दलित बच्ची का धर्मांतरण करवाने वाली दरकशा (बाएँ) और कैफ (दाएँ) को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है (फोटो साभार: Dainik Bhaskar & AI) प्रयागराज की एक 15 साल की दलित लड़की को एक मुस्लिम महिला केरल लेकर गई। यहाँ उसका इस्लाम में धर्मांतरण करवाया गया। उसको जिहादी ट्रेनिंग देने का भी प्रयास हुआ। लड़की किसी तरह बच कर वापस पहुँची। पुलिस की जाँच में सामने आया कि मुस्लिम महिला के गैंग में और भी लोग शामिल हैं और उसका काम दलित एवं गरीब बच्चों को आतंकी नेटवर्क में शामिल करवाना है। अब इस मामले में मुस्लिम महिला और उसका साथी गिरफ्तार हो गए हैं।
प्रयागराज की दलित बच्ची को फँसाया
पूरा मामला प्रयागराज के फूलपुर थाने से जुड़ा हुआ है। यहाँ लिलहट गाँव में एक दलित विधवा महिला और उसकी बेटी रहती है। बेटी की आयु मात्र 15 वर्ष है। उसके पड़ोस में ही दरकशा नाम की मुस्लिम लड़की रहती है। दरकशा बानो कथित तौर पर इस हिन्दू बच्ची की सहेली है।
दरकशा हिन्दू बच्ची के साथ रहती है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि दरकशा हिन्दू बच्ची को इस्लाम के बारे में ब्रेनवॉश किया करती थी। वह हिन्दू धर्म के प्रति जहर भी भरती थी। 8 मई, 2025 को दरकशा बानो रात 10 बजे हिन्दू बच्ची को एक शादी से लेकर फूलपुर की एक मस्जिद के पास गई।
दरकशा बानो का मददगार मोहम्मद कैफ यहाँ बाइक लेकर खड़ा था। दरकशा ने हिन्दू बच्ची को इस दौरान पाने जाल में फँसा लिया था। कैफ ने इन दोनों को प्रयागराज जंक्शन छोड़ा। रास्ते में कैफ ने हिन्दू बच्ची से छेड़छाड़ भी की। दरकशा प्रयागराज से बाद हिन्दू बच्ची को प्रयागराज से लेकर दिल्ली चली गई।
दरकशा की मंजिल लेकिन दिल्ली नहीं थी। यहाँ से वह हिन्दू बच्ची को लकर केरल के त्रिशूर चली गई। यहाँ हिन्दू बच्ची के साथ प्रताड़नाओं का दौर चालू हो गया। उसका धर्मांतरण करवाया गया। उसे आतंकी ट्रेनिंग की बात भी हुई। बच्ची किसी तरह बच के पुलिस के पास पहुँची, जहाँ से प्रयागराज सूचना परिवार के पास पहुँची। बच्ची वापस इसके बाद आ सकी।
हिन्दू पीड़िता बोली- दाढ़ी वाले जिहाद की बात करते थे
हिन्दू बच्ची ने बरामद होने के बाद बताया कि त्रिशूर में उसे एक ऐसे घर में ले जाया गया था जहाँ और भी कई नाबालिग लड़कियाँ मौजूद थीं। हिन्दू बच्ची ने यह भी बताया कि इसी घर में कई ‘बड़ी दाढ़ी वाले’ मौजूद थे। इन लोगों ने बच्ची पर इस्लाम में धर्मांतरण करने का दबाव बनाया।
बच्ची के अनुसार, ‘बड़ी दाढ़ी वालों’ ने उसको जिहादी ट्रेनिंग देने की बातें भी की। इस दौरान दरकशा वहाँ से गायब हो गई। डरी सहमी बच्ची किसी तरह यहाँ से भाग निकली। यहाँ वाल रेलवे स्टेशन पहुँची जहाँ पुलिस ने उससे जानकारी ली। इसके बाद बच्ची का प्रयागराज लौटना संभव हो पाया।
UPपुलिस बोली- केरल मॉड्यूल से जुड़ी है दरकशा
इस मामले में 28 जून, 2025 को प्रयागराज के फूलपुर थाने में FIR दर्ज करवाई गई है। FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। पुलिस से पीड़िता की माँ ने पूरी घटना बताई है, इसके साथ ही कहा है कि उसे अब फोन पर धमकियाँ मिल रही हैं। FIR में पुलिस ने दरकशा, मोहम्मद कैफ, मोहम्मद ताज समेत 4 लोगों को आरोपित बनाया गया है।
इनके खिलाफ BNS की कई धाराओं में मामला दर्ज हुआ है। इसके अलावा आरोपितों पर SC/ST एक्ट की धाराएँ लगाई गई हैं। पुलिस ने मामले दरकशा और कैफ को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस को जाँच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य पता चले हैं।
प्रयागराज के DCP कुलदीप सिंह गुनावत ने बताया है कि बानो एक संगठित गिरोह का हिस्सा है जो गरीब और दलित लड़कियों को बहला-फुसलाकर, उनका ब्रेनवॉश करके और उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करके आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल करता है।
उन्होंने शक जताया है कि दरकशा बानो केरल के एक मॉड्यूल से जुड़ी हुई है। अब इसकी जाँच 3 टीमें कर रही हैं।
जेडी वेंस, डोनाल्ड ट्रंप, एलन मस्क (फोटो साभार: NYT) इतिहास लिखा नहीं जाता दोहराया जाता है, इस कटु सच्चाई को कोई झुठला नहीं सकता। अभी कुछ ही दिन पहले बौखलाहट में पाकिस्तान बोल गया कि सोवियत संघ(Soviet Union) को तोड़ने जिस आतंकवाद के लिए पाकिस्तान से मदद ली थी। आज वही आतंकवाद अमेरिका को आग में झोंक रहा है। भारत आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहा है उसके बावजूद IMF द्वारा पाकिस्तान को अनुदान दिए जाने का विरोध नहीं किया। ट्रम्प साहब आतंकवाद आतंकवाद ही होता है। मालूम है कि पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है फिर भी अप्रत्यक्ष समर्थन दिया। अब आतंकवाद के विरुद्ध भारत की तरह आतंकवाद पर हमला बोलोगे या नहीं? यह अमेरिका की अग्नि-परीक्षा की घडी है। देखो अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध कब शंखनाद करता है?
यमन बेस्ड आतंकी संगठन अल-कायदा इन द अरेबियन पेनिनसुला (AQAP) के सरगना साद बिन आतिफ अल-अवलाकी ने एक 34 मिनट का वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में उसने अमेरिका में रहने वाले मुस्लिमों से जिहाद छेड़ने और वहाँ के बड़े-बड़े लोगों जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और टेस्ला कंपनी के मालिक एलन मस्क की हत्या करने की खुलेआम अपील की है। इस वीडियो का नाम है “इंसाइटिंग द बिलीवर्स”। इसे AQAP के समर्थक ऑनलाइन प्रोपेगेंडा का हथियार बनाकर सर्कुलेट कर रहे हैं।
साद ने इस वीडियो में कहा कि अमेरिका इजरायल और हमास के बीच चल रही जंग में इजरायल का साथ दे रहा है और इसके लिए उसका बदला लेना जरूरी है। उसने अमेरिका में रहने वाले करीब 45 लाख मुस्लिमों से कहा, “तुम्हें किसी से सलाह लेने की जरूरत नहीं, बस बदला लो! बदला लो! उन काफिर अमेरिकियों को मारो।” उसने ट्रंप, वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ और एलन मस्क को ‘धरती का कचरा’ और ‘सबसे बड़े अपराधी’ बताया। उसने इन नेताओं, उनके परिवारों और व्हाइट हाउस से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की बात कही।
साद ने गाजा में जारी जंग का जिक्र करते हुए कहा कि वहाँ मुस्लिमों पर हो रहे जुल्मों के बाद अब कोई सीमा नहीं बची। उसने कहा, “गाजा में हमारे लोगों के साथ जो हो रहा है, उसका बदला लेना जरूरी है।” उसने यहूदियों के खिलाफ भी हिंसा भड़काने की कोशिश की और कहा, “यहूदियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं छोड़नी चाहिए, जैसे उन्होंने फलस्तीनियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी।” उसने गाजा में अस्पतालों पर हो रही बमबारी का हवाला दिया और मुस्लिमों से बदला लेने की अपील की।
BREAKING: Al-Qaeda leader, Sa'ad Bin Atef Al-Awlaki, has just now called for American Muslims to wage Jihad on US soil and to assassinate President Donald Trump, Vice President J.D. Vance, and Elon musk, others. pic.twitter.com/1QQzKOWVd9
इसके साथ ही साद ने हाल के कुछ हमलों की तारीफ भी की। उसने जुलाई 2024 में ट्रंप पर हमले की कोशिश और मई 2025 में वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के कर्मचारियों पर हुए हमले का जिक्र किया। उसने इन हमलों को सही ठहराया और कहा कि ऐसे और हमले होने चाहिए।
साद ने सिर्फ लोगों पर हमले की बात नहीं की, बल्कि उसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सरकार को भी नुकसान पहुँचाने की बात कही। उसने हैकर्स से कहा कि वो अमेरिका और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बनाएँ। उसने माइक्रोसॉफ्ट और एलन मस्क की कंपनियों जैसे टेस्ला को भी ‘वैध निशाना’ बताया। उसने AQAP की पत्रिका ‘इंस्पायर’ का जिक्र करते हुए लोगों को बम बनाने की तकनीक सीखने की सलाह दी, ताकि वो हमले कर सकें।
ये वीडियो ऐसे समय में आया है, जब AQAP को पिछले कुछ सालों में काफी कमजोर माना जा रहा है। अमेरिका के ड्रोन हमलों और संगठन के अंदर आपसी झगड़ों की वजह से इसकी ताकत कम हुई है। फिर भी संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, AQAP के पास अभी भी 3,000 से 4,000 सदस्य हैं। अमेरिका ने AQAP को विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है। ये संगठन 2009 में यमन और सऊदी अरब के अल-कायदा ग्रुपों के गठजोड़ (विलय) के बाद बना था।
विशेषज्ञों का मानता है कि साद गाजा का मुद्दा उठाकर यमन के हूती विद्रोहियों की बढ़ती लोकप्रियता को चुनौती देना चाहता है। हूती विद्रोही भी इजरायल के खिलाफ हमले कर रहे हैं, और साद को लगता है कि हूतियों की लोकप्रियता से AQAP की अहमियत कम हो रही है। जानकारों का मानना है कि ये वीडियो AQAP की तरफ से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश है।
साद बिन आतिफ अल-अवलाकी कौन है?
साद बिन आतिफ अल-अवलाकी यमन के शबवा प्रांत के अल-शुबाह इलाके की अल-अवालिक जनजाति से है। वो 2024 में AQAP का नेता बना, जब संगठन का पुराना सरगना खालिद अल-बतरफी मर गया। इससे पहले साद AQAP की शूरा परिषद का हिस्सा था और हमलों की योजना बनाने में शामिल था। वो अनवर अल-अवलाकी का रिश्तेदार है, जो एक कुख्यात आतंकी था और 2011 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था। अमेरिका ने साद पर 60 लाख डॉलर का इनाम रखा है, क्योंकि उसने पहले भी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की बात कही थी।
REWARD! Up to $6M 💰 for information on terrorist SA'AD BIN ATEF AL-AWLAKI. He has publicly called for attacks against the U.S. and our allies. Got info on him? SEND US A TIP! https://t.co/zfCv4LhtVNpic.twitter.com/9NRDrLFik7
साद का जन्म यमन में हुआ था और वो अल-कायदा की विचारधारा को फैलाने में हमेशा सक्रिय रहा है। 2023 में भी वो एक वीडियो में दिखा था, जिसमें उसने यमन की दक्षिणी जनजातियों से संयुक्त अरब अमीरात और दक्षिणी परिषद के खिलाफ लड़ने को कहा था। उसका संगठन अपने खर्चे चलाने के लिए बैंक लूट, हथियार तस्करी और फिरौती जैसे अपराध करता है।
बाबा रामदेव के बयान पर दिल्ली हाई कोर्ट को सच्चाई जानने की कोशिश क्यों नहीं की? रूह अफ़ज़ा का निर्माता मुसलमान है तो फटकार दो सच्चाई बताने वाले को। क्या यही कानून है? क्या कोर्ट ने हमदर्द के खाते जांचने के आदेश दिए? यदि नहीं तो क्यों? आज से लगभग 40 पूर्व हिन्दी साप्ताहिक पाञ्चजन्य ने इसी खबर को प्रकाशित किया था और साप्ताहिक के मुख्य संपादक थे भानु प्रताप शुक्ल। अपनी विस्तृत रपट में उन सभी मुस्लिम संस्थानों के नाम प्रकाशित किये थे जिन्हे हमदर्द फंडिंग करता था। इस समाचार के प्रकाशित होने के बाद से हमदर्द ने पाञ्चजन्य और Organiser दोनों साप्ताहिकों को ब्लैकलिस्ट कर कई वर्षों तक कोई विज्ञापन देना बंद कर दिया था। हमदर्द से पूछिए कि हमदर्द ने पाञ्चजन्य और Organiser दोनों साप्ताहिकों को ब्लैकलिस्ट क्यों किया था?
दूसरे, कुछ साल पहले हमदर्द ने 10वी कक्षा में लड़कियों द्वारा इनके निर्धारित अंक प्रतिशत प्राप्त करने वाले लड़कियों को शायद 2000 रूपए देने की घोषणा की थी। मैंने खुद अपनी पुत्री और उसकी सहेली के फॉर्म हमदर्द में जमा करवाए थे। लेकिन सहेली का चैक आ गया लेकिन मेरी पुत्री का नहीं। क्योकि मेरी पुत्री हिन्दू और सहेली मुस्लिम। उस समय इस विभाग के अध्यक्ष सिद्दीकी थे। जब उनसे संपर्क किया तो बोले देर से जमा किया होगा। जब उनको कहा कि इन दोनों बच्चियों के फॉर्म जमा करने की तारीख देखिए। यानि ये राशि सिर्फ मुस्लिम लड़कियों के लिए है हिन्दू या अन्य के लिए नहीं। सिद्दीकी के पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन जज साहब तब से घर में रूहअफजा नहीं आयी और न ही मै कहीं भी पीता हूँ।
दिल्ली हाई कोर्ट बाबा रामदेव के हमदर्द शरबत पर वीडियो बनाने पर नाराज है। उसने बाबा रामदेव की निंदा की है और कहा कि यह वीडियो उसकी ‘आत्मा को झकझोरता’ है। हाई कोर्ट ने कहा है कि इसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। बाबा रामदेव ने रूह अफजा पर बनाई वीडियो को हटाने की बात कोर्ट को बताई है।
यह सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में मंगलवार (22 अप्रैल 2025) को हुई। बाबा रामदेव के खिलाफ यह मुकदमा ‘हमदर्द नेशनल फाउंडेशन’ की ओर से दायर किया गया था। हमदर्द के इस मामले में कोर्ट ने बाबा रामदेव से पाँच दिन के भीतर हलफनामा भी माँगा है।
हाई कोर्ट ने बाबा रामदेव से कहा है कि इस हलफनामे में वादा करें कि वह भविष्य में कोई ऐसा बयान, विज्ञापन या सोशल मीडिया पोस्ट नहीं करेंगे जिससे ‘हमदर्द’ को आपत्ति हो। हमदर्द ने कहा कि बाबा रामदेव अपना प्रोडक्ट बिना उनका नाम लिए बेच सकते हैं, क्योंकि उन्हें हर कोई जानता है।
बता दें कि बाबाा रामदेव ने कुछ दिन पहले पतंजलि के गुलाब शरबत प्रचार करते हुए दावा किया था कि हमदर्द कंपनी के रूह अफ़ज़ा से जो पैसा आता है। उससे मदरसे और मस्जिदें बनाई जाती हैं।
पीएफआई के काले कारनामों की फाइल (फोटो साभार: DNA India) प्रवर्तन निदेशालय(ED) ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर एक रिपोर्ट जारी उसके खतरनाक मंसूबों को बेनकाब किया है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) एक कट्टरपंथी संगठन है जिस पर भारत में आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने, साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने और एक इस्लामी जिहाद की योजना बनाने का आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा की गई जाँचों से यह साफ़ हुआ है कि PFI ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अपने नेटवर्क का विस्तार किया है।
इसका उद्देश्य समाज में अस्थिरता फैलाकर साम्प्रदायिक दंगों को भड़काना, सरकार के खिलाफ विद्रोह करना और हिंसा को उकसाना था। इस रिपोर्ट में PFI के वित्तीय नेटवर्क, विदेशी फंडिंग, और उसकी गतिविधियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है।
क्या है पीएफआई?
PFI की स्थापना 2006 में केरल में हुई थी। यह संगठन पहले एक ‘सामाजिक सुधारक’ संगठन के रूप में सामने आया, लेकिन धीरे-धीरे इसके असली उद्देश्य सामने आए। संगठन ने जल्दी ही भारत के विभिन्न राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, और अन्य राज्यों में विस्तार किया। इसके अलावा, PFI का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी खाड़ी देशों और सिंगापुर तक फैला हुआ है।
PFI का संचालन इसके शीर्ष नेताओं और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। ये सदस्य संगठन के विभिन्न आयामों को संचालित करने, फंडिंग का प्रबंधन करने, और संगठन की रणनीति बनाने में शामिल हैं। पीएफआई के महत्वपूर्ण पदाधिकारियों में सिर्फ देश में बैठे कट्टरपंथी ही नहीं हैं, बल्कि विदेश में बैठे इस्लामी कट्टरपंथी भी हैं, जिनमें से देश में बैठे अधिकांश कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ को आप भी जान लीजिए..
KA रऊफ शरीफ, पद: नेशनल जनरल सेक्रेटरी, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI)
भूमिका: संगठन के युवा विंग के संचालन की जिम्मेदारी थी। इनके नेतृत्व में युवाओं को संगठन में शामिल किया गया और विभिन्न स्थानों पर हिंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित किया गया।
अब्दुल रज़ाक BP, पद: डिविजनल प्रेसिडेंट, केरल
भूमिका: स्थानीय स्तर पर संगठन का विस्तार और विभिन्न अभियानों का नेतृत्व किया।
भूमिका: राज्य स्तर पर फंडिंग, कार्यक्रमों की योजना और सामरिक निर्णय लेने में शामिल थे।
शफीक़ पायथ, पद: PFI सदस्य, कतर
भूमिका: कतर से संगठन के लिए धन इकट्ठा करने और उसे भारत भेजने का कार्य किया।
परवेज़ अहमद, पद: दिल्ली स्टेट PFI के अध्यक्ष
भूमिका: दिल्ली में PFI की गतिविधियों का नेतृत्व और साम्प्रदायिक दंगे भड़काने में शामिल रहे।
साहुल हमीद, पद: PFI सदस्य, सिंगापुर
भूमिका: सिंगापुर से हवाला के जरिए धन इकट्ठा कर भारत में भेजने का कार्य किया।
KS एम. इब्राहिम उर्फ असगर, पद: अरिवगम मदरसा का सचिव
भूमिका: मदरसों का इस्तेमाल धार्मिक रूपांतरण के लिए किया और जिहादी प्रशिक्षण में शामिल रहे।
ओ. एम. ए. सलाम, पद: PFI के अध्यक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (NEC) सदस्य
भूमिका: संगठन के मुख्य रणनीतिकार थे और राष्ट्रीय स्तर पर अभियानों का नेतृत्व किया।
अनिस अहमद, पद: NEC सदस्य
भूमिका: PFI के राष्ट्रीय अभियानों में प्रमुख भागीदारी।
ए. मोहम्मद युसुफ, पद: NEC सदस्य
भूमिका: संगठन के आतंकी एजेंडे को लागू करने में शामिल थे।
अब्दुल खाडर पुत्तूर, पद: शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षक
भूमिका: सदस्यों को हथियारों का प्रशिक्षण देने का कार्य करते थे।
PFI का नेटवर्क और फंडिंग
PFI का वित्तीय नेटवर्क अत्यंत जटिल और वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है। जाँच में पाया गया कि संगठन ने विभिन्न स्रोतों से कुल 94 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि जमा की थी। यह राशि हवाला, डमी दानदाताओं, और विदेशों से बैंकिंग चैनलों के माध्यम से प्राप्त की गई थी।
PFI ने देशभर में 29 बैंक खातों का उपयोग किया, जो कि केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में स्थित थे। यह धनराशि विभिन्न परियोजनाओं और अभियानों के लिए उपयोग की जाती थी, जिनमें हिंसक गतिविधियाँ और साम्प्रदायिक तनाव भड़काने के प्रयास शामिल थे।
PFI का विदेशी नेटवर्क विशेष रूप से खाड़ी देशों में फैला हुआ था, जहां इसके 13,000 से अधिक सक्रिय सदस्य थे। संगठन ने सिंगापुर, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, ओमान और UAE में ज़िला कार्यकारी समितियाँ (District Executive Committees) बनाई थीं। हर समिति को करोड़ों रुपये जुटाने का लक्ष्य दिया गया था, और यह धन हवाला और अन्य गुप्त चैनलों के माध्यम से भारत में भेजा जाता था।
पीएफआई खड़ा कर रही थी जिहादी फौज
PFI के सदस्यों को हिंसक अभियानों के लिए तैयार करने के लिए विशेष हथियार प्रशिक्षण दिया जाता था। केरल के कन्नूर जिले में स्थित नारथ कैम्प में 2013 में ऐसा ही एक प्रशिक्षण कैंप चल रहा था, जहाँ सदस्यों को विस्फोटक और हथियारों का उपयोग सिखाया जा रहा था। इन प्रशिक्षण शिविरों को ‘शारीरिक शिक्षा’ के नाम पर आयोजित किया जाता था, जबकि असल में यहाँ आक्रामक युद्धाभ्यास की तैयारी की जाती थी।
PFI के सदस्यों ने फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में भाग लिया था, जिसमें उन्होंने हिंसा भड़काने का काम किया था। इसके अलावा, हाथरस (उत्तर प्रदेश) में संगठन के सदस्यों ने साम्प्रदायिक तनाव भड़काने का प्रयास किया। PFI का लक्ष्य था कि वह समाज में अस्थिरता फैलाकर सरकार और कानून-व्यवस्था को चुनौती दे सके।
ED ने PFI और इसके सहयोगी संगठनों की 56.56 करोड़ रुपये की 35 संपत्तियाँ जब्त की हैं। इन संपत्तियों में कई ट्रस्टों और व्यक्तियों के नाम पर खरीदी गई जमीनें और इमारतें शामिल हैं। ये संपत्तियाँ धार्मिक संस्थानों और शैक्षिक ट्रस्टों के रूप में चलाई जा रही थीं, लेकिन इनका उपयोग संगठन की आतंकी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।
जाँच में पाया गया कि PFI ने नकली दानदाताओं के नाम पर फंडिंगइकट्ठा की थी और इसे विभिन्न संपत्तियों और खातों में छुपा रखा था। ED ने अब तक PFI से जुड़े 26 सदस्यों को गिरफ्तार किया है और 9 शिकायतें दर्ज की हैं।
PFI की गतिविधियों की जाँच से साफ़ है कि यह संगठन केवल एक सामाजिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक संगठित आतंकवादी नेटवर्क था। इसके विदेशी फंडिंग, हवाला तंत्र, और देशभर में हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता ने इसे भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बना दिया है। ED और NIA की जाँच में संगठन की गहरी जड़ें उजागर हो चुकी हैं, और इसके प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हालाँकि PFI का नेटवर्क अभी भी सक्रिय है और इसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए सुरक्षा एजेंसियाँ और भी कठोर कदम उठा रही हैं।
पत्रकार प्रियांक वाजपेयी सलाह देने लगे कि कपिल मिश्रा और भाजपा को लोगों को 'जिहाद' का मतलब समझाना चाहिए (फोटो साभार: इंडिया डेली लाइव) आजकल मीडिया गैंग जरुरत से ज्यादा सक्रीय हो रहा है। सनातन धर्म को लेकर भ्राँतियाँ फ़ैलाने का कुचक्र चलाया जा रहा है। और इन दिनों तो शायद ही कोई दिन जाता होगा, इनकी धुलाई न होती हो। जून 4 को स्मृति ईरानी ने सरदेसाई को धोया, और अब ‘इंडिया डेली लाइव’ के पत्रकार प्रियांक वाजपेयी को कपिल मिश्रा ने। इन प्रोपगैंडिस्ट पत्रकारों की इतनी धुलाई होने के बावजूद प्रोपेगंडा चलाने से बाज नहीं आ रहे। विदेशों के हाथ की कठपुतली बने जिहाद की परिभाषित करते फिर रहे हैं, लेकिन किसी कट्टरपंथी मौलाना को समझाने की इनमे हिम्मत नहीं।
दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने ‘इंडिया डेली लाइव’ के पत्रकार प्रियांक वाजपेयी को एक इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने ‘जिहाद’ का मतलब समझाया। इस दौरान पत्रकार ने उन्हें उलझाने की कोशिश भी की, लेकिन कपिल मिश्रा ने अपने अंदाज़ में बेबाकी से कुतर्क का जवाब तर्क से दिया। कपिल मिश्रा ने इस दौरान ये स्पष्ट कहा कि जिसने औरंगज़ेब को अपना बाप मान लिया है उसे निशाना बनाना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि आप धर्म बदल सकते हो, लेकिन पूर्वज तो वही रहेंगे।
याद दिलाते चलें कि फर्रुखाबाद में समाजवादी पार्टी की जिलाध्यक्ष मारिया आलम खाँ ने ‘वोट जिहाद’ की अपील की थी। वो पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की भतीजी हैं। उन्होंने कहा था कि ‘संघी सरकार’ को हटाने के लिए ये ज़रूरी है। कायमगंज में I.N.D.I. गठबंधन के प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार करते समय उन्होंने ऐसा कहा था। उन पर FIR भी दर्ज की गई थी। हालाँकि, सलमान खुर्शीद ने अपनी भतीजी के बयान से बाद में किनारा कर लिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बयान को लेकर विपक्ष को आड़े हाथों लिया। गुजरात के सुरेंद्र नगर में पीएम मोदी ने कहा कि अब तक ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ के बारे में सुना था, लेकिन अब मुस्लिमों से ‘वोट जिहाद’ की अपील की जा रही है। पीएम मोदी ने याद दिलाया कि कॉन्ग्रेस के किसी भी नेता ने इस बयान का विरोध नहीं किया। इसके बाद झारखंड में भी उन्होंने ‘वोट जिहाद’ वाली विपक्ष की अपील पर करारा प्रहार किया।
देखिए कपिल मिश्रा का एक पुराना वीडियो:-
कपिल मिश्रा ने इंटरव्यू में कहा – जिहाद का सीधा अर्थ होता है काफिर को मारने और उसे मुस्लिम बनाना। कपिल मिश्रा ने पूछा कि अजमल कसाब क्या करने आया था, संसद भवन पर हमला करने वाले क्या करने आए थे? इस पर IDL के सीनियर मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर प्रियांक वाजपेयी उन्हें समझाने लगे कि जिहाद का तो मतलब होता है खुद पर नियंत्रण रखना। इस पर कपिल मिश्रा ने सवाल दागा कि क्या अजमल कसाब खुद पर नियंत्रण रखने आया था?
उन्होंने कहा कि इससे बड़ी बदतमीजी और झूठ कुछ नहीं हो सकता है। पत्रकार आरोप लगाने लगा कि जिहाद शब्द का गलत अर्थ लगाया गया और कसाब को इसका सही अर्थ नहीं पता था, इस पर कपिल मिश्रा ने कहा कि तुम जाकर आतंकियों को समझा दो जिहाद का मतलब, रावलपिंडी, लाहौर और कराची में जाकर बताओ। कपिल मिश्रा ने पूछा कि आतंकी बम फोड़ेंगे और आप हिन्दुओं के बीच में बैठ कर जिहाद का मतलब समझाओगे? प्रियांक वाजपेयी फिर कहने लगे कि आप जनप्रतिनिधि हैं, आपको इसका सही मतलब बताना चाहिए।
इस पर पूर्व विधायक कपिल मिश्रा ने कहा कि पूरी दुनिया ने 9/11 से लेकर संसद भवन पर हमले तक ‘जिहाद’ का मतलब पता है। उन्होंने कहा कि जिहाद के नाम पर राम मंदिर को गिराया गया था, भारत के 2 टुकड़े हुए और काशी के संकटमोचन मंदिर में बम ब्लास्ट हुआ, दिल्ली के कनॉट प्लेस और लाजपत नगर में धमाके हुए। कपिल मिश्रा ने कहा कि जो काम जिहादी बन कर कसाब बंदूक से करने आया था, ‘वोट जिहाद’ का नारा लगाने वाले वही काम वोट से करना चाहते हैं।
कपिल मिश्रा ने कहा, “ये भारत है। यहाँ जिहाद जब-जब आया है, हार कर गया है। हमने राम मंदिर को भी दोबारा खड़ा कर लिया। आप डिक्शनरी से लेकर इसका अर्थ इधर-उधर घुमाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब सबको पता है। इसके नाम पर क्या सिखाया जाता है। ‘वोट जिहाद’ का मतलब ये थोड़े था कि स्कूल-अस्पताल बनाएँगे, उनका आशय था कि सारे मुस्लिम एक होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वोट करें।”
फिर ‘इंडिया डेली लाइव’ के प्रियांक वाजपेयी सलाह देने लगे कि भाजपा खुद को ‘सर्वधर्म समभाव’ वाली पार्टी कहती है तो उसे जिहाद का असली अर्थ समझाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, राष्ट्रवादी मौलानाओं का पक्ष भी यही है। इस पर कपिल मिश्रा ने चुनौती दी कि वो दारुल उलूम देवबंद से जिहाद के खिलाफ फतवा निकलवा दे। उन्होंने कहा कि भाजपा थोड़े बताएगी इसका मतलब, मौलवियों या मस्जिदों ने बम धमाके और हमले के आतंकियों के खिलाफ फतवा निकाला क्या?
जिहाद मतलब आतंक वोट जिहाद मतलब वोट लेकर आतंक
जब पत्रकार महोदय जिहाद का मतलब आत्म नियंत्रण बताने लगे तो मतलब समझाना ही पड़ा
— Kapil Mishra (Modi Ka Pariwar) (@KapilMishra_IND) May 5, 2024
कपिल मिश्रा ने कहा कि देवबंद को फतवा निकालना चाहिए कि आतंकियों को मरने के बाद ’72 हूरें’ नहीं मिलेंगी, बल्कि वो सब जहन्नुम में जाएँगे। इसके बाद भी प्रियांक वाजपेयी कहते रहे कि ये कपिल मिश्रा वाली परिभाषा है। करावल नगर से BJP के विधानसभा प्रत्याशी रहे कपिल मिश्रा ने कहा कि ये उनकी परिभाषा नहीं है, ये सत्य है। उन्होंने कहा कि विश्व का इतिहास ये कह रहा है कि जिहाद मतलब आतंक। उन्होंने पूछा कि वो डिक्शनरी में अर्थ खोजें या उनके सामने जो तलवार लेकर खड़ा है उसे देखें?
धमाके के बाद दूतावास के बाहर मौजूद सुरक्षाकर्मी (चित्र साभार: India Today)
देश की राजधानी दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित इजरायली दूतावास के पास 26 दिसम्बर 2023 की शाम को एक धमाका हुआ। धमाके के बाद मौके पर पहुँची दिल्ली पुलिस को यहाँ से एक पत्र बरामद हुआ है। इसमें जिहाद और अल्लाह हू अकबर जैसे नारों और गाजा में चल रहे युद्ध का जिक्र है।
1965 में इंडो-पाक युद्ध के दौरान देशभक्ति से ओतप्रोत कई गैर-फ़िल्मी गीतों का प्रसारण होता था, और इन गीतों में मोहम्मद रफ़ी द्वारा गया गीत "कहनी है एक बात हमें, इस देश के पहरेदारों से, सम्भल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से...." बहुत अधिक चर्चित हुआ था। यदाकदा यह गीत आज भी अपनी प्रासंगिता यानि दूरदर्शिता यानि दार्शनिकता दर्शा रहा है। भारत सरकार को इन उपद्रवियों को सात समुद्र पार जाकर गिरफ्तार कर कार्यवाही करनी होगी। काफी समय से अब यह भी चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि "जब तक उपद्रवियों को परिवार सहित ब्लैकलिस्ट कर सरकारी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाएगा, अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे और बेगुनाह इनके शिकार होते रहेंगे।
जानकारी के अनुसार, नई दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित इजरायली दूतावास के पास खाली पड़े एक प्लॉट में शाम 26 दिसम्बर 2023 की शाम 5 बजे एक धमाका हुआ। धमाके की सूचना के बाद दिल्ली पुलिस बम स्क्वाड और फॉरेंसिक टीम के साथ मौके पर पहुँची।
We can confirm that around 5:10 pm there was a blast at close proximity to the embassy. Delhi Police and the security team are still investigating the situation: Israel Embassy in New Delhi https://t.co/WB4jy1BmGK
दिल्ली पुलिस ने इलाके को सील करके आसपास जाँच की और पाया कि यह धमाका कम आवृत्ति वाला था। दिल्ली पुलिस की जाँच टीम ने इसी प्लॉट से एक पत्र भी बरामद किया है। पत्र इजरायल के राजदूत को संबोधित करके लिखा गया है। पत्र की भाषा काफी अभद्र है और इसमें गालियों का भी उपयोग किया गया है।
यह पत्र एक पन्ने का है और इसे टाइप करके लिखा गया है। यह पत्र इजरायल के झंडे में लपेट कर यहाँ छोड़ा गया था। पत्र में गाजा पट्टी में हो रही इस्लामी आतंक विरोधी कार्यवाही रोकने की धमकी दी गई है। इसमें इस्लामी नारों जैसे कि ‘अल्लाह-हू-अकबर’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्दों का उपयोग किया गया है।
इस पत्र में इजरायल के खिलाफ जिहाद जारी रखने की धमकी दी गई है। गौरतलब है कि 7 अक्टूबर 2023 को इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर हमला कर दिया था। इसके बाद इजरायल गाजा में लगातार आतंक विरोधी अभियान चला रहा है। यह धमाका इसी की प्रतिक्रिया में बताया जा रहा है।
इजरायली दूतावास ने इस बम धमाके की पुष्टि की है। भारत में इजरायल के उपराजदूत ओहाद नकश कायनार ने कहा, “आज शाम (26 दिसम्बर 2023) को शाम पाँच बजे के कुछ मिनटों के बाद दूतावास के पास में एक धमाका हुआ। हमारे सारे कर्मचारी और राजनयिक सुरक्षित हैं। हमारी सुरक्षा एजेंसियाँ दिल्ली पुलिस के साथ सहयोग कर रही हैं और मामले की आगे जाँच की जा रही है।” इजरायल के भारत में राजदूत नाओर गिलोन ने स्पष्ट किया है कि धमाके के समय वह दूतावास में नहीं थे।
#WATCH | Deputy Ambassador of Israel to India, Ohad Nakash Kaynar says, "This is evening several minutes after 5, an explosion occurred in close proximity of the Embassy. All our diplomats and workers are safe. Our security teams are working in full cooperation with local Delhi… pic.twitter.com/jqQSTJMgKQ
दिल्ली पुलिस के अलावा धमाके वाली जगह की जाँच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (NIA) ने भी की है। जाँच में धमाके वाली जगह पर कोई अवशेष नहीं मिले हैं, इसलिए अभी शुरूआती तौर पर इसे एक रासायनिक धमाका माना जा रहा है। हालाँकि, पूरी जानकारी जाँच के बाद ही सामने आएगी।
धमाका करने वालों की तलाश के क्रम में आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जाँच की जा रही है। दिल्ली पुलिस को अभी सीसीटीवी में दो लोग दिखे हैं, जिन पर धमाके का शक जताया जा रहा है। दिल्ली पुलिस सीसीटीवी के सहारे इन्हें पहचान कर इनकी तलाश में जुटी है।
Regarding the Israel Embassy incident yesterday, Delhi Police found two suspects after examining the CCTV footage. Police are now scanning CCTV visuals and trying to find out how the two suspects reached there and which route they took. Police also received a threatening letter…
उधर इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने इजरायली दूतावास के बाहर हुए इस हमले के बाद अपने नागरिकों के लिए यात्रा सलाह जारी की है। सुरक्षा परिषद इसे एक संभावित आतंकी हमला मान कर चल रही है। इसने अपने नागरिकों से भारत और विशेष कर दिल्ली में भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचने की सलाह दी है। साथ ही ऐसे जगहों पर जाने से बचने को कहा है जो कि इजरायली और यहूदी समुदाय के आने जाने वाली जगहें मानी जाती हैं। सुरक्षा परिषद ने अपनी सलाह में इजरायली नागरिकों ने भारत में सतर्कता बरतने की सलाह दी है।
हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब नई दिल्ली में स्थित इजरायली दूतावास को निशाना बनाया गया हो। इससे पहले जनवरी 2021 में भी इजरायली दूतावास के बाहर एक धमाका हुआ था। इस धमाके में जान माल की कोई क्षति नहीं हुई थी लेकिन कुछ गाड़ियाँ क्षतिग्रस्त हो गईं थी। दिल्ली पुलिस ने इजरायली दूतावास और यहूदियों के धार्मिक स्थलों समेत अन्य जगह पर सुरक्षा को धमाके के बाद बढ़ा दिया है।
तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक प्लस (OPEC Plus) ने प्रतिदिन 20 लाख बैरल तेल कटौती की घोषणा की है। इस घोषणा के बाद से ऐसा कहा जा रहा था कि अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध और भी अधिक खराब होने जा रहे हैं। ओपेक प्लस के इस फैसले के बाद अमेरिका ने कहा भी था कि सऊदी अरब ने यह काम रूस को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से किया है। इस बीच सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के चचेरे भाई प्रिंस सऊद अल शालान ने अमेरिका का नाम लिए बिना पश्चिमी देशों को ‘जिहाद’ की धमकी दी है।
प्रिंस सऊद अल शालान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी वायरल हो रहा है। इस वीडियो में शालान ने किसी का भी नाम नहीं लिया है। हालाँकि, इसे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के खिलाफ धमकी के रूप में देखा जा रहा है। वीडियो में, सऊद अल सलमान ने कहा, “पश्चिम के देशों को मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि कोई भी सऊदी अरब और शाही परिवार के अस्तित्व को चुनौती देगा तो हम सभी जिहाद और शहादत के लिए ही बने हैं। ये उन सभी के लिए है जिन्हें लगता है कि वे हमें धमका सकते हैं।”
सऊदी अरब के मानवाधिकार वकील अब्दुल्लाह अलाउध के अनुसार, प्रिंस साऊद अल शालान कबीलाई नेता हैं और वह सऊदी अरब के संस्थापक रहे किंग अब्दुल अजीज के पोते हैं। शालान का यह बयान तब सामने आया है जब अमेरिका सऊदी अरब द्वारा तेल उत्पादन में कटौती करने को लेकर लगातार जुबानी हमले बोल रहा है।
सऊदी अरब तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है। ऐसे में आगे आने वाले समय में अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध खराब होते हैं अमेरिका में तेल और गैस के दाम आसमान छू सकते हैं। जिसका असर न केवल अमेरिका बल्कि अन्य देशों पर भी पड़ेगा। यही नहीं, सऊदी अरब द्वारा तेल उत्पादन में कमी करने के फैसले से भी दुनिया भर में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है।
अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में सऊदी अरब पर रूस का सहयोग करने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों पर ‘पुनर्विचार’ कर रहा है। सऊदी सरकार ने रूस के साथ जो किया है उसके नतीजे उन्हें भुगतने होंगे।
कश्मीर में 'जिहादियों' का समर्थन करती थीं मुस्लिम महिलाएँ अब खुद भी हैं शिकार कश्मीरी पंडित पुरुषों को जहाँ बेरहमी से मारा जा रहा था, वहीं औरतों के रेप हो रहे थे, उन्हें कलमे पढ़वाए जा रहे थे और इन्हें बल देने में जो उन दरिंदों का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रही थीं वो और कोई नहीं बल्कि मुस्लिम महिलाएँ ही थीं।
“हाल ही में मुझे एक महिला के बारे में पता चला। वो किसी फील्ड में गोल्ड मेडलिस्ट थीं। उनके पिता बीएससी थे, उनकी माँ प्रोफेसर थीं। कुल मिलाकर वो कश्मीर के एक पढ़े-लिखे परिवार से थीं। 90 के दशक में इस्लामी कट्टरपंथियों ने पहले उनके माता-पिता को मारा, फिर उनका इतनी बुरी तरह रेप किया कि आज भी वो उस दर्द से नहीं उबर पाई हैं। वो लाइट बंद करके एक ही जगह बैठी रहती हैं। वहीं वह पेशाब करती हैं- टट्टी करती हैं। हमेशा उसी कमरे में अंधेरे में रखती हैं। उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। बस एक भाई है जो उनका ध्यान रखता है पर उन्हीं की तरह वो भी डिप्रेशन का शिकार है। अगर वो औरत अपने करियर के हिसाब से आगे बढ़ती तो शायद आज किसी बड़े पद पर आसित होती। मगर वो है कहाँ? अंधेरे में! ”
कश्मीरी हिंदू महिलाओं की पीड़ा को बयाँ करने वाला ये वाकया कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसे ऑपइंडिया के साथ द कश्मीर फाइल्स की एक्ट्रेस भाषा सुंबली ने साझा किया है। कश्मीरी पंडितों के साथ 90 के दशक में हुई इस्लामी बर्बरता को जस का तस जनता के सामने पेश करने वाली ‘द कश्मीर फाइल्स’ में भाषा एक विक्टिम के किरदार में तो हैं ही, लेकिन असल जीवन में भी उनकी जड़ें कश्मीर से ही हैं। वह, कश्मीर के मुद्दों पर मुखर होकर हमेशा अपनी बात रखती रहीं। मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि कश्मीर से होने के बावजूद उन्होंने कभी उस ओर रुख नहीं किया। ये पूछे जाने पर कि आखिर ऐसा क्यों? भाषा हर बार यही बताती हैं कि वो अपने ही घर एक टूरिस्ट बनकर नहीं जाना चाहती, वो नहीं चाहती कि वो कश्मीर जाकर होटल रुकें जिसके अगल-बगल में उनके उस घर के अवशेष या स्मति चिह्न हों जिसे कट्टरपंथ की आग में जला दिया गया था।
90 के दशक में इस्लामी कट्टरपंथ केवल मुस्लिम पुरुषों में नहीं देखने को मिला था बल्कि छोटे बच्चे से लेकर महिलाओं तक में हिंदुओं के लिए नफरत पैदा हो चुकी थी। भाषा हमसे बात करते हुए बालकृष्ण गंजू को याद करती हैं जो अपनी जान बचाने के लिए एक चावल के ड्रम में छिपे थे और उन्हें इस्लामी पूरा घर छानने के बाद भी नहीं ढूँढ पाए थे, लेकिन तभी पड़ोस की मुस्लिम महिला ने उन दरिंदों को ध्यान उस ड्रम पर दिलवाया और बर्बरता से उन्हें उसी ड्रम में भून दिया गया। इसी तरह अपनी माँ के साथ हुई घटना को भाषा साझा करती हैं कि कैसे उनकी माँ को उनके गाँव के छोटे लड़के ने धमकी दी थी कि वो न स्लीवलेस कपड़ों में बाहर जाएँगी और न ही स्कूटी आदि चलाएँगी।
कश्मीर पंडितों के साथ हुई वीभत्सता और मुस्लिम महिलाएँ
उस दौर में हिंदुओं से नफरत की कोई सीमा नहीं थी। कश्मीरी पंडित पुरुषों को जहाँ बेरहमी से मारा जा रहा था, वहीं औरतों के रेप हो रहे थे, उन्हें कलमे पढ़वाए जा रहे थे और इन्हें बल देने में जो उन दरिंदों का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रही थीं वो और कोई नहीं बल्कि मुस्लिम महिलाएँ ही थीं। जिनमें से कुछ मुस्लिम महिलाएँ बाद में जाकर कट्टरपंथियों का शिकार भी हुईं। द डिप्लोमैट में इस संबंध में कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। जिसमें कुछ मुस्लिम महिलाओं की कहानियाँ थीं जो कश्मीर में रेप का शिकार हुईं। किसी ने बताया था कि आतंकियों ने उनका 14 साल की उम्र में रेप किया, तो किसी ने बताया कि 9 साल की उम्र में ही आतंकी उन पर हावी हो गए।
रिपोर्ट में फातिमा नाम की महिला ने तो यहाँ तक बताया कि उसके साथ आतंकियों ने इतने साल रेप किया कि उससे कोई निकाह को तैयार नहीं होता था। बाद में किसी अपाहिज भाई के साथ उसका निकाह हुआ। उसे लगा अब सारी चीजें शांत होंगी। लेकिन नहीं! आतंकी उसके ससुराल भी गए और तब भी रेप किया उसका एक बच्चा हो गया था और दूसरा होने वाला था। इसी तरह अफरोजा ने बताया कि जब वो 12 साल की थी तब कुछ लोग उनके घर खाना खाने, खासर मीट, खाने आते थे और उन लोगों को अंदर रहने को कहा जाता था। एक दिन उनमें से एक आदमी ने उसे बुलाया और जब वो गई तो उसे पकड़ लिया। अफरोजा को नहीं पता था कि क्या हो रहा है पर उसके मुताबिक वो गलत और दर्द देने वाला था।
मेहमान मुजाहिद कॉन्सेप्ट का शिकार हुईं मुस्लिम महिलाएँ
ऑपइंडिया ने इस संबंध में जब भाषा सुंबली से बात की तो उन्होंने अपनी बात रखते हुए ‘मेहमान मुजाहिद’ कॉन्सेप्ट की चर्चा की। ‘मेहमान मुजाहिद’ की अवधारणा समझाते हुए उन्होंने बताया कि कश्मीर में जिहाद पर निकले मुजाहिदों को मुस्लिम परिवार घर बुला बुलाकर मेहमान नवाजी करते थे। औरतों को लगता था कि जब वे लोग कौम के लिए इतना कर रही हैं तो वो उन्हें खिला-पिलाकर खुश तो कर ही सकती हैं। इसी कॉन्सेप्ट की आड़ में कश्मीर की मुस्लिम महिलाओं के साथ भी ज्यादतियाँ हुई। उन्होंने सामने आई रिपोर्ट्स को लेकर कहा कि अगर ऐसा हो रहा है कि औरतें सामने आ रही हैं तो अच्छी बात है और उन्हें एहसास होने लगा है कि उन्हें कैसे जिहाद के नाम पर तबाह किया जा रहा है।
अपनी बात रखते हुए सुंबली स्पष्ट कहती हैं कि वैसे उन्हें इस मामले में कोई लेना-देना नहीं है। उनके लिए अपने लोग, अपना समुदाय महत्वपूर्ण है जिन्हें तमाम तरह से प्रताड़ित किया था। उनके मुताबिक, ये सब बिलकुल ऐसा है जैसे कश्मीर पंडितों का घर जलाते हुए वो खुद शिकार हो गए।
वह याद दिलाती हैं कि एक वो भी दौर था जब इन्हीं मुस्लिम महिलाओं ने हिंदुओं के ख़िलाफ़ कट्टरपंथियों का साथ दिया। जिसका जिक्र द कश्मीर फाइल्स में भी है और बालकृष्ण गंजू के साथ हुई निर्ममता भी इस बात का प्रमाण है कि कैसे मुस्लिम महिलाओं ने 90 के दशक में हिंदुओं के नरसंहार में अपनी भूमिका निभाई। वो इन्हीं पुरानी बातों को याद करते हुए आज कश्मीर में जिहाद की आड़ में जो मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहा है उस पर कुछ भी कहने से मना कर करती हैं। उनके मुताबिक, अगर हमारा घर जलाते-जलाते उन पर आफत आ गई तो क्या अब इस भी हम लोग ही रोएँ? नहीं। हमारा लेना-देना नहीं है।
शुरुआत में कश्मीर करता था बॉलीवुड को फॉलो, फिर हिंदुओं को हिजाब पहनने को कहा जाने लगा
कश्मीर में पसरे कट्टरपंथ को लेकर भाषा ने कहा कि शुरुआती दौर में कश्मीर ऐसा नहीं था। वहाँ बॉलीवुड का हर फैशन फॉलो करने वाली महिलाएँ थी लेकिन धीरे-धीरे समय बदला और हिंदू लड़कियों को हिजाब पहनाने की बातें होनी लगीं। उनके मुताबिक उनकी माँ यानी डॉ क्षमा कौल के साथ भी ऐसी घटनाएँ घटी थीं जिन्हें एक गाँव के बच्चे ने ही उनके हिसाब से रहने को कह दिया था।
मुहल्ले के बच्चे ने दी धमकी, सहपाठी ने रुलाया: कश्मीर में कट्टरपंथ पर ‘दर्दपुर’ की लेखिका डॉ क्षमा कौल
डॉ क्षमा कौल ‘दर्दपुर’ किताब की लेखिका हैं जो कश्मीर में फैलते कट्टरपंथ की चश्मदीद रही हैं। जब हमने उनसे संपर्क किया और उन अनुभवों को जाना तो उन्होंने 35-40 साल पुराने किस्सों का जिक्र किया। डॉ क्षमा कौल से बात करते लगा कि अभी तक हमने कश्मीर में कट्टरपंथ को सिर्फ 1989-1990 के समय से आँका लेकिन वास्तविकता में इसकी नींव कई साल पहले से पड़नी शुरू हो गई थी।
उन्होंने अपने साथ हुई दो घटनाएँ साझा कीं, जो बताती हैं कि कैसे मुस्लिम परिवार का बच्चा-बच्चा भी हिंदुओं को काफिर की नजर से देखता था। उन्होंने बताया कि 1984 में वो जब वो नौकरी करने लगी थीं तब स्कूटी से अपने काम पर जाया करती थीं। लेकिन एक दिन मोहल्ले के छोटे लड़के ने उन्हें रोका और कहा, “रहना है तो हमारे हिसाब से रहो।” डॉ क्षमा आज उस बच्चे को याद करते हुए कहती हैं कि वो बच्चा बेहद प्यारा था। लेकिन उसने जब कट्टरता आनी शुरू हुई तो उसने मुझे रोककर ये सारी बातें कहीं।
चौथी क्लास की एक घटना को याद करते हुए डॉ क्षमा ने बताया कि वो परीक्षा के बाद स्कूल में दवात भूल गई थीं, जब वो उसे वापस लेने गई तो एक मुस्लिम सहपाठी ने उन्हें रोका और उन्हें कहा कि अगर दवात वापस लेनी है तो रोकर दिखाना होगा। डॉ क्षमा के अनुसार, वह बहुत ज्यादा छोटी थीं जब उनके साथ ये सारी घटनाएँ शुरू हुईं।
स्कूल में चलती थी आतंकवाद की ट्रेनिंग
उनके मुताबिक, उनके घर के पास में एक हाई स्कूल था जहाँ मुस्लिमों को सुबह-सुबह ट्रेनिंग दी जाती थी और ट्रेनिंग के समय वहाँ इतनी भयानक आवाजें आती थीं कि वे लोग डर जाते थे कि आखिर हो क्या रहा है। जब हम लोग पूछते थे कि ये लोग किस चीज की ट्रेनिंग कर रहे हैं तो बताया जाता था कि वो पुलिसमैन हैं और अपनी ट्रेनिंग कर रहे हैं। बाद में पता चला कि ये सब आतंकवाद फैलाने की तैयारी थी।
वह कहती हैं कि 1984-1985 में मुस्लिम कट्टरंपथियों ने जमकर तैयारी की थी और 1986 में पहला हमला किया। फिर 1987 शांत रहे। 1989 में ये निकल कर सामने आए और हिंदुओं को मारना शुरू किया। शुरू में 1-1 को मारा गया फिर धीरे-धीरे 5-6 मारे जाने लगे। बाद में औरतों को निशाना बनाया गया। उसके बाद कश्मीरी पंडित सिर्फ भागते रहे और ये लोग मस्जिद पर लाउडस्पीकर लगाकर बताते रहे कि कश्मीरी पंडित चले जाएँ और औरतों को यही छोड़ दें।
कट्टरपंथ से जूझना कश्मीरी पंडित महिलाओं के जीवन का अंग बन गया था
वह कहती हैं, “कश्मीर में रहकर कट्टरपंथियों को झेलना कश्मीरी पंडित महिलाओं के जीवन का अंग बन गया था। हमारे डीएनए में हो गया था कि हमें ये सब सहना ही सहना है। हमारे दिमागों में भी भर दिया गया कि अगर कोई ऐसे परेशान करे तो रोते हुए घर लौट आना है।” उन्होंने उन घटनाओं को साझा किया जब कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ वीभत्सता की हर सीमा लांघी गई।
वह गिरिजा टीकू की कहानी को साझा करती हैं और कहती है कि वो महिला सिर्फ अपनी तनख्वाह लेने वापस गई थी। लेकिन वहाँ उसकी मुस्लिम सहेली ने ही इंतजाम किया था कि आतंकवादी आएँ, उसकी काफिर सहेली का गैंगरेप करें। आपको हैरानी होगी कि गिरिजा टीकू को मारने वाले उन आतंकियों ने गिरिजा का न केवल रेप किया था बल्कि उसका शरीर आरा मशीन में कटवाया था और दोनों हिस्से अलग-अलग फेंके थे।
ऐसे ही एक नर्स से जुड़ा किस्सा वो बताती है, जिन्होंने इंसानियत दिखाते हुए अपना खून आतंकी क चढ़ाया, लेकिन बाद में क्या हुआ? उनका रेप, उन्हें भी मारा गया और उनकी लाश को उसी अस्पताल के आंगन में फेंका गया जहाँ उन्होंने खून दिया था। इसी तरह एक दंपत्ति को जीप में बाँधकर जमीन से रगड़-रगड़ कर मारा गया। एक डॉ सुंबली थी जिन्हें उनके घर में जला दिया गया। आदि-आदि
द कश्मीर फाइल्स ‘शिकारा’ की तरह नहीं करेगी निराश
डॉ क्षमा की तरह तमाम कश्मीरी पंडितों के पास अपने-अपने अनुभव हैं जिन्हें उन लोगों ने 32 साल तक समेटे रखा। अब विवेक अग्रनिहोत्री के निर्देशन में बनी ‘द कश्मीर फाइल्स’ आपके सामने इन्हीं कहानियों को विजुअली प्रस्तुत करेगी ताकि दुनिया को भी पता चले कि 32 साल में अपने ही घरों से विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों पर क्या बीती।
इससे पहले साल 2020 में जब कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को दिखाने के नाम पर शिकारा फिल्म का प्रमोशन हुआ था। उस समय कई लोगों ने इससे कई उम्मीद बाँधीं थी। देश के विभिन्न राज्यों से लेकर विदेशों तक में बैठे कश्मीरी पंडितों में एक आस जगी कि शायद अब उनके साथ हुई निर्ममता का दुनिया को अहसास होगा। लेकिन, फिल्म रिलीज के बाद ये उम्मीद उस समय बुरी तरह धराशायी हुई जब लोगों ने देखा कि कैसे कश्मीरी पंडितों का मखौल एक प्रेम कहानी दिखा कर उड़ाया गया।
फिल्म के बाद प्रीमियर कई लोग गुस्से से चीखते-चिल्लाते दिखाई दिए थे कि उनका नाम इस्तेमाल करके क्या लाया गया है और एक सवाल सबके मन को कचोट रहा था कि क्या बॉलीवुड में पसरा नैरेटिव कभी कश्मीरी पंडितों के साथ हुई बर्बरता को सामने नहीं आने देगा या क्या हर बार कश्मीरी पंडितों को आधार बनाकर भाईचारे की, प्रेम की कहानियाँ रची जाती रहेंगी। कश्मीरी पंडितों के सवाल, उनका दर्द, उनका गु्स्सा सब वाजिब था। उनकी पीड़ा दिखाने के नाम पर जो घिनौना नैरेटिव गढ़ा गया।
वो उसी पर प्रतिक्रिया थी। लेकिन, 2020 की शिकारा और 2022 की द कश्मीर फाइल्स में क्या अंतर है इसका अंदाजा रिलीज से पहले आ रहे उन लोगों के रिएक्शन से लगाया जा सकता है जो फिल्म देखने के बाद उन भयावह पलों को याद कर एक बार फिर फूट-फूटकर रोए और अन्य लोगों से यह फिल्म देखनी की अपील इसलिए की ताकि पूरी दुनिया जाने कश्मीर में 90 का दौर कितना काला और खून से रंगा है जिसके सामने बड़ी-बड़ी प्रेम कहानी कितनी तुच्छ है।