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अखलाख, हमास, फिलिस्तीन और गाज़ा पर मातम करने वाले ईद पर सूर्या की क़ुरबानी पर खामोश क्यों? पड़ोसी मुस्लिमों के मुँह से भी कट्टरपंथियों के लिए नहीं फूट रहा एक भी शब्द

गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। गंगा-जमुना की तहजीब और सेकुलरिज्म का रोना वाले सूर्या की क़ुरबानी पर क्यों खामोश हैं? टीवी पर चर्चाओं में जब घिरने पर बेशर्म संविधान की दुहाई देने लगते हैं। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।

सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग का मुँह नहीं खुला।

घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।

Republic Bharat पर अपने शो महाभारत पर एंकर राम मोहन शर्मा जब इस दुर्घटना की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे तब एक महिला ने कहा कि सरकार को इन लोगों को मिलने वाली हर सुविधा वापस ले लेनी चाहिए। यह सच भी है। जब तक सरकार ऐसे ठोस कदम नहीं उठाएगी इस तरह की हरकतों, दंगों और हिन्दू त्यौहारों पर होने वाली पत्थरबाज़ी बंद नहीं होगी। दूसरे, इन कट्टरपंथी और इनके समर्थकों को मालूम है कि मोदी सरकार सिर्फ पाकिस्तान के लिए सख्त हो सकती है, किसी और के लिए नहीं। बांग्लादेश में हिन्दुओं का नरसंहार होने के बावजूद मानवीय आधार पर आर्थिक मदद बंद नहीं की जबकि पाकिस्तान का पानी बंद कर दिया।      

प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग

हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, मुख्यमंत्री योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।

हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”

वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।

क्यों की गई सूर्या की हत्या

सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।

चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।

सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।

पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता

घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।

सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।

सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया

मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।

इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।

‘The Kerala Story' फिल्म को प्रोपेगंडा फिल्म बताने वाले वामपंथियों की लड़कियों के Love Jehad का शिकार होने पर ले रहे चुपचाप एक्शन

                         लव जिहाद को लेकर वामपंथी नेता का विरोध (फोटो साभार: केरल कौमुदी)
केरल के एक कम्युनिस्ट नेता की बेटी मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है और अब पिता लव जिहाद का रोना रो रहा है। ये सुनने में अजीब लगता है न? लेकिन यही हकीकत है।

Love Jehad की गाथा 1980 के लगभग केरल से ही शुरू हुई, लेकिन तुष्टिकरण के चलते धर्म-निरपेक्षता के नाम पर दबाया जाता रहा और हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा इस मुद्दे को उठाने पर इसे साम्प्रदायिकता का नाम देकर बदनाम किया जाता रहा। लेकिन जब आज वही आग इनके घरों में घुस गयी तब चुपचाप कार्यवाही की जा रही है। अब कोई 'Love is Love' कहने की हिम्मत नहीं। मामला घर में लगी आग का है। यह सच है कि वामपंथी किसी धर्म या मजहब को नहीं मानते, लेकिन दोगले अपने-अपने घरों में पूजा पाठ और नमाज तक पढ़ते हैं। 

   

केरल के कासरगोड में सीपीएम के एरिया कमिटी मेंबर पीवी भास्करन की बेटी संगीता ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें वो बताती है कि उसके पिता ने उसे घर में कैद कर रखा है, बुरी तरह पीटा जा रहा है, मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दे रहे। संगीता पैरालाइज्ड है, एक्सीडेंट के बाद कमर से नीचे लकवा मार गया। वो राशिद नाम के मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है, बस इसी बात पर घर में हंगामा मच गया।

संगीता का कहना है कि तलाक के बाद मिले पैसे उसके पिता और भाई ने हड़प लिए। पिता ने धमकी दी कि ‘कम्युनिज्म यहाँ नहीं चलेगा, मार दूँगा और केस से बच जाऊँगा’। संगीता ने कोर्ट में हैबियस कॉर्पस की पिटीशन डाली, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट में कहा कि वो माता-पिता के साथ है। लोकल पुलिस ने पिता के राजनीतिक प्रभाव से बात नहीं सुनी।

अब पिता भास्करन का दावा है कि राशिद पहले से शादीशुदा है और संगीता की 1.5 करोड़ की प्रॉपर्टी के लिए उसे फँसाया है। भास्करन वही नेता हैं, जो पहले ‘The Kerala Story' फिल्म को संघ परिवार का प्रोपगैंडा बताते थे। ये फिल्म लव जिहाद पर बेस्ड है, जो केरल में नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करने के नेटवर्क्स को दिखाती है। केरल में लेफ्ट और कांग्रेस दोनों ही लव जिहाद को फर्जी बताते हैं, वोट बैंक के चक्कर में। लेकिन अब जब खुद की बेटी का मामला आया, तो भास्करन को लव जिहाद याद आ गया। ये दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है?

सोचिए कि जो वामपंथी नेता जनता को लेक्चर देते हैं कि धर्म के नाम पर कुछ नहीं होता, सब प्रोपगैंडा है। लेकिन जब घर की इज्जत दांव पर लगे, तो वही लव जिहाद का शोर मचाते हैं। ये सिर्फ भास्करन का मामला नहीं। केरल में ही एक और केस हुआ था, जहाँ एक क्रिश्चियन सीपीएम कैडर की बेटी या रिश्तेदार मुस्लिम लड़के से रिलेशनशिप में थी। कोर्ट ने कपल को साथ रहने की इजाजत दी, लेकिन कम्युनिस्टों का ग्रुप ने मुस्लिम लड़के को कोर्ट के सामने पीट दिया।

यही लोग बाहर से कहते हैं कि इंटरफेथ मैरिज फ्रीडम है, लेकिन जब अपना परिवार हो, तो असलियत सामने आ जाती है। वामपंथी खुद को सेकुलर बताते हैं, लेकिन अंदर से परिवार की रक्षा के लिए वही बातें करते हैं जो आम हिंदू या क्रिश्चियन परिवार करते हैं।

लव जिहाद क्या है, ये केरल तो जानता ही है। वहाँ सबसे बड़े नेटवर्क्स का खुलासा हो चुका है। ISIS जैसे वैश्विक आतंकवाद से जुड़े केस सामने आए। ‘The Kerala Story' ने इन्हीं हकीकतों को दिखाया, लेकिन वामपंथियों ने विरोध किया। फिल्म को बैन करने की माँग की, प्रोपगैंडा कहा। क्यों? क्योंकि अल्पसंख्यक वोट बैंक को नाराज नहीं करना।

केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ही लव जिहाद को झूठ बताते हैं। लेकिन रियलिटी ये है कि मुस्लिम लड़के नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करते हैं। पहले दोस्ती, फिर लव, फिर कन्वर्जन और निकाह। संपत्ति, परिवार तोड़ना सब इन्वॉल्व। केरल स्टोरी जैसी फिल्में हकीकत बयान करती हैं, लेकिन पॉलिटिशियंस इसे दबाते हैं।

ऐसे मामले सिर्फ केरल तक सीमित नहीं। पूरे देश में फैले हैं। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी शासन के समय कई केस हुए, जहाँ हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसती रहीं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भी लव जिहाद को डिबेट ही नहीं होने दिया। लेकिन प्राइवेट में कई लेफ्ट फैमिलीज ने अपनी बेटियों को बचाने के लिए चुपके से एक्शन लिया।

एक उदाहरण लीजिए केरल के ही सीएम पिनारायी विजयन की बेटी वीणा का केस। वो DYFI के मुस्लिम प्रेसिडेंट मुहम्मद रियास से शादी कर ली। ये पॉजिटिव तरीके से पेश किया गया, लेकिन क्या ये असली लव था या पॉलिटिकल वैल्यू? वामपंथी इसे सेकुलरिज्म का प्रतीक बताते हैं, लेकिन अगर कोई आम लड़की ऐसा करे और बाद में परेशानी हो, तो वो प्रोपगैंडा। दोहरा मापदंड साफ दिखता है।

वामपंथियों का असली चेहरा ये केस खोलते हैं। वो खुद को धर्म-विरोधी बताते हैं, लेकिन घर में पूजा-पाठ करते हैं। कई नेता नमाज पढ़ते पकड़े गए। जनता को दिखाने के लिए कट्टर कम्युनिस्ट, लेकिन परिवार बचाने के लिए रिलिजन मैटर्स। ये फर्जीवाड़ा है। सेकुलरिज्म का मतलब ये नहीं कि अपनी बेटी को खतरे में डालो। लव जिहाद एक सिस्टम है- जहाँ लड़के ट्रेनिंग लेते हैं, लड़कियों को फँसाते हैं। केरल, यूपी, हरियाणा हर जगह केस सामने आए हैं। लेकिन वामपंथी मीडिया और पॉलिटिक्स इसे कवर-अप करते हैं। क्यों? वोट के लिए। अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश रखना।

संगीता का केस दुखद है। वो पैरालाइज्ड है, मदद की जरूरत है, लेकिन परिवार संपत्ति के चक्कर में उसे सताने लगा। राशिद का बैकग्राउंड संदिग्ध लगता है- पहले से शादी, प्रॉपर्टी का लालच। भास्करन ने सही कहा हो या गलत, लेकिन उनका डर जायज है। आम परिवारों में यही होता है। लेकिन वही लोग जो बाहर से कहते हैं ‘Love is Love', घर में डरते हैं। ये दिखाता है कि लव जिहाद रियल है, फिल्में झूठ नहीं बोलतीं। पुलिस का रोल भी शक के घेरे में है कि उसने पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस से केस को दबा कर रखा। संगीता ने डीएसपी और कलेक्टर तक से शिकायत की, लेकिन अभी तक कोई एक्शन नहीं। ये केरल के पुलिसिया सिस्टम की भी नाकामी है।

भास्करन का केस एक आईना है। वामपंथी सेकुलरिज्म फेक है। असली सेकुलरिज्म परिवार की सुरक्षा है, न कि वोट बैंक की गुलामी। ऐसे लव जिहाद को नकारना बंद करें और असलियत को स्वीकार कर कार्रवाई के लिए सामने आएँ, वर्ना फर्जी वामपंथ के चक्कर में तमाम परिवार बर्बाद होते ही रहेंगे।

‘आतंकवादी नहीं, आम नागरिकों की मौत हुई’: ‘The Wire’ की आरफा खानम शेरवानी ने चलाया दुश्मन मुल्क का एजेंडा; अरफ़ा ने साबित कर दिया है कि आतंकवाद का मजहब होता है

                                               प्रोपेगैंडा चलाने वाली पत्रकार आरफा खानम
जहाँ एक तरफ पूरा देश ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारतीय सेना को धन्यवाद दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ ‘The Wire’ जैसे मीडिया संस्थान और अरफ़ा खानम शेरवानी जैसे एजेण्डाबाज पत्रकार प्रपंच से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे संवेदनशील समय में भी दुश्मन का एजेंडा चला रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। सिंधु जल संधि के स्थगन के साथ पाकिस्तानियों के वीजा रद्द करने और चेनाब नदी का पानी रोकने के बाद आखिरकार जब भारतीय सेनाओं ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत आतंकियों के ठिकाने नेस्तनाबूद किए, उसके बाद कहीं भारतीयों के कलेजों को ठंडक मिली, लेकिन देश की ये बहादुरी भी प्रोपेगेंडा चलाने वालों को हजम नहीं हुई।

जम्मू कश्मीर में पहलगाम के बैसारन घाटी में 22 अप्रैल, 2025 को भरी दोपहर में उस समय आतंकी हमला हुआ जब पर्यटक घाटी में अपने लिए यादें संजो रहे थे। कुछ बिल्कुल नए विवाहित जोड़े अपने हनीमून पर आए थे तो वहीं कुछ परिवार देश के दक्षिणी हिस्से से एकदम उत्तर में आकर प्रकृति के अप्रतिम दृश्यों को निहार रहे थे।

उसी समय पाकिस्तानी आतंकियों ने गोलीबारी शुरु कर दी। 24 हिंदुओं समेत कुल 28 लोगों को गोली मारी गई। हत्या से पहले उन सभी से उनका धर्म पूछा गया। गैर-मुस्लिम होने का प्रमाण जाँचा गया। हिंदू महिलाओं के सामने ही उनका सुहाग उजाड़ दिया गया।

इस आतंकी हमले के बाद देशभर में लोगों में आक्रोश फैल गया। सबके दिलों में न्याय की ज्वाला धधक रही थी। एक ओर भारत सरकार अपने निर्णय ले रही था को वहीं आम लोग भी अपने-अपने तरीकों से इसका विरोध जता रहे थे। कई शहरों में पाकिस्तान के झंडों के पोस्टर सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर चिपकाए गए। कुछ ने सोशल मीडिया पर प्रक्रिया दी तो कई जगहों पर कैंडल मार्च निकाल कर न्याय की आस लगाई थी।

भारत सरकार ने भी लोगों का भरोसा टूटने नहीं दिया। लगातार अपने कड़े निर्णयों से सरकार बताती रही कि वो फुल फॉर्म में है। हमले के ठीक 15 दिन बाद 7 मई, 2025 की आधी रात में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ मिशन का आगाज किया और पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में अपनी नींव जमाए बैठे आतंकी संगठनों के 9 ठिकाने तबाह कर दिए। इस मिशन से जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैय्यबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के लगभग 100 आतंकियों को जमींदोज कर दिया गया। सेना ने इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया हैंडल से दी।

‘The Wire’ की आरफा खानम शेरवानी ने चलाया पाकिस्तान का एजेंडा

इस मिशन की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद प्रोपेगेंडा चलने वाले न्यूज पोर्टल और पत्रकारों में इस बात की खलबली मच गई कि किस तरह से पाकिस्तान को ‘पीड़ित’ दिखलाया जाए। किस तरह से बताया जाए की जो मारे गए वह आतंकी नहीं थे और किस तरह से भारत सरकार के खिलाफ एक नया जहर घोला जा सके।

इस कड़ी में प्रोपेगेंडा न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ की सीनियर एडिटर आरफा खानम शेरवानी ने एक पैनल डिस्कशन कर डाला। इसने कुछ वामपंथी पत्रकारों को शामिल कर लिया गया और इस पैनल चर्चा में आरफा ने ये तक कह डाला कि जो मारे गए वह आतंकी नहीं थे बल्कि आम नागरिक थे।

जब देश में हो रहे धमाकों में नागरिक मारे जा रहे थे, तब अपने चहिते पाकिस्तान और रिश्तेदार आतंकवादियों को कुछ कहने की हिम्मत हुई? यानि अरफ़ा ने साबित कर दिया है कि आतंकवाद का मजहब होता है।

आरफा खानम ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम से शुरू होकर पूरे मिशन की चिरौरी करते हुए लगभग एक घंटे के वीडियो में ये बताने की कोशिश की कि मिशन में क्या क्या खामियाँ रहीं, इस मिशन से पाकिस्तान के लोग किस तरह परेशान हो रहे हैं और इस मिशन के जरिए मोदी सरकार क्या-क्या फायदे लेगी।

आरफा ने सबसे पहले इसी बात पर चर्चा जरूरी समझी कि इस मिशन का नाम सिंदूर रखा तो उसे किस तरह से लिखा गया। आरफा ने कहा, “भारतीय सेना ने पारंपरिक तरीकों से हटकर मिशन जानकारी सोशल मीडिया हैंडल से दी गई। इसमें पोस्टर लगाया गया और उसमें सिंदूर को इस तरह लिखा गया जैसे भारत में शादीशुदा औरतें अपनी माँग में सिंदूर भरती हैं और साथ में ये भी कहा है कि न्याय हुआ।”

इसके बाद आरफा ने भारत ने एयरस्ट्राइक पर सवाल जवाब किए। पैनल डिस्कशन में कहा गया कि हमारे पास सिर्फ भारत सरकार और पाकिस्तान की ओर से किए गए दावे ही हैं कि उन्होंने मिशन में क्या किया है।

आरफा ने पैनलिस्ट्स से पूछा कि भारत के दर-दर से और घर-घर आवाज आ रही थी कि लोगों को जंग चाहिए। तो क्या ये जंग है? इसके जवाब में पैनलिस्ट और वरिष्ठ पत्रकार राहुल बेदी ने कहा, “भारत ने पाकिस्तान के 9 ठिकानों पर हमला किया है तो इसकी जवाबी हमले 100% होंगे और यह कहाँ होंगे हमें नहीं पता है। मिलिट्री पर या एयरफोर्स पर हमले हो सकते हैं।”

अपने पैनल डिस्कशन में आरफा ने पाकिस्तान सरकार की बातें इतनी मजबूती से रखी मानो ऐसा लग रहा हो कि वह पाकिस्तान की कोई प्रवक्ता हों। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान कह रहा है कि जो लोग मारे गए हैं उनमें कोई आतंकवादी नहीं है। ऐसे में जितने हमले हुए हैं उनमें कोई आतंकवादी नहीं मारा है बल्कि आम नागरिकों की मौत हुई है।”

आरफा के इस बयान से लोगों में काफी गुस्सा बढ़ गया। लोगों का कहना है कि देश के लिए खड़े होने से ज्यादा जरूरी पाकिस्तान को समर्थन देना नहीं हो सकता, लेकिन प्रोपेगंडा चलाने वाले इन पत्रकारों के लिए पाकिस्तान को पीड़ित दिखलाना शायद सबसे जरूरी है। राहुल बेदी ने कहा कि इस मिशन से पीएम मोदी अपना राजनीतिक फायदा ज़रूर उठाएँगे।

कौन है हमास का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ ऑनलाइन बेचने वाला ‘Mr. Fafo’ : कभी डॉक्टर, कभी मरीज, कभी घायल बच्चे का बाप…

Mr. Fafo के लगातार प्रोपगैंडा कर रहा है (चित्र साभार: Twitter)
इस्लामी आतंकी संगठन हमास और इजरायल के युद्ध के बीच हमास और फिलीस्तीन के प्रोपगेंडा की पोल खुल रही है। ऐसे में सोशल मीडिया पर एक ऐसे ही वीडियो क्रिएटर की कलई खुली है जो कि एक दिन आतंकी, दूसरे दिन पीड़ित और तीसरे दिन डॉक्टर बन लेता है। उसे सोशल मीडिया ने ‘Mr. Fafo’ की संज्ञा दी है।

7 अक्टूबर 2023 को इस्लामी आतंकी संगठन हमास के इजरायल पर हमले के तुरंत बाद आतंकियों की करतूतों को मिटाने और फिलिस्तीनियों के लिए सहानुभूति बटोरने का दौर चालू हो गया था। इसी कड़ी में सालेह अलजफारवी नाम के एक व्यक्ति जो कि गाजा का रहने वाला है, ने कई वीडियो सोशल मीडिया पर डाले।

सालेह पैलीवुड (Pallywood) का अभिनेता है। Pallywood दरअसल, फिलीस्तीन और हॉलीवुड के वुड शब्दों को मिलाकर बनाया गया है। इस Pallywood का मुख्य कार्य इजरायल के विरुद्ध प्रोपगेंडा कंटेंट बनाना है।

सालेह के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं जिनमें वह एक में गंभीर रूप से घायल मरीज बना हुआ है और उसे मरते हुए दिखाया गया है। दूसरे वीडियो में वह एक घायल बच्चे का बाप बन लेता है, तीसरे में एक डॉक्टर और चौथे में एक गायक बन लेता है।

सबसे पहले सालेह की एक ऐसी वीडियो वायरल हुई जिसमें वह इजरायल पर हुए आतंकी हमले के बाद जश्न मना रहा था। इसके बाद दूसरी वीडियो में वह इजरायल के हवाई हमलों से भागता हुआ दिखा। इसी के चलते लोगों ने एक्स (पहले ट्विटर) पर उसका मजाक उड़ाना चालू किया।

उसकी इन हरकतों के चलते उसे Mr. FAFO नाम दिया गया है। दरअसल, FAFO एक अंग्रेजी चलताऊ कहावत F@*k Around, Find Out के पहले अक्षरों को मिलाकर बनाया गया है इसका अर्थ होता है कि गड़बड़ करो और नतीजा देखो।

सालेह की सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रही हैं। डॉ एली डेविड नाम के एक अकाउंट ने एक्स (पहले ट्विटर) पर इसी कड़ी में सालेह का एक वीडियो डाला जिसमें उन्होंने लिखा कि Mr. Fafo जो कि सुबह तक एक रेडियोलाजिस्ट था,अब गायक बन गया है।

किंगडम ऑफ़ इजरायल नाम के एक अकाउंट ने सालेह के कुछ फोटो वीडियो डाले जिसमें एक में वह हमास का आतंकी बनते हुए गाना गाता है, एक में किसी मरीज का एक्सरे मशीन पर इलाज करते हुए दिखता है जबकि दूसरी फोटो में उसका वही मीम है जिसने उसे Mr. Fafo के तौर पर ‘ख्याति’ दिलाई है।

एक्स पर ही याकोव कापलान द्वारा डाले गए एक वीडियो में सालेह मीडिया रिपोर्टर बना हुआ है। एक वीडियो में वह गाजा में अपने फिल्म स्टाफ के साथ भी दिखता है, जिसमें कुछ लोग उसके साथ किसी शूटिंग के लिए जा रहे हैं।

ओली लन्दन द्वारा डाले गए एक वीडियो में सालेह हँसता हुआ दिखता है जबकि वह कई ऐसे वीडियो बना चुका है जिसमें वह खुद को इजरायली हवाई हमलों में मारे गए बच्चों का बाप बताता है या फिर हवाई हमले में बर्बाद इमारतों पर क्रन्दन करता है। उसके प्रोपगेंडा के चलते मेटा ने उसका इन्स्टाग्राम अकाउंट उड़ा दिया था लकिन उसने अपने बैकअप अकाउंट से स्टोरी दुबारा डालनी चालू कर दी हैं।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर फिलीस्तीन के लोगों द्वारा इस तरह का प्रोपगेंडा कोई नई बात नहीं है। लगातार इजरायल को एक दमनकारी शक्ति दिखाने के लिए ऐसी कई फोटो वीडियो वायरल की जाती रही हैं। हाल ही में सोशल मीडिया यूजर्स ने दावा किया था कि गाजा से एक बच्ची का फोटो वायरल किया जा रहा है जो कुछ ही दिनों के अंतर पर तीन अलग-अलग हवाई हमलों में घायल हुई।


Khalistan पर जनमत संग्रह फेल, कनाडा के पीएम ट्रूडो की सिख वोट बैंक की राजनीति को फिर झटका, नए नक्शे में दिल्ली भी

कनाडा के पीएम ट्रूडो की सिख वोट बैंक की राजनीति को फिर एक बार करारा झटका लगा है। कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में लंबे समय से प्रतीक्षित भारत विरोधी जनमत संग्रह को आधिकारिक तौर पर विफल घोषित कर दिया गया है। जनमत संग्रह के लंबे-चौड़े दावों के बावजूद इसमें मुठ्ठीभर लोग ही जमा हो पाए। जनमत संग्रह का आयोजित करने वाले भारत में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन एसएफजे ने भारत की राजधानी दिल्ली को खालिस्तान के हिस्से के रूप में शामिल करते हुए एक नया विवादित नक्शा भी जारी किया। खालिस्तानी आतंकवादी पन्नू ने वाशिंगटन डी.सी. में कहा, “यह पंजाब और भारत के बीच एक युद्ध है जिसमें कब्ज़ा करने वाली सेना हिंसा का उपयोग कर रही है, जबकि सिख वोटों का उपयोग कर रहे हैं।”

हरदीप निज्जर को जहां गोली मारी, उसी गुरुद्वारे में किया गया जनमत
कनाडा के जनमत संग्रह के बारे में सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक यह सरे के उसी गुरुद्वारे में पर्याप्त पुलिस तैनाती के बीच आयोजित किया गया था, जहां जून में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने दावा करते हुए आरोप लगाया था कि निज्जर की हत्या में भारत की संलिप्तता की संभावना है। वहीं भारत सरकार ने खालिस्तानी उग्रवादी की मौत के आरोपों का दृढ़ता से खंडन किया, जिसे नई दिल्ली ने पहले ही ‘आतंकवादी’ करार दिया था। भारत ने कनाडा से अपने उन दावों के लिए सबूत पेश करने के लिए भी कहा। ऐसा न होने पर राजनयिक को निष्कासित कर दिया था।

जनमत संग्रह में दो हजार से भी कम वोटों के चलते फ्लॉप घोषित
खालिस्तान के लिए सरे में हुए मतदान में 2000 से भी कम लोगों ने शिरकत की। स्थानीय स्रोतों से प्राप्त रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इस बार पिछले जनमत संग्रह में भाग लेने वाले लोगों का केवल वही समूह सामने आया, जिसमें मुख्य रूप से छात्र प्रतिभागी शामिल थे। इस बार जनमत संग्रह में कोई नया समूह शामिल नहीं हुआ। जनमत संग्रह प्रक्रिया में नई भागीदारी में कमी के चलते इसे फ्लॉप करार दिया गया।इसी साल 10 सितंबर को हुए पिछले जनमत संग्रह में एक लाख से अधिक वोटों का दावा किया गया था, लेकिन वास्तविकता में मतदान महज 2398 वोट था।

देशविरोधी गतिविधियों रोकने के लिए भारत लगातार बना रहा है कनाडा पर दबाव
सरे में निराशाजनक प्रतिक्रिया मिलने के बाद अगले साल एबॉट्सफ़ोर्ड, एडमॉन्टन, कैलगरी और मॉन्ट्रियल में जनमत संग्रह आयोजित करने की चर्चा हो रही है। वहीं कभी-कभी ‘सिख फॉर जस्टिस’ जैसे अलगाववादी संगठन इन अनौपचारिक ‘खालिस्तान जनमत संग्रह’ का आयोजन करते हैं। दूसरी ओर, भारत इस मामले में लंबे समय से कनाडाई सरकार पर दबाव बना रहा है और उनसे अपने देश में स्थित व्यक्तियों और समूहों द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने का आह्वान किया है, जिन्हें भारतीय कानून के तहत आतंकवादी घोषित किया गया है।

कनाडा में उच्चायुक्त की गिरफ्तारी पर एक लाख डॉलर इनाम देने की घोषणा की
खालिस्तान जनमत संग्रह के दूसरे चरण के समापन पर, कट्टरपंथी सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) समूह ने कनाडा में उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा की गिरफ्तारी पर एक लाख डॉलर इनाम देने की घोषणा की। चरमपंथी समूह वर्मा को सिख अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए जिम्मेदार मानता है। एसएफजे के कानूनी सलाहकार और घोषित आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने आईएएनएस से कहा कि भारत में सिखों के लिए एक अलग मातृभूमि के लिए समर्थन देने के लिए कई लोग सरे के गुरुद्वारे में आए। मतदान के समापन पर सभा द्वारा दो प्रस्ताव पारित किए गए, जिसमें “निज्जर की हत्या की साजिश रचने और निर्देशित करने” के लिए वर्मा की गिरफ्तारी और मुकदमा चलाने की मांग की गई। जनमत संग्रह का आयोजित करने वाले भारत में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन एसएफजे ने भारत की राजधानी दिल्ली को खालिस्तान के हिस्से के रूप में शामिल करते हुए एक नया नक्शा भी जारी किया। पन्‍नू ने वीज़ा रोकने और ओसीआई कार्ड रद्द करने के भारत के हालिया कदमों की भी आलोचना की।

कनाडा में खालिस्तान समर्थकों ने किया पीएम मोदी और तिरंगे का अपमान
जनमत संग्रह का पहला चरण पिछले महीने आयोजित किया गया था, जब प्रधानमंत्री मोदी ने जी 20 नेताओं के शिखर सम्मेलन में अपने समकक्ष जस्टिन ट्रूडो को कनाडा में भारत विरोधी गतिविधियों को जारी रखने के बारे में नई दिल्ली की चिंताओं से अवगत कराया था। लेकिन पहला चरण भी बुरी तरह फ्लॉप रहा तो आयोजकों को 29 अक्तूबर को दूसरे चरण की घोषणा करनी पड़ी। एसएफजे के एक प्रवक्ता ने कहा कि पहले और दूसरे चरण के संयुक्त मतदान में खालिस्तानी समर्थकों ने मतदान किया है। उन्होंने दावा का कि 2024 में कनाडाई शहरों एबॉट्सफ़ोर्ड, एडमॉन्टन, कैलगरी, मॉन्ट्रियल में जनमत संग्रह का आयोजन किया जाएगा। निज्जर की मौत के बाद कनाडा में पोस्टर युद्ध छिड़ गया, जिसमें भारतीय राजनयिकों और प्रतिष्ठानों को धमकी दी गई। कई खालिस्तान समर्थकों ने सितंबर के अंत में कनाडाई शहरों वैंकूवर, ओटावा और टोरंटो में भारतीय राजनयिक मिशनों के बाहर रैली की, भारतीय तिरंगे और पीएम मोदी का अपमान किया।

कनाडा में हिंदुओं को धमकी देते हुए भारत वापस जाने की दी धमकी
ऑनलाइन सामने आए वीडियो की एक श्रृंखला में, उन्होंने कनाडा में हिंदुओं को धमकी देते हुए उन्हें भारत वापस जाने के लिए कहा और पीएम मोदी से इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध से सीखने को कहा, ताकि भारत में भी इसी तरह की “प्रतिक्रिया” न हो। ट्रूडो के आरोपों के बाद भारत और कनाडा के बीच तनाव बढ़ गया, जिसे भारत ने “बेतुका और प्रेरित” बताते हुए खारिज कर दिया। इस साल की शुरुआत से, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में खालिस्तानी जनमत संग्रह का आह्वान कर रहे हैं, हिंदू मंदिरों और भारतीय मिशनों और प्रतिष्ठानों को भारत-विरोधी भित्तिचित्रों के साथ तोड़-फोड़ कर रहे हैं।

खालिस्तान के पहले वायरल हुए नक्शे में राजस्थान के भी 10 जिले
पाकिस्तान के बाद खालिस्तान समर्थकों का गढ़ बन रहे कनाडा में आतंकियों के सरपरस्तों ने खालिस्तान की आग को भड़काने के लिए खालिस्तान का नक्शा वायरल किया है। इस नक्शे में हिंदुस्तान के राज्यों के कई जिले हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान के हिस्से वाला पंजाब इसमें शामिल नहीं है, जबकि वो भारत के हिस्से वाले पंजाब से बड़ा है। इसके अलावा खालिस्तान के इस नक्शे में राजस्थान के भी 10 सरहदी जिलों को शामिल किया गया है। लेकिन गहलोत सरकार ने इस पर चुप्पी साधी हुई है और कोई एक्शन अब तक नहीं लिया है। दूसरी ओर नब्बे के दशक में एक भैरोंसिंह शेखावत की सरकार थी, तब खालिस्तानी आतंकियों ने राजस्थान में कांग्रेस के मंत्री के बेटे का अपहरण कर लिया था। तब शेखावत ने न सिर्फ तत्काल टीम का गठन किया, बल्कि मंत्री के बेटे को अपहृर्ताओं से मुक्त कराया और आतंकी को टीम ने एनकाउंटर में मार गिराया था।

कनाडा में हो रहे भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक प्रदर्शन
केंद्र की मोदी सरकार शुरू से ही आतंकियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए हुए है। केंद्र सरकार ने खालिस्तान समर्थक गुरपतवंत सिंह पन्नु को आतंकी घोषित कर रखा है। वो सिक्ख फॉर जस्टिस (एसएफजे) नामक संगठन कनाडा से चलाता है। पन्नु कनाडा में चल रहे भारत विरोधी प्रदर्शनों में कई बार शामिल हो चुका है। वो कई बार सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड कर भारतीयों और भारत सरकार को धमकियां देता है। दो दिन पहले ही पन्नु ने कनाडा में बसे हिन्दुओं को कनाडा छोड़ जाने की धमकी दी है। पन्नु ने ही खालिस्तान नामक देश भारत से अलग करने की मुहिम चलाई हुई है, जिसमें कनाडा में हजारों लोग जुड़े हुए हैं। उन्होंने खालिस्तान देश का अलग ही नक्शा भी जारी किया है। पन्नु को वहां शरण देने के संबंध में भारत सरकार अपनी आपत्ति कनाडा सरकार को दर्ज करवा चुकी है।

खालिस्तानी आतंकियों की राजस्थान पर बुरी नजर तो नहीं?
खालिस्तान का ऐसा ही एक नक्शा इन दिनों सोशल मीडिया पर फिर से वायरल है। इस नक्शे में राजस्थान के भी 10 जिलों को शामिल किया गया है। हैरान और परेशान करने वाली बात ये है कि इस पर सरकार ने कई एक्शन नहीं लिया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या खालिस्तान को लेकर चल रही गतिविधियों से राजस्थान को भी सतर्क होने की जरूरत नहीं है। क्या कनाडा और खालिस्तानी गतिविधियों के तार राजस्थान से भी जुड़े हैं? क्या 28 साल पहले की तरह एक बार फिर खालिस्तानी आतंकियों की बुरी नजर राजस्थान पर तो नहीं? राजस्थान की बात करें तो नक्शे में पंजाब से सटे श्रीगंगानगर, अनूपगढ़, बीकानेर, जोधपुर, अलवर, खैरथल, भरतपुर, डीग, बूंदी और कोटा को दिखाया गया है। हालांकि हाल ही में बने अनूपगढ़, खैरथल और डीग जिले को अलग से मेंशन नहीं किया गया है। क्योंकि ये नक्शा कुछ पुराना है, तब ये जिले अस्तित्व में ही नहीं आए थे। खास बात ये है कि 2 साल पहले भी ये नक्शा सामने आया था। अब कनाडाई प्रधानमंत्री ट्रूडो के खुलकर खालिस्तानियों के समर्थन में आने के कारण खालिस्तान मूवमेंट बढ़ने के बाद एक बार फिर ये नक्शा चर्चा में है। इस नक्शे में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली सहित उत्तरप्रदेश और राजस्थान के हिस्सों को दिखाया गया है।

खालिस्तानियों ने किया मंत्री पुत्र का अपहरण, भैरोसिंह सरकार ने बचाया था
पंजाब का पड़ोसी राज्य होने से राजस्थान में खालिस्तानी आतंक का खतरा पहले भी बना रहा है। वर्ष 1995 में इंदिरा गांधी के करीबी रह चुके केंद्रीय मंत्री और राजस्थान के दिग्गज नेता रामनिवास मिर्धा के बेटे राजेंद्र मिर्धा को खालिस्तानी आतंकियों ने फरवरी 1995 में किडनैप कर लिया था। उन्होंने राजेंद्र मिर्धा को छोड़ने के बदले जनवरी, 1995 में पकड़े गए खालिस्तान समर्थक भुल्लर को छोड़ने की मांग की थी। राजेन्द्र मिर्धा के अपहरण के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत सरकार ने कई टीमें इस केस के लिए गठित कीं। उनमें से एक इंटेलीजेंस टीम में शामिल रहे अफसर हुकुम सिंह के मुताबिक मिर्धा का अपहरण खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) और अन्य 27-28 संगठनों से जुड़े लोगों ने किया था। जयपुर में हुए पुलिस एनकाउंटर में एक खालिस्तान समर्थक नवनीत सिंह कादिया मारा गया और राजेंद्र मिर्धा को सुरक्षित बचा लिया गया। एनकाउंटर में तीन खालिस्तानी समर्थक दया सिंह लाहौरिया, हरनेक सिंह भप और सुमन सूद भागने में कामयाब हो गए।

खालिस्तानी नक्शे में पाकिस्तानी पंजाब का जिक्र नहीं
खालिस्तान का जो नक्शा दिखाया गया है, उसमें भारतीय पंजाब से सटे हुए पाकिस्तानी पंजाब का जिक्र तक नहीं है। ये हैरान करने वाला इसलिए है कि क्योंकि पाकिस्तानी पंजाब भारतीय पंजाब से भी करीब 30 प्रतिशत बड़ा है। राजस्थान के जो जिले नक्शे में दिखाए गए हैं, खालिस्तानियों का दावा है कि उनमें खालिस्तान मूवमेंट से सहानुभूति रखने वाले कुछ लोग हैं। राजस्थान के श्रीगंगानगर, अनूपगढ़, बीकानेर, फलोदी, बीकानेर व जोधपुर सरहदी इलाके हैं। इनकी सरहद उत्तर में पंजाब और पश्चिम में पाकिस्तान से सटी हुई है। पाकिस्तान से सटी बार्डर पर अक्सर ड्रग्स व हथियारों की तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं। कई बार बीएसएफ ने वहां ड्रोन, प्रशिक्षित कबूतर और बाज जैसे पक्षियों को पकड़ा है जो पाकिस्तान से भारत की तरफ आते हैं।

खालिस्तानी आतंकियों की पनाहगाह बनता जा रहा है कनाडा
कनाडा दरअसल, खालिस्तानियों आतंकियों का गढ़ बनता जा रहा है। गुरपतवंत सिंह पन्नू से लेकर पंजाबी सिंगर सिद्ध मूसेवाला की हत्या का आरोपी गोल्डी बराड़ तक फिलहाल कनाडा में ही पनाह लिए हैं। खासकर गुरपतवंत सिंह पन्नू पिछले दिनों खालिस्तानी गतिविधियों को लेकर खासा चर्चा में रहा है। इसके अलावा गोल्डी बराड़, लखबीर सिंह उर्फ लांडा, चरणजीत सिंह उर्फ रिंकू रंधावा, अर्शदीप सिंह गिल उर्फ अर्श डल्ला, रमनदीप सिंह उर्फ रमन जज, गुरपिंदर सिंह उर्फ बाबा डल्ला और सुखदुल सिंह उर्फ सुखा भी कनाडा में है। कनाडा के राजनेताओं में खालिस्तानियों के प्रति नरम रुख चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। मौजूदा कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे टूडो साल 1984 में कनाडा के पीएम थे और उस वक्त भी उन पर खालिस्तानियों को समर्थन देने का आरोप लगा था और दोनों देशों के संबंध बिगड़े थे।

JNU के प्रोफेसर ने यौन-शोषण किया… लेकिन गैर-ब्राह्मण था, इसलिए चुप रह गई: मीना कंडासामी, कांग्रेस समर्थक

मीना कंडासामी (फोटो साभार: द गार्डियन)
ब्राह्मण विरोधी और कांग्रेस के प्रति निष्ठावान डॉक्टर मीना कंडासामी ने हाल ही में सोशल मीडिया पर स्वीकार किया था कि उन्होंने छेड़छाड़ करने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ इसलिए शिकायत नहीं की, क्योंकि वह गैर-ब्राह्मण था।

कंडासामी ने ट्विटर पर JNU में 25 साल की उम्र में हुई छेड़छाड़ को लेकर अपनी चुप्पी को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “साल 2010 में एक 25 वर्षीय लड़की के रूप में, जो JNU में यूजीसी की विजिटिंग फेलो थी, मैंने उस गैर-ब्राह्मण फैकल्टी (प्रोबेशन पर आए) पर आरोप नहीं लगाया, जिन्होंने मुझसे छेड़छाड़ की थी। हालाँकि, जेएनयू में GSCASH के कड़े नियम थे। मैंने जेएनयू में कई अकादमिक शुभचिंतकों, प्रोफेसरों और दिल्ली के लेखकों को बताया कि क्या हुआ, लेकिन मैंने कोई कार्रवाई नहीं की, क्योंकि मैंने दो चीजों के बारे में सोचा था।”

                                                                                                 स्रोत: ट्विटर

अपने ऊपर हुए यौन हमले के बारे में चुप रहने का एक कारण यह भी है कि उन्हें कथित यौन करने वाली की पत्नी से अपने जीवन का पहला वेतन चेक मिलना था। हालाँकि, उन्होंने अपने साथ छेड़छाड़ के बारे में बात नहीं करने का प्राथमिक कारण छेड़छाड़ करने वाले का गैर-ब्राह्मण होना बताया। उन्हें डर था कि उत्पीड़क के खिलाफ आरोप लगाने के कारण उन्हें ‘ब्राह्मण के हाथों की कठपुतली’ कहा जाएगा।

उन्होंने लिखा, “मैं बहुत युवा थी। कोई भी मुझे उस युवती के रूप में नहीं देखता जो न्याय चाहती है। वे इसे केवल एक ब्राह्मण विभाग प्रमुख (प्रोफेसर जिसने मुझे आमंत्रित किया) द्वारा एक गैर-ब्राह्मण बुद्धिजीवी के खिलाफ मेरा इस्तेमाल करने के रूप में देखेंगे। मुझे एक एजेंट बताया जाएगा। अगर मुझे जेएनयू में किसी दलित या बहुजन ने आमंत्रित किया होता तो मैं अलग तरह से सोचती। मैंने अपनी चुप्पी बनाए रखने का फैसला किया, क्योंकि अपमान के साथ रहना ब्राह्मण के हाथों की कठपुतली कहलाने से बेहतर था।”

जाहिरा तौर पर, ब्राह्मणों के प्रति घृणा ने कंडासामी को इतना परेशान कर दिया था कि उन्होंने छेड़छाड़ करने वाले के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, क्योंकि वह एक गैर-ब्राह्मण था और न्याय दिलाने से ब्राह्मणवाद को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने अपने खिलाफ यौन हमले को दृढ़ता से सहन किया, क्योंकि इसके खिलाफ बोलने से, उनकी विकृत समझ के अनुसार, ब्राह्मणवाद को बल मिलता।

कंडासामी ने अफसोस जताते हुए लिखा, “यह मैं ही हूँ। मैं 2.0 प्रकार के लोगों से अनुरोध करतीं हूँ कि जो भी नाम से आप मुझे बुलाना चाहें बुलाएँ। मैंने पहली बार ब्राह्मणवाद और उसके वर्चस्व की विषाक्तता देखी है। और हाँ, इस खबर के लिए मुझे के लिए खेद है, लेकिन मैं इसके वर्चस्ववादी परियोजना में शामिल होने वाली बच्ची नहीं हूँ।”

संभवत: वह ‘ब्राह्मणवादी वर्चस्व को खत्म करो’ गिरोह के सम्मानित सदस्यों में से एक हैं, जिनकी ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों पर सभी बुराइयों का दोष मढ़ने की आदत है। साल 2020 में कंडासामी ने अपने एक ट्विटर थ्रेड में ‘ब्राह्मणवादी वर्चस्व को नष्ट करने’ की आवश्यकता पर जोर दिया था।

                                                                                                                                  स्रोत: ट्विटर

मीना कंडासामी ने ट्वीट किया था, “कई युवतियाँ आपकी ओर देख रही हैं। उन्हें जाति व्यवस्था को नष्ट करने के लिए कहो। उन्हें बताओ कि आत्मनिर्णय का अर्थ है जाति की अवज्ञा करना। उन्हें ब्राह्मणवादी वर्चस्व को तोड़ने के लिए कहो। मनुस्मृति में आग लगाने के लिए कहो। उन्हें डॉ अम्बेडकर को पढ़ने के लिए कहो। उन्हें विद्रोह करने के लिए कहो।”

मीना कंदासामी के इस ट्वीट से लगता है कि ब्राह्मणवाद शायद समाज को बुरी तरह से प्रभावित करने वाली सभी बुराइयों की जड़ है। शायद इसलिए उन्होंने खुद के साथ हुई छेड़छाड़ से उन्होंने आँखें मूँद लीं, ताकि उन पर ब्राह्मणवाद के एजेंट के रूप में कार्य करने का तोहमत ना लगे।

कश्मीर को बना दिया विवादित क्षेत्र, एनिमेटेड मूवी ‘Injustice’ में भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

एक लम्बे समय से कश्मीर को विवादित बनाने का पाकिस्तान समर्थक देशों का षड़यंत्र चल रहा है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा कश्मीर मुद्दे को UNO ले जाना ही भयंकर भूल थी। जिसका पाकिस्तान आज तक फायदा उठा रहा है। 
डीसी की एनिमेटिड फिल्म ‘इनजस्टिस (Injustice)’ के रिलीज से पहले उसकी एक छोटी सी क्लिप ने इंटरनेट पर बवाल खड़ा कर दिया है। इस क्लिप में सुपरमैन और वंडर वुमेन कश्मीर में हर सैन्य शस्त्र को तोड़ते हुए अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं और सब तहस-नहस करके उसे हथियार मुक्त जोन घोषित किया जा रहा है।

अब कई सोशल मीडिया यूजर्स इस क्लिप को शेयर कर रहे हैं और बता रहे हैं कि कैसे कश्मीर का चित्रण डीसी की इस एनिमेटिड मूवी में हुआ है और कैसे उन्होंने भारत को बुरा दिखाया है।

एक यूजर ने इस क्लिप को शेयर करते हुए बताया कि भारतीय वायु सेना का F/A-18D ‘हॉर्नेट्स’, AIM-9L ‘साइडविंदर’ इन्फ्रारेड (IR) क्लोज कॉम्बैट मिसाइलों (CCMs) से लैस है, जिसे जस्टिस लीग आइकन सुपरमैन नष्ट कर रहा है।

एक यूजर कहता है, “डीसी कॉमिक्स और डीसी कॉमिक्स ऑन फिल्म ने खुद ही बाजार में भारतीय लोगों और उनके प्राइड भारतीय सेना के ख़िलाफ जाकर अपनी छवि बिगाड़ ली है। डीसी एनिमेटिड मूवी इनजस्टिस में कश्मीर को विवादित दिखाया गया है, इसमें सुपरमैन और वंडरवुमेन भारतीय सैन्य शस्त्र को नष्ट कर रहे हैं।”

डीसी की एनिमेटिड फिल्म ‘इनजस्टिस’ एक वीडियो गेम आधारित है, जिसकी रिलीज डेट 19 अक्टूबर है। हालाँकि, इंटरनेट पर यह पहले ही लीक हो गई और सोशल मीडिया यूजर इसकी क्लिप निकाल कर ये बताने लगे कि कैसे इस एनिमेटिड फिल्म में पाकिस्तानी प्रोपगेंडे का प्रसार हुआ है। कैसे कश्मीर को एक विवादित जगह करार दी गई है और कैसे सैन्य शस्त्रों को नष्ट किए जाने के बाद सुपरमैन और वंडरवुमेन उसे हथियार मुक्त जोन घोषित कर गर्व महसूस करते हैं।

जिस भास्कर में स्टाफ मर्जी से ‘सूसू-पॉटी’ नहीं कर सकते, वहाँ ‘पाठकों की मर्जी’ कॉर्पोरेट शब्दों की चाशनी है बस

'पाठकों की मर्जी' के बजाय भास्कर शुद्ध बिजनेस करे, पत्रकारिता के लिए यही काफी होगा
लक्ष्मी प्रसाद पंत। दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संपादक हैं। 22 जुलाई को एक ट्वीट करते हैं। समय होता है दोपहर का 12 बज कर 14 मिनट।

“मैं स्वतंत्र हूं, क्योंकि मैं दैनिक भास्कर हूं….!!!”

आजाद देश में सभी स्वतंत्र हैं। पाँचवीं का बच्चा भी, दैनिक भास्कर भी। अपराध साबित होने तक अपराधी भी। 9वीं-10वीं के नागरिक शास्त्र वाली किताबों की सर्वसामान्य बात राष्ट्रीय संपादक स्तर के आदमी को क्यों लिखनी पड़ी? खुद लक्ष्मी प्रसाद पंत (एलपी पंत) ही बता पाएँगे।

आगे बढ़ते हैं। तारीख वही थी, समय हो गया था दोपहर का 1 बज कर 42 मिनट। एलपी पंत फिर से एक ट्वीट करते हैं। बिना शब्दों वाला ट्वीट। सिर्फ फोटो। जो लिखा था, फोटो में ही लिखा था।

“भास्कर में चलेगी पाठकों की मर्जी” – फोटो में यह नीचे वाला हिस्सा है। सच्चाई यह है कि इस वाक्य में ईमानदारी नहीं है। कैसे? कोई सबूत? सबूत खुद लेखक है। लेखक जिसने दैनिक भास्कर (ऑनलाइन मीडिया) में काम किया है कभी। जब तक काम किया, इसी के सहारे रोजी-रोटी भी चली थी।

भास्कर में पाठक की मर्जी ?

पाठक सुबह अखबार खरीदता है। खोल कर पढ़ता है। पाठक TV देखता है। अपने मन का चैनल बदलता है। पाठक वेबसाइट खोलता है, एक खबर छोड़ दूसरी खबर पर चला जाता है। इसे मर्जी कहते हैं, पाठक की मर्जी। कृपया इसे “भास्कर में पाठक की मर्जी” जैसे चाशनी में डूबे शब्द मत बनाइए। पाठक निरीह है, शब्दों का अफीम देकर उसे मानसिक तौर पर निर्जीव मत बनाइए।

क्यों? क्योंकि सही में भास्कर हो या ‘XYZ टाइम्स’ या ‘ABC तक’… कहीं भी पाठकों की मर्जी नहीं चलती। क्यों नहीं चलती?

क्योंकि… 1.) अस्पताल में डॉक्टर-नर्स तय करते हैं कि पैर में बैंडेज लगाना है या आँख पर। 2.) सीमा पर सेना के अफसर-जवान तय करते हैं कि गोली दागनी है या हथगोला फेंकना है। 3.) संसद में सांसद तय करते हैं कि शाह बानो को क्या चाहिए या उनका खुद का वेतन बढ़े या नहीं… इन तीनों (सिर्फ उदाहरण हैं, तमाम धंधे-बिजनेस-कॉर्पोरेट आप खुद लिख सकते हैं) के जैसे ही किसी मीडिया हाउस में संपादक-संपादक के नीचे वाले-डेस्क वालों से लेकर फील्ड वाले पत्रकार तय करते हैं कि क्या छपेगा, क्या नहीं। फिर ढकोसला क्यों? शब्दों का पहाड़ क्यों?

पत्रकारों की मर्जी 

दिल्ली में दैनिक जागरण (ऑनलाइन) की नौकरी के बाद दैनिक भास्कर (ऑनलाइन ही) पहुँचा। भेजा गया भोपाल क्योंकि भास्कर के दिल्ली ऑफिस में जगह खाली नहीं थी। जाना तो था ही, सो मैं पहुँचा भोपाल। ऑफिस में कुछ नए दोस्त बने, कुछ सोशल मीडिया पर पहले से दोस्त थे, उनसे मुलाकात हुई। शुरुआती 2-4 दिनों (जब आप चुपचाप बैठे होते हैं, सिर्फ मुंडी हिलाते हैं और काम करते हैं) के बाद ऑफिस को भी देखने लगा। संपादकीय बातों से दूर यह कहानी ऑफिस के दर-ओ-दीवार की ही है।

नित्य क्रिया से निवृत होने वाली बात सरकारी स्कूल की किताबों में दूसरी-तीसरी में पढ़ा दी गई थी। जो बात इन किताबों में छूट गई थी, वो भास्कर के भोपाल ऑफिस ने साक्षात दिखा दी। भास्कर ने सिखाया कि सूसू-पॉटी करने के लिए अलग-अलग लोगों (इंसान, एक ही ऑफिस में काम करने वाले इंसान) के लिए अलग-अलग व्यवस्था होनी चाहिए।

मैं तब संपादकीय टीम का एक अदना सा सिपाही था, इसलिए हमारे लिए जो टॉयलेट थे, वो आम थे। मैनेजमेंट (या शायद तब के संपादक भी जाते होंगे, मैंने हालाँकि कभी झाँक कर देखा नहीं) के लोग जिस टॉयलेट में जाते थे, उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था – Executive Toilet… मतलब उनका टॉयलेट खास था।

आम और खास टॉयलेट तक की दीवार को जो संपादक आज तक (कुछ मित्र बताते हैं कि अभी तक है) नहीं गिरा पाए हैं, जो संपादक अपनी संपादकीय टीम के साथी को Executive तक फील नहीं करवा पाते हैं, वो ऑफिस की दीवारों के पार सड़क पर चलते आम पाठकों के लिए इतने भारी-भरकम शब्द कैसे गढ़ लेते हैं?

PS: दैनिक भास्कर समूह पर ज्यादा पैसा कमाने लेकिन टैक्स कम देने का आरोप है। आयकर वालों ने इसे लेकर कई जगह छापे मारे। उसके बाद ‘पत्रकारिता का दमन’, ‘आपातकाल’ जैसे जुमले उछाले गए। मेरी कहानी का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं। बस यह बताने की कोशिश है कि सब कुछ वैसा नहीं, जैसा दैनिक भास्कर बताता है।(साभार)

वैक्सीन पॉलिसी: पी चिदंबरम और राजदीप सरदेसाई ने कोरोना वैक्सीन को लेकर फैलाया था प्रोपेगंडा; चिदंबरम ने वापस लिया बयान

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जहाँ कोरोना वैक्सीन को लेकर भ्रम फैलाया, वहीं ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी अपने पुराने बयान से यू-टर्न लेते हुए केंद्र सरकार के फैसले का श्रेय विपक्षी नेताओं को दे डाला। विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया पर हंगामा करने में देर नहीं मचाई और दावा किया कि वैक्सीन नीति की प्रक्रिया ‘सेंट्रलाइज्ड’ हो, ये उनकी शुरू से माँग थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने भी यही किया।

उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘राष्ट्र के नाम सम्बोधन’ का संदेश यही है कि केंद्र सरकार ने अपनी पिछली गलतियों से सीख ली है और उसने जो दो प्रमुख गलतियाँ की थीं, उसे सुधारने का प्रयास किया है। लेकिन, साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर झाँसा देने का आरोप लगाते ये भी कहा कि उन्होंने अपनी गलतियों के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने दावा किया कि किसी ने भी ऐसा नहीं कहा था कि केंद्र को वैक्सीन की खरीद नहीं करनी चाहिए।

तमिलनाडु के कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अब मोदी कह रहे हैं कि राज्यों ने वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी, इसीलिए उन्हें ये सुविधा दी गई थी। उन्होंने सवाल दागा था कि किस राज्य के किस मुख्यमंत्री ने किस समय वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी या ऐसी माँग की थी? इसके बाद लोगों ने उनके सामने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पत्र पेश किया, जिसमें उन्होंने यही माँग रखी थी।

फिर पी चिदंबरम ने अपने बयान को गलत बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने मुख्यमंत्री ममता का पत्र शेयर किया है, जिसके बाद वो अपने बयान में भूल-सुधार करते हैं। चिदंबरम ने ये बयान ANI को दिया था। दरअसल, फरवरी 24, 2021 के उस पत्र में ममता बनर्जी ने माँग की थी कि राज्य सरकारों को प्राथमिकता के आधार पर राज्यों को बड़ी संख्या में वैक्सीन की खरीद की अनुमति देनी चाहिए।

इस दौरान पी चिदंबरम अपनी ही पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी का वो पत्र भी भूल गए, जो उन्होंने अप्रैल 8, 2021 को लिखा था। राहुल गाँधी ने तब माँग की थी कि वैक्सीन की खरीद में राज्य सरकारों की ज्यादा भूमिका होनी चाहिए। तब उन्होंने ‘सेंट्रलाइज्ड प्रोपेगंडा’ को गलत करार दिया था। खुद पी चिदंबरम ने NDTV को वैक्सीन की प्रक्रिया डिसेंट्रलाइज करने को कहा था। शेखर गुप्ता ने भी एक ट्वीट में लिखा था कि कई राज्यों ने ऐसी माँग की है।

ज्ञात हो कि टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार करने और 1 मई से पहले की व्यवस्था को वापस लाते हुए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब भारत सरकार द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा। दो सप्ताह में केन्द्र और राज्य नए दिशा निर्देशों के मुताबिक जरूरी तैयारियाँ करेंगे। आगामी 21 जून से, भारत सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिकों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन प्रदान करेगी।

वहीं राजदीप सरदेसाई ने राज्यों को वैक्सीन को वैक्सीन की खरीद का अधिकार दिए जाने के समय मनमोहन सिंह को श्रेय देते हुए उनकी तारीफों के पुल बाँधे थे, लेकिन अब वो इस प्रक्रिया के वापस लिए जाने के बाद विपक्षी नेताओं को श्रेय देते नहीं अघा रहे। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने राज्यों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह मान ऐसा किया है। लेकिन, तब राजदीप ने कहा था कि मनमोहन की सलाह पर राज्यों को ये अधिकार मिला है।