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उत्तर प्रदेश को बदनाम करने के लिए NewsLaundry की ट्रिक: असल बात को छुपाओ, शब्दों का हेर-फेर कर प्रोपेगेंडा फैलाओ


उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2017 के बाद निवेश प्रोत्साहन के क्षेत्र में एक सुनियोजित नीतिगत यात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य राज्य को निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य के रूप में स्थापित करना था। हालाँकि प्रपेगेंडा मीडिया न्यूजलॉन्ड्री ने 30 जून 2026 को उत्तर प्रदेश में हुए निवेश और समझौता ज्ञापनों पर आर्टिकल लिखा।

इस आर्टिकल में शब्दों का हेर फेर कर न्यूजलॉन्ड्री ने ये बताने की कोशिश की कि यूपी में निवेश को लेकर हुए MoU केवल कागजी दावे हैं और सरकार सुर्खियों के आधार पर बड़े-बड़े दावे कर रही है।

असल में फरवरी 2018 में शुरू हुए पहले यूपी इन्वेस्टर्स समिट से लेकर फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट तथा जून 2026 के उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग (बेंगलुरु) तक उत्तर प्रदेश सरकार ने निवेश के लिए मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू के मंच का बार-बार उपयोग किया है। 

साभार सोशल मीडिया 

न्यूजलॉन्ड्री ने शब्दों से खेल कर निवेश को बताया झूठ

न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तर प्रदेश में आए निवेश को लेकर एक रिपोर्ट की सीरीज ‘द एमओयू मिराज’ प्रकाशित किया है। इसमें न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के कई एमओयू पर सवाल उठाए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया था। इस दावे को लेकर न्यूजलॉन्ड्री सवाल खड़े कर रही है। उसका कहना है कि निवेश को बढ़ा चढ़कर और केवल ‘शून्य बढ़ाकर’ कागजी दावे किए जा रहे हैं।

वास्तव में ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने के दावे का सही अर्थ यह है कि इतने मूल्य के निवेश प्रस्ताव सरकार को मिले थे, न कि उतना पैसा एक साथ राज्य में आ गया था। निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में बड़ा फर्क होता है, और यह फर्क रिपोर्ट में धुंधला कर दिया गया है।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया कि किन MoU में बाद में कितनी प्रगति हुई, कौन-सी परियोजनाएँ अप्रूवल तक पहुँचीं और किन्हें रद्द किया गया। यानी रिपोर्ट में साइनिंग का प्रक्रिया को ही पूरा निवेश समझ कर पाठकों को अंतिम सत्य बता दिया बता दिया गया।

Newslaundry ने MoUs को ‘कागजी निवेश’ कहकर वास्तविक निवेश से बराबरी पर रखा। यह गलत है क्योंकि सरकार ने कभी इन्हें realised investment नहीं बताया, बल्कि ‘pipeline’ और ‘commitments’ के रूप में प्रस्तुत किया है।

रिपोर्ट में लिखा गया कि कई MoU बाद में धरातल पर नहीं उतरे। इस बात में बताते हुए लेखक ये बताना भूल गए कि उत्तर प्रदेश सरकार ने MoU के लिए मॉनिटरिंग तंत्र बनाया गया है ताकि राज्य में निवेश प्रस्तावों पर विभागीय स्तर पर फॉलो-अप, नियमित समीक्षा और प्रगति रिपोर्टिंग पर काम किया जा सके।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यदि कोई राज्य वास्तव में केवल कागजी आँकड़े बढ़ाना चाहता, तो उसे निगरानी और सत्यापन की ऐसी व्यवस्था बनाने की कोई जरूरत नहीं होती।

निगरानी तंत्र यह दिखाता है कि राज्य ने गलती की संभावना को स्वीकार किया, लेकिन उसे सुधारने के लिए संस्थागत ढाँचा भी बनाया। इसीलिए अधूरे और वित्तीय अनियमितताओं वाले MoU पर समय पर कार्यवाही होनी सुनिश्चित हुई। 

MoU से नहीं होता आर्थिक हस्तांतरण

पहली बात जो साफ तौर पर जानने के लायक है वह ये कि अगर कोई व्यक्ति या कंपनी MoU पर हस्ताक्षर करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि राज्य का पैसा तुरंत ट्रांसफर हो गया या जनता का धन सीधे खतरे में आ गया।

MoU से पहले भी सरकारी स्तर पर जाँच होती है, और बाद में भी प्रोजेक्ट की क्षमता, वित्तीय स्थिति, भूमि उपलब्धता, अनुमतियों और अनुपालन की समीक्षा होती है। इसलिए केवल किसी असंगत या कम-ज्ञात इकाई के MoU पर हस्ताक्षर कर देने से इसे ‘घोटाला’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

इसके अलावा जब भी किसी निवेशक की वित्तीय साख पर कोई सवाल खड़े होते हैं तब राज्य सरकार के पास उसकी समीक्षा, MoU रद्द करने या उस पर अन्य कार्रवाही करने का तंत्र होता है।

अब तक की 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के माध्यम से ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतर चुकी हैं और लगभग 60 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। ये अकेले एमओयू की चर्चा से कहीं आगे की वास्तविकता दर्शाता है।

सत्यापन, निगरानी एवं कार्रवाई की प्रक्रिया

न्यूजलॉन्ड्री ने आयोजनों में आए पूछ एआई, ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर जैसी कुछ कंपनियों के निवेश प्रस्ताव में हुई धोखाधड़ी और उनके संदिग्धता पर सवाल करते खड़े करते हुए योगी कार्यकाल में आए सभी तरह के निवेश को ही झूठ बताने की कोशिश की।

सच्चाई यह है कि जिन संदिग्ध कंपनियों के बारे में सरकार को पता चला उस पर जाँच की गई है और कुछ एक निवेश प्रस्ताव को छोड़कर ज्यादातर निवेश प्रस्ताव को धरातल पर उतरने का काम शुरू किया जा चुका है।

‘Newslaundry’ वालो, जन्नत की टपरी पर 72 हूरों के साथ शराब कब बहाओगे?

                               'न्यूजलॉन्ड्री' ने वीर सावरकर के अपमान के लिए क्रिएट किया 'स्वर्ग का दृश्य'
जन्नत का दृश्य है, 130 फ़ीट की 72 हूरों के साथ वो लोग बैठे हुए हैं जिनकी इस्लाम में सबसे ज़्यादा इज्जत है, वो जन्नत में बहने वाली दारू की नदी में से दारू निकाल कर ‘दारू पर चर्चा’ कर रहे हैं। सबका मजाक बनाया जा रहा है। आतंकवाद पर चर्चा हो रही है, ‘सर तन से जुदा’ पर चर्चा हो रही है। क्या आपने कभी किसी यूट्यूब चैनल पर ऐसा ‘व्यंग्य’ वाला वीडियो देखा? नहीं देखा ना? हम पूरी बात समझेंगे, लेकिन पहले शुरू से शुरू करते हैं।

‘झबड़ा’ कहे जाने वाले अभिनंदन शेखरी कप्रोपगैंडा प्लेटफॉर्म Newslaundry एक वीडियो बनाता है। वीडियो में व्यंग्य के नाम पर हिन्दू देवी-देवताओं और पौराणिक किरदारों का मज़ाक बनाया जाता है। महान स्वतंत्रता सेनानी वीर विनायक दामोदर सावरकर का अपमान किया जाता है। शुरू में एक फालतू डिस्क्लेमर लगा दिया जाता है, जिसे व्यंग्य की शैली में रखने के चक्कर में उसकी ऐसी की तैसी कर दी गई है। जिस वीडियो की हम बात कर रहे, उसमें पत्रकार अतुल चौरसिया ने राम मंदिर पर प्रलाप किया है।

उस वीडियो में पत्रकार अमीश देवगन(News18) को ब्रह्मर्षि नारद की भूमिका में दिखाया गया है। साथ ही अंजना ओम कश्यप को एक साध्वी की वेशभूषा में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी प्राचीन शासक की वेशभूषा में दिखाया गया है। इस वीडियो में वीर सावरकर और अटल बिहारी वाजपेयी को भी दिखाया गया है। दिखाया गया है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के मौजूदा घटनाक्रम से दुःखी हैं।

संक्षेप में बताएँ तो इस वीडियो के जरिए जहाँ इस बात पर चिंता जताई गई है कि 500 वर्षों के संघर्ष और बलिदानों के बाद अवैध कब्जे से मुक्त हुई रामजन्मभूमि पर बन रहे मंदिर को मीडिया कवरेज क्यों मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल और कॉन्ग्रेस का बचाव किया गया है और उन्हें सीख दी गई है कि आगे क्या करना चाहिए। वीडियो में आज के भारत पर चिंता जताते हुए वीर सावरकर पर दोष मढ़ दिया गया है। यहाँ तक कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को लेकर नेहरू ने डॉ प्रसाद को वहाँ न जाने की सलाह दी थी, उसका भी बचाव किया गया है।

अब वापस आते हैं डिस्क्लेमर पर। इसमें लिखा है, “यह बात समझ से परे है कि किसी मृत व्यक्ति की भावना को कैसे ठेस पहुँच सकती है, लेकिन अगर आत्मा ज़िंदा रहती है और आत्मा में भावनाएँ हैं तो हम नहीं चाहते कि उस आत्मा की भावनाओं को भी ठेस नहीं पहुँचाना सकते।” यहाँ बड़ी चालाकी से हिन्दू देवी-देवताओं, साधु-संतों और पौराणिक पात्रों पर टिप्पणियों को लेकर खुद को ही NOC सर्टिफिकेट दे दिया गया है। यानी, उनका कहना है कि वो हिन्दुओं की भावनाएँ आहत करेंगे और किसी को विरोध करने का अधिकार नहीं है।

                                ‘न्यूजलॉन्ड्री’ के डिस्क्लेमर में व्यंग्य के चक्कर में व्यंग्य की कर दी ऐसी ही तैसी

ठीक है, चलिए मान लेते हैं। किसी को आहत होने का अधिकार नहीं है। Newslaundry को पत्रकारिता का सबसे बड़ा झंडाबरदार भी मान लेते हैं। अतुल चौरसिया को श्रीलाल शुक्ल से भी अव्वल दर्जा का व्यंग्यकार का दर्जा दे देते हैं। तो क्या अब ‘न्यूजलॉन्ड्री’ के यूट्यूब चैनल पर स्वर्ग की जगह जन्नत का वीडियो आएगा, जिसमें हिन्दू धर्म नहीं बल्कि इस्लाम मजहब वाले जिनकी इबादत करते हैं, जिन्हें महापुरुष मानते हैं – उन्हें लेकर व्यंग्य किया जाएगा? क्या ये संभव है?

मान लीजिए, जन्नत का दृश्य है। वहाँ मुल्ले-मौलवी जमा हैं। कन्हैया लाल तेली और उमेश कोल्हे का ‘सर तन से जुदा’ किए जाने पर बहस हो रही है। जिस तरह अतुल चौरसिया ने इस वीडियो में धर्मराज युधिष्ठिर को लेकर व्यंग्य किया है, क्या वो इस्लाम के ____ को लेकर व्यंग्य कर सकता है? नूपुर शर्मा ने जब हदीथ से लेकर एक तथ्य का जिक्र कर दिया तो क्या हुआ ये बताने की ज़रूरत नहीं है। वो डेढ़ वर्षों से घर में कैद हैं, बाहर निकलती भी हैं तो काफी सुरक्षा व्यवस्था की ज़रूरत पड़ती है।

उसके बाद ‘सर तन से जुदा’ का सिलसिला चला, देश भर में भीड़ जुटा कर नारेबाजी हुई, इस बयान का समर्थन करने वालों पर हमले हुए, क़तर से लेकर अन्य इस्लामी मुल्कों से बयान दिलवाए गए और पूरे देश में डर का माहौल बना दिया गया। जब तथ्य कहने पर इतना सब कुछ हो गया, व्यंग्य पर क्या कुछ होगा ये सोच से भी परे है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास इसका उदाहरण मौजूद नहीं है। फ्रांस में एक ऐसे ही व्यंग्य के कारण कुछ ऐसा हो गया था जिसने पूरे यूरोप को हिला दिया था।

जनवरी 2015 में फ्रांस में ‘शार्ली हेब्दो’ पत्रिका के दफ्तर पर हमला बोल दिया गया। कारण – उसने पैगंबर मुहम्मद का कार्टून प्रकाशित किया था। पत्रिका के दफ्तर और एक सुपरमार्केट पर हुए हमलों में 17 लोग मारे गए। मृतकों में 5 कार्टूनिस्ट थे, इमारत के बाहर तैनात एक पुलिस अधिकारी थी। अगले दिन एक सुपरमार्ट पर हमला कर के एक कर्मचारी और 3 ग्राहकों को इन्हीं हमलावरों में मार डाला। अक्टूबर 2020 में फ्रांस में ही एक शिक्षक सैमुअल पैंटी को उनके ही छात्र ने मार डाला, क्योंकि उन्होंने क्लासरूम में ये कार्टून दिखाया था।

नूपुर शर्मा और ‘शार्ली हेब्दो’ वाली घटनाएँ सिर्फ एक उदाहरण हैं उस चीज का, जो सदियों से होता आ रहा है। अगर ‘न्यूजलॉन्ड्री’ की हिम्मत है तो वो इसी तरह का वीडियो बनाए। इस्लाम छोड़िए, ईसाई मजहब या जीसस क्राइस्ट को लेकर ही कोई व्यंग्य बना कर दिखाए। फरिश्तों, 72 हूरों और जन्नत में शराब की नदी पर क्या कभी ‘न्यूजलॉन्ड्री’ व्यंग्य बनाएगा? नहीं बनाएगा, क्योंकि इसका सारा डिस्क्लेमर सिर्फ हिन्दुओं के लिए है, अगर कहीं एक मुस्लिम भी नाराज़ हो गया तो ये मीडिया संस्थान बिना किसी व्यंग्य के माफीनामा जारी कर देगा।

‘न्यूजलॉन्ड्री’ ‘जन्नत में दारू की टपरी’ पर 72 हूरों के साथ चर्चा करते हुए मुल्ले-मौलवियों का भी वीडियो आएगा? अलकाय, ISIS, बोको हराम, तालिबान और जैश-ए-मुहम्मद द्वारा की जा रही हत्याओं पर चर्चा सुनने को मिलेगी? बिना किसी बात के ‘संविधान की हत्या’ का रट्टा मारने वाला अतुल चौरसिया सचमुच में हो रही हत्याओं पर कुछ बोलेगा? सचमुच की हत्याएँ, यानी जहाँ हथियार का इस्तेमाल किया जाता है, खून निकलता है, अस्पताल में पोस्टमॉर्टम होता है, परिवार वाले रोते हैं।

ये ‘संविधान की हत्या’ क्या होती है? ‘न्यूजलॉन्ड्री’ कहता है कि मीडिया मर गया है। क्या भारत भूमि के आराध्य श्रीराम से जुड़ी खबरें दिखाने की मनाही है संविधान में? कहाँ लिखा है, किसने लिखा है? संविधान में तो राम, सीता और लक्ष्मण के वन-गमन की तस्वीर अंकित है। राम-राज्य की अवधारणा तो महात्मा गाँधी की थी, जिनका इस वीडियो में इस्तेमाल वीर सावरकर को नीचा दिखाने के लिए किया गया है। वो वीर सावरकर, जिन्हें अंग्रेजी ने दो-दो आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई, कालापानी की कैद में कोल्हू में बैल की जगह जोता।

वहीं वीर सावरकर, जिनके बिना 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को हम अंग्रेजों के नज़रिए से साधारण ‘सिपाही विद्रोह’ ही समझ कर पढ़ रहे होंगे, रानी लक्ष्मीबाई और वीर कुँवर सिंह जैसे कई शूरवीर इतिहास के पन्नों में गुम रहते। इसीलिए, ‘न्यूजलॉन्ड्री’ ज़रा अपने डिस्क्लेमर के हिसाब से चलते हुए कभी जन्नत की टपरी पर दारू पर चर्चा वाला भी वीडियो बनाए, उसमें इस्लाम मजहब में जिन लोगों का नाम तक लेने पर ‘सर तन से जुदा’ हो जाता है उन्हें लेकर व्यंग्य कर के दिखाए। क्या लगता है, होगा?