Showing posts with label #Hindutva. Show all posts
Showing posts with label #Hindutva. Show all posts

शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को दी पटखनी, भबानीपुर में 15000+ वोटों से CM को हराया: बोले- यह हिंदुत्व की जीत; हिन्दुओं सेकुलरिज्म के नशे से निकलो


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े उलटफेर के तहत तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके गढ़ भबानीपुर में करारी हार का सामना करना पड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,105 वोटों से हरा दिया है।

मतगणना के अंतिम राउंड के बाद सामने आए नतीजों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी को कुल 73,917 वोट मिले जबकि ममता बनर्जी 58,812 वोटों के साथ पीछे रह गईं। यह हार न सिर्फ चुनावी दृष्टि से बड़ी मानी जा रही है बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका खास महत्व है।

शुभेंदु ने कहा, “ममता बनर्जी को हराना बेहद जरूरी था। यह ममता बनर्जी की राजनीति से रिटायरमेंट की शुरुआत है। इस बार भी वह 15,000 से ज्यादा वोटों से हार गईं। मुसलमानों ने खुलकर उन्हें वोट दिया। वार्ड नंबर 77 में जितने भी मुसलमान वोट डालने आए, उन्होंने ममता को ही वोट दिया। वहीं हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समाज ने मुझे आशीर्वाद दिया और जिताया। यह जीत हिंदुत्व की जीत है।”

इस जीत को हिन्दुत्व की जीत कहने का कारण भी है, क्योकि हिन्दू और हिन्दू महिलाओं पैट हुए दर्दनाक अत्याचारों ने ममता को हारा है। जबसे ममता मुख्यमंत्री बनी तभी से घुसपैठिए और मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं पर अत्याचार होने शुरू हो गए। इतने अत्याचारों के बावजूद 15 सालों तक ममता का सत्ता बने रहने की वजह थी बोगस वोटिंग। जैसाकि वोटिंग के दौरान कई मतदाताओं ने साफ कहा कि पहली बार वोट डालने का मौका मिला है पहले तो घर से निकले बगैर ही हमारा वोट पड़ जाता था। और जैसे ही मौका मिला अत्याचारों का बदला ले लिया। 

लेकिन बंगाल से बाहर हिन्दुओं को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। मुसलमानों ने बीजेपी को हराने एकजुट होकर ममता और इसकी पार्टी को वोट दिया। लेकिन बेशर्म हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में रहता है। जब मुसलमान एकजुट होकर बीजेपी को हराने के लिए वोट कर सकता है तो हिन्दू क्यों नहीं एकजुट होकर बीजेपी को वोट देता? चुनावों में मुसलमान अपनी जातिगत लड़ाई को छोड़ एकजुट होकर वोट कर सकता है हिन्दुओं तुम क्यों जातिगत सियासत में बंटते हो?  

इस जीत के साथ शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। वह पहले ऐसे भाजपा नेता बन गए हैं जिन्होंने ममता बनर्जी को दो बार चुनाव में हराया है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से भी ममता बनर्जी को हराया था।

नाम महुआ मोइत्रा और सयानी घोष, दोनों TMC की फायरब्रांड नेता हैं।
लेकिन इस चुनाव में फायरब्रांड राजनीति ने TMC को ताकत देने के बजाय नुकसान पहुंचाया।
बेवजह का aggression, तीखी भाषा, personal attacks और फालतू की टिप्पणी इन सबने मिलकर TMC की नैया डुबोने का काम किया।
योगी आदित्यनाथ जैसे नेता , जिनसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है , उन पर हल्की भाषा में टिप्पणी करना TMC के लिए उल्टा पड़ गया।
राजनीति में विरोध जरूरी है , लेकिन विरोध के नाम पर अपमान जनता हमेशा याद रखती है।
चुनाव सिर्फ भाषणों से नहीं जीते जाते। चुनाव जनता की भावना , भाषा की मर्यादा, संगठन की ताकत और जमीन पर काम से जीते जाते हैं।
TMC के कई नेताओं ने इस चुनाव में मुद्दों से ज्यादा अहंकार दिखाया। जनता से संवाद कम हुआ , विरोधियों पर व्यक्तिगत हमला ज्यादा हुआ। और जब भाषा का संतुलन बिगड़ता है, तो जनता बैलेट से जवाब देती है।
नतीजा सामने है ....
TMC बुरी तरह चुनाव हार गई। BJP प्रचंड बहुमत के साथ बंगाल में इतिहास रच गई। और ममता बनर्जी अपनी खुद की सीट तक नहीं बचा पाईं।
इस चुनाव ने साफ संदेश दिया है:

राजनीति में आग उगलना आसान है, लेकिन जनता के गुस्से की आग में पूरी पार्टी जल सकती है।

पवित्र पहाड़ी पर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आने पर मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया The News Minute

                                           थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

                                            (फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

                                                          साभार- आउटलुक ट्रेवलर

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

मुझे दुख होता है जब कुछ लोग कहते हैं और पूछते हैं कि मोदी ने हिंदुओं के लिए किया ही क्या है

अबू धाबी में मंदिर उद्घाटन करने बाद पूजा करते 
सुभाष चन्द्र

आजकल विपक्ष मोदी के लिए भाजपा समर्थकों और हिन्दू जनमानस के दिमाग को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं और शायद यह प्रश्न उसी खेमे से आया होगा जिसे हमारे हिंदुओं ने मूर्ख बनकर लपक लिया है कि मोदी ने हिंदुओं के लिए क्या किया है? इस प्रश्न से मुझे सच में पीड़ा हुई क्योंकि ऐसा पूछने वालों ने कुछ तथ्यों को देखा ही नहीं। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नरेंद्र मोदी ने हिन्दू जागरण का वह काम किया है जो कोई नहीं कर सकता; हिंदुओं को सर उठा कर जीना सिखाया है, वे न समझें तो यह उनकी मर्जी; यह उनके दिमाग का दिवालियापन; दुनिया भर में आज भारतीयों को भारत पर गर्व होता है और विदेशों में प्रवासी भारतीयों में मोदी ने जान डाल दी क्या ऐसा पहले किसी प्रधानमंत्री ने किया था?

नरेंद्र मोदी पहला प्रधानमंत्री है जो डंके की चोट पर हर मंदिर में जाकर विधि विधान से पूजा करता है वरना तो विगत में प्रधानमंत्री जालीदार टोपी पहन कर इफ्तार पार्टियों का मजा लूटा करते थे मुसलमान और मुस्लिम कट्टरपंथी खुश होते रहे, लेकिन जिसने रोज़ा नहीं रखा, उसके द्वारा रोजा इफ्तार करवाना गुनाह है। रोजदार अपना रोजा ख़राब करते रहे हैं। आज प्रधानमंत्री आवास में और राष्ट्रपति भवन नवरात्रों में कन्या पूजन होता है यह क्या हिंदू जागरण के लिए कम है?

आज कुछ मुसलमान कहते मिल सकते हैं कि हिंदुओं ने मोदी द्वारा राम मंदिर बनाने को भी भुला दिया लेकिन मोदी अगर बाबरी मस्जिद बनवा देता तो मुसलमान हमेशा उसे वोट देते, यह कह कर भ्रम फैलाते है क्योंकि मुसलमानों ने मोदी की सभी योजनाओं का भरपूर लाभ उठा कर भी उसे वोट नहीं दिया

मोदी के अगर हिंदू मंदिरों का निर्माण और पुनरुत्थान को भी हिंदुओं के लिए किया गया काम हिंदू मानस न माने तो उसे मूर्ख ही कहेंगे देश में ही नहीं, इस्लामिक देशों में भी बने मंदिर, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता

-मुस्लिम देश बहरीन में 200 साल पुराने श्री कृष्ण मंदिर का Renovation 4.2 मिलियन डॉलर की लागत से 2019 में शुरू किया गया;

-अक्टूबर, 2022 में दुबई में भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ जिसमें शिव मंदिर और गुरुद्वारा भी है;

-फरवरी, 2024 में अबू धाबी में भव्य हिन्दू मंदिर का उद्घाटन स्वयं मोदी करके आए थे;

-धारा 370 हटाने के बाद कश्मीर घाटी में अनेक मंदिरों का Renovation किया गया और अभी भी चल रहा है ऐसे कई मंदिर हैं जिनमें 50-50 साल बाद पूजा शुरू हुई;

-यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के 900 किलोमीटर की 4-धाम यात्रा 1500 करोड़ की लागत से शुरू की गई जिसकी monitoring मोदी खुद करते हैं;

-Ram Mandir in Ayodhya (500 साल बाद मुगलों की गुलामी से निजात मिली)

Kedarnath Temple (भव्य निर्माण हुआ)

Somnath Temple Renovation 

Kashi Vishwanath Corridor बना जिसके बाद बनारस में पहुंचने वाले यात्रियों की संख्या उच्चतम स्तर पर पहुंच गई,

महालोक उज्जैन का एक तिहाई काम पूरा हुआ,

कालिका माता मंदिर पावागढ़ 18 जून 2022 को भव्य निर्माण के बाद मोदी ने उद्घाटन किया,

-राम मंदिर उद्घाटन से पहले 11 दिन के अनुष्ठान में भगवान राम से जुड़े 6 मंदिरो में पूजा की;

-रामायण यात्रा ट्रेन से 14 तीर्थो को जोड़ा; और 

-गुरुनानक का 550वां, गुरु गोबिंद सिंह का 350वां और गुरु अर्जन देव का 400वां प्रकाश पर्व बड़ी धूम से मनाए

मोदी ने ये जो काम हिंदुओं के लिए किए वे सब हिंदू मानस को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए किए और इन सब से आर्थिक गतिविधि इस तरह से बढ़ी जिससे हर तबके को काम मिला

मोदी प्रधानमंत्री होने के नाते कोई योजना भेदभाव करने नहीं बना सकता और वह कभी कोई काम वोट हासिल करने के इरादे से नहीं करता मुसलमान क्या उसके साथ अहसान फरामोशी करेंगे, जब हिंदू ही उसके किए को नकार देते हैं चाहे वे गरीब, अमीर, या महिलाएं हों

हिंदू मानस एक बात याद रखे, मोदी जैसा हिंदू राजा फिर नहीं मिलेगा, आप उसकी अनदेखी करोगे आप ही पछताओगे और ऐसा करने से आप उसे पीड़ा ही देंगे

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 387 उम्मीदवारों की जमानत जब्त किसने करवाई हिंदुओं ने या हिंदुत्ववादियों ने ?

परिवार भक्तों द्वारा सोनिया गाँधी को अध्यक्षा बनाने के लिए सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर करने के दिन से कांग्रेस निरंतर पतन की ओर अग्रसर है। और इस पतन के ग्राफ को राहुल-प्रियंका जोड़ी पाताललोक में लेकर जाने में प्रयासरत हैं। 

एक समय था जब अधिकतर आज़ाद उम्मीदवारों की जमानत जब्त होती थी, दूसरे नंबर पर क्षेत्रीय पार्टियां रही, फिर तीसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी है और अब उसी पंक्ति में कांग्रेस भी शामिल हो गयी है। 
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। लेकिन कांग्रेस का नारा ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ की चर्चा आज भी हो रही है। लोगों का कहना है कि यूपी के सियासी दंगल में कांग्रेस की मर्दानी यानि महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा खूब लड़ी, लेकिन अपने 399 में से 387 उम्मीदवारों की जमानत बचाने में नाकाम रही। अगर प्रतिशत की दृष्टि से देखे तो कांग्रेस के 97 प्रतिशत उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सिर्फ दो ही प्रत्याशी अपनी सीट बचा सके। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस के इस बेहद खराब प्रदर्शन को लेकर लोग खूब मजे ले रहे हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि कांग्रेस की इस दुर्गति के लिए कौन जिम्मेदार है- हिन्दू या हिन्दुत्ववादी।

सोशल मीडिया पर लोग राहुल गांधी को उनके ट्वीट की याद दिला रहे हैं। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसते हुए लिखा था, ” हिंदुत्ववादी गंगा में अकेला स्नान करता है। हिंदू गंगा में करोड़ों लोगों के साथ स्नान करता है एक तरफ हिंदू है, दूसरी तरफ हिंदुत्ववादी है। एक तरफ सच है, दूसरी तरफ झूठ है हिंदू सच बोलते हैं, हिंदुत्ववादी झूठ बोलते हैं।”

कांग्रेस की दुर्दशा के लिए प्रियंका वाड्रा पर तंज

बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट कर लिखा है, ” प्रियंका गांधी वाड्रा ने यूपी में खुद को कांग्रेस का चेहरा बताया था और ” मैं लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ” के नारे के साथ महिलाओं को भरमाने की कोशिश की थी, लेकिन जनता ने उन्हें केवल 2 सीटें दीं।

 इसके बावजूद कांग्रेस के किसी नेता ने महासचिव पद से उनका इस्तीफा नहीं मांगा।”

एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि ये वही “मौसी” है जो अपने आप को “लड़की” बोलकर लड़ना चाहती थी… किंतु कहीं से भी नहीं लड़ी… फिर भी हार गई।

हिंदू Vs हिंदुत्ववादी के चक्कर में राहुल गाँधी का भाषण बना कॉमेडी शो

राहुल गाँधी के भाषणों का विरोधी मजाक जरूर बनाते हैं, लेकिन वह कांग्रेस की सच्चाई सार्वजनिक कर रहे हैं। कांग्रेस प्रारम्भ से लेकर आज तक अपने आपको हिन्दू हितैषी बताती है, लेकिन मुग़ल युग में हिन्दू मंदिरों को मस्जिद, दरगाह एवं कब्रिस्तानों में बदलने को वास्तविक रूप देने पर उन्हें सच्चाई छुपाकर विवादित बना दिया। दूसरे, महात्मा गाँधी के वध पर चितपावन ब्राह्मणों का नरसंहार कांग्रेस राज में हुआ था, जिस पर आज भी कोई बोलने को तैयार नहीं; गो-वध का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों पर गोलियां चलवाकर उनके खून से 7 नवंबर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट कांग्रेस राज में लाल हुई थी; रामजन्मभूमि पर कोर्ट में झूठ बोला ; मलियाना में मुसलमानों का नरसंहार और 1984 में सिखों का नरसंहार आदि कांग्रेस राज में ही हुआ। इतना ही नहीं, यूपीए राज में घोर हिन्दू विरोधी Anti-Communal Violence Bill बना था, सौभाग्यवश, बिल पारित नहीं हुआ। 
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की किताब में हिंदुत्व की तुलना आतंकी संगठन ISIS और बोको हराम से करने के बाद उपजे विवाद पर पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा हिंदू और हिंदुत्व में अंतर बताने के बाद अब उन्होंने एक बार फिर दोनों को परिभाषित किया है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्ववादी पीछे से पीठ में चाकू मारता है, जबकि हिंदू आगे से। राजस्थान की राजधानी जयपुर की रैली में रविवार (12 दिसंबर) को बोलते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि 2014 से सत्ता में हिंदुत्ववादी बैठे हैं और इन्हें सत्ता से बाहर करना है।

 रैली को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा, “किसानों की जो आत्मा है… उनका जो दिल है… छाती में चाकू मारा…। और भाईयों और बहनों… आगे से नहीं… यूँ नहीं (चाकू मारने का प्रक्रिया बताते हुए)… यूँ (एक सुरक्षाकर्मी के पीछे जाकर चाकू मारने का संकेत हुए)। आगे से नहीं, पीछे से। क्यों? क्योंकि वो हिंदुत्ववादी है। हिंदू अगर मारता तो आगे से मारता। हिंदुत्ववादी है तो पीछे से मारेगा।”

राहुल गाँधी ने हिंदू और हिंदुत्व के बीच अंतर को दोहराते हुए कहा कि हिंदूवादी सत्य के लिए मरता है, लेकिन हिंदुत्ववादियों को सत्य को कोई लेना देना नहीं होता। उन्होंने कहा कि एक हिंदू के लिए सत्य उसका पथ होता है। वह आजीवन सत्य की खोज में रहता है और सत्य के लिए ही मरता है। महात्मा गाँधी का उदाहरण देते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि उन्होंने पूरे जीवन सत्य की खोज की, लेकिन हिंदुत्ववादी गोडसे ने उनके सीने में तीन गोलियाँ मारकर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी।

रैली में बोलते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि हिंदू और हिंदुत्व एक नहीं हो सकते। जैसे दो जीवों की एक आत्मा नहीं हो सकती, उसकी तरह दो शब्दों का एक मतलब नहीं हो सकता। हर शब्द का अलग मतलब होता है। एक हिंदू सत्य की खोज में कभी झुकता नहीं है, लेकिन एक हिंदुत्ववादी को नफरत से भरा होता है, क्योंकि उसके मन में खौफ होता है। रैली में जुटे कार्यकर्ताओं से कहा कि अब वक्त आ गया है कि सत्ता में बैठे हिंदुत्ववादियों को हटाकर हिंदुओं को लाया जाए।

उन्होंने कहा, “मैं हिंदू हूँ, लेकिन हिंदुत्ववादी नहीं हूँ। इस देश में दो शब्दों का टक्कर है। महात्मा गाँधी हिंदू थे और गोडसे हिंदुत्ववादी था।” राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर निशाना साधते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि आज देश के सारे संस्थान एक संगठन और एक हाथ में है। हर मंत्री के दफ्तर में संघ के OSD बैठे हैं।

ऐसे में राहुल गाँधी को नाथूराम गोडसे के 150 बयानों को जरूर पढ़ना चाहिए। और अपनी ही पार्टी से पूछें कि गोडसे को सार्वजनिक होने पर क्यों प्रतिबन्ध लगाया गया था?

इसके पहले नवंबर में राहुल गाँधी ने कहा था, “हिंदुस्तान में 2 विचारधाराएँ हैं, एक कॉन्ग्रेस पार्टी की और एक RSS की। आज के हिन्दुस्तान में बीजेपी और RSS ने नफरत फैला दी है और कॉन्ग्रेस की​ विचारधारा जोड़ने, भाईचारे और प्यार की है। उनका कहना है कि आरएसएस की विचारधार आज प्यार-भाईचारे पर हावी हो गई है।”

भाजपा पर सवाल उठाते हुए उन्होंने आगे कहा था, “बीजेपी हिंदुत्व की बात करती है। हिंदू और हिंदुत्व में क्या फर्क है, क्या ये एक हो सकते हैं? अगर हैं तो इनका नाम क्यों एक जैसा नहीं है। ये सच में अलग हैं। क्या हिंदू धर्म में ये है कि सिख और मुस्लिम को पीटा जाए? हिंदुत्व में ये है।”

उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं और उज्जैनवासियों की सुगमता के लिए उज्जैन में महाकाल रोड पर होटल और उनके मालिकों के नाम इस प्रकार हैं, यानि राहुल गाँधी के हिन्दू Vs हिन्दुत्व का चक्कर-

1. होटल का नाम- शंकरा गेस्ट हाउस

पता- महाकाल मार्ग, उज्जैन

होटल के मालिक- अब्दुल रऊफ खान।

2. होटल का नाम- शिवकृपा

पता- महाकाल मार्ग, उज्जैन

होटल के मालिक- नवाब।

3. होटल का नाम- अमृत पैलेस

पता-  महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- जावेद कुरैशी

4. होटल का नाम-  संगम पैलेस

पता-  महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- जहीर खान

5. होटल का नाम-  कल्पना पैलेस

पता-महाकाल मार्ग, उज्जैन

मालिक- सोहेल खान

6. होटल का नाम-  रॉयल

पता- महाकाल मार्ग

मालिक- रईस खान

7. होटल का नाम - सिल्वर स्वीट्स गेस्ट हाउस

पता- महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- जुबेर अहमद

8. होटल का नाम-  एप्पल

पता-  महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- कलील

9. होटल का नाम-  हाईलाईट

पता- महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- अनीस शेख

10.होटल का नाम -  सिटी पैलेस

पता - महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- मुस्तकीम।

11.होटल का नाम-  सफॉयर

पता-  महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- करीम खान। 

12. होटल का नाम- प्रिंस गेस्ट हाउस

पता-  महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- शहनवाज खान। 

13. होटल का नाम- संजर पैलेस

पता-  महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक-  मो. याकूब। 

14. होटल का नाम -उज्जैन गेस्ट हाउस

पता- महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- सिकन्दर लाला। 

15. होटल का नाम- सागर गेस्ट हाउस

पता- महाकाल मार्ग उज्जैन

मालिक- बाबू खान। 

बाहर से आने वाले अपने मित्र और रिश्तेदारों को अवश्य प्रेषित करें , उनकी सुविधा के लिए कृपया इन होटलों से बचें ।

 महाकाल मंदिर के पास भारत माता मंदिर में रुके वो संघ का है और बहुत  सस्ता है और हमारा धर्म भी बचा रहेगा।

वहां तुम्हारी शुद्धता और पवित्रता दोनों भंग नही होगी।