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आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

               आरफा खानम की इस्लामी पत्रकारिता (फोटो साभार: आरम खानुम शेरवानी का यूट्यूब चैनल)
कुंठा और पूर्वाग्रह ऐसी चीजें हैं जो इंसान के दिमाग को खोखला कर देती हैं। जब यह बीमारी किसी के जेहन में घर कर जाए, तो उसे हर सकारात्मक चीज में भी सिर्फ नकारात्मकता ही नजर आती है। इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम शेरवानी इसी बीमारी से पीड़ित हैं।

आज जब पूरी दुनिया देख रही है कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कद और लोकप्रियता किस स्तर पर बढ़ी है- उस समय आरफा खानम शेरवानी खोज-खोजकर सिर्फ अपने देश के प्रधानमंत्री की बुराई करने में जुटी हैं।

उनकी कुंठा देख साफ पता चलता है कि चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरेआम मीडिया के सामने मोदी की सराहना करें, फ्रांस के राष्ट्रपति खुद वीडियो संदेशों के जरिए अपना प्रेम जाहिर करें, या फिर इजरायल के प्रधानमंत्री गर्मजोशी से गले मिलकर भारत के साथ दोस्ती की गहराई को दिखाएँ, लेकिन आरफा को इन दृश्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो अपने स्तर पर प्रधानमंत्री की छवि धूमिल करने के प्रयास जी-जान से करेंगी।

इस बार भी आरफा ने यही किया है। जी-7 समिट के दौरान सामने आई तस्वीरों को देख पूरा देश प्रधानमंत्री की तारीफ में जुटा था, लेकिन आरफा खानम ने एक पर्ची को देखकर पूरी वीडियो बना दी और ये समझाया कि अब तक कहा जाता था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता हैं, मगर अब मान लिया जाना चाहिए कि वो पर्ची वाले PM हैं, उन्होंने देश के लोगों को बेवकूफ बनाया है।

अपने इंट्रो में आरफा ने कहा, “15 साल पहले जिस व्यक्ति ने भारत के लोगों को ये कहकर बेवकूफ बनाया कि वो देश के मान-सम्मान-सरहदों की रक्षा करेगा। भारत की जनता ने जिसे तीन बार प्रधानमंत्री बनाया… अब वो सबूत मिल रहे हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं।”

अपनी वीडियो में वो जर्नलिज्म के छात्रों को पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर रिसर्च करने को कहती हैं कि वो पीएम मोदी के बैठने से लेकर हँसने तक को नोट करने को कहती हैं। इतना ही नहीं आरफा ये भी समझाने का प्रयास करती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश को विदेशी नेता के आगे झुका दिया है।

आरफा की समस्या ये है कि आखिर राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री की तारीफ क्यों की, क्यों उन्हें सुंदर, अच्छा डील करने वाला बताया और क्यों ये बोला कि जब तक पीएम मोदी प्रधानमंत्री हैं अमेरिका हमेशा भारत का साथ देगा। ऑपरेशन सिंदूर के समय पर पाकिस्तान के साथ बैठकर सब सुलह करने की पैरवी करने वाली आरफा खानम यहाँ अपनी दोगलई दिखाते हुए ये भी कहती हैं कि क्या हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि दूसरे देश हमारे मामलों में हस्तक्षेप करेंगे!

आगे वीडियो में आरफा खानम को समस्या इस बात से होती है कि प्रधानमंत्री के हाथ में पर्ची कैसे दिख गई। वो इस चीज को अपनी वीडियो में ऐसे हाईलाइट कर रही हैं जैसे दुनिया के पत्रकार की नजर नहीं पड़ी थी और उन्होंने ही प्रधानमंत्री को एक्सपोज किया हो।

अब जरा खुद सोचिए क्या प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप के सामने बैठते हुए ये नहीं पता था कि कैमरे में वो दिख रहे हैं और उनके हाथ में रखा कागज भी… उन्हें भी मालूम है कि उनकी हरकतों पर विदेशी कैमरों से ज्यादा देश में बैठे गिद्धों की नजर है जो मौका मिलते ही झपट्टा मारेंगे। लेकिन फिर भी अगर उन्होंने अपने हाथ में कोई कागज रखा तो ये ऐसा मुद्दा नहीं है कि उनकी वाकशैली पर सवाल खड़े किए जाएँ। ये सिर्फ कुतर्क है।

अब इस कुतर्क की हकीकत को समझिए कि दुनिया का बड़े से बड़ा नेता, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हो या कोई महान विचारक, जब किसी औपचारिक मंच पर देश या विदेश नीति, आँकड़ों और गंभीर विषयों पर बात करता है, तो वह पॉइंटर्स को अपने साथ रखता है।

यह एक जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान है ताकि देश को लेकर कोई भी बिंदु गलती से भी गलत न पेश हो। इसे देश को मूर्ख बनाना कहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझना भी कहा जाता है। आरफा भी जब टीवी के सामने कैमरे के लिए कभी बोलती होंगी तो टेलीप्राम्पटर उनके सामने रहता होगा ताकि खबर का कोई पहलू न छूटे… है न?

जब बड़े-बड़े पत्रकार किसी मुद्दे पर अपने पाठकों को बिना टेलीप्रॉम्पटर पर देखे खबर पढ़कर नहीं सुना सकते, तो प्रधानमंत्री के हाथ में दिखी एक पर्ची से उनके वाककौशल पर सवाल नहीं उठाना चाहिए उठाइए… क्योंकि इससे मजाक उन्हीं पत्रकारों का बनेगा।

क्या है आरफा खानम की प्रासंगिकता?

 हास्यास्पद बात ये है कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर सवाल करने का प्रयास आरफा जैसे वो लोग कर रहे हैं जिनकी खुद की प्रासंगिकता सिर्फ इस्लामी रिपोर्टिंग तक सीमित रह गई है। आज सरकार विवरण दे सकती है कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता के लिए क्या किया। उनके पास अपने कामों को सिद्ध करने के लिए जमीन पर दिख रहा विकास और डेटा होगा। मगर, आरफा खानम के पास खुद को ‘निष्पक्ष’ साबित करने के लिए न लेख होगा, न निजी विचार होंगे, न सोशल मीडिया पोस्ट होगा और न ही कोई वीडियो होगी।

वो भले चिल्ला-चिल्लाकर खुद को न्यूट्रल कहें, हाशिए समाज पर बैठे लोगों की आवाज बनने का दावा करें किंतु उनके किए काम और उनकी टाइमलाइन साफ बताती है कि उनकी चिंताओं में देश के हिंदू के मुद्दे हैं ही नहीं। उनकी स्थिति यहाँ पहुँच चुकी है कि अगर आज वह अपने में परिवर्तन करके हिंदुओं की बात करना और मोदी सरकार के कार्यों की सराहना करना शुरू भी कर दें तो उनके अपने दर्शक ही उनको स्क्रीन से दफा कर देंगे।

असल में बेवकूफ बनाने की की जाए तो असली बेवकूफ तो आपने सेकुलर हिंदुओं का बनाया है, जिन्होंने विश्वास किया कि आप निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर उन्हें सूचनाएँ देंगी, हिंदुओं के पीड़ित होने पर उनके मुद्दे को भी प्राथमकिता देंगी, लेकिन आपने मंच पाकर कभी अपनी कट्टरपंथी खाल को नहीं बदला। देश के पक्ष में उस समय तक बोला आपको लगा कि आपका फायदा है, मोदी सरकार आते ही आपके सुर बदले और आपकी इस्लामी खाल खाल से आपके सेकुलर हिंदू फॉलोवर्स भी परिचित हुए कि आप सिर्फ उन्हें ठगने के लिए बैठी हैं।

हम केवल बीते दिनों की ही बात करें तो देश-दुनिया में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन आपने सूचनाओं को किस तरह प्रसारित किया इसका उदाहरण आपकी वीडियोज के थंबनेल देखकर ही पता चलता है। आइए आरफा खानम के कुछ थंबनेल में लिखे टेक्स्ट पर नजर डालें…

  • ट्रंप के सामने मोदी की बेबसी, दुनिया चौंकी
  • ईरान वसूलेगा अमेरिका से 400 बिलियन? PM Modi को Iran से क्या सीखना चाहिए?
  • आयुष की तरह जब आदित्य ने अपनाया इस्लाम, हिंदुत्ववादियों ने जीना कैसे हराम कर दिया?
  • सकते में Israel, Iran सबसे बड़ा Winner, Pakistan को ज़बरदस्त Diplomatic Success
  • PM Modi के गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती, क्या यही है सबूत?
  • अन्ना आंदोलन का समर्थन बड़ी भूल थी? मोदी सरकार में देश बदतर?
  • “तानाशाह को खटकते हैं मेरे जैसे पत्रकार” पंजाब की मिट्टी से Arfa Khanum Sherwani
  • Deal क़रीब, Shehbaz Sharif ने चौंकाया, गोदी मीडिया की Iran पर डबल बेशर्मी
                                फोटो साभार: आरफा खानम शेरवानी का यूट्यूब
आप इन थंबनेल और शीर्षक को देखिए। क्या आपको कहीं से भी लगता है कि एक पत्रकार द्वारा दी गई ये रिपोर्ट हो सकती हैं। शीर्षक ही अपने आप में ये बताने के लिए काफी हैं कि आरफा को पीएम मोदी बेबस दिखें तो उनके लिए अच्छा कंटेंट हैं, लेकिन अगर वो गले मिलें तो ये बताया जाएगा कि गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती।
इसके अलावा ईरान से जुड़ी अगर कोई खबर आए तो उसपर आरफा का कैसा रुख होगा और पाकिस्तान की छवि का निर्माण करना हो तो कैसे हेडलाइन में उसकी दलाली को डिप्लोमैटिक सक्सेस बताएँगे।
वहीं देश भर के हिंदुओं को आहत करने वाला आयुष मलिक का मुद्दा अगर चर्चा में आ जाए तो ये देख सकते हैं कि उनकी रिपोर्टिंग उस पर कैसे होगी। वो ऐसी घटना में इस्लामी कट्टरपंथ को उजागर करने की बजाय हिंदूवादियों को बर्बर दिखाने का प्रयास करेंगी।
                                                   आरफा खानम के सोशल मीडिया पोस्ट
इसी प्रकार से उनका सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट भी हैं। मोदी सरकार को देश से उखाड़ने का सपना देखने वाली आरफा एक तरफ राहुल गाँधी की कोटा स्पीच को जरूरी बताती हैं और दूसरी ओर ट्रंप के साथ बैठे प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने से पीछे नहीं हटतीं। उन्हें ईरान की जीत का जश्न इसलिए मनाना है क्योंकि वहाँ एक मजहब के लोगों की बहुलता है, लेकिन भारत के आयुष मलिक को इसलिए दोषी दिखाना है क्योंकि उसके केस पर देश के हिंदुओं में नाराजगी है।
क्या आपको कहीं कोई पोस्ट या वीडियो थंबनेल देखकर ये लगा कि आरफा ने कभी हिंदुओं का मुद्दा उठाया है, लव जिहाद के लिए मारी गई किसी हिंदू लड़की के लिए अपना शोक व्यक्त किया है? वैश्विक संकट के बीच देश की प्रशंसा की है? नहीं, क्योंकि वास्तविकता यही है कि खुद को निष्पक्ष पत्रकार बताने वाली, सत्ता का कॉलर पकड़कर सवाल पूछने का सपना देखने वाली आरफा के लिए हिंदुओं के मुद्दे जरूरी हैं ही नहीं। उन्होंने अपने पत्रकार होने का अस्तित्व सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों के मुद्दे उठाकर ही बचा रखा है। मोदी सरकार के रहने से उन्हें यही डर कि एक दिन ये अस्तित्व मिट जाएगा। उन्हें लोग पत्रकार की जगह इस्लामी प्रवक्ता कहने लगेंगे।(साभार) 

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज से गूंजेगी संसद; धधकाई राष्ट्रप्रेम की ज्वाला, पर इस्लामवादियों ने नहीं किया कबूल: नेहरू ने हटवाए माँ दुर्गा की स्तुति वाले छंद, ‘वंदे मातरम के 150 साल’ पर संसद में बेनकाब होगा लिबरल गैंग

आज हर बीतते दिन के साथ भारत का वह धूमिल इतिहास सामने आने लगा है, जिसे मुस्लिम वोटबैंक और मुस्लिम कट्टरपंथियों के क़दमों में घुटने टेक चुके नेताओं और उनकी पार्टियों ने जनता के सामने नहीं आने दिया। इन मुस्लिम वोट के भूखे नेताओं ने उस राष्ट्रीय गीत को ही खंडित करने में कोई हिचक नहीं दिखाई, जिसने स्वतंत्रता सेनानियों को एक ऊर्जा दी थी। जो नेता और पार्टियां अपने राष्ट्रीय गीत को ही खंडित कर दे क्या उनसे देशप्रेम की उम्मीद की जा सकती है और करनी भी नहीं चाहिए। 

याद हो कुछ समय जब भगवा ध्वज पर विवाद होने पर TimesNow नवभारत पर एंकर सुशांत सिन्हा ने भगवा ध्वज के राष्ट्रीय झंडे पर खुलकर प्रकाश डालते हुए बताया था कि जब सामने स्वतंत्रता दिखनी शुरू होने पर राष्ट्रीय ध्वज पर चर्चा में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमे कई सुझाव भी आए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने 1906 में भगवा झंडे का सुझाव दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया था। लेकिन कट्टरपंथी महात्मा गाँधी के पास गए और नेहरू का सुझाया भगवा ध्वज को नज़रअंदाज़ कर आखिर में विवश होकर तिरंगा रखा गया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा होगी।

सरकार इस बहस को विशेष रूप से युवाओं तक वंदे मातरम् के संदेश को पहुँचाने का अवसर मान रही है। यह वही गीत है, जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय स्वाभिमान की नींव रखी।

संसद में ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत

 लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार (8 दिसंबर 2025) को ‘राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा’ शामिल की गई है और इसके लिए दस घंटे का समय निर्धारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहस की शुरुआत करेंगे और उनके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने विचार रखेंगे।

विपक्ष की ओर से कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी वाड्रा और सांसद गौरव गोगोई को इस बहस में हिस्सा लेने के लिए चुना है। वहीं राज्यसभा में मंगलवार (9 दिसंबर 2025) को गृह मंत्री अमित शाह इस बहस का नेतृत्व करेंगे और उनके बाद स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बोलेंगे। यह चर्चा उस समय हो रही है, जब हाल ही में चुनाव सुधारों और एसआईआर को लेकर संसद में कई बार गतिरोध देखने को मिला था।

वंदे मातरम् की रचना: साहित्य से राष्ट्रगीत बनने की यात्रा

वंदे मातरम् की रचना बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।

यह गीत केवल कविता नहीं था, बल्कि माँ और मातृभूमि दोनों की आराधना का एक अद्भुत संगम था। इसमें भारत की धरती, प्रकृति और संस्कृति को देवी रूप में प्रस्तुत किया गया। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, तब वंदे मातरम् एक साधारण गीत से आगे बढ़कर आंदोलन की आवाज बन गया। स्कूलों, कॉलेजों, जनसभाओं और रैलियों में युवा इसे गाते थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा देते थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीत में ढालकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना दिया। उस समय यह गीत हर भारतीय के हृदय में साहस और प्रेरणा की अग्नि जलाने वाला एक मन्त्र बन चुका था।

अंग्रेजों का भय और प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार इस गीत को विद्रोह और स्वतंत्रता की भावना बढ़ाने वाला मानती थी। इसलिए 1910 के बाद प्रशासन ने स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बोलने या गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

छात्रों को स्कूलों से निकाला गया, नेताओं को जेल भेजा गया और कई लोगों को सजाएँ दी गईं, लेकिन फिर भी इस गीत की आवाज को दबाया नहीं जा सका। प्रतिबंध जितना कड़ा होता गया, वंदे मातरम् उतनी ही ताकत के साथ जनमानस में गूँजता रहा।

विदेशों में भारतीय पहचान का प्रतीक

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का पहला तिरंगा फहराया और उस तिरंगे पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था। यह वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्वभर में भारत की आजादी और अस्मिता का प्रतीक बन गया।

मुस्लिम लीग ने किया विरोध और नेहरू ने की काँट-छाँट

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है।

नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ। नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कट्टरपंथियों ने हमेशा ही खड़ा किया विवाद

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।
बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”
यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

आज का वंदे मातरम्: भावना, पहचान और राष्ट्रगौरव

150 वर्ष बीत जाने के बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है। यह राष्ट्रगौरव, समर्पण और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह गीत धर्म या राजनीति की सीमाओं में कैद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में संसद में होने वाली यह चर्चा केवल इतिहास याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का क्षण है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

‘The Kerala Story' फिल्म को प्रोपेगंडा फिल्म बताने वाले वामपंथियों की लड़कियों के Love Jehad का शिकार होने पर ले रहे चुपचाप एक्शन

                         लव जिहाद को लेकर वामपंथी नेता का विरोध (फोटो साभार: केरल कौमुदी)
केरल के एक कम्युनिस्ट नेता की बेटी मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है और अब पिता लव जिहाद का रोना रो रहा है। ये सुनने में अजीब लगता है न? लेकिन यही हकीकत है।

Love Jehad की गाथा 1980 के लगभग केरल से ही शुरू हुई, लेकिन तुष्टिकरण के चलते धर्म-निरपेक्षता के नाम पर दबाया जाता रहा और हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा इस मुद्दे को उठाने पर इसे साम्प्रदायिकता का नाम देकर बदनाम किया जाता रहा। लेकिन जब आज वही आग इनके घरों में घुस गयी तब चुपचाप कार्यवाही की जा रही है। अब कोई 'Love is Love' कहने की हिम्मत नहीं। मामला घर में लगी आग का है। यह सच है कि वामपंथी किसी धर्म या मजहब को नहीं मानते, लेकिन दोगले अपने-अपने घरों में पूजा पाठ और नमाज तक पढ़ते हैं। 

   

केरल के कासरगोड में सीपीएम के एरिया कमिटी मेंबर पीवी भास्करन की बेटी संगीता ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें वो बताती है कि उसके पिता ने उसे घर में कैद कर रखा है, बुरी तरह पीटा जा रहा है, मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दे रहे। संगीता पैरालाइज्ड है, एक्सीडेंट के बाद कमर से नीचे लकवा मार गया। वो राशिद नाम के मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है, बस इसी बात पर घर में हंगामा मच गया।

संगीता का कहना है कि तलाक के बाद मिले पैसे उसके पिता और भाई ने हड़प लिए। पिता ने धमकी दी कि ‘कम्युनिज्म यहाँ नहीं चलेगा, मार दूँगा और केस से बच जाऊँगा’। संगीता ने कोर्ट में हैबियस कॉर्पस की पिटीशन डाली, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट में कहा कि वो माता-पिता के साथ है। लोकल पुलिस ने पिता के राजनीतिक प्रभाव से बात नहीं सुनी।

अब पिता भास्करन का दावा है कि राशिद पहले से शादीशुदा है और संगीता की 1.5 करोड़ की प्रॉपर्टी के लिए उसे फँसाया है। भास्करन वही नेता हैं, जो पहले ‘The Kerala Story' फिल्म को संघ परिवार का प्रोपगैंडा बताते थे। ये फिल्म लव जिहाद पर बेस्ड है, जो केरल में नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करने के नेटवर्क्स को दिखाती है। केरल में लेफ्ट और कांग्रेस दोनों ही लव जिहाद को फर्जी बताते हैं, वोट बैंक के चक्कर में। लेकिन अब जब खुद की बेटी का मामला आया, तो भास्करन को लव जिहाद याद आ गया। ये दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है?

सोचिए कि जो वामपंथी नेता जनता को लेक्चर देते हैं कि धर्म के नाम पर कुछ नहीं होता, सब प्रोपगैंडा है। लेकिन जब घर की इज्जत दांव पर लगे, तो वही लव जिहाद का शोर मचाते हैं। ये सिर्फ भास्करन का मामला नहीं। केरल में ही एक और केस हुआ था, जहाँ एक क्रिश्चियन सीपीएम कैडर की बेटी या रिश्तेदार मुस्लिम लड़के से रिलेशनशिप में थी। कोर्ट ने कपल को साथ रहने की इजाजत दी, लेकिन कम्युनिस्टों का ग्रुप ने मुस्लिम लड़के को कोर्ट के सामने पीट दिया।

यही लोग बाहर से कहते हैं कि इंटरफेथ मैरिज फ्रीडम है, लेकिन जब अपना परिवार हो, तो असलियत सामने आ जाती है। वामपंथी खुद को सेकुलर बताते हैं, लेकिन अंदर से परिवार की रक्षा के लिए वही बातें करते हैं जो आम हिंदू या क्रिश्चियन परिवार करते हैं।

लव जिहाद क्या है, ये केरल तो जानता ही है। वहाँ सबसे बड़े नेटवर्क्स का खुलासा हो चुका है। ISIS जैसे वैश्विक आतंकवाद से जुड़े केस सामने आए। ‘The Kerala Story' ने इन्हीं हकीकतों को दिखाया, लेकिन वामपंथियों ने विरोध किया। फिल्म को बैन करने की माँग की, प्रोपगैंडा कहा। क्यों? क्योंकि अल्पसंख्यक वोट बैंक को नाराज नहीं करना।

केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ही लव जिहाद को झूठ बताते हैं। लेकिन रियलिटी ये है कि मुस्लिम लड़के नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करते हैं। पहले दोस्ती, फिर लव, फिर कन्वर्जन और निकाह। संपत्ति, परिवार तोड़ना सब इन्वॉल्व। केरल स्टोरी जैसी फिल्में हकीकत बयान करती हैं, लेकिन पॉलिटिशियंस इसे दबाते हैं।

ऐसे मामले सिर्फ केरल तक सीमित नहीं। पूरे देश में फैले हैं। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी शासन के समय कई केस हुए, जहाँ हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसती रहीं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भी लव जिहाद को डिबेट ही नहीं होने दिया। लेकिन प्राइवेट में कई लेफ्ट फैमिलीज ने अपनी बेटियों को बचाने के लिए चुपके से एक्शन लिया।

एक उदाहरण लीजिए केरल के ही सीएम पिनारायी विजयन की बेटी वीणा का केस। वो DYFI के मुस्लिम प्रेसिडेंट मुहम्मद रियास से शादी कर ली। ये पॉजिटिव तरीके से पेश किया गया, लेकिन क्या ये असली लव था या पॉलिटिकल वैल्यू? वामपंथी इसे सेकुलरिज्म का प्रतीक बताते हैं, लेकिन अगर कोई आम लड़की ऐसा करे और बाद में परेशानी हो, तो वो प्रोपगैंडा। दोहरा मापदंड साफ दिखता है।

वामपंथियों का असली चेहरा ये केस खोलते हैं। वो खुद को धर्म-विरोधी बताते हैं, लेकिन घर में पूजा-पाठ करते हैं। कई नेता नमाज पढ़ते पकड़े गए। जनता को दिखाने के लिए कट्टर कम्युनिस्ट, लेकिन परिवार बचाने के लिए रिलिजन मैटर्स। ये फर्जीवाड़ा है। सेकुलरिज्म का मतलब ये नहीं कि अपनी बेटी को खतरे में डालो। लव जिहाद एक सिस्टम है- जहाँ लड़के ट्रेनिंग लेते हैं, लड़कियों को फँसाते हैं। केरल, यूपी, हरियाणा हर जगह केस सामने आए हैं। लेकिन वामपंथी मीडिया और पॉलिटिक्स इसे कवर-अप करते हैं। क्यों? वोट के लिए। अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश रखना।

संगीता का केस दुखद है। वो पैरालाइज्ड है, मदद की जरूरत है, लेकिन परिवार संपत्ति के चक्कर में उसे सताने लगा। राशिद का बैकग्राउंड संदिग्ध लगता है- पहले से शादी, प्रॉपर्टी का लालच। भास्करन ने सही कहा हो या गलत, लेकिन उनका डर जायज है। आम परिवारों में यही होता है। लेकिन वही लोग जो बाहर से कहते हैं ‘Love is Love', घर में डरते हैं। ये दिखाता है कि लव जिहाद रियल है, फिल्में झूठ नहीं बोलतीं। पुलिस का रोल भी शक के घेरे में है कि उसने पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस से केस को दबा कर रखा। संगीता ने डीएसपी और कलेक्टर तक से शिकायत की, लेकिन अभी तक कोई एक्शन नहीं। ये केरल के पुलिसिया सिस्टम की भी नाकामी है।

भास्करन का केस एक आईना है। वामपंथी सेकुलरिज्म फेक है। असली सेकुलरिज्म परिवार की सुरक्षा है, न कि वोट बैंक की गुलामी। ऐसे लव जिहाद को नकारना बंद करें और असलियत को स्वीकार कर कार्रवाई के लिए सामने आएँ, वर्ना फर्जी वामपंथ के चक्कर में तमाम परिवार बर्बाद होते ही रहेंगे।

मीलॉर्ड का मतलब है : “हमारी आत्मा मर चुकी है, हमारी सुन्नत हो चुकी है, हम हिंदुओं पर अत्याचार करने वाले मुग़ल हैं, हम मुस्लिमों को तुम्हें थूक और मूत मिला हुआ खाना खिलाने से नहीं रोक सकते”

साभार: नवभारत टाइम्स 
 सुभाष चन्द्र

कांवड़ यात्रा 22 जुलाई को शुरू हुई जिस दिन मीलॉर्ड जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस SVN भट्टी ने अंतरिम रोक लगा दी और कल 26 जुलाई को उस रोक को हटाने से मना  कर दिया और मुस्लिम याचिकाकर्ताओं को उप्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दिए जवाब पर प्रतिक्रिया देने के समय देते हुए 5 अगस्त सुनवाई की अगली तारीख लगा दी।  

मतलब कांवड़ यात्रा ढक्कन बेशर्म निकम्मे हिंदू द्रोही जजों की अंतरिम रोक के चलते 2 अगस्त को महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक के दिन समाप्त हो जाएगी और मुसलमान सभी routes पर अशुद्ध खाना खिलाते रहेंगे

लेखक 
चर्चित YouTuber 
उसके बाद कहेंगे कि अब इस मामले में सुनवाई की जरूरत नहीं है क्योंकि कांवड़ यात्रा ख़त्म हो चुकी है। 

अब साफ़ हो गया है कि इन मीलॉर्ड्स के दिमाग में हिंदुओं के लिए नफरत कूट कूट कर भरी है और येन केन प्रकारेण जैसे भी हो मुस्लिमों के आगे हिंदुओं को जलील करने वाले ये लोग हिंदुओं के प्रति Hate Mongers हैं

कल की तारीख से पहले में मेल द्वारा इन दोनों जजों को (Kind Attention - Justice Hrishikesh Roy और Justice SVN Bhatti लिख कर सुप्रीम कोर्ट को 3 वीडियो भेजे थे)

पहले वीडियो में मुस्लिम दूध में थूक रहा है;  कपड़ों पर थूक रहा है; पानी में थूक रहा है; फलों पर थूक रहा है; रोटी पर थूक रहा है, और हेयर सैलून में चेहरे पर थूक रहा है

दूसरे वीडियो में मौलाना अलीमुद्दीन टीवी पर कह रहा है कि “खाने में थूकना” हमारी आस्था है, इसको थूकना न कहें”

तीसरे वीडियो में एक लड़का होटल में बड़े भिगोने में तैयार सब्जी (कम से कम 10 किलो होगी) में पेशाब कर रहा है

ये 3 वीडियो देख कर भी उनकी खोपड़ी में अगर समझ नहीं आई तो वो पक्के मुसलमान हैं। मक्कारी देखिए जजों की कैसे वकालत करते है मुसलमानों की, जब उप्र के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि आपका आदेश केंद्रीय कानून का उल्लंघन है तो मिला कहते है कि फिर ये कानून सारे देश में लागू होना चाहिए, 3 राज्यों में क्यों लागू किया गया। तो फिर आप आदेश दीजिये कि केंद्रीय कानून देश भर में लागू किया जाए

आप सुप्रीम कोर्ट के जज होते हुए क्या दिमाग को ताला लगा कर बैठते हैं जिससे हिंदुओं का दमन किया जा सके? आपको पता है 3 राज्यों में कांवड़ यात्रा का मार्ग है इसलिए वहां पर ही इसकी जरूरत समझी गई और अगर देश भर में कांवड़ यात्रा हुई होती तो सब जगह इसे लागू किया जाता। यह सवाल करके भी मीलॉर्ड मुसलमानों के वकील की हैसियत से बात कर रहे थे

याचिकाकर्ता तो देखिये कौन है महुआ मोइत्रा और आकर पटेल, सब जानते हैं वो कितने हिंदू विरोधी हैं और वो भाजपा के सख्त विरोधी हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के जवाब पर प्रतिक्रिया  देने के लिए समय मांगते हुए कहा कि “उप्र सरकार के आदेश ने देश के secular character को प्रभावित किया है, संविधान की secular values का उल्लंघन किया है और अनेक तरह के मौलिक अधिकारों के हनन का हवाला दिया

ये ढक्कन लोग बस इतना बता दें कि कौन सा secularism, Right to equality, Right to Dignity of Life और Right not to be Discriminated due to caste और पूरा संविधान आपको यह अधिकार देता कि आप दूसरों के भोजन में थूकें, दूध, रोटी, पानी इत्यादि में थूकें? ऐसा करके आप तो खुद दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं

मीलॉर्ड आपने भगवान शंकर के लिए कांवड़ों के पावन कार्य को मलिन किया है और इस तरह आपने शंकर जी के प्रति अपराध किया है। जाइए मेरी बात याद रख लेना महादेव आप के समेत सभी हिंदू द्रोही जजों का सर्वनाश करेंगे। आप अब महादेव के टारगेट पर रहेंगे। याद रहे आप मुस्लिमों की जितनी भी वकालत करें, आप उनके लिए “काफिर” ही रहेंगे

हिन्दू नामों से चलते होटल और ढाबों का खुलासा होना शुरू; सूरत में आदिल सलीम नूरानी का चर्चित रेस्टोरेंट "कंसार थाल'; 'चेलिया मुस्लिमों द्वारा हिन्दू नामों से चलने वाले होटल, किसी हिन्दू को नौकरी पर नहीं रखते

सच परेशान हो सकता है, पराजित नहीं यानि कांवर यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले होटलों के मालिकों को अपना नाम बताने पर हंगामा करना छद्दम सेक्युलरिस्ट्स को ही बेनकाब कर रहा है। हिन्दुओं को आंखें खोलनी होंगी कि सेकुलरिज्म के हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा धोखा किया जा रहा है। क्या हिन्दुओं के विरुद्ध बहुत गहरा षड़यंत्र चल रहा है, जिसे चौपट करने क्या परमपिता परमेश्वर ने मोदी-योगी को भारतीय राजनीति में पदापर्ण करवाया है। हिन्दुओं को भी रेवड़ियों को त्याग कर इन छद्दम सेक्युलरिस्टों से दूरी बनानी चाहिए। एकतरफा धर्म-निपेक्षता चलाने वालों से होशियार और चौकन्ना रहना चाहिए। ये लोग कभी भी अपनी तिजोरी भरने के लिए हिन्दुओं को संकट में डाल सकते हैं। सनातन को अपमानित करने वालों को अभी संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में वोट देने से परहेज नहीं किया। हिन्दुओं को लालच त्यागना होगा।
केंद्र और राज्य सरकारों को नाम छुपाकर कोई भी व्यापार करने वालों के विरुद्ध कानून लाकर इसे घिनौना अपराध घोषित करना चाहिए। दिल्ली में जवाहर होटल, करीम होटल, नूरी मसाले आदि मुस्लिम नाम से चल रहे हैं, हिन्दू भी खूब खरीदारी करते हैं, लेकिन नाम छुपाकर हिन्दू नाम से व्यापार करना क्या अपराध नहीं।
सूरत में एक बहुत बड़ा गुजराती रेस्टोरेंट है, जिसका नाम है "कंसार थाल"!

2020 तक लोगों को यही पता था कि यह रेस्टोरेंट किसी हिंदू का है, क्योंकि प्रवेश द्वार पर बड़ी सी गणेश जी की पीतल की प्रतिमा रखी थी।
2020 में दो करोड़ के ड्रग्स के साथ आदिल सलीम नूरानी नाम का एक शांतिदूत पकड़ा गया... तब गुजरात के लोगों को पता चला कि अहमदाबाद सूरत और बड़ोदरा में जो "कंसार थाल" के नाम से जो यह बहुत प्रसिद्ध गुजराती रेस्टोरेंट है उसका मालिक ये आदिल सलीम नूरानी है और आप यह देखकर चौंक जाएंगे कि इसके हर रेस्टोरेंट में प्रवेश करते ही आपको गणेश जी की प्रतिमा नजर आएगी।
"कंसारा" गुजरात में हिंदुओं की एक जाति होती है जिसे शेष भारत के अलग अलग क्षेत्रों में "कसेरा" आदि उपनामों से भी जाना जाता है, जो कि पारंपरिक रूप से विभिन्न धातुओं को मिलाकर एक मिश्र धातु का निर्माण करती है जिसे "कांसा" कहते हैं, उस कांसे को हाथों से ही हथौड़े से पीट-पीटकर "थाली" या अन्य बर्तन बनाती है और उस "थाली" या कांसे के बर्तनों में भोजन करना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी "कंसार" अथवा "कसेरे" के द्वारा हाथों से बनाई गई मिश्र धातु "कांसे" की थाली में भोजन करना बहुत लाभप्रद बताया गया है।
"कंसार" एक तरह का पारंपरिक व्यंजन परोसने का पात्र होता है जिसे पारंपरिक रूप से सात्विक भोजन हेतु हिंदू प्रयोग में लाते हैं।
अब यह शांति धूर्त अपने रेस्टोरेंटस का नाम "कसाई थाल"या "हलाल थाल" इत्यादि न रखकर सात्विक सनातनी हिन्दुओं को भरमाने व धर्म भ्रष्ट करने के लिए अब हिंदुओं के नाम पर, हिंदू प्रतीक चिन्हों द्वारा बरगला कर हिंदू खान पान की सुचिता को भंग करने की भावना से अंधेरे में रखते हुए हिंदुओं से ही पैसा कमा रहे हैं।
लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि यह शांति धूर्त वैसे तो मूर्ति पूजा के विरूद्ध होते हैं,
लेकिन जब धंधे की बात आती हो या हिंदुओं को धोखा देने की बात आती हो, तब यह अल तकिया अपनाकर एक छद्म आवरण पहन लेते हैं ताकि हिंदू इनके रेस्टोरेंट में खाना खाने धोखे से आ जाएं ...!!
और धोखा खाते भी है … अपनी पहचान को छुपाकर कोई काम वही करता है जो कुछ अपराध करना चाहता है ..या लोगों को ठगना भ्रमित करना ….
यह अपराध की श्रेणी में होना चाहिए
"चेलिया मुस्लिम" द्वारा हिन्दू नामों से चलने वाले होटल 

आपको राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के हाइवे पर तमाम ऐसे होटल मिलेंगे जिनका नाम भाग्योदय, तुलसी, बनास, डिनरवेल, अरुणोदय, आदि हिन्दू नाम वाला होगा | और राज्य में भी होगे चैन बहुत गहरी हैं  इन होटलों की चेन जिसमे हजारो होटल है उन्हें गुजरात के बनासकांठा के रहने वाले "चेलिया मुस्लिम" चलाते है ।

.इन होटलों में एक भी हिन्दू को नौकरी नही दी जाती..और इन के रखरखाव से भी पता नहीं लगता कि इनका संचालन किसी मुस्लिम द्वारा किया जा रहा है। चेलिया ग्रुप ऑफ़ होटल्स का हेड ऑफिस अहमदाबाद में है । इनका पूरा खरीद सेंट्रलाइज्ड होता है। ये डाइरेक्ट कोल्डड्रिंक, नमकीन आदि बनाने वाली कम्पनीज के साथ बल्क में डील करते है,.. फिर उसे हर एक होटल में सप्लाई करते है। जहाँ तक सम्भव हो ये खरीदारी मुस्लिम से ही करते है। इनके होटल्स में इनवर्टर, बैटरी, आरओ आदि सप्लाई करने वाला भी मुस्लिम ही होता है। चूँकि ये अपने होटलों का नाम हिन्दू नाम जैसा रखते है और "ओनली वेज" लिखते है। और इनके होटल साफ सुथरे दिखते है .. इसलिए हिन्दू इनके होटलों के तरफ आकर्षित होते है। इनका ये मानना है की हिन्दुओ से पैसा निकालो और उसे मुस्लिमो के बीच लाओ।

इनका पूरा बिजनस फ्रेंचाइजी माडल पर आधारित होता है। इनकी एक सहकारी कमेटी है जो अल्पसंख्यक आयोग में अल्पसंख्यक कमेटी के रूप में रजिस्टर्ड है .. इस कमेटी में देश विदेश के लाखो चेलिया मुस्लिम मेम्बर है और सब अपना अपना योगदान देते है। फिर ये हाइवे पर कोई अच्छा जगह देखकर उसे काफी ऊँची कीमत देकर खरीद लेते है। फिर उस होटल का एक खरीदी बिक्री का एकाउंट बनाते है.. और उस होटल को किसी चेलिया मुस्लिम को चलाने के लिए सौप देते है।

पुरे विश्व के चेलिया मुस्लिम सिर्फ मुहर्रम में अपने गाँव में इकठ्ठे होते है। फिर हर एक होटल के लाभ हानि का हिसाब करते है। इसलिए मुहर्रम के दौरान करीब 20 दिनों तक गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के हाइवे पर के 90% होटल्स बंद रहते है।

ये बसों के स्टाफ को मुफ्त खाना और बेहद महंगे गिफ्ट देते है ताकि ड्राइवर इनके ही होटल पर बस रोके। और सवारियों से खाने का मोटा पैसा वसूलते हैं। 

.अहमदाबाद के सरखेज में इनका बहुत बड़ा सेंट्रलाइज्ड परचेज डिपो है। खुद का आलू प्याज आदि रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज है। ये सीजन पर सीधे किसानो से बेहद सस्ते दाम पर आलू, प्याज और अदरक आदि खरीद लेते है।

."इकोनोमिक्स टाइम्स अहमदाबाद" में छपे एक रिपोर्ट में इस चेलिया होटल्स की कुल पूंजी इस समय करीब 3000 करोड़ रूपये पहुंच चुकी है। और इनकी कुल परिसम्पत्तियों की कीमत इस समय 10,000 करोड़ रूपये होगी।

.हिन्दुओ के जेब से पैसा निकालकर उसे मुसलमानों में बांटने का ये चेलिया ग्रुप्स ऑफ़ होटल्स बेहद खतरनाक मोडल है।

.दुःख इस बात का है की अभी तक हिन्दू चेलिया मुस्लिमो के इस गंदे खेल को नही समझ सके और इनके होटलों में खाना खाकर इन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करते है...या समझिए किसी का ध्यान ही नहीं गया था। और फिर इनका ये पैसा आतंकियों को जाता है। गजवा ऐ हिंद के लिए जाता है‌। इससे बड़ा खतरनाक ये है की इन की मार्केट इतनी मजबूत बन चुकी है। ये किसी हिन्दू के होटल को चलने ही नही देते।

अंधा कानून तो सुना था लेकिन असल में अंधे तो मीलॉर्ड हैं, लगता है “थूका और मुता” हुआ खाने की उन्हें आदत पड़ गई है; शरिया चलेगा सुप्रीम कोर्ट के Proxy Rule से

 सुभाष चन्द्र

मैं बहुत पहले से कह रहा हूं कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकीलों की सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मिलकर चांडाल चौकड़ी बनी हुई है जो मनमाने फैसले करा लेते हैं।  सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ऋषिकेश रॉय एंड जस्टिस SVN भट्टी ने सिंघवी की अर्जी पर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रुट पर दुकानदारों को नाम दर्शाने के आदेश पर बिना समय गवाएं रोक लगा कर उप्र, UKhand और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर दिया

मीलॉर्ड में सिंघवी और याचिकाकर्ता से यह पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि नाम छुपाकर धंधा क्यों किया जा रहा है? यह जघन्न अपराध है, क्यों ऐसे अपराधी को बचाने आये हो? दूसरे, जब यूपीए सरकार ने इस कानून को बनाया था, तब क्यों नहीं लागु किया? ये कैसा सेकुलरिज्म है जो असली नाम बताने से खतरे में आ गया है?

मीलॉर्ड बड़े तमतमाए हुए थे योगी सरकार के आदेश पर और बोले कि “दोनों राज्यों के आदेश को लागू होने से नहीं रोका गया तो Secularism और संविधान” के प्रावधानों का उल्लंघन होगा

जजों ने कहा कि दुकानों को सिर्फ यह बताना होगा कि वह मांसाहार बेचते हैं या शाकाहारी खाना 

लगता है सुप्रीम कोर्ट को Secularism ही खतरे में नहीं लगा बल्कि “इस्लाम भी खतरे में” दिखाई दे गया आपने यह तो बताने को कहा कि मांसाहार बेचते है या शाकाहारी खाना लेकिन यह बताने के लिए नहीं कहा कि “भोजन में थूकते हैं या नहीं, या पेशाब मिलाते हैं या नहीं और जो फल सब्जियां ग्राहकों को परोसते हैं उन पर पेशाब का छिड़काव करते हैं या नहीं”

मीलॉर्ड ये हम नहीं कह रहे, ये मुसलमान खुद कहते हैं कि थूक लगा कर काफिरों को खाना देना उनका मजहब कहता है उसे देख कर ही मैं कहता हूं कि हो सकता है न्याय अंधा हो लेकिन असल में जज ही अंधे हैं जो देखते हुए भी आंखें बंद कर लेते हैं यह बात उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में कबूल भी की है

लेखक 
चर्चित यूटूबर 

मीलॉर्ड मुसलमानों के वकील बन गए तो उनकी तरफ से आप और सिंघवी जैसे वकील ही बताएं कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर कहता है और उनके भगवानों को भी नहीं मानता और “गज़वा ए हिंद” बनाना चाहता है,तो फिर -

मोहम्मद अनुस का “वैष्णो ढाबा” कैसे - वह “इस्लाम का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद वसीम का “गणपति ढाबा” कैसे - “अल्लाह का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद आदिल का “ओम शिव वैष्णो” ढाबा क्यों - “आदिल का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद शमशेर का “लक्ष्मी शुद्ध वैष्णो” ढाबा क्यों - “रजिया बेगम का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद इरफ़ान का “श्रीनाथ डोसा ढाबा” क्यों, “इरफ़ान का डोसा” क्यों नहीं-

केवल एक केरल के मुस्लिम और हिंदू के रेस्ट्रॉन्ट के बारे में बता कर जस्टिस भट्टी ये प्रमाणपत्र  देना चाहते है कि मुसलमान सफाई रखते है और हिंदू गंदगी रखने वाले बता कर हिंदुओं को बदनाम करना चाहते हैं ऐसा कीजिए मीलॉर्ड अपने बंगले सरकार से मुस्लिम बस्तियों के नजदीक बनवा कर वहां रह कर देखिए वो कितनी सफाई पसंद हैं आप आज देते हुए भूल गए कि ईद पर मुसलमान भी हिंदुओं से सामान न खरीदने की कॉल देते हैं लेकिन आपको उन्हीं पर तरस आ रहा है क्योंकि आप सनातन धर्म को ख़त्म करने के मिशन में “Secularists” के  साथ भागीदार हैं

मीडिया के पत्रकार और अख़बार लगे हैं साबित करने में कि मुलायम सिंह ने 2006 में कोई आदेश नहीं दिया था और 2006 के FSSI एक्ट को तोड़मरोड़ कर बता रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि मुलायम की हालत पतली थी जिसकी वजह से उसने 2007 के चुनाव से पहले हिंदुओं को रिझाने के लिए ये आदेश दिए थे मीलॉर्ड ने FSSI को भी देखना जरूरी नहीं समझा

मियां जावेद अख्तर कह रहे हैं ये हिटलर का नाजी आदेश है मियां जी अगर हिटलर राज होता तो आपको इतनी बात कहने पर जेल में डाल दिया जाता

मुसलमानों को गलत काम करने से रोका जा सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ऐसा चाहता ही नहीं और अभी उम्मीद है संविधान पीठ तलाकशुदा महिलाओं पर दिए गए फैसले को भी पलट देगी

जवाब दो क्या संविधान या सेकुलरिज्म नाम छुपाकर व्यापार करने की इजाजत देता है? खुद के लिए चाहिए ‘हलाल’ सिस्टम, कांवड़ रूट पर ‘पहचान’ सिस्टम से भी परेशानी; देश में संविधान और सेकुलरिज्म के नाम कितना बड़ा ढोंग रचा जा रहा है

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में पुलिस ने कांवड़ यात्रा रूट पर खाने-पीने की सभी दुकानों पर मालिकों का नाम लिखने का आदेश जारी किया। 22 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा से पहले मुजफ्फरनगर जिले के सभी दुकानदारों, ढाबों, फल विक्रेताओं और चाय की दुकानों ने प्रशासन के निर्देशानुसार अपने प्रतिष्ठानों या वेंडिंग ठेलों पर मालिकों या कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करना शुरू कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि इस निर्देश का उद्देश्य धार्मिक यात्रा के दौरान भ्रम से बचना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। लेकिन प्रशासन के इस कदम से तुष्टिकरण के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन सहित लेफ्ट लिबरल गैंग को मिर्ची लग गई। यहां तक कि इस पहल को विवाद बनाने में जावेद अख्तर जैसे बुद्धिजीवी भी कूद पड़े हैं। जावेद अख्तर ने इसकी तुलना जर्मनी के नाजी शासन से कर डाली और कहा कि नाजी शासन में दुकानों पर निशान लगते थे। इनका दोगलापन देखिए कि खुद के लिए ‘हलाल’ सिस्टम चाहिए, लेकिन कांवड़ रूट पर ‘पहचान’ सिस्टम से भी परेशानी हो रही है।

असली नाम बताने से किसी को क्या तकलीफ हो रही है? इस कदम का विरोध करने वाला दिखाए कि 'संविधान नाम छुपाकर व्यापार करने की इजाजत देता है।' संविधान को वास्तविकता में लाओ। सिर्फ कांवर रास्ते में ढाबे और खाने के होटलों पर असली नाम लिखने से जो छल, कपट और धोखा टीवी पर चौकाने वाले समाचारों सामने आ रहे हैं,  उसे देख लगता है कि देश में संविधान और सेकुलरिज्म के नाम कितना बड़ा ढोंग रचा जा रहा है। छद्दम सेक्युलरिस्टों की चीख-पुकार जायज है, क्योकि उनकी दोगलापन जगजाहिर हो गया है। अगर यही सिस्टम पूरे देश में लागू हो गया, निश्चितरूप से तूफान खड़ा हो जाएगा।  

हिंदू हलाल खाना बंद कर दे तो सेक्यूलरिज्म खतरे में !
दिलचस्प बात यह है कि हिंदू अगर हलाल सर्टिफिकेट का खाने को मना कर दे तो सेक्यूलरिज्म ख़तरे में हो जाता है। हिंदू अगर थूका हुआ खाने को मना कर दे तो भी सेक्यूलरिज्म ख़तरे में आ जाता है। यह समझ से परे है कि अपनी पहचान बताने में क्या हर्ज है ? क्या विपक्ष और लेफ्ट लिबरल कुतर्क की राजनीति नहीं कर रहे हैं? जब एक समुदाय के लोग कहते हैं कि हमें खाने पीने की चीजों पर हलाल मार्का चाहिए ताकि हमें पता चले कि हम जो खा रहे हैं क्या खा रहे हैं किसके यहां का खा रहे हैं। लेकिन जब यही बात दूसरे समुदाय के लोग करते हैं तब उनके पेट में मरोड़ उठने लगती है, यह दोगलापन है।

प्रशासन का निर्देश- पहचान के साथ करें दुकानदारी
एसएसपी अभिषेक सिंह ने कहा कि कांवड़ यात्रा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। जिले में कांवड़ियों की ओर से लिए जाने वाले मार्गों की कुल लंबाई करीब 240 किलोमीटर है। इन मार्गों पर स्थित सभी भोजनालयों पर मालिकों या कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित होना चाहिए। एसएसपी ने कहा कि होटल हों, ढाबे हों या ठेले हों, जहां से कांवड़िए खाद्य सामग्री खरीदते हैं, उनके लिए आदेश जारी किया गया। दुकानदारों को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी पहचान के साथ दुकानदारी करें यानी सभी दुकानदारों को अपनी दुकान पर नाम का बोर्ड लगाने को कहा गया है। मुजफ्फरनगर में कांवड़ यात्रा के रास्ते पर पड़ने वाले बहुत से मुस्लिम दुकानदारों ने बोर्ड लगाने शुरू कर दिए हैं।

यूपी के साथ उत्तराखंड सरकार का फैसला- नाम का बोर्ड लगाना होगा
उत्तर प्रदेश के साथ-साथ उत्तराखंड की धामी सरकार ने भी फैसला किया है कि कांवड़ के रास्ते में पड़ने वाले दुकानदारों को अपना असली नाम का बोर्ड लगाना होगा। प्रशासन का निर्देश आते ही विपक्षी दलों और लेफ्ट लिबरल गैंग को मिर्ची लग गई है। मुजफ्फरनगर के दुकानदार प्रशासन का आदेश मान कर बोर्ड लगाना शुरू कर चुके हैं लेकिन इस फैसले पर सियासत शुरू हो गई है। अदसदुद्दीन ओवैसी से लेकर महुआ मोईत्रा तक ने योगी सरकार को घेरा है। AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी से लेकर अखिलेश यादव, पवन खेड़ा, जावेद अख्तर और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोईत्रा ने तक ने फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

शिकायतों के बाद प्रशासन ने उठाया यह कदम
पिछले वर्ष कावड़ यात्रा के समय मुजफ्फरनगर के बघरा में स्तिथ आश्रम के संचालक स्वामी यशवीर महाराज ने राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर स्थित होटल ढाबो के मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा हिंदू देवी देवताओं के नाम पर आधारित नाम रखने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की थी। इस बार भी स्वामी यशवीर महाराज ने प्रशासनिक अधिकारियों से बात कर मुस्लिम होटल संचलको के नाम मोटे अक्षरों में अंकित करने की मांग की थी। हाल ही में मुजफ्फरनगर के विधायक और यूपी के मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने एक जिला स्तरीय बैठक में कहा कि मुसलमानों को किसी भी विवाद से बचने के लिए हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर अपनी दुकानों का नाम नहीं रखना चाहिए। जिला प्रशासन ने मंत्री की चिंता पर ध्यान दिया और पुलिस को कुछ शिकायतें भी मिली थीं। इसी को मद्देनजर रखते हुए निर्देश जारी किए।

दुकानदार स्वेच्छा से निर्देश का पालन कर रहेः SSP
मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक सिंह का कहना है कि मुजफ्फरनगर में कांवड़ यात्रा का मार्ग 240 किलोमीटर है। इस मार्ग पर खान-पान के जितने ठेले और होटल हैं, इन जगहों से अपने लिए खाने-पीने की चीजें खरीदते हैं। इन दुकानदारों से कहा गया है कि वे अपने प्रोपराइटर और वहां काम करने वालों के नाम बाहर प्रदर्शित करें ताकि कावंड़ियों में किसी तरह की भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो। हमारी कोशिश है कि कांवड़ यात्रा के दौरान कहीं आरोप-प्रत्यारोप और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति न बने। मार्ग पर सभी दुकानदार स्वेच्छा से इस निर्देश का पालन कर रहे हैं।

फैसला वापस लेने का सवाल ही नहींः DIG सहारनपुर
सहारनपुर के DIG ने कहा कि योगी सरकार ठेलों-दुकानों पर नाम लिखवाने से पीछे नहीं हटेगी, बल्कि सवाल ही नहीं है। कांवड़ मार्ग पर बहुत शिकायतें आई हैं, यहां अनियमित रेट वसूले जाते हैं और मांस आदि की बिक्री की जाती थी। अब ऐसा नहीं करने दिया जाएगा।

वैष्णो ढाबा, खाटू श्याम ढाबा, गणपित ढाबा- सबके मालिक मुसलमान
सहारनपुर में जनता वैष्णो ढाबा, आगरा-मथुरा रोड पर खाटू श्याम ढाबा, बरेली में चौधरी स्वीट्स, हरिद्वार रोड पर न्यू गणपति टूरिस्ट ढाबा नंबर-1, मुजफ्फरनगर में ओम शिव वैष्णो ये सभी दुकान पहचान बदलकर खोले गए हैं। इनके मालिक मुसलमान हैं। बिहार में उजियार आलम ने अपना नाम अर्जुन सिंह बताकर दुकान खोली और हिंदू लड़कियों को काम पर रखने लगा। उसका मकसद लड़कियों को लव जिहाद में फंसाकर धर्मांतरण करना था। इस काम के लिए उसे जरूर कहीं से पैसे मिलते होंगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

असदुद्दीन ओवैसी ने अफ्रीका और जर्मनी से की तुलना
AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले की तुलना दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और जर्मनी में यहूदिया के बहिष्कार से की। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है, ‘उत्तर प्रदेश पुलिस के आदेश के अनुसार अब हर खाने वाली दुकान या ठेले के मालिक को अपना नाम बोर्ड पर लगाना होगा ताकि कोई कांवड़िया गलती से मुसलमान की दुकान से कुछ न खरीद ले। इसे दक्षिण अफ्रीका में अपारथाइड कहा जाता था और हिटलर की जर्मनी में इसका नाम ‘Juden Boycott’ था।

महुआ मोईत्रा ने संविधान विरोधी बताया
टीएमसी की सांसद महुआ मोईत्रा ने मुजफ्फरनगर प्रशासन के इस फैसले के संविधान विरोधी बताते हुए लिखा, ‘आगे क्या? क्या मुसलमान अपनी पहचान के लिए अपनी आस्तीन पर स्टार ऑफ डेविड का निशान पहनेंगे? अगली बार जब कांवड़ियों या उनके परिवारों को डॉक्टर या खून की आवश्यकता हो तो उनके इलाज के लिए दूसरी कांवड़ ढूंढ लें। यह पूरी तरह से अवैध और संविधान विरोधी है।’

यह सरकार प्रायोजित कट्टरताः पवन खेड़ा
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इसे ‘सरकार प्रायोजित कट्टरता’ करार दिया। खेड़ा ने एक पोस्ट में कहा, “सिर्फ राजनीतिक दलों को ही नहीं सभी सही सोच वाले लोगों और मीडिया को इस राज्य प्रायोजित कट्टरता के खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए। हम BJP को देश को अंधकार युग में वापस धकेलने की अनुमति नहीं दे सकते।”

दुकानों पर नाम लिखने के आदेश पर भड़के अखिलेश यादव
अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा ‘… और जिसका नाम गुड्डू, मुन्ना, छोटू या फत्ते है, उसके नाम से क्या पता चलेगा? माननीय न्यायालय स्वत: संज्ञान ले और ऐसे प्रशासन के पीछे के शासन तक की मंशा की जाँच करवाकर, उचित दंडात्मक कार्रवाई करे. ऐसे आदेश सामाजिक अपराध हैं, जो सौहार्द के शांतिपूर्ण वातावरण को बिगाड़ना चाहते हैं।’

जावेद अख्तर ने कहा- नाजी शासन में दुकानों पर निशान लगते थे
कवि, गीतकार बुद्धिजीवी जावेद अख्तर को भी यह बात हजम नहीं हो पाई जावेद अख्तर ने इसकी तुलना जर्मनी के नाजी शासन से कर डाली और कहा कि नाजी शासन में दुकानों पर निशान लगते थे। जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मुजफ्फरनगर यूपी पुलिस ने निर्देश दिया है कि निकट भविष्य में किसी विशेष धार्मिक जुलूस के मार्ग पर सभी दुकानों, रेस्टोरेंट और यहां तक ​​कि वाहनों पर मालिक का नाम प्रमुखता से और स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए। क्यों? नाजी जर्मनी में वे केवल विशेष दुकानों और घरों पर ही निशान बनाते थे।’

मोहम्मद जुबैर ने बताया- यह खतरनाक है!
लेफ्ट लिबरल गैंग से मोहम्मद जुबैर ने सोशल मीडिया पर लिखा- यह ख़तरनाक है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में, एसपी अभिषेक सिंह ने कांवर यात्रा के मार्ग पर पड़ने वाले होटलों, ढाबों और छोटे विक्रेताओं को आदेश दिया कि वे मालिकों के धर्म की पहचान करने के उद्देश्य से उनकी दुकानों के सामने उनके नाम प्रदर्शित करें।

राजदीप सरदेसाई का सबका साथ सबका विकास पर तंज 
पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सोशल मीडिया पर लिखा- तो अब, यूपी में कांवर यात्रा मार्ग पर खाद्य विक्रेताओं,फेरीवालों को पुलिस ने अपने ठेले,दुकानों,रेस्तरां पर अपना नाम लिखने के सख्त निर्देश दिए हैं। वास्तव में, यह एक संकेत है कि मुस्लिम मालिक वाली दुकानों से कोई भोजन नहीं खरीदा जाएगा! दक्षिण अफ्रीका में, ऐसी प्रथाओं को एक बार ‘रंगभेद’ परिभाषित किया गया था। सबका साथ, सबका विकास किसी का?

थूक जिहाद वालों की हो सकेगी पहचान 
आखिर इन पर लोग कैसे विश्वास करे। आजकल सोशल मीडिया अलग-अलग शहरों के अनेक वीडियो वायरल हो रहे होते हैं जहां इस समुदाय के लोग थूक जिहाद कर रहे होते हैं। फलों में थूक लगाकर पैक करते हैं। सैलून में थूक मिलाकर फेस मसाज करते हैं। गंदी नालियों में सब्जियों को धोते हैं। समोसे में गाय मांस मिलाकर बेचते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण वीडियो प्रमाण के साथ हैं। ऐसे में हिंदुओं को यह जानने का अधिकार है कि जिस दुकान से वे अपने व्रत के लिए फल खरीद रहे हैं वह दुकान कौन चला रहा है।

दुबई में भी हिंदू पहचान छिपाकर नहीं खोलते दुकान
सोशल मीडिया पर एक यूजर मो. आसिफ खान ने लिखा- मुस्लिम बहुल देशों में लाखों हिंदू रह रहे हैं। वे अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और अपने देश को धन भेज रहे हैं। अगर उन देशों में मुसलमान ऐसी हरकतें करने लगें तो क्या होगा? इसका जवाब देते हुए कश्मीरी हिंदू नामक यूजर ने कहा- ये है दुबई में रेस्टोरेंट “इंड्या बाय विनीत”। हिंदू आप लोगों की तरह अपनी पहचान नहीं छिपाते। दुबई के इस रेस्टोरेंट में गणेश जी मूर्ति भी लगी हुई है। अब जिसको खाना है आकर खाए जिसको नहीं खाना वो न आए। कम से कम वो पहचान तो नहीं छिपा रहे। लेकिन भारत में तो पहचान छिपाकर गलत हरकतें की जा रही हैं।

हिंदुओं पर थोपा गया है हलाल सर्टिफिकेट
भारत में खाने पीने के सामान का प्रमाणन करने वाला FSSAI हलाल सर्टिफिकेट नहीं देता है। भारत में हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र (जमीयत उलमा-ए-हिंद की एक राज्य इकाई) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट जैसे कुछ संगठन कोई उत्पाद हलाल है नहीं, इसका प्रमाण पत्र जारी करते हैं। हलाल मुस्लिमों के खाने-पीने के सामान और विशेष कर मांस से सम्बन्धित है। यानी जो हलाल उत्पाद हैं, उन्हें मुस्लिम खा सकते हैं। मांस का हलाल होना इस बात का प्रमाणन है कि वह उसी तरीके से काटा गया है, जैसा इस्लामी किताबों में बताया गया है। हलाल सर्टिफिकेट यूं तो मुसलमानों के लिए होती है लेकिन इसे हिंदुओं पर भी थोपा जाता है। किसी कंपनी का सामान अगर हिंदू खरीदते हैं और उस पर हलाल सर्टिफेकेट है तो इसका मतलब है कि यह हिंदुओं पर थोपा गया है। क्योंकि हिंदुओं को हलाल से कोई मतलब नहीं है। यानी 18 प्रतिशत मुसलमानों के लिए जो हलाल सर्टिफिकेट लगाया गया है वह 80 प्रतिशत हिंदुओं पर भी थोप दिया गया।

बेवजह हलाल सर्टिफिकेट के लिए पैसे भरते हैं हिंदू
जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट हलाल इकोसिस्टम में आने वाली एक कम्पनी से 60,000 रुपये रजिस्ट्रेशन और फिर 1500 रुपये प्रति उत्पाद हलाल प्रमाणन के लिए लेती है। इसके ऊपर से GST भी लगता है। अगर कोई कंपनी 10 उत्पाद बनाती है और उसको हलाल प्रमाणन की आवश्यकता है तो उसे 75,000 रुपये + GST देना होगा। यह धनराशि सिर्फ तीन साल के लिए है, इसके बाद दोबारा फीस देनी होती है। कंपनियां इस सर्टिफिकेट को लेने के लिए जो खर्च करती हैं वह पैसे भी उत्पाद की लागत पर जोड़ देती हैं। इस तरह 80 प्रतिशत हिंदू जब भी हलाल सर्टिफिकेट वाले उत्पाद खरीदते हैं तो वे इसके लिए भी पैसा चुकाते हैं।