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भारत में वामपंथ के पूरे हुए 100 साल, स्वतंत्रता संग्राम का विरोध, चीन का समर्थन और सैंकड़ों सुरक्षाकर्मियों की हत्या: कम्युनिस्टों की ‘विदेशी विचारधारा’ ने देश को हिंसा की आग में जलाया


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के 100 साल पूरे होने पर इसके नेता और समर्थक जश्न और पुरानी यादों के साथ इस मौके को मना रहे हैं। हालाँकि, सौ साल का सफर सिर्फ यादें ताजा करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समय आत्म-मंथन और गंभीर मूल्यांकन का भी है। राजनीतिक आंदोलन केवल अपनी उम्र से प्रासंगिक नहीं बनते, बल्कि वे अपने परिणामों (कामयाबियों) से अपनी अहमियत साबित करते हैं।

पिछली एक सदी में, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज के रूप में पेश किया है। इसने हमेशा यह दावा किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी अवधि का समाधान है और नैतिक रूप से अन्य राजनीतिक परंपराओं से बेहतर है। हालाँकि, अपनी इस छवि के बावजूद, आज कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी रूप से सिमट गया है, विचारधारा के मामले में काफी सख्त (जड़) हो गया है और भारत की सामाजिक व आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह कटता जा रहा है।

इससे एक ऐसा अनिवार्य सवाल खड़ा होता है जिसे महज नारों या अतीत की पुरानी यादों के सहारे टाला नहीं जा सकता:

क्या भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने वाकई भारत की सेवा की, या फिर इसने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया?

यह लेख इस सवाल का जवाब किसी खोखली बयानबाजी या वैचारिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजनीतिक व्यवहार और ठोस परिणामों के जरिए देने की कोशिश करता है। क्योंकि 100 साल बीत जाने के बाद, कोई भी विचारधारा न तो बिना सोचे-समझे सम्मान की हकदार है और न ही बिना सोचे-समझे तिरस्कार की, बल्कि वह एक ईमानदार ऑडिट (सच्चे मूल्यांकन) की हकदार है।

साम्यवाद का क्षेत्र: भारतीय नहीं, स्वदेशी कभी नहीं

कम्युनिज्म (Communism) का उदय भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हकीकत से नहीं हुआ था। यह एक यूरोपीय वैचारिक उत्पाद था, जो 19वीं सदी के यूरोप की खास परिस्थितियों में पैदा हुआ था। वे परिस्थितियाँ थीं- तेजी से होता औद्योगिकीकरण, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और पूंजीपतियों व औद्योगिक श्रमिकों के बीच गहरी वर्गीय खाई।

इस सिद्धांत को कार्ल मार्क्स ने विकसित किया था, जिन्होंने यूरोपीय पूंजीवाद का विश्लेषण किया, और बाद में इसे व्लादिमीर लेनिन ने अपनाया, जिन्होंने सत्ता हथियाने के लिए एक कड़े नियंत्रण वाले और ‘हरावल दस्ते’ (vanguard) के नेतृत्व वाली क्रांति की वकालत की थी।

इन दोनों विचारकों (मार्क्स और लेनिन) ने ऐसे समाजों में काम किया जो एक जैसे थे और जहाँ उद्योग मुख्य थे। वहाँ इंसान की असली पहचान उसकी आर्थिक स्थिति या ‘क्लास’ से होती थी। उनके काम करने का तरीका इन तीन बातों पर टिका था।

शोषक और शोषित की साफ पहचान: यानी समाज में एक पक्ष हमेशा जुल्म करने वाला और दूसरा जुल्म सहने वाला होता है।

न्याय के लिए हिंसा का रास्ता: यानी इंसाफ पाने के लिए पुरानी व्यवस्था को हिंसक तरीके से तोड़ना जरूरी है।

कड़ा सरकारी नियंत्रण: यानी गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए सारी ताकत एक जगह (सरकार के हाथ में) रखना ही समाधान है।

लेकिन भारत की बनावट कभी ऐसी नहीं रही। भारतीय समाज हजारों साल पुरानी एक सभ्यता है, जो विविधताओं (अलग-अलग तरह के लोगों) से भरी हुई है। यहाँ समाज सिर्फ अमीर-गरीब (आर्थिक क्लास) से नहीं, बल्कि समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से बना है। इतिहास गवाह है कि भारत में सामाजिक बदलाव हमेशा सुधार आंदोलनों और आपसी तालमेल से आए हैं, न कि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह तबाह करके।

भारत की इसी खूबी और कम्युनिस्ट विचारधारा के बीच मेल न होना ही वह कारण है, जिसकी वजह से कम्युनिज्म को यहाँ गहराई से नहीं अपनाया गया। एक ऐसी विचारधारा जो केवल ‘दो पक्षों’ (शोषक और शोषित) की लड़ाई पर टिकी हो, वह उस सभ्यता में नहीं टिक सकती जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। भारतीय समाज लचीला और सबको साथ जोड़ने वाला है, जबकि कम्युनिज्म सख्त और बँटा हुआ है। यही विरोध भारत में कम्युनिज्म की असफलता की सबसे बड़ी वजह है।

देश से ऊपर विचारधारा: भारत छोड़ो आंदोलन और चीन युद्ध

नतीजे देने में फेल होने के साथ-साथ, भारतीय कम्युनिस्टों पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने हमेशा देश के हित से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा। इस विरोधाभास के दो बड़े उदाहरण गौर करने लायक हैं।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जब CPI देश के साथ खड़ी नहीं हुई

अगस्त 1942 में, भारत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन देखा, जिसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहा गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में देश के हर कोने और हर समुदाय के लोग शामिल हुए थे। लेकिन ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) ने इस आंदोलन का विरोध करने का फैसला किया।

CPI ने इस आंदोलन का साथ क्यों नहीं दिया? इसकी वजह जानकर आपको हैरानी हो सकती है। यह फैसला भारत के लिए नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा से जुड़ा था। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ (रूस) पर जर्मनी ने हमला कर दिया था, जिसके बाद रूस ने ब्रिटेन के साथ हाथ मिला लिया। चूंकि ब्रिटेन अब रूस का साथी बन चुका था, इसलिए CPI ने इस युद्ध को फासीवाद के खिलाफ ‘जनता का युद्ध‘ (People’s War) घोषित कर दिया।

उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ कोई रुकावट पैदा न करें और हड़ताल या विरोध प्रदर्शनों को रोकें। यहाँ तक कि कई मामलों में कम्युनिस्ट नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी किया। जब लाखों भारतीय अंग्रेजों की गोलियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे, तब CPI हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत आजादी के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत नहीं, बल्कि ‘मॉस्को’ (रूस) के हित थे।

1962 का चीन युद्ध: चुप्पी, उलझन और चीन के प्रति लगाव

ठीक 20 साल बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से वही पुरानी बात दोहराई गई। जब चीनी सेना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमाओं को पार किया, तब पूरे देश को राजनीतिक एकता और स्पष्टता की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े हिस्से ने चीन के प्रति हमदर्दी दिखाई और इस मामले पर गोल-मोल बात की। इसी विवाद की वजह से आगे चलकर CPI के दो टुकड़े हो गए और चीन का समर्थन करने वाले गुट ने अलग होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ यानी CPM बना ली।

देशहित से अलग हटकर सोचना तो कम्युनिज्म की असफलता का सिर्फ एक हिस्सा था। इससे भी ज्यादा नुकसानदेह वह तरीका था, जिसमें कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता ही छोड़ दिया और हथियारों के दम पर बगावत शुरू कर दी। 1960 के दशक के आखिर से, भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा ने न केवल सरकार का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हिंसा का एक लंबा दौर था। इसमें हत्याएँ की गईं, नरसंहार हुए, सरकारी संपत्तियों को तबाह किया गया और आम जनता को डराया-धमकाया गया। इस हिंसा के शिकार कोई विदेशी शासक या बड़े पूंजीपति नहीं थे, बल्कि भारत के आम लोग थे। जनजातीय (आदिवासी), किसान, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और दिहाड़ी मजदूर। भारतीय कम्युनिज्म की असली मानवीय कीमत को समझने के लिए नारों या किताबों को नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट उग्रवाद द्वारा छोड़े गए खून के निशानों को देखना होगा।

भारत में कम्युनिस्ट उग्रवादियों द्वारा किए गए 10 सबसे बड़े नरसंहार

दंतेवाड़ा नरसंहार (2010), छत्तीसगढ़– 6 अप्रैल 2010 को, ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सली)’ के लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहुत ही सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 76 जवान शहीद हो गए थे। उग्रवादियों ने पहले बारूदी सुरंगों (landmines) का इस्तेमाल किया और फिर ऑपरेशन से लौट रहे जवानों पर अँधाधुँध गोलियाँ बरसा दीं। आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों पर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और भयानक हमला माना जाता है। इस घटना के बाद देश में ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ने के तरीके में बड़ा बदलाव आया।

झीरम घाटी नरसंहार (2013), छत्तीसगढ़- 25 मई 2013 को, नक्सली उग्रवादियों ने बस्तर के झीरम घाटी इलाके में कॉन्ग्रेस पार्टी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ राजनेताओं समेत 27 लोगों की जान चली गई। नक्सलियों ने यह हमला उस समय किया जब नेता जनता के बीच जा रहे थे। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि माओवादी चुनाव लड़ने या लोकतंत्र में भरोसा रखने के बजाय, जनता द्वारा चुने गए नेताओं को खत्म करने की रणनीति पर काम करते हैं। इस हमले की पूरी देश में निंदा हुई और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला माना गया।

नयागढ़ शस्त्रागार हमला (2008), ओडिशा- फरवरी 2008 में, नक्सली लड़ाकों ने ओडिशा के नयागढ़ में पुलिस के शस्त्रागार (जहाँ हथियार रखे जाते हैं) पर एक साथ मिलकर रात में हमला बोला। इस हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए, भारी मात्रा में हथियार लूट लिए गए और सरकारी इमारतों को तबाह कर दिया गया। इस घटना ने दिखाया कि उग्रवादी कितने खतरनाक और बड़े हमले करने की ताकत रखते हैं। इस लूट के बाद उस इलाके में नक्सलियों के पास हथियारों की ताकत काफी बढ़ गई।

सुकमा हमला (2017), छत्तीसगढ़- 24 अप्रैल 2017 को, सुकमा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने CRPF की एक टीम पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। उग्रवादियों ने इस हमले में देशी बमों (IED) और बहुत करीब से गोलीबारी का इस्तेमाल किया। उन्होंने वहाँ के मुश्किल रास्तों और खुफिया जानकारी के लीक होने का फायदा उठाया। इस घटना ने यह दिखाया कि सालों से चल रहे अभियानों के बावजूद, नक्सली उग्रवाद की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है।

अरनपुर IED हमला (2023), छत्तीसगढ़- अप्रैल 2023 में, नक्सली उग्रवादियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में एक प्रेशर IED (बारूदी सुरंग) में धमाका किया। इस हमले में ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) के 10 जवान और एक नागरिक ड्राइवर की जान चली गई। उग्रवादियों ने एक ऐसे वाहन को निशाना बनाया जो उग्रवाद विरोधी अभियान से लौट रहा था। यह घटना एक बार फिर नक्सलियों की उस रणनीति को दिखाती है, जिसमें वे सार्वजनिक सड़कों पर बिना सोचे-समझे बमों का इस्तेमाल करते हैं।

सेनारी गाँव नरसंहार (1999), बिहार- मार्च 1999 में, ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) ने बिहार के सेनारी गाँव में 34 आम लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मरने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे। उग्रवादियों ने इन लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था और इसे ‘अमीर-गरीब की लड़ाई’ (क्लास स्ट्रगल) बताकर सही ठहराया। इस घटना ने नक्सलियों के नारों और उनकी असलियत के बीच के अंतर को साफ कर दिया।

बारा नरसंहार (1992), बिहार- फरवरी 1992 में, नक्सली उग्रवादियों ने गया जिले के बारा गाँव पर हमला किया और 37 ग्रामीणों की जान ले ली। निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ वामपंथी चरमपंथी हिंसा की यह शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी। इसी घटना के बाद बिहार में हिंसा और बदले का एक लंबा दौर शुरू हुआ जिसने राज्य को अस्थिर कर दिया।

लातेहार पुलिस वैन ब्लास्ट (2016), झारखंड- जुलाई 2016 में, नक्सलियों ने झारखंड के लातेहार जिले में एक लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें गश्ती वाहन में सवार आठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। यह हमला ग्रामीण इलाकों में पुलिस और सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने की उनकी सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।

सुकमा रोड-ओपनिंग पार्टी हमला (2018), छत्तीसगढ़- मार्च 2018 में, सुकमा जिले में नक्सलियों ने CRPF की उस टीम पर हमला किया जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी थी। इस हमले में नौ जवान शहीद हुए। उग्रवादियों ने विकास के कामों को रोकने के लिए जानबूझकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया, क्योंकि वे जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के खिलाफ हैं।
गिरिडीह लैंडमाइन ब्लास्ट (2007), झारखंड- अक्टूबर 2007 में, नक्सलियों ने गिरिडीह जिले में एक आम नागरिक वाहन के नीचे लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस घटना ने दिखाया कि नक्सली हिंसा कितनी अंधी है, जहाँ सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में अक्सर आम नागरिक अपनी जान गँवा देते हैं।

सौ साल, कोई सुधार नहीं

100 साल पूरे होने के बाद, भारतीय कम्युनिज्म का मूल्यांकन सिर्फ उनके इरादों, सिद्धांतों या भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसका फैसला उनके रिकॉर्ड से होना चाहिए। वह रिकॉर्ड बताता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जो भारत के बाहर से आई, जिसने भारतीय समाज को कभी नहीं समझा, देश के हितों से ऊपर विदेशी ताकतों को रखा और देश से ऊपर हमेशा अपनी विचारधारा को चुना। जब चुनावों में उनकी ताकत कम हुई, तो इस आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दिया और हिंसा अपना ली। पीछे रह गए हजारों मृत नागरिक, शहीद जवान और तबाह हुए परिवार।
यह कहानी किसी ऐसी विचारधारा की नहीं है जो परिस्थितियों की वजह से हार गई। यह उस विचारधारा की कहानी है जो इसलिए फेल हो गई क्योंकि वह भारत की हकीकत, यहाँ की विविधता और लोकतांत्रिक सोच के साथ तालमेल नहीं बिठा सकी। इसलिए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होना जश्न का नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मौका है। इन 100 सालों में कम्युनिज्म ने न तो गरीबों को आजाद किया, न लोकतंत्र को मजबूत किया और न ही देश की रक्षा की। इसने सिर्फ एक बात साबित की है, एक बाहर से आई विचारधारा जो खुद को देश से ऊपर रखती है, वह आखिर में देश और खुद- दोनों को नुकसान ही पहुँचाती है।

पवित्र पहाड़ी पर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आने पर मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया The News Minute

                                           थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

                                            (फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

                                                          साभार- आउटलुक ट्रेवलर

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

बिहार चुनाव से पहले ही कांग्रेस डुबाने को आतुर राहुल गाँधी ने वैचारिक दिवालियेपन में RSS-वामपंथियों से तुलना कर INDI गठबंधन में डाल दी दरार

                                                                                AI जेनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: Dall-E)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम। आखिर योगी योगी ही है राहुल गाँधी नहीं। और जब कोई योगी कोई शब्द अपने मुंह से निकालता है उसका अर्थ बहुत गहरा होता, उसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है। अब कोई नहीं समझ पाए तो बात उसकी बुद्धि पर निर्भर है। याद करिए जब राहुल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी, तब योगीजी ने कहा था कि "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइये", और देखिए अपनी माँ सोनिया गाँधी से ज्यादा कांग्रेस के लिए राहुल ही घातक साबित हो रहे हैं। 2024 में 99 सीट लेकर सुरमा भोपाली बन गए। ये तो खटाखट के लालच में जनता आ गयी वरना 30/32 से ज्यादा सीटें नहीं आने वाली थी। और बिल्ली भागों छिका ऐसा टूटा कि उत्तर प्रदेश में सहयोगी समाजवादी पार्टी को भी सीटें मिल गयीं। 

संघ और वामपंथ की तुलना कर, यानि राहु की केतु से तुलना, INDI गठबंधन ही नहीं कांग्रेस को ही घोर संकट में डाल दिया है। जिस आदमी LoP पद की मर्यादा नहीं रख सकता उससे देशहित तो क्या पार्टी हित की भी सोंच नहीं रखनी चाहिए। और जो रखे उससे बड़ा कोई महामूर्ख नहीं।  पता नहीं क्यों लोग राहुल को वोट देते हैं। अगर राहुल के पूरे राजनितिक जीवन की समीक्षा की जाये तो शायद ही कोई काम हो जो देश या जनता के हित में किया हो।          

बिहार में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही सियासी हलचल तेज हो गई है। लेकिन इस बार चर्चा का केंद्र कोई नीतिगत मुद्दा या विकास का एजेंडा नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी का एक बयान है।

केरल के कोट्टायम में एक कार्यक्रम में राहुल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPM को एक ही तराजू में तौलते हुए कहा, “मैं RSS और CPM दोनों से वैचारिक रूप से लड़ता हूँ। मेरी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इन दोनों में लोगों के लिए भावनाएँ नहीं हैं।” इस बयान ने न सिर्फ सत्तारूढ़ बीजेपी को हमला करने का मौका दिया, बल्कि इंडी गठबंधन के सहयोगी वामपंथी दलों को भी नाराज कर दिया।

यह बयान बिहार जैसे संवेदनशील राज्य में… जहाँ वामपंथी पार्टियाँ इंडी गठबंधन का हिस्सा हैं, एक बड़े सियासी तूफान का कारण बन सकता है। इस लेख में हम राहुल गाँधी के इस बयान के बिहार में इंडी गठबंधन पर प्रभाव, उनकी वैचारिक उलझन और भारतीय राजनीति में विचारधाराओं के टकराव को समझने की कोशिश करेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि राहुल गाँधी की राजनीतिक सोच आखिर है क्या और क्यों वह बार-बार ऐसी स्थिति में फँस जाते हैं, जहाँ उनकी अपनी पॉलिटिकल अप्रोच को ही नुकसान पहुँचता है।

बिहार में कांग्रेस का बेड़ा गर्क करेंगे राहुल गाँधी

राहुल गाँधी का ताजा बयान उनकी वैचारिक अस्पष्टता और सियासी अपरिपक्वता को उजागर करता है। उनकी सोच में स्पष्टता का अभाव न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि इंडी गठबंधन की एकता को भी कमजोर करता है। बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में, जहाँ गठबंधन को पहले से ही कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, यह बयान एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।

राहुल गाँधी को अगर विपक्ष का नेतृत्व करना है, तो उन्हें अपनी वैचारिक स्थिति स्पष्ट करनी होगी। उन्हें यह तय करना होगा कि वह किस विचारधारा के साथ खड़े हैं और किसके खिलाफ। बिना किसी ठोस वैचारिक आधार के उनकी बयानबाजी केवल भ्रम और विवाद पैदा करती है। बिहार चुनाव में अगर इंडी गठबंधन को सफल होना है, तो उसे एकजुट होकर एक स्पष्ट रणनीति के साथ मैदान में उतरना होगा। लेकिन राहुल के बयानों से यह एकजुटता खतरे में पड़ रही है।

कुल मिलाकर राहुल गाँधी का बयान गठबंधन की पहले से ही नाजुक स्थिति को और कमजोर कर रहा है। अगर गठबंधन को बिहार में NDA को टक्कर देनी है, तो उसे तुरंत आपसी मतभेदों को सुलझाना होगा और एकजुट रणनीति बनानी होगी। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि क्या गठबंधन इस संकट से उबर पाएगा, या राहुल गाँधी का वैचारिक भटकाव बिहार में विपक्ष की हार का कारण बनेगा।

सोचने की बात तो ये भी है कि आखिर वो क्या वजह है कि राहुल गाँधी अक्सर वैचारिक सोच के मुद्दे पर मतिभ्रम का शिकार हो जाते हैं और ऐसी उल-जलूल हरकत कर बैठते हैं कि उन्हें पूरे देश में कोई गंभीरता से नहीं लेता… बस, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो, क्योंकि वो पार्टी चीफ अगर गधा है, तब भी उसे ‘सुप्रीम हाई कमान’ ही मानते हैं। फिर चाहे वो 52 साल का युवा हो, या 10वीं फेल ‘उत्तराधिकारी’…

भारतीय राजनीति में विचारधाराओं का बारीक विभाजन

भारतीय राजनीति को समझने के लिए पहले हमें विचारधाराओं का मूल ढांचा समझना होगा। दुनिया भर में और खास तौर पर भारत में, राजनीति मुख्य रूप से दो धुरियों पर टिकी होती है: दक्षिणपंथ और वामपंथ। इसके अलावा तीसरा रास्ता है मध्यमार्गी या समाजवादी विचारधारा, जो दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। और चौथी धारा है पॉपुलिस्ट या अवसरवादी, जो जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे मुद्दों पर आधारित होती है। आइए, पहले तो यही बात समझते हैं-

  1. दक्षिणपंथ (Right-Wing): यह विचारधारा राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक गौरव और परंपराओं को बढ़ावा देती है। भारत में बीजेपी, शिवसेना जैसी पार्टियाँ और RSS जैसे राष्ट्रवादी संगठन इस विचारधारा के प्रमुख प्रतीक हैं। ये दल राष्ट्रवाद, आर्थिक उदारीकरण और मजबूत केंद्रीकृत शासन की वकालत करते हैं। हालाँकि शिवसेना जैसी पार्टियाँ अतीत में दक्षिणपंथी भले ही रही हों, लेकिन वो स्थान विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष जैसे एजेंडे में बंधकर भी खुद को सीमित करती रही हैं। फिर भी, ये आम तौर पर दक्षिणपंथी अंब्रेला संगठनों में गिने जाते रहे हैं।
  2. वामपंथ (Left-Wing): वामपंथी विचारधारा सामाजिक समानता, मजदूरों और किसानों के अधिकार और धर्मनिरपेक्षता पर जोर देती है। भारत में CPM, CPI और CPIML जैसे दल इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये दल पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ हैं और समाजवादी ढाँचे की वकालत करते हैं। इनके कई सहयोगी चरमपंथी भी रहे हैं और वो सशस्त विद्रोह का रास्ता अपना कर देश विरोधी कार्यों में लगे हुए हैं। प्रतिबंधित माओवादी-नक्सलवादी संगठन इसके उदाहरण हैं।
  3. मध्यमार्गी या समाजवादी (Centrist/Socialist): यह विचारधारा दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच संतुलन बनाती है। भारत में कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से इस मध्यमार्गी रास्ते को अपनाया है, जिसमें धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक कल्याण और आर्थिक सुधारों का मिश्रण शामिल है। एनसीपी जैसी पार्टियाँ, जिनके नेता कॉन्ग्रेस से ही निकले रहे हैं, वो भी इसी मार्ग पर चलने के लिए जानी जाती हैं, हालाँकि एनसीपी जैसी पार्टियाँ पूँजीवाद की समर्थक रही हैं।
  4. पॉपुलिस्ट या अवसरवादी: यह धारा किसी ठोस विचारधारा पर नहीं टिकी होती। यह जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों पर आधारित होती है और तात्कालिक लाभ के लिए नीतियाँ बनाती है। भारत में कई क्षेत्रीय दल जैसे DMK, RJD, SP, BSP और कुछ हद तक AAP इस श्रेणी में आते हैं।
कांग्रेस पार्टी अपनी स्थापना से लेकर अब तक मध्यमार्गी और पॉपुलिस्ट विचारधारा का मिश्रण रही है। यह कभी समाजवादी नीतियों (जैसे इंदिरा गाँधी के दौर में राष्ट्रीयकरण) तो कभी आर्थिक उदारीकरण (1991 के सुधार) की वकालत करती रही है। लेकिन राहुल गाँधी की व्यक्तिगत विचारधारा इस मिश्रण को और जटिल बनाती है, क्योंकि वह न तो पूरी तरह समाजवादी हैं, न दक्षिणपंथी और न ही वामपंथी। उनकी सोच एक ऐसी उलझन में फँसी है, जो बार-बार उनके बयानों में झलकती है।

राहुल गाँधी का वैचारिक भटकाव

राहुल गाँधी की राजनीति को समझना आसान नहीं है, क्योंकि उनकी कोई स्पष्ट वैचारिक लाइन नहीं दिखती। वह एक तरफ RSS और बीजेपी को निशाना बनाते हैं, दूसरी तरफ अपने ही गठबंधन के सहयोगियों जैसे वामपंथी दलों को उसी श्रेणी में रख देते हैं। यह बयानबाजी उनकी वैचारिक अस्पष्टता को उजागर करती है। आइए, इसे कुछ बिंदुओं के जरिए समझें-
RSS और CPM की तुलना: राहुल गाँधी का यह कहना कि RSS और CPM में लोगों के प्रति भावनाओं की कमी है, न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि सियासी तौर पर भी आत्मघाती है। RSS और CPM की विचारधाराएँ ध्रुवीय रूप से विपरीत हैं। RSS जहाँ हिंदू राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकरूपता की बात करता है, वहीं CPM की कम्युनिष्ट विचारधारा मूल रूप से भारत भूमि की है ही नहीं। ये आर्थिक बराबरी और धर्म विरोध की वकालत करता है। हालाँकि भारत में ये इस्लामी तुष्टिकरण में शामिल रहता है।
दोनों को एक ही खाँचे में रखना न सिर्फ वैचारिक अज्ञानता को दर्शाता है, बल्कि गठबंधन की एकता को भी कमजोर करता है। केरल में कम्युनिष्टों और संघ में लंबा संघर्ष चला है और सहयोगी होने के नाते राहुल का बयान वामपंथियों के लिए बेहद अपमानजनक है।
केरल और बिहार का विरोधाभास: केरल में कांग्रेस और CPM प्रतिद्वंद्वी हैं। वहाँ कांग्रेस UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) का नेतृत्व करती है, जबकि CPM LDF (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) की अगुवाई करता है। लेकिन बिहार में दोनों इंडी गठबंधन में साथ हैं। राहुल का केरल में दिया गया बयान बिहार के संदर्भ में गलत संदेश देता है, जहाँ वामपंथी पार्टियों का ग्रामीण इलाकों में प्रभाव है। यह बयान गठबंधन के कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा कर सकता है और वोटों के बँटवारे का खतरा बढ़ा सकता है।
पॉपुलिस्ट बयानबाजी: राहुल गाँधी की बयानबाजी अक्सर पॉपुलिस्ट होती है, जिसमें वह बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन उनमें ठोस वैचारिक आधार नहीं होता। उदाहरण के लिए – राहुल गाँधी “नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान” की बात करते हैं, लेकिन यह नारा भावनात्मक होने के बावजूद कोई स्पष्ट नीतिगत दिशा नहीं देता। उनकी यह सोच कि “लोगों की भावनाएँ” ही नेतृत्व का आधार हैं, राजनीति को एक सतही स्तर पर ले जाती है, जहाँ ठोस नीतियों और योजनाओं की जगह भावनात्मक नारे ले लेते हैं।
गठबंधन के साथ अवसरवाद: राहुल गाँधी और कांग्रेस का गठबंधन रणनीति भी उनकी वैचारिक उलझन को दर्शाती है। महाराष्ट्र में वह शिवसेना (UBT) के साथ गठबंधन में हैं, जो कभी बीजेपी की सहयोगी थी और अब भी कई मायनों में दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित है। वहीं बिहार में वह RJD और वामपंथी दलों के साथ हैं, जो समाजवादी और वामपंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने पहले CPM के साथ गठबंधन किया, फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के खिलाफ लड़ा। यह अवसरवादी रवैया उनकी वैचारिक अस्पष्टता को और उजागर करता है।

बिहार में इंडी गठबंधन पर प्रभाव

बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 में होने वाले हैं और यह चुनाव इंडी गठबंधन के लिए एक बड़ा इम्तिहान है। बिहार में गठबंधन में RJD, कांग्रेस और वामपंथी दलों (CPI, CPM, CPIML) के साथ कई छोटे-मोटे जातीय-क्षेत्रीय दल शामिल हैं। लेकिन राहुल गाँधी के बयान ने गठबंधन की एकता पर सवाल उठा दिए हैं। आइए- इसके प्रभावों को विस्तार से समझते हैं…
वामपंथी दलों की नाराजगी: CPM और CPI के नेताओं ने राहुल के बयान की कड़ी आलोचना की है। CPM महासचिव एम.ए. बेबी ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और कहा कि यह बयान केरल और भारत की राजनीतिक वास्तविकताओं की समझ की कमी को दर्शाता है।
CPI नेता डी. राजा ने भी गठबंधन की वर्चुअल बैठक में इस मुद्दे को उठाया और कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा करती हैं। बिहार में वामपंथी दलों का वोट बैंक भले ही सीमित हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों, खासकर सीमांचल और मगध क्षेत्र में, उनकी संगठनात्मक ताकत अहम है। अगर यह नाराजगी बढ़ती है, तो गठबंधन के लिए सीट-बँटवारे और संयुक्त रणनीति में मुश्किलें आ सकती हैं।
कार्यकर्ताओं में भ्रम: बिहार में गठबंधन के कार्यकर्ताओं के बीच पहले से ही समन्वय की कमी रही है। RJD और कांग्रेस के कार्यकर्ता अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ काम करते देखे गए हैं। अब राहुल के बयान से वामपंथी कार्यकर्ताओं में भी असंतोष फैल सकता है। यह जमीनी स्तर पर गठबंधन की एकजुटता को कमजोर कर सकता है, जिसका फायदा NDA को मिल सकता है।
AAP की दूरी और गठबंधन की कमजोरी: आम आदमी पार्टी (AAP) पहले ही इंडी गठबंधन से बाहर हो चुकी है। इससे गठबंधन पहले से ही कमजोर स्थिति में है। अब अगर वामपंथी दल भी दूरी बनाते हैं, तो बिहार में गठबंधन की संभावनाएँ और कम हो जाएंगी। बिहार में RJD और कांग्रेस की ताकत सीमित है और वामपंथी दलों की संगठनात्मक क्षमता गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
BJP को हमला करने का मौका: राहुल के बयान ने बीजेपी को एक नया हथियार दे दिया है। बीजेपी पहले से ही राहुल को ‘अपरिपक्व’ और ‘वैचारिक रूप से खाली’ बताती रही है। अब वह इस बयान का इस्तेमाल करके यह साबित करने की कोशिश करेगी कि राहुल न तो अपने सहयोगियों को संभाल सकते हैं और न ही एक मजबूत विपक्षी नेतृत्व दे सकते हैं। खैर, ये अब कहने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि राहुल गाँधी अपनी हरकतों से ये बात बार-बार साबित भी कर रहे हैं।

राहुल गाँधी की वैचारिक उलझन की पड़ताल

राहुल गाँधी की वैचारिक अस्पष्टता कोई नई बात नहीं है। उनकी राजनीति में कई बार ऐसे बयान और कदम देखे गए हैं, जो उनकी समझ और रणनीति पर सवाल उठाते हैं। आइए, इसे कुछ उदाहरणों के जरिए समझते हैं-
संस्थानों पर हमला: राहुल गाँधी ने कई बार कहा है कि वह न सिर्फ बीजेपी और RSS से लड़ रहे हैं, बल्कि ‘भारतीय राज्य‘ (Indian State) से भी लड़ रहे हैं। यह बयान उनकी समझ की कमी को दर्शाता है। भारतीय राज्य यानी संवैधानिक संस्थाएँ जैसे चुनाव आयोग, न्यायपालिका और प्रशासन, लोकतंत्र का आधार हैं। इन्हें सीधे निशाना बनाना न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि राहुल की सोच में स्पष्टता का अभाव है।
आर्थिक नीतियों में भटकाव: राहुल एक तरफ पूँजीपतियों जैसे अंबानी और अडानी पर हमला करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की सरकारें (जैसे तेलंगाना में) इन्हीं पूँजीपतियों के साथ बड़े सौदे करती हैं। यह दोहरा रवैया उनकी आर्थिक सोच की उलझन को दर्शाता है। वह न तो पूरी तरह समाजवादी हैं और न ही उदारीकरण के समर्थक। क्योंकि एक तरफ वो देश में इंडस्ट्री की बात करते हैं, चीनी सामानों पर बोलते हैं, तो दूसरी तरफ वो गिग वर्कर्स के पास पहुँचते हैं। कभी खलासी बन जाते हैं, कभी किसान तो कभी मैकेनिक।
जाति और सामाजिक मुद्दों पर अस्पष्टता: राहुल गाँधी जातिगत जनगणना की वकालत करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की कर्नाटक सरकार इस मुद्दे पर टालमटोल करती रही है। यह दिखाता है कि उनकी बातें और कदम एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। फिर, कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए जो जनगणना कराई थी, जिसमें जाति आधारित डाटा भी अलग से सर्वे के तौर पर जुटाया गया था, लेकिन उसे सार्वजनिक ही नहीं किया गया।
वैचारिक विरोधियों की पहचान में फेल: राहुल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने वैचारिक विरोधियों को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाते। वह एक तरफ RSS जैसे स्वदेशीय राष्ट्रवादी संगठनों को निशाना बनाते हैं, दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय विचारधारा आधारिक वामपंथियों को भी उसी श्रेणी में रख देते हैं। यह न सिर्फ गठबंधन की एकता को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है।

बिहार में इंडी गठबंधन की चुनौतियाँ

बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले इंडी गठबंधन कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। 2020 के चुनाव में गठबंधन का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था, जब RJD, कांग्रेस और वामपंथी दलों ने मिलकर भी NDA को सत्ता से हटा नहीं पाए। इस बार भी कई मुश्किलें सामने हैं, खासकर राहुल गाँधी के हालिया बयान के बाद, जिसने गठबंधन की एकता पर सवाल उठा दिए हैं।
सीट बँटवारे को लेकर बढ़ेगा तनाव: बिहार में गठबंधन के भीतर सीट बंटवारा हमेशा से एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। इंडी गठबंधन का सबसे बड़ा दल RJD अधिकांश सीटों पर दावा करता है। 2020 में कांग्रेस को 70 सीटें मिली थीं, लेकिन उसका प्रदर्शन कमजोर रहा, जिससे RJD और अन्य सहयोगी नाराज हुए।
इस बार वामपंथी दलों (CPI, CPM, CPIML) की माँग है कि उन्हें उनकी संगठनात्मक ताकत के आधार पर अधिक सीटें दी जाएँ। राहुल गाँधी के CPM और RSS को एक समान बताने वाले बयान ने वामपंथी दलों में नाराजगी पैदा की है, जिससे सीट बँटवारे की बातचीत और जटिल हो सकती है। अगर वामपंथी दल गठबंधन से अलग होने का फैसला करते हैं, तो यह गठबंधन की रणनीति को बड़ा झटका देगा।
बिहार के गठबंध में RJD का दबदबा: बिहार में RJD गठबंधन का नेतृत्व करता है और तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता इसे मजबूत बनाती है। लेकिन कांग्रेस की सीमित लोकप्रियता और राहुल के बयानों से उत्पन्न तनाव RJD के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। RJD चाहता है कि गठबंधन में एकजुटता बनी रहे, लेकिन वामपंथी दलों की नाराजगी और कॉन्ग्रेस की कमजोर स्थिति इसे मुश्किल बना रही है।
NDA की मजबूत स्थिति: बीजेपी और जेडीयू की अगुवाई वाली NDA बिहार में मजबूत स्थिति में है। नीतीश कुमार की प्रशासनिक क्षमता और बीजेपी की संगठनात्मक ताकत गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती है। नीतीश की सामाजिक समीकरणों को साधने की क्षमता और बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड विपक्ष के लिए मुश्किलें पैदा करता है। राहुल का बयान गठबंधन की एकता को कमजोर करता है, जिससे NDA को और मजबूती मिल सकती है।
वोटों का बँटवारा: बिहार में वामपंथी दलों का वोट बैंक भले ही सीमित हो, लेकिन सीमांचल और मगध जैसे क्षेत्रों में उनकी गहरी पैठ है। अगर राहुल के बयान से वामपंथी कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ता है या वे गठबंधन से अलग होते हैं, तो विपक्षी वोटों का बँटवारा तय है। यह NDA के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि विपक्ष का बिखरा वोट उनकी जीत को आसान बना सकता है।

केरल : ‘कम्युनिस्ट नेताओं की शह पर उठाई जा रहीं मुस्लिम लड़कियाँ, गैर-मुस्लिमों से करवा रहे शादी’: मौलाना नासर, सचिव, सुन्नी युवजन सभा

                                             मौलाना नासर (चित्र साभार: Indian Express & TV9)
बीते कुछ समय से केरल में मुस्लिमों द्वारा हिंसा और ‘लव जिहाद’ के मामले सामने आए हैं, जिससे यहाँ गैर-मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बनी रहती हैं। इन सब के बीच केरल के मौलाना का कहना है कि मुस्लिम लड़कियाँ गैर मुस्लिमों द्वारा जान बूझ कर फँसाई जा रही हैं और उनका मजहब परिवर्तन करवाया जा रहा है।

संस्था केरल जेम-आयतुलउलमा की सुन्नी युवजन सभा के सचिव मौलाना नासर फैजी कूडथई ने 6 दिसम्बर, 2023 को कोझिकोड में यह बयान दिया है। उसने केरल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट सरकार पर मुस्लिम लड़कियों की दूसरे धर्मों में शादी को बढ़ावा देने के आरोप लगाए हैं।

मौलाना नासर ने कहा है कि मुस्लिम लड़कियाँ उठाई जा रही हैं और गैर-मुस्लिमों से ब्याही जा रही हैं। उसने मुस्लिम समुदाय को इससे बचने और सेक्युलरिज्म के नाम पर चलाई जाने वाली सीपीएम की चालों से सावधान रहने को कहा। मौलाना नासर ने कहा, “बीते दिनों में हमने अंतरधार्मिक शादियों को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक रणनीति को देखा है। संविधान यह अधिकार देता है कि मुस्लिम, मुस्लिम से और हिन्दू, हिन्दू से विवाह करे। लेकिन कुछ मूर्खों को यह लगता है कि भारतीय संस्कृति को तभी बढ़ावा मिलेगा जब हिन्दू-मुस्लिम विवाह हो।”

आगे मौलाना नासर ने कहा, “मुस्लिम लड़कियाँ पार्टी और अखबार के दफ्तरों, CPM, DYFI और SFI के नेताओं की शह पर उठाई जा रही हैं और उनका विवाह गैर मुस्लिमों से किया जा रहा है। मह्ल्लू (मस्जिद) कमेटियों को इसके खिलाफ खड़े होना चाहिए।”

संस्था केरल जेम-आयतुलउलमा के केरल की पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ सम्बन्ध हैं। यह पार्टी केरल में कांग्रेस के UDF गठबंधन में शामिल है। केरल में वर्ष 2016 से ही कांग्रेस सत्ता से बाहर है और कम्युनिस्ट सरकार के विपक्ष में है।

यह पहली बार देखा गया है कि किसी मुस्लिम मौलाना ने अंतरधार्मिक विवाहों के विरोध में आवाज उठाई हो। यह बात ध्यान देने वाली है कि केरल में लगातार हिन्दू महिलाओं के साथ ‘लव जिहाद‘ के मामले सामने आते रहे हैं। सिर्फ हिन्दू ही नहीं बल्कि केरल के ईसाई समुदाय के लोगों ने भी ईसाई लड़कियों के मुस्लिम लड़कों द्वारा फँसाए जाने को लेकर आवाज उठाई है।

ऐसे मामलों में मुस्लिम युवक हिन्दू लड़कियों को झूठी पहचान के आधार पर प्यार के नाम पर फंसाते हैं और बाद में उनका इस्लाम में परिवर्तन करवाते हैं। ऐसा करने पर उन्हें आर्थिक लाभ दिए जाते हैं। इस काम में कई इस्लामिक संस्थाएँ और कई मुस्लिम देश लगे हुए हैं।

बीते दिंनों जब केंद्र सरकार ने संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया पर प्रतिबंध लगाया था तब भी हिन्दू लड़कियों को धर्मान्तरित करने के ऐसे ही कई मामले प्रकाश में आए थे। PFI लगातार मुल्सिम युवाओं से आह्वान करती थी कि वह हिन्दू लड़कियों को इस्लाम में परिवर्तित करें। PFI ने ऐसा करने वाले लड़कों के लिए 2 लाख रूपए नकद, एक दुकान और एक घर का पुरस्कार रखा हुआ था। इन सबके पीछे केरल में अंदर तक पहुँच चुका इस्लामिक कट्टरपंथ है। इसको मुख्यधारा की मीडिया द्वारा इतना प्रकाश में नहीं लाया जाता।