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न गीता का श्लोक सुन पा रही, न भक्ति भजन… आरफा खानम आपका ये दर्द कैसे होगा कम? खतना पर खामोश लेकिन मुस्लिम-मुस्लिम करो पर राम मंदिर, भगवा और हिंदुओं से चिढ़ क्यों


अपनी इस्लामी पत्रकारिता के लिए कु्ख्यात आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर सोशल मीडिया पर रोना-धोना मचाए हुए हैं। आरफा खानम का दुख ये है कि आखिर ये जो टीवी पर दिखने वाले पत्रकार हैं इनका चेहरा क्यों बदल रहा है? क्यों ये लोग हिंदू त्योहारों पर भारतीय परिधान पहन पहनकर टीवी कार्यक्रम करने लगे हैं? क्यों इनके माथे पर तिलक, हाथ में कलावा दिखाई देता है…? आदि आदि 
देखिए(फोटो में) पाखंडी भड़काऊ अरफ़ा खानम को। ये अरफ़ा खानम वही मुस्लिम महिला है जो मुस्लिम महिलाओं को बुर्का और हिजाब पर भड़काने का कोई मौका नहीं चुकती लेकिन खुद बिना हिजाब और बुर्के के मस्त होकर घूमती है। औरों को नसीहत अपने आपको फजीयत। अब इसको भड़काऊ नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए?   

आरफा ने अपने दुख के बारे में अब तक कई लोगों के साथ साझा कर दिया है। वो खुलकर बता रही हैं कि पत्रकारों का ‘हिंदू’ रूप देखकर उन्हें कितनी पीड़ा है। कभी वो संविधान की तस्वीर साझा करके अपने जख्म पर मलहम लगा रही हैं। कभी वामपंथी ‘बुद्धिजीवियों’ से चर्चा करके।

दिलचस्प बात ये है कि आरफा खानम जिन्हें समस्या इस बात से है कि अन्य पत्रकार आखिर क्यों हिंदुत्व की ओर झुकाव दिखाने लगे हैं, उन आरफा को ये एहसास ही नहीं है कि उनकी पत्रकारिता कितनी एकतरफा है। पिछले कुछ सालों में अगर आरफा खानम द्वारा उठाए मुद्दों का विश्लेषण किया जाए तो समझ आएगा कि आरफा खानम सोते-जागते सिर्फ इस्लाम और मुसलमान करती हैं। और ऐसा करता देख जो लोग उनपर सवाल उठाते हैं उन्हें वो कम्युनल मानती है, उनके सेकुलर होने पर सवाल उठाती हैं।

आप आरफा का एक्स हैंडल देखेंगे तो पता चलेगा कि इस बार वह राम मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम की कवरेज देखकर बिलबिलाई हैं। उनकी प्रतिक्रिया देखकर समझ ये नहीं आ रहा कि उनकी समस्या मुसलमानों का दुख है या हिंदुओं के प्रति घृणा।

देख सकते हैं कि शुभांकर मिश्रा के एक पोस्ट जिसमें उन्होंने बताया था कि अयोध्या में 500 वर्ष बाद राम मंदिर पर केसरिया फहरा है। उन्होंने खुशी जताई थी कि वो उस युग में जन्मे हैं जब रामललाल को टेंट से निकलकर सिंहासन पर बैठते देखा गया। इस ट्वीट ने आरफा को ऐसा जख्म दिया कि उन्होंने शुभांकर के लिए लानत भेज दी। उन्होने लिखा “और देखते-ही-देखते हिंदी पत्रकारिता, ‘हिंदू पत्रकारिता’ में बदल गई। पत्रकार, क़लम के सिपाहियों से धर्म के सैनिक बन बैठे। और देखते-ही-देखते… लानत है!”

इसके बाद द वायर का एक वीडियो देखिए। आरफा रोने वाले अंदाज में भारतीय नागरिकों को बता रही हैं कि देखिए अयोध्या में ध्वाजारोहण हो रहा है लेकिन हमेशा इस बात को याद रखा जाए कि भारत का झंडा केसरिया नहीं बल्कि तिरंगा है। और संविधान की प्रस्तावना वो कसम है जो हम लोगों ने खाई थी जब देश आजाद हुआ था।

एक अन्य वायरल होती क्लिप में आरफा हिंदी मीडिया को टारगेट करती इसलिए नजर आ रही हैं क्योंकि वो राममंदिर की कवरेज करता है। वह सिद्धार्थ वरदराजन और सीमा चिश्ती से बात करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर करती हैं। उनका कहना कि जो महिला पत्रकार स्टूडियो में कोट पेंट पहनकर आती थीं वो भगवा पहनकर और तिलक लगाकर क्यों आ रही हैं। वो गीता के श्लोक और भक्ति के भजन पढ़ रही हैं।

वह इस वीडियो में साफ बोल रही हैं कि जो कुछ हो रहा है उनसे वो देखा नहीं जा रहा। उनसे भजन श्लोक नहीं सुने जा रहे। उन्हें पता नहीं चल रहा कि वो कैसे इस वक्त को काटें। आरफा के ये चेहरे के भाव हो सकता है उन लोगों को भावुक कर रहे हों जिनके लिए असल में वह पत्रकारिता करती हैं, मगर बाकियों के लिए ये सब सिर्फ हास्यासपद है। कारण- आरफा की पत्रकारिता ही है।

आज आपको संविधान की प्रस्तावना पढ़कर सुनाने वाली आरफा खानम के बारे में कोई सेकुलर राय बनाने से पहले याद रखिएगा कि आरफा सालों से इस्लामी की कुरीतियों को मजहबी अधिकार दिखाकर उन्हें सपोर्ट करती रही हैं। उनके लिए पत्रकारिता निष्पक्ष सिर्फ तब तक है जब वो इस्लामी पक्ष रखे, अगर देश की हिंदू आबादी की कोई चर्चा होगी तो उससे हिंदी पत्रकारिता के हिंदू पत्रकारिता में तब्दील हो जाने का डर रहेगा।

उनके लिए हलाला, पॉलीगेमी और तीन तलाक जैसे मुद्दे कभी भी चर्चा लायक नहीं लगे। उन्हें दिक्कत हुई तो सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर से, वहाँ फहराते केसरिया झंडे से और भगवा कपड़ों में वहाँ पहुँचे भक्तों। अजीब बात ये है कि अपने आपको निष्पक्ष प याद करिए यही वो आरफा खानम हैं जिन्होने कर्नाटक में जब स्कूलों में हिजाब पहनने का मुद्दा गरमाया था उस समय स्कूल के यूनिफॉर्म कोड की जगह हिजाब पहनने वाली लड़कियों का समर्थन किया था। जो जायरा वसीम के एक्टिंग छोड़ने के फैसले पर सवाल उठाने वालों पर भड़की थीं।

क्या उस समय पर उन्हें याद नहीं आया कि देश का शैक्षणिक संस्थान अपने नियम मानने को अगर कह भी रहा है तो उसमें समस्या क्या है। तब क्यों नहीं आरफा ने ये रोना रोया मुस्लिम छात्राएँ क्यों हिजाब पहन-पहनकर स्कूल-कॉलेज को मदरसा जैसा बनाने का प्रयास कर रही हैं।

इसी तरह राम मंदिर पर जो आरफा रह रहकर अपना दुख बयान करती हैं क्या आप जानते हैं कि यही आरफा बामियान बुद्ध के विनाश को जस्टिफाई कर चुकी हैं। साल 2021 में आरफा ने ये बताना चाहा था कि तालिबान ने ‘हिन्दुत्व के गुंडों’ से प्रेरित होकर बामियान बुद्ध की विशाल मूर्ति को विस्फोटक से उड़ा दिया था। शेरवानी ने ट्वीट में लिखा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने ही अफगानिस्तान में बौद्ध स्मारक के तालिबान द्वारा विनाश को प्रेरित किया था।

सोचकर देखिए कि जिन आरफा को बामिया बुद्ध की मूर्ति उड़ाने वालों के कृत्य का बचाव करने के लिए तक तर्क मिल रहा है। उन्हें कभी ये समझ क्यों नहीं आया कि राम मंदिर हिंदू के लिए क्या था? उनके लिए बाबरी का वह ढाँचा देश में सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान के होने का प्रतीक था जिसे करोड़ों सनातनियों की भावना रौंदते हुए खड़ा किया गया था। हैरानी नहीं है कि आज जब उसी जगह, एक लंबी कानूनी लड़ाई जीतकर हिंदुओं ने अपने रामलला का मंदिर बना लिया है तो आरफा को क्यों सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान खतरे में लगते हैं।

अंधा कानून तो सुना था लेकिन असल में अंधे तो मीलॉर्ड हैं, लगता है “थूका और मुता” हुआ खाने की उन्हें आदत पड़ गई है; शरिया चलेगा सुप्रीम कोर्ट के Proxy Rule से

 सुभाष चन्द्र

मैं बहुत पहले से कह रहा हूं कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकीलों की सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मिलकर चांडाल चौकड़ी बनी हुई है जो मनमाने फैसले करा लेते हैं।  सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ऋषिकेश रॉय एंड जस्टिस SVN भट्टी ने सिंघवी की अर्जी पर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रुट पर दुकानदारों को नाम दर्शाने के आदेश पर बिना समय गवाएं रोक लगा कर उप्र, UKhand और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर दिया।

मीलॉर्ड में सिंघवी और याचिकाकर्ता से यह पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि नाम छुपाकर धंधा क्यों किया जा रहा है? यह जघन्न अपराध है, क्यों ऐसे अपराधी को बचाने आये हो? दूसरे, जब यूपीए सरकार ने इस कानून को बनाया था, तब क्यों नहीं लागु किया? ये कैसा सेकुलरिज्म है जो असली नाम बताने से खतरे में आ गया है?

मीलॉर्ड बड़े तमतमाए हुए थे योगी सरकार के आदेश पर और बोले कि “दोनों राज्यों के आदेश को लागू होने से नहीं रोका गया तो Secularism और संविधान” के प्रावधानों का उल्लंघन होगा
।

जजों ने कहा कि दुकानों को सिर्फ यह बताना होगा कि वह मांसाहार बेचते हैं या शाकाहारी खाना। 

लगता है सुप्रीम कोर्ट को Secularism ही खतरे में नहीं लगा बल्कि “इस्लाम भी खतरे में” दिखाई दे गया। आपने यह तो बताने को कहा कि मांसाहार बेचते है या शाकाहारी खाना लेकिन यह बताने के लिए नहीं कहा कि “भोजन में थूकते हैं या नहीं, या पेशाब मिलाते हैं या नहीं और जो फल सब्जियां ग्राहकों को परोसते हैं उन पर पेशाब का छिड़काव करते हैं या नहीं”।

मीलॉर्ड ये हम नहीं कह रहे, ये मुसलमान खुद कहते हैं कि थूक लगा कर काफिरों को खाना देना उनका मजहब कहता है। उसे देख कर ही मैं कहता हूं कि हो सकता है न्याय अंधा हो लेकिन असल में जज ही अंधे हैं जो देखते हुए भी आंखें बंद कर लेते हैं। यह बात उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में कबूल भी की है।

लेखक 
चर्चित यूटूबर 

मीलॉर्ड मुसलमानों के वकील बन गए तो उनकी तरफ से आप और सिंघवी जैसे वकील ही बताएं कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर कहता है और उनके भगवानों को भी नहीं मानता और “गज़वा ए हिंद” बनाना चाहता है,तो फिर -

मोहम्मद अनुस का “वैष्णो ढाबा” कैसे - वह “इस्लाम का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद वसीम का “गणपति ढाबा” कैसे - “अल्लाह का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद आदिल का “ओम शिव वैष्णो” ढाबा क्यों - “आदिल का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद शमशेर का “लक्ष्मी शुद्ध वैष्णो” ढाबा क्यों - “रजिया बेगम का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद इरफ़ान का “श्रीनाथ डोसा ढाबा” क्यों, “इरफ़ान का डोसा” क्यों नहीं-

केवल एक केरल के मुस्लिम और हिंदू के रेस्ट्रॉन्ट के बारे में बता कर जस्टिस भट्टी ये प्रमाणपत्र  देना चाहते है कि मुसलमान सफाई रखते है और हिंदू गंदगी रखने वाले बता कर हिंदुओं को बदनाम करना चाहते हैं। ऐसा कीजिए मीलॉर्ड अपने बंगले सरकार से मुस्लिम बस्तियों के नजदीक बनवा कर वहां रह कर देखिए वो कितनी सफाई पसंद हैं। आप आज देते हुए भूल गए कि ईद पर मुसलमान भी हिंदुओं से सामान न खरीदने की कॉल देते हैं लेकिन आपको उन्हीं पर तरस आ रहा है क्योंकि आप सनातन धर्म को ख़त्म करने के मिशन में “Secularists” के  साथ भागीदार हैं।

मीडिया के पत्रकार और अख़बार लगे हैं साबित करने में कि मुलायम सिंह ने 2006 में कोई आदेश नहीं दिया था और 2006 के FSSI एक्ट को तोड़मरोड़ कर बता रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मुलायम की हालत पतली थी जिसकी वजह से उसने 2007 के चुनाव से पहले हिंदुओं को रिझाने के लिए ये आदेश दिए थे। मीलॉर्ड ने FSSI को भी देखना जरूरी नहीं समझा।

मियां जावेद अख्तर कह रहे हैं ये हिटलर का नाजी आदेश है। मियां जी अगर हिटलर राज होता तो आपको इतनी बात कहने पर जेल में डाल दिया जाता।

मुसलमानों को गलत काम करने से रोका जा सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ऐसा चाहता ही नहीं और अभी उम्मीद है संविधान पीठ तलाकशुदा महिलाओं पर दिए गए फैसले को भी पलट देगी।

मोदी को बदनाम करने के लिए अवनी डायस ने डॉक्यूमेंट्री में भारत के संविधान को लेकर बोला झूठ, अपनी ‘पत्रकार’ की करतूत ABC News ने कबूली; बीजेपी क्यों नहीं ABC News और इसकी पत्रकार पर कार्यवाही करती?

कहते हैं आदमी के मरने के बाद लकीर पीटने से कुछ नहीं होता, यह बात भारत की जनता पर शत-प्रतिशत लागू होती है। जो शिक्षित होते हुए भी अनपढ़ों की तरह व्यवहार करती है। 2024 लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को हराने संविधान को लेकर कितनी भ्रांतियों फैलाई गयी। लेकिन शिक्षित भी अनपढ़ बन उन दुष्प्रचार का शिकार हो गया। क्या मेरी आयु(+) वालों को नहीं मालूम कि कांग्रेस ने संविधान में इतने अधिक संशोधन किये कि प्रस्तावना तक बदल दी। क्या संविधान निर्माताओं ने ऐसी प्रस्तावना लिखी थी? यूपीए काल में सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री से अधिक अधिकार क्यों दिए? सोनिया की इजाजत के बिना मनमोहन सिंह में किसी फाइल पर साइन करने की हिम्मत नहीं थी? सोनिया एक सांसद थी किस अधिकार से किसी भी कार्यक्रम में प्रथम पंक्ति में मंत्रिमंडल के साथ बैठती थी? मोदी सरकार ने संविधान से इन असंवैधानिक बातों को निकालकर क्या गलत किया था? और जो नेता ऐसी तर्कहीन बातों को संविधान से निकाले जाने पर देश में आग लगने की बात कहे, क्या ऐसा कोई नेता एक भी वोट का हक़दार है? 

I.N.D.I.गठबंधन को समर्थन करने वालों, अपनी भावी पीढ़ी की चिंता करो और इस I.N.D.I.गठबंधन से जितनी अधिक दूरी बना सकते हो बनाओ, जरा सोंचों: देश का संविधान तब खतरे में नहीं था, जब बहुमत के नशे में कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियों ने Muslim Waqf Board बनाया था, जब बहुमत के नशे में Minority Commission बना था, तब खतरे में नहीं था जब Muslim Personal Law Board बना दिया था, तब खतरे में नहीं था जब Places of Worship Act बनाया था, तब संविधान खतरे में नहीं था जब Anti-Communal Violence Act बनाया था, ये तो बीजेपी की मेहरबानी से पास नहीं हुआ और 2014 चुनाव हो गया। इस Act के अनुसार दंगा चाहे मुसलमान ने किया हो कसूरवार हिन्दू ही, सजा हिन्दू को, हिन्दू की संपत्ति कुर्क कर मुसलमान को दे दी जाएगी, यानि कांग्रेस और इसके समर्थक पार्टियां जिसे I.N.D.I.गठबंधन कहते हैं भारत को इस्लामिक देश नहीं मुल्क बनाने की तैयारी कर दी थी।   

इमरजेंसी में जनता ने क्या-क्या अत्याचार नहीं हुए, आज की युवा पीढ़ी को नहीं मालूम। अपनी वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति या transfer करवाने या रुकवाने के लिए कर्मचारी को नसबंदी के 2 केस देने होते थे, जो कर्मचारी को झूठे फर्जी केस का प्रमाण लेने के लिए 50-50 रूपए यानि दो केस के 100 रूपए देकर प्राप्त करने होते थे। 

फिल्म "आंधी" को बैन कर दिया था, अभिनेता-निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार की बहुचर्चित फिल्म "रोटी कपडा और मकान" का बहुचर्चित गीत " हाय महंगाई तू कहाँ से आयी..." को बैन कर दिया था। इतना ही नहीं, किसी कार्यक्रम में गायक किशोर कुमार ने गाने से मना करने पर रेडियो पर किशोर के गानों को बैन कर दिया था। फिल्म "किस्सा कुर्सी का" सेंसर से पास नहीं होने दिया। मारधार दिखाई जाने वाली फिल्मों को सेंसर पास नहीं करता था, लेकिन गाँधी परिवार के करीबी अमिताभ बच्चन अभिनीत मारधार वाली फिल्म "शोले" पास हो गयी।      


बाप(राजीव गाँधी) कह रहा है कि अगर संविधान बदलने की जरूरत होगी तो हम बार बार संविधान बदलेंगे, हमारे पूर्वजों ने भी कई बार संविधान बदला है और  बेटा(राहुल गाँधी) कह रहा है कि अगर संविधान बदला तो देश में आग लगा देंगे समझ नहीं आता कहां लोचा हो गया है। 

एबीसी की ‘पत्रकार’ अवनी दास के फैलाए फेक न्यूज पर ऑपइंडिया की रिपोर्ट के 2 सप्ताह बाद आखिरकार एबीसी न्यूज ने मान लिया कि उसकी कथित ‘पत्रकार’ अवनी डायस ने भारत के संविधान के बारे में दर्शकों को गुमराह किया है। अब एबीसी न्यूज ने अपनी सफाई दी है।

27 जून 2024 को एबीसी न्यूज ने स्वीकार किया कि अवनी डायस ने ‘भारत की आजादी के साथ ही ‘सेकुलर’ शब्द संविधान का हिस्सा है’ का जो दावा किया है, वो झूठा है। एबीसी न्यूज ने अवनी दास के फेक न्यूज पर सफाई देते हुए कहा कि ‘नरेंद्र मोदी पर बने डॉक्यूमेंट्री, जिसे 5 जून को पब्लिश किया गया था, उसमें ‘भारत के मूल संविधान में सेकुलर’ होने का दावा गलत था।’

अपनी इज्जत बचाने के क्रम में एबीसी न्यूज ने लिखा, ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1960 के दशक के दौरान पुष्टि की थी कि धर्मनिरपेक्षता भारत के 1950 के संविधान की एक बुनियादी विशेषता है, इस शब्द को 1976 में एक संवैधानिक संशोधन में जोड़ा गया, जिससे भारत का वर्णन “संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य” से बदलकर “संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” हो गया।’

मामला कैसे शुरू हुआ?

इस विवाद की शुरुआत 5 जून को हुई थी, जब एक तरफ पीएम मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ भारत विरोधी शक्तियाँ भारत सरकार और खासकर मोदी सरकार को बदनाम करने के प्रयास में लगातार जुटे हुए थे। इन्हीं प्रयासों में एक है ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (एबीसी) की कथित ‘पत्रकार’ अवनी डायस द्वारा झूठ फैलाने का प्रयास, जिसमें अवनि ने 5 जून 2024 को भारत के संविधान के बारे में फर्जी बातें प्रसारित की।
अवनी डायस ने कुछ समय पहले ही ये फर्जी खबर फैलाई थी कि ‘निगेटिव रिपोर्टिंग’ की वजह से भारत सरकार ने उनका वीजा रद्द कर दिया है, जबकि वो दावा फर्जी निकला था। इस बार अवनि ने दावा किया है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ भारतीय संविधान का अहम हिस्सा है, वो भी अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद यानी 1947 से। अवनी ने ‘नरेंद्र मोदी से पहले के भारत की कहानी’ हेडलाइन के साथ एक वीडियो बनाकर ये बताने की कोशिश की कि भारत में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की धर्मनिरपेक्षता किस तरह के खतरे में है।
अपने वीडियो के 9.19 मिनट पर अवनी डायस ने कहा, “आपको बता दें कि जब 1947 में अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भारत की स्थापना हुई थी, तो इसके संविधान में लिखा गया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसका मतलब है कि धर्म के आधार पर देश में सभी को आजादी होनी चाहिए।” अवनी ने दावा किया कि भारत के संविधान में सेक्युलर शब्द पेज नंबर 33 पर बड़े अक्षरों में लिखा है।
हालाँकि अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही ‘पत्रकार’ अवनी ये भूल गई कि भारत का संविधान 1947 में लागू नहीं हुआ और जब भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तब सेक्युलर शब्द उस संविधान का हिस्सा ही नहीं था। बता दें कि भारत का संविधान 1947 में नहीं, बल्कि तीन साल बाद 1950 में लागू हुआ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा 1976 में (आपातकाल के काले दिनों के दौरान) बनाया गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संसद को दरकिनार कर संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल करने के लिए 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया था। अवनी डायस के दावों के विपरीत, संविधान यह बताने के लिए नहीं लिखा गया था कि भारत एक ‘धर्मनिरपेक्ष देश’ है। पूरे वीडियो में एबीसी न्यूज के ‘पत्रकार’ ने वैश्विक स्तर पर देश की छवि को धूमिल करने के लिए अटकलों, अनुमानों और मान्यताओं पर भरोसा किया।

पहले भी विवादों में रही हैं अवनी डायस

इसी साल अप्रैल में अवनी डायस ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर दावा किया था कि मोदी सरकार ने उनका वीजा नहीं बढ़ाया, जिसकी वजह से उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अवनी ने दावा किया कि ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग सरकार को पसंद नहीं आ रही थी। हालाँकि ये पूरी तरह से झूठ था, क्योंकि उन्होंने जैसे ही वीजा के लिए अप्लाई किया, उनका वीजा 2 माह के लिए बढ़ा दिया गया। इसके बावजूद एबीसी न्यूज ने एक आर्टिकल प्रकाशित किया और दावा किया कि भारत के विदेश मंत्रालय ने फोन करके अवनी को सूचित किया था कि उनका वीजा नहीं बढ़ाया जा रहा।
खैर, इस प्रोपेगेंडा से इतर अवनी डायस से जुड़ा एक और मामला भी है। उसने कनाडा में हरदीप निज्जर की हत्या को भारत से जोड़ने की कोशिश करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिस पर भारत सरकार रोक लगा चुकी है और यू-ट्यूब पर पर भी उसके मामले में नोटिस दिख रहा है। दरअसल, यो डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से गलत थी, बल्कि भारत के संवेदनशील सीमाई इलाकों में गलत तरीके से फिल्माई गई थी। उन लोकेशन पर शूट करने के लिए गलत तरीके से अनुमति हासिल की गई थी, जिसका बीएसएफ ने भी विरोध किया था।

पहले भी भारत को लेकर प्रोपेगेंडा फैलाती रही हैं अवनि डायस

अवनी डायस भारत विरोधी, सनातन विरोधी लेखों के लिए जानी जाती है। उसने कई बार प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की, लेकिन हर बार एक्सपोज होती रही। इसी साल मार्च में अवनी डायस ने ब्रिसबेस में स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर पर खालिस्तानी कट्टरपंथियों के हमले को नकारते हुए कट्टरपंथियों को क्लीनचिट देने की कोशिश की थी। उन्हें इसे हिंदू समूहों का ही हमला करार दे दिया था। उनके दावों को खुद ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने एक्सपोज कर दिया था। एक फेसबुक पोस्ट में ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने अवनी डायस और उनकी साथी नाओमी सेल्वारत्नम को ‘ब्राउन सिपाही’ की संज्ञा दी थी।

‘हिन्दुओं के कारण भारत सेक्युलर, काशी-मथुरा में गलती सुधारने का वक्त’: अयोध्या पर आर्कियोलॉजिस्ट केके मुहम्मद

अयोध्या में खुदाई कर मंदिर का सबूत जुटाने वाले पुरातत्वविद् केके मुहम्मद (Archeologist KK Mohammad) का कहना है कि बाबरी की तरह देश में अभी कई मुद्दे हैं और अगर सभी पक्षों ने इसका हल नहीं निकाला तो ये बड़ी समस्या बन जाएँगी। उन्होंने कहा कि देश में कई मंदिर हैं, जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। उन्होंने कहा कि देश में धर्मनिरपेक्षता हिंदुओं के कारण है।

केके मुहम्मद ने कहा कि मथुरा और काशी के ज्ञानवापी मामले को जल्द हल करना चाहिए। यहाँ प्रमाण की कमी नहीं है। बस सच को स्वीकार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा मुसलमानों से कहता हूँ कि पाकिस्तान से अलग होने के बावजूद भारत सेक्युलर है, क्योंकि यहाँ हिंदुओं की मैजॉरिटी है।”

गौरतलब करने की बात है कि सेवानिर्वित होने के बाद तमिल भाषा में लिखी पुस्तक में इन्होने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि अयोध्या में राममन्दिर कभी का बन गया होता, अगर कांग्रेस और वामपंथियों ने कोर्ट से खुदाई में मिले अनेकों प्रमाणों को छुपाकर केवल एक ही खम्बा नहीं दिखाया होता। उन्होंने लिखा है कि इन्हीं के निरीक्षण में अयोध्या में खुदाई हुई थी, जिसमें मन्दिर के ही सारे सबूत मिले थे।  

दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा कि जब बात साइंटिफिक रिसर्च की हो तो उस पर विश्वास करना चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं कहता हूँ कि भारत जैसे देश में मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाए जाने पर कई मामले सामने आएँगे। ऐसे में पहले जो गलती की है, उसे सुधारने के पक्ष में सोचना चाहिए।”

देश में आर्कियोलॉजिस्ट के भविष्य के सवाल पर उन्होंने कहा कि भात में इनका कोई भविष्य नहीं है। इसके लिए ना स्टूडेंट्स आगे आ रहे हैं और न ही सरकार सपोर्ट कर रही है। बीजेपी गवर्नमेंट से कुछ उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने कहा, मैं कहता हूँ कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) का सबसे खराब समय BJP के राज में ही है।”

अयोध्या मामले में हिंदू मंदिर की बात रखने के कारण केके मुहम्मद को मुस्लिम समुदाय का विरोध झेलना पड़ता। उन्होंने कहा, “लोगों के विरोध को फेस न करना पड़े, इसके लिए मैं अपने प्रोफेशन से धोखा नहीं कर सकता। खुदाई में मंदिर के अवशेष मिले। ये फैक्ट था। इतिहास के तथ्यों को रखना ही मेरा धर्म है।”

केके मुहम्मद ने कहा था कि 27 मंदिरों को तोड़कर दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में स्थित कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद बनाई गई है। उन्होंने कहा था कि मंदिरों को तोड़कर निकाले गए और उन पत्थरों से ही यह मस्जिद बनी है। उन्होंने कहा था कि उस जगह पर अरबी में लिखे अभिलेखों और ताजूर मासिर नामक किताब में इसका जिक्र है।

केके मुहम्मद 1976-77 में पहली बार अयोध्या में जाकर राम मंदिर और बाबरी मस्जिद वाली विवादित जगह पर खुदाई की थी। उन्होंने बाबरी के नीचे मंदिर के अवशेषों का पता लगाने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने कहा था कि मंदिर के खंम्भों पर मस्जिद बनाई गई थी।

कर्नाटक : 5000 रुपए का ईनाम रख पैगंबर मुहम्मद पर निबंध प्रतियोगिता करा रहा था हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ

साभार ANI 

कर्नाटक के धरवाड़ क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल में गुप्त रूप से इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करने के कारण कार्रवाई की गई है। गडक जिले में स्थित सरकारी स्कूल के हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ को निलंबित कर दिया गया है।

कर्नाटक सरकार की ओर इसे इस तरह की प्रतियोगिता आयोजित करने का किसी तरह का निर्देश नहीं दिया गया था। इसके बावजूद हेडमास्टर ने पैगंबर पर गुप्त रूप से प्रतियोगिता आयोजित की। लोक निर्देश के अतिरिक्त आयुक्त सिद्रमप्पा एस. बिरादर ने बताया, “प्रारंभिक जाँच के दौरान हेडमास्टर के खिलाफ आरोप सही साबित हुए। यही वजह है कि उन्हें निलंबित कर दिया गया है।”

घटना नागवी के सरकारी हाईस्कूल की है। मामले का खुलासा हिंदू संगठन श्रीराम सेना के सदस्यों द्वारा प्रधानाध्यापक के विरोध के बाद हुई। इसके बाद बुधवार (28 सितंबर 2022) को घटना की जाँच शुरू की गई। खंड शिक्षा अधिकारी ने बताया कि एक शिकायत दर्ज की गई थी और वह शिकायत की एक प्रति राज्य शिक्षा विभाग के उप-निदेशक को भेजेंगे।

जाँच में पाया गया कि प्रधानाध्यापक मुनाफ ने अन्य शिक्षकों या विभाग को बताए बिना कक्षा 8 के 43 छात्रों को पैगंबर मुहम्मद पर एक पुस्तक देकर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया था। प्रधानाध्यापक अब्दुल मुनाफ ने कथित तौर पर बच्चों को किताबें दीं और इस प्रतियोगिता के लिए 5,000 रुपए के नकद पुरस्कार की भी घोषणा की।

एक अभिभावक शरणप्पा गौड़ा हापलाद ने कहा, “मुझे पता चला कि स्कूल के प्रधानाध्यापक निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित करके और 5,000 रुपए का नकद पुरस्कार घोषित कर छात्रों के दिमाग में इस्लाम थोपने की कोशिश कर रहे थे। लड़के और लड़कियों को 5,000 रुपए जीतने की उम्मीद में निबंध लिखने के लिए कहा गया था।”

उन्होंने छात्रों का धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाते हुए आगे बताया, “हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ का इरादा छात्रों का धर्म परिवर्तन कराना था। इसलिए मैंने श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं को सूचित किया। मैं जानना चाहता हूँ कि पैगंबर मुहम्मद पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करने के पीछे और क्या इरादा हो सकता है।”

हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों को लेकर अदालत ने ‘दंगाइयों’ के वकील महमूद प्राचा को फटकारा

दिल्ली की एक अदालत ने राजधानी में हिंदू विरोधी दंगो के आरोपितों के वकील महमूद प्राचा को फटकार लगाई है। यह फटकार महमूद प्राचा को इसलिए लगाई गई है, क्योंकि उसने अदालत में तर्क दिया था, “2020 के दिल्ली दंगों के दौरान केवल मुसलमानों को निशाना बनाया गया था और झूठे मामलों में उन्हें फँसाया गया था।” प्राचा ने यह भी कहा था कि दिल्ली के दंगे वास्तव में सांप्रदायिक दंगे नहीं थे।

आखिर कब तक गैर-मुस्लिमों को सेकुलरिज्म के नाम पर छला जाता रहेगा? 
जब कभी कहीं भी दंगे में मुस्लिम गिरफ्तार किए जाते हैं, इनके सरगना हमेशा मुस्लिम मजहब के नाम पर 
गरीब, मजलूम और नसमझ कहकर victim card खेलने लगते हैं। जब प्रदर्शनों में हिन्दुओं की गैर-मौजूदगी में भारत को इस्लामिक देश बनाने और fuck hindutva के नारे कोई गरीब, मजलूम और नासमझ लगा सकता है? इन साम्प्रदायिक नारे लगाए जाने के पीछे कौन सी सोंच थी? किन लोगों के कहने पर देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का षड़यंत्र काम कर रहा था? क्यों नहीं इन साम्प्रदायिक नारों का विरोध किया गया? 
देखिए जनवरी 29, 2020 को लिखा सर्वाधिक पढ़ा गया लेख, जो उनको भी गंभीरता से पढ़ना चाहिए जो सेकुलरिज्म का राग अलापते रहते हैं, आखिर कब तक गैर-मुस्लिमों को सेकुलरिज्म के नाम पर छला जाता रहेगा? :-
सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार
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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने 11 नवंबर को आरोपित आरिफ की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए वकील महमूद प्राचा की जमकर खिंचाई की। उन्होंने कहा, “पुलिस ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया, सांप्रदायिक आधार पर नहीं। एक चश्मदीद गवाह को आरोपित द्वारा धमकाया जा सकता है। आपके तर्क बेबुनियाद हैं।” इसके बाद अदालत ने आरोपित आरिफ को जमानत देने से इनकार कर दिया।

यह मामला 25 फरवरी, 2020 को शिव विहार तिराहा के पास आलोक तिवारी की हत्या से संबंधित है, जिसे कई गंभीर चोटें आई थीं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक को धारदार और नुकीले हथियारों से 13 चोटें आई थीं। दंगों के दौरान हुई हत्या के दो अलग-अलग मामलों में भी आरोपित आरिफ की जाँच चल रही है।

लिबरल गिरोह के वकील महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है।

 जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य भी है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। साथ ही जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

भारत में सेक्युलरवाद से कितनी हो रही है हानि?

                                                                                                                                         साभार 
लंबे काल में बनी सामाजिक मनोवृत्तियाँ आसानी से नहीं बदलतीं। 19 जून 1924 को लिखे अपने एक लेख में महात्मा गाँधी ने कहा थाः “तेरह सौ वर्षों के साम्राज्यवादी विस्तार ने मुसलमानों को एक वर्ग के रूप में योद्धा बना दिया है। इसलिए वे आक्रामक होते हैं। … हिन्दुओं की सभ्यता बहुत प्राचीन है। हिन्दू मूलतः स्वभाव से अहिंसक होता है। इस प्रवृत्ति के कारण उनमें हथियारों का प्रयोग करने वाले कुछ ही होते हैं। उनमें आम तौर पर हथियारों के प्रयोग की प्रवृत्ति नहीं होती, जिससे वे कायरता की हद तक भीरू होते हैं।”

गाँधी के इस अवलोकन की तुलना लगभग साठ वर्ष बाद के इस अनुभव से करें जो हमारे पूर्व विदेश सचिव जे. एन. दीक्षित को पाकिस्तान में भारतीय राजदूत के रूप में हुआ था। उन्होंने पाया कि पाकिस्तानियों की नजर में, “भारत एक दुर्बल देश है जहाँ हिन्दू लोकाचार व्याप्त है। इसलिए पाकिस्तान के सैन्य मनोबल के सामने इसकी कोई बराबरी नहीं है।” स्वयं देश के अंदर सैयद शहाबुद्दीन जैसे प्रबुद्ध नेता ने कहा था, "भारत का हिंदू सेक्यूलरिज्म का पालन इसलिए करता है क्योंकि वह मुस्लिम देशों से डरता है।” यह टिप्पणी 1983 में की गई थी।

लगभग सौ वर्ष की अवधि को समेटने वाली ये तीन टिप्पणियाँ एक ही बात का संकेत करती हैं। यह ऐसा सत्य है जिसे यहाँ सभी दलों के नेता, बुद्धिजीवी अनुभव करते हैं, किंतु चर्चा नहीं करते। इसी हीन स्थिति को अरबी शब्दावली में ‘जिम्मीवाद’ (dhimmitude) कहा गया है। उस तरह के यहूदी और ईसाई जिम्मी कहलाते थे, जिन्हें इस्लामी शासनों ने अपने राज्य में कुछ शर्तों पर जिंदा रहने दिया था। वास्तव में भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद की विशिष्टता उसी मानसिकता के संदर्भ में समझी जा सकती है। क्या कारण है कि इसी भारत से अलग हुए टुकड़ों- पाकिस्तान और बंगलादेश में सेक्यूलरिज्म की कोई हैसियत नहीं, जबकि भारत में इसे किसी देवता की तरह पूजा जाता है? हमारी संपूर्ण राज्य व्यवस्था उस सेक्यूलरिज्म के सामने झुक-झुक कर सलाम करती है, जिसे पाकिस्तान में कोई पहचानता तक नहीं! एक ही देश के दो समुदायों के बीच ऐसा विभेद और किसी तरह नहीं समझा जा सकता। ऊपर उद्धृत गाँधीजी की बात फिर से पढ़ कर देखें।

जिम्मीवाद को विश्व-विमर्श में चर्चित करने का श्रेय ईरानी मूल की ब्रिटिश लेखिका बैट येओर (Bat Y'eor) को जाता है। सदियों के इस्लामी साम्राज्यवाद के अधीन रहते हुए गैर-मुस्लिमों में जो एक स्थायी डर बैठ गया, यह उसी की संज्ञा है। यह डर तब भी बना रहता है जब संबंधित समाज पर इस्लामी शासन का अंत हो चुका हो। यहाँ हिन्दुओं पर इसी "जिम्मीवाद" की छाया है जिसने "सेक्यूलरिज्म" का रूप धारण कर लिया है। सैयद शहाबुद्दीन ने उसी को दूसरे शब्दों में रखा था। सोहेल अहमद सटीक कहते हैं, “इस्लामी शासन में केवल एकेश्वरवादी अर्थात ईसाई और यहूदी ही सामान्य रूप से रह सकते हैं। किंतु बहुदेववादी या मूर्ति-पूजक नहीं रह सकते। उन्हें जिहाद द्वारा खत्म करने का ही विधान है। लेकिन फिर भी, यदि विशाल संख्या या अन्य (आर्थिक आदि) कारणों से उन्हें खत्म करना संभव न हो तो उन्हें तरह-तरह के अंकुश में, दूसरे दर्जे की प्रजा के रूप में रखा जाता रहा। लंबे समय तक ऐसे इस्लामी शासन में रहकर इन दूसरे दर्जे के नागरिकों की डरू मानसिकता ही "जिम्मी" कहलाती है। वे मुसलमानों से आदतन सहमे रहते हैं।”

यह अक्षरशः सत्य है। इस्लामी कानूनों का कोई भी ज्ञाता इसकी सोदाहरण पुष्टि करेगा कि इस्लामी शासन में जिम्मियों को किन प्रतिबंधों और हीन स्थितियों में रहना होता है। अभी कुछ ही वर्ष हुए जब अफगानिस्तान में तालिबान ने वहाँ सिखों और हिन्दुओं को पीला फीता बाँध कर चलने का आदेश दे रखा था। वह जिम्मियों वाले इस्लामी कायदों में ही एक था। याद रहे, उसी तालिबान को दुनिया भर के मुस्लिम नेता-बुद्धिजीवी भी ‘सबसे आदर्श इस्लामी शासन’ बताते रहे हैं। जब भारत पर इस्लामी राज था तो हिन्दुओं के लिए प्रायः वही स्थिति थी। प्रसिद्ध शायर अमीर खुसरो ने इस पर गहरा अफसोस भी व्यक्त किया था, "यदि हनाफी कानूनों का चलन न रहा होता तो इस्लाम की तलवार ने भारत से कुफ्र का सफाया कर दिया होता।" खुसरो उस कानून से रंज व्यक्त कर रहे थे जिसने हिन्दुओं को यहूदियों-ईसाइयों की तरह "जिम्मी" का दर्जा देकर इस्लामी राज में भी जिंदा रहने देने की व्यवस्था दे दी!

अतएव, यदि भारत का इतिहास देखें तो हजार वर्षों की पराधीनता के सामने पिछले साठ वर्षों की स्वतंत्रता एक अल्प अवधि है। इसलिए हीन मानसिकता के अवशेष यहाँ हिन्दू उच्च वर्ग में अब भी जमे हुए हैं। वह केवल अंग्रेजी या पश्चिम भक्ति में ही नहीं, इस्लामी आक्रामकता से नजरें चुराने में भी झलकती है। ईमाम बुखारी भी समय-समय पर अरब देशों से शिकायत करने और तेल की आपूर्ति बंद कराने जैसी धमकियाँ हमारे राजनेताओं को देते रहे हैं। और क्यों न दें? आखिर हमारे जिन सासंदों ने पोप के इस्लाम संबंधी बयान की निंदा की, उन्हींने कभी खुमैनी, अहमदीनेजाद जैसों के जिहादी बयानों पर कभी आपत्ति नहीं की। हमारे जो प्रकाशक एम.एफ. हुसैन द्वारा बनाई गई देवी सरस्वती, दुर्गा आदि की अश्लील पेंटिंगें छापते रहे हैं, उन्हींने मुहम्मद के कार्टूनों को समाचार रूप में भी दिखाने से परहेज किया; वाद-विवाद चलाना तो दूर, जो उन्होंने दीपा मेहता की हिंदू-द्वेषी फिल्मों ‘फायर’ और ‘वाटर’ पर चलाया था। इस डरू नीति को सब लोग खूब समझते हैं। कश्मीरी मुसलमानों के अलगाववाद को सांप्रदायिकता न कहना, आतंकवादियों को उग्रवादी भर कहना, दीनदार-अंजुमन, सिमी जैसे संगठनों की जिहादी और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों पर मौन रखना, गोधरा का नाम तक न लेना, जबकि उसके बाद हुए दंगों पर अंतहीन स्यापा करना, इस्लामी नेताओं की हिंसक बयानबाजियों पर बगलें झाँकना, आदि उसी जिम्मी मनोवृत्ति के लक्षण हैं। इसी को "सेक्यूलरिज्म" कह अपनी दास-मनोवृत्ति और कायरता छिपाई जाती है।

भारतीय सेक्यूलरवाद वस्तुतः जिम्मीवाद है। इसीलिए वह हिन्दू और मुस्लिम नेताओं, संगठनों, क्षेत्रों, आबादियों के प्रति दो मानदंड रखता है। मुहम्मद अफजल और दारा सिंह, दीनदार अंजुमन और विश्व हिंदू परिषद्, उमा भारती और महबूबा मुफ्ती, जम्मू-कश्मीर और गुजरात, कश्मीरी हिन्दू और बोस्नियाई मुसलमान, मुहम्मद के कार्टूनकार और देवी सरस्वती के गंदे पेंटर, बेस्ट बेकरी और राधाबाई चाल, आदि प्रसंग निरंतर आते रहते हैं जब एक ही तरह के दो प्रसंगों पर निर्लज्ज दोहरापन स्पष्ट दिखता है। हिन्दू उच्च वर्ग और उसके प्रतिनिधि बुद्धिजीवियों का यह दोहरापन जिम्मी मानसिकता की अभिव्यक्तियाँ हैं। जो स्वभावतः मानती है कि इस्लाम का रुतबा ऊँचा और उसके अधिकार अधिक हैं। हमारे सेक्यूलरवादियों का व्यवहार सदैव यही कहता है। यह उन की अलिखित, पर आधारभूत मान्यता है।

किंतु समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी है। जिम्मी मानसिकता पर से सेक्यूलर आडंबर खुलने लगा है। अनेक बुद्धिजीवी सच देखने लगे हैं, इसलिए उनमें से कइयों की प्रगल्भता कम हुई है, चाहे सच कहने का साहस नहीं आया। सेक्यूलरिज्म के नाम पर निरंतर मिथ्याचार का बचाव करते-करते वे भी अब संकोच महसूस करने लगे हैं। क्योंकि उस का पोलापन स्वतः उजागर होने लगा है। इसी को व्यक्त करते हुए हमारे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश कुलदीप सिंह ने एक बार कहा था, “भारत में सेक्यूलरिज्म को (इस्लामी) सांप्रदायिकता सहन करने में, उसका बचाव करने में बदलकर रख दिया गया है। अल्पसंख्यकों को समझना होगा कि वे उस संस्कृति, विरासत और इतिहास से नाता नहीं तोड़ सकते, जो हिन्दू जीवन शैली से मिलता-जुलता है।… अल्पसंख्यकवाद को राष्ट्र-विरोध का रूप लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

ऐसी सम्मतियाँ भारत के करोड़ों लोगों की भावना है, किंतु दुर्भाग्य से अब भी उन पर खुली चर्चा नहीं हो रही। दिनों-दिन जो हालात बन रहे हैं, उसमें यह मौन अच्छा नहीं। हिन्दुओं के प्रति जिस भेद-भाव, तज्जनित दुःख, आक्रोश और विवशता को जान-बूझ कर झुठलाया जाता है, वह समय पाकर विकृत रूप में फूटती है। हिन्दू सेक्यूलरवादियों के पाप का घड़ा भरता जा रहा है। सेक्यूलरवादी बुद्धिजीवी प्रशान्त भूषण के साथ हुई मार-पीट को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। ऐसे लोगों की चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए शोर-शराबे ने देश का वातावरण जितना बिगाड़ा है, उतना इस्लामी कट्टरपंथियों ने नहीं। लोग उनका अपराध समझने लगे हैं। अच्छा हो, हमारे नेता और संपादकगण भी समझें और आवश्यक सुधार करें!

स्रोत्र : "भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद" पुस्तक से