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‘शिक्षा क्रांति’ के नाम पर छलावा: पंजाब में 1,100 से अधिक सरकारी स्कूलों में प्रिंसिपल नहीं!


कॉकरोच बीजेपी शासित राज्यों में शिक्षा के नाम हंगामा करने का षड़यंत्र कर रहे हैं लेकिन अपने गुरु केजरीवाल के पंजाब में शिक्षा के नाम पर दिल्ली की तरह पागल बनाए जाने पर आंखे बंद हैं। झाड़खंड में छात्रों द्वारा आंदोलन करने जाने में शायद घुटनों में तकलीफ होने के साथ-साथ आंख, नाक और कान सब में शायद सीसा भर गया है।   
आम आदमी पार्टी (आप) के बहुचर्चित शिक्षा मॉडल की हकीकत एक बार फिर बेनकाब हो गई है। पंजाब में भगवंत मान सरकार द्वारा लगातार ‘शिक्षा क्रांति’ के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के 60 प्रतिशत सीनियर सेकेंडरी स्कूल बिना नियमित प्रिंसिपल के चल रहे हैं। शिक्षक संगठनों और विपक्षी दलों के खुलासे ने साफ कर दिया है कि दिल्ली से लेकर पंजाब तक शिक्षा व्यवस्था केवल महंगे विज्ञापनों और प्रचार तक सीमित है, जबकि हकीकत में स्कूल शिक्षकों की भारी कमी, प्रशासनिक अव्यवस्था और बदहाली से जूझ रहे हैं।

पंजाब में प्रशासनिक पंगुता: 1,113 सीनियर सेकेंडरी स्कूल बिना प्रिंसिपल

डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (डीटीएफ) के अनुसार, पंजाब के कुल 1,927 सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में से 1,113 स्कूलों में नियमित प्रिंसिपल ही नहीं हैं। मानसा और नवांशहर में 86 प्रतिशत, तरनतारन और बरनाला में 80 प्रतिशत तथा मोगा, कपूरथला और जालंधर में करीब 70 प्रतिशत पद रिक्त हैं। स्कूलों में मुखिया न होने के कारण अध्यापकों पर गैर-जरूरी प्रशासनिक बोझ डाला जा रहा है, जिससे शिक्षण कार्य पूरी तरह ठप हो गया है।

‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ के नाम पर छलावा: 19,000 आम स्कूलों की अनदेखी

पंजाब सरकार चुनिंदा ‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ का उद्घाटन कर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रही है, जबकि राज्य के 19 हजार से अधिक सामान्य सरकारी स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। बीजेपी नेताओं ने औचक निरीक्षण के बाद खुलासा किया कि सामान्य स्कूलों में 80 से 90 बच्चे एक ही कमरे या बरामदों में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।

फिनलैंड और सिंगापुर टूर का तमाशा: प्रशासनिक प्रशिक्षण बनाम बुनियादी जरूरतें

सरकार ने शिक्षकों और प्रिंसिपलों को सिंगापुर और फिनलैंड भेजने के नाम पर करोड़ों रुपये का प्रचार किया, लेकिन जब स्कूलों में नियमित प्रिंसिपल और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं हैं, तो इस तरह के विदेशी दौरों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। विशेषज्ञों का आरोप है कि बुनियादी कमियों को दूर करने के बजाय विदेशी दौरों को पीआर स्टंट की तरह भुनाया जा रहा है।

ड्रग्स और सुरक्षा का संकट: चारदीवारी और सुरक्षा गार्ड से वंचित स्कूल

पंजाब के कई सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की चारदीवारी टूटी पड़ी है और सुरक्षा गार्ड तक तैनात नहीं हैं। राज्य में नशामुक्ति के दावों के बीच स्कूलों के आसपास सुरक्षा का यह अभाव छात्रों के लिए असुरक्षित माहौल पैदा कर रहा है, जिससे अभिभावकों में भारी चिंता है।

अतिथि और संविदा व्यवस्था का जाल: पक्के रोजगार के वादों की अनदेखी

दिल्ली के रास्ते पर चलते हुए पंजाब में भी स्थायी नियुक्तियों के बजाय संविदा, एडहॉक और गेस्ट शिक्षकों के भरोसे काम चलाया जा रहा है। चुनाव पूर्व सभी संविदा शिक्षकों को पक्का करने और समान काम के लिए समान वेतन देने के बड़े वादों के बावजूद आज भी शिक्षक अनिश्चित भविष्य और कम वेतन में काम करने को मजबूर हैं।

सड़कों पर लाठी खाते शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कामों का बोझ

तथाकथित शिक्षा क्रांति का दावा करने वाली सरकार में ईटीटी और बीएड शिक्षक अपनी नियमित भर्तियों और लंबित पदोन्नतियों के लिए पानी की टंकियों पर चढ़ने और लाठीचार्ज झेलने को मजबूर हैं। वहीं, कार्यरत 90 प्रतिशत शिक्षकों को पढ़ाई कराने के बजाय जनगणना, ड्रग सर्वे और चुनावी ड्यूटियों जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंक दिया गया है।

सरकारी स्कूलों में नामांकन में भारी गिरावट

प्रचार तंत्र के बावजूद पंजाब के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में करीब 9 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। प्रशासनिक अव्यवस्था और पढ़ाई का माहौल न होने के कारण अभिभावक सरकारी स्कूलों से अपने बच्चों को निकालने पर मजबूर हैं, जिससे लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है।

साइंस-कॉमर्स स्ट्रीम नदारद: गरीब छात्रों के सपनों पर ताला

पंजाब और दिल्ली के अधिकांश ग्रामीण व कस्बाई सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में 11वीं और 12वीं में केवल आर्ट्स विषय पढ़ाए जा रहे हैं। विज्ञान (साइंस) और वाणिज्य (कॉमर्स) की प्रयोगशालाओं और अध्यापकों का अभाव होने से गरीब और मध्यम वर्ग के छात्र डॉक्टर, इंजीनियर या सीए बनने की दौड़ से स्कूल स्तर पर ही बाहर हो रहे हैं।

विज्ञापन बनाम बजट: प्रचार पर करोड़ों खर्च, शिक्षा बोर्ड का बकाया अटका
पंजाब बीजेपी ने सवाल उठाया है कि सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए दूसरे राज्यों के विज्ञापनों में करोड़ों रुपये फूंक रही है, जबकि पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (पीएसईबी) का 570 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया अटका पड़ा है। रिक्त पदों को भरने के बजाय सरकारी खजाने को राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किया जा रहा है।
दिल्ली मॉडल की भी खुली पोल: क्लासरूम निर्माण में भारी अनियमितताएं
पंजाब से पहले दिल्ली के शिक्षा मॉडल की पोल भी खुल चुकी है, जहां संविदा और गेस्ट टीचर्स के भरोसे पूरा तंत्र छोड़ा गया। दिल्ली में अस्थायी क्लासरूम निर्माण की लागत में 53 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि और भारी वित्तीय गड़बड़ियों की जांच की मांग सतर्कता रिपोर्टों के आधार पर उठाई गई।
नतीजे चमकाने का खेल: 9वीं-11वीं में छंटनी की पुरानी नीति
दिल्ली में बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे बेहतर दिखाने के लिए 9वीं और 11वीं कक्षा के कमजोर छात्रों को आगे न बढ़ने देने या स्कूल से निकालने की नीति का जो आरोप लगता रहा है, वही तरीका अब पंजाब में भी अपनाया जा रहा है। बच्चों की गुणवत्ता सुधारने के बजाय केवल आंकड़ों की बाजीगरी कर जनता को गुमराह किया जा रहा है।

पंजाब में AAP राज में 6 पेपर लीक: भगवंत मान के झूठ और कुशासन की खुली पोल

पंजाब में ‘बदलाव’ का रंगीन सपना दिखाकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। दिल्ली वाले अपने राजनीतिक आका अरविंद केजरीवाल के नक्शेकदम पर चलते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी जनता को गुमराह करने और सफेद झूठ बोलने में महारत हासिल कर ली है। साढ़े चार साल में छह से अधिक बड़े पेपर लीक होने, संगठित परीक्षा माफिया के हावी होने और हाई कोर्ट की करारी फटकार के बावजूद सीएम भगवंत मान का यह दावा करना कि ‘पंजाब में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ’, न केवल हास्यास्पद है बल्कि पंजाब के लाखों मेहनती, योग्य और राष्ट्रभक्त युवाओं के भविष्य पर सीधा प्रहार है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पंजाब की जनता के साथ मुस्तैदी से खड़ी है और मान सरकार की इस नाकामी, झूठ की राजनीति तथा शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस के इस्तीफे की मांग को लेकर निर्णायक संग्राम लड़ रही है।

दिल्ली मॉडल का असली चेहरा: झूठ और छलावे पर टिकी आप सरकार
अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर भगवंत मान ने भी पंजाब में भ्रम और झूठ की राजनीति को अपना मुख्य हथियार बना लिया है। जिस प्रकार दिल्ली में झूठे वादों का महल खड़ा किया गया, ठीक वही छलावा अब पंजाब की जनता के साथ किया जा रहा है। प्रशासनिक अनुभवहीनता और दृष्टि के अभाव में आम आदमी पार्टी ने पंजाब को पूरी तरह प्रशासनिक अराजकता में ढकेल दिया है।

मुख्यमंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान: सफेद झूठ की पराकाष्ठा
26 जुलाई 2026 को दिए अपने बयान में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ढिंडोरा पीटा कि उनके साढ़े चार साल के शासन में राज्य में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। जब पूरा पंजाब परीक्षा घोटालों की आग में झुलस रहा है, तब मुख्यमंत्री का यह बयान केवल एक राजनीतिक दांव-पेच नहीं, बल्कि अपनी असफलताओं को छिपाने का एक ढीठ और गैर-जिम्मेदाराना प्रयास है।

कानून बनाने के बजाय इनकार की मुद्रा:  टालमटोल वाला रवैया
जब देश के अन्य राज्य और केंद्र की मोदी सरकार पेपर लीक रोकने के लिए सख्त से सख्त कानून बना रही है, तब पंजाब के मुख्यमंत्री यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं कि समस्या मौजूद है। भगवंत मान को पंजाब की जनता को जवाब देना चाहिए कि वे माफिया पर नकेल कसने के लिए कड़ा कानून बनाने से पीछे क्यों हट रहे हैं?

नैतिक जवाबदेही से भागते शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस 
जब भी शासन-प्रशासन की साख पर धब्बा लगता है, तो नैतिक जवाबदेही तय होना पहला कदम होता है। लेकिन पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस कुर्सी से चिपके हुए हैं। एक के बाद एक 6 बड़े पेपर लीक होने के बावजूद शिक्षा मंत्री का चुप्पी साधे रखना और पद न छोड़ना यह साबित करता है कि आप सरकार में नैतिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है।

अरविंद केजरीवाल के सफेद झूठ और ढोंग का पर्दाफाश
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, जो अन्य राज्यों में शिक्षा क्रांति की डींगें हांकते नहीं थकते, पंजाब के पेपर लीक मामले पर पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं। केजरीवाल खुद सार्वजनिक मंचों से यह झूठा दावा कर रहे थे कि ‘आज पंजाब शिक्षा के क्षेत्र में नंबर 1 पर है’ और आप सरकार के कार्यकाल में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। उन्होंने घोटालों पर लीपापोती करते हुए धोखाधड़ी की इतनी गंभीर घटनाओं को महज ‘डिजिटल पेन से नकल की छिटपुट कोशिश’ बताकर टालने का प्रयास किया। एक तरफ केजरीवाल केंद्र सरकार और अन्य राज्यों से इस्तीफे मांगते घूमते हैं, वहीं दूसरी तरफ पंजाब में साढ़े चार साल में 6 बड़े पेपर लीक होने के बावजूद अपने ही मुख्यमंत्री भगवंत मान और शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस का बचाव कर रहे हैं। केजरीवाल का यह दोहरा चरित्र और झूठा प्रचार साबित करता है कि उन्हें पंजाब के युवाओं के भविष्य से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि वे केवल अपनी पार्टी की धूमिल होती साख को बचाने में लगे हैं।

पहला पेपर लीक: पंजाब फार्मेसी भर्ती परीक्षा में हाई-टेक धांधली
19 जुलाई 2026 को बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेस (BFUHS) द्वारा आयोजित 454 फार्मेसी ऑफिसरों की भर्ती परीक्षा विवादों के घेरे में आ गई। परीक्षा शुरू होने के महज 15 मिनट बाद ही हाई-टेक डिवाइसेज से पर्चा बाहर पहुंच गया और 7,000 अभ्यर्थियों की मेहनत पर पानी फिर गया।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का चाबुक: फार्मेसी भर्ती पर स्टे
फार्मेसी भर्ती परीक्षा में हुई धांधली इतनी उजागर हुई कि मामला हाई कोर्ट पहुंच गया। केशव कंबोज और अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी है। कोर्ट के इस कड़े कदम ने मुख्यमंत्री के उस खोखले दावे की पोल खोल दी कि पंजाब में सब निष्पक्ष हो रहा है।

ब्लूटूथ पेन और गैंग का साम्राज्य: मान सरकार में प्रशासनिक विफलता
मुख्यमंत्री भले ही इसे सिर्फ एक साधारण ‘ब्लूटूथ चीटिंग’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करें, लेकिन 35 अभ्यर्थियों का पकड़ा जाना और 11 सदस्यीय बाहरी गैंग की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि पंजाब में परीक्षा माफिया का तंत्र कितना मजबूत हो चुका है।

दूसरा पेपर लीक: नायब तहसीलदार भर्ती परीक्षा घोटाला
आप सरकार के शुरुआती दौर में ही नायब तहसीलदार परीक्षा में ब्लूटूथ और इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स के माध्यम से नकल कराने का बड़ा मामला सामने आया था। इसमें जमकर धांधली हुई, जिससे पूरे राज्य की प्रशासनिक चयन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया।

तीसरा पेपर लीक: पंजाब पुलिस सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती धांधली


पंजाब के युवाओं का सपना पुलिस बल में शामिल होकर देश और राज्य की सेवा करना होता है। लेकिन आप सरकार ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को भी घोटाले की भेंट चढ़ा दिया, जिससे आक्रोशित अभ्यर्थियों को सड़कों पर उतरने के लिए विवश होना पड़ा।

चौथा पेपर लीक: पटवारी और राजस्व विभाग परीक्षा में अनियमितताएं
राजस्व विभाग में पटवारी पदों के लिए हुई परीक्षा में भी पर्चा लीक होने और आंसर-शीट में हेरफेर की शिकायतें आईं। पारदर्शी व्यवस्था का ढोंग रचने वाली आप सरकार के राज में परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त पाई गई।

पांचवां पेपर लीक: असिस्टेंट प्रोफेसर एवं लेक्चरर भर्ती घोटाला
उच्च शिक्षा क्षेत्र को भी भगवंत मान सरकार के कुप्रबंधन ने नहीं बख्शा। असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती में प्रश्नपत्र लीक होने और चहेतों को लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे, जिसने पंजाब के शैक्षणिक स्तर और मेधावी युवाओं के भरोसे को करारा झटका दिया।

छठा पेपर लीक: पशुपालन और अन्य तकनीकी विभागों की भर्ती परीक्षाएं
पशुपालन विभाग एवं अन्य प्राविधिक (तकनीकी) पदों की भर्ती परीक्षाओं में भी पर्चा समय से पहले लीक हुआ और संगठित गिरोहों ने इसे हल किया। साढ़े चार साल में 6 भर्ती परीक्षाओं में सेंधमारी सरकार की असफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मनीष सिसोदिया का उलटा पड़ा दांव: केजरीवाल और मान के वादे की खुली हवा
आप नेता मनीष सिसोदिया ने खुद बयान दिया था कि अगर पंजाब में एक भी पेपर लीक होता है तो अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान खुद पंजाब के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लेंगे। लेकिन आज लगातार 6 पेपर लीक होने और छात्रों के सड़कों पर उतरने के बावजूद न तो केजरीवाल ने इस्तीफा मांगा और न ही भगवंत मान ने कोई कदम उठाया। सिसोदिया का यह दावा अब आम आदमी पार्टी के दोहरे रवैये और राजनीतिक पाखंड का सबसे बड़ा सबूत बन गया है। 

‘कट्टर ईमानदार’ होने का जुमला
खुद को ‘कट्टर ईमानदार’ बताने वाली आम आदमी पार्टी के शासन में लगातार 6 पेपर लीक होना यह सिद्ध करता है कि ईमानदारी का यह नारा केवल वोटों की ठगी के लिए गढ़ा गया एक राजनीतिक जुमला था।

पंजाब : नशा और धर्मांतरण बने नासूर: केजरीवाल के इशारे पर नाचने को मजबूर मुख्यमंत्री भगवंत मान; दलित और पिछड़ी जातियों के नाम पर खुली दुकानों के दुकानदार खामोश, क्यों?

गुरुओं की जिस धरती पर गुरु गोविंद सिंह ने धर्म की रक्षा करने और सच्चे गुरुसिख बनाने के लिए अपने दो साहिबजादों को शहीद करवा दिया था, वहां पर अब धर्मांतरण और नशे का खुला खेल चल रहा है। आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार में गरीब हिंदुओं-सिखों को बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करके ईसाई बनाया जा रहा है। इसके लिए ईसाई मिशनरी तरह-तरह के ढोंग रचते हैं। वो अपने अंदर ईसा मसीह की आत्मा आने का स्वांग भरते हुए गरीब और कम पढे़-लिखे लोगों को ईसाई बना रहे है। खास बात ये है कि इन नए-नकोरे ईसाइयों में से कइयों ने दस्तावेजों पर फिलहाल कुछ नहीं बदला है। दरअसल, अरविंद केजरीवाल की राजनीति पूरी तरह झूठ पर आधारित है। झूठे वादे और हसीन सपने दिखाकर ये जनता को भरमाते हैं। लेकिन अब एक के बाद एक उनके झूठ पर से पर्दा उठ रहा है। दिल्ली की जनता ने तो ‘झूठे’ केजरीवाल को सत्ता से बाहर ही कर दिया है। पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने गारंटी दी थी कि तीन महीने के अंदर नशा खत्म कर देंगे। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी अपना वादा पूरा नहीं किया। इसका खामियाजा यहां की युवा पीढ़ी को उठाना पड़ रहा है। आज पंजाब के युवा ड्रग ओवरडोज के शिकार हो रहे हैं और केजरीवाल-मान की गारंटी गायब है।

केजरीवाल जो चाहता है, वो मजबूर मान को करना पड़ता है
दरअसल, पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री की अपनी मजबूरी है। दरअसल, उनकी पार्टी और सरकार दिल्ली से चलती है। कई बार मुख्यमंत्री मान भी मजबूर होते हैं। केजरीवाल जो चाहता है, वो उसको करना पड़ता है। हालांकि मैंने फाइलों पर उल्टा सीधा लिखने के क्रम को तोड़ा है। अगर पंजाब सरकार की कोई चीज समझ में नहीं आती तो बुला लेते हैं। उनसे बात करके समझने की कोशिश की। कई बार मेरी बात उनको ठीक लगती है तो वह स्वीकार कर लेते हैं। टकराव की स्थिति मतभिन्नता से बनती है।

पंजाब में नशा और धर्मांतरण दो बड़ी समस्याएं बन गई हैं

आप सरकार आने के बाद से पंजाब में नशा और धर्मांतरण दो बड़ी समस्याएं बन गई हैं और सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने मीडिया से बातचीत में साफ-साफ कहते हैं कि राज्य की दो ही बड़ी समस्याएं हैं- नशा और धर्मातंरण। मुझसे मिलने आने वाले पंजाब के ज्यादातर लोग इन्हीं का जिक्र करते हैं। नशे के खिलाफ अभियान पर कटारिया ने कहा- इसके लिए मिलकर प्रयास कर सकते हैं। नशा पंजाब की जड़ों में इस कदर फैल गया है कि तत्काल सफलता तो बहुत दूर है, लेकिन कोशिश शुरू करें तो सकारत्मक परिणाम आएंगे। मैं जब से पंजाब आया हूं, रोज क्राइम रिपोर्ट देखता हूं। इसमें नशे के कारोबार और धर्मांतरण के मामले खूब आ रहे हैं।
सीमावर्ती जिलों में बच्चों में नशे की प्रवृति ने झकझोर दिया
राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया बताते है कि मैं सीमावर्ती जिलों के दौरे पर गया, वहां विलेज कमेटी के लोगों से मिला। वहां महिलाएं खड़ी थीं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि गवर्नर साहब और कुछ कर सको तो करना। हमारे बच्चों को नशे से बचा लो। उनकी आंखों में जो करुणा और दर्द था, उसने मुझे झकझोर दिया। महिला कह रही थी, जवान बेटा तड़प रहा है। उसे नशा लाकर देना होता है। हमने इसके खिलाफ अभियान शुरू किया है। मैं खुद पैदल यात्रा में शामिल हुआ। लोगों का गजब रिस्पॉन्स मिला।
बिखर चुकी कांग्रेस पार्टी में नेता घुटन महसूस कर रहे हैं
कांग्रेस से बहुत से नेताओं को बीजेपी में ज्वाइन करने पर कटारिया कहते हैं कि कांग्रेस तो बिखर रही है। उनकी विचारधारा को लोग पसंद नहीं करते। अब उनके नेताओं की मजबूरी है। क्योंकि वो पार्टी से जुड़े हुए हैं। कांग्रेस में पहले कई अच्छे लोग भी रहे हैं। प्रणब मुखर्जी से अच्छा व्यक्ति कौन हो सकता है, लेकिन वो भी घुटन महसूस करते थे। उनके जीवन में मूल्य बहुत प्रमुख थे, लेकिन उसके बाद तो केवल तुष्टीकरण के आधार पर देश को कमजोर करते चले गए। इससे कांग्रेस कमजोर होती गई। जो अच्छे लोग हैं, वह सब वहां अपने आप को अच्छा नहीं समझते थे। कई लोग उस कारण से भी निकले। बाहर से अच्छे लोग लेने में दिक्कत नहीं है। लेकिन कैडर उतना मजबूत हो कि बाहर वालों को अपने हिसाब से ढालकर ट्रेंड कर सकें। कोई नुकसान नहीं होगा। बीजेपी नेता अपने परिश्रम और विचार के आधार पर चुनाव लड़ते हैं। उनको जनता पहले भी पसंद करती थी। आज भी पसंद करती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयालजी से लेकर अब पीएम मोदी तक हमारे दिग्गज नेताओं ने जिस समर्पण भाव से संगठन खड़ा किया। उसकी प्रतिष्ठा जनता के बीच में है।
धर्मांतरण के चलते पंजाब में आठ गुना से ज्यादा बढ़ चुके हैं ईसाई
पंजाब में जहां तक धर्मांतरण की बात है तो साल 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में सिखों की संख्या जहां 57.69 प्रतिशत थी तो हिंदुओं की आबादी 38.49 प्रतिशत थी वहीं पंजाब में ईसाइयों की आबादी करीब डेढ़ प्रतिशत ही थी। ऐसे में अपनी आबादी बढ़ाने के लिए ईसाइयों द्वारा गरीब सिखों और हिंदुओं को ईसाई धर्म में शामिल किया जा रहा है। पंजाब में धर्म परिवर्तन का असर यह है कि प्रदेश में ईसाइयों के चर्च की संख्या बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान से सटे बॉर्डर इलाकों में यह चर्च बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही ईसाई धर्म को बढ़ावा देने के लिए दीवारों पर संदेश भी लिखे जा रहे हैं। हालात यह हैं कि अब ईसाई धर्म को मानने वाले 12 फीसदी से ऊपर जा चुके हैं। पिछले दिनों धर्मांतरण के खिलाफ निहंग सिखों ने भी जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन इन सब के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। इस अवैध धर्म परिवर्तन के खिलाफ सरकार कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है। अगर इसकी तह में जाएं तो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सनातन धर्म से नफरत की बात सामने आती है। केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रह चुके हैं और इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है।
पंजाब में मस्जिदें और चर्च बनना चिंता का विषयः  ज्ञानी हरप्रीत सिंह
अकाल तख्त की ओर से  ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा कि हमें धार्मिक रूप से कमजोर करने के लिए पंजाब की इस धरती पर बहुत जोर-शोर से ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा है। पंजाब में विभिन्न जगहों पर मस्जिदें और चर्च बन रहे हैं, जो हमारे लिए चिंता का विषय है। पंजाब के सिखों और हिंदुओं को गुमराह कर उन्हें ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है और यह सब सरकार की नाक के नीचे हो रहा है।
धर्म परिवर्तन के बारे में क्या कहता है संविधान
भारतीय संविधान के (अनुच्छेद 25-28) अनुसार कोई व्यक्ति अपनी पसंद से कोई भी धर्म चुन सकता है, और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति का धर्म जबरन या लालच देकर नहीं कराया जा सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए और 298 के अनुसार यह एक दंडनीय अपराध है। इसे लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कानून बने हैं। धर्म परिवर्तन करने के दो तरीके हैं। पहला कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए और दूसरा धार्मिक स्थल पर जाकर उनके निर्धारित शिष्टाचार का पालन करते हुए। अगर कोई अपना धर्म बदलना चाहता है तो उसे अपने ज़िले के कलेक्टर या किसी अन्य संबंधित अधिकारी को नोटिस देना होगा। नोटिस देने के 30 से 60 दिनों के अंदर धर्म परिवर्तन कराया जाएगा। इसके लिए आपको कोर्ट या किसी वकील से एक हलफनामा बनाना होगा और अपनी सारी जानकारी देनी होगी – जैसे आप किस धर्म में जा रहे हैं, नाम और पता आदि। धर्म बदलने के बाद धर्म गजट कार्यालय में अपना नया नाम और धर्म दर्ज कराना होता है।
लोगों को लुभाने के लिए मंच से चमत्कार के दावे, इसका लोग कर रहे विरोध
इस धर्मांतरण का सबसे ज्यादा विरोध इसके तरीकों को लेकर किया जा रहा है। ईसाई मिशनरी मंच पर खड़े होकर अपने अंदर ईसा मसीह की आत्मा आने की बात कहते हैं। वे तरह-तरह के स्वांग रचकर गरीब-अशिक्षित लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कहते हैं। वे चमत्कारिक तरीके से लंबे समय से बीमार चल रहे लोगों को ठीक करने का दावा करते हैं। वे उन बीमार लोगों का भी पल भर में इलाज करने का दावा करते हैं जिन बीमारियों का इलाज संभव नहीं है। मंच से कुछ लोग इस बात का भी दावा करते हैं कि उनकी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, उनकी बीमारी ठीक हो गई। इससे गरीब-अशिक्षित लोग प्रभावित होकर ईसाई धर्म की ओर मुड़ जाते हैं। इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाकर भी लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित किया जाता है। वे गरीबों को यह बताते हैं कि ईसाई धर्म अपनाने से वे अमेरिकी-यूरोपीय देशों के ईसाइयों की तरह धनवान बन जाएंगे। लेकिन यह संभव नहीं है और इसका कोई आधार नहीं है। यही कारण है कि सिख समुदाय की ओर से इन दावों को गैरकानूनी बताकर इनका विरोध किया जा रहा है।
पादरियों की संख्या 65 हजार से अधिक हो चुकी
साल 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में ईसाइयों की कुल जनसंख्या 3 लाख 48 हजार थी। लेकिन आज आलम यह है कि यहां पादरियों की संख्या 65,000 के करीब हो चुकी है। यही नहीं पंजाब में ईसाइयत के प्रचार का बेड़ा उठाए लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पंजाब में सिखों को ईसाई बनाने के तमाशे ने लाखों लोगों को चर्च तक पहुंचा दिया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालत यह है कि ईसाई मिशनरी यहां के सभी 23 जिलों में फैली हुई हैं। ये मिशनरियां माझा और दोआबा बेल्ट के अलावा मालवा में फिरोजपुर और फाजिल्का के सीमावर्ती इलाकों में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं।
पंजाब के सीमावर्ती इलाक़ों में तेजी से फैला ईसाई धर्म
चंडीगढ़ से अमृतसर और गुरदासपुर जाते हुए रास्ते में आपको जगह-जगह ईसाई पादरियों के पोस्टर और होर्डिंग दिखाई देंगे। पाकिस्तान से लगने वाले पंजाब के इलाक़ों में ईसाई धर्म का कितना प्रभाव है। इसका अंदाज़ा गांवों में बने चर्चों से लगाया जा सकता है। इनमें से अधिकांश नए चर्च निजी तौर पर प्रचार करने वाले पादरियों द्वारा स्थापित किए जा रहे हैं। कई जगहों पर ईसाई धर्म मानने वाले लोगों ने घरों में चर्च स्थापित कर लिए हैं। वह प्रचार के विभिन्न माध्यमों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ख़ूब प्रचार भी कर रहे हैं। भारत के 10 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून मौजूद हैं। यह कानून पहली बार 1967 में ओडिशा में बनाया गया था। उसके बाद इसे गुजरात, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में लागू किया गया। हरियाणा विधानसभा द्वारा भी धर्मांतरण विरोधी विधेयक पारित किया जा चुका है। इन सभी राज्यों में कानून का उल्लंघन करने पर सज़ा और जुर्माने की राशि अलग-अलग है।
ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित समुदाय के लोग नाम नहीं बदलते
पंजाब में ईसाई समुदाय की आबादी बहुत कम हैं। जानकारों का मानना है कि कम संख्या का एक कारण यह भी है कि बहुत से लोग धर्मांतरण के बाद अपना नाम नहीं बदलते हैं। इसके पीछे कारण है दलित समुदाय के लोगों को मिलने वाला आरक्षण है। सीमावर्ती इलाक़ों में जो धर्मांतरण हो रहा है उस में ज्यादातर लोग ग़रीब और दलित वर्ग से आते है। बहुत सारे दलित असल में ईसाई बन चुके है पर कागजों में दलित ही हैं क्योकि ईसाई समुदाय को कोई आरक्षण नहीं मिलता है। इसलिए बहुत सारे लोग असल में ईसाई घर्म को मानते हैं पर वो ना तो आपना नाम बदलते है और ना ही कोई चीज़ पहनते हैं जिससे ये पता लग सके कि ये लोग आपना धर्म बदल कर ईसाई धर्म अपना चुके है। पंजाब में ईसाई समुदाय की संख्या को देखा जाए तो पता चलता है कि जिन लोगों ने धर्मांतरण किया है उन में से अधिकांश दलित समुदाय के लोग हैं।
पंजाब के कई गांवों में ईसाई हुए बहुसंख्यक
पंजाब के हालात वैसे ही हो रहे हैं जैसे 1980 और 1990 के दशक में तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश के हुआ करते थे। गुरदासपुर के कई गांवों की छतों पर छोटे-छोटे चर्च बन गए हैं। पंजाब के सीमावर्ती इलाके में रहने वाले मजहबी सिख और वाल्मीकि हिंदू समुदायों के कई दलितों ने ईसाई धर्म अपना लिया है। यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट की मानें तो अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में 600-700 चर्च बन चुके हैं, इनमें से 70 फीसदी पिछले पांच वर्षों में ही बने हैं। पाकिस्तान बॉर्डर से लगभग 2 किलोमीटर पहले दुजोवाल गांव पड़ता है। इस गांव में लगभग 30 प्रतिशत लोग ईसाई हैं। गांव में दो गुरुद्वारे हैं और दो ही चर्च हैं।
मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरी के रास्ते पर चल रहे शिष्य केजरीवाल
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रहे हैं। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है। आम तौर पर माना जाता है कि शिष्य पर गुरु के उपदेशों का असर होता है। केजरीवाल पर भी उनके गुरु के उपदेश का असर दिखाई दे रहा हैे। वो उन्हीं के बताये रास्ते पर चल रहे हैं। जिस तरह मदर टेरेसा ने गरीबों की मुफ्त सेवा के बहाने दलितों और आदिवासियो के बीच पैठ बनाई। उसके बाद ईसाई मिशनरियों ने चमत्कारिक मुफ्त इलाज, मुफ्त शिक्षा और पैसे का लालच देकर और ऊंच-नीच, जात-पात का एहसास दिलाकर गरीब दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण कराया। उसी तरह केजरीवाल भी मुफ्त रेवड़ी कल्चर के जरिए गरीब दलितों, आदिवासियों, सिखों में पैठ बनाकर उनके बौद्ध और ईसाई धर्म में धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं।
मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने के कार्यक्रम में शामिल हुए थे केजरीवाल
गौरतलब है कि 4 सितंबर, 2016 को वेटिकन सिटी में मदर टेरेसा को पोप फ्रांसिस की मजूदगी में संत की उपाधि दी गई। उपाधि देने के लिए आयजित इस कार्यक्रम में दिल्ली के तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल भी शामिल हुए थे। अरविंद केजरीवाल मदर टेरेसा को बहुत मानते थे। इसी समय उन्होंने मदर टेरेसा को याद करते हुए एक लेख आउटलुक पत्रिका में लिखा था। लेख में केजरीवाल ने 1992 में मदर टेरेसा से मिलने और मिशनरीज ऑफ चैरिटी के कालिघाट आश्रम में बिताये गए पलों का जिक्र किया था। उस लेख का कुछ अंश यहां दिया जा रहा है…
मिशनरीज ऑफ चैरिटी और केजरीवाल का संस्मरण
“टाटा स्टील से इस्तीफा दे दिया और मदर टेरेसा से मिलने कोलकाता चला गया। ये सुबह का समय था और वहां लंबी कतारें लगी हुई थीं। वह सभी लोगों से कुछ सेकेंड के लिए मिल रही थी। जैसे ही मेरा नंबर आया उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और पूछा तुम क्या चाहते हो? मैंने मदर से कहा कि मां, मैं आपके साथ काम करना चाहता हूं।
उन्होंने मुझसे कलिघाट आश्रम जाने की बात कही। ये मिशनरीज ऑफ चैरिटी के अहम केंद्रों में से एक था। उन्होंने मुझसे वहां जाकर काम करने के लिए कहा। उस समय कोलकाता ऐसा स्थान था जहां दोनों तरह के लोग मिल जाते थे, जिसमें कुछ तो बहुत गरीब थे, वहीं कुछ बहुत अमीर। फिलहाल वहां अभी के हालात मुझे नहीं पता हैं। मुझे काम दिया गया कि मैं शहर में घूमकर गरीब, असहाय, बेबस लोगों को कलिघाट आश्रम ले जाऊं और उनकी सेवा करूं, मैंने ऐसा ही किया।
एक बार मैंने मदर से पूछा कि आप जरूरतमंद लोगों को सेवा मुहैया कराती हैं, आखिर आप उन्हें ठीक होने के बाद आत्मनिर्भर बनाने पर विचार क्यों नहीं करती हैं? इस पर उन्होंने कहा कि ये काम सरकार और दूसरे एनजीओ का है। उनका काम जरूरतमंदों की सेवा करना है। ये पूरा अनुभव मेरे लिए आध्यात्मिक था। मैं वहां कुछ महीने तक रहा।
जब मैं नागपुर में नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्स की ट्रेनिंग के लिए पहुंचा, जहां आईआरएस ट्रेनियों को भेजा जाता है, वहां मुझे मदर टेरेसा का आश्रम एकेडमी के बिल्कुल पास ही मिल गया। एकेडमी में ही मेरी सुनीता (पत्नी) से मुलाकात हुई। हम अकसर सप्ताह के आखिर में आश्रम जाते थे। नागपुर का आश्रम बिल्कुल अलग था। यहां कलिघाट आश्रम की तरह वॉलंटियर नहीं बल्कि नन्स होती थी जो सेवा कार्य करती थी। इसलिए यहां हमारे लिए ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं था।”
सेवा की आड़ में दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण
दरअसल मदर टरेसा ने गरीबों की सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियों के लिए भारत में एक मैदान तैयार किया, जिसमें वो धर्मांतरण का खेल बखूबी खेल सके। मदर टेरेसा ने तथाकथित नि:स्वार्थ सेवाभाव से भारतीय जनमानस में एक दीन-दुखियों के उद्धारक के रूप में अपनी छवि बनाई, उसका फायदा आगे चलकर ईसाई मिशनरियों ने भी उठाया। पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित और खुद को प्रगतिशील बताने वाले वामपंथियों, सेक्युलर और लिबरल गैंग ने मदर टरेसा का खूब महिमामंडन किया। उन्होंने मदर टेरेसा को गरीबों का मसीहा बताकर जनता के सामने पेश किया। लेकिन मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरियों का मकसद सेवा की आड़ में दलितों और आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराना था।