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‘भाषा-कला-खाना-पहनावा… सब मुगलों की देन’: ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने यूँ किया इस्लामी आक्रांताओं का महिमामंडन, बाबर से पहले देश में कुछ नहीं था क्या?

                                                  'द इकोनॉमिस्ट' के लेख में मुगलों का गुणगान

1992 की बॉलीवुड फिल्म ‘बेमिसाल’ के एक सीन में अमिताभ बच्चन ने कहा था, “कश्मीर को छोड़कर, भारत के सभी हिल स्टेशन अंग्रेजों ने खोजे थे, कश्मीर को मुगलों ने खोजा था।” यह बात उन्होंने राखी गुलजार यानी कविता से कही थी। उस वक्त कविता मुगल शासकों की ‘शानदार संगीत, चित्रकला और वास्तुकला’ के लिए तारीफ कर रही थीं और जोर दे रही थीं कि उनका कोई मुकाबला नहीं है। तब अमिताभ ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि उनकी सबसे बड़ी देन तो ‘मुगलाई खाना’ है।

यह क्लिप 2022 में फिर से सामने आई और वायरल हो गई। लोगों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि फिल्म इंडस्ट्री किस तरह लगातार सच को तोड़-मरोड़कर पेश करती है, ताकि हमलावरों को महिमा मंडित किया जा सके। वैसे भी यह हिंदू-विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए बदनाम रही है।

अब 2026 की बात करें, तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने उस फिल्मी सीन को अपने तरीके से लिखा है। इसमें मुगल वंश को ‘भाषा, खान-पान, वास्तुकला, संगीत, कला और मिली-जुली संस्कृति’ का श्रेय दिया गया है। साथ ही, व्यंग्य करते हुए यह भी जोड़ा गया है कि इसी वंश की वजह से 2014 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई।

“What have the Mughals ever done for us?” शीर्षक वाला लेख 19 अप्रैल 2026 (रविवार) को प्रकाशित हुआ। इसके साथ यह टैगलाइन थी कि भारत के सबसे महान मुस्लिम साम्राज्य ने अपनी सबसे शक्तिशाली हिंदू पार्टी का निर्माण कैसे किया।

यह मुस्लिम शासकों का स्तुतिगान है, जो यह बताता है कि मुगलों ने भारत को समृद्ध बनाया। लेकिन, मुगलों के प्रभाव के बिना भी भारत की हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक सभ्यता थी। यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत थी। कला और विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियाँ थीं। साहित्य में योगदान था और जिसकी एक समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत थी।

बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। वह परिवारिक झगड़ों और लड़ाइयों में बार-बार मिली हार के कारण अपने पैतृक घर फरगना (जो अब उज़्बेकिस्तान में है) से बेदखल हो गया। इसकी वजह से वह भारत की ओर रुख किया। उसे यहाँ की अपार धन-संपदा और संसाधनों ने आकर्षित किया था। वह इस्लामी आक्रमणकारी था।

इस्लामवादियों से लेकर श्वेत उपनिवेशवादियों तक— सभी भारत को लूटने आए थे। इसका शोषण करने आए थे। इसमें वे सफल भी रहे। आक्रमणकारी किसी भी तरह से यहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन करवाना चाहते थे। मुगलों का उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही था।

मुगलों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया: एक हास्यास्पद तर्क

‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक, “उन सभी में, मुगलों का शासन सबसे लंबे समय तक चला। 21 अप्रैल को पानीपत की पहली लड़ाई के ठीक 500 साल पूरे हो रहे हैं; यह वह समय था जब तैमूरलंग और चंगेज खान के मध्य एशियाई वंशज बाबर (इसीलिए ‘मुगल’, जो ‘मंगोल’ शब्द से बना है) ने दिल्ली के अंतिम सुल्तान को हराया था।

उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य, अपने चरमोत्कर्ष पर, दुनिया के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। इसके शासकों ने भारतीय राजशाही की रीतियों को अपनाया, स्थानीय लोगों से विवाह किए, और वास्तव में वे भारतीय ही बन गए (अंग्रेजों के विपरीत)। उनकी उपलब्धियाँ भारतीय ही हैं,”

मुगल साम्राज्य की धन-संपदा और सत्ता का स्रोत वह भारतीय भूभाग ही था, जिसे उन्होंने सदियों तक लूटा-खसोटा। उन्होंने देश की फलती-फूलती प्राचीन रीतियों और परंपराओं का लाभ उठाकर नई संरचनाएँ खड़ी कीं। इन संरचनाओं का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके किया गया था। बाद में इन्हें ‘समन्वय के प्रतीक’ स्मारक के रूप में महिमामंडित किया गया।

वे अपनी लूटी हुई धन-संपत्ति को अपनी मूल मातृभूमि तक नहीं ले जा सके, क्योंकि उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों द्वारा वहाँ से खदेड़ दिया गया था। बाबर ने वापस जाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो पाया।

दरअसल वे भारत में किसी प्रेम या लगाव के कारण नहीं, बल्कि केवल मजबूरी के कारण रुके रहे। भारत के प्रति उनके तथाकथित प्रेम का एक और प्रमाण इस बात से मिलता है कि बाबर के पार्थिव अवशेषों को, उसकी इच्छानुसार काबुल ले जाकर दफनाया गया। वह उसी स्थान को अपना ‘घर’ मानता था।

वामपंथी-उदारवादी खेमा (लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड) आमतौर पर आक्रमणकारियों की निंदा का तो स्वागत करते हैं, लेकिन तब नहीं, जब वे अत्याचार भारत या हिंदुओं के विरुद्ध किए गए हों। ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या उन्हें सही ठहराने जाता है। जैसा कि इस लेख (कॉलम) में देखा जा सकता है, उनका गुणगान किया जाता है।

इसी क्रम में, ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी मजाक उड़ाया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने भारत के उस इतिहास का जिक्र किया था, जिसमें भारत को विदेशी शक्तियों के अधीन रहना पड़ा।

इतिहासकारों ने माना कि मुगलों ने मंदिरों तोड़ा, साथ ही दावा किया कि इसे उनका अपमान नहीं माना जा सकता। ‘जजिया’ लगाना, हिंदुओं का नरसंहार और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन, जिनका जिक्र इस्लामी शासकों ने खुद अपनी लेखनी में किया था, उन्हें उसने आसानी से नजरअंदाज कर दिया।

हालाँकि वह गुट जो छोटी-मोटी घटनाओं को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ‘उकसावा’ करार देता है, वह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों पर हुए हमलों को अपमान नहीं मानता। वह यह कहना चाहता है कि इसे आस्था पर हमला नहीं समझा जाना चाहिए। ध्यान दें तो हिंदू-विरोधी आचरण को सामान्य सी बात मानता है।

इसके बाद लेखक ने कहा, “उन्होंने भारत के पास जो कुछ भी था, सब ले लिया। साथ ही, यह विचारधारा पूछती है कि बदले में उन्होंने हमें क्या दिया?” फिर मुगलों का गुणगान करना शुरू कर देता है।

मुगलों के जरिए भारत का परिचय फारस से हुआ, जिन्होंने भारतीय भाषा में योगदान दिया- द इकोनॉमिस्ट

लेख में जोर देकर कहा गया, “उनके ऊपर दिए गए उद्धरण के मूल 28 शब्दों में से, एक-चौथाई शब्द फारसी के जरिए भारत में आए। यह बात मुस्लिम भारत के इतिहासकार रिचर्ड ईटन बताते हैं। मुगल दरबार की भाषा ने उत्तरी भारत की ज्यादातर भाषाओं को प्रभावित किया है। सच तो यह है कि हिंदी और हिंदू—दोनों ही ‘हिंद’ शब्द से आए हैं। यह उस नदी का फारसी नाम है, जिसे अंग्रेजी में ‘इंडस’ (और इस तरह ‘इंडिया’) कहा जाता है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद में ‘हिंदू’ शब्द जोड़ने के अलावा, मुगलों ने हमारे लिए और क्या किया है?”

भारत में भाषाओं का सबसे विविध संग्रह मौजूद है, जो समय के साथ लगातार विकसित होता रहा है। भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और समय के साथ आगे बढ़ती हैं। इसी तरह हिंदी का फारसी के साथ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के एक ही पूर्वज है। हालाँकि हिन्दी की जड़ें संस्कृत में हैं। भाषाओं का यह जुड़ाव मुगलों के प्रभाव से ज्यादा, इन भाषाओं के मूल से संबंधित था।

अगर इसी तर्क को माना जाए, तो अंग्रेजी भाषा का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करना गलत, भ्रामक और ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। ठीक वैसे ही, जैसा कि मौजूदा तर्क है। इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि भाषा, कला और साहित्य के प्रसार के लिए दमन की जरूरत नहीं होती। कई देश बिना किसी की गुलामी किए भी विदेशी भाषाओं को अपना चुके हैं।

मुगलों ने भारतीय खान-पान और वास्तुकला में एक खास नजाकत जोड़ी- द इकोनॉमिस्ट

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने मुगलों की तारीफ करते हुए उनके खान-पान पर जोर दिया। इन्हें अक्सर ‘मुगलाई’ कहा जाता है, इनमें तंदूरी व्यंजन और बिरयानी शामिल हैं।

“तंदूर—मिट्टी का एक ओवन जिससे परतदार नान और भुने हुए कबाब निकलते हैं— फारसी दुनिया से आया था। ठीक वैसे ही जैसे समोसे, शरबत, अलग-अलग तरह की मिठाइयाँ और बिरयानी आई थीं। बिरयानी पिछले दस सालों से लगातार डिलीवरी ऐप्स पर भारत में सबसे ज्यादा ऑर्डर की जाने वाली डिश रही है।

BJP का वह धड़ा, जो मौज-मस्ती का विरोधी है, वह मांस और अंडों को पसंद नहीं करता, लेकिन शाकाहारी लोग भी अच्छे तंदूरी पनीर का मजा लेते हैं। लेख में कहा गया है कि पनीर शब्द फारसी के ‘पनीर’ से आया है, जो एक तरह का चीज है और शायद अफगानों के जरिए भारत पहुँचा।

तंदूर का आविष्कार सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यताओं में हुआ था। मध्य एशिया में बाबर के राज में चावल की खेती नहीं होती थी, जबकि बिरयानी का एक मुख्य हिस्सा चावल ही है। भारतीय उपमहाद्वीप मशहूर मसालों के लिए मशहूर रहा है। लेकिन यह विचार कि मसालों और मीट के साथ पकाया गया चावल एक बेहतरीन डिश बन सकता है, इसके लिए शायद मुगलों का ही शुक्रिया अदा करना होगा।

लेख के अनुसार, मुगलों के आने से पहले भारतीय लोग शायद संघर्ष कर रहे थे या बहुत ही साधारण भोजन पर निर्भर थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनके पास स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का ज्ञान और महारत नहीं थी। इसके बाद भारतीय मजदूरों और संसाधनों से तैयार की गई भव्य परियोजनाओं के लिए मुगलों की तारीफ की गई।

लेख में बताया गया, “भारत के दस सबसे मशहूर ऐतिहासिक स्थलों में से चार (जिनके लिए टिकट लगता है), जिन्हें स्थानीय पर्यटक सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं और विदेशियों की पसंद वाली सूची के छह स्थल मुगलों के ही बनवाए हुए हैं। इन दोनों सूचियों में ताजमहल सबसे ऊपर है। हर साल प्रधानमंत्री लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हैं। यह दिल्ली में स्थित एक मुगल स्मारक है और भारत की अपनी पहचान के लिए इतना अहम है कि यह हमारे सबसे आम नोट के पीछे भी छपा हुआ है।”

विडंबना यह है कि इन इमारतों का निर्माण उस समय हुआ था, जब आम भारतीय (ज्यादातर हिंदू) मुगलों की तानाशाही और बर्बरता को झेल रहे थे। ये इमारतें मुगलों की बेहद आलीशान जीवनशैली की प्रतीक हैं और इन्हें उनके समृद्ध साम्राज्य की शान दिखाने के लिए ही बनाया गया था।

इसके अलावा उनके पास इस धन-दौलत को मध्य एशिया ले जाने का कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मर्जी के मुताबिक और अपने फायदे के लिए ही इस धन का इस्तेमाल किया।

बहरहाल, ये सभी ऐतिहासिक स्थल पूरी तरह से भारत की संपत्ति हैं। चुनी हुई सरकार का पूरा अधिकार है कि वह इनका इस्तेमाल मुद्रा (नोटों) पर छापने के लिए करे या किसी अन्य काम के लिए। फिर भी, इससे इन स्थलों से जुड़ा इतिहास या मुगलों की वह धूमिल विरासत मिट नहीं जाती। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू की नींव संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में है, फिर भी इस बात को खुलकर नहीं बताया जाता, क्योंकि ऐसा करने से मुस्लिम बादशाहों की बड़ाई करने वाले एजेंडे कमजोर पड़ जाएँगे।

शेरवानी, सितार और BJP की जबरदस्त बढ़त के लिए मुगल जिम्मेदार हैं- द इकोनॉमिस्ट

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने शेरवानी और सितार को लेकर मुगलों की खूब तारीफ़ की। ये दोनों चीज़ें 16वीं और 18वीं सदी के बीच विकसित हुई थीं। इसने इतिहासकार जदुनाथ सरकार का हवाला देते हुए कहा, “मध्यकालीन भारत के लोकप्रिय धर्म सूफीवाद, उर्दू भाषा और कला—विजेताओं और पराजितों की साझा विरासत थे। इन्होंने इन दोनों को आपस में जोड़ने का काम किया।

लेख में अकबर के कथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ के उस घिसे-पिटे और उबाऊ ढोंग का प्रचार किया, जिसने हिंदू महाकाव्यों का अनुवाद करवाया था। साथ ही, उस समुदाय के खिलाफ चलाए गए अपने हिंसक अभियानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। मानो यह महिमामंडन ही काफी न हो, इस लेख ने हिंदू मान्यताओं का उपहास उड़ाते हुए यह दावा भी कर दिया कि अगर राम जन्मभूमि पर ‘बाबरी मस्जिद’ न होती, तो ‘भगवा पार्टी’ (BJP) कभी सत्ता में नहीं आ पाती।

लेख में कहा गया, “1990 में, जब पार्टी के पास संसद में केवल 16% सीटें थीं, तब उसने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया। इसमें रामजन्मभूमि स्थल पर एक मंदिर बनाने की माँग की गई। इसे रामायण के नायक भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है। उस जगह पर एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे पहले मुगल बादशाह बाबर के शासनकाल में बनवाया गया था।”

इसमें कहा गया, “1992 में, BJP के अधिकारियों की मौजूदगी में एक भीड़ ने उस मस्जिद को ढहा दिया। इस घटना से पूरे देश में हिंसा की आग भड़क उठी, जिसने पार्टी के जनाधार को मजबूत किया और अंततः उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचा दिया। 2024 की शुरुआत में, जब मोदी ने उस बहुप्रतीक्षित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, तब तक उनकी पार्टी के पास 56% सीटें हो चुकी थीं। पिछले एक दशक में पार्टी ने मुगल-कालीन शहरों के नाम बदलने, मुगलई खान-पान को नकारने और इतिहास की किताबों से मुगलों का जिक्र मिटाने पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रखा है।”

राम मंदिर हिंदू धर्म का मूल आधार है। इसे महज एक चुनावी हथकंडा बताकर उसकी गरिमा को कम करने की कोशिश की गई। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि BJP ने इस मुद्दे का समर्थन किया था। इस मीडिया संस्थान ने बाबर को नायक के तौर पर दिखाया, जबकि वह मंदिरों को ढहाने वाला था। वहीं दूसरी ओर BJP को हिंदुओं के अधिकारों की पैरवी करने के कारण, एक खलनायक के तौर पर पेश किया गया।

लेख के आखिर में कहा गया, “ईंटों से बनी किसी इमारत को ढहा देना एक बात है, लेकिन उस संस्कृति को मिटाना कहीं ज्यादा मुश्किल है। यह पाँच सदियों से भी ज्यादा समय से भारत के खून और मिट्टी में रच-बस गई है। तो फिर उनके इस सवाल का सबसे अच्छा जवाब यही है कि मुगलों ने उनके लिए आखिर किया क्या है। उन्होंने राजनीतिक हिंदुत्व को उसका एक ऐसा ‘खलनायक’ दिया, जो हमेशा रहेगा और जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता।”

इंटरनेट यूजर्स ने जताई हैरानी

एक यूज़र ने इस पर टिप्पणी करते हुए लेक को बेतुका करार दिया। उसने लिखा “यह कहना कि मुगलों की वजह से ही नरेंद्र मोदी की पार्टी सत्ता में आई, कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर और नाजियों ने ही इजरायल देश बनाया था,”

वरुण ने मीडिया प्लेटफॉर्म से कहा कि वे अपने दायरे को केवल कला या संगीत तक ही सीमित न रखें, बल्कि सूर्य, चंद्रमा और हिमालय की रचना के लिए मुगलों का भी गुणगान करें।

‘द इकोनॉमिस्ट’ भी दूसरी मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों की तरह ही ऐसी कहानियाँ गढ़ने में माहिर है, जो भारत की उपलब्धियों का श्रेय विदेशियों को देती हैं। चाहे वे अतीत से जुड़ी हों या वर्तमान से। दरअसल ये भारतीय हिन्दू समाज की उपलब्धियों को नकारने का तरीका है।

सम्मान देकर बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा का जश्न मना रहा है ‘द इकॉनॉमिस्ट’, दिया ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड: पश्चिमी मीडिया की ‘नैतिकता’ की फिर खुली पोल

                                    द इकॉनॉमिस्ट (फोटो साभार : आईएएनएस/द इकोनॉमिस्ट)
हर साल दिसंबर महीने में यूरोपीय मैगज़ीन द इकॉनॉमिस्ट अपने प्रतिष्ठित ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड की घोषणा करती है। यह पुरस्कार किसी देश की समृद्धि या खुशहाली को नहीं, बल्कि उस देश द्वारा किए गए महत्वपूर्ण सुधारों को आधार बनाकर दिया जाता है। ऐसा दावा खुद ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ही करता है।

इस साल बांग्लादेश को यह सम्मान मिला है। द इकॉनॉमिस्ट ने कहा कि बांग्लादेश ने कथित ‘तानाशाही शासन’ को समाप्त करके यह अवॉर्ड प्राप्त किया। हालाँकि, इस दौरान मैगज़ीन ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रही हिंसा और उत्पीड़न को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

द इकॉनॉमिस्ट के अनुसार, ये अवॉर्ड उन देशों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले साल में महत्वपूर्ण प्रगति की हो। मैगज़ीन ने बताया कि बांग्लादेश ने शेख हसीना की सरकार को हटाकर ‘तकनीकी अंतरिम सरकार’ स्थापित की है, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं। इसके अलावा छात्र आंदोलनों की भी सराहना की गई, जिन्होंने शेख हसीना की सत्ता को समाप्त किया।

मैगज़ीन ने यह भी दावा किया कि शेख हसीना के हटने के बाद देश में ‘व्यवस्था बहाल’ हुई है और ‘आर्थिक स्थिरता’ आई है। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है? हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से 50,000 टन चावल की माँग की है और अडानी ग्रुप के बिजली बिल का बड़ा हिस्सा बकाया है। इसके अलावा बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि द इकॉनॉमिस्ट किस आर्थिक स्थिरता की बात कर रहा है।

लेकिन सबसे चिंता का विषय यह है कि द इकॉनॉमिस्ट ने बांग्लादेश में बढ़ती हिंदू विरोधी हिंसा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। शेख हसीना की सरकार के गिरने के महज तीन दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, व्यवसायों और घरों पर 205 से अधिक हमले हुए। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है और अगस्त 2024 से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर विस्तार से रिपोर्ट दी है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का एक प्रमुख उदाहरण चिटगाँव में भगवान गणेश की मूर्तियों के साथ की गई तोड़फोड़ है। इसी तरह पबना और किशोरगंज जिलों में दुर्गा की मूर्तियों को नष्ट किया गया। ये घटनाएँ बांग्लादेश में धार्मिक असहिष्णुता के बढ़ते स्तर को दर्शाती हैं, लेकिन द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

अब सवाल यह उठता है, क्या कोई देश सच में ‘सुधार’ कर सकता है, जबकि उसके अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा और दमन बढ़ रहा हो? भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या पिछले तीन सालों में तेजी से बढ़ी है। 2022 में हिंदुओं पर 47 हमले दर्ज हुए थे, 2023 में यह संख्या 302 हो गई, जो 2022 के मुकाबले 545% अधिक थी। वहीं, 2024 में यह संख्या 2,200 तक पहुँच गई, जो 2023 से 628% और 2022 के मुकाबले 4,580% अधिक थी। इन आँकड़ों के बावजूद द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं पर चुप्पी साध रखी है, जिससे उनकी ‘प्रगति’ की परिभाषा पर गंभीर सवाल उठते हैं।

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा करना एक व्यापक समस्या का हिस्सा है, जो उपमहाद्वीप में हिंदू समुदाय के हाशिए पर जाने और उनके उत्पीड़न को दर्शाता है। हाल के महीनों में बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। इन समूहों ने हिंदुओं और उनके संगठनों को परेशान करने के लिए ईशनिंदा के आरोपों का सहारा लिया है। हृदय पाल और उस्ताद मंडल के मामले इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।
यहाँ तक कि इस्कॉन जैसे हिंदू संगठन भी इस अत्याचार से बच नहीं सके। इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश और हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी, हिंदू संस्थानों को निशाना बनाने की सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है। अंतरिम सरकार द्वारा हिंदू विरोध प्रदर्शनों को दबाने और उन पर देशद्रोह जैसे झूठे आरोप लगाने के फैसले से यह साफ होता है कि उनकी स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए एक साजिश चल रही है।

द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू-विरोधी पक्षपात पुराना

सालों से द इकॉनॉमिस्ट ने यह साबित किया है कि उसका हिंदुओं, हिंदुत्व और भारतीय सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्पष्ट झुकाव है। यह पक्षपात लगातार हिंदू राष्ट्रवाद को ‘चरमपंथी’ आंदोलन के रूप में पेश करने के प्रयासों में दिखता है, जबकि इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को अनदेखा किया गया है।
हमारे शोध के दौरान यह पाया गया कि द इकॉनॉमिस्ट की रिपोर्टिंग में एक बार-बार दोहराया जाने वाला विषय है, जिसमें हिंदुत्व को एक रूढ़िवादी और वर्चस्ववादी विचारधारा के रूप में दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, अपने एक लेख ‘What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?’ में इस मैगजीन ने हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने वाले हथियार के तौर में पेश किया।
इसके साथ ही द इकॉनॉमिस्ट भारत की नीतियों और घटनाओं के संदर्भ को तोड़-मरोड़कर पेश करने या पूरी तरह अनदेखा करने का प्रयास करता है। उदाहरण के तौर पर, उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण कानून बताया, जबकि इसके मूल उद्देश्य को नजरअंदाज कर दिया।
नरेंद्र मोदी को भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया गया था 
प्रधानमंत्री मोदी के शासन की कवरेज भी द इकॉनॉमिस्ट के इस पक्षपाती दृष्टिकोण को दिखाती है। उदाहरण के लिए, “How Narendra Modi is remaking India into a Hindu state” जैसे लेखों में पत्रिका ने सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जबकि सरकार द्वारा चलाए जा रहे कई कल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया।

पश्चिमी देशों का सेलेक्टिव अप्रोच

पश्चिमी देशों की चयनात्मक नैतिकता इस समस्या को और बढ़ाती है। बढ़ते सबूतों के बावजूद वैश्विक संस्थाएँ और मीडिया हाउस इन अत्याचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने इन नफरत से भरे अपराधों को दस्तावेज़ करने से परहेज किया है। हमारी एक रिपोर्ट के अनुसार, OHCHR ने इन हमलों को धार्मिक घृणा अपराध मानने से इनकार कर दिया है, जो हिंसा को नजरअंदाज करने की सोची-समझी कोशिश को दर्शाता है। इसके बजाय, वे व्यापक सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इन घटनाओं के धार्मिक पहलुओं को छिपा देते हैं।
भारतीय मीडिया पोर्टल द वायर ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को छिपाने या कमकर दिखाने का प्रयास किया है। हाल ही में एक खुलासे में यह पाया गया कि द वायर ने जातीय सफाए को ‘अतिरंजित’ या ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताने की कोशिश की है, जिससे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों की जिम्मेदारी को कम किया गया। ऐसी रिपोर्टिंग न केवल पाठकों को गुमराह करती है, बल्कि यह उन खतरनाक विचारों को बढ़ावा देती है, जो हिंदू अल्पसंख्यकों के दर्द और पीड़ा को कमतर आँकते हैं।
बीबीसी ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा की रिपोर्टिंग के लिए आलोचना का सामना किया है। ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे बीबीसी ने हिंदुओं के खिलाफ टारगेटेड हिंसा और हमलों को ‘राजनीतिक हिंसा’ के तौर पर पेश किया और धार्मिक मामले को नजरअंदाज किया। बीबीसी ने इसे व्यापक राजनीतिक अशांति से जोड़ते हुए इस बात को छिपा दिया कि यह हिंसा सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हो रही है। इससे न केवल हिंदुओं के खिलाफ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न को अनदेखा किया गया, बल्कि अंतरिम सरकार और अपराधियों की जिम्मेदारी को भी कम कर दिया गया।
पश्चिमी मीडिया और संस्थाओं का यह दोहरा रवैया लंबे समय से जारी है। द इकॉनॉमिस्ट, द वायर और बीबीसी जैसे मीडिया पोर्टल्स ने लगातार हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की गंभीरता को कम करके दिखाया है। वे इन घटनाओं को अक्सर ‘राजनीतिक’ या ‘आर्थिक अशांति’ के रूप में पेश करते हैं और धार्मिक संदर्भों को नजरअंदाज करते हैं। इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को गलत तरीके से पेश करती है, बल्कि अपराधियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिम्मेदारी से बचने का मौका भी देती है।
वास्तव में द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू विरोधी और पक्षपाती रवैया केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हिंदू विरोधी विचारों को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। इस पत्रिका की रिपोर्टिंग और इसके द्वारा उठाए गए मुद्दे अक्सर इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, जिसमें हिंदुओं के धार्मिक पहचान को निशाना बनाया जाता है और हिंदुओं पर ही चरमपंथ के आरोप लगाए जाते हैं, जोकि सच्चाई से एकदम उलट है।

घरों में कैद रहने के कारण अरब की औरतें मर्दों से ज्यादा दिखती हैं ‘थुलथुल’: द इकोनॉमिस्ट

द इकोनॉमिस्ट पर फूटा मुस्लिमों का गुस्सा
विदेश के जाने-माने समाचार पत्र ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने हाल में अरब औरतों पर लिखे एक लेख में ‘मोटी’ शब्द का प्रयोग किया। इस लेख की शुरुआत जेनब नाम की महिला से हुई जिसका वजन 120 किलो है।

इस लेख का शीर्षक जहाँ दिया गया, “आखिर अरब जगत में औरतें जो हैं वो मर्दों से मोटी क्यों होती हैं।” वहीं इस लेख का निष्कर्ष यह दिखाया गया कि अरब में औरतें ज्यादातर घर में रहती हैं इसलिए वह मोटी होती हैं। इसके अनुसार औरतों को ज्यादा बाहर खेलने-कूदने का मौका नहीं मिलता जिससे वह मोटी हो जाती हैं जबकि जो मर्द हैं वो खेलते हैं, मजदूरी करते हैं, काम करते हैं और बाहर जाते रहते हैं।

जेनब का वर्णन करते हुए द इकोनॉमिस्ट ने बताया कि 60 साल की उम्र में ‘जेनब’ बगदाद के रेस्टोरेंट में काम करती है और उसका बॉस उसे वहाँ आखिरी में बचा तला-भुना खाना देता है। लेख के मुताबिक ऐसा खाना खा-खाकर जेनब 120 किलो की हो गई और उसकी बेटियों का वजन भी कुछ न करने के कारण आगे बढ़ता जाएगा।

द इकोनॉमिस्ट से नाराज हुए मुस्लिम

इस लेख और इसके शीर्षक को पढ़ने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स गुस्से से आग बबूला हो गए हैं। कई यूजर्स ने इस लेख को घटिया बताते हुए इसे तथ्यों से परे बताया है।
वहीं अरब से जुड़े लोगों ने उनके पूछा है कि आखिर द इकोनॉमिस्ट को उनसे समस्या क्या है। क्यों एक के बाद एक घटिया लेख उनपे लिखे जाते हैं।
इस लेख में मोटी शब्द का प्रयोग देखने के बाद लोग उन स्टडीज का जिक्र कर रहे हैं जो बताती हैं कि इंग्लैंड और अमेरिका में मोटापे के चलते कितनी गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं।
एक यूजर ने लिखा, “इस अखबार को अरब और इराक की महिलाओं से माफी माँगनी चाहिए। इन्होंने इस आर्टिकल से अरब महिलाओं की और उनके शरीर में होने वाले बदलावों की बेईज्जती की है जो बच्चे को जन्म देने के बाद होते हैं। ये बेहद शर्मनाक है।” यूजर ने कहा कि न केवल द इकोनॉमिस्ट को ये तस्वीर हटानी चाहिए बल्कि जिस महिला कलाकार की फोटो शेयर की है, उससे माफी भी माँगनी चाहिए।
इसी तरह भारत में दलितों के विरुद्ध झूठ फैलाने वाली इरेना अकबर भी इस लेख से आहत दिखीं। उन्होंने गुस्से में पूछा क्या ये घटिया अखबर ये भी बताएगा कि पश्चिम में औरतें, पुरुषों से मोटी क्यों हैं। उन्होंने इस अखबार को नारीविरोधी और इस्लामोबिक बताया।
बलसम मुस्तफा ने आर्टिकल में प्रयोग की गई महिला कलाकार की तस्वीर पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जो महिला तस्वीर में दिख रही है वो बहुत छोटेपन से हर टैबू को तोड़ती आई है। उसे तो सम्मान दिया जाना चाहिए, न कि उसे या किसी और अरब महिला को बॉडी शेम।
इसी तरह अन्य यूजर्स भी द इकोनॉमिस्ट पर गुस्सा उतारते हुए दिखे। कुछ ने इल्जाम लगाया कि ये विदेशी अखबर अरब वालों से चिढ़ता है क्योंकि वहाँ की औरतों के पास ज्यादा अधिकार हैं। अगर वहाँ उन्हें कोई परेशान करता है तो सीधे जेल में होगा।