मुझे याद है जब सितंबर 2011 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सद्भावना यात्रा के दौरान एक मौलाना ने उन्हें “इस्लामिक जालीदार टोपी” पहनाने की कोशिश की थी लेकिन मोदी ने उसे पहनने से मना कर दिया था। इस बात को लेकर कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष और Left Liberal Echo fraud system पागलों की तरह मोदी के पीछे पड़ गया था जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो। अब जिन्हें आदत है ऐसी इस्लामिक टोपी पहन कर मौलाना बनने की, तो उनके लिए क्या कह सकते हैं लेकिन मोदी नहीं पहनना चाहता था तो उससे पेट में मरोड़ क्यों हुई।
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पाकिस्तानी भूल रहे हैं कि स्मृति ईरानी मुस्लिमों की प्रतिनिधि बन कर नहीं गई थी बल्कि भारत के मंत्री की हैसियत से गई थी और अपने देश भारत के मुसलमानों के फायदे की बात करके आई है।
स्मृति ईरानी तुम पाकिस्तानियों के बाप की नौकर है क्या जो तुम्हारे कहने से पोशाक पहनेगी। तुम लोग हिजाब पहना कर अपनी औरतों के साथ कैसे कैसे कुकर्म कर लेते हो, ये तुम जानते हो और तुम्हारा मुल्क तो ऐसी हालत में है जिसके लोग हज पर जाने के लिए पैसे भी नहीं जुटा पाते और जिसकी वजह से पाकिस्तान ने अपना हज कोटा वापस करना शुरू कर दिया है जबकि भारत का कोटा इस साल बढ़ा कर पौने दो लाख कर दिया है सऊदी अरब ने।
अपने गिरेबान में झाँक कर देखो पाकिस्तानियों। सऊदी अरब और इराक सरकारों का कहना है कि पाकिस्तान के लोग जियारत के बहाने उनके देशों में आ कर चोरी और अन्य अपराधों में शामिल होते हैं जिसकी वजह से उनकी जेलें भरी रहती हैं।
सऊदी अरब के एक व्यक्ति ने पाकिस्तान के लोगों को ठोकते हुए लिखा था - हमारा देश है, हमारी जमीन है, हमारे कानून हैं, तुम कौन होते हो दखल देने वाले, तुम केवल इसलिए दखल दे रहे हो कि तुम्हारे बाप दादा ने इस्लाम काबुल कर तुम्हे अरबी नाम दे दिया, इससे क्या तुम असली मुसलमान हो गए जो हमें ज्ञान देने चल पड़े। इस बेचारे को इतनी धमकी मिलीं कि अपना ट्वीट डिलीट करना पड़ गया।
पाकिस्तान के ही नहीं ये अधिकांश कट्टरपंथी मुस्लिमों की सोच होगी कि एक गैर मुस्लिम भारतीय महिला नेता कैसे मदीना चली गई। फिर ऐसे कट्टरपंथी लोगों को एक नियम दुनियाभर के लिए बनाना चाहिए कि किसी इस्लामिक मस्जिद, मज़ार या दरगाह में कोई “गैर मुस्लिम” प्रवेश नहीं कर सकता।
इसलिए जितना प्रचार हो करना चाहिए कि हिन्दू मज़ारों और दरगाहों पर जाना पूरी तरह बंद कर दें। फिर चाहे वह अजमेर की चिश्ती की दरगाह हो या हाजी अली की, अलबत्ता राहुल “कालनेमि” अपने दादा फ़िरोज़ गांधी का मकबरा भुला कर “बाबर” की कब्र पर रोने जा सकता है।
अवलोकन करें:-
जिस दिन से हिन्दू मजारों पर जाना छोड़ देगा, वह आतंकवाद और आतंकवाद समर्थकों पर बहुत जबरदस्त चोट होगी। अपने देवी-देवताओं पर विश्वास करने का प्रमाण धारावाहिक "रामायण" निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर का देखना चाहिए, जिन्होंने प्रभु राम के बाल रूप में काक(कौए) के साथ क्रीड़ा करते दृश्य को फिल्मांकन करने प्रभु राम से प्रार्थना की थी, देखिए वीडियो: