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कश्मीर : जब गैंगरेप करके सड़क पर फेंकी गई हिंदू नर्स की क्षत-विक्षत लाश… सरला भट्ट केस में 36 साल बाद आतंकी यासीन मलिक समेत 5 के खिलाफ चार्जशीट दायर

                     यासीन मलिक पर सरला भट हत्याकांड में चार्जशीट दायर (फोटो साभार- दैनिक भास्कर)
वो भी क्या दिन थे जब शेख जी फाख्ता उड़ाते थे यानि आतंकवाद को बढ़ावा, सेना के जवानों को मारने और हिन्दुओं को मारने वालों को कांग्रेस से लेकर यूपीए(यानि वर्तमान INDI गठबंधन) बहुत सम्मान दिया करते थे, प्रधानमंत्री आवास में किसी सम्मानित की तरह आओभगत होती थी। वक़्त का चक्र ऐसा घुमा आज जेल में ज़िंदगी काटने को मजबूर।

टेरर फंडिंग के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा जेकेएलएफ का पूर्व प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ 36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्याकांड में बड़ी कार्रवाई हुई है। जम्मू-कश्मीर की एसआईए ने 36 साल पुराने मामले में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें उसे मुख्य आरोपितों में शामिल किया है।

इसके तीन आरोपितों, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है। चौथा आरोपित मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है और उसके पीओके में छिपे होने की आशंका है। सरला को उसी ने गोली मारी थी। चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने अप्रैल 1990 में सरला भट्ट को अगवा किया और उसकी हत्या की साजिश रची।

सरला भट्ट कौन थी?

कश्मीरी पंडित सरला भट्ट उस वक्त श्रीनगर के शेर ए कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (SKIMS) में स्टाफ नर्स थीं। 36 साल पहले उनका अपहरण किया गया। उन्हें यातनाएँ दी गईं। बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। सरला अनंतगाग की रहने वाली थी।

18 अप्रैल 1990 को सरला ड्यूटी पर जा रही थीं। इसी दौरान अस्पताल परिसर के पास से उन्हें उठा लिया गया। चार दिन तक अलग-अलग जगह रख कर बुरी तरह टॉर्चर किया गया। बाद में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका शव श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में मिला। शरीर पर गोलियों के साथ साथ उन यातनाओं के भी निशान थे, जो चार दिनों तक उन्हें दिए गए।

शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उसे ‘सुरक्षाबलों का मुखबिर’ होने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं सरला के परिवार वालों पर भी जुल्म ढाए गए। उसके घर पर ग्रेनेड से हमला किया गया और कश्मीर से पलायन के लिए मजबूर किया गया। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि इस हत्या का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों में भय पैदा करना था, ताकि उनका घाटी से पलायन तेज हो।

एसआईए ने 737 पन्नों की चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल की। इसमें यासीन मलिक सहित 5 लोगों को आरोपी बनाया गया। चार्जशीट में प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, मेडिकल और फॉरेंसिक सामग्री तथा नई जाँच के आधार पर आरोप तय किए गए।

यासीन मलिक पर अब तक किन-किन मामलों में कार्रवाई हुई?

यासीन मलिक आतंकियों की फंडिंग का दोषी है। इस मामले में उसे उम्रकैद की सजा मिली है। NIA ने 2017 में यह मामला दर्ज किया था। उसने घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए हवाला के जरिए धन जुटाया। 2022 में यासीन मलिक ने अदालत में कई आरोप स्वीकार किए। दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।

उस पर आतंकवाद, आपराधिक साजिश और UAPA के तहत भी कई मामले दर्ज हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप है।

इन मामलों में भी उन्हें दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई।

जनवरी 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के जवानों पर हुए हमले के मामले में भी यासीन मलिक का नाम आया था।

इस मामले में भी NIA ने कार्रवाई की है और मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया में है।

1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के मामले में भी यासीन मलिक का नाम जाँच के दौरान आया। इस मामले में भी अदालत में मुकदमा चल रहा है और अंतिम फैसला नहीं आया है।

1990 के दशक में उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुई थीं। जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ दर्जनों आपराधिक और आतंकवाद संबंधी मामले अलग-अलग वक्त पर दर्ज हुए हैं। इनमें से कुछ में वह दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कुछ अभी भी न्यायालय में लंबित हैं।

फिलहाल यासीन मलिक आतंकवाद फंडिंग मामले में तिहाड़ में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। NIA ने उनकी सजा बढ़ाकर मृत्युदंड किए जाने की भी अपील की है, जिस पर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। सरला भट्ट हत्याकांड की नई चार्जशीट उनके खिलाफ एक अलग और महत्वपूर्ण कानूनी कार्रवाई है, जिसकी सुनवाई आगे होगी।

जेब में कंडोम और ‘लव लेटर’: पूर्व आतंकी मुश्ताक ने खोली पाकिस्तान की पोल, बताया- जन्नत-हूर का ख्वाब दिखा फँसाते हैं

          पूर्व आतंकी मुश्ताक ने बताया कैसे कश्मीरी लड़कियों को फँसाते थे पाकिस्तानी आतंकी (फोटो साभार: AI)
पूर्व कश्मीरी आतंकी और बाद में भारतीय सेना के लिए अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर चुके मुश्ताक अहमद भट ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के लोकप्रिय पॉडकास्ट (‘PGX: Raw & Real’) पर एक इंटरव्यू में 90 के दशक से लेकर 2016 तक के आतंक की उस काली सच्चाई को खोलकर रख दिया, जिसे पाकिस्तान हमेशा दुनिया से छिपाना चाहता है।

उन्होंने बताया कि सरहद पार से आने वाले आतंकी ‘मुजाहिद’ होने का दावा कर घाटी में केवल अपनी हवस मिटाने और कश्मीरी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने आते थे।

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान जिस ‘जिहाद’, ‘मजहब की लड़ाई’ और ‘आजादी की लड़ाई’ का नैरेटिव दुनिया के सामने पेश करता रहा है, उसकी हकीकत क्या है? क्या सचमुच हजारों कश्मीरी युवा किसी मकसद के लिए हथियार उठाकर सीमा पार गए थे या फिर वे एक ऐसे खेल का हिस्सा बन गए थे जिसमें मजहब, राजनीति, प्रोपेगेंडा और विदेशी एजेंसियों के हित सबसे ऊपर थे और युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नहीं था?

इन सवालों का जवाब उस व्यक्ति ने दिया है, जिसने इस काली दुनिया को भीतर से देखा। उसने कश्मीर में बंदूक संस्कृति का उदय देखा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के कैंपों में समय बिताया, अफगानिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण लिया, ‘जिहाद’ की विचारधारा के नाम पर होने वाली ब्रेनवॉशिंग को करीब से देखा और बाद में उस रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। यह व्यक्ति है मुश्ताक अहमद भट, जिन्हें कभी ‘अशफाक’ और ‘रोमियो’ जैसे कोड नेम से जाना जाता था।

प्रखर के पॉडकास्ट में मुश्ताक अहमद भट ने ऐसे कई खुलासे किए, जो पाकिस्तान के दशकों पुराने दावों को चुनौती देते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार मुठभेड़ों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तलाशी के दौरान उनकी जेबों से जिहाद और शहादत के संदेश नहीं, बल्कि कश्मीरी लड़कियों को लिखे गए प्रेम पत्र निकलते थे। कई मामलों में कंडोम भी बरामद हुए।

मुश्ताक के अनुसार, जब पकड़े गए आतंकियों से पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम और जिहाद के नाम पर लड़ने आए हैं तो उनके पास ऐसी चीजें क्यों हैं?, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता था। वे बहस से बचते थे या गुस्से में जवाब देते थे। यह वह पहला सच था जो उस छवि से बिल्कुल अलग था, जो पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठनों द्वारा ‘मुजाहिदीन’ के बारे में बनाई जाती रही है।

मुश्ताक बताते हैं कि कई विदेशी और पाकिस्तानी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में ऐसे मामले सामने आए जहाँ आतंकियों ने स्थानीय परिवारों में शरण ली, परिवार की लड़कियों के साथ रात बिताई और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। वैसी लड़कियाँ और उनके होने वाले बच्चों की जिंदगी बदल गई। यह कहानी केवल आतंकियों की निजी हरकतों की नहीं है, बल्कि यह कहानी उस पूरे तंत्र की है, जिसने हजारों युवाओं को ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नाम पर इस्तेमाल किया।

एक संपन्न और राजनीतिक परिवार से आने वाला युवक

मुश्ताक अहमद भट किसी आर्थिक मजबूरी या सामाजिक उपेक्षा के कारण उस रास्ते पर नहीं गए थे। वे कश्मीर के एक प्रभावशाली और राजनीतिक परिवार से आते थे। उनके दादा गाँव के मुखिया थे और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जमीन-जायदाद की कमी नहीं थी। पढ़ाई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हुई। सामान्य जीवन चल रहा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर तेजी से बदल रहा था। 1987 के चुनावों के बाद राजनीतिक असंतोष बढ़ा। चुनावी धांधली के आरोप लगे। अलगाववादी भावनाओं को हवा मिली। पाकिस्तान ने इस असंतोष को अवसर के रूप में देखा। घाटी में धीरे-धीरे एक नया माहौल बनने लगा।

मुश्ताक बताते हैं कि उस दौर में बंदूक केवल हथियार नहीं थी, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। कॉलेजों और युवाओं के बीच पिस्तौल और AK-47 आकर्षण का केंद्र बन गए थे। जिसके पास हथियार होता था, उसे अलग नजर से देखा जाता था।

मुश्ताक ने स्वीकार किया कि वे भी इसी माहौल से प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि बंदूक शक्ति का प्रतीक है। युवाओं के मन में यह धारणा बैठाई जा रही थी कि हथियार उठाना ही सम्मान पाने का रास्ता है। यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा था।

‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नारों से शुरू हुई यात्रा

मुश्ताक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी यही बताया गया कि वे एक बड़े और पवित्र मिशन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। ‘आजादी’ जुल्म के खिलाफ संघर्ष’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्द लगातार सुनाई देते थे। रैलियाँ निकलती थीं। भाषण होते थे। युवाओं को बताया जाता था कि वे इतिहास बदलने जा रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसे युवाओं की पहचान की जाती थी, जो भावनात्मक रूप से प्रभावित हो चुके हों। मुश्ताक भी उन्हीं युवाओं में शामिल हो गए। कुछ समय बाद उन्हें बताया गया कि वे सीमा पार जाने के लिए तैयार रहें। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीमा पार जाकर वे किसी महान उद्देश्य के लिए काम करेंगे।

कुपवाड़ा से सीमा पार और मुजफ्फराबाद तक

1990 के आसपास मुश्ताक और उनके साथियों को कुपवाड़ा के रास्ते सीमा पार कराया गया। यह यात्रा आसान नहीं थी। जंगलों, पहाड़ों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुँचे। रात में चलना, दिन में छिपना और लगातार सतर्क रहना इस यात्रा का हिस्सा था।

आखिरकार वे मुजफ्फराबाद पहुँचे, जहाँ उनका स्वागत किया गया। उन्हें बताया गया कि अब वे जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। यहीं से शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसे मुश्ताक बाद में ‘ब्रेनवॉशिंग’ के रूप में याद करते हैं। मुजफ्फराबाद के कैंपों में हर तरफ एक ही बात सुनाई देती थी- जिहाद, शहादत और जन्नत।

युवाओं को बताया जाता था कि यह दुनिया अस्थायी है और असली सफलता शहादत में है। मजहबी भाषणों, भावनात्मक कहानियों और प्रचार सामग्री के जरिए उनके भीतर एक विशेष मानसिकता विकसित की जाती थी, लेकिन कुछ ही समय बाद मुश्ताक को कई बातें खटकने लगीं।

उन्होंने देखा कि जिन युवाओं के नाम पर पैसा आता था, वह उन तक नहीं पहुँचता था। कैंपों के वरिष्ठ लोग बेहतर सुविधाओं में रहते थे, जबकि युवा साधारण और कठिन परिस्थितियों में रहते थे। यहीं से उनके मन में पहला बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर यह सचमुच मजहब और सिद्धांतों की लड़ाई है, तो फिर भ्रष्टाचार क्यों?

विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तैयार किया गया नैरेटिव

मुश्ताक के अनुसार, एक समय उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल किया गया जहाँ विदेशी प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के सामने कश्मीर की एक विशेष तस्वीर पेश की जाती थी। उन्हें बताया जाता था कि क्या कहना है और कैसे कहना है। भारतीय सेना के खिलाफ कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।

लोगों को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति हासिल की जा सके। मुश्ताक के अनुसार, यहीं से उन्हें एहसास होने लगा कि केवल हथियारों का ही नहीं, बल्कि नैरेटिव और प्रोपेगेंडा का भी एक बड़ा खेल चल रहा है।

मुजफ्फराबाद में कुछ समय बिताने के बाद मुश्ताक अहमद भट और उनके साथ मौजूद कई अन्य युवाओं को अफगानिस्तान भेजे जाने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें बताया गया कि अब वे असली ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं। वहाँ से लौटकर वे ‘बड़े मिशन’ का हिस्सा बनेंगे।

उस समय तक मुश्ताक के मन में कई सवाल पैदा हो चुके थे, लेकिन वे उस मशीनरी के भीतर थे जहाँ सवाल पूछना आसान नहीं था। जो व्यक्ति सवाल पूछता था, उस पर शक किया जाता था। जो संगठन की लाइन से अलग सोचता था, उसे पसंद नहीं किया जाता था। ऐसे माहौल में अधिकांश युवा चुप रहना ही बेहतर समझते थे।

पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक का सफर, हिज्ब-ए-इस्लामी के कैंप में मिली ट्रेनिंग

मुश्ताक बताते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को पहले पेशावर की ओर ले जाया गया। वहाँ से उन्हें अफगानिस्तान पहुँचाया गया। उस समय अफगानिस्तान युद्ध और अस्थिरता का केंद्र था। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई के बाद भी वहाँ हथियारबंद गुट सक्रिय थे और अलग-अलग संगठनों के कैंप चल रहे थे।

यहीं पर मुश्ताक को पहली बार एहसास हुआ कि कश्मीर का मुद्दा केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जहाँ अलग-अलग देशों, संगठनों और विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। अफगानिस्तान में मुश्ताक को हिज्ब-ए-इस्लामी से जुड़े कैंपों में प्रशिक्षण दिया गया।

यहाँ उन्हें हथियार चलाने, विस्फोटक इस्तेमाल करने, घात लगाकर हमला करने और कठिन इलाकों में लड़ने की ट्रेनिंग दी गई। AK-47 से लेकर दूसरे हथियारों तक, हर चीज सिखाई जाती थी। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी पाक युद्ध का हिस्सा हैं।

लेकिन मुश्ताक कहते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान भी उन्हें बार-बार यह महसूस होता था कि जो बातें मंचों पर कही जाती हैं और जो जमीन पर दिखाई देता है, दोनों में बहुत अंतर है। मुश्ताक बताते हैं कि अफगानिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने पहली बार युद्ध को वास्तविक रूप में देखा।

फिल्मों और भाषणों में युद्ध को रोमांचक दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर वह केवल मौत, तबाही और दर्द छोड़ता है। उन्होंने टूटे हुए घर देखे, घायल लोगों को देखा, ऐसे परिवार देखे जिनके कई सदस्य मारे जा चुके थे। ऐसे बच्चे देखे जिन्होंने अपने माता-पिता खो दिए थे। यही वह समय था जब उनके भीतर ‘जिहाद’ की चमक फीकी पड़ने लगी।

जन्नत के सपने और मौत की सच्चाई

मुश्ताक बताते हैं कि कैंपों में युवाओं को बार-बार बताया जाता था कि शहादत सबसे बड़ी सफलता है। उन्हें जन्नत और हूरों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं, लेकिन अफगानिस्तान में उन्होंने देखा कि मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे। वे युवा थे जिन्हें भावनाओं में बहाकर यहाँ तक लाया गया था। जो लोग फैसले लेते थे, वे सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते थे।

यहीं से उनके मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे हो रहा है? मुश्ताक बताते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि ‘जिहाद’ केवल विचारधारा नहीं, बल्कि एक कारोबार भी बन चुका है।

फंड जुटाए जाते थे, दान लिया जाता था, विदेशों में अभियान चलाए जाते थे, युवाओं के नाम पर पैसा आता था, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा ऊपर बैठे लोगों तक ही सीमित रहता था। जिन युवाओं को मैदान में भेजा जाता था, उनके हिस्से में केवल खतरा और मौत आती थी।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बिताए समय के दौरान मुश्ताक को यह समझ आने लगा कि कश्मीर का मुद्दा कई लोगों के लिए राजनीतिक साधन बन चुका है। कश्मीर में जितना तनाव रहेगा, उतना ही यह मुद्दा जिंदा रहेगा। जितने ज्यादा युवा हथियार उठाएँगे, उतना ही यह नेटवर्क मजबूत रहेगा। इसलिए युवाओं को लगातार भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जाता था।

उन्हें बताया जाता था कि वे किसी महान मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में वे एक ऐसे खेल का हिस्सा थे जिसमें उनका इस्तेमाल हो रहा था।

मुश्ताक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, वे बार-बार कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी युवाओं का हुआ। कई युवा पढ़ाई छोड़कर चले गए, कई कभी वापस नहीं लौटे, कई मारे गए, कई जेलों में पहुँचे और कई ऐसे थे जिन्हें यह तक समझ नहीं आया कि वे आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं।

मुश्ताक मानते हैं कि वे खुद भी उसी दौर में बहक गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस रास्ते पर वे चल पड़े थे, उसका अंत केवल विनाश था। अफगानिस्तान के अनुभवों, कैंपों में देखे गए भ्रष्टाचार और लगातार दिखाई दे रहे विरोधाभासों ने मुश्ताक की सोच पूरी तरह बदल दी।

प्रेम पत्र, कंडोम, हूरों के नाम पर कश्मीरी लड़कियों का शोषण

मुश्ताक के खुलासों में सबसे ज्यादा चर्चा उन घटनाओं की हुई जिनमें मारे गए आतंकियों की जेबों से प्रेम पत्र और कंडोम मिले। उनके अनुसार, यह उस नैरेटिव को चुनौती देता है जिसमें आतंकियों को केवल मजहबी योद्धा के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे।

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने ‘लव लेटर्स’ के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में लिखे गए इन खतों में कहीं भी जिहाद या किसी मजहबी मकसद की बात नहीं दिखी, बल्कि उनमें कश्मीरी लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और शादी के सपने दिखा कर प्रभाव में लेने वाली बातें होती थी।

कई खतों में लिखा था, “पापी से नहीं, पाप से नफरत करो…”, “मैं तुम्हारे अच्छे कैरेक्टर से प्यार करता हूँ…”। मुश्ताक का दावा था कि विदेशी आतंकी इसी तरह के झूठे प्रेम और भरोसे का माहौल बनाकर मासूम लड़कियों को अपने करीब लाने की कोशिश करते थे। मामला सिर्फ इन खतों तक सीमित नहीं था।

पूर्व कमांडर ने दावा किया कि कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं। जब उनसे पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने आए हैं तो ऐसी चीजों की जरूरत क्यों पड़ी, तब वे जवाब देने के बजाय भड़क जाते थे। वे हूरों का ख्वाब लेकर आते थे और कश्मीरी लड़कियों का शोषण करते थे।

मुश्ताक के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के कुछ गाँवों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनकी जिंदगी पाकिस्तानी आतंकियों के आने-जाने के बाद बदल गई। उनका कहना था कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय घरों में शरण लेते थे और अस्थायी या छद्म शादियों के जरिए लड़कियों से रिश्ते बनाते थे।

यमरश और उरपोरा नागबल गाँवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि साजिद और आदिल पठान जैसे पाकिस्तानी आतंकियों ने स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। पीछे रह गए बच्चे और वे महिलाएँ, जिन्हें समाज की नजरों और मुश्किलों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

सालों तक ‘शहादत’ और ‘जिहाद’ के नाम पर कश्मीर में हिंसा फैलाने वाले आतंकियों की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कोई मजहबी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा खेल था जिसमें युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें देकर बड़े कमांडरों और पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने स्वार्थ पूरे किए। यह सच घाटी के उन युवाओं के लिए एक आईना है, जो आज भी पाकिस्तान के प्रभाव में आकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

J&K को दिखाया पाकिस्तान का हिस्सा, नॉर्थ ईस्ट को चीन में घुसाया: गलत मैप शेयर करने पर नेपाल एयरलाइंस को गाली पड़ी तो बोले- SORRY, गलती हो गई

    नेपाल एयरलाइंंस ने भारत के J&K को पाकिस्तान और नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाते मैप किया शेयर (साभार: X-Nepal Airlines)
नेपाल में बालेन शाह की सरकार बनने के बाद एक और भारत-विरोधी कारनामे सामने आ रहे हैं। अब नेपाल एयरलाइंस ने नक्शा (मैप) जारी किया, जिसमें पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का और पूरे नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाया गया है। भारत के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एयरलाइन से जवाबदेही माँगी, तब जाकर एयरलाइन ने ऐसा भ्रामक नक्शा दिखाने के लिए माफी माँगी है।

दरअसल, नेपाल की ‘नेपाल एयरलाइंस’ ने 29 अप्रैल 2026 ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट पर अपने फ्लाइट नेटवर्क को दिखाते हुए पूरी दुनिया का एक नक्शा पोस्ट किया। इस नक्शे में सबसे आपत्तिजनक बात थी कि इसमें भारत के अधिकतर हिस्सों को चीन और पाकिस्तान के नक्शे में दिखाया गया।

नक्शे में खासकर पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया, जिस पर भारत के नेटिजन्स भड़क गए। इतना ही नहीं भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे सिक्किम, दार्जीलिंग समेत पूरे नॉर्थ ईस्ट को भी चीन के हिस्से में दिखाया गया। यह देखकर भारत के नेटिजंस और ज्यादा गुस्सा गए।

नेपाल एयरलाइंस पर भारत के नेटिजन्स का फूटा गुस्सा

इस हरकत के बाद नेपाल एयरलाइंस भारत के नेटिजन्स के निशाने पर आ गया। लोगों ने नेपाल एयरलाइंस से जवाबदेही माँगी। ‘एक्स’ पर #NepalAirlines और #JammuKashmir से जुड़े हैशटैग के साथ पोस्ट वायरल होने लगे, जिसमें यूजर्स ने इसे भारत-विरोधी और जानबूझकर किया गया गलत काम बताया।

दिव्या गंडोत्रा ​​टंडन नाम की यूजर ने लिखा, “भारत ने दशकों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। खुली सीमा से लेकर लाखों नेपाली नागरिकों को रोजगार देने तक, व्यापार के लिए भारत के बंदरगाह उपलब्ध कराने से लेकर ईंधन पाइपलाइन, बिजली परियोजनाएँ, आपदा के समय मदद, बुनियादी ढाँचे का निर्माण, स्कॉलरशिप और सैन्य सहयोग तक, भारत हमेशा नेपाल के साथ खड़ा रहा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “लेकिन ऐसे में नेपाल एयरलाइंस की ओर से जारी एक फ्लाइट नेटवर्क मैप ने हैरान कर दिया। इस मैप में जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के साथ दिखाया गया। यह कोई साधारण डिजाइन की गलती नहीं लगती, बल्कि एक गंभीर और संवेदनशील मामला है। जब भारत आज भी नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साझेदार है, तब एक राष्ट्रीय एयरलाइन से ऐसी लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती। यह केवल एक नक्शा नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है, जो कई सवाल खड़े करता है।”

असम के वोकेशनल टीचर्स एसोसिएशन के आधिकारिक हैंडल ने भी आपत्ति जताते हुए लिखा, “भारत कई दशकों से नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साथी रहा है। ऐसे में नेपाल एयरलाइंस द्वारा अपने फ्लाइट मैप में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। यह एक गंभीर गलती है, जिसे सुधारा जाना चाहिए।”

ऐसे ही भोजपुरी स्टार और RJD नेता खेसारी लाल यादव ने भी लिखा, “कोई बता पाएगा की क्या सोच के नेपाल एयरलाइंस भारत के नक्शे में ऐसा छेड़ छाढ़ किया है और वो भी जम्मू कश्मीर को लेकर? ये मामूली बात नहीं है, जानबूझकर किया हुआ काम लगता हैं। इसको चिढ़ाना बोलते हैं।”

‘द दार्जीलिंग क्रोनिकल’ नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “नेपाल एयरलाइंस की नजर में दुनिया कुछ अलग ही है। उनके नक्शे को देखें तो ऐसा लगता है कि भारत का पूरा उत्तर-पश्चिम, पूरा उत्तर-पूर्व, दार्जिलिंग, सिक्किम और यहाँ तक कि म्यांमार का हिस्सा भी चीन में शामिल कर दिया गया है। काठमांडू में आजकल लोग क्या फूँक रहे हैं?”

नेपाल एयरलाइंस ने माँगी माफी

भारत के यूजर्स की कड़ी आलोचना के बाद नेपाल एयरलाइंस ने आखिरकार सार्वजनिक तौर पर माफी माँगी। एयरलाइन ने कहा कि वे अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर हाल ही में साझा किए गए फ्लाइट नेटवर्क मैप में हुई गलती के लिए दिल से माफी माँगते हैं।

यह भी कहा कि इस नक्शे में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लेकर गंभीर त्रुटियाँ थीं, जो नेपाल सरकार या नेपाल एयरलाइंस की आधिकारिक स्थिति को बिल्कुल भी नहीं दर्शाती है।

नेपाल का भारत-विरोधी रुख और बालेन शाह सरकार में उथल-पुथल

नेपाल में नई बालेन शाह सरकार बनने के बाद से ही नेपाल का भारत-विरोधी रुख सामने आता जा रहा है। हाल ही में बालेन शाह सरकार नई भंसार नीति लाई थी, जिसके तहत भारत से लाए जाने वाले 100 से अधिक नेपाली रुपये (लगभग ₹63) के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाई थी, जिसके बाद भी बालेन शाह सरकार का विरोध हुआ था।

यह भी किसी से नहीं छिपा कि बालेन शाह सरकार अपने ही फैसलों से गतिरोध का सामना कर रही है, उनके बड़े-बड़े मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिसके बाद उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ा। कुल मिलाकर नई बालेन शाह सरकार देश को चलाने में असमर्थ साबित हो रही है।

J&K में श्रीनगर एयरपोर्ट पर हिरासत में लिए गए 2 अमेरिकी नागरिक, सैटेलाइट फोन के साथ पकड़े गए: एयरपोर्ट सिक्योरिटी ने पूछताछ के बाद पुलिस के हवाले किया

                                                                       

                                                                                                                        साभार : ZEENews  
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में सुरक्षा एजेंसियों ने एयरपोर्ट पर दो अमेरिकी नागरिकों को रविवार (19 अप्रैल 2026) को सैटेलाइट फोन रखने के आरोप में हिरासत में लिया है। पकड़े गए लोगों की पहचान जेफ्री स्कॉट और हालदार कौशिक के रूप में हुई है।

अधिकारियों के मुताबिक, नियमित जाँच के दौरान उनके पास सैटेलाइट फोन पाए गए जो जम्मू-कश्मीर में बिना अनुमति रखना और इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है। एयरपोर्ट सिक्योरिटी ने दोनों से पूछताछ की और बाद में उन्हें आगे की जाँच के लिए पुलिस के हवाले कर दिया।

सुरक्षा एजेंसियों ने दोनों से पूछताछ शुरू कर दी है और यह जानने की कोशिश की जा रही है कि वे इन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से कर रहे थे। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, दोनों श्रीनगर से बाहर जाने की तैयारी में थे। इस मामले में उनके साथ मौजूद कोलकाता के हलदर कौशिक को भी पकड़ गया है। फिलहाल मामले की जाँच जारी है और संबंधित एजेंसियाँ सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्रवाई कर रही हैं।

रूबिया अपहरण कांड : 35 साल बाद शफत अहमद को CBI ने दबोचा, आतंकी यासीन मलिक का था मददगार


केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने 01 दिसंबर 2025 को 1989 के रूबिया सईद अपहरण कांड में नई गिरफ्तारी की है। CBI ने 35 साल बाद इस केस में श्रीनगर के हवाल इलाके से शफत अहमद शुंगलू को धर दबोचा। पहले शुंगलू को निशात पुलिस स्टेशन ले जाया गया, फिर सीबीआई (CBI) ने हिरासत में ले लिया। अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ से कई राज खुल सकते हैं।

उस समय यह भी चर्चा थी कि यह तथाकथित अपहरण है। यह सिर्फ आतंकियों को छुड़ाने के लिए ड्रामा था। दादी उसके साथ रह रही है खाना घर से जा रहा है फिर अपहरण कैसा? और इसका किसी ओर से खंडन करने की बजाए चुप्पी साध ली गयी थी। असली कहानी अब आएगी सामने। 

देखा जाए तो अपहरण हो या प्लेन हाइजेक इसकी जन्मदाता कांग्रेस ही है। मुफ़्ती मोहम्मद सईद जनता पार्टी से पहले किस पार्टी में था कांग्रेस में। दूसरे, इंदिरा गाँधी को जेल से छुड़ाने के लिए प्लेन हाइजेक किसने करवाया संजय गाँधी ने, संजय गाँधी किस पार्टी में था कांग्रेस। फिर भी महामूर्ख कहते है कांग्रेस अच्छी पार्टी है।    

रूबिया अपहरण केस क्या था, जिसने हिला दिया था पूरा देश

शफत अहमद शुंगलू की ताजा गिरफ्तारी रूबिया सईद अपहरण कांड की जाँच को नई जान दे रही है, जो कश्मीर के आतंकवाद के इतिहास का एक काला अध्याय है। 8 दिसंबर 1989 को तब के गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया को जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के आतंकियों ने अगवा कर लिया था।

लाल डीड अस्पताल में डॉक्टर रूबिया बस से घर लौट रही थीं जब बंदूक की नोक पर उन्हें किडनैप कर लिया गया। यह खबर दिल्ली पहुँचते ही हड़कंप मच गया। पूरे देश में सन्नाटा छा गया, क्योंकि यह पहली बार था जब आतंकी केंद्र सरकार के मंत्री के घर तक सेंध लगा बैठे।

अपहरण के पीछे साफ मकसद था- जेल में बंद अपने साथियों को रिहा कराना। आतंकियों ने शर्त रखी: रूबिया की जान चाहिए तो पाँच खूँखार सदस्यों को छोड़ो। सरकार मुश्किल में फँस गई। एक तरफ मंत्री की बेटी की जिंदगी, दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा। कई दिनों तक पर्दे के पीछे बातचीत चली।

आखिरकार 13 दिसंबर को वीपी सिंह सरकार झुक गई। पाँच आतंकियों को रिहा किया गया, बदले में रूबिया घर लौट आईं। लेकिन इस सौदे ने कश्मीर का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी घटना ने आतंकियों के हौसले बुलंद कर दिए।

यासीन मलिक था अपहरण केस का मास्टरमाइंड, खुद रूबिया ने की थी पहचान

इस सौदे के केंद्र में था जेकेएलएफ का चीफ यासीन मलिक। मलिक पर अपहरण का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, दिसंबर 1989 के पहले हफ्ते में मलिक और उसके साथियों ने साजिश रची। रूबिया को निशाना बनाकर सरकार को ब्लैकमेल करने का प्लान था।

मलिक ने खुद को अपहरण की योजना का सूत्रधार बताया। 2022 में रूबिया ने टाडा कोर्ट में मलिक समेत चार आरोपितों की पहचान की। उन्होंने कहा, “यही वो लोग थे जिन्होंने मुझे अगवा किया।” रूबिया का यह बयान केस को मजबूत करने वाला साबित हुआ। “

यासीन मलिक की भूमिका सिर्फ अपहरण तक सीमित नहीं थी। वह जेकेएलएफ का चेहरा था, जो पाकिस्तान समर्थित आतंक को कश्मीर में फैला रहा था। मलिक ने अपहरण को एक राजनीतिक हथियार बनाया। रिहाई के बाद रिहा हुए आतंकी जैसे अली मोहम्मद मीर, मोहम्मद यासिन फतेह और इकबाल अहमद गंदरू ने जेकेएलएफ को नई ताकत दी। मलिक ने इन्हें हथियारों से लैस किया और हमलों की साजिशें रचीं।

मलिक की गिरफ्तारी के बाद दोबारा खुली फाइल

साल 2019 में मलिक की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने पुरानी फाइलें खोलीं। जनवरी 2024 में मलिक समेत 10 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इसमें अपहरण, साजिश और बंधक बनाने के आरोप हैं। अब उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकी मलिक ने कभी अपराध नहीं माना, लेकिन गवाहों के बयानों ने उसे आखिरकार न्याय के कटघरे में खड़ा कर दिया।

रूबिया अपहरण केस के बाद कश्मीर में हिंदुओं पर हुआ जुल्म

इस अपहरण ने कश्मीर में आतंकवाद को तेजी से बढ़ावा दिया। पहले कश्मीर में अलगाववाद था, लेकिन 1989 के बाद यह हिंसा का सैलाब बन गया। रिहा हुए आतंकियों ने नई भर्तियाँ कीं, हथियारों का जखीरा बढ़ाया। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सौदे ने आतंकियों को संदेश दिया- सरकार झुक सकती है। नतीजा? 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो गया।

जेकेएलएफ ने हिंदू परिवारों पर हमले किए, हजारों घर जलाए। मलिक पर कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का भी आरोप है। सरकार ने 2019 में जेकेएलएफ को आतंकी संगठन घोषित किया। गृह मंत्रालय ने कहा, “यह संगठन 1989 के पंडित जेनोसाइड, आईएएफ अधिकारियों की हत्या और रूबिया अपहरण के लिए जिम्मेदार है।”

कश्मीर में आई अपहरण की बाढ़, हर तरफ आतंकी ही आतंकी

अपहरण के बाद किडनैपिंग की होड़ लग गई। 1991 में आईएएस अधिकारी ए.के. भट्टाचार्य का बेटा अपहरण हुआ। 1992 में वीसी चिल्टन का बेटा। ये सभी जेकेएलएफ की साजिशें थीं। मलिक ने इनसे फंडिंग और हथियार जुटाए। कश्मीर घाटी में ग्रेनेड हमले, सड़क किनारे बम विस्फोट आम हो गए। 1989 से 1990 के बीच आतंकी घटनाएं दोगुनी हो गईं।

पीआईबी के अनुसार, 1989 में 200 से ज्यादा हमले हुए, जो 1990 में 1000 पार कर गए। मलिक की रणनीति थी- हाई-प्रोफाइल टारगेट चुनो, सरकार को मजबूर करो। इसने अलगाववाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर पाकिस्तान को मजबूत किया।

कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने की वजह सिर्फ अपहरण नहीं, बल्कि मलिक जैसी साजिशें थीं। 1989 के बाद जेकेएलएफ ने आईएएफ के चार अधिकारियों की हत्या की। मलिक पर यह केस भी चल रहा है। एनआईए ने 2019 में मलिक को टेरर फंडिंग में उम्रकैद दी। ओपन मैगजीन के अनुसार, मलिक ने अपहरण से कश्मीर को ‘कॉन्सपिरेटर’ बना दिया।

इस अपहरण कांड के बाद बढ़ा था कश्मीर में आतंकवाद

सीबीआई की यह कार्रवाई दिखाती है कि कानून कभी सोता नहीं। शुंगलू की पूछताछ से बाकी फरार जैसे अली मोहम्मद मीर तक पहुँच बन सकती है। मलिक की साजिश ने कश्मीर को आग में झोंक दिया, लेकिन अब न्याय की बारी है। कश्मीर के इतिहासकार कहते हैं कि अपहरण ने ‘अलगाववाद से आतंकवाद’ का रास्ता खोला। 1990 में 1 लाख पंडित बेघर हुए। जेकेएलएफ ने 1000 से ज्यादा हमले किए। मलिक ने पाकिस्तान से ट्रेनिंग ली, हथियार मँगवाए।

बहरहाल, ताजा गिरफ्तारी से केस में नया मोड़ आ गया है। शफत अहमद शुंगलू पर अपहरण में सहयोग का आरोप है। एक चश्मदीद गवाह ने कहा, “मैंने 1989 के बाद सोपोर में शुंगलू को देखा।” कुछ आरोपित धारा 164 के तहत जुर्म कबूल कर चुके हैं। वहीं, सीबीआई इस केस को टाडा कोर्ट में चला रही है। जिसमें जनवरी 2021 में कोर्ट ने मलिक समेत 10 के खिलाफ आरोप तय किए थे। अब अगली सुनवाई में शुंगलू की भूमिका खुल सकती है।

क्या इसीलिए UAPA का विरोध करती थी कश्मीर टाइम्स की एडिटर आभा भसीन? SIA ने देश विरोधी गतिविधियों में दर्ज किया केस

        कश्मीर टाइम्स की एक्क्यूटिव एडिटर आभा भसीन (साभार- X-@AdityaRajKaul/outlook india)
19 नवंबर को जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने कश्मीर टाइम्स के जम्मू कार्यालय पर छापा मारा। यह कार्रवाई आतंकी फंडिंग, ‘राष्ट्रविरोधी’, जिहादी विचारधारा को बढ़ावा देने और ‘अलगाववादी गतिविधियों’ की जाँच के तहत की गई।

इसके बाद कश्मीर टाइम्स से जुड़े लोगों समेत एग्जीक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन के खिलाफ कठोर गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम- UAPA के तहत FIR दर्ज की है।

अधिकारियों के अनुसार, दर्ज FIR में अनुराधा पर आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया था। ऑफिस की तलाशी के दौरान एक रिवॉल्वर, खाली और भरी हुई AK-सीरीज की गोलियाँ, चली हुई गोलियाँ, संदिग्ध पिस्तौल कारतूस, ग्रेनेड के सेफ्टी लीवर, डिजिटल उपकरण और दस्तावेज बरामद किए गए।

कश्मीर टाइम्स की मैनेजिंग एडिटर अनुराधा भसीन ने इसे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने, बदनाम करने और चुप कराने की कोशिश’ बताया। यह अखबार 1954 में उनके पिता वेद भसीन ने स्थापित किया था। 2021-22 में लगातार निशाना बनाए जाने के बाद इसका प्रिंट संस्करण बंद कर दिया गया।

अनुराधा भसीन और कश्मीर टाइम्स पर आरोप है कि वे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ के नाम पर एंटी इंडिया प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार वेद भसीन द्वारा स्थापित और अब उनकी बेटी अनुराधा भसीन की ओर से चलाया जा रहा यह अखबार पहले भी विवादों में रहा है। 2020 में इसका श्रीनगर कार्यालय सील कर दिया गया था।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने कश्मीर टाइम्स को दो संपत्तियाँ आवंटित की थीं। एक कार्यालय के लिए और दूसरी वेद भसीन के निवास के लिए। 2015 में वेद भसीन की मृत्यु के बाद प्रशासन ने परिवार को आवास खाली करने का नोटिस दिया। अनुराधा भसीन ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अखबार का श्रीनगर कार्यालय ‘गैरकानूनी तरीके से बंद’ कर दिया।

इसके बाद 2023 में इसका डिजिटल संस्करण शुरू किया गया। भसीन और सह-संपादक और अनुसार अनुराधा के पति प्रबोध जम्वाल ने यह आरोप खारिज किया कि अखबार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देता है या अलगाववादी नैरेटिव चलाता है। असल में, यह अखबार कश्मीर के दोनों हिस्सों (LoC से अलग हुए हिस्से) की रिपोर्टिंग करता है और पाकिस्तान-प्रशासित हिस्से पर भी सवाल उठाता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुराधा इस समय अमेरिका में हैं। SIA ने अनुराधा भसीन और उनके अखबार कश्मीर टाइम्स पर आरोप लगाया है कि वे जम्मू-कश्मीर के आसपास के इलाकों में अलगाव वादी और राष्ट्रविरोधी लोगों के साथ आपराधिक साजिश में शामिल हैं। SIA उनसे पूछताछ कर सकती है।

10 नवंबर को दिल्ली के लालकिले के पास हुए बड़े कार धमाके की जाँच चल रही है। इस जिहादी आतंकी हमले में 13 लोग मारे गए थे। हमले का मुख्य आरोपी डॉ. उमर-उन-नबी था, जो कट्टरपंथी डॉक्टरों और मौलवियों के ‘व्हाइट कॉलर’ मॉड्यूल का हिस्सा था। इस दौरान कश्मीर टाइम्स पर कार्रवाई हो रही है।

अधिकारियों के अनुसार यह मॉड्यूल बड़े आतंकी हमलों की योजना बना रहा था। जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े कई डॉक्टरों से लगभग 3000 किलो विस्फोटक और हथियार बरामद किए गए। यह मॉड्यूल हमास की शैली में हमला करने की तैयारी कर रहा था। ऐसा ही हमला अक्टूबर 2023 में इजरायल पर हुआ था।

अनुराधा ने पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक समय बिताया है और खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ की आवाज बताती हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई फेलोशिप हासिल की हैं और कश्मीर संघर्ष पर लिखती रही हैं।

किन विवादों का हिस्सा रहीं अनुराधा भसीन

2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जब केंद्र सरकार ने सुरक्षा कारणों से कम्यूनिकेशन (संचार) बंदी लागू की तो अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ कदम’ माना गया और इससे से भी जाहिर हुआ कि वे अलगाववादियों की भाषा बोल रही हैं।
पहलगाम हमले के बाद भसीन का तर्क दिया कि हर आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई मानने की घोषणा करके भारत सरकार ने युद्ध की सीमा को कम कर दिया है और पाकिस्तान को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया। भसीन का कहना था कि मोदी सरकार ‘आतंकी हमलों पर फलती-फूलती है’।
17 नवंबर 2025 को अनुराधा भसीन ने पाकिस्तान-समर्थित और इस्लामी मानसिकता से भरा हुआ एक लेख लिखा। इसका शीर्षक था- ‘Inventing an Enemy Within: ‘White Collar Hate’ to Combat ‘White Collar Terror’’। इस लेख में भसीन ने तर्क दिया कि दिल्ली धमाके के बाद ‘व्हाइट कॉलर टेररिज्म’ के नाम पर सभी मुसलमानों के खिलाफ इस्लामोफोबिया फैलाया जा रहा है।
भसीन ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार दिल्ली हमले के बाद जनता के गुस्से को निकालने के लिए एक खलनायक खड़ा करना चाहती है। इसीलिए मुसलमानों और खास तौर पर पढ़े-लिखे मुसलमानों को भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरे के रूप में पेश किया जा रहा है।
अनुराधा भसीन ने पाकिस्तान की फौज की बड़ाई करने से नहीं थकतीं। अपने लेख में उन्होंने यह भी कहा कि भारत को पता है कि दुनिया साउथ एशिया में परमाणु टकराव नहीं चाहती। साथ ही पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को भी कम करके नहीं आँका जा सकता।
फरवरी 2024 में अनुराधा भसीन ने कारवां इंडिया का एक प्रोपेगेंडा आर्टिकल साझा किया। इसमें दावा किया गया था कि भारतीय सेना अपने नागरिकों को प्रताड़ित करती है और फिर उनकी हत्या करती है।
कश्मीर टाइम्स पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर को ‘पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू और कश्मीर’ कहता है। अपनी रिपोर्ट्स में अखबार कभी ‘PaJK’ लिखता है या फिर लिखता है, “भारत इसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहता है।”
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Kashmir Times Office Raid: जम्मू में कश्मीर टाइम्स के दफ्तर पर छापा, AK-47 और पिस्टल की गोलियां बरामद
अनुराधा भसीन अक्सर UAPA के खिलाफ आवाज उठाती हैं। वह इसे असहमति की आवाज को दबाने का हथियार कहती हैं। हालाँकि SIA की जाँच के बाद उन पर UAPA के तहत ही मामला दर्ज किया गया है। इसके बाद वामपंथी समूह अनुराधा भसीन के बचाव में उतर आया है।

क्या मुख्यमंत्री के भेष में दंगाइयों का सरगना है राष्ट्रवाद का ढोंग रचने वाला उमर अब्दुल्ला? दीवाल फाँद कर जिनकी कब्र पर फातिहा पढ़ने पहुँचे उमर अब्दुल्ला, वो शहीद नहीं ‘दंगाई’ थे

       फातिहा पढ़ते उमर अब्दुल्ला (बाएँ) और श्रीनगर की मजार (फोटो साभार: Greater Kashmir & Outlook)
कोयले को चाहे जितना भी साबुन से धोलो रहेगा काला ही। आतंकियों का सरगना चाहे कहीं भी हो अपनी पहचान जाहिर कर ही देता है, जिस तरह चोर चोरी तो छोड़ सकता है हेरफेरा नहीं। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को जेल में बंद कर किसने मारा? डॉ मुखर्जी की हत्या में शेख अब्दुल्ला के साथ कौन-कौन शामिल था? इस रहस्मयी हत्या से कब पर्दा हटेगा, कोई नहीं कह सकता? क्योकि मुस्लिम वोटों की चिंता सभी को है चाहे बीजेपी ही क्यों न हो। यही देश का विशेषकर मुसलमानों का दुर्भाग्य है कि  सच्चाई बयां करने वालो को पहले तो फिरकापरस्त, शांति का दुश्मन, साम्प्रदायिक, गंगा-जमुनी तहजीब का दुश्मन आदि आदि नामों से अलंकृत किया जाता था लेकिन आज चल रहा है "सिर तन से जुदा गैंग'।           

केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार (14 जुलाई, 2025) को श्रीनगर की एक मजार पर जाकर फूल चढ़ाए हैं। उन्होंने यहाँ फातिहा भी पढ़ा है। यहाँ पहुँचने के लिए उन्होंने पुलिस से लड़ाई झगड़ा, दीवाल फांदी और श्रीनगर के भीतर काफी हंगामा किया।

उमर अब्दुल्ला ने ‘नक्शाबाद साहिब’ कही जाने वाली इस मजार पर फूल चढ़ाने और इन कथित शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक्स (पहले ट्विटर) पर भी खूब बवाल किया और दावा किया कि उन्हें नजरबन्द किया गया है। उनकी सरकार में शामिल कई और लोगों ने भी यही दावे किए। दंगाइयों के समर्थकों का नज़रबंद ही रहना बेहतर है। 

यह सभी इस ‘शहीदों’ वाली मजार पर श्रद्धांजलि देना चाहते थे। इससे पहले उन्होंने जिला प्रशासन से इसकी अनुमति माँगी थी, जिसके लिए इनकार कर दिया गया था। जिस मजार पर उमर अब्दुल्ला ने यह फूल चढ़ाए हैं, उन्हें वह ’13 जुलाई के शहीद’ कहते हैं जबकि असल में यह दंगाई थे। यह लोग 1931 में मारे गए थे।

क्यों हो रहा 13 जुलाई पर बवाल?

इस पूरे बवाल की जड़ 9 दशक पहले की एक तारीख 13 जुलाई, 1931 से जुड़ी है। दरअसल, 13 जुलाई, 1931 को श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बार महाराजा हरि सिंह की सेना ने 21 इस्लामी दंगाइयों को गोली मार दी थी। यह इस्लामी दंगाई जेल पर हमला करने आए थे और महाराजा हरि सिंह का तख्तापलट करना चाहते थे।

1948 में जब जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हो गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य की सत्ता में आई तो इन्हें शहीद का दर्जा दे दिया गया। इस दिन राज्य में छुट्टी भी घोषित की गई। इनको ‘लोकतंत्र’ के लिए आंदोलन करने वाला क्रांतिकारी बताया गया। इनके लिए एक सूफी संत की मजार के पास एक स्मारक भी बनाया गया था।

अब इसी स्मारक पर उमर अब्दुल्ला श्रद्धांजलि देना चाहते थे, जिसकी अनुमति न मिलने पर हंगामा हुआ।

क्या है 13 जुलाई के शहीदों की सच्चाई

कश्मीर में कट्टर मानसिकता वाले लगातार 13 जुलाई की घटना को महाराजा हरि सिंह के खिलाफ क्रान्ति और जनआंदोलन करार देते हैं। इसे ‘कश्मीर शहीद दिवस’ बताते हैं। कहा जाता है कि यह महाराजा के कथित क्रूर शासन के खिलाफ एक विद्रोह था। जबकि असल में यह एक ‘काफिर’ हिन्दू शासक के खिलाफ लड़ाई थी।

इस सम्बन्ध में कश्मीरी पंडित एक्टिविस्ट सुशील पंडित ने एक लेख में काफी अच्छे से समझाया था। वो मानते हैं कि आधुनिक कश्मीर का पहला नरसंहार तभी हुआ था, वो भी पूरी साजिश के साथ। सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई, ज़िंदा जला दिया गया, विकलांग बना दिया गया और नदी में फेंक दिया गया।

महिलाओं का यौन शोषण और बलात्कार हुआ। कइयों के घर लूट लिए गए तो कइयों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने बताया है कि कैसे जब पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई की तो उनमें से कुछ की मौत हो गई, जिसके बाद उनके गिरोह द्वारा उन्हें ‘शहीद’ बता दिया गया।

स्वतंत्र भारत में जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने उन आतंकियों के कृत्यों को ‘पवित्र’ बनाने के लिए नायकों की तरह उनका सम्मान करते हुए 13 जुलाई को उन्हें याद किया जाने लगा। आइए, अब जानते हैं कि असल में उस दिन हुआ क्या था। उस समय जम्मू कश्मीर के स्वायत्त राजा थे हरि सिंह।

तब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख, गिलगिट-बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद-मीरपुर और अक्साई चीन के अलावा शक्सगाम घाटी के इलाके भी उनके क्षेत्र का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन, अंग्रेज उनसे कुछ इलाके छीनना चाहते थे। महाराजा हरि सिंह उन दुर्लभ राजाओं में से एक थे, जिनका शासन मुस्लिम बहुल इलाके में था। इसीलिए, अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत पेशवर के एक अहमदी अब्दुल क़दीर को खानसामा के वेश में श्रीनगर में स्थापित कर दिया।

इसके बाद ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ के शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को भी लाया गया। वो एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति हुआ करता था, जिसकी पुश्तें आज भी जम्मू कश्मीर को अपनी बपौती समझती हैं। ख़ानक़ाह मोहल्ला स्थित ‘शाह-ए-हमदान’ में एक सार्वजनिक सभा हुई, जहाँ अब्दुल क़दीर ने एक भड़काऊ भाषण दिया। महाराजा के विरुद्ध जंग के लिए कुरान का हवाला दिया गया। उसने भड़काया कि एक ‘काफिर’ कैसे मुस्लिमों के ऊपर राज कर सकता है, इसकी इस्लाम में सख्त मनाही है।

कानून के अनुसार जिस गोहत्या पर प्रतिबंध था, उसके लिए उसने मुस्लिमों को खुल कर उकसाया। उसे जब राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो दंगे भड़क गए। कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिशें हुईं। मज़बूरी में जेल परिसर में ही सुनवाई होती थी। 13 जुलाई को भी एक ऐसी ही सुनवाई थी। लेकिन, भीड़ ने वहाँ हमला कर दिया और जज के चैंबर में घुसने की कोशिश करने लगे। भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया और आगजनी शुरू कर दी।

जैसा कि आज भी होता है, जम कर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी भी शुरू कर दी। जेल के कैदियों ने भी वहाँ से भागने का प्रयास शुरू कर दिया। पुलिस बल ने सारे पैंतरे आजमा लिए, लेकिन मुस्लिम भीड़ तितर-बितर नहीं हुई। कुछ कैदियों को भगा भी दिया गया। इसके बाद स्थानीय DM ने गोली चलाने के आदेश दिए। हरि पर्वत किले की तरफ भी भीड़ चल पड़ी थी। लाठीचार्ज का कोई असर नहीं हो रहा था। महराजगंज तब व्यापारियों का अड्डा हुआ करता था, जहाँ जम कर लूटपाट मचाई गई।

सुशील पंडित लिखते हैं कि इसके बाद भोरी कदल से लेकर आईकदल तक एक लंबी दूरी में हिन्दुओं की दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया और चीजें लूट ली गईं। सफाकदल, गंजी, खुद और नवाकदल जैसे इलाकों में भी जम कर लूटपाट हुई। बाजार में बही-खातों को जला दिया गया और हिन्दू दुकानदारों में भगदड़ मच गई। लाखों के सामान लूट लिए गए, ये सड़कों पर तहस-नहस कर के फेंक दिए गए। हालाँकि, इस दौरान किसी मुस्लिम के दुकान में घुस कर लूटपाट की कोई खबर नहीं आई।

श्रीनगर के विचारनाग में मुस्लिम भीड़ अलग से जुटी हुई थी। वहाँ समृद्ध हिन्दुओं के साथ अत्याचार किया गया और उनकी महिलाओं का यौन शोषण हुआ। जब तक सेना आई, तब तक मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं का बड़ा नुकसान कर दिया था। इसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ गिरोह काम पर लगा और उसने इसे ‘सामंती सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक विद्रोह’ नाम दे दिया। याद कीजिए, मोपला मुस्लिमों द्वारा केरल में किए गए बड़े स्तर के नरसंहार को भी ‘जमींदारों के खिलाफ किसानों का विद्रोह’ कह दिया गया था।

जबकि, असल में कश्मीर में 13 जुलाई, 1931 को जो भी हुआ, वो एक हिन्दू राजा के विरुद्ध इस्लामी जंग था। शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह का भी इन दंगों को भड़काने में बड़ा हाथ था। उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया। हालाँकि, अगले ही साल महाराजा ने उसे माफ़ी दे दी और उसने ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ का गठन कर के लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। मीरपुर में हिन्दुओं ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की। बाद में उनमें से सैकड़ों को शरणार्थी बन कर रहना पड़ा।

हिन्दुओं के गाँव जलाए, मंदिर तोड़े

उस समय इस घटना को देखने वाले बुजुर्गों ने बताया था कि कैसे कइयों को बेरहमी से मार डाला गया और इस्लाम अपनाने को भी कइयों को मजबूर किया गया। मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आईं। गुरुग्रंथ साहिब सहित कई पवित्र सनातनी पुस्तकों को जला दिया गया और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित किया गया। इसे ’88 ना शौरांश’ कहते हैं, अर्थात 88 का नरसंहार। विक्रम संवत के हिसाब से तब 1988 चल रहा था।
उस घटना के बाद के सैकड़ों परिवार और उनकी पुश्तें दशकों तक पुनर्वास के लिए संघर्ष करती रहीं। खुद अंग्रेजी रिकार्ड्स की मानें तो 31 मंदिरों-गुरुद्वारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। 600 के आसपास जबरन इस्लामी धर्मांतरण के मामले सामने आए। सुक्खचैनपुर और संवल (मीरपुर) के हिन्दुओं को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अंग्रेज लिखते हैं कि जहाँ भी दंगाई पहुँचे, स्थानीय मुस्लिम जनसंख्या ने उनका साथ दिया।
कुछ हिन्दुओं के गाँवों को तो एकदम से वीरान ही बना दिया गया, ऐसी लूटपाट और तबाही मचाई गई। इसके बाद 18 जनवरी, 1932 को भी हिन्दुओं के 50 गाँवों पर हमला हुआ और 300 घरों को लूटा गया। इनमें से 40 को आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं, 40 हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बनाया गया। थन्ना गाँव में 20 जनवरी, 1932 को फिर से 36 घरों में लूटपाट हुई और 8 को फूँक दिया गया। सोहाना गाँव में 84 घरों में लूटपाट हुई और एक अन्य गाँव में 28 जनवरी को लूटपाट हुई।
जिस कश्मीर को महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानों के चंगुल से छुड़ाया था और फिर डोगरा राजाओं ने हिन्दू शासन की स्थापना की, वहाँ के गैर-मुस्लिमों को सदियों के अत्याचार से राहत मिली। लेकिन, इस घटना के बाद से पुनः कश्मीर में पंडितों का नरसंहार शुरू हो गया। वहाँ भारत का संविधान स्वतंत्रता के बाद भी लागू नहीं हो पाया और मुट्ठी भर अलगाववादियों के अलावा अब्दुल्लाह-मुफ़्ती मिल कर यहाँ इस्लामी शासन चलाते रहे।

मोदी सरकार में रुका गद्दारों का सम्मान

जुलाई 2020 में ऐसा पहली बार हुआ, जब कश्मीर में दंगाइयों को श्रद्धांजलि नहीं दी गई। मोदी सरकार के कारण ये संभव हो पाया। आधुनिक कश्मीर में हिन्दुओं को संगठित तरीके से खदेड़ना के कार्य तभी शुरू हुआ था। अंग्रेजों के षड्यंत्र और इस्लामी भीड़ की हिंसा ने एक हिन्दू सत्ता को उखाड़ने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार किया और बाद में ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसे एक अलग रंग दिया। महाराजा हरि सिंह ने इन घटनाओं की जाँच के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बरजोर दलाल की अध्यक्षता वाली एक समिति को दी।
महाराजा हरि सिंह ने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भारतीय एकता की बात की थी, उसी के बाद अंग्रेज सेनाधिकारी मेजर बोट ने अब्दुल कदीर नाम के पठान को वहाँ लाकर बसाया। ये सब एक साजिश का हिस्सा था। ब्रिटिश ने सत्ता सँभालने के बाद अब्दुल कदीर को 1.5 साल में ही रिहा कर दिया, जबकि उसे 5 साल की जेल हुई थी।
कादियाँ नगर के अहमदिया समुदाय ने इस पूरे मामले में अंग्रेजो की खासी मदद की। इस रिपोर्ट में पता चला कि अंग्रेज अधिकारी वेकफील्ड जानबूझ कर उस दिन जेल के पास स्थिति को काबू करने नहीं गया, जबकि सुरक्षा का नियंत्रण उसके पास ही था।
4 जुलाई, 1931 को कुरान की बेअदबी की खबर सामने आई, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। लेकिन, वेकफील्ड ने जाँच के बाद कुरान के तौहीन की बात प्रचारित की और मुस्लिमों को भड़काया। श्रीनगर में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ भड़काऊ सामग्रियाँ भेजी गईं। वेकफील्ड की जगह प्रधानमंत्री बनाए गए हरि कृष्ण कौल ने मुस्लिम दंगाइयों से राज्य का समझौता कराया, लेकिन दंगे नहीं रुके। देश के कई हिस्सों में इस्लामी दंगों का पैटर्न यही रहा है, आज भी यही है।

ऐसी कौन सी डॉक्टरी पढ़ाता है ईरान जो शिया मुल्क की दौड़ लगाते हैं कश्मीरी, 100+ छात्रों को आर्मेनिया के रास्ते निकाला: इजरायली हमलों के बीच भारत ने शुरू किया ‘ऑपरेशन सिन्धु’

ऑपरेशन सिंधु (फोटो साभार- एक्स/ @DDIndialive)
इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के बाद भारत ने अपने नागरिकों को निकालना चालू कर दिया है। भारत ने अपने नागरिकों को युद्धग्रस्त ईरान से निकालने के लिए ‘ऑपरेशन सिन्धु’ लॉन्च किया है। भारत ने अपने 100+ नागरिकों को ईरान से निकाल भी लिया है। इन्हें आर्मेनिया के रास्ते निकाला गया है।

लगभग 110 भारतीय छात्र, जो ईरान के विभिन् विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे थे, उन्हें दूतावास की मदद से पहले सीमा पार कर आर्मेनिया पहुँचाया गया और अब सभी विशेष उड़ान से भारत लौट आए हैं। इन छात्रों को लेकर पहली फ्लाइट आर्मेनियाई राजधानी येरेवन से बुधवार (18 जून 2025) को दिल्ली पहुँचे।

ईरान और आर्मेनिया ने इस मामले में भारत की काफी सहायता की है। ईरान ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह भारत के छात्रों को बाहर निकालने के लिए अपने दरवाजे खुले रखेगा और इसी प्रतिबद्धता को निभाते हुए उसने भारतीय मिशन को हरसंभव सहायता दी।

ईरान से सुरक्षित निकाले गए छात्र

तेहरान में स्थित भारतीय दूतावास ने तनाव के बाद बिगडती स्थिति को देखते हुए 110 भारतीय छात्रों को तुरंत शहर से बाहर निकालने की योजना बनाई। इन छात्रों को सुरक्षित रास्ते से आर्मेनिया ले जाया गया और फिर वहाँ से भारत भेजा गया।

निकाले गए छात्रों में से ज्यादातर उर्मिया मेडिकल यूनिवर्सिटी के हैं। इनमें से करीब 90 छात्र जम्मू-कश्मीर के हैं। ईरान से निकाले गए छात्र तमहीद मुगल ने बताया कि वे सभी भारत सरकार के इस त्वरित कदम के लिए आभारी हैं। उन्होंने कहा कि कहा कि इस मुश्किल समय में सरकार ने उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

भारतीय छात्र ईरान में क्या करने जाते हैं?

ईरान में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र मेडिकल शिक्षा के लिए जाते हैं। उर्मिया, तेहरान, मशहद जैसे शहरों में कई मेडिकल विश्वविद्यालय हैं जहाँ छात्र एमबीबीएस और अन्य मेडिकल डिग्रियों की पढ़ाई करते हैं। यहाँ फीस कम होती है और एडमिशन प्रक्रिया भी सरल होती है, जिससे मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों के लिए यह एक आसान विकल्प बन जाता है।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में जहाँ MBBS की पढ़ाई की फीस ₹1 करोड़ जाती है तो वहीं ईरान में यह ₹14 लाख से ₹30 लाख तक में ही हो जाता है। बताया गया है कि यहाँ मेडिकल की शिक्षा बांग्लादेश से भी सस्ती है। इसके अलावा ईरान, बांग्लादेश के मुकाबले कहीं अधिक विकसित है।

कुछ लोगों का दावा है कि ईरान जम्मू-कश्मीर से ईरान जाने वाले शिया छात्रों को सब्सिडी भी मिलती है। बताया गया है कि ईरान में वर्तमान में 2000 भारतीय छात्र पढ़ते हैं। ईरान का मेडिकल शिक्षा क्षेत्र भारत में मान्यता प्राप्त है और छात्रों को विदेश में अच्छी शिक्षा मिलती है।

यहाँ के कई विश्वविद्यालय विश्व में मान्यता रखते हैं। हालाँकि, इस बार के हालात असामान्य हैं और क्षेत्र में बढ़ते युद्ध के खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने एहतियातन छात्रों को बाहर निकालने का फैसला लिया। अब इन्हें ऑपरेशन सिंधु के तहत बाहर निकाला जाएगा।

जम्मू के आप शंभू मंदिर के भीतर नहीं घुस पाई जेहादी पाकिस्तानी की नापाक मिसाइल, दरवाजे पर ही हुए टुकड़े

                जम्मू कश्मीर का आप शंभु मंदिर (लेफ्ट), सिरसा में ही 'फतेह-2' को मार गिराया (राइट)
इतिहास लिखा नहीं जाता दोहराया जाता है। गाज़ियों(मुग़ल) के कदमों पर चलते पाकिस्तान की जेहादी जहरीली मानसिकता को देख पाकिस्तानपरस्तों को होश में आना चाहिए। इजराइल को गालियां देने वालों अपने लाडले पाकिस्तान की जहरीली हरकतों पर क्यों नहीं बोलते? क्यों नहीं पाकिस्तान जाकर उससे पूछते कि क्यों स्कूलों और शहरी इलाकों में बमबारी कर बेकसूर नागरिकों को मारा जा रहा है? पाकिस्तान की जहरीली हरकत को रक्षा मंत्री 
ख्वाजा आसिफ ने अपनी ही पार्लियामेंट में कहा कि "जरुरत पड़ने पर मदरसों के लड़कों को भी सरहद पर भेजा जा सकता है।" पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने मदरसों में दी जाने वाली तालीम को कबूल कर लिया है। 
हमारा प्रधानमंत्री बुजदिल है मोदी का नाम लेने से डरता है--पाकिस्तानी सांसद, संसद में   

दूसरे, भारत में पल रहे पाकिस्तानपरस्तों को पाकिस्तान संसद में उनके ही सांसद अपने प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।  

भारत-पाक तनाव के बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक पाकिस्तानी सांसद अपने प्रधानमंत्री को बुजदिल बता रहा है। यह वीडियो पाकिस्तानी संसद का है। इस वीडियो में वहां के सांसद शाहिद खट्टर अपने प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की तुलना गीदड़ से कर रहे हैं और उन्हें बुजदिल बता रहे हैं। शाहिद खट्टर ने यह भी कहा कि हमारे पीएम तो नरेन्द्र मोदी का नाम भी नहीं ले सकते हैं, उन्हें डर लगता है। सोशल मीडिया पर लोग इस वीडियो के शेयर कर पाकिस्तानी पीएम पर तंज कस रहे हैं। आप भी देखिए…

खैर, आतंकी पाकिस्तान जिस तरह मन्दिरों और गुरुद्वारों को निशाना बना रहा है। 1965 में भी जेहादी पाकिस्तान ने जम्मू में माता वैष्णो मन्दिर पर हमला किया था। भारत में पाकिस्तान के दलाल जो अपनी कुर्सी की खातिर सनातन को कलंकित करने का कोई मौका नहीं चूकते उन्हें देखना चाहिए कि जम्मू के आप शम्भू मंदिर में दागी मिसाइल मंदिर के द्वार पर ही टुकड़े-टुकड़े हो गयी। इतना ही नहीं राजस्थान एक मंदिर में भी दागे गए बमों का अम्बार देखा जा सकता है। मंदिर में इतने बम दागे गए लेकिन फटा एक भी नहीं।        

शुक्रवार (9 मई 2025) की रात अचानक एक खबर फैली कि पाकिस्तान ने दिल्ली एयरपोर्ट की तरफ फतेह-2 नाम की एक बैलिस्टिक मिसाइल दागी है। इस खबर से लोगों में डर और गलत जानकारी फैलने लगी। इसकी पुष्टि दिल्ली एयरपोर्ट के अधिकारियों ने तुरंत की और इस खबर को गलत साथ ही गैर-जिम्मेदाराना बताया है।

उन्होंने लोगों से अपील की है, कि हमले से जुड़ी अफवाहों पर बिल्कुल ध्यान न दें। इसके अलावा सही खबरों के लिए सिर्फ आधिकारिक सोर्स पर ही भरोसा करें। एयरपोर्ट पर उड़ानें सामान्य रूप से जारी रहीं और कामकाज में कोई रुकावट नहीं आई।

रक्षा सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने जो मिसाइल दागी थी, वह दिल्ली तक पहुँची ही नहीं। उसे हरियाणा के सिरसा के ऊपर ही भारत के हवाई सुरक्षा सिस्टम से मार गिराया गया है। इससे किसी भी आम नागरिक या जरूरी जगह को कोई खतरा नहीं हुआ।

पाकिस्तान माहौल खराब करने के लिए ऐसी झूठी अफवाह फैला रहा है। भारतीय सेना ने यह भी बताया कि नियंत्रण रेखा (LoC) पर ड्रोन की गतिविधियाँ और गोलाबारी भी बढ़ गई है।

सेना के सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के कई ठिकानों को भी निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन हर बार उनके हमले नाकाम कर दिए गए। कड़ी निगरानी और तैयारी की वजह से पंजाब और जम्मू में हमारे हवाई सुरक्षा सिस्टम ने दुश्मन के ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को मार गिराया।

जम्मू कश्मीर के आप शंभु मंदिर पर भी पाकिस्तान द्वारा हमले की खबर सामने आई है। ऑपरेशन सिंदूर से बौखलाए पाकिस्तान ने शंभु मंदिर के ठीक सामने गेट पर मिसाइल से हमले कर दिया। लेकिन फिलहाल किसी के हताहत होने की कोई सूचना नहीं मिली है।

सोशल मीडिया पर भी एक वीडियो काफी वायरल हो रही है। शुकवार (9 मई 2025) को ही पाकिस्तान ने लगातार दूसरी रात जम्मू कश्मीर से लेकर गुजरात तक के 26 स्थानों पर ड्रोन से हमला किया। रक्षा मंत्रालय का दावा है कि हवाई अड्डों और वायुसेना ठिकानों किए गए हमलों को हवा में ही विफल कर दिया गया। इसकी वीडियो भी जारी हुई है। वीडियो में स्थान जम्मू कश्मीर बताया गया है और उधमपुर के डिब्बर इलाके से जोरदार धमाके के बाद धुआँ उठता दिखाई दे रहा है। इसके बाद हवाई सायरन बजाए गए।

दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और जम्मू में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कुछ संवेदनशील इलाकों में रात के समय ब्लैकआउट के नियम लागू कर दिए गए हैं और निगरानी ड्रोन लगातार संदिग्ध इलाकों पर नजर रख रहे हैं।

हालाँकि, रक्षा अधिकारियों ने लोगों को विश्वाश दिलाया कि भारत के सभी हवाई ठिकाने सुरक्षित हैं और एयरपोर्ट समेत भीड़भाड़ वाले एरिया को किसी भी प्रकार का सीधा खतरा नहीं है।