प्रभारी बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी दान की रकम की गिनती करने वाले कर्मचारियों की निगरानी और पूरी काउंटिंग प्रक्रिया को देखना था। बैंकिंग पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इस काम की निगरानी के लिए रखा गया था।
FIR और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन पर निगरानी में कथित लापरवाही और अनियमितताओं में संलिप्तता के आरोप हैं। जाँच एजेंसियाँ यह देख रही हैं कि उनके प्रभारी रहते हुए दान की रकम की गिनती में कथित गड़बड़ी कैसे हुई।
करुणेश पांडेय
करुणेश पांडेय पर दान की रकम से जुड़ी रसीदों और वित्तीय रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी का आरोप है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा के साथ पूरी साजिश में शामिल था। जाँच एजेंसियों का दावा है कि वह श्रद्धालुओं के चढ़ावे को संभालने वाली कोर टीम का हिस्सा थे।
एक रिपोर्ट के अनुसार, उनकी जिम्मेदारी दान की रकम को गिनती वाले कमरे तक पहुँचाने से भी जुड़ी थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने रकम और रिकॉर्ड की हेराफेरी में भूमिका निभाई और कथित गड़बड़ी से संपत्ति अर्जित की।
राम मंदिर के धर्म ध्वज समारोह में PM मोदी (फोटो: narendramodi.in) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्म ध्वज की स्थापना एक रस्म से आगे बढ़कर एक ऐतिहासिक घटना है। यह वह क्षण है, जिसमें सदियों की प्रतीक्षा, संघर्ष और करोड़ों-करोड़ राम भक्तों की भावनाएँ एक प्रतीक के रूप में आसमान में लहरा उठीं।
भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्घोष इस ध्वज को देश का बड़ा वर्ग गर्व, आस्था और सभ्यता के पुनरुत्थान के रूप में देख रहा है तो वहीं तथाकथित लिबरल वर्ग इससे दुखी है। वामपंथी गुटों से लेकर लिबरल्स और पाकिस्तान तक सब परेशान हैं।
इनकी परेशानी का असली कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब फैसला दिया गया था तब मस्जिद बनाने के लिए भी मिली जमीन पर मस्जिद के नाम पर नींव तक खुदी जबकि हिन्दुओं ने अपने पुरुषोत्तम श्रीराम का मन्दिर बना लिया। मन्दिर बनने से पहले ये ही लोग मन्दिर चंदे में हेराफेरी का आरोप लगाने वाले मस्जिद पर जमा हुए चन्दे का कहां इस्तेमाल हो रहा है क्यों नहीं बताते? मुसलमानों को एकजुट होकर कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि हिन्दुओं ने तो भव्य मन्दिर निर्मित कर लिया तुम्हारी मस्जिद का क्या हुआ? हकीकत में बाबरी मस्जिद पर चल रही दुकान बंद होने की परेशानी इन्हे चैन से नहीं रहने दे रही।
लिबरल्स की एक जमात इस बात से दुखी हो गई है कि राम मंदिर पर ध्वज फहराने के लिए खुद प्रधानमंत्री क्यों चले गए। जब प्रधानमंत्री मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में पहुँचे थे, तब भी इस जमात के पेट में मरोड़ उठने लगी थीं। वामपंथी पार्टी CPI के महासचिव डी राजा भी इन दुखी लोगों की जमात में शामिल हैं। राजा ने इसके विरोध में X पर एक लंबा पोस्ट लिखा है।
राजा ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी देश के सामने अयोध्या में भगवा झंडा फहरा रहे हैं और इसे ‘भारतीय सभ्यता के पुनरुत्थान’ का प्रतीक बता रहे हैं। यह सिर्फ संशोधनवाद नहीं है बल्कि यह एक संकीर्ण, बहिष्कारवादी विचारधारा के साथ हमारे संवैधानिक इतिहास को फिर से लिखने का एक बेशर्म प्रयास है। यह बेहद चिंताजनक है कि देश के सर्वोच्च पद का इस्तेमाल हमारे संविधान में निहित बहुलवाद का जश्न मनाने के बजाय RSS के वैचारिक एजेंडे को वैध बनाने के लिए किया जा रहा है।”
Despite the Supreme Court verdict stating that the demolition of the Babri Masjid was a criminal act, for which no one has been held accountable, PM Modi stands before the nation, raising a saffron flag in Ayodhya and claiming it as the symbol of “resurgence of Indian… pic.twitter.com/k9fQOqGGQB
उन्होंने कहा कि हम सबका झंडा तिरंगा है और इस घटना को तमाशा बताया है। यकीनन तिरंगा इस राष्ट्र की पहचान है जो आजादी के बाद आया है। उसका सम्मान है और पूरा राष्ट्र उसके सम्मान में नतमस्तक है। पर डी राजा ये क्यों भूल गए कि भगवा झंडा और राम राज्य का प्रतीक ध्वज हजारों वर्ष पुराने इस राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधि है। हिंदुओं के मन में उसके लिए अपार श्रद्धा है।
डी राजा हिंदुओं की आस्था की तुलना तमाशे से कर सकते हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहने वाला है। क्योंकि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज सहिष्णुता को अपने मन में, अपनी आत्मा में आत्मसात किए हुए है। डी राजा को समझने की जरूरत है कि क्या वो ऐसा किसी और मजहब के प्रतीक के लिए कहने की हिम्मत जुटा पाएँगे। जवाब सीधा सा है नहीं, और इसकी वजह आप-हम सब जानते हैं। डी राजा ऐसे कहने वाले अकेले नहीं है।
वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ‘द हिंदू’ की पत्रकार सुहासिनी हैदर भी इससे दुखी हैं और लोगों को भी भ्रम में डालने की कोशिश कर रही हैं। हैदर ने X पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा, “विचित्र विरोधाभास – पिछले कुछ वर्षों से अन्य सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के लिए कहा गया है लेकिन संविधान की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आज धार्मिक ध्वज फहराएँगे।”
Curious contradiction- shrines of all other faiths have been asked to raise the national tricolour for the past few years, but the PM and CM, who have sworn by the constitution will raise a religious flag today. pic.twitter.com/WRcB32WiYq
सुहासिनी हैदर जिस संविधान की दुहाई दे रही हैं क्या वो प्रधानमंत्री को अपना धर्म मानने से रोकता है? क्या वो देश के हर नागरिक को अपना धर्म मानने की आजादी का अधिकार नहीं देता है। सुहासिनी को मतलब ना संविधान से ना धर्म उन्हें बस मतलब अपने प्रोपेगेंडा से है। जाहिर है कि राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा सभी जगह फहराया जाता है, खुद राम मंदिर के परिसर में भी बीते 15 अगस्त 2025 को तिरंगा फहराया गया था।
इन वामपंथियों द्वारा तिरंगे को भगवा का विरोधी साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन वो भूल गए हैं कि भगवा हमेशा से इस राष्ट्र कि चेतना का आधार था, है और रहेगा। हालाँकि, इसके होने से तिरंगा की शान में ना कमी आती है और ना होगी।
सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका कथित ‘बाबरी मस्जिद’ को फिर से बनाए जाने की वकालत भी कर रहा है। अयोध्या से करीब 850 किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में तो सत्तारूढ़ TMC के एक विधायक हुमायूँ कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को बाबरी नाम की मस्जिद बनाने का एलान भी कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी ऐसे स्वर दिखे हैं। ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’ नाम के एक हैंडल ने फिर ‘बाबरी’ बनाने की बात कही है।
राम मंदिर के धर्म ध्वज से जुड़ी एक पोस्ट पर जवाब देते हुए हैंडल ने लिखा, “बाबरी का विनाश न तो हिंदुओं के लिए कोई सभ्यतागत उपलब्धि है और न ही व्यापक उम्माह के लिए, यह तो बस एक प्रतीक है जिसे हागिया सोफिया की तरह उलटा जा सकता है।” हैंडल से आगे लिखा गया, “इस बीच, पंजाब, सिंध, बंगाल और कश्मीर जैसे हिंदू सभ्यता के उद्गम स्थलों से हिंदू धर्म का सफाया हो चुका है, जिसे उलटा नहीं जा सकता।”
राजीव निगम नाम के एक यूजर ने धर्म ध्वज की स्थापना को नौटंकी बताया है। अभिनेता अनुपम खेर ने X पर एक पोस्ट में लिखा कि हमारे जीते जी अयोध्या में हमें श्री राम मंदिर पर ध्वजारोहण समारोह का शुभ अवसर प्राप्त हुआ इससे बड़े सौभाग्य की बात क्या हो सकती है। इस पर राजीव निगम से लिखा, “फुल नौटंकी चालू आहे” यानी पूरी तरह से नौटंकी चल रही है।
सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की भरमार है जो प्रभु राम के धर्म ध्वज की स्थापना किए जाने से दुखी हैं। भारत में वामपंथी और लिबरल तो दुखी हैं ही, साथ में ही पड़ोसी देश पाकिस्तान भी रो रहा है। वो भारत पर आरोप लगाते हुए UN तक से गुहार लगाने पहुँच गया है।
पाकिस्तान भी परेशान, UN तक लगाई गुहार
देश में तो प्रोपेगेंडा फैलाने वाले परेशान हैं हीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान भी परेशान है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा बयान जारी कर राम मंदिर के धर्म ध्वज की स्थापना पर सवाल उठाए हैं।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, “पाकिस्तान ने अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की जगह पर बने तथाकथित ‘राम मंदिर’ पर झंडा फहराने पर गहरी चिंता जताई है। सदियों पुरानी इबादत गाह बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को फासीवादी सोच से प्रेरित कट्टरपंथी भीड़ ने गिरा दिया था।”
पाकिस्तान ने आगे कहा, “भारत में बाद की कानूनी प्रक्रिया, जिसमें जिम्मेदार लोगों को बरी कर दिया गया और गिराई गई मस्जिद की जगह पर मंदिर बनाने की इजाज़त दी गई, अल्पसंख्यकों के प्रति भारतीय सरकार के भेदभाव वाले रवैये के बारे में बहुत कुछ बताती है।” पाकिस्तान ने कहा, “भारतीय मुसलमान लगातार बढ़ते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने का सामना कर रहे हैं।”
पाक ने कहा, “UN और संबंधित इंटरनेशनल संस्थाओं को इस्लामिक विरासत की सुरक्षा और सभी माइनॉरिटीज के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा पक्का करने में एक कंस्ट्रक्टिव भूमिका निभानी चाहिए। पाकिस्तान भारत सरकार से अपील करता है कि वह मुसलमानों समेत सभी धार्मिक समुदायों की सुरक्षा पक्का करे।”
🔊PR No.3️⃣5️⃣0️⃣/2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
Pakistan calls international attention to rising Islamophobia and heritage desecration in India
— Ministry of Foreign Affairs - Pakistan (@ForeignOfficePk) November 25, 2025
पाकिस्तान के दुख को समझा भी जा सकता है। वो खुद भुखमरी और गृह युद्ध जैसी स्थितियों से जूझ रहा है और फौज हर तरफ से पिट रही है। ऐसे में आवाम का ध्यान भटकाने के लिए ऐसी हरकतों का सहारा लेना पड़ रहा है। भारत के वामपंथियों की आदत ही खराब हो गई है। इस वर्ग को हर ऐसे क्षण में खामी तलाशने की आदत सी हो गई है, जैसे उन्हें भारत की आत्मा को समझना ही नहीं बल्कि उससे स्वयं को अलग रखना है।
यह वही विचारधारा है जिसने 2019 में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी निराशा ही जताई थी। तब भी तर्कों की लंबी फेहरिस्त पेश की गई कभी सेक्युलरिज्म खतरे में है, कभी राजनीति धर्म के बिना भी चल सकती है और कभी इतिहास मिटाया जा रहा है। पर सच यह है कि जो इतिहास मिटाया गया था, वह अब फिर से स्थापित हुआ है। जिनकी स्मृति सैकड़ों वर्षों तक दबा दी गई थी, आज वह फिर सबके हृदय में प्रफुल्लित हो रही है। यह धर्म ध्वज उसी स्मृति का प्रत्यक्ष रूप है।
आज जब ध्वज फहरा रहा है, तभी यह सदा पीड़ित लिबरल समूह उसमें भी राजनीति, बहुसंख्यक वर्चस्व, राजनीतिक हिंदुत्व जैसी चीजें ढूँढ रहा है। सवाल यह है कि जब किसी समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान होता है तो यह वर्ग असंतोष क्यों महसूस करता है?
ऐसा लगता है कि भारत की प्राचीन पहचान को स्वीकार करना उन्हें असुविधाजनक लगता है। यह वर्ग भूल जाता है कि राम मंदिर का निर्माण किसी सत्ता की इच्छा से कहीं आगे बढ़कर समाज की सामूहिक स्मृति और सैकड़ों वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। आज राम मंदिर पर स्थापित धर्म ध्वज से कुछ लोगों को समस्या है, क्योंकि उन्हें यह मानना मुश्किल लगता है कि भारत का सांस्कृतिक चरित्र जाग रहा है और वह भी आत्मविश्वास के साथ। यह काल भारत के स्व: के बोध का काल है। राम मंदिर के शिखर पर फहराया यह ध्वज ‘भारत माँ’ के मस्तक पर तिलक की तरह है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (25 नवंबर 2025) को अयोध्या के राम मंदिर में धर्म ध्वज की स्थापना की है। इस दौरान उनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद रहे। ध्वजारोहण के बाद पीएम मोदी ने देशवासियों को संबोधित भी किया है।
इस दौरान पीएम मोदी ने कहा, “आज पूरा भारत, पूरा विश्व राममय है। हर राम भक्त के दिल में अद्वितीय संतोष है, असीम कृतज्ञता है और अपार अलौकिक आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं। सदियों की वेदना आज विराम पा रही है। सदियों का संकल्प आज सिद्धी को प्राप्त हो रहा है।”
उन्होंने आगे कहा, “आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक जलती रही, जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं। भगवान राम के गर्भ गृह की अनंत ऊर्जा, श्री राम परिवार का प्रताप इस धर्म ध्वज के रूप में, दिव्यतम, भव्यतम मंदिर में प्रतिस्थापित हुआ है।”
पीएम मोदी ने इस ध्वज को सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज बताया है। उन्होंने कहा, “ये धर्म ध्वज केवल ध्वज नहीं बल्कि यह भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है। इसका भगवा रंग, इस पर रचित सूर्य वंश की ख्याति, वर्णित ओम शब्द और अंकित कोविदार वृक्ष राम-राज्य की कीर्ति की प्रतिरूपित करता है। यह ध्वज संकल्प है, यह ध्वज सफलता है, यह ध्वज संघर्ष से सृजन की गाथा है, यह ध्वज सदियों से चले आ रहे सपनों का साकार स्वरुप है।”
साथ ही उन्होंने मैकाले के प्रभाव को खत्म कर भारत को मानसिक गुलामी से मुक्ति दिलाने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने कहा, “1835 में मैकाले नाम के अंग्रेज ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे, मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी। 10 साल बाद 2035 में उस अपवित्र घटना को 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं। हमें आने वाले 10 वर्षों में भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करना है।”
मोदी ने आगे कहा, “मैकाले ने जो सोचा था, उसका प्रभाव कहीं व्यापक था। हमें आजादी मिली लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं मिली, हमारे यहाँ एक विकार आ गया कि विदेश की हर व्यवस्था अच्छी है और हमारी चीजों में खोट है।”
आज अयोध्या में एक ऐसा पल आया जो सदियों की आस्था को नई ऊंचाई दे गया. भगवान राम और माता सीता के दिव्य विवाह का प्रतीक विवाह पंचमी के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर के शिखर पर केसरिया धर्म ध्वज फहराया. पीएम मोदी ने अभिजीत मुहूर्त 11:52 से 12:35 बजे के बीच एक बटन दबाकर ध्वज को सिर्फ 10 सेकंड में ऊपर चढ़ाया. RSS प्रमुख मोहन भागवत, यूपी गवर्नर, सीएम योगी और 6-7 हजार मेहमान भी इसके साक्षी बने.आइए जानते हैं इस खास ध्वज की 10 रोचक बातें…
केसरिया रंग: त्याग और भक्ति का प्रतीक
ये ध्वज पूरी तरह केसरिया रंग का है जो अग्नि की लपटों और उगते सूरज की तरह चमकता है. ये रंग राम के त्याग और समर्पण की याद दिलाता है. ये रंग धर्म की विजय और एकता का संदेश देता है. विवाह पंचमी पर ये रंग राम-सीता के प्रेम को और गहरा कर गया जैसे त्रेता युग का सूर्य फिर से अयोध्या पर चमक उठा.
आकार: 22 फीट लंबा और 11 फीट चौड़ा त्रिकोण
ध्वज का आकार त्रिकोणाकार है जो 22 फीट लंबा और 11 फीट चौड़ा है. ये राम वंश की गरिमा और मजबूती को दर्शाता है.आज के ध्वजारोहण में जब ये शिखर पर लहराया तो दूर-दूर से दिखाई दिया. ये साइज मंदिर की भव्यता से मैच करता है.यह ध्वज 4 किमी की दूरी से दिखाई देगा.
वजन: सिर्फ 2 से 3 किलो
ये ध्वज इतना हल्का है कि वजन सिर्फ 2 से 3 किलो के बीच है ताकि हवा में आसानी से लहरा सके. PM मोदी के बटन दबाते ही ये ऊपर चढ़ा और हजारों भक्तों के जयकारों से गूंज उठा.
मटेरियल: पैराशूट नायलॉन और रेशम का कमाल
ध्वज को एविएशन-ग्रेड नायलॉन पैराशूट फैब्रिक से बनाया गया है.ऊपर से रेशमी धागों की कढ़ाई की गई है. अहमदाबाद के पैराशूट स्पेशलिस्ट कारीगरों ने हाथों से तैयार किया गया है.
तीन लेयर्स: मौसम से बेअसर
इसमें तीन सिन्थेटिक केमिकल लेयर्स लगाई गई हैं जो UV प्रोटेक्शन और वाटरप्रूफिंग देती है. चाहे 200 किमी/घंटा की तेज हवा हो, धूप हो या बारिश ये सब झेल लेगा.
प्रतीक: चमकता सूर्य, राम वंश की शोभा
ध्वज के बीच में सोने के धागों से कढ़ा चमकता सूर्य बना है जो सूर्य वंश के राम के पराक्रम और तेज को दिखाता है. PM मोदी के ध्वजारोहण के दौरान ये सूर्य जैसे उगते सूरज की तरह चमका. विवाह पंचमी पर ये प्रतीक राम के राजतिलक की याद दिलाता है.
पवित्र ओम, ब्रह्मांड की चेतना
ऊपर ओम का चिन्ह उकेरा गया है जो ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और शांति का प्रतीक है.यह चिन्ह ध्वज पर लहरा रहा है.
कोविदार वृक्ष, अयोध्या की समृद्धि
नीचे कोविदार वृक्ष की छवि है जो अयोध्या का पवित्र वृक्ष माना जाता है और राम राज्य में समृद्धि व शासन के आदर्शों को जोड़ता है. ये वृक्ष सीता के आश्रम से जुड़ा है. ध्वजारोहण के समय ये प्रतीक जैसे विवाह पंचमी पर सीता के आगमन की कहानी जीवंत कर गया.
स्पेशल रस्सी: कानपुर की मजबूत पकड़
फहराने के लिए कानपुर से मंगाई गई स्पेशल रस्सी का इस्तेमाल हुआ जिसमें स्टेनलेस स्टील कोर और सिन्थेटिक नायलॉन फाइबर है. ये रस्सी इतनी मजबूत है कि भारी हवाओं में भी ध्वज को संभाले रखेगी.आज PM मोदी ने इसी से ध्वज चढ़ाया.
4 किमी दूर से ही दिखेगा
ये ध्वज इतना चमकीला है कि 4 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देगा. आज अयोध्या के सरयू घाट से लेकर राम पथ तक भक्तों ने इसे देखा और जयकारे लगाए. ये 10 बातें राम मंदिर के ध्वज को सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि जीवंत आस्था का प्रतीक बनाती हैं.
बिहार के मुगलपुत्र बिहार के सिवान में ऑपइंडिया की यात्रा दौरान अनुराग मिश्रा ने कॉलेज पढ़े मुस्लिम युवकों से बात की। एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने कहा, “राम मंदिर तोड़कर बनाया गया, बाबरी मस्जिद हमारी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था ना?” दूसरा MA पास युवक बोला, “मुगल हमारे पूर्वज हैं, औरंगजेब ने हिंदू मंदिर तोड़े तो क्या गलत किया? वो इस्लाम फैला रहे थे।”
शहाबुद्दीन को लेकर सब एक स्वर में बोले, “साहेब गरीब मुसलमानों के मसीहा थे, ऊँची जाति वालों से लड़ते थे।”
राम मंदिर पर गुस्सा साफ था। एक टीचर ने कहा, “हिंदू हमेशा मुसलमानों को दबाते हैं, राम मंदिर इसका सबूत है।” लोग मुगलों को गौरवशाली योद्धा बताते हैं और राम मंदिर को अन्याय।
मुस्लिम कट्टरपंथियों की इस बात को सुन अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर का विरोध करने वाले सारे हिन्दुओं को शर्म आनी चाहिए। जो अपने पुरुषोत्तम श्रीराम मंदिर का विरोध कर रहे थे। वही स्थिति काशी, मथुरा और अन्य धार्मिक स्थलों की हैं। इन सनातन विरोधी हिन्दुओं को मुसलमानों से सीखना चाहिए कि किस तरह कब्जाए स्थान को अपना हक़ जमाया जाता है। और तुम बेशर्म अपने धार्मिक स्थलों का विरोध करते हो। क्या तुम्हारे पूर्वजों ने यही संस्कार दिए। उनकी आत्माएं भी तुम्हे कोसती होंगी कि हमारी संतानें सनातन विरोधी हो गयी हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – सिवान के पढ़े-लिखे मुस्लिम अभी भी बाबरी को अपनी जमीन और मुगलों को अपना इतिहास मानते हैं।
थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स) तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।
पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।
यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।
फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।
‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।
मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज
आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”
हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।
इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।
मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।
अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।
सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।
‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा
लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।
दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’
परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।
(फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)
इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।
ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।
इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?
दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?
फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह
तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?
साभार- आउटलुक ट्रेवलर
इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।
लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।
कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।
इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।
हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया
यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।
लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।
अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।
लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।
लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”
निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”
पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।
गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।
इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।
इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।
मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।
कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है
लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।
निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।
इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।
अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।
मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू
हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।
अयोध्या मस्जिद का प्रस्तावित डिजाइन (फोटो- टीवी9) उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने जमीन दे दी लेकिन 5 साल बाद भी उस पर काम ठप पड़ा है। मस्जिद के लिए बने ट्रस्ट ने चंदा तो जुटाया लेकिन सरकारी विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) नहीं ले सका। अब NOC ना होने के चलते इसके लेआउट प्लान को भी अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) ने खारिज कर दिया है।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय पत्रकार ओम प्रकाश सिंह द्वारा दाखिल RTI में सामने आया कि विभिन्न सरकारी विभागों का अनिवार्य NOC ना होने के चलते ADA ने यह प्लान खारिज किया है।
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक अयोध्या फैसले में राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था। साथ ही, मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया था।
इसके बाद 3 अगस्त 2020 को तत्कालीन जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने अयोध्या के पास धन्नीपुर गाँव में पाँच एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को हस्तांतरित कर दी। इसके बाद मस्जिद निर्माण के लिए बनाए गए ट्रस्ट ने 23 जून 2021 को ADA में लेआउट प्लान की मंजूरी हेतु आवेदन दायर किया था।
RTI के जवाब में ADA ने स्वीकार किया कि मस्जिद ट्रस्ट ने 4 लाख रुपए आवेदन और जाँच शुल्क के रूप में जमा किए। ADA के मुताबिक, मस्जिद निर्माण के लिए लोक निर्माण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नागरिक उड्डयन, सिंचाई एवं राजस्व विभाग, नगर निगम, जिलाधिकारी कार्यालय और अग्निशमन विभाग की NOC माँगी गई थी।
मस्जिद ट्रस्ट के सचिव ने क्या कहा?
मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन ने कहा कि उन्हें अग्निशमन विभाग की ओर से आपत्तियाँ आई थीं। अग्निशमन विभाग की साइट जाँच में पाया गया कि प्रस्तावित मस्जिद और अस्पताल भवन की ऊँचाई को देखते हुए अप्रोच रोड की चौड़ाई कम से कम 12 मीटर होनी चाहिए। जबकि मौके पर दोनों मार्ग छह मीटर से ज्यादा चौड़े नहीं पाए गए और मुख्य सड़क महज चार मीटर चौड़ी निकली थी।
हुसैन ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए जमीन देने का आदेश दिया और उत्तर प्रदेश सरकार ने हमें जमीन दी। इसके बाद भी आवश्यक NOC क्यों नहीं मिलीं और ADA ने प्लान को क्यों खारिज किया, यह समझ से बाहर है।”
उन्होंने आगे कहा कि अग्निशमन विभाग की आपत्ति के बारे में उन्हें जानकारी है लेकिन बाकी किसी भी विभाग की आपत्ति को लेकर उन्हें कुछ जानकारी नहीं है। बकौल हुसैन, RTI के जवाब से स्थिति स्पष्ट हो गई है और अब हम आगे की कार्रवाई करेंगे।
इस बीच अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है और यह पूरे होने के चरण में है। तो दूसरी और मस्जिद परियोजना लापरवाहियों के चलते अभी तक अधर में ही अटकी हुई है। जो लोग शताब्दियों तक कथित ढांचे को मस्जिद बताते हुए लड़ रहे थे, उनके लिए मस्जिद की प्राथमिकता कितनी है, यह 5 जमीन आवंटन के 5 वर्ष बाद स्पष्ट हो जाता है।