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अहमदाबाद के ‘सेवेंथ डे स्कूल’ में पहले भी हो चुके हैं कई विवाद; विदेशी चर्च से कनेक्शन, धर्मांतरण, मीट खिलाने का आरोप और अब हिंदू छात्र की हत्या…

                                      अहमदाबाद के 'सेवेंथ डे स्कूल' की तस्वीर (फोटो साभार : The Hindu)
अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में 19 अगस्त 2025 को एक बड़ा हादसा हुआ है। स्कूल में 10वीं कक्षा के एक हिंदू छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि हत्या एक मुस्लिम छात्र ने की। हमले के बाद घायल छात्र को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने आरोपित छात्र को हिरासत में ले लिया है। उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

घटना के बाद, 20 अगस्त 2025 को स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग स्कूल में जमा हुए और उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों ने स्कूल प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि स्कूल में सुरक्षा को लेकर लापरवाही हुई। मामले की जाँच जारी है और पुलिस स्थिति पर नजर रख रही है।

घटना के बाद स्कूल प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों का कहना है कि स्कूल ने घायल छात्र की मदद नहीं की और छात्र को समय पर अस्पताल नहीं ले जाया गया। यह भी कहा गया है कि स्कूल ने हादसे के तुरंत बाद सफाई शुरू कर दी।

स्कूल प्रशासन ने पानी का टैंकर मँगवाया और स्कूल परिसर की धुलाई करवाई। लोगों का आरोप है कि इससे सबूत मिटाने की कोशिश की गई। अब पुलिस इन आरोपों की जाँच कर रही है। मामला सबूत छिपाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।

पहले भी विवादों में रहा है स्कूल

जिस स्कूल में हिंदू छात्र की हत्या हुई, वह पहले भी विवादों में घिर चुका है। 2016 में एक घटना सामने आई थी। उस समय स्कूल के एक शिक्षक ने कक्षा 4 के एक बच्चे की पिटाई कर दी थी। बच्चे की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने मौखिक परीक्षा के दौरान किसी से बात कर ली थी।

इस बात से गुस्साए शिक्षक ने बच्चे के बाल पकड़कर मारपीट की। आरोप है कि शिक्षक ने चेहरे पर घूंसा मारा, जिससे बच्चे के खून बहने लगा। इस घटना को लेकर भी स्कूल की काफी आलोचना हुई थी।

इस घटना के बाद कई अभिभावक स्कूल पहुँच गए। उन्होंने स्कूल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। अभिभावकों के दबाव के बाद स्कूल प्रशासन ने शिक्षक को निलंबित कर दिया। निलंबित शिक्षक का नाम ‘मोसेस अदला‘ था।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह शिक्षक पहले भी चार बच्चों की पिटाई कर चुका है। अभिभावकों ने इस मामले की शिकायत खोखरा थाने में की थी। पुलिस ने केस दर्ज कर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की थी।

यह स्कूल अक्टूबर 2024 में भी विवादों में आया था। उस समय स्कूल का स्टाफ 200 छात्रों को मेहसाणा के एक वॉटर पार्क में लेकर गया थे। इस यात्रा के लिए जिला शिक्षा कार्यालय से कोई अनुमति नहीं ली गई थी, जो कि सरकारी नियमों का उल्लंघन थी।

घटना सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारियों ने इसका संज्ञान लिया। उन्होंने स्कूल प्रशासन को बकायदा नोटिस भेजा था। साथ ही, पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई गई थी।

स्कूल प्रशासन पर और भी गंभीर आरोप

हिंदू छात्र की हत्या के बाद स्कूल प्रशासन पर कई सवाल उठे हैं। स्थानीय लोगों ने स्कूल की भूमिका पर शक जताया है। मृतक छात्र के दादा ने ऑपइंडिया से बातचीत में बड़ा दावा किया। घटना वाले दिन कुछ मुस्लिम छात्रों ने चेहरे ढक रखे थे। उन्होंने पीड़ित छात्र पर चाकू से हमला कर दिया। मृतक के दादा ने कहा कि घटना से दो महीने पहले ही स्कूल में शिकायत दी गई थी। शिकायत में कहा गया था कि मुस्लिम छात्र हिंदू छात्रों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन स्कूल ने कोई कार्रवाई नहीं की।

इसके अलावा, दादा ने बताया कि उनका पूरा परिवार शाकाहारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम छात्र स्कूल में मटन लाते थे। उनके पोते को पनीर बताकर मटन खिलाया जाता था।

इतना ही नहीं, स्कूल कैब के मालिक ने भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्रों पर हमले किए हैं। अब इन आरोपों की पुलिस जाँच कर रही है।

पीड़ित छात्र के दादा ने बताया कि उन्होंने कई बार वीडियो बनाकर स्कूल को सबूत दिए। उन्होंने लगातार शिकायतें कीं, लेकिन स्कूल ने कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने धर्मांतरण का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि पहले हिंदू छात्रों पर ईसाई या मुस्लिम बनने का दबाव डाला जाता था।

अन्य अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने भी यही आरोप लगाए। उनका कहना है कि मुस्लिम छात्र लगातार हिंदू छात्रों को परेशान करते थे। इन घटनाओं की स्कूल में शिकायत की गई, लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके अलावा एक और गंभीर आरोप सामने आया है। कहा गया कि स्कूल में नैतिक शिक्षा के नाम पर ईसाई मजहब का प्रचार किया जा रहा है। सिलेबस के जरिए छात्रों को ईसाई मजहब की ओर आकर्षित करने की कोशिश हो रही है।

इसके अलावा, एक महिला ने बड़ा दावा किया है। उसने कहा कि स्कूल संचालक अभिभावकों से ₹2 लाख माँग रहे थे। साथ ही, छात्रों से कहा जा रहा था कि वे बिना बोर्ड परीक्षा दिए पास हो जाएँगे। इन आरोपों की भी अब जाँच की जा रही है।

चर्च के जरिए चलता स्कूल

जाँच में पता चला कि यह स्कूल ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च‘ नाम का एक विदेशी संगठन चलाता है। इस संगठन का मुख्यालय अमेरिका में है। अहमदाबाद में यह स्कूल एक स्थानीय ट्रस्ट, ‘एश्लॉक ट्रस्ट’ के जरिए चलाया जाता है। यह ट्रस्ट भी उसी चर्च का हिस्सा है। पूरी दुनिया में, यह चर्च संगठन 7,804 स्कूल और कॉलेज चलाता है।

स्कूल के मूल्य और नियम ईसाई मजहब के अनुसार बनाए गए हैं। चर्च के स्कूल अधिकतर चर्च के नियमों के अनुसार चलते हैं। दुनिया भर में, ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च संगठन’ सभी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के नियम बनाता है और फिर उन पर लागू करवाता है।

स्कूल का प्रिंसिपल जी इमैनुएल

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल के प्रिंसिपल का नाम जी इमैनुएल है। जी इमैनुएल ईसाई मजहब को मानते हैं और पूरे स्कूल का प्रबंधन संभालते हैं। हत्या से पहले, स्थानीय लोग और अभिभावक प्रिंसिपल से कई बार शिकायत कर चुके थे। लेकिन प्रिंसिपल ने इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया और कोई कदम नहीं उठाया।

यह स्कूल ‘काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन’ (CISCE) से जुड़ा है। यह एक गैर-सरकारी संगठन है। यह संस्था 1990 से स्कूल की पढ़ाई की देखरेख करती है। खास बात यह है कि प्रिंसिपल जी इमैनुएल खुद इस संस्था का अध्यक्ष है।

सेवेंथ डे स्कूल CISCE और गुजरात बोर्ड दोनों से जुड़ा हुआ है। चूंकि स्कूल के प्रिंसिपल खुद CISCE के अध्यक्ष हैं, इसलिए कई आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर परिषद का अध्यक्ष ही स्कूल का प्रिंसिपल है, तो स्कूल के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा?

अवलोकन करें:-

अहमदाबाद : सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्र की चाकू मारकर की हत्या, स्कूल प्रब
अहमदाबाद : सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्र की चाकू मारकर की हत्या, स्कूल प्रब
 

हालाँकि, प्रिंसिपल इमैनुएल की तरफ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है। पुलिस फिलहाल मामले की जाँच कर रही है।

पंजाब : नशा और धर्मांतरण बने नासूर: केजरीवाल के इशारे पर नाचने को मजबूर मुख्यमंत्री भगवंत मान; दलित और पिछड़ी जातियों के नाम पर खुली दुकानों के दुकानदार खामोश, क्यों?

गुरुओं की जिस धरती पर गुरु गोविंद सिंह ने धर्म की रक्षा करने और सच्चे गुरुसिख बनाने के लिए अपने दो साहिबजादों को शहीद करवा दिया था, वहां पर अब धर्मांतरण और नशे का खुला खेल चल रहा है। आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार में गरीब हिंदुओं-सिखों को बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करके ईसाई बनाया जा रहा है। इसके लिए ईसाई मिशनरी तरह-तरह के ढोंग रचते हैं। वो अपने अंदर ईसा मसीह की आत्मा आने का स्वांग भरते हुए गरीब और कम पढे़-लिखे लोगों को ईसाई बना रहे है। खास बात ये है कि इन नए-नकोरे ईसाइयों में से कइयों ने दस्तावेजों पर फिलहाल कुछ नहीं बदला है। दरअसल, अरविंद केजरीवाल की राजनीति पूरी तरह झूठ पर आधारित है। झूठे वादे और हसीन सपने दिखाकर ये जनता को भरमाते हैं। लेकिन अब एक के बाद एक उनके झूठ पर से पर्दा उठ रहा है। दिल्ली की जनता ने तो ‘झूठे’ केजरीवाल को सत्ता से बाहर ही कर दिया है। पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने गारंटी दी थी कि तीन महीने के अंदर नशा खत्म कर देंगे। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी अपना वादा पूरा नहीं किया। इसका खामियाजा यहां की युवा पीढ़ी को उठाना पड़ रहा है। आज पंजाब के युवा ड्रग ओवरडोज के शिकार हो रहे हैं और केजरीवाल-मान की गारंटी गायब है।

केजरीवाल जो चाहता है, वो मजबूर मान को करना पड़ता है
दरअसल, पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री की अपनी मजबूरी है। दरअसल, उनकी पार्टी और सरकार दिल्ली से चलती है। कई बार मुख्यमंत्री मान भी मजबूर होते हैं। केजरीवाल जो चाहता है, वो उसको करना पड़ता है। हालांकि मैंने फाइलों पर उल्टा सीधा लिखने के क्रम को तोड़ा है। अगर पंजाब सरकार की कोई चीज समझ में नहीं आती तो बुला लेते हैं। उनसे बात करके समझने की कोशिश की। कई बार मेरी बात उनको ठीक लगती है तो वह स्वीकार कर लेते हैं। टकराव की स्थिति मतभिन्नता से बनती है।

पंजाब में नशा और धर्मांतरण दो बड़ी समस्याएं बन गई हैं

आप सरकार आने के बाद से पंजाब में नशा और धर्मांतरण दो बड़ी समस्याएं बन गई हैं और सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने मीडिया से बातचीत में साफ-साफ कहते हैं कि राज्य की दो ही बड़ी समस्याएं हैं- नशा और धर्मातंरण। मुझसे मिलने आने वाले पंजाब के ज्यादातर लोग इन्हीं का जिक्र करते हैं। नशे के खिलाफ अभियान पर कटारिया ने कहा- इसके लिए मिलकर प्रयास कर सकते हैं। नशा पंजाब की जड़ों में इस कदर फैल गया है कि तत्काल सफलता तो बहुत दूर है, लेकिन कोशिश शुरू करें तो सकारत्मक परिणाम आएंगे। मैं जब से पंजाब आया हूं, रोज क्राइम रिपोर्ट देखता हूं। इसमें नशे के कारोबार और धर्मांतरण के मामले खूब आ रहे हैं।
सीमावर्ती जिलों में बच्चों में नशे की प्रवृति ने झकझोर दिया
राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया बताते है कि मैं सीमावर्ती जिलों के दौरे पर गया, वहां विलेज कमेटी के लोगों से मिला। वहां महिलाएं खड़ी थीं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि गवर्नर साहब और कुछ कर सको तो करना। हमारे बच्चों को नशे से बचा लो। उनकी आंखों में जो करुणा और दर्द था, उसने मुझे झकझोर दिया। महिला कह रही थी, जवान बेटा तड़प रहा है। उसे नशा लाकर देना होता है। हमने इसके खिलाफ अभियान शुरू किया है। मैं खुद पैदल यात्रा में शामिल हुआ। लोगों का गजब रिस्पॉन्स मिला।
बिखर चुकी कांग्रेस पार्टी में नेता घुटन महसूस कर रहे हैं
कांग्रेस से बहुत से नेताओं को बीजेपी में ज्वाइन करने पर कटारिया कहते हैं कि कांग्रेस तो बिखर रही है। उनकी विचारधारा को लोग पसंद नहीं करते। अब उनके नेताओं की मजबूरी है। क्योंकि वो पार्टी से जुड़े हुए हैं। कांग्रेस में पहले कई अच्छे लोग भी रहे हैं। प्रणब मुखर्जी से अच्छा व्यक्ति कौन हो सकता है, लेकिन वो भी घुटन महसूस करते थे। उनके जीवन में मूल्य बहुत प्रमुख थे, लेकिन उसके बाद तो केवल तुष्टीकरण के आधार पर देश को कमजोर करते चले गए। इससे कांग्रेस कमजोर होती गई। जो अच्छे लोग हैं, वह सब वहां अपने आप को अच्छा नहीं समझते थे। कई लोग उस कारण से भी निकले। बाहर से अच्छे लोग लेने में दिक्कत नहीं है। लेकिन कैडर उतना मजबूत हो कि बाहर वालों को अपने हिसाब से ढालकर ट्रेंड कर सकें। कोई नुकसान नहीं होगा। बीजेपी नेता अपने परिश्रम और विचार के आधार पर चुनाव लड़ते हैं। उनको जनता पहले भी पसंद करती थी। आज भी पसंद करती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयालजी से लेकर अब पीएम मोदी तक हमारे दिग्गज नेताओं ने जिस समर्पण भाव से संगठन खड़ा किया। उसकी प्रतिष्ठा जनता के बीच में है।
धर्मांतरण के चलते पंजाब में आठ गुना से ज्यादा बढ़ चुके हैं ईसाई
पंजाब में जहां तक धर्मांतरण की बात है तो साल 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में सिखों की संख्या जहां 57.69 प्रतिशत थी तो हिंदुओं की आबादी 38.49 प्रतिशत थी वहीं पंजाब में ईसाइयों की आबादी करीब डेढ़ प्रतिशत ही थी। ऐसे में अपनी आबादी बढ़ाने के लिए ईसाइयों द्वारा गरीब सिखों और हिंदुओं को ईसाई धर्म में शामिल किया जा रहा है। पंजाब में धर्म परिवर्तन का असर यह है कि प्रदेश में ईसाइयों के चर्च की संख्या बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान से सटे बॉर्डर इलाकों में यह चर्च बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही ईसाई धर्म को बढ़ावा देने के लिए दीवारों पर संदेश भी लिखे जा रहे हैं। हालात यह हैं कि अब ईसाई धर्म को मानने वाले 12 फीसदी से ऊपर जा चुके हैं। पिछले दिनों धर्मांतरण के खिलाफ निहंग सिखों ने भी जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन इन सब के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। इस अवैध धर्म परिवर्तन के खिलाफ सरकार कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है। अगर इसकी तह में जाएं तो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सनातन धर्म से नफरत की बात सामने आती है। केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रह चुके हैं और इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है।
पंजाब में मस्जिदें और चर्च बनना चिंता का विषयः  ज्ञानी हरप्रीत सिंह
अकाल तख्त की ओर से  ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा कि हमें धार्मिक रूप से कमजोर करने के लिए पंजाब की इस धरती पर बहुत जोर-शोर से ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा है। पंजाब में विभिन्न जगहों पर मस्जिदें और चर्च बन रहे हैं, जो हमारे लिए चिंता का विषय है। पंजाब के सिखों और हिंदुओं को गुमराह कर उन्हें ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है और यह सब सरकार की नाक के नीचे हो रहा है।
धर्म परिवर्तन के बारे में क्या कहता है संविधान
भारतीय संविधान के (अनुच्छेद 25-28) अनुसार कोई व्यक्ति अपनी पसंद से कोई भी धर्म चुन सकता है, और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति का धर्म जबरन या लालच देकर नहीं कराया जा सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए और 298 के अनुसार यह एक दंडनीय अपराध है। इसे लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कानून बने हैं। धर्म परिवर्तन करने के दो तरीके हैं। पहला कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए और दूसरा धार्मिक स्थल पर जाकर उनके निर्धारित शिष्टाचार का पालन करते हुए। अगर कोई अपना धर्म बदलना चाहता है तो उसे अपने ज़िले के कलेक्टर या किसी अन्य संबंधित अधिकारी को नोटिस देना होगा। नोटिस देने के 30 से 60 दिनों के अंदर धर्म परिवर्तन कराया जाएगा। इसके लिए आपको कोर्ट या किसी वकील से एक हलफनामा बनाना होगा और अपनी सारी जानकारी देनी होगी – जैसे आप किस धर्म में जा रहे हैं, नाम और पता आदि। धर्म बदलने के बाद धर्म गजट कार्यालय में अपना नया नाम और धर्म दर्ज कराना होता है।
लोगों को लुभाने के लिए मंच से चमत्कार के दावे, इसका लोग कर रहे विरोध
इस धर्मांतरण का सबसे ज्यादा विरोध इसके तरीकों को लेकर किया जा रहा है। ईसाई मिशनरी मंच पर खड़े होकर अपने अंदर ईसा मसीह की आत्मा आने की बात कहते हैं। वे तरह-तरह के स्वांग रचकर गरीब-अशिक्षित लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कहते हैं। वे चमत्कारिक तरीके से लंबे समय से बीमार चल रहे लोगों को ठीक करने का दावा करते हैं। वे उन बीमार लोगों का भी पल भर में इलाज करने का दावा करते हैं जिन बीमारियों का इलाज संभव नहीं है। मंच से कुछ लोग इस बात का भी दावा करते हैं कि उनकी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, उनकी बीमारी ठीक हो गई। इससे गरीब-अशिक्षित लोग प्रभावित होकर ईसाई धर्म की ओर मुड़ जाते हैं। इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाकर भी लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित किया जाता है। वे गरीबों को यह बताते हैं कि ईसाई धर्म अपनाने से वे अमेरिकी-यूरोपीय देशों के ईसाइयों की तरह धनवान बन जाएंगे। लेकिन यह संभव नहीं है और इसका कोई आधार नहीं है। यही कारण है कि सिख समुदाय की ओर से इन दावों को गैरकानूनी बताकर इनका विरोध किया जा रहा है।
पादरियों की संख्या 65 हजार से अधिक हो चुकी
साल 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में ईसाइयों की कुल जनसंख्या 3 लाख 48 हजार थी। लेकिन आज आलम यह है कि यहां पादरियों की संख्या 65,000 के करीब हो चुकी है। यही नहीं पंजाब में ईसाइयत के प्रचार का बेड़ा उठाए लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पंजाब में सिखों को ईसाई बनाने के तमाशे ने लाखों लोगों को चर्च तक पहुंचा दिया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालत यह है कि ईसाई मिशनरी यहां के सभी 23 जिलों में फैली हुई हैं। ये मिशनरियां माझा और दोआबा बेल्ट के अलावा मालवा में फिरोजपुर और फाजिल्का के सीमावर्ती इलाकों में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं।
पंजाब के सीमावर्ती इलाक़ों में तेजी से फैला ईसाई धर्म
चंडीगढ़ से अमृतसर और गुरदासपुर जाते हुए रास्ते में आपको जगह-जगह ईसाई पादरियों के पोस्टर और होर्डिंग दिखाई देंगे। पाकिस्तान से लगने वाले पंजाब के इलाक़ों में ईसाई धर्म का कितना प्रभाव है। इसका अंदाज़ा गांवों में बने चर्चों से लगाया जा सकता है। इनमें से अधिकांश नए चर्च निजी तौर पर प्रचार करने वाले पादरियों द्वारा स्थापित किए जा रहे हैं। कई जगहों पर ईसाई धर्म मानने वाले लोगों ने घरों में चर्च स्थापित कर लिए हैं। वह प्रचार के विभिन्न माध्यमों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ख़ूब प्रचार भी कर रहे हैं। भारत के 10 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून मौजूद हैं। यह कानून पहली बार 1967 में ओडिशा में बनाया गया था। उसके बाद इसे गुजरात, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में लागू किया गया। हरियाणा विधानसभा द्वारा भी धर्मांतरण विरोधी विधेयक पारित किया जा चुका है। इन सभी राज्यों में कानून का उल्लंघन करने पर सज़ा और जुर्माने की राशि अलग-अलग है।
ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित समुदाय के लोग नाम नहीं बदलते
पंजाब में ईसाई समुदाय की आबादी बहुत कम हैं। जानकारों का मानना है कि कम संख्या का एक कारण यह भी है कि बहुत से लोग धर्मांतरण के बाद अपना नाम नहीं बदलते हैं। इसके पीछे कारण है दलित समुदाय के लोगों को मिलने वाला आरक्षण है। सीमावर्ती इलाक़ों में जो धर्मांतरण हो रहा है उस में ज्यादातर लोग ग़रीब और दलित वर्ग से आते है। बहुत सारे दलित असल में ईसाई बन चुके है पर कागजों में दलित ही हैं क्योकि ईसाई समुदाय को कोई आरक्षण नहीं मिलता है। इसलिए बहुत सारे लोग असल में ईसाई घर्म को मानते हैं पर वो ना तो आपना नाम बदलते है और ना ही कोई चीज़ पहनते हैं जिससे ये पता लग सके कि ये लोग आपना धर्म बदल कर ईसाई धर्म अपना चुके है। पंजाब में ईसाई समुदाय की संख्या को देखा जाए तो पता चलता है कि जिन लोगों ने धर्मांतरण किया है उन में से अधिकांश दलित समुदाय के लोग हैं।
पंजाब के कई गांवों में ईसाई हुए बहुसंख्यक
पंजाब के हालात वैसे ही हो रहे हैं जैसे 1980 और 1990 के दशक में तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश के हुआ करते थे। गुरदासपुर के कई गांवों की छतों पर छोटे-छोटे चर्च बन गए हैं। पंजाब के सीमावर्ती इलाके में रहने वाले मजहबी सिख और वाल्मीकि हिंदू समुदायों के कई दलितों ने ईसाई धर्म अपना लिया है। यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट की मानें तो अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में 600-700 चर्च बन चुके हैं, इनमें से 70 फीसदी पिछले पांच वर्षों में ही बने हैं। पाकिस्तान बॉर्डर से लगभग 2 किलोमीटर पहले दुजोवाल गांव पड़ता है। इस गांव में लगभग 30 प्रतिशत लोग ईसाई हैं। गांव में दो गुरुद्वारे हैं और दो ही चर्च हैं।
मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरी के रास्ते पर चल रहे शिष्य केजरीवाल
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रहे हैं। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है। आम तौर पर माना जाता है कि शिष्य पर गुरु के उपदेशों का असर होता है। केजरीवाल पर भी उनके गुरु के उपदेश का असर दिखाई दे रहा हैे। वो उन्हीं के बताये रास्ते पर चल रहे हैं। जिस तरह मदर टेरेसा ने गरीबों की मुफ्त सेवा के बहाने दलितों और आदिवासियो के बीच पैठ बनाई। उसके बाद ईसाई मिशनरियों ने चमत्कारिक मुफ्त इलाज, मुफ्त शिक्षा और पैसे का लालच देकर और ऊंच-नीच, जात-पात का एहसास दिलाकर गरीब दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण कराया। उसी तरह केजरीवाल भी मुफ्त रेवड़ी कल्चर के जरिए गरीब दलितों, आदिवासियों, सिखों में पैठ बनाकर उनके बौद्ध और ईसाई धर्म में धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं।
मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने के कार्यक्रम में शामिल हुए थे केजरीवाल
गौरतलब है कि 4 सितंबर, 2016 को वेटिकन सिटी में मदर टेरेसा को पोप फ्रांसिस की मजूदगी में संत की उपाधि दी गई। उपाधि देने के लिए आयजित इस कार्यक्रम में दिल्ली के तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल भी शामिल हुए थे। अरविंद केजरीवाल मदर टेरेसा को बहुत मानते थे। इसी समय उन्होंने मदर टेरेसा को याद करते हुए एक लेख आउटलुक पत्रिका में लिखा था। लेख में केजरीवाल ने 1992 में मदर टेरेसा से मिलने और मिशनरीज ऑफ चैरिटी के कालिघाट आश्रम में बिताये गए पलों का जिक्र किया था। उस लेख का कुछ अंश यहां दिया जा रहा है…
मिशनरीज ऑफ चैरिटी और केजरीवाल का संस्मरण
“टाटा स्टील से इस्तीफा दे दिया और मदर टेरेसा से मिलने कोलकाता चला गया। ये सुबह का समय था और वहां लंबी कतारें लगी हुई थीं। वह सभी लोगों से कुछ सेकेंड के लिए मिल रही थी। जैसे ही मेरा नंबर आया उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और पूछा तुम क्या चाहते हो? मैंने मदर से कहा कि मां, मैं आपके साथ काम करना चाहता हूं।
उन्होंने मुझसे कलिघाट आश्रम जाने की बात कही। ये मिशनरीज ऑफ चैरिटी के अहम केंद्रों में से एक था। उन्होंने मुझसे वहां जाकर काम करने के लिए कहा। उस समय कोलकाता ऐसा स्थान था जहां दोनों तरह के लोग मिल जाते थे, जिसमें कुछ तो बहुत गरीब थे, वहीं कुछ बहुत अमीर। फिलहाल वहां अभी के हालात मुझे नहीं पता हैं। मुझे काम दिया गया कि मैं शहर में घूमकर गरीब, असहाय, बेबस लोगों को कलिघाट आश्रम ले जाऊं और उनकी सेवा करूं, मैंने ऐसा ही किया।
एक बार मैंने मदर से पूछा कि आप जरूरतमंद लोगों को सेवा मुहैया कराती हैं, आखिर आप उन्हें ठीक होने के बाद आत्मनिर्भर बनाने पर विचार क्यों नहीं करती हैं? इस पर उन्होंने कहा कि ये काम सरकार और दूसरे एनजीओ का है। उनका काम जरूरतमंदों की सेवा करना है। ये पूरा अनुभव मेरे लिए आध्यात्मिक था। मैं वहां कुछ महीने तक रहा।
जब मैं नागपुर में नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्स की ट्रेनिंग के लिए पहुंचा, जहां आईआरएस ट्रेनियों को भेजा जाता है, वहां मुझे मदर टेरेसा का आश्रम एकेडमी के बिल्कुल पास ही मिल गया। एकेडमी में ही मेरी सुनीता (पत्नी) से मुलाकात हुई। हम अकसर सप्ताह के आखिर में आश्रम जाते थे। नागपुर का आश्रम बिल्कुल अलग था। यहां कलिघाट आश्रम की तरह वॉलंटियर नहीं बल्कि नन्स होती थी जो सेवा कार्य करती थी। इसलिए यहां हमारे लिए ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं था।”
सेवा की आड़ में दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण
दरअसल मदर टरेसा ने गरीबों की सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियों के लिए भारत में एक मैदान तैयार किया, जिसमें वो धर्मांतरण का खेल बखूबी खेल सके। मदर टेरेसा ने तथाकथित नि:स्वार्थ सेवाभाव से भारतीय जनमानस में एक दीन-दुखियों के उद्धारक के रूप में अपनी छवि बनाई, उसका फायदा आगे चलकर ईसाई मिशनरियों ने भी उठाया। पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित और खुद को प्रगतिशील बताने वाले वामपंथियों, सेक्युलर और लिबरल गैंग ने मदर टरेसा का खूब महिमामंडन किया। उन्होंने मदर टेरेसा को गरीबों का मसीहा बताकर जनता के सामने पेश किया। लेकिन मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरियों का मकसद सेवा की आड़ में दलितों और आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराना था।

छत्तीसगढ़ : ईसाई मिशनरियों की गुंडई से उबला नारायणपुर, एसपी का सिर फटा : विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान भी हिंसा

                         ईसाई मिशनरियों के विरोध में जनजातीय समाज का प्रदर्शन (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)
छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्मांतरण का खेल कई वर्षों से जारी है और इसका सबसे ज़्यादा निशाना जनजातीय समाज के लोगों को बनाया गया है। अब ईसाई धर्मांतरण के विरोध में जनजातीय समाज ने भी आक्रोशित होकर विरोध प्रदर्शन किया है। ताज़ा मामला नारायणपुर जिले के एड़का गाँव का है, जहाँ धर्मांतरित ईसाइयों पर जनजातीय समाज के लोगों पर हमला करने का आरोप है। इस संबंध पीड़ितों ने छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उइके को पत्र लिख कर मामला से अवगत कराया है।

इस पत्र में आरोप लगाया गया है कि एड़का पंचायत के गोर्रा ग्राम में नए-नए धर्मांतरित ईसाइयों द्वारा जनजातीय समाज के लोगों पर लाठी-डंडों और रॉड के अलावा धारदार हथियारों से हमला किया गया। दावा किया गया है कि कुछ पादरी इस हमलावर भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। नारायणपुर जिला चिकित्सालय में घायलों का इलाज चल रहा है। पीड़ितों का कहना है कि उन्हें जान बचा कर भागना पड़ा। जिला प्रशासन को बिगड़ती कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए जनजातीय समाज ने राज्यपाल से कार्रवाई की माँग की है।

                 पीड़ित जनजातीय समाज ने राज्यपाल अनुसुइया उइके को लिखा पत्र, घटना से कराया अवगत

स्थानीय मीडिया संस्थान ‘बोल छत्तीसगढ़’ की खबर में जानकारी दी गई है कि इस हमले में जनजातीय समाज के एक दर्जन से अधिक नेता घायल हुए हैं। साथ ही गाँव में दंगे जैसा माहौल बन गया। सूत्रों के हवाले से मीडिया संस्थान ने कहा है कि बाहर से करीब 700-800 ईसाइयों की भीड़ को बुलाया गया था। नारायणपुर के एसपी सदानंद कुमार को भी चोटें आई हैं। पत्थरबाजी और लाठी-डंडे से मारपीट की खबर पाकर वो घटनास्थल पर पहुँचे थे। उनसे हमने संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उधर से फोन नहीं उठाया गया। उनसे बातचीत होते ही हमारी खबर को अपडेट किया जाएगा।

जिलाधिकारी अजीत वसंत ने भी अस्पताल जाकर घायलों का हालचाल लिया और घटना के संबंध में पूछताछ की। जनजातीय समाज ने धर्मांतरण के विरुद्ध रैली निकाली थी, जिसमें 5000 के करीब लोग शामिल हुए थे। जबकि ईसाइयों का आरोप है कि बंगलापारा के चर्च में तोड़फोड़ की गई है। जनजातीय समाज का कहना है कि ये सुनियोजित साजिश के तहत भोले-भाले लोगों को ईसाई धर्मांतरण के लिए फँसा कर निशाना बनाया जा रहा है।

धर्मांतरण से वहाँ की मूल संस्कृति भी प्रभावित हो रही है, जिससे जनजातीय समाज नाराज़ है। जबकि धर्मांतरण करने वालों का कहना है कि उन्हें गाँव से बाहर जाने के लिए कहा जा रहा है। बेनूर क्षेत्र के करीब 6 गाँवों में धर्मांतरण के कारण माहौल गर्म है। दोनों पक्षों के बीच पहले भी मारपीट हुई है। धर्मांतरण करने वाले कई लोगों ने जिला कलेक्ट्रेट के बाहर धरना भी दिया था। पुलिस-प्रशासन के काफी समझाने के बाद वो वापस गए थे।

जनजातीय समाज के लोगों ने बताया कि सड़क पर आने-जाने वाले निर्दोष लोगों को मारा-पीटा गया है। जनजातीय समाज के एक नेता ने बताया कि उन्हें जान से मार डालने की धमकी दी गई। उन्होंने कहा कि हमलोग जनजातीय समाज को छोड़ कर कहाँ जाएँगे। उन्होंने बताया कि ‘लोगों को काटने’ की धमकी भी दी गई है। घायलों को सिर में पट्टी बाँधे भी देखा जा सकता है। उनका कहना है कि राज्य के कई इलाकों में ईसाई धर्मांतरण एक बड़ी समस्या है।

पीड़ितों ने कहा कि चर्च के इशारे पर इस हमले को अंजाम दिया गया है। कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें लोगों को बड़े-बड़े डंडे लिए मारपीट करते हुए देखा जा सकता है। पुलिस वालों पर भी हमले किए गए। अर्धसैनिक बलों के जवानों को भी घायल देखा गया। एक मैदान में ग्रामीणों के कार्यक्रम का वीडियो भी सामने आया है, जहाँ कई अर्धसैनिक बल तैनात हैं। बताया जा रहा है कि ये कार्यक्रम ईसाइयों द्वारा धर्मांतरण की साजिश और मना करने पर मारपीट की घटना के विरोध में हुआ था।

एसपी का सिर फटने के कारण उन्हें टाँके लगाए गए हैं। एड़का थाना प्रभारी भुनेश्वर जोशी भी घायल हुए हैं। इन इलाकों में माओवादियों का भी प्रभाव रहा है। मारपीट के विरोध में बखरुपारा स्थित साप्ताहिक बाजार में जनजातीय समाज ने विरोध प्रदर्शन की बात कही थी। नारायणपुर में बंद भी बुलाया गया था, उसमें भी हिंसा की खबरें आईं। थाने में दोनों तरफ से लिखित शिकायतें मिली हैं। बताया जा रहा है कि शनिवार (31 दिसंबर, 2022) को कुछ लोगों ने जनजातीय समाज के लोगों को घर से निकाल कर रात के अँधेरे में पिटाई की, जिससे वहाँ आक्रोश है।

कर्नाटक : 5000 रुपए का ईनाम रख पैगंबर मुहम्मद पर निबंध प्रतियोगिता करा रहा था हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ

साभार ANI 

कर्नाटक के धरवाड़ क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल में गुप्त रूप से इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करने के कारण कार्रवाई की गई है। गडक जिले में स्थित सरकारी स्कूल के हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ को निलंबित कर दिया गया है।

कर्नाटक सरकार की ओर इसे इस तरह की प्रतियोगिता आयोजित करने का किसी तरह का निर्देश नहीं दिया गया था। इसके बावजूद हेडमास्टर ने पैगंबर पर गुप्त रूप से प्रतियोगिता आयोजित की। लोक निर्देश के अतिरिक्त आयुक्त सिद्रमप्पा एस. बिरादर ने बताया, “प्रारंभिक जाँच के दौरान हेडमास्टर के खिलाफ आरोप सही साबित हुए। यही वजह है कि उन्हें निलंबित कर दिया गया है।”

घटना नागवी के सरकारी हाईस्कूल की है। मामले का खुलासा हिंदू संगठन श्रीराम सेना के सदस्यों द्वारा प्रधानाध्यापक के विरोध के बाद हुई। इसके बाद बुधवार (28 सितंबर 2022) को घटना की जाँच शुरू की गई। खंड शिक्षा अधिकारी ने बताया कि एक शिकायत दर्ज की गई थी और वह शिकायत की एक प्रति राज्य शिक्षा विभाग के उप-निदेशक को भेजेंगे।

जाँच में पाया गया कि प्रधानाध्यापक मुनाफ ने अन्य शिक्षकों या विभाग को बताए बिना कक्षा 8 के 43 छात्रों को पैगंबर मुहम्मद पर एक पुस्तक देकर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया था। प्रधानाध्यापक अब्दुल मुनाफ ने कथित तौर पर बच्चों को किताबें दीं और इस प्रतियोगिता के लिए 5,000 रुपए के नकद पुरस्कार की भी घोषणा की।

एक अभिभावक शरणप्पा गौड़ा हापलाद ने कहा, “मुझे पता चला कि स्कूल के प्रधानाध्यापक निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित करके और 5,000 रुपए का नकद पुरस्कार घोषित कर छात्रों के दिमाग में इस्लाम थोपने की कोशिश कर रहे थे। लड़के और लड़कियों को 5,000 रुपए जीतने की उम्मीद में निबंध लिखने के लिए कहा गया था।”

उन्होंने छात्रों का धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाते हुए आगे बताया, “हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ का इरादा छात्रों का धर्म परिवर्तन कराना था। इसलिए मैंने श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं को सूचित किया। मैं जानना चाहता हूँ कि पैगंबर मुहम्मद पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करने के पीछे और क्या इरादा हो सकता है।”