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सम्मान देकर बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा का जश्न मना रहा है ‘द इकॉनॉमिस्ट’, दिया ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड: पश्चिमी मीडिया की ‘नैतिकता’ की फिर खुली पोल

                                    द इकॉनॉमिस्ट (फोटो साभार : आईएएनएस/द इकोनॉमिस्ट)
हर साल दिसंबर महीने में यूरोपीय मैगज़ीन द इकॉनॉमिस्ट अपने प्रतिष्ठित ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड की घोषणा करती है। यह पुरस्कार किसी देश की समृद्धि या खुशहाली को नहीं, बल्कि उस देश द्वारा किए गए महत्वपूर्ण सुधारों को आधार बनाकर दिया जाता है। ऐसा दावा खुद ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ही करता है।

इस साल बांग्लादेश को यह सम्मान मिला है। द इकॉनॉमिस्ट ने कहा कि बांग्लादेश ने कथित ‘तानाशाही शासन’ को समाप्त करके यह अवॉर्ड प्राप्त किया। हालाँकि, इस दौरान मैगज़ीन ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रही हिंसा और उत्पीड़न को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

द इकॉनॉमिस्ट के अनुसार, ये अवॉर्ड उन देशों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले साल में महत्वपूर्ण प्रगति की हो। मैगज़ीन ने बताया कि बांग्लादेश ने शेख हसीना की सरकार को हटाकर ‘तकनीकी अंतरिम सरकार’ स्थापित की है, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं। इसके अलावा छात्र आंदोलनों की भी सराहना की गई, जिन्होंने शेख हसीना की सत्ता को समाप्त किया।

मैगज़ीन ने यह भी दावा किया कि शेख हसीना के हटने के बाद देश में ‘व्यवस्था बहाल’ हुई है और ‘आर्थिक स्थिरता’ आई है। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है? हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से 50,000 टन चावल की माँग की है और अडानी ग्रुप के बिजली बिल का बड़ा हिस्सा बकाया है। इसके अलावा बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि द इकॉनॉमिस्ट किस आर्थिक स्थिरता की बात कर रहा है।

लेकिन सबसे चिंता का विषय यह है कि द इकॉनॉमिस्ट ने बांग्लादेश में बढ़ती हिंदू विरोधी हिंसा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। शेख हसीना की सरकार के गिरने के महज तीन दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, व्यवसायों और घरों पर 205 से अधिक हमले हुए। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है और अगस्त 2024 से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर विस्तार से रिपोर्ट दी है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का एक प्रमुख उदाहरण चिटगाँव में भगवान गणेश की मूर्तियों के साथ की गई तोड़फोड़ है। इसी तरह पबना और किशोरगंज जिलों में दुर्गा की मूर्तियों को नष्ट किया गया। ये घटनाएँ बांग्लादेश में धार्मिक असहिष्णुता के बढ़ते स्तर को दर्शाती हैं, लेकिन द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

अब सवाल यह उठता है, क्या कोई देश सच में ‘सुधार’ कर सकता है, जबकि उसके अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा और दमन बढ़ रहा हो? भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या पिछले तीन सालों में तेजी से बढ़ी है। 2022 में हिंदुओं पर 47 हमले दर्ज हुए थे, 2023 में यह संख्या 302 हो गई, जो 2022 के मुकाबले 545% अधिक थी। वहीं, 2024 में यह संख्या 2,200 तक पहुँच गई, जो 2023 से 628% और 2022 के मुकाबले 4,580% अधिक थी। इन आँकड़ों के बावजूद द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं पर चुप्पी साध रखी है, जिससे उनकी ‘प्रगति’ की परिभाषा पर गंभीर सवाल उठते हैं।

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा करना एक व्यापक समस्या का हिस्सा है, जो उपमहाद्वीप में हिंदू समुदाय के हाशिए पर जाने और उनके उत्पीड़न को दर्शाता है। हाल के महीनों में बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। इन समूहों ने हिंदुओं और उनके संगठनों को परेशान करने के लिए ईशनिंदा के आरोपों का सहारा लिया है। हृदय पाल और उस्ताद मंडल के मामले इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।
यहाँ तक कि इस्कॉन जैसे हिंदू संगठन भी इस अत्याचार से बच नहीं सके। इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश और हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी, हिंदू संस्थानों को निशाना बनाने की सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है। अंतरिम सरकार द्वारा हिंदू विरोध प्रदर्शनों को दबाने और उन पर देशद्रोह जैसे झूठे आरोप लगाने के फैसले से यह साफ होता है कि उनकी स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए एक साजिश चल रही है।

द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू-विरोधी पक्षपात पुराना

सालों से द इकॉनॉमिस्ट ने यह साबित किया है कि उसका हिंदुओं, हिंदुत्व और भारतीय सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्पष्ट झुकाव है। यह पक्षपात लगातार हिंदू राष्ट्रवाद को ‘चरमपंथी’ आंदोलन के रूप में पेश करने के प्रयासों में दिखता है, जबकि इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को अनदेखा किया गया है।
हमारे शोध के दौरान यह पाया गया कि द इकॉनॉमिस्ट की रिपोर्टिंग में एक बार-बार दोहराया जाने वाला विषय है, जिसमें हिंदुत्व को एक रूढ़िवादी और वर्चस्ववादी विचारधारा के रूप में दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, अपने एक लेख ‘What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?’ में इस मैगजीन ने हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने वाले हथियार के तौर में पेश किया।
इसके साथ ही द इकॉनॉमिस्ट भारत की नीतियों और घटनाओं के संदर्भ को तोड़-मरोड़कर पेश करने या पूरी तरह अनदेखा करने का प्रयास करता है। उदाहरण के तौर पर, उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण कानून बताया, जबकि इसके मूल उद्देश्य को नजरअंदाज कर दिया।
नरेंद्र मोदी को भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया गया था 
प्रधानमंत्री मोदी के शासन की कवरेज भी द इकॉनॉमिस्ट के इस पक्षपाती दृष्टिकोण को दिखाती है। उदाहरण के लिए, “How Narendra Modi is remaking India into a Hindu state” जैसे लेखों में पत्रिका ने सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जबकि सरकार द्वारा चलाए जा रहे कई कल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया।

पश्चिमी देशों का सेलेक्टिव अप्रोच

पश्चिमी देशों की चयनात्मक नैतिकता इस समस्या को और बढ़ाती है। बढ़ते सबूतों के बावजूद वैश्विक संस्थाएँ और मीडिया हाउस इन अत्याचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने इन नफरत से भरे अपराधों को दस्तावेज़ करने से परहेज किया है। हमारी एक रिपोर्ट के अनुसार, OHCHR ने इन हमलों को धार्मिक घृणा अपराध मानने से इनकार कर दिया है, जो हिंसा को नजरअंदाज करने की सोची-समझी कोशिश को दर्शाता है। इसके बजाय, वे व्यापक सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इन घटनाओं के धार्मिक पहलुओं को छिपा देते हैं।
भारतीय मीडिया पोर्टल द वायर ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को छिपाने या कमकर दिखाने का प्रयास किया है। हाल ही में एक खुलासे में यह पाया गया कि द वायर ने जातीय सफाए को ‘अतिरंजित’ या ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताने की कोशिश की है, जिससे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों की जिम्मेदारी को कम किया गया। ऐसी रिपोर्टिंग न केवल पाठकों को गुमराह करती है, बल्कि यह उन खतरनाक विचारों को बढ़ावा देती है, जो हिंदू अल्पसंख्यकों के दर्द और पीड़ा को कमतर आँकते हैं।
बीबीसी ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा की रिपोर्टिंग के लिए आलोचना का सामना किया है। ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे बीबीसी ने हिंदुओं के खिलाफ टारगेटेड हिंसा और हमलों को ‘राजनीतिक हिंसा’ के तौर पर पेश किया और धार्मिक मामले को नजरअंदाज किया। बीबीसी ने इसे व्यापक राजनीतिक अशांति से जोड़ते हुए इस बात को छिपा दिया कि यह हिंसा सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हो रही है। इससे न केवल हिंदुओं के खिलाफ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न को अनदेखा किया गया, बल्कि अंतरिम सरकार और अपराधियों की जिम्मेदारी को भी कम कर दिया गया।
पश्चिमी मीडिया और संस्थाओं का यह दोहरा रवैया लंबे समय से जारी है। द इकॉनॉमिस्ट, द वायर और बीबीसी जैसे मीडिया पोर्टल्स ने लगातार हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की गंभीरता को कम करके दिखाया है। वे इन घटनाओं को अक्सर ‘राजनीतिक’ या ‘आर्थिक अशांति’ के रूप में पेश करते हैं और धार्मिक संदर्भों को नजरअंदाज करते हैं। इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को गलत तरीके से पेश करती है, बल्कि अपराधियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिम्मेदारी से बचने का मौका भी देती है।
वास्तव में द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू विरोधी और पक्षपाती रवैया केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हिंदू विरोधी विचारों को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। इस पत्रिका की रिपोर्टिंग और इसके द्वारा उठाए गए मुद्दे अक्सर इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, जिसमें हिंदुओं के धार्मिक पहचान को निशाना बनाया जाता है और हिंदुओं पर ही चरमपंथ के आरोप लगाए जाते हैं, जोकि सच्चाई से एकदम उलट है।

घरों में कैद रहने के कारण अरब की औरतें मर्दों से ज्यादा दिखती हैं ‘थुलथुल’: द इकोनॉमिस्ट

द इकोनॉमिस्ट पर फूटा मुस्लिमों का गुस्सा
विदेश के जाने-माने समाचार पत्र ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने हाल में अरब औरतों पर लिखे एक लेख में ‘मोटी’ शब्द का प्रयोग किया। इस लेख की शुरुआत जेनब नाम की महिला से हुई जिसका वजन 120 किलो है।

इस लेख का शीर्षक जहाँ दिया गया, “आखिर अरब जगत में औरतें जो हैं वो मर्दों से मोटी क्यों होती हैं।” वहीं इस लेख का निष्कर्ष यह दिखाया गया कि अरब में औरतें ज्यादातर घर में रहती हैं इसलिए वह मोटी होती हैं। इसके अनुसार औरतों को ज्यादा बाहर खेलने-कूदने का मौका नहीं मिलता जिससे वह मोटी हो जाती हैं जबकि जो मर्द हैं वो खेलते हैं, मजदूरी करते हैं, काम करते हैं और बाहर जाते रहते हैं।

जेनब का वर्णन करते हुए द इकोनॉमिस्ट ने बताया कि 60 साल की उम्र में ‘जेनब’ बगदाद के रेस्टोरेंट में काम करती है और उसका बॉस उसे वहाँ आखिरी में बचा तला-भुना खाना देता है। लेख के मुताबिक ऐसा खाना खा-खाकर जेनब 120 किलो की हो गई और उसकी बेटियों का वजन भी कुछ न करने के कारण आगे बढ़ता जाएगा।

द इकोनॉमिस्ट से नाराज हुए मुस्लिम

इस लेख और इसके शीर्षक को पढ़ने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स गुस्से से आग बबूला हो गए हैं। कई यूजर्स ने इस लेख को घटिया बताते हुए इसे तथ्यों से परे बताया है।
वहीं अरब से जुड़े लोगों ने उनके पूछा है कि आखिर द इकोनॉमिस्ट को उनसे समस्या क्या है। क्यों एक के बाद एक घटिया लेख उनपे लिखे जाते हैं।
इस लेख में मोटी शब्द का प्रयोग देखने के बाद लोग उन स्टडीज का जिक्र कर रहे हैं जो बताती हैं कि इंग्लैंड और अमेरिका में मोटापे के चलते कितनी गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं।
एक यूजर ने लिखा, “इस अखबार को अरब और इराक की महिलाओं से माफी माँगनी चाहिए। इन्होंने इस आर्टिकल से अरब महिलाओं की और उनके शरीर में होने वाले बदलावों की बेईज्जती की है जो बच्चे को जन्म देने के बाद होते हैं। ये बेहद शर्मनाक है।” यूजर ने कहा कि न केवल द इकोनॉमिस्ट को ये तस्वीर हटानी चाहिए बल्कि जिस महिला कलाकार की फोटो शेयर की है, उससे माफी भी माँगनी चाहिए।
इसी तरह भारत में दलितों के विरुद्ध झूठ फैलाने वाली इरेना अकबर भी इस लेख से आहत दिखीं। उन्होंने गुस्से में पूछा क्या ये घटिया अखबर ये भी बताएगा कि पश्चिम में औरतें, पुरुषों से मोटी क्यों हैं। उन्होंने इस अखबार को नारीविरोधी और इस्लामोबिक बताया।
बलसम मुस्तफा ने आर्टिकल में प्रयोग की गई महिला कलाकार की तस्वीर पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जो महिला तस्वीर में दिख रही है वो बहुत छोटेपन से हर टैबू को तोड़ती आई है। उसे तो सम्मान दिया जाना चाहिए, न कि उसे या किसी और अरब महिला को बॉडी शेम।
इसी तरह अन्य यूजर्स भी द इकोनॉमिस्ट पर गुस्सा उतारते हुए दिखे। कुछ ने इल्जाम लगाया कि ये विदेशी अखबर अरब वालों से चिढ़ता है क्योंकि वहाँ की औरतों के पास ज्यादा अधिकार हैं। अगर वहाँ उन्हें कोई परेशान करता है तो सीधे जेल में होगा।