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‘5 वक्त की नमाज पढ़ते थे कृष्णजी’: मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान राम-कृष्ण को बताया- ‘मुसलमान’, CM योगी पर भी की विवादित टिप्पणी

                                                मौलाना जर्जिस अंसारी (फोटो साभार: आज तक)
मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान श्री कृष्ण को लेकर विवादित बयान दिया है जिसके बाद हंगामा मच गया है। दरअसल, मौलना ने एक मजहबी तकरीर के दौरान भगवान श्री कृष्ण को मुसलमान बताया है और कहा है कि भगवान कृष्ण पाँचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे। इस बयान का वीडियो सामने के बाद संतों और धार्मिक और सामाजिक संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है।

अंसारी को फिर इतना भी मालूम होगा कि भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत गीता में कहा "विनाश काले विपरीत बुद्धि", यानि अंसारी जो अपने आपको मौलाना कहता है साबित कर रहा है कि उसने अपने धर्म परिवर्तन कर रखा है।  

मौलाना जर्जिस अंसारी ने कहा, “हमारे भाई, अगर बुरा न मानें, तो कृष्ण जी भी पाँचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे। यकीन न आए तो श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का 10वाँ श्लोक देख लीजिए…जिसमें कृष्ण जी अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन, ईश्वर की पूजा करो तो पूरे शरीर का योग करो। योगी, उत्तर प्रदेश वाला नहीं। पूरे शरीर का योग करो यानी पूजा सिर्फ खड़े होकर नहीं बल्कि पूरे शरीर के साथ होनी चाहिए।”

जर्जिस ने हिंदुओं का मजाक उड़ाते हुए आगे कहा, “आज हिंदू धर्म में चले जाइए, लोग सिर्फ ऐसे हाथ उठाएँगे- ओम नमः शिवाय, बस हो गई पूजा। योगी जी बड़े भक्त बनते हैं राम के और अगर अपनी किताबें पढ़ लें, तो यकीन मानिए इस्लाम से मोहब्बत करने लगेंगे।” उन्होंने कहा, “इसी दीन और इसी धर्म को रामचंद्र जी ने भी पेश किया है, कृष्ण जी ने भी पेश किया है। ये सिर्फ मुसलमानों का नहीं है।”

मौलाना के इस बयान पर साधु-संत भड़क गए हैं। महंत विष्णु दास ने कहा, “मौलाना कहता है कि भगवान श्री कृष्ण मुसलमान हैं। ऐसे मौलाना की जो जीभ काटकर लाएगा उसे 10 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा।”

मौलाना जर्जिस अंसारी का यह वीडियो झारखंड की एक मजहबी जलसे का बताया जा रहा है। यह वीडियो 23 जून 2026 का बताया जा रहा है लेकिन यह वायरल अब हुआ है। मौलाना जार्जिस उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के रहने वाले हैं और पहले भी कई विवादित बयान दे चुके हैं।

उत्तर प्रदेश को बदनाम करने के लिए NewsLaundry की ट्रिक: असल बात को छुपाओ, शब्दों का हेर-फेर कर प्रोपेगेंडा फैलाओ


उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2017 के बाद निवेश प्रोत्साहन के क्षेत्र में एक सुनियोजित नीतिगत यात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य राज्य को निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य के रूप में स्थापित करना था। हालाँकि प्रपेगेंडा मीडिया न्यूजलॉन्ड्री ने 30 जून 2026 को उत्तर प्रदेश में हुए निवेश और समझौता ज्ञापनों पर आर्टिकल लिखा।

इस आर्टिकल में शब्दों का हेर फेर कर न्यूजलॉन्ड्री ने ये बताने की कोशिश की कि यूपी में निवेश को लेकर हुए MoU केवल कागजी दावे हैं और सरकार सुर्खियों के आधार पर बड़े-बड़े दावे कर रही है।

असल में फरवरी 2018 में शुरू हुए पहले यूपी इन्वेस्टर्स समिट से लेकर फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट तथा जून 2026 के उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग (बेंगलुरु) तक उत्तर प्रदेश सरकार ने निवेश के लिए मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू के मंच का बार-बार उपयोग किया है। 

साभार सोशल मीडिया 

न्यूजलॉन्ड्री ने शब्दों से खेल कर निवेश को बताया झूठ

न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तर प्रदेश में आए निवेश को लेकर एक रिपोर्ट की सीरीज ‘द एमओयू मिराज’ प्रकाशित किया है। इसमें न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के कई एमओयू पर सवाल उठाए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया था। इस दावे को लेकर न्यूजलॉन्ड्री सवाल खड़े कर रही है। उसका कहना है कि निवेश को बढ़ा चढ़कर और केवल ‘शून्य बढ़ाकर’ कागजी दावे किए जा रहे हैं।

वास्तव में ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने के दावे का सही अर्थ यह है कि इतने मूल्य के निवेश प्रस्ताव सरकार को मिले थे, न कि उतना पैसा एक साथ राज्य में आ गया था। निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में बड़ा फर्क होता है, और यह फर्क रिपोर्ट में धुंधला कर दिया गया है।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया कि किन MoU में बाद में कितनी प्रगति हुई, कौन-सी परियोजनाएँ अप्रूवल तक पहुँचीं और किन्हें रद्द किया गया। यानी रिपोर्ट में साइनिंग का प्रक्रिया को ही पूरा निवेश समझ कर पाठकों को अंतिम सत्य बता दिया बता दिया गया।

Newslaundry ने MoUs को ‘कागजी निवेश’ कहकर वास्तविक निवेश से बराबरी पर रखा। यह गलत है क्योंकि सरकार ने कभी इन्हें realised investment नहीं बताया, बल्कि ‘pipeline’ और ‘commitments’ के रूप में प्रस्तुत किया है।

रिपोर्ट में लिखा गया कि कई MoU बाद में धरातल पर नहीं उतरे। इस बात में बताते हुए लेखक ये बताना भूल गए कि उत्तर प्रदेश सरकार ने MoU के लिए मॉनिटरिंग तंत्र बनाया गया है ताकि राज्य में निवेश प्रस्तावों पर विभागीय स्तर पर फॉलो-अप, नियमित समीक्षा और प्रगति रिपोर्टिंग पर काम किया जा सके।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यदि कोई राज्य वास्तव में केवल कागजी आँकड़े बढ़ाना चाहता, तो उसे निगरानी और सत्यापन की ऐसी व्यवस्था बनाने की कोई जरूरत नहीं होती।

निगरानी तंत्र यह दिखाता है कि राज्य ने गलती की संभावना को स्वीकार किया, लेकिन उसे सुधारने के लिए संस्थागत ढाँचा भी बनाया। इसीलिए अधूरे और वित्तीय अनियमितताओं वाले MoU पर समय पर कार्यवाही होनी सुनिश्चित हुई। 

MoU से नहीं होता आर्थिक हस्तांतरण

पहली बात जो साफ तौर पर जानने के लायक है वह ये कि अगर कोई व्यक्ति या कंपनी MoU पर हस्ताक्षर करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि राज्य का पैसा तुरंत ट्रांसफर हो गया या जनता का धन सीधे खतरे में आ गया।

MoU से पहले भी सरकारी स्तर पर जाँच होती है, और बाद में भी प्रोजेक्ट की क्षमता, वित्तीय स्थिति, भूमि उपलब्धता, अनुमतियों और अनुपालन की समीक्षा होती है। इसलिए केवल किसी असंगत या कम-ज्ञात इकाई के MoU पर हस्ताक्षर कर देने से इसे ‘घोटाला’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

इसके अलावा जब भी किसी निवेशक की वित्तीय साख पर कोई सवाल खड़े होते हैं तब राज्य सरकार के पास उसकी समीक्षा, MoU रद्द करने या उस पर अन्य कार्रवाही करने का तंत्र होता है।

अब तक की 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के माध्यम से ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतर चुकी हैं और लगभग 60 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। ये अकेले एमओयू की चर्चा से कहीं आगे की वास्तविकता दर्शाता है।

सत्यापन, निगरानी एवं कार्रवाई की प्रक्रिया

न्यूजलॉन्ड्री ने आयोजनों में आए पूछ एआई, ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर जैसी कुछ कंपनियों के निवेश प्रस्ताव में हुई धोखाधड़ी और उनके संदिग्धता पर सवाल करते खड़े करते हुए योगी कार्यकाल में आए सभी तरह के निवेश को ही झूठ बताने की कोशिश की।

सच्चाई यह है कि जिन संदिग्ध कंपनियों के बारे में सरकार को पता चला उस पर जाँच की गई है और कुछ एक निवेश प्रस्ताव को छोड़कर ज्यादातर निवेश प्रस्ताव को धरातल पर उतरने का काम शुरू किया जा चुका है।

उत्तर प्रदेश : अब जब्त अफीम से बनेगी जीवनरक्षक दवा, योगी सरकार का अपराध से जनकल्याण तक का सफर

            जब्त अफीम से बनेगी दवा, योगी सरकार ने अपराध को बदला जनकल्याण में (फोटो साभार : ChatGPT)
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले जिस उत्तर प्रदेश में माफियाओं का डंका बजता था, पुलिस मंत्रियों की भैंस ढूंढने में लगी रहती थी, आज स्थिति एकदम बदल चुकी है।   

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस तरह अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति बनाई है, उसी तरह अब उनसे जब्त की गई सामग्री को भी प्रयोग में लाया जाएगा। दरअसल गाजियाबाद पुलिस ने अलग-अलग थानों के मालखानों में सालों से बंद पड़े 16,378 किलोग्राम से ज्यादा के नशीले पदार्थ जब्त कर उसे पूरी तरफ नष्ट किया है।

इसी के साथ, अपराधियों से पकड़ी गई 4.206 किलोग्राम शुद्ध अफीम को नष्ट करने के बजाय सरकारी अफीम कारखाने (गाजीपुर) भेजा गया है। इस अफीम का इस्तेमाल अब नशे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों की दवाएँ बनाने में किया जाएगा। योगी सरकार का यह कदम दिखाता है कि कैसे अपराध की सामग्री का इस्तेमाल अब जन-कल्याण के लिए हो रहा है।

थानों में जमा ड्रग्स को ऐसे किया गया नष्ट

गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के थानों में सालों से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ जमा थे। इन मादक पदार्थों की वजह से थानों के मालखानों में जगह कम पड़ रही थी और इनके दुरुपयोग का खतरा भी बना हुआ था। इसी समस्या को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एक उच्च स्तरीय ड्रग डिस्पोजल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी में अपर पुलिस आयुक्त अपराध और अपर पुलिस उपायुक्त यातायात जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया था।

इस विशेष कमेटी ने कोर्ट, संबंधित विभागाध्यक्षों और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से सभी जरूरी कानूनी अनुमतियाँ और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किए। इसके बाद बुधवार (10 जून) को धौलाना स्थित एक अधिकृत बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल केंद्र में कुल 63 मुकदमों से जुड़े मादक पदार्थों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। नष्ट किए गए सामान में सबसे अधिक मात्रा नंदग्राम थाने से बरामद हुई 15,735 लीटर कोडीन युक्त नशीली कफ सिरप की थी। नियमों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई।

जब्त अफीम से दवा बनने की पूरी प्रक्रिया

अफीम एक खास पौधे से मिलती है। इस पौधे का नाम ‘अफीम पोस्त‘ है। इसे वैज्ञानिक भाषा में पैपावर सोम्रिफेरस कहते हैं। इस पौधे पर हरे रंग के कच्चे फल लगते हैं। इन कच्चे फलों को ‘डोडा’ कहा जाता है। जब इन डोडों पर हल्का सा चीरा लगाया जाता है, तो उनमें से सफेद रंग का गाढ़ा दूध जैसा रस निकलता है। यही रस हवा के संपर्क में आकर सूख जाता है और गोंद जैसा काला-भूरा बन जाता है। इसी सूखे रस को हम अफीम कहते हैं।

अफीम के अंदर कई तरह के प्राकृतिक तत्व होते हैं। विज्ञान की भाषा में इन तत्वों को ‘एल्कलॉइड्स’ कहते हैं। अफीम में ऐसे 25 से ज्यादा अलग-अलग तत्व पाए जाते हैं। जब पुलिस अपराधियों से यह अफीम पकड़ती है, तो उसे गाजीपुर के सरकारी कारखाने में भेजा जाता है। इस कारखाने को ‘सरकारी अफीम और अल्कलॉइड वर्क्स’ (GOAW) कहते हैं। यहाँ वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में अफीम की पूरी जाँच करते हैं। वह देखते हैं कि अफीम कितनी असली है। इसके बाद मशीनों की मदद से अफीम को अच्छी तरह साफ किया जाता है।

अफीम से कैसे निकाली जाती है दवा?

साफ करने की इस प्रक्रिया को ‘प्रोसेसिंग’ कहते हैं। प्रोसेसिंग के दौरान वैज्ञानिक अफीम के अंदर से दो सबसे जरूरी तत्व अलग करते हैं। पहले तत्व का नाम ‘मॉर्फीन’ है। दूसरे तत्व का नाम ‘कोडीन’ है। ये दोनों तत्व बहुत काम के होते हैं। जब ये तत्व अफीम से अलग हो जाते हैं, तो सरकार इन्हें दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियों को बेच देती है। ये कंपनियाँ इन तत्वों की मदद से बहुत ही असरदार और तेज दर्द को ठीक करने वाली दवाएँ तैयार करती हैं।

इन दोनों तत्वों का काम अलग-अलग बीमारियों में होता है। उदाहरण के लिए, ‘कोडीन’ नाम के तत्व का इस्तेमाल सूखी खांसी को ठीक करने के लिए किया जाता है। इससे खांसी के कफ सिरप बनाए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, ‘मॉर्फीन’ नाम का तत्व बहुत तेज दर्द को रोकने के काम आता है। डॉक्टर इसका इस्तेमाल गंभीर मरीजों के लिए करते हैं। मॉर्फीन की मदद से दर्द को दबाने वाले इंजेक्शन और गोलियाँ (टैबलेट) बनाई जाती हैं। इस तरह यह अफीम मरीजों का जीवन बचाने के काम आती है।

क्या हर पकड़ी गई अफीम से दवा बन सकती है?

यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है। पुलिस जो भी अफीम पकड़ती है, उस हर अफीम से दवा नहीं बनाई जा सकती। असल में, नशा बेचने वाले तस्कर बहुत चालाक होते हैं। वे ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अफीम में मिलावट कर देते हैं। वे अफीम का वजन बढ़ाने के लिए उसमें स्टार्च, पाउडर या खराब केमिकल मिला देते हैं। कभी-कभी तो इसमें आर्सेनिक और लेड जैसी जहरीली चीजें भी मिला दी जाती हैं। ऐसी मिलावटी अफीम इंसानी शरीर के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक और जानलेवा हो जाती है।

जब पुलिस इस अफीम को गाजीपुर या नीमच के सरकारी कारखाने में भेजती है, तो वहाँ सबसे पहले उसकी शुद्धता जाँची जाती है। इसके लिए लैब में एक खास टेस्ट होता है। अगर टेस्ट में अफीम मिलावटी निकलती है, तो कारखाना उसे लेने से मना कर देता है। यही नहीं, अगर अफीम में सीलन (नमी) या फंगस लगी हो, तो भी वह रिजेक्ट हो जाती है। ऐसी खराब अफीम को दवा बनाने के लायक नहीं माना जाता। बाद में, इस खराब अफीम को भी बाकी नशीले पदार्थों की तरह आग में जलाकर या केमिकल डालकर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। कारखाने में सिर्फ और सिर्फ एकदम शुद्ध अफीम का ही इस्तेमाल दवा बनाने के लिए होता है।

योगी सरकार: अपराध खत्म कर लोगों की भलाई का नया सफर

उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, कामकाज का तरीका बिल्कुल बदल गया है। पहले के समय में पुलिस जो करोड़ों रुपए की अफीम पकड़ती थी, वह थानों के मालखानों में सालों तक बंद रहती थी। वह रखी-रखी सड़ जाती थी या फिर कई बार चोरी भी हो जाती थी। लेकिन अब योगी सरकार ने इस पूरे सिस्टम को साफ-सुथरा और बेहतर बना दिया है। अब पकड़ी गई चीजों का सही इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार की इस नई नीति से एक साथ दो बड़े फायदे हो रहे हैं। पहला फायदा यह है कि पुलिस नशे का काला कारोबार करने वाले अपराधियों को पकड़कर उनका पूरा नेटवर्क तोड़ रही है। दूसरा फायदा यह है कि उनसे जो अफीम मिल रही है, उसका इस्तेमाल बीमार और लाचार लोगों के इलाज के लिए किया जा रहा है। सरकार एक तरफ अपराधियों पर कड़ा एक्शन ले रही है, तो दूसरी तरफ उनकी जब्त की गई चीजों को जनता की भलाई में लगा रही है। यह सरकार की एक बहुत अच्छी और दूर की सोच को दिखाता है।

पुलिस और कानून के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?

कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई बहुत जरूरी है। थानों के मालखानों में बहुत ज्यादा नशा जमा रखना खतरे से खाली नहीं होता। हमेशा डर रहता है कि कहीं यह नशीले पदार्थ चोरी न हो जाएँ। यह भी डर रहता है कि कोई इन्हें दोबारा चोरी-छिपे बाजार में न बेच दे। इसलिए समय-समय पर अभियान चलाकर इन्हें नष्ट करना बहुत जरूरी है। इससे थानों का रिकॉर्ड एकदम साफ हो जाता है और पुलिस के कामकाज में ईमानदारी बनी रहती है।

गाजियाबाद पुलिस ने इन नशीले पदार्थों को खुले में नहीं जलाया। खुले में जलाने से हवा जहरीली हो जाती है। इसके बजाय पुलिस इन्हें धौलाना के एक विशेष वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में लेकर गई। वहाँ पूरी सावधानी और नियमों के साथ इन्हें नष्ट किया गया। इससे पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश पुलिस का यह कदम देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मिसाल है। यह दिखाता है कि कैसे कड़े नियमों का पालन करके जनता की भलाई और सुरक्षा की जा सकती है।

‘अजय राय ने मोदी की #$% फाड़ दी’: उत्तर प्रदेश कांग्रेस चीफ राय ने मोदी पर की घटिया टिप्पणी

                                         उत्तर प्रदेश कांग्रेस चीफ ने मोदी पर की अभद्र टिप्पणी
लगता मोदी विरोध में राहुल गाँधी ही नहीं शायद पूरी कांग्रेस अपना दिमागी संतुलन खो चुकी है। जिसे देख यह कहने में संकोच नहीं कि कांग्रेस को वोट देना मतदाता द्वारा भी अपने दिमागी दिवालियेपन का सबूत देगा।  

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस इकाई के मुखिया अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बेहद घटिया टिप्पणी की है। इसके बाद सोशल मीडिया पर जमकर बवाल मचा हुआ है। बीजेपी की IT सेल के मुखिया अमित मालवीय ने X पर राय का यह वीडियो शेयर किया है। यह वीडियो उत्तर प्रदेश के महोबा का है, जहाँ शुक्रवार (22 मई 2026) को राय एक दुष्कर्म पीड़िता से मिलने पहुँचे थे।

राय इस वीडियो में कह रहे हैं, “कह देना कि अजय राय ने मोदी की #$% फाड़ दी है।” मालवीय ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “कुछ दिन पहले जब यूपीपीसीसी चीफ अजय राय अस्वस्थ थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सार्वजनिक रूप से उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की थी।”

उन्होंने आगे लिखा, “आज वही अजय राय प्रधानमंत्री के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते कैमरे में कैद हुए। यही कांग्रेस की राजनीति का स्तर है- शिष्टाचार का जवाब अभद्रता से।”

वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस पर गंभीर नाराजगी जताई है। सीएम योगी ने X पर लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के विषय में उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा की गई अभद्र, असंसदीय और अक्षम्य टिप्पणी कांग्रेस के राजनीतिक कुसंस्कारों को प्रकट करती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “पूर्व में कांग्रेस के ‘युवराज’ भी अपने कुसंस्कार का परिचय दे चुके हैं। कॉन्ग्रेस अब हताशा, निराशा, कुंठा और मानसिक दिवालियेपन के शीर्ष स्तर पर पहुँच चुकी है। अब देश वासियों से क्षमा माँगने लायक भी स्थिति उनकी नहीं रही है।”