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कभी केरल की पहली महिला IPS बन जमाई थी धाक, अब तिरुवनंतपुरम में वामपंथियों को दी मात

आर श्रीलेखा
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया है। केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) आर श्रीलेखा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में सस्थामंगलम वार्ड से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उम्मीदवार के तौर पर शानदार जीत दर्ज की है।

इस जीत के साथ ही वह न सिर्फ वामपंथ के गढ़ में सेंध लगाने में सफल रहीं बल्कि भाजपा की ओर से तिरुवनंतपुरम की पहली महिला महापौर बनने की सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर कर सामने आई हैं।

45 साल से लगातार नगर निगम पर काबिज वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) को इस बार करारी हार मिली है। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) 101 में से 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।

श्रीलेखा की व्यक्तिगत जीत इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बनकर सामने आई है। एक सख्त, बेबाक और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में पहचानी जाने वाली श्रीलेखा ने अब पूरी ताकत के साथ राजनीति में कदम रख दिया है।

केरल की पहली महिला IPS का लंबा और बेदाग सफर

तिरुवनंतपुरम में जन्मी आर श्रीलेखा का पालन-पोषण भी यही हुआ है। जनवरी 1987 में उन्होंने इतिहास रचते हुए केरल की पहली महिला IPS अधिकारी बनी थी। उस दौर में जब पुलिस सेवा को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, श्रीलेखा ने अपनी काबिलियत से न सिर्फ जगह बनाई बल्कि ऊँचे पद तक पहुँचीं।

करीब 33 साल के अपने सेवा काल में उन्होंने केरल पुलिस के कई अहम विभागों में काम किया। वे जिला पुलिस प्रमुख रहीं, क्राइम ब्रांच, विजिलेंस, फायर फोर्स, मोटर वाहन विभाग और जेल विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा उन्होंने CBI में भी सेवाएँ दीं।

CBI में रहते हुए उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में सख्त कार्रवाई की। भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ उनकी बेखौफ छवि के चलते उन्हें ‘रेड श्रीलेखा’ के नाम से भी जाना गया। वह अनुशासन, पारदर्शिता और कड़क प्रशासन के लिए मशहूर रहीं।

साल 2017 में उन्हें पुलिस महानिदेशक (DGP) पद पर प्रमोट किया गया। इसके साथ ही वे केरल की पहली महिला DGP बनीं। उन्होंने दिसंबर 2020 में रिटायरमेंट ले ली।  

रिटायरमेंट के बाद राजनीति में एंट्री

रिटायरमेंट के बाद आर श्रीलेखा ने कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। साल 2017 के अभिनेत्री यौन उत्पीड़न मामले में उन्होंने अभिनेता दिलीप को झूठा फंसाए जाने का दावा किया, जिससे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस  से निष्कासित नेता राहुल ममकुटाथिल के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने में हुई देरी पर सवाल उठाए, जिस पर काफी चर्चा हुई।

इन बयानों के चलते कुछ लोग उनके समर्थक बने तो कुछ आलोचक, लेकिन यह साफ हो गया कि श्रीलेखा अब चुप रहने वालों में से नहीं हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली।

भाजपा में शामिल होने के बाद जब उनसे कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और कार्यशैली से प्रभावित होकर पार्टी में आई हैं। पार्टी में शामिल होने के कुछ ही समय बाद उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने का फैसला किया।

नगर निगम चुनाव में उन्होंने तिरुवनंतपुरम के सस्थामंगलम वार्ड से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत दर्ज की। खुद श्रीलेखा ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि इस वार्ड में अब तक किसी उम्मीदवार को इतनी बड़ी बढ़त नहीं मिली थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान LDF और कॉन्ग्रेस की ओर से उनके खिलाफ लगातार व्यक्तिगत हमले किए गए, लेकिन जनता ने उन सभी आलोचनाओं को नकार दिया।

इस चुनाव में भाजपा ने 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनते हुए 45 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत कर दिया। हालाँकि भाजपा एक सीट से पूर्ण बहुमत से चूक गई लेकिन निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से निगम में सत्ता का रास्ता साफ माना जा रहा है।

क्या श्रीलेखा बनेंगी पहली महिला महापौर?

तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत ने केरल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए है। 101 वार्डों वाले निगम में भाजपा को 50 सीटें मिली हैं, जबकि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) 29 और कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) 19 सीटों पर सिमट गया। दो सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं। इस परिणाम के साथ ही निगम पर 45 सालों से चले आ रहे वामपंथी शासन का अंत हो गया।

इस ऐतिहासिक जीत के बाद केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और भाजपा से विजयी रहीं श्रीलेखा को महापौर बनाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। उनका प्रशासनिक अनुभव, सख्त छवि और चुनावी जीत भाजपा के लिए मजबूत नेतृत्व विकल्प मानी जा रही है।

त्रिपुरा : क्या 1972 से लेफ्ट की रही प्रतिष्ठित सीट को छीनने वाली प्रतिमा भौमिक बनेंगी मुख्यमंत्री ?

                                           प्रतिमा भौमिक ने लेफ्ट के गढ़ में खिलाया कमल
त्रिपुरा में भाजपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाने जा रही है। 60 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी को 32 सीटें मिली है। वैसे तो इस लाल गढ़ को बीजेपी ने 2018 में ही भेद दिया था। लेकिन धनपुर वह सीट थी जो पिछली बार भगवा लहर में भी लेफ्ट के साथ रही। 2023 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट का यह गढ़ भी ढह गया है। बीजेपी की प्रतिमा भौमिक ने इस सीट पर कमल खिलाया है।

प्रतिमा की जीत कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नतीजों के बाद से उनके त्रिपुरा की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने की अटकलें लगाई जा रही है। वैसे चुनावों से पहले बीजेपी ने माणिक साहा को ही सीएम चेहरे के तौर पर मैदान में उतारा था। लेकिन अब मीडिया रिर्पोटों में कहा जा रहा है कि प्रतिमा उनकी जगह ले सकती हैं।

                                 त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के नतीजे (साभार: eci.gov.in)

प्रतिमा भौमिक (BJP leader Pratima Bhoumik) अभी केंद्र की मोदी सरकार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री हैं। उन्होंने CPM के गढ़ में भगवा फहराकर सभी को हैरान कर दिया है। प्रतिमा भौमिक ने जिस धनपुर सीट से सीपीएम उम्मीदवार कौशिक चंदा को हराया है, उस सीट से त्रिपुरा के गठन के बाद से कभी लेफ्ट हारा नहीं था। त्रिपुरा राज्य 1972 में अस्तित्व में आया था। उसके बाद से धनपुर का प्रतिनिधित्व कम्युनिस्ट दिग्गज समर चौधरी और माणिक सरकार करते रहे।

त्रिपुरा को राज्य का दर्जा मिलने के बाद समर चौधरी ने पहले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। वह लगातार 1993 तक इस सीट पर काबिज रहे। 1998 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में धनपुर विधानसभा सीट से माणिक सरकार चुनाव जीते और राज्य के मुख्यमंत्री बने। 2018 के भाजपा लह​र में भी माणिक सरकार यह लाल गढ़ बचाने में कामयाब रहे। उन्होंने पिछले चुनाव में प्रतिमा भौमिक को करीब 5400 वोटों से हराया था।

इस बार के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से 53 वर्षीय प्रतिमा भौमिक को त्रिपुरा में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि त्रिपुरा को इस बार प्रतिमा के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री मिल सकती है। भौमिक के सीएम बनाए जाने की अटकलों के बारे में पूछे जाने पर एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “इससे ​इनकार नहीं किया जा सकता। अगर उन्हें सीएम बनाया जाता है, तो माणिक साहा को केंद्र सरकार में जगह दी जा सकती है।”

                                  धनपुर में सीपीएम के कौशिक चंदा को प्रतिमा भौमिक ने हराया (साभार: eci.gov.in)

कृषक परिवार से आती हैं प्रतिमा भौमिक

प्रतिमा भौमिक धनपुर गाँव के कृषक परिवार से आती हैं। उनका गाँव भारत-बांग्लादेश सीमा के करीब है। उन्होंने अगरतला के महिला कॉलेज से जीवन विज्ञान में स्नातक की है। प्रतिमा अपने पिता की मदद करना चाहती थीं, इसलिए पढ़ाई करने के बाद वह गाँव आईं। यहाँ वह खेती और छोटे व्यवसाय में अपने पिता का हाथ बँटाती थीं। इसके अलावा गाँव में वह समाज सेवा करती थीं। वह आरएसएस में काम करने के दौरान बीजेपी से जुड़ गई थीं।

समर्थकों के लिए प्रतिमा दी

प्रतिमा भौमिक ‘प्रतिमा दी’ के नाम से भी लोकप्रिय हैं। वह पिछले लोकसभा चुनावों में पश्चिम त्रिपुरा लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुई थीं। इससे पहले वह भाजपा की त्रिपुरा इकाई की महासचिव भी रह चुकी हैं। वह केंद्रीय मंत्री बनने वाली त्रिपुरा की पहली महिला हैं। इससे पहले सिर्फ दो बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में त्रिपुरा का प्रतिनिधित्व हुआ है। 1967 और 1968 में राज्यसभा के लिए मनोनीत जादवपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ त्रिगुण सेन केंद्रीय शिक्षा मंत्री थे। बाद में, असम की बराक घाटी से कॉन्ग्रेस के संतोष मोहन देब, 1989 और 1991 में त्रिपुरा से दो बार चुने गए और 1996 तक केंद्रीय इस्पात राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे।

नाना फडणवीस : इस चितपावन ब्राह्मण की कूटनीति का यूरोप ने भी माना लोहा : महाराष्ट्र का ‘चाणक्य’ जिसने अंग्रेजों, निज़ाम, टीपू सबको बाँध कर रखा

                                       नाना फडणवीस ने एक मुश्किल समय में मराठा सत्ता का मार्गदर्शन किया
कुर्सी की भूखी कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने तुष्टिकरण करते देश के गौरवशाली इतिहास को ठंठे बस्ते में डालने के ही कारण जमीयत प्रमुख मदनी 1400+ साल पुराने इस्लाम को पुराना मजहब बताने की हिम्मत कर सका। दूसरे, जितने मुग़ल वंशज भारत में हैं, विश्व में कहीं नहीं मिलेंगे। यह भारत में ही संभव है, जहाँ इतिहास से खिलवाड़ करने वालों को भी सम्मान दिया जाता था, अगर यही दुष्कर्म विदेश में हुआ होता, ये पार्टियां और इतिहासकार जेलों में होते। मजे की बात यह है कि किसी धर्म/मजहब को नहीं मानने वाले 
कम्युनिस्ट संविधान की आड़ में हर मजहब में दखलंदाजी करते रहते हैं। ये वही कम्युनिस्ट पार्टी है जिसने 1962 इंडो-चीन युद्ध के दौरान फौजियों को खून देने से मना कर दिया था।  

मराठा साम्राज्य के उद्भव के साथ ही मुगलों का पतन शुरू हो गया था यही कारण था कि औरंगजेब के समय अपने चरम को छूने वाली मुगलिया सत्ता उसके मरने के बाद ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी। छत्रपति शिवाजी महारज, संभाजी और साहूजी के बाद मराठा साम्राज्य में छत्रपति की जगह पेशवा का दबदबा रहने लगा, जो सेनापति होते थे। नानाजी फडणवीस एक ऐसा नाम है, जो छत्रपति या पेशवा नहीं थे, लेकिन उन्होंने इन दोनों को मजबूत करने में अपनी बुद्धिमत्ता और बहादुरी से कोई कसर नहीं छोड़ी।

नाना फडणवीस का जन्म सन् 1742 में 12 फरवरी को हुआ था, जबकि उनका निधन 13 मार्च, 1800 को हुआ। उनसे पहले हम इटली के निकोलो मैकियावेली के बारे में जानते हैं, जिन्हें आधुनिक राजनीतिक विज्ञान का जनक कहा जाता है। 15वीं-16वीं शताब्दी में जब यूरोप मध्यकाल से आधुनिक युग में घुस रहा था, तब मैकियावेली उस दौर के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ बन कर उभरे। फ्लोरेंस में जन्मे निकोलो से ही नाना फडणवीस की तुलना विदेशियों ने की।

बालाजी जनार्दन भानु, जिन्हें आगे चल कर नाना फडणवीस कहा गया – वो एक चितपावन ब्राह्मण थे। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में उनके समर्थकों ने बड़ी संख्या में चितपावन ब्राह्मणों का नरसंहार किया था। भीड़ ने वीर विनायक दामोदर के भाई नारायण सावरकर की भी हत्या कर दी थी। वो भी एक स्वतंत्रता सेनानी थे। बालाजी का जन्म सतारा में हुआ था। पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट और भानु के परिवार का अच्छा रिश्ता था।

बालाजी महादजी, जो कि फडणवीस के नाना थे, उन्होंने मुगलों की एक साजिश से पेशवा की जान बचाई थी। पेशवा जब मराठा साम्राज्य के सर्वेसर्वा बन गए, तब फडणवीस उनके खासमखास हो गए और सरकार में धमक रखने लगे। पेशवा ने नाना फडणवीस के लिए भी शिक्षा-दीक्षा की वही व्यवस्था की थी, जो उन्होंने अपने बेटों विश्वास राव, माधव राव और नारायण राव के लिए की थी। नाना फडणवीस पानीपत के तीसरे युद्ध में बच कर निकल गए थे।

उस युद्ध में दुर्रानी ने मुगलों व अन्य इस्लामी ताकतों के बल पर मराठा साम्राज्य को बड़ा नुकसान पहुँचाया था, जिससे कुछ वर्षों के लिए उनका विजय रथ रुक गया था। नाना फडणवीस ने इसके बाद मराठाओं को आगे बढ़ने में मदद की और ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी कूटनीति से साम्राज्य को मजबूत किया। उन्होंने अंग्रेजों, मैसूर के टीपू सुल्तान और हैदराबाद के निजाम के खिलाफ युद्ध में रणनीति बनाई और उन्हें परास्त किया।

भीमाशंकर मंदिर के शिखर के निर्माण का श्रेय नाना फडणवीस को ही दिया जाता है। अहिल्याबाई, तुकोजी और माधोजी के चल बसने के बावजूद अंग्रेजों के खतरों के बीच नाना फडणवीस ने मराठों को एकता के सूत्र में बाँधे रखा था। लेकिन, सन् 1800 में उनके निधन के बाद मराठे बँट गए और सिंधिया-होल्कर आपस में लड़ने लगे। पेशवा ने सिंधिया का साथ दिया। पेशवा को अंग्रेजों के साथ ‘बेसिन की संधि’ करने को मजबूर होना पड़ा।

नाना फडणवीस के बारे में कहा जाता है कि वो असाधारण बुद्धि के स्वामी थे और एक योद्धा न होने के बावजूद युद्धकला की समझ रखते थे। उनकी सूझबूझ के कारण ही मैसूर, हैदराबाद और अंग्रेजों से मराठे बचे रहे। सन् 1789 में उन्होंने महादजी सिंधिया को पत्र लिख कर कहा था कि काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करना हिन्दू धर्म के लिए एक योग्य कार्य होगा। उनका मानना था कि इस कार्य से न सिर्फ उस समय की मराठा सरकार के लोगों के नाम हिन्दुओं के दिमाग में छप जाएँगे, बल्कि इससे राज्य की भलाई भी होगी और प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।

यही वो समय भी था, जब मुग़ल बादशाह शाह आलम को मराठों ने निर्देश दिया कि वो गौहत्या को प्रतिबंधित करने का आदेश जारी करे। नाना फडणवीस को मात्र 16 वर्ष की उम्र में सदाशिव राव का सचिव नियुक्त किया गया था। उन्होंने अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध पानीपत की लड़ाई में हिस्सा लिया। इस युद्ध के बाद मराठा सेनाओं को भागना पड़ा। इस पूरे प्रकरण में नाना फडणवीस की माँ और पत्नी कहीं गम हो गईं। उन पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा और वो दुनिया से अलग-थलग रहने लगे।

लेकिन, इस दौरान समर्थ गुरु रामदास की एक पुस्तक ‘दास बोध’ का उन्होंने अध्ययन किया और उनका दिमाग बदला। उन्होंने तब महाराष्ट्र के लिए कुछ करने का निर्णय लिया। उनके मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्री बनने के बाद अंग्रेजों को दो बार मुँह की खानी पड़ी। उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक मराठा कूटनीति के शीर्ष पर खुद को बनाए रखा। महाराष्ट्र के कई जमींदार उस दौरान गद्दार हो गए थे, लेकिन अपने जीवित रहते नाना फडणवीस ने गद्दारों को रोके रखा।

पेशवा नाना साहब (बालाजी) तो पानीपत की हार की व्यथा में ही चल बसे, जिसके बाद उनके 16-17 साल के बेटे माधव राव को पेशवा बनाया गया। उन्होंने नाना फडणवीस के मार्गदर्शन में फिर से मराठा प्रभुत्व स्थापित किया और खोई गरिमा को वापस हासिल किया। माधव राव की युवावस्था में ही मौत के बाद उनके बेटे नारायण राव ने बागडोर सँभाली। लेकिन, वो उतने योग्य साबित नहीं हुए। उधर पेशवा नाना का भाई भी लॉबिंग में लगा था।

राघोबा ने नारायण राव को मरवा दिया, लेकिन नाना फडणवीस ने एक हत्यारे को पेशवा नहीं बनाया। उन्होंने ‘अष्ट प्रधान’ सदस्यों की मदद से नारायण राव के बेटे सवाई माधो राव को पेशवा बना दिया। नाना फडणवीस को मराठा ख़ुफ़िया विभाग को मजबूत करने के लिए भी जाना जाता है। उनका ख़ुफ़िया विभाग इतना मजबूत था कि देश में कहीं कोई महत्वपूर्ण घटना होती थी तो नाना फडणवीस के पास उसकी सूचना अलग-अलग सूत्रों से पूरे विवरण के साथ पहुँचती थी।

फिर वो अपने अध्ययन कक्ष में बैठ कर मनन करते थे कि आगे क्या करना है और क्या नहीं। उन्होंने महादजी सिंधिया से कई बार कहा था कि अगर अंग्रेजों को छूट दे दी गई तो वो पूरे देश को गुलाम बना देंगे। अंग्रेजों ने नाना फडणवीस को रास्ते से हटाने की कई बार कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। उलटे, निजाम और भोंसले को नाना फडणवीस ने अंग्रेजों के खिलाफ कर दिया। वो एक दूरदृष्टि वाले नेता थे, जिन्हें बखूबी पता था कि राज्य के असली दुश्मन कौन हैं और कौन नहीं। नाना फडणवीस के वक्त मराठों ने जो संधियाँ की, उनकी बात कभी और।