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घुसपैठियों को ‘बेचारा’ दिखा BBC ने फैलाया बंगाल में SIR पर प्रोपेगेंडा, 90 लाख नाम हटने पर रोया ‘मुस्लिम प्रताड़ना’ का रोना

एक समय था जब भारतीय BBC द्वारा प्रसारित किसी समाचार पर आंख मीच कर विश्वास करते थे, लेकिन कालचक्र ऐसा घुमा वही BBC बन रहा है (बी)Bhramit (बी)Biased (सी)Campaigner, भारत विरोधी आज इसी BBC का इस्तेमाल कर रहे हैं और हमारा कहलाए जाने वाला राष्ट्रीय मीडिया खामोश रहता है। या यूँ समझा जाए कि "यार जो प्रकाशित/प्रसारित करना है करो हम चुप रहेंगे। तुम भी अपनी रोजी-रोटी कमाओ और हम भी।" यह आम नागरिक से लेकर राजनेताओं के चिंतन का विषय है।             

चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की कि संशोधन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक और मीडिया गुटों ने मुस्लिम-पीड़ित की कहानी को हवा देना शुरू कर दिया।

“Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights” हेडलाइन के साथ इस आर्टिकल में स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने एक तरह का डर का माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने नाम हटाए जाने को राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करते हुए इसे ‘वोटिंग अधिकार छिन जाने’ का मामला बताया, जो राज्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अपने इस एकतरफा लेख में कोलकाता के इस तथाकथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ ने खासतौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाए जाने की एक काल्पनिक कहानी को ज्यादा उभारने की कोशिश की।

इस आर्टिकल में चालाकी से आँकड़े, भौगोलिक संदर्भ, राजनीतिक बयान और सहानुभूति जगाने वाली व्यक्तिगत कहानियों को इस तरह पेश किया गया है कि पाठक खुद ही इन बिंदुओं को जोड़कर एक कथित साजिश का अंदाजा लगाने लगें। मानो बंगाल के मुस्लिमों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश हो रही हो, जो आमतौर पर BJP के खिलाफ वोट करते हैं।

12 अप्रैल 2026 को प्रकाशित BBC के इस आर्टिकल में लिखा गया है, “भारत की बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो काफी हद तक खुली और कुछ हिस्सों में नदी के किनारे-किनारे गुजरती है। इसका एक बड़ा हिस्सा बंगाल से होकर जाता है। यही वजह है कि राज्य में प्रवासन और मतदाता सूची को लेकर होने वाली बहस को एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप दे दिया गया है।”

स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला नहीं लिया, जब उसने सभी ‘विवाद सुलझाए बिना ही इस अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दे दी।’ उन्होंने यह भी लिखा की इस वजह से ‘करीब 27 लाख मतदाताओं का भविष्य अब भी अनिश्चित’ बना हुआ है।

बंगाल SIR में मतदाता हटाना पारदर्शी जाँच या मुस्लिमों का मत छीनने की कोशिश?

दिसंबर 2025 में चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.25 लाख नाम हटाए थे। ये वे लोग थे जो या तो मृत पाए गए, कहीं और शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से अनुपस्थित थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई। फिर 28 फरवरी को अंतिम सूची से करीब 5 लाख और नाम हटाए गए, जिससे कुल मिलाकर हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख के आसपास पहुँच गई।

शुरुआत में 60.06 लाख मतदाताओं को जाँच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहाँ 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख से ज्यादा अयोग्य निकले। मुर्शिदाबाद की सीमा बांग्लादेश से लगती है। यहाँ बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भीड़ जुटाकर हिंसा जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में अयोग्य मतदाताओं का सामने आना इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जा रहा है। मालदा और अन्य सीमावर्ती जिलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।

सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की बढ़ती संख्या जैसे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन जिलों की धार्मिक जनसंख्या संरचना को बदलने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है। हालाँकि, इस पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले गुट यह कहानी गढ़ रहें है कि चुनाव आयोग और BJP मिलकर मुस्लिमों को मनमाने तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित कर रहे हैं।

चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम सामान्य श्रेणियों में आते हैं। जैसे मृतक, लंबे समय से अनुपस्थित, स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके लोग, दिए गए पते पर न मिलने वाले या फर्जी एंट्रीज। मतदाता सूची में इस तरह की गड़बड़ियाँ आम होती हैं और SIR अभियान का मकसद ही इन्हें ठीक करना था। यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि अब तक शामिल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इसी उद्देश्य से चलाई गई। ताकि घोस्ट वोटर, पलायन और पुरानी एंट्रीज जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके।

SIR में चुनाव आयोग ने तय प्रक्रिया का पालन किया, जबकि उसे राज्य की TMC सरकार के दबाव और विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन BBC के आर्टिकल में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि चुनाव आयोग के अधिकारी लगातार दबाव में काम कर रहे थे और मालदा में तो न्यायिक अधिकारियों को अपने काम के दौरान इस्लामी भीड़ की हिंसा तक झेलनी पड़ी। जाहिर है, ये बातें उस ‘मुस्लिम पीड़ित’ वाली कहानी में फिट नहीं बैठतीं, जिसे पेश करने की कोशिश की गई है।

BBC के आर्टिकल में दावा किया गया है, “राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक, जिन 27 लाख मामलों पर स्थिति स्पष्ट नहीं है, उनमें करीब 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर हटाए गए 90 लाख नामों में से 31.1 लाख यानी लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से ज्यादा है।”

हालाँकि, BBC की इस कहानी के उलट सच यह है कि जिन 27 लाख मामलों को ‘अभी तय नहीं’ बताया जा रहा है, या जिन 27,16,393 मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्हें बिना जाँच के बाहर नहीं किया गया। बल्कि हर मामले की न्यायिक समीक्षा हुई। इन नामों को कुछ गड़बड़ियों की वजह से चिन्हित किया गया था और करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने इनकी जाँच की। यह पूरी प्रक्रिया हाई कोर्ट की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुई। कुल 60.06 लाख मामलों में से 32.68 लाख लोगों को योग्य माना गया, जबकि 27.16 लाख को अयोग्य घोषित किया गया।

सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उनके लिए आपत्ति दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। इसके लिए 19 खास ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहा वे अपील कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान कराने की अनुमति जरूर दी है और यह भी कहा कि दूसरे राज्यों में SIR प्रक्रिया ‘सुचारू रूप’ से पूरी हुई, जबकि बंगाल में ‘कानूनी विवादों’ के चलते स्थिति अलग रही। साथ ही, शीर्ष अदालत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि बिना SIR या चुनाव को रोके पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा और तय समय सीमा का ध्यान रखा जाए।

वहीं BBC के आर्टिकल में ‘राजनीतिक दलों’ के आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया, “हटाए गए 90 लाख नामों में से 3.11 लाख यानी करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि राज्य की आबादी में उनकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हैं।”

लेकिन BBC ने इस बात को नजरअंदाज किया कि कुल संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा नाम हिंदुओं के ही हटाए गए, जो करीब 63 प्रतिशत हैं। यहाँ तक कि कुछ हिंदू बहुल इलाकों जैसे पश्चिम बर्धमान और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। इसके बावजूद BBC का आर्टिकल SIR प्रक्रिया को इस तरह पेश करता है मानो यह बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ और किसी ‘मुस्लिम-विरोधी साजिश’ से जुड़ा मामला हो, जिससे राज्य में डर और तनाव का माहौल बन सकता है।

चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी जाँच के बाद की गई है, न कि किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए। मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इसके बावजूद BBC ने कमजोर दलीलों और अस्पष्ट वजहों के सहारे अपनी साजिश वाली कहानी को सही ठहराने की कोशिश की है।

अगर एक पल के लिए मान भी लें कि चुनाव आयोग और BJP ने मिलकर चुनावी सूची को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, तो फिर सवाल उठता है कि खुद को हिंदू समर्थक बताने वाली पार्टी ऐसी प्रक्रिया क्यों होने देंगी, जिसमें हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू हों? और बंगाल में पहली बार जीत हासिल करने की कोशिश कर रही BJP आखिर ऐसा खुद को नुकसान पहुँचाने वाला कदम क्यों उठाएगी?

इसके बावजूद द वायर, न्यूजलॉन्ड्री, द क्विंट और आर्टिकल-14 जैसे प्लैटफॉर्म्स के लिए लिखने वाले स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने आधिकारिक आँकड़ों या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को तवज्जो देने के बजाए कुछ चुनिंदा उदाहरणों और TMC जैसे दलों के सूत्रों पर ज्यादा भरोसा किया। यहाँ तक कि द क्विंट में अपने एक आर्टिकल में उन्होंने बंगाल के SIR अभियान को ‘घोषित किए बिना लागू किया NRC’ तक बता दिया।

वोटर लिस्ट फ्रीज होने के चलते हटाए गए मतदाता बंगाल चुनाव में नहीं कर सकते वोट

जिन मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं, उन्हें सिर्फ इस वजह से दोबारा वोट देने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम हैं। चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, तब तक इसमें नए नाम नहीं जोड़े जा सकते।

इस बात की पुष्टि 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोमल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और जिनकी दोबारा शामिल होने की अर्जी लंबित है, उन्हें आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

यह टिप्पणी कोर्ट ने उस समय की जब 13 लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ कोर्ट से दखल देने की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘समय से पहले’ बताया और उन्हें पहले अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की सलाह दी।

TMC नेता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट से कहा था कि करीब 16 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें चुनाव में वोट देने की इजाजत दी जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “यह बिल्कुल संभव नहीं है। अगर ऐसा किया गया, तो इशसे जुड़े लोगों के वोटिंग अधिकारों को ही रोकना पड़ेगा।”

वहीं जस्टिस बागची ने बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता (कुरैशा यासमीन और अन्य) पहले ही अपील ट्रिब्यूनल के पास जा चुके हैं… ऐसे में हमें लगता है कि उनकी चिंता अभी समय से पहले की है। अगर उनकी माँग मान ली जाती है, तो उसके जरूरी कानूनी परिणाम भी सामने आएँगे।”

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने का आवेदन 9 अप्रैल 2026 या उसके कुछ दिन बाद मंजूर हो जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और वह वोट दे सकेगा। लेकिन कोर्ट ने यह भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के मामले अभी लंबित हैं, उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

BBC आर्टिकल के लेखक की हिंदू-विरोधी, BJP-विरोधी और कभी प्रो-TMC आर्टिकल लिखने की आदत

हालाँकि, स्निधेंदु भट्टाचार्य का बार-बार ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाना हैर करने वाला नहीं है, क्योंकि पहले भी वह हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ लिखे गए आर्टिकल को लेकर चर्चा में रहे हैं।

इतना ही नहीं चुनावों के दौरान उनके TMC के पक्ष में लिखे गए आर्टिकल का भी एक रिकॉर्ड रहा है, जिससे उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठते रहे हैं।

जहाँ तक बंगाल का सवाल है, यह उन राज्यों में शामिल है जहाँ बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के मामले ज्यादा सामने आते हैं। पिछले तीन साल में 2600 से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया है। राज्य के कुल 10 जिले ऐसे हैं जो बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए हैं। जैसे उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। ऐसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ और उससे जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।

सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की जातीय और भाषा की समानता की वजह से आवाजाही को पकड़ना हमेशा मुश्किल रहा है। इसी का फायदा उठाकर कई बांग्लादेशी घुसपैठिए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम बताए जाते हैं, यहाँ स्थानीय पहचान पत्र बनवाने और मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में SIR जैसे अभियान के जरिए उनकी पहचान करना और उन्हें मतदाता सूची से हटाना एक तरीका माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक मीडिया समूह ऐसे लोगों को वोटबैंक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।

पिछले साल भी ऐसा देखा गया था कि जैसे ही नवंबर 2025 में SIR के दूसरे चरण के तहत घर-घर जाकर जाँच की घोषणा हुई, कई अवैध घुसपैठियों में घबराहट फैल गई। कुछ लोगों ने तो यह भी माना कि वे बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में आए थे। इसके बाद अचानक कई लोगों का वहाँ से चले जाना इस बात का संकेत था कि उन्हें पकड़े जाने का डर था।

वहीं, यह भी हैरानी की बात नहीं मानी जा रही कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे पत्रकार को मंच दिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाया। BBC पर पहले भी भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लगते रहे हैं। चाहे 2022 की लीसेस्टर हिंसा हो, 2020 के दिल्ली दंगे या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घटनाों की कवरेज।

हैरानी की बात नहीं है कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे एक पक्षपाती ‘स्वतंत्र पत्रकार’ को मंच दिया, जिन्होंने बंगाल के SIR को लेकर मुस्लिम पीड़ित वाली कहानी पेश की। ब्रिटेन के इस मीडिया संस्थान पर पहले भी कई बार भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लग चुके हैं। चाहे 2022 में लीसेस्टर की हिंसा की कवरेज हो, 2020 के दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग या फिर हिंदू-घृणा वाले पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर जैसे लोगों को नरम छवि में दिखाना। इन सभी मामलों में उस पर सवाल उठे हैं।इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भारत के तेल भंडार को लेकर डर फैलाने वाली खबरें हो या 2024 में बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी नरसंहार को छिपाने का प्रयास करने जैसे उदाहरण हों।

‘उम्माह’ के लिए कुछ भी करेगा ‘इस्लामी’ इकोसिस्टम, इनका दोहरापन; अरफा के लिए US-इजरायल की मार से तबाह हुआ ईरान ‘विश्वगुरु’, वो सुपरपॉवर भी

                अरफा खानम शेरवानी (फोटो साभार: arfakhanum/Instagram/@khanumarfa/X)
अरफा खानम शेरवानी जिन्हें हम सब ‘अरफा’ के नाम से जानते हैं, एक बार फिर अपने दोगले चेहरे का प्रदर्शन कर रही हैं। बुधवार (08 अप्रैल 2026) को ही उन्होंने दो पोस्ट किए। पहले पोस्ट में लिखा कि “ईरान उभर के सामने आया है” और दूसरे में सीधे घोषणा कर दी- “I have no hesitation in saying that after defeating America, Iran is now the ultimate ‘Vishwa Guru’ of the world”। फिर ईरान दूतावास की पोस्ट को कोट करते हुए लिख दिया, “Hello Superpower ”। वाह रे अरफा! विश्वगुरु? सचमुच?

याद दिला दें कि जब भारत के संदर्भ में ‘विश्वगुरु’ शब्द आता है तो इन कॉन्ग्रेसियों और इस्लामी इकोसिस्टम वालों को चिढ़ मच जाती है। जब पीएम मोदी ने जब भारत को विश्वगुरु बनाने की बात की तो इन्हें हँसी आ गई, ट्रोलिंग शुरू हो गई। लेकिन आज अस्थाई संघर्ष-विराम के मौके पर अचानक ईरान को ‘विश्वगुरु’ और ‘सुपरपावर‘ बताने लगी हैं। समझते भी हैं ये लोग कि विश्वगुरु होने का मतलब क्या होता है? या फिर बस उम्माह का झंडा लेकर घूमने का बहाना चाहिए?

अरफा, कल तक तुम अयातोल्ला की ख़िलाफ़त कर रही थीं। महिला अधिकार, मानवाधिकार, फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के नाम पर ईरान की तानाशाही को कोस रही थीं। फिर अचानक अमेरिका के खिलाफ़ ‘इस्लामी उम्माह’ का नारा लगाने लगीं।

और अब? अस्थाई सीजफायर होते ही ईरान को विश्वगुरु साबित करने में जुट गईं। क्यों?

क्योंकि तुम्हारा सहोदर पाकिस्तान वहाँ दलाली करने लगा था। बात अब उम्माह की हो गई है ना?

वर्ना उसी ईरान के मूल निवासियों (पारसियों) को भारत ने अपने घर में पनाह दी है। बिना किसी परेशानी के। वे यहाँ फल-फूल रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, परिवार चला रहे हैं। लेकिन अरफा को समस्या भारत से इस बात की है कि वो तमाम झंझावातों के बीच भी अपने सभी लोगों का ख्याल रख रहा है। उसी ईरान से लोगों को बाहर निकालकर ला रहा है, जिसमें अधिकतर इसके मुस्लिम भाई ही हैं। फिर भी इन नमकहरामों के मन में भारत के प्रति इतनी घृणा बैठी हुई है कि बर्बाद हो चुके ईरान में उन्हें विश्वगुरु दिखने लगा है।

इसे ही कहते हैं दोगलापन। ये खाएँगी भारत का, भारत की हवा-पानी, भारत की आजादी, भारत की मीडिया में छूट, भारत की सिक्योरिटी। लेकिन गाएँगी ईरान का, पाकिस्तान का, लेबनान का, गाजा का… या हर उस जगह का जहाँ इनके उम्माह वाले दिखेंगे। हाँ भाई, क्यों नहीं? क्योंकि ये तो ‘काफिरों’ का देश है ना। तो इनका प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों पर ही रहेगा। चाहे वहाँ लाखों मार दिए जाएँ (अयातोल्लाओं की ओर से) या इनके बंधु पूरी दुनिया को बम-धमाकों में उड़ाते रहें जन्नत के नाम पर।

अभी उसी ईरान से तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें अपने पुलों को बचाने के लिए ईरान महिलाओं और बच्चों की ह्यूमन चेन बना रहा है। महिलाएँ, बच्चे – जिनकी सुरक्षा के नाम पर अरफा पहले चिल्लाती थीं- आज उनको ढाल बनाकर पुल बचा रहे हैं। और अरफा? उन्हें ‘विश्वगुरु’ कह रही हैं। वाह रे दोगलों! कल तक महिला-वाद के नाम पर अयातोल्ला को कोसती थीं, आज वही महिलाएँ ह्यूमन शील्ड बन रही हैं तो मुँह बंद। क्योंकि अब उम्माह का मुद्दा आ गया।

अरफा तुम The Wire की सीनियर एडिटर हो, AMU की एलुम्ना हो। तुम्हारा पूरा इकोसिस्टम कॉन्ग्रेस और इस्लामी लॉबी का है। तुम्हें हमेशा ‘सेकुलरिज्म’ का ढोंग रचाना पड़ता है। लेकिन जब बात अपनी आती है तो असली चेहरा सामने आ जाता है। पाकिस्तान से प्यार, ईरान से प्यार, गाजा से प्यार – लेकिन भारत? भारत तो बस ‘फासीवादी’ है, ‘इस्लामोफोबिक’ है। भारत ने ईरानियों को शरण दी, उनको सुरक्षा दी, लेकिन तुम्हें ये सहन नहीं होता। क्योंकि तुम्हारा दिल कहीं और बसता है। तुम्हें भारत की तरक्की, भारत की मजबूती, भारत की विश्व पटल पर बढ़ती पहचान कभी रास नहीं आई।

देखो अरफा, विश्वगुरु बनने के लिए सिर्फ़ एक युद्ध में अमेरिका से टकराना काफी नहीं होता। विश्वगुरु वो होता है जो अपने नागरिकों की रक्षा करे, महिलाओं को आजादी दे, बच्चों को भविष्य दे, अर्थव्यवस्था को मजबूत करे। ईरान में आज महिलाएँ हिजाब के नाम पर कोड़े खा रही हैं, विरोध करने पर जेल जा रही हैं। लेकिन तुम्हें वो ‘सुपरपावर’ दिख रहा है। क्योंकि तुम्हारा एजेंडा हिंदुस्तान को नीचा दिखाना है। तुम चाहती हो कि भारत हमेशा ‘दूसरे’ देशों के मुकाबले छोटा दिखे।

ये दोगलापन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं, पूरे उस इकोसिस्टम का है जिसमें तुम खड़ी हो। कल अमेरिका दुश्मन था, आज ईरान हीरो बन गया। कल पाकिस्तान ‘पीस’ का दूत था, आज ईरान ‘विश्वगुरु’। कल महिला अधिकार, आज उम्माह। कल सेकुलर, आज इस्लामी ब्रदरहुड। ये चरित्रहीनता है। ये नमकहरामी है।

अरफा, तुम भारत में बैठकर ईरान का गान गा सकती हो। लेकिन हकीकत ये है कि भारत ने तुम्हें वो आजादी दी है जो ईरान में कभी नहीं मिलेगी। तुम बिना हिजाब के घूम सकती हो, बिना डरे बोल सकती हो, बिना जेल गए आलोचना कर सकती हो। लेकिन तुम्हें ये आजादी भी भारत से ही मिली है। फिर भी तुम्हारा दिल ईरान और पाकिस्तान के लिए धड़कता है।

ये ही तो दुख की बात है। भारत तुम्हें खिला-पिला रहा है, लेकिन तुम्हारा प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों के लिए है। बर्बाद ईरान में विश्वगुरु ढूँढ रही हो, जबकि असली विश्वगुरु वो देश है जो तुम्हें शरण दे रहा है। लेकिन तुम्हारा? वाह रे दोगलों… वाह!

छँटनी के डर से जेफ बेजोस से नौकरी की भीख माँगता प्रांशु वर्मा, इंडिया ब्यूरो चीफ, वॉशिंगटन पोस्ट में नौकरी बचाने की शर्त बना ‘भारत विरोध’

                           Washington Post में छटनी; नौकरी बचाने भारत का विरोध करने को तैयार  
वरिष्ठ पत्रकारों का अपने ही संस्थान के मालिक से सार्वजनिक मंच पर नौकरी बचाने की अपील करना मीडिया जगत में एक असामान्य और चौंकाने वाली स्थिति है। यह घटना न सिर्फ संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है बल्कि मीडिया संस्थानों पर मालिकाना प्रभाव की वास्तविकता को भी सामने लाती है। साथ ही, यह उस धारणा को भी चुनौती देती है कि मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करता है।

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा का ऐसा ही एक मामला सामने आया है। अखबार में बड़े पैमाने पर छँटनी की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए सीधे अमेजन के संस्थापक और द वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस से हस्तक्षेप करने की अपील की है।

प्रांशु वर्मा का ट्वीट सिर्फ यह कहने तक सीमित नहीं था कि उन्हें नौकरी पर बने रहने दिया जाए। वह ट्वीट ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने सबके सामने अपना परिचय, अपने काम का ब्योरा और अखबार के प्रति अपनी निष्ठा एक साथ रख दी हो। जेफ बेजोस को टैग करते हुए वर्मा ने कहा कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ भारत के गिने-चुने मीडिया संस्थानों में से है, जो सरकार के दबाव या सेंसरशिप के डर के बिना रिपोर्टिंग करता है।

 एक ही झटके में, उन्होंने खुद को कथित तौर पर तानाशाही मीडिया इकोसिस्टम में एक बहादुर विरोधी के तौर पर पेश कर दिया। साथ ही, अखबार को कथित तौर पर दबाने वाले भारतीय शासन व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले एकमात्र ‘योद्धा’ के तौर पर पेश किया। दरअसल, लंबे वक्त से इस तरह की दुश्मनी विदेशी मीडिया निकालता रहा है। पश्चिमी संरक्षकों का समर्थन पाने के लिए इस तरह की मनगढ़ंत बातें कुछ मीडियाकर्मी लंबे वक्त से करते रहे हैं।

इसके बाद जो सामने आया, उसने लोगों को और हैरान कर दिया। प्रांशु वर्मा ने अपने ट्वीट में अपने ब्यूरो की उन खबरों की गिनती भी कर दी जिन्हें वह चर्चित मानते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर भारतीय अरबपतियों पर की गई वे रिपोर्टें गिनाईं, जिनमें दावा किया गया था कि उनके साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा मोदी सरकार के दौर में कथित भाई-भतीजावाद से जुड़ी खबरें, भारतीय कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने के आरोपों वाले लेख और भारत की घुसपैठ रोकने की कोशिशों को ‘मुसलमानों को बांग्लादेश भेजने का अभियान’ बताने वाली रिपोर्टें भी शामिल थीं।

ब्यूरो चीफ द्वारा भेजे गए हर लेख का एक मकसद साफ था। ना केवल बेजोस के सामने अपनी काबिलियत साबित करना नहीं बल्कि उस ‘ग्लोबल नजरिए’ के साथ वैचारिक जुड़ाव का संकेत देना जिसने वाशिंगटन पोस्ट की विदेशी रिपोर्टिंग को परिभाषित किया है।

वर्मा ने यह साफ कर दिया कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में काम करने और वहाँ टिके रहने का एक तय तरीका है। वहाँ भारत पर रिपोर्टिंग का मतलब सिर्फ घटनाएँ बताना नहीं है बल्कि भारत को कटघरे में खड़ा करना भी है। भारत को एक ऐसे संप्रभु लोकतांत्रिक देश के रूप में नहीं देखा जाता जो जटिल समस्याओं से जूझ रहा हो बल्कि उसे शक की नजर से देखा जाता है। उसकी नीतियों और फैसलों को अक्सर दमन, बहुसंख्यकवाद और नैतिक चूक के फ्रेम में रखकर पेश किया जाता है।

जाली दस्तावेजों, सीमा घुसपैठ और कई मामलों में आपराधिक आरोपों से जुड़े अवैध रोहिंग्याओं के जबरन देश में आने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जाता बल्कि इसे सांप्रदायिक उत्पीड़न अभियान का नाम दिया जाता है। अरबपति उदारीकरण की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्था में कारोबारी नहीं हैं, बल्कि सत्ताधारी भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। कूटनीतिक तनाव भू-राजनीति नहीं बल्कि भारत की कथित नैतिक विफलताओं के कारण उत्पन्न ‘विघटन’ है।

इसीलिए वर्मा की दलील पत्रकारिता के बचाव के लिए नहीं है बल्कि खुद को बनाए रखने की कोशिश है। इसमें साफ पता चलता है कि देखो हम कितना नुकसान करते हैं। देखो हम किस तरह की बातें फैलाते हैं। यकीनन इसे बचाना जरूरी है।

ताजा मामला ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ पर छाए संकट के बारे में बहुत कुछ बताता है। पोस्ट के पुराने मीडिया रिपोर्टर पॉल फारही की रिपोर्ट के मुताबिक, अखबार स्टाफ में भारी कटौती की तैयारी कर रहा है, जिससे 300 लोगों की नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर विदेशी डेस्क और स्पोर्ट्स डेस्क पर पड़ेगा। एडिटर्स ने कथित तौर पर चेतावनी दी है कि न्यूजरूम के आधे से ज्यादा लोगों को छँटनी का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले 2023 में करीब 240 लोगों को नौकरी से हटाया गया था।

ये छँटनी की वजह साफ है। एडवरटाइजिंग रेवेन्यू गिर गया है, सब्सक्रिप्शन रुक गए हैं और ग्लोबल जर्नलिज्म के लिए जो नैतिक दिखावा कभी होता था, वह अब बिलों का भुगतान नहीं कर रहा है। पढ़ने वाले ध्यान नहीं दे रहे हैं, इसलिए नहीं कि जवाबदेह रिपोर्टिंग का स्वागत नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि रिपोर्टिंग के रूप में लगातार ‘नैरेटिव एक्टिविज्म’ ने भरोसा खत्म कर दिया है।

वर्मा की बेजोस से सार्वजनिक अपील एक व्यापक और कुछ हद तक ‘बेशर्मी’ है। ब्यूरो चीफ और सीनियर एडिटर एक अरबपति मालिक से मेहरबानी की अपील करते हैं, साथ ही सत्ता से अपनी स्वतंत्रता का दावा करते हैं। यह एक ऐसी उलझन है जिसे #SaveThePost जैसे हैशटैग से दूर नहीं किया जा सकता।

अजीब बात है कि एक पत्रकार जो भारत सरकार पर प्रेस की आजादी को दबाने का आरोप लगाता है। उसका अपना पेशेवर भविष्य पूरी तरह से एक अमेरिकी उद्योगपति के विवेक पर निर्भर करता है। यह विडंबना ही है कि वर्मा अपने ब्यूरो की भारत के व्यापारिक समूहों पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का बखान करते हुए एक अमेरिकी व्यवसायी से अपनी नौकरी बचाने की गुहार लगा रहे थे।

हालाँकि, प्रॉब्लम यह नहीं है कि बेजोस घाटे में चल रहे डेस्क को फंडिंग देने में हिचकिचा रहे हैं। प्रॉब्लम यह है कि द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे आउटलेट्स इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि नफ़रत से भरी, सोच पर अड़ी रिपोर्टिंग अब एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल नहीं है। इसी सोच की वजह से द वॉशिंगटन पोस्ट के लिए दुनिया भर में मुश्किलें बढ़ रही हैं। ये संस्थान ऐसी हालत में आ गया है कि अब उसे बने रहने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के बारे में सोचना पड़ रहा है।

वर्मा का ट्वीट उनकी नौकरी बचाने के लिए था। अनजाने में ही इसने उस मानसिकता को उजागर कर दिया जिसने अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में से एक को पतन के कगार पर पहुँचा दिया है। यही कारण है कि न्यूजलॉन्ड्री, द वायर आदि जैसे अधिकांश भारतीय मीडिया संस्थान जो द पोस्ट की विचारधारा का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी इसी कारण से चंदा और सदस्यता के लिए लगातार अनुरोध करना पड़ता है।

चाहे वह कोई अमेरिकी प्रतिष्ठित समाचार पत्र हो या उसके भारतीय वैचारिक अनुकरणकर्ता, पाठकों ने उन मीडिया संगठनों से अपना समर्थन वापस लेना शुरू कर दिया है जो छद्म पत्रकारिता को ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता करते हैं।

मोदी और मुसद्दिक: ईरान 1951 और भारत 2024—क्या इनमें कोई समानता है? भारत को ईरान बनाने से बचाने के लिए Deep State और Toolkit की कठपुतली बने विपक्ष, आन्दोलनजीवियों और बिकाऊ मीडिया से सतर्क रहने की जरुरत है

भारत को विश्व गुरु बनाने
में व्यस्त मोदी 
ईरान के कुशल प्रशासक मुसद्दिक
1951 तक खुशहाल रहने वाला ईरान आज अपनी बर्बादी खुद देख रहा है। 
आज ईरान की जो हालत हो रही है, उसका जिम्मेदार इजराइल नहीं बल्कि ईरान के ही बिकाऊ नेता, मीडिया और जनता ही है। इतिहास सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि उससे शिक्षा लेने के लिए होता है। अगर इतिहास से कुछ नहीं सीखा तो चाहे व्यक्ति जितना भी विद्वान क्यों न हो किसी अनपढ़ से कम नहीं।  

आज भारत को ऐसा यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिला है जो भारत को आत्मनिर्भर बना रहा है, लेकिन गुलामी मानसिकता वाले विरोध करने का कोई मौका नहीं झोड़ रहे। दुःख इस बात का है जिन मुद्दों पर विरोध करना चाहिए उन सभी पर आज तक किसी का मुंह नहीं खुलता। आज भारतवासी बताएं जिन लोगों के कारण गुलामी की बेड़ियाँ टूटी उनमे से कितनों इतिहास पढ़ाया जाता है। जो धार्मिक स्थलों को विवादित बना दे उससे उम्मीद की भी नहीं जा सकती।  

भारत जब भी गुलाम हुआ जयचन्दों और मीर ज़ाफरों द्वारा गद्दारी करने के कारण हुआ। भारत का अस्तित्व तो मिटाने में असफल रहे, लेकिन गुलाम बनाने में सफल हो गए। भारत में आज लगभग वही स्थिति Deep State और Toolkit के हाथों कठपुतली बना विपक्ष, मीडिया और आन्दोलनजीवियों द्वारा हो रही है। मुग़ल आक्रांताओं से पहले खुशहाल भारत को जयचन्दों लालच ने बदहाल कर दिया। लेकिन उनका आज कोई नामलेवा नहीं।

देखिए एक मित्र द्वारा भेजा गया लेख, मुझे नहीं मालूम कहाँ से इसे निकाला लेकिन इस लेख पर हर देशवासी को आत्ममंथन करना चाहिए:-

क्या आपने कभी सोचा है कि ईरानी लोग अमेरिका को "शैतानों की भूमि" क्यों कहते हैं?

कभी ईरान के तेल पर ब्रिटेन का वर्चस्व था। ईरान के तेल उत्पादन का 84% हिस्सा इंग्लैंड को जाता था, और केवल 16% ही ईरान को मिलता था।

1951 में, एक सच्चे देशभक्त मोहम्मद मुसद्दिक ईरान के प्रधानमंत्री बने। वे नहीं चाहते थे कि ईरान की तेल संपदा पर विदेशी कंपनियों का कब्जा रहे।

15 मार्च 1951 को मुसद्दिक ने ईरानी संसद में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का विधेयक पेश किया, जो भारी बहुमत से पारित हुआ। टाइम मैगज़ीन ने उन्हें 1951 का "मैन ऑफ द ईयर" घोषित किया!

लेकिन इस फैसले से ब्रिटेन को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने मुसद्दिक को हटाने के कई प्रयास किए — रिश्वत, हत्या की कोशिश, सैन्य तख्तापलट — पर मुसद्दिक की दूरदर्शिता और लोकप्रियता के कारण सब विफल रहे।

जब ब्रिटेन असफल हुआ, तो उसने अमेरिका से मदद मांगी। CIA ने मुसद्दिक को हटाने के लिए 1 मिलियन डॉलर (लगभग 4,250 मिलियन रियाल) स्वीकृत किए।

योजना थी: जनता में असंतोष फैलाना, मीडिया और धार्मिक नेताओं को खरीदना, और अंततः संसद के भ्रष्ट सांसदों के माध्यम से उनकी सरकार को गिराना।

631 मिलियन रियाल पत्रकारों, संपादकों और मौलवियों को दिए गए ताकि वे मुसद्दिक के खिलाफ माहौल बना सकें।

हजारों लोगों को फर्जी प्रदर्शन के लिए भुगतान किया गया। प्रमुख वैश्विक मीडिया भी अमेरिका का समर्थन करने लगा। व्यक्तिगत कार्टूनों से शुरू हुई आलोचना, बिल्कुल वैसी ही जैसे आज भारत में मोदी के निजी जीवन पर हमले होते हैं।

मुसद्दिक को तानाशाह कहा गया। जब उन्हें अहसास हुआ कि संसद के जरिए उनकी सरकार को गिराया जाएगा, तो उन्होंने संसद भंग कर दी। अमेरिका ने ईरान के शाह पर दबाव बनाया कि वे मुसद्दिक को प्रधानमंत्री पद से हटाएं।

210 मिलियन रियाल की रिश्वत से फर्जी दंगे करवाए गए, और शाह की वापसी के बाद मुसद्दिक ने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें जेल में डाला गया और फिर जीवन भर नजरबंद रखा गया।

इसके बाद ईरान के तेल का 40% अमेरिका और 40% इंग्लैंड को दे दिया गया, बाकी 20% अन्य यूरोपीय देशों को।

फिर कट्टरपंथी खुमैनी सत्ता में आए, और आम ईरानी की हालत और खराब हो गई।

मुसद्दिक का अपराध क्या था?

सिर्फ इतना कि वे चाहते थे कि विदेशी नहीं, बल्कि देश की अपनी कंपनियां तेल और अन्य संसाधनों पर नियंत्रण रखें। अगर मुसद्दिक का साथ दिया गया होता, तो 1955 से पहले ही ईरान एक संपूर्ण लोकतांत्रिक राष्ट्र बन सकता था। लेकिन पत्रकारों, संपादकों, सांसदों और प्रदर्शनकारियों ने चंद पैसों में देश का भविष्य बेच दिया।

उसी समय ईरान की जनता ने महसूस किया कि अमेरिका ने उनकी सरकार को गिराने में गहरी भूमिका निभाई थी — और तभी से अमेरिका को "शैतानों की भूमि" कहा जाने लगा।

अब सोचिए — ईरान के असली दुश्मन कौन थे?

वे थे — बिके हुए पत्रकार, संपादक, सांसद और आंदोलनकारी। अगर ये बिकते नहीं, और लोग मुसद्दिक के साथ खड़े रहते तो अमेरिका की चालें कभी सफल नहीं होतीं।

आज भारत भी एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है।

यह दुर्भाग्य है कि आम जनता को षड्यंत्र तब तक समझ में नहीं आते जब तक उनके साथ अत्याचार नहीं होने लगते। नकली मुद्दे, फर्जी आंदोलन, गलत आंकड़े, जातियों को आपस में लड़वाना, अल्पसंख्यकों को भड़काना, और कम्युनिस्ट लॉबी का राष्ट्र विरोधी ताकतों को समर्थन देना ये सब एक गहरी साजिश का हिस्सा हैं, जिसका मकसद भारत को फिर से विदेशी नियंत्रण में लाना है।

अब समय है कि हम सजग बनें और बिकाऊ मीडिया के झूठे प्रचार का शिकार न बनें।

हर देशभक्त को वर्तमान नेतृत्व पर विश्वास करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। अन्यथा, ईरान जैसी तबाही भारत में भी हो सकती है।

आज दुनिया की कई खुफिया एजेंसियाँ भारतीय राजनेताओं को अपने एजेंट बनाने की कोशिश कर रही हैं, ताकि किसी भी तरह मोदी सरकार को हटाया जा सके।

हमारा भाग्य हमारे हाथ में है बस समय रहते समझना होगा।

"न्यूयॉर्क टाइम्स" ने मुसद्दिक को तानाशाह कहा था। आज वही "टाइम मैगज़ीन" मोदी को "डिवाइडर इन चीफ" कहती है।

क्या ये सब संयोग है? नहीं, ये एक रणनीति है। 

पहलगाम के इस्लामी आतंकियों को ‘मिलिटेंट्स’ बता रहा था New York Times, अमेरिकी संसद की कमेटी ने रगड़ा: ‘बंदूकधारी-चरमपंथी’ की खाल में पहचान छिपा रहा विदेशी मीडिया

      पहलगाम हमला पर NYT रिपोर्ट को अमेरिकी संसद की कमेटी ने ही रगड़ दिया (फोटो साभार: AI Grok/NYT)
जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हिंदुओं को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले पर वैश्विक मीडिया की कवरेज ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बीच, अमेरिकी संसद की हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के बहुमत पक्ष (House Foreign Affairs Committee Majority) ने New York Times को आड़े हाथों लिया है। कमेटी ने ट्वीट करके कहा कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहलगाम में हुए हमले को आतंकी हमला कहने के बजाय ‘मिलिटेंट्स’ यानी उग्रवादियों द्वारा हमला बताया, जो पूरी तरह गलत है।

House Foreign Affairs Committee Majority ने साफ कहा कि चाहे भारत हो या इजरायल, आतंकवाद को लेकर New York Times हकीकत से कोसों दूर है। कमेटी ने New York Times की हेडलाइन को ठीक करते हुए लिखा, “यह साफ-साफ आतंकी हमला था।”

पहलगाम में आतंकियों ने 28 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी, जिसमें से अधिकतर पर्यटक थे। पीड़ितों ने बताया कि हमलावरों ने पुरुषों की पैंट खोलकर यह चेक किया कि उनका खतना हुआ है या नहीं। जिनका खतना नहीं हुआ, उन्हें हिंदू समझकर गोली मार दी गई। आईडी कार्ड चेक किए गए और पूछा गया कि ‘मुस्लिम हो?’

इस हमले में 28 लोग मारे गए, जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में 24 लोगों के मारे जाने की बात कही। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हमले को क्षेत्र में नागरिकों पर सालों में सबसे खराब हमला बताते हुए इसे ‘आतंकी हमला’ करार दिया और दोषियों को सजा दिलाने का वादा किया।

लेकिन इस घटना को वैश्विक मीडिया ने जिस तरह से पेश किया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। ऑपइंडिया पहले ही अपनी रिपोर्ट में बता चुका है कि किस तरह से अल जजीरा, बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और पाकिस्तानी मीडिया डॉन जैसे बड़े संस्थानों ने आतंकियों को आतंकी कहने से परहेज किया। अल जजीरा ने आतंकियों को ‘सशस्त्र व्यक्ति’ और ‘बंदूकधारी’ कहा। उसने “आतंकी हमला” शब्द को डबल कोट में लिखा, जैसे कि उसे इस शब्द पर भरोसा ही न हो।

पाकिस्तानी मीडिया डॉन ने भी आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ लिखा और जम्मू कश्मीर को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ कहकर भारत का हिस्सा मानने से इनकार किया। डॉन ने पहलगाम को ‘मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र’ करार दिया और हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन ‘कश्मीर रेजिस्टेंस’ को ‘लिटिल नोन ग्रुप’ कहकर छोटा दिखाने की कोशिश की।

वाशिंगटन पोस्ट ने भी आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ कहा और लिखा कि हमला ‘बिना किसी भेदभाव’ के किया गया, जबकि पीड़ितों ने साफ बताया कि हमला धर्म के आधार पर किया गया। वाशिंगटन पोस्ट ने यह भी लिखा कि भारत सरकार ने मुस्लिम बहुल इलाकों में असहमति को दबाने के लिए सख्त कार्रवाई की, जो इस हमले से ध्यान हटाने की कोशिश लगती है।

 बीबीसी ने भी जम्मू कश्मीर को ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ लिखा और आतंकवाद को ‘अलगाववादी विद्रोह’ कहकर हल्का करने की कोशिश की। बीबीसी ने यह भी दावा किया कि जम्मू कश्मीर में 5 लाख भारतीय सैनिक तैनात हैं, जो अतिशयोक्ति लगता है। बीबीसी ने आतंकियों को ‘चरमपंथी’ और ‘बंदूकधारी’ कहकर संबोधित किया। जर्मन मीडिया डीडब्ल्यू ने भी ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ और ‘बंदूकधारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।

यह पहली बार नहीं है जब वैश्विक मीडिया ने आतंकवाद को हल्का दिखाने की कोशिश की हो। भारत में आतंकवाद को लेकर पहले भी कई बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो आतंकियों का बचाव करते नजर आते हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान आतंकवाद को सही तरीके से पेश करने से पीछे हटते हैं और सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रखकर काम करते हैं।

जिस भारत की खाते हैं उसी से जंग की बात कर गए राहुल गाँधी, फिर भी क्लीनचिट दे रहा था ‘द लल्लनटॉप’; क्या राहुल को विपक्षी नेता बने रहने का अधिकार है? आखिर किस भारत विरोधी देश के लिए कांग्रेस राष्ट्र से लड़ाई लड़ रही है?

सौरभ द्विवेदी, राहुल गाँधी (फोटो साभार : Kalinga Literature Festival / ANI)
मोदी-योगी विरोध में राहुल गाँधी और समूचा विपक्ष समझबूझ भूल ऊलजलूल बोल रहे हैं। लोक सभा में विपक्ष नेता राहुल गाँधी ने कांग्रेस कार्यालय उदघाटन के अवसर पर राष्ट्र से लड़ाई लड़ने पर समूचा विपक्ष क्यों चुप है? अगर यही बात बीजेपी के किसी नेता ने बोल दी होती, इसी विपक्ष ने देश में कोहराम मचा दिया होता, लेकिन राहुल द्वारा राष्ट्र से लड़ाई पर चुप्पी साधे रखना साबित करता है कि किसी को देश नहीं अपनी तिजोरी और कुर्सी की चिंता है। अगर विपक्ष इस घोर आपत्तिजनक बयान पर कांग्रेस के साथ खड़ी रहती है कांग्रेस के साथ-साथ इनका भी बहुत जल्दी पाताललोक में जाना तय है। आखिर किस भारत विरोधी देश के लिए कांग्रेस राष्ट्र से लड़ाई लड़ रही है? देश में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी आदि मुद्दों पर लड़ाई लड़ना अलग बात है लेकिन राष्ट्र से लड़ाई किसके लिए? 

द लल्लनटॉप के संपादक ‘पत्रकार’ सौरभ द्विवेदी ने 18 जनवरी को कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विवादित बयान का बचाव करने की कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास उल्टा पड़ गया। दरअसल, राहुल गाँधी ने हाल ही में भारतीय राज्य (Indian State) के खिलाफ अपनी लड़ाई की बात कही थी, जिस पर विवाद हो गया था। इस मामले में लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने बीजेपी को ही घेरने की कोशिश की और राहुल गाँधी के बयान का बचाव किया। ये अलग बात है कि शो में मौजूद राजनीतिक विश्लेषक रजत सेठी ने उन्हें आईना दिखाने में देरी नहीं की, जिसके बाद सौरभ द्विवेदी अपने दावे से पीछे हटते नजर आए।

राहुल गाँधी के बयान और बीजेपी के हमलों के बीच सौरभ द्विवेदी ने 18 जनवरी को अपने शो ‘नेता नगरी’ में राजनीतिक विश्लेषक रजत सेठी के साथ बातचीत के दौरान राहुल गाँधी का बचाव किया। सौरभ ने कहा, “जेपी नड्डा कह रहे हैं कि राहुल गाँधी ने भारत के खिलाफ लड़ाई की बात की है। जबकि राहुल गाँधी ने अपने भाषण में भारतीय सरकार (Indian Government) के खिलाफ लड़ाई का जिक्र किया था। भाजपा उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है।” सौरभ ने दावा किया कि राहुल गाँधी ने ‘बीजेपी, आरएसएस और भारतीय सरकार के खिलाफ’ लड़ाई की बात कही।

हालाँकि, रजत सेठी ने सौरभ द्विवेदी की इस बात को तुरंत गलत ठहराया। उन्होंने कहा, “सौरभ जी, राहुल गाँधी ने भारतीय सरकार नहीं, बल्कि भारतीय राज्य (Indian State) का जिक्र किया था। उन्होंने यह बयान अंग्रेजी में दिया था और उनके शब्द साफ-साफ थे।”

रजत सेठी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “भारतीय राज्य का मतलब भारतीय संविधान, उसकी संस्थाएँ और उसकी संरचना से है। राहुल गाँधी ने जो कहा, वह एक बड़ी चूक हो सकती है, लेकिन इसके निहितार्थ गंभीर हैं। अगर कोई भारतीय राज्य के खिलाफ बोलता है, तो यह देशद्रोह के दायरे में आता है। राहुल गाँधी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि उनकी लड़ाई और युद्ध भारतीय राज्य के खिलाफ है। वो कोई आम आदमी नहीं, बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं।”

सौरभ द्विवेदी ने आखिरकार रजत सेठी की बात मानते हुए कहा, “हाँ, राहुल गाँधी ने अपने बयान में भारतीय सरकार नहीं, बल्कि भारतीय राज्य कहा था। यह मेरे द्वारा दी गई जानकारी में गलती थी।”

14 जनवरी को नई दिल्ली में कांग्रेस के नए हेडक्वार्टर के उद्घाटन के अवसर पर राहुल गाँधी ने अपने संबोधन में कहा, “यह मत सोचिए कि हम एक निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। अगर आप यह मानते हैं कि हम भाजपा और आरएसएस जैसे एक राजनीतिक संगठन से लड़ाई लड़ रहे हैं, तो यह सही नहीं है। उन्होंने देश की लगभग हर संस्था पर कब्जा कर लिया है। अब हम सिर्फ भाजपा और आरएसएस से नहीं, बल्कि भारतीय राज्य (Indian State) से लड़ रहे हैं।”

राहुल गाँधी के इस बयान पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “राहुल गाँधी खुलकर देश के खिलाफ बोल रहे हैं। यह कांग्रेस की मानसिकता को दिखाता है, जो देश के खिलाफ षड्यंत्र कर रही है।”

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, “राहुल गाँधी का यह बयान देश के खिलाफ है। भारतीय राज्य का मतलब संविधान और उसकी संरचनाओं से है। ऐसे में राहुल गाँधी का यह बयान संविधान का अपमान है। कांग्रेस को इस पर तुरंत सफाई देनी चाहिए।”

बहरहाल, राहुल गाँधी के ‘भारतीय राज्य से लड़ाई’ वाले बयान ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। भाजपा इसे देशविरोधी बयान करार दे रही है, जबकि कांग्रेस इसे भाजपा और आरएसएस के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा बता रही है। इस विवाद में सौरभ द्विवेदी का राहुल गाँधी का बचाव करना और फिर अपनी गलती मानना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि इस बयान का आगामी चुनावों में कांग्रेसऔर राहुल गाँधी पर क्या असर पड़ता है।

सम्मान देकर बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा का जश्न मना रहा है ‘द इकॉनॉमिस्ट’, दिया ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड: पश्चिमी मीडिया की ‘नैतिकता’ की फिर खुली पोल

                                    द इकॉनॉमिस्ट (फोटो साभार : आईएएनएस/द इकोनॉमिस्ट)
हर साल दिसंबर महीने में यूरोपीय मैगज़ीन द इकॉनॉमिस्ट अपने प्रतिष्ठित ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड की घोषणा करती है। यह पुरस्कार किसी देश की समृद्धि या खुशहाली को नहीं, बल्कि उस देश द्वारा किए गए महत्वपूर्ण सुधारों को आधार बनाकर दिया जाता है। ऐसा दावा खुद ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ही करता है।

इस साल बांग्लादेश को यह सम्मान मिला है। द इकॉनॉमिस्ट ने कहा कि बांग्लादेश ने कथित ‘तानाशाही शासन’ को समाप्त करके यह अवॉर्ड प्राप्त किया। हालाँकि, इस दौरान मैगज़ीन ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रही हिंसा और उत्पीड़न को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

द इकॉनॉमिस्ट के अनुसार, ये अवॉर्ड उन देशों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले साल में महत्वपूर्ण प्रगति की हो। मैगज़ीन ने बताया कि बांग्लादेश ने शेख हसीना की सरकार को हटाकर ‘तकनीकी अंतरिम सरकार’ स्थापित की है, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं। इसके अलावा छात्र आंदोलनों की भी सराहना की गई, जिन्होंने शेख हसीना की सत्ता को समाप्त किया।

मैगज़ीन ने यह भी दावा किया कि शेख हसीना के हटने के बाद देश में ‘व्यवस्था बहाल’ हुई है और ‘आर्थिक स्थिरता’ आई है। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है? हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से 50,000 टन चावल की माँग की है और अडानी ग्रुप के बिजली बिल का बड़ा हिस्सा बकाया है। इसके अलावा बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि द इकॉनॉमिस्ट किस आर्थिक स्थिरता की बात कर रहा है।

लेकिन सबसे चिंता का विषय यह है कि द इकॉनॉमिस्ट ने बांग्लादेश में बढ़ती हिंदू विरोधी हिंसा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। शेख हसीना की सरकार के गिरने के महज तीन दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, व्यवसायों और घरों पर 205 से अधिक हमले हुए। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है और अगस्त 2024 से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर विस्तार से रिपोर्ट दी है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का एक प्रमुख उदाहरण चिटगाँव में भगवान गणेश की मूर्तियों के साथ की गई तोड़फोड़ है। इसी तरह पबना और किशोरगंज जिलों में दुर्गा की मूर्तियों को नष्ट किया गया। ये घटनाएँ बांग्लादेश में धार्मिक असहिष्णुता के बढ़ते स्तर को दर्शाती हैं, लेकिन द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

अब सवाल यह उठता है, क्या कोई देश सच में ‘सुधार’ कर सकता है, जबकि उसके अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा और दमन बढ़ रहा हो? भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या पिछले तीन सालों में तेजी से बढ़ी है। 2022 में हिंदुओं पर 47 हमले दर्ज हुए थे, 2023 में यह संख्या 302 हो गई, जो 2022 के मुकाबले 545% अधिक थी। वहीं, 2024 में यह संख्या 2,200 तक पहुँच गई, जो 2023 से 628% और 2022 के मुकाबले 4,580% अधिक थी। इन आँकड़ों के बावजूद द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं पर चुप्पी साध रखी है, जिससे उनकी ‘प्रगति’ की परिभाषा पर गंभीर सवाल उठते हैं।

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा करना एक व्यापक समस्या का हिस्सा है, जो उपमहाद्वीप में हिंदू समुदाय के हाशिए पर जाने और उनके उत्पीड़न को दर्शाता है। हाल के महीनों में बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। इन समूहों ने हिंदुओं और उनके संगठनों को परेशान करने के लिए ईशनिंदा के आरोपों का सहारा लिया है। हृदय पाल और उस्ताद मंडल के मामले इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।
यहाँ तक कि इस्कॉन जैसे हिंदू संगठन भी इस अत्याचार से बच नहीं सके। इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश और हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी, हिंदू संस्थानों को निशाना बनाने की सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है। अंतरिम सरकार द्वारा हिंदू विरोध प्रदर्शनों को दबाने और उन पर देशद्रोह जैसे झूठे आरोप लगाने के फैसले से यह साफ होता है कि उनकी स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए एक साजिश चल रही है।

द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू-विरोधी पक्षपात पुराना

सालों से द इकॉनॉमिस्ट ने यह साबित किया है कि उसका हिंदुओं, हिंदुत्व और भारतीय सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्पष्ट झुकाव है। यह पक्षपात लगातार हिंदू राष्ट्रवाद को ‘चरमपंथी’ आंदोलन के रूप में पेश करने के प्रयासों में दिखता है, जबकि इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को अनदेखा किया गया है।
हमारे शोध के दौरान यह पाया गया कि द इकॉनॉमिस्ट की रिपोर्टिंग में एक बार-बार दोहराया जाने वाला विषय है, जिसमें हिंदुत्व को एक रूढ़िवादी और वर्चस्ववादी विचारधारा के रूप में दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, अपने एक लेख ‘What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?’ में इस मैगजीन ने हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने वाले हथियार के तौर में पेश किया।
इसके साथ ही द इकॉनॉमिस्ट भारत की नीतियों और घटनाओं के संदर्भ को तोड़-मरोड़कर पेश करने या पूरी तरह अनदेखा करने का प्रयास करता है। उदाहरण के तौर पर, उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण कानून बताया, जबकि इसके मूल उद्देश्य को नजरअंदाज कर दिया।
नरेंद्र मोदी को भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया गया था 
प्रधानमंत्री मोदी के शासन की कवरेज भी द इकॉनॉमिस्ट के इस पक्षपाती दृष्टिकोण को दिखाती है। उदाहरण के लिए, “How Narendra Modi is remaking India into a Hindu state” जैसे लेखों में पत्रिका ने सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जबकि सरकार द्वारा चलाए जा रहे कई कल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया।

पश्चिमी देशों का सेलेक्टिव अप्रोच

पश्चिमी देशों की चयनात्मक नैतिकता इस समस्या को और बढ़ाती है। बढ़ते सबूतों के बावजूद वैश्विक संस्थाएँ और मीडिया हाउस इन अत्याचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने इन नफरत से भरे अपराधों को दस्तावेज़ करने से परहेज किया है। हमारी एक रिपोर्ट के अनुसार, OHCHR ने इन हमलों को धार्मिक घृणा अपराध मानने से इनकार कर दिया है, जो हिंसा को नजरअंदाज करने की सोची-समझी कोशिश को दर्शाता है। इसके बजाय, वे व्यापक सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इन घटनाओं के धार्मिक पहलुओं को छिपा देते हैं।
भारतीय मीडिया पोर्टल द वायर ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को छिपाने या कमकर दिखाने का प्रयास किया है। हाल ही में एक खुलासे में यह पाया गया कि द वायर ने जातीय सफाए को ‘अतिरंजित’ या ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताने की कोशिश की है, जिससे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों की जिम्मेदारी को कम किया गया। ऐसी रिपोर्टिंग न केवल पाठकों को गुमराह करती है, बल्कि यह उन खतरनाक विचारों को बढ़ावा देती है, जो हिंदू अल्पसंख्यकों के दर्द और पीड़ा को कमतर आँकते हैं।
बीबीसी ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा की रिपोर्टिंग के लिए आलोचना का सामना किया है। ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे बीबीसी ने हिंदुओं के खिलाफ टारगेटेड हिंसा और हमलों को ‘राजनीतिक हिंसा’ के तौर पर पेश किया और धार्मिक मामले को नजरअंदाज किया। बीबीसी ने इसे व्यापक राजनीतिक अशांति से जोड़ते हुए इस बात को छिपा दिया कि यह हिंसा सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हो रही है। इससे न केवल हिंदुओं के खिलाफ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न को अनदेखा किया गया, बल्कि अंतरिम सरकार और अपराधियों की जिम्मेदारी को भी कम कर दिया गया।
पश्चिमी मीडिया और संस्थाओं का यह दोहरा रवैया लंबे समय से जारी है। द इकॉनॉमिस्ट, द वायर और बीबीसी जैसे मीडिया पोर्टल्स ने लगातार हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की गंभीरता को कम करके दिखाया है। वे इन घटनाओं को अक्सर ‘राजनीतिक’ या ‘आर्थिक अशांति’ के रूप में पेश करते हैं और धार्मिक संदर्भों को नजरअंदाज करते हैं। इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को गलत तरीके से पेश करती है, बल्कि अपराधियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिम्मेदारी से बचने का मौका भी देती है।
वास्तव में द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू विरोधी और पक्षपाती रवैया केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हिंदू विरोधी विचारों को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। इस पत्रिका की रिपोर्टिंग और इसके द्वारा उठाए गए मुद्दे अक्सर इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, जिसमें हिंदुओं के धार्मिक पहचान को निशाना बनाया जाता है और हिंदुओं पर ही चरमपंथ के आरोप लगाए जाते हैं, जोकि सच्चाई से एकदम उलट है।

मनमोहन सिंह के समय ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ = मंत्री बनाने-हटाने वाले + मुफ्त विदेश यात्रा करने वाले एलीट पत्रकारों का इकोसिस्टम जब सरकारों को निर्देश देता था

                                              मनमोहन सिंह  के साथ जहाजों में घूमते पत्रकार 
पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह नहीं रहे। ईश्वर उनकी आत्मा को सद्गति दें। उनके जाने के बाद कमोबेश हर तबका उन्हें अच्छे शब्दों में याद कर रहा है, जो डॉक्टर साहब के सौहार्द्रपूर्ण व्यक्तित्व के लिए उचित भी है। मनमोहन सिंह को याद करने वाले पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्ट किस्म के लोगों के शोक संदेश में एक खास पैटर्न देखने को मिला है।

जैसे कि ‘हमने मनमोहन सिंह को JNU में काले झंडे दिखाए थे, हम उनके साथ विदेश यात्रा पर गए, संसद की कैंटीन या किसी पार्टी में चाय पर मिले, वे रेगुलर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे, हमारे मुश्किल सवाल पर सिंह साहब नाराज नहीं हुए’ वगैरह-वगैरह।

इसका निष्कर्ष यह निकाला जाता है कि मनमोहन सिंह अभिव्यक्ति की आजादी के बहुत बड़े पैरोकार थे, लेकिन क्या यह वाकई अभिव्यक्ति की आजादी थी? या फिर यह बड़े मीडिया संस्थान के गिने-चुने पत्रकारों और राजधानी के खास एक्टिविस्टों को मिलने वाली टोकन छूट थी? 

क्या JNU की जगह पटना यूनिवर्सिटी में बिहार के किसी मंत्री को काले झंडे दिखाकर छात्र बच सकते थे? क्या गाँव का आम आदमी अपने प्रधान या तहसीलदार से मुश्किल सवाल पूछ कर बिना पिटे घर लौट सकता था? सबका जवाब ‘नहीं’ ही है।

मनमोहन को काले झंडे दिखाने वाले गिरफ्तार नहीं हुए, क्योंकि उनके साथ JNU की लिगेसी जुड़ी थी और दुलारे पत्रकारों के साथ उनके बड़े मीडिया संस्थानों की लेगसी जुड़ी थी। यही लेगेसी और एलीटिज्म उन्हें टोकन छूट दिलाती थी, जिसे उन्होंने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम से प्रचारित किया।

साल 2004 से 2014 के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ‘टोकन छूट’ वाला स्वर्णकाल था, जिसमें सरकार एलीट लेगेसी के सामने नतमस्तक होती रही। जहाँ बड़े पत्रकार शराब के नशे में मंत्री बनाने-हटाने का दावा करते थे। लाखों करोड़ का घोटाला करने वाले मंत्रियों से साथ उनकी गलबहियाँ होती थी। उनसे नीचे वाले प्रधानमंत्री के साथ सरकारी खर्चे पर विदेश यात्रा जाते थे।

उनसे भी नीचे वाले सरकारी खर्चे से चलने वाली सभाओं-गोष्ठियों में गाल बजाते थे। कुल मिलाकर एलीट पत्रकारों-बुद्धिजीवियों का पूरा इकोसिस्टम तैयार था, जो नेताओं के लिए सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करते थे और बदले में संचारतंत्र पर एकाधिकार पाते थे। रवीश कुमार जैसे पत्रकारों ने इसी टोकन छूट की बदौलत अहंकारपूर्ण जुमले गढ़े कि ‘डरा हुआ पत्रकार मरा हुआ लोकतंत्र पैदा करता है’।

हालाँकि, पत्रकार और नेता दोनों लोकतंत्र की पैदाइश हैं, जिसका बीजारोपण जनता करती है। लेकिन, बड़े नेताओं की सोहबत से मिलने वाली छूट एलीट पत्रकारों को लोकतंत्र का ‘बाप’ होने का एहसास कराती रही। यह बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे मस्जिद की मुंडेर पर बैठा कौआ खुद को मुअज्जन समझने लगे।

इमरजेंसी काल के बाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ठेकेदार पैदा हुए, जो अभिव्यक्ति की आजादी का दोहन करते हुए जनता के नाम पर बेलगाम हरकतें करते। हालाँकि, इस टोकन आजादी का एक कतरा भी आम जनता तक नहीं पहुँच पाता था। लुटियन दिल्ली से मिलने वाली टोकन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लुटियन के पत्रकारों और एक्टिविस्टों में ही बँट कर खत्म हो जाती थी। साल 2004 से 2014 के बीच दिल्ली के मुठ्ठी भर लोगों की अभिव्यक्ति ही पूरे देश की अभिव्यक्ति मान ली गई।

इस मामले में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल अलग नजर आता है। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने सबसे पहले इन ठेकेदारों को किनारे किया। उन्होंने मन की बात, सोशल मीडिया और रैलियों के माध्यम से सीधे आम जनता से संपर्क किया। मीडिया एजुकेशन में इसे ही ‘मास लाइन कम्युनिकेशन’ कहते हैं। नरेंद्र मोदी से पहले महात्मा गाँधी और चीनी क्रांति के नेता माओ इस ‘मास लाइन कम्युनिकेशन’ का सफल प्रयोग कर चुके थे। जो लुटियन पत्रकारों को रास नहीं आ रहा। 

दूसरी ओर, मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में दिल्ली के कुछ दर्जन चुने हुए पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे। उन्हें अपनी यात्राओं पर साथ ले जाते थे। डॉक्टर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की संवाद शैली में सबसे बड़ा अंतर यही है। मनमोहन सिंह जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए एलीट पत्रकारों को माध्यम बनाते थे। नरेंद्र मोदी सीधे जनता से संवाद करते हैं।

मोदी ने पत्रकारों की ‘गेट कीपिंग’ यानी मध्यस्थता को खत्म कर दिया। शायद यही कारण है कि एलीट पत्रकारों के लिए मनमोहन सिंह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन हैं और नरेंद्र मोदी ‘तानाशाह’। हालाँकि संचारशास्त्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला शख्स भी यह आसानी से समझ सकता है कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की आम जनता संवाद के मामले में अधिक सबल और स्वतंत्र हुई है।

अब उसे अपनी बात रखने के लिए किसी मार्फत की जरूरत नहीं। हाँ, इस दौरान एलीट पत्रकारों को मिलने वाली विशेष सुविधाएँ जरूर कम हुई हैं। उनकी विदेश यात्राएँ, सस्ते दर पर मिलने वाले फ्लैट और प्लॉट भी नहीं मिल रहे। इस सिलसिले में बड़े यूट्यूबर्स, जो मनमोहन सिंह के जमाने में टीवी एंकर हुआ करते थे, उनके गुस्से का कारण आसानी से समझा जा सकता है। शायद यही कारण है कि मनमोहन के कार्यकाल में लूटी ऐश के दबाव में मीडिया राहुल गाँधी पर बांग्लादेश पत्रकार द्वारा लगाए गंभीर आरोपों पर चुप्पी साधे हुए है, अगर यही आरोप बीजेपी के किसी नेता पर लगे होते यही मीडिया खूब चौपले लगा रहे होते।  

मीडिया शिक्षण संस्थानों में सामान्यतः प्रेस के 4 सिद्धांत अथवा सिस्टम पढ़ाए जाते हैं, लेकिन इन 4 सिद्धांतों में मीडिया का लोकतांत्रीकरण सिद्धांत शामिल नहीं होता। यह सिद्धांत मीडिया की जगह आम जनता के हाथ में संचार के माध्यमों को सौंपने की बात कहती है। यह सिद्धांत मीडिया के ब्यूरोक्रेसी और प्रोड्यूसर कंट्रोल की निंदा करती है।

इस सिंद्धांत के अंतर्गत छोटे चौपाल, चर्चा समूह, कम्युनिटी रेडियो वगैरह को तरजीह दी जाती है। लैटीन अमेरिकी मीडिया रिसर्चर पाउलो फ्रेइरे ने अपनी रिसर्च में साबित किया है कि भारत जैसे विकासशील देशों में मीडिया को लोकतांत्रीकरण सिद्धांत का पालन करना चाहिए। हालाँकि, भारत का एलीट मीडिया हमेशा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर संचार माध्यमों पर अपने एकाधिकार के लिए लड़ता रहा।

बड़े मीडिया टायकूंस, संपादक, बुद्धिजीवी और पूँजीपति नहीं चाहते कि आम जनता के हाथ में मीडियम की पहुँच हो। वे हमेशा से जनता को संचारतंत्र के ग्राहक के रूप में देखना चाहते हैं, ताकि उनका व्यापार और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का शगूफा चलता रहे।

पुनः अपने प्रारंभिक सवाल पर लौटते हैं। क्या वाकई मनमोहन सिंह जी का कार्यकाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल था? मेरी राय में ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। जो लोग भी मनमोहन सिंह साहब को श्रद्धांजलि देते हुए ऐसा लिख रहे हैं, वह उनके अधिकारों का स्वर्णकाल जरूर हो सकता है। यह दौर हमेशा मीडिया मोनोपॉली और एलीट पत्रकारों को मिलने वाली टोकन छूट के रूप में याद रखा जाएगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस मॉडल ने नीरा वाडिया जैसे लॉबिस्ट-बचौलियों को फायदा पहुँचाया। बाकी एक प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और RBI गवर्नर के रूप में सेवाओं के लिए राष्ट्र डॉक्टर मनमोहन सिंह का आभारी रहेगा। खासतौर से उनकी वाणी की सौम्यता और उनका सौहार्द्रपूर्ण व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत होंगे।

सूरत अग्निकांड में कौन PM मोदी को जलाना चाहता था?: अजीत अंजुम या विनोद कापड़ी? विक्रांत मैसी से बात करते-करते शुभंकर मिश्रा ने खोल दी मीडिया की मोदी घृणा की पोल

                                      अजीत अंजुम एवं विनोद कापड़ी (साभार: X/ajitanjum)
अभिनेता विक्रांत मैसी के साथ 10 नवंबर 2024 के एक पॉडकास्ट में पत्रकार शुभंकर मिश्रा ने बताया कि कैसे मुख्यधारा का मीडिया किसी घटना के इर्द-गिर्द नैरेटिव गढ़ता है, जो घटना या इसमें शामिल लोगों के बारे में धारणा को प्रभावित करता है। मिश्रा ने खुलासा किया कि साल 2019 में जिस टेलीविजन न्यूज चैनल में वे रिपोर्टर के रूप में काम थे, उसने सूरत कोचिंग अग्निकांड को कवर करने के लिए भेजा था।

शुभंकर मिश्रा ने बताया कि न्यूज चैनल की ओर से उन्हें पीड़ितों में से एक के घर जाने के लिए कहा गया था। इसके साथ ही इस घटना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराते हुए बाइट (बयान) लेने के लिए कहा गया था। बता दें कि सूरत के इस कोचिंग अग्निकांड में 22 लोगों की जान चली गई थी। इसको लेकर बड़े पैमाने पर विवाद हुआ था।

आग लगने की यह घटना 24 मई 2019 को सूरत के जगतनाका स्थित व्यवसायिक केंद्र में स्थित एक कोचिंग सेंटर में हुई थी। यह आग एयर कंडिशन (AC) में शॉर्ट सर्किट होने के कारण लगी थी। घटना में बाहर निकलने का रास्ता ब्लॉक हो गया था, जिसके कारण छात्र-छात्राएँ वहाँ फँस गए थे। उस बिल्डिंग में अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन भी नहीं किया जा रहा था और ना ही भवन के पास सर्टिफिकेट था।

मिश्रा ने कहा, “जिस समय यह घटना हुई, उस समय मैं सूरत में था। आग से बचने के लिए छात्र-छात्राएँ बिल्डिंग के कूद रहे थे। उस समय लड़कियों के इमारत से कूदने के कई परेशान करने वाले वीडियो सामने आए थे। इसकी मैंने वहाँ से दो दिनों तक रिपोर्टिंग की थी। इस घटना के बाद बिल्डिंग को सील कर दिया गया था और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद मामला खत्म हो गया था।”

उन्होंने आगे कहा, “दो दिनों के बाद अहमदाबाद में एक बड़े नेता की रैली थी। मैंने अपने एडिटर से पूछा कि क्या मैं वहाँ जाऊँ, क्योंकि यहाँ पर बिल्डिंग को सील हो गया और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है? मेरे एडिटर ने कहा कि नहीं। जब सारी दुनिया रैली की लाइव टेलिकास्ट कर रही है तो तुम हादसे के पीड़ित के घर जाओ और किसी बच्चे को पकड़कर बाइट लो कि ‘मोदी अंकल आपने ये क्या करवा दिया, मेरी बहन लौटा दो’?”

हालाँकि, शुभंकर मिश्रा ने किसी समाचार चैनल या संपादक का नाम नहीं लिया, लेकिन मिश्रा की लिंक्डइन प्रोफ़ाइल और सूरत कोचिंग आग की घटना के कवरेज के पुराने वीडियो बताते हैं कि उस समय वे टीवी9 भारतवर्ष में काम कर रहे थे। नेटिज़न्स का अनुमान है कि जिस संपादक ने पीएम मोदी के खिलाफ बाइट लेने के लिए कहा होगा वह विनोद कापड़ी या अजीत अंजुम हो सकते हैं।

अजीम अंजुम और विनोद कापड़ी ने साल 2019 में टीवी9 भारतवर्ष में काम किया था। दोनों पीएम मोदी से नफरत करने के लिए जाने जाते हैं। इस तरह का निर्देश देने वाले संपादक का नाम जानने के लिए ऑपइंडिया ने शुभंकर मिश्रा से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो पाई। उनसे बाचती होने के बाद इस खबर को अपडेट किया जाएगा।

दिल्ली : कभी शेख हसीना के सौजन्य से खाते थे बिरयानी, अब हटा दी ‘बंगबंधु’ की तस्वीर: पत्रकारों ने बताया – ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में ‘साँपों’ ने मनाया बांग्लादेश तख्तापलट का जश्न

                         शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर PCI से हटाई गई (फोटो साभार: सुभाष S यादव)
बांग्लादेश में तख्तापलट क्या हुआ, ‘बंगबंधु’ कहे जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ से हटा दी गई है। बता दें कि शेख मुजीबुर रहमान ने ही ‘मुक्ति वाहिनी’ का गठन किया था, जो पाकिस्तानी फ़ौज से लड़ कर बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) की मुक्ति का कारण बना। PCI के दफ्तर में शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर हटाए जाने के बाद लोगों ने सोशल मीडिया में विरोध किया, जिसके बाद तस्वीर फिर से लगा दी है।

सुभाष S यादव ने सोमवार (5 अगस्त, 2024) को एक तस्वीर ली, जिसमें शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर हटाई हुई दिख रही है। तस्वीर को देखिए:

                                                5 अगस्त को हटी हुई तस्वीर की ली गई फोटो

इसके बाद उन्होंने विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से इसे लेकर आवाज़ उठाई। फिर 4 दिन बाद इस तस्वीर को लगा दिया गया। शुक्रवार (9 अगस्त, 2024) को उनके द्वारा ली गई इस तस्वीर को देखिए:

                            9 अगस्त को वापस लगा दी शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर

हमने PCI से जुड़े कुछ पत्रकारों से बात की, जिन्होंने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए बताया कि अब फिर तस्वीर लगा दी है। उन पत्रकारों ने बताया कि खूब लानत-मलानत के बाद ये कदम उठाया गया है। हमें खबर मिल रही है कि तख्ता पलट के बाद वहाँ जश्न भी मनाया गया था। जश्न के दौरान तस्वीर हटाई गई थी। एक पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शेख हसीना ने ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में साँप पाल रखा था, जिसने मौका मिलते ही उन्हें ही डस लिया।

PCI में स्थित हमारे सूत्रों ने ये भी बताया कि शेख हसीना के सौजन्य से वहाँ पर बिरयानी पार्टी कभी शुरू की गई थी। बिरयानी बनाने के लिए बांग्लादेश से ही खानसामा आता था। वहीं मौका मिलते ही इन्होंने शेख हसीना के पिता की तस्वीर ही हटा दी। इन्होंने आक्रोश जताते हुए कहा कि प्रेस क्लब के वामपंथी किसी के नहीं है। दावा है कि PCI में तो भारत की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले सेनानियों की तस्वीरें तक नहीं लगी हैं। ये वामपंथी नेताओं और एक्टिविस्ट्स को जम कर मंच भी देते हैं।

‘आपको कितने पैसे मिले थे लड़की को बदनाम करने के लिए’: जब पत्रकारों के सवाल से हुआ अजीत अंजुम का सामना तो चिचियाकर भागे, Video वायरल

अजीत अंजुम अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ YouTube पर प्रोपेगंडा फैलाने के लिए जाने जाते हैं। वो उस गिरोह का हिस्सा हैं, जो पीएम मोदी को ‘तानाशाह’ बता कर अपनी प्रासंगिता बनाए रखने की चेष्टा करता रहता है। हालाँकि, जब इस गिरोह के लोगों का खुद सवालों से सामने होता है तो वो भाग निकलते हैं। अजीत अंजुम से जब किसी पत्रकार ने सवाल पूछा तो उन्होंने उस पर ही जेल में बंद आसाराम से पैसे लेने का आरोप लगा दिया।

ये वह दौर था जब सारा मीडिया कांग्रेस/यूपीए के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पता था, तत्कालीन सरकार के इशारे पर सारा मीडिया नचा करता था। आज तो जिसे देखो गोदी मीडिया कह सकता है, लेकिन उस समय सब भीगी बिल्ली बने रहते थे। जिसका फायदा मीडिया भी अपनी TRP बढ़ाने के लिए उल्टे-सीधे स्टिंग ऑपरेशन करते रहते थे। 

याद करिये, दिल्ली के तुर्कमान गेट के पास एक सरकारी स्कूल की अध्यापिका की होती दुर्गति। बेचारी इतना ज्यादा बेइज्जत हुई थी कि निर्दोष साबित होने के बावजूद नौकरी पर वापस करने की हिम्मत नहीं कर पायी। कौन महिला पब्लिक द्वारा बुरी तरह पीटते कपडे चिथड़े कर दिए जाएँ, लेकिन वही बेशर्म पत्रकार आज भी बहुत निर्भीक पत्रकार बन टीवी पर आता है। काश, ऐसा उसके परिवार की किसी महिला के साथ हुआ होता। कहाँ सो गया था मानव अधिकार और महिला आयोग? 

उन्होंने सवाल पूछने वाले पत्रकार को ‘आसाराम का चेला’ बता दिया। बदले में पत्रकारों ने भी उनसे पूछा कि उन्हें कितने पैसे मिले थे? एक पत्रकार ने पूछा, “आपको कितने पैसे मिले थे लड़की को बदनाम करने के लिए?” इस दौरान अजीत अंजुम पत्रकारों के सवालों का जवाब देने से इनकार करते हुए लगातार उँगली बता-बता कर कुछ कुछ उलटा-सीधा बोलते रहे। इसके बाद वो कार में बैठ गए और ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। इस तरह बार-बार पीएम मोदी से सवालों के जवाब की अपेक्षा रखने वाले अजीत अंजुम खुद एक सवाल से भाग खड़े हुए।

एक तरह से 2-4 पत्रकारों ने मिल कर अजीत अंजुम को वास्तविकता का भान करा दिया। ये वीडियो कब का है, ये अभी तक सामने नहीं आया है। हालाँकि, ऐसा लग रहा है जैसे ये हाल का ही वीडियो है। एक ट्विटर यूजर ने तो दावा कर दिया कि अजीत अंजुम को चिकेन-पकौड़ा की दुकान से खदेड़ दिया गया। असल में अजीत अंजुम का एक अपुष्ट ट्वीट वायरल होता है जिसमें उन्होंने योगी आदित्यनाथ के दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद पत्रकारिता छोड़ चिकेन-पकौड़ा का दुकान खोलने की बात कही थी।

हालाँकि, अजीत अंजुम दावा करते हैं कि उन्होंने कभी इस तरह का ट्वीट किया ही नहीं। लोगों ने उनके ताज़ा वीडियो को ‘पकौड़ी माफिया पर जनता की स्ट्राइक’ कह कर भी चलाया। 2020 में भी एक वीडियो सामने आया था, जिसके आधार पर दावा किया गया था कि किसान आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने अजीत अंजुम की पिटाई की। नवंबर 2023 में मध्य प्रदेश विधानसभा मतदान के दौरान उन्होंने एक महिला से जबरन अपने सवाल का जवाब लेना चाहा, जिसके बाद लोगों ने उन्हें खदेड़ा था।