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राष्ट्रपति/राज्यपाल के लिए बिल की मंजूरी की टाइमलाइन तय नहीं कर सकती कोर्ट: SC का फैसला, कहा- अधिक देरी हुई तो दे गवर्नर को देंगे निर्देश


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि गवर्नर और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभाओं से आए बिलों पर फैसला लेने के लिए कोर्ट कोई टाइमलाइन तय नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि पिछले फैसले में तय की गई समय-सीमा और ‘डीम्ड असें’ (समय पर कार्रवाई न होने पर बिल को मंजूर मान लेना) संविधान के खिलाफ है। अदालत ने माना कि ऐसा करना गवर्नर और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों में दखल होगा।

जानकारी के अनुसार, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गवर्नर का काम किसी और संस्था से बदला नहीं जा सकता। यानी अगर गवर्नर बिल पर फैसला लेने में देर कर दें, तो भी अदालत उस प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती। कोर्ट तभी कदम उठा सकती है जब देरी बेहद ज़्यादा हो और उसकी कोई वजह न हो और तब भी अदालत सिर्फ इतना कह सकती है कि गवर्नर ‘उचित समय’ में फैसला लें, न कि क्या फैसला लें।

यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए सवालों पर दिया गया है, जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या अदालत गवर्नर और राष्ट्रपति की प्रक्रिया पर समय-सीमा तय कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा करना सत्ता के विभाजन के सिद्धांत के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवर्नर किसी ‘सुपर मुख्यमंत्री’ की तरह बर्ताव नहीं कर सकते, क्योंकि राज्य में दो सरकारें नहीं हो सकतीं।

 

यूँ ही सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार ने नहीं कहा- इससे पैदा होगी संवैधानिक अराजकता, राष्ट्रपति ने भी ‘डेडलाइन’ पर पूछे थे 14 सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हुए विधेयकों की मंजूरी देने की डेडलाइन तय की थी। अब इस पर केंद्र सरकार ने गंभीर चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने बीते अप्रैल में राष्ट्रपति द्वारा बिल की मंजूरी के लिए 3 महीने की समयसीमा तय की थी जिस पर सरकार ने ‘संवैधानिक अराजकता’ की स्थिति पैदा होने की चेतावनी दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं हैं। जिसके बाद खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को लेकर 14 गंभीर सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों से अपना जवाब देने को कहा था।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ 19 अगस्त से इस मामले की सुनवाई करने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि ऐसी समयसीमाएँ सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों का हड़पना होगा जो उसे नहीं दी गई हैं।

सरकार ने कहा कि इसके चलते शक्तियों का पृथक्करण बिगड़ जाएगा। सरकार ने चेतावनी दी कि इसके चलते ‘संवैधानिक अराजकता‘ की स्थिति पैदा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने बयान में कहा, “अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सर्वोच्च न्यायालय संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या या संविधान बनाने वालों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकता। जब तक संविधान के लिखित नियमों में कोई तय प्रक्रिया मौजूद ना हो।”

मेहता ने कहा कि राज्यपाल की सहमति की प्रक्रिया लागू करने में कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल जैसे ऊँचे पद को घटाकर एक छोटे या अधीनस्थ पद की तरह बना दिया जाए।

मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद अपने आप में ‘पूर्ण राजनीतिक’ पद हैं और ये लोकतांत्रिक शासन के ऊँचे आदर्शों के प्रतीक हैं। यानी इन्हें संपूर्ण राजनीतिक वैधता मिली हुई है। उन्होंने कहा कि अगर कभी इन पदों से जुड़ी कोई गड़बड़ी नजर आती है तो उसका समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए ना कि अदालत के जरूरत से ज्यादा दखल से।

सरकार ने आगे बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वे किसी बिल पर विचार करने में पूरी स्वतंत्रता रखें और उन्हें किसी निश्चित समयसीमा का पालन करना जरूरी नहीं है। समयसीमा ना होना जान-बूझकर और सोच-समझकर संविधान में रखा गया एक विशेष नियम है।

संविधान में कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं बताई गई है जिससे बिना संविधान में बदलाव किए इन सीमाओं को लागू कर सके। संविधान में बदलाव करना केवल संसद की विशेष शक्ति है जो अनुच्छेद 368 के तहत ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने पूछे थे 14 सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े कुछ अहम सवाल पूछे थे। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाई है।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास ये सवाल भेजे थे। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की इजाजत देता है।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था-

  1. जब राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत कोई बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का क्या था फैसला?

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने राज्यपाल RN रवि के उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी ना देने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में इस पर सुनवाई की। तमिलनाडु की सरकार की दलील थी कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा 2 बार पारित किए जाने के बावजूद विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लटका रखा है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी और साथ ही राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।
राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लंबे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

जब कोई विधेयक संसद या विधानसभा में पास हो जाता है, तो इसे लागू करने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और कानून नहीं बनता।
राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।
राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।
दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने उठाया था।
उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदाहरण था।

क्यों SC का फैसले बताया जा रहा न्यायिक दखल?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही न्यायिक दखल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। संविधान से इतर जाकर देश के प्रमुख के ऊपर समयसीमा लगाने को लेकर कई कानूनविदों ने इस पर सवाल उठाए थे।
पूर्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट के ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने तक का दावा कर दिया था।
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विधेयकों पर कार्यपालिका को समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए कहना संविधान में ना तो दिया गया है और ना ही इसकी भावना निहित है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता राजन सिंह ने चेताया था कि ऐसे फैसलों से न्यायपालिका सरकार की कार्यप्रणाली में बहुत गहराई तक दखल कर सकती है और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से भविष्य में अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं।
संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं, जैसा केंद्र सरकार ने भी अपने जवाब में बताया है। कुछ समय पहले की बात है जब चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
कानूनविद मानते हैं कि न्यायपालिका में जवाबदेही के अभाव के चलते ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जहाँ अधिक न्यायिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब कुछ दिनों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी तो देखना होगा कि कोर्ट अपने फैसले को लेकर क्या रुख रखता है।

पंजाब : नशा और धर्मांतरण बने नासूर: केजरीवाल के इशारे पर नाचने को मजबूर मुख्यमंत्री भगवंत मान; दलित और पिछड़ी जातियों के नाम पर खुली दुकानों के दुकानदार खामोश, क्यों?

गुरुओं की जिस धरती पर गुरु गोविंद सिंह ने धर्म की रक्षा करने और सच्चे गुरुसिख बनाने के लिए अपने दो साहिबजादों को शहीद करवा दिया था, वहां पर अब धर्मांतरण और नशे का खुला खेल चल रहा है। आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार में गरीब हिंदुओं-सिखों को बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करके ईसाई बनाया जा रहा है। इसके लिए ईसाई मिशनरी तरह-तरह के ढोंग रचते हैं। वो अपने अंदर ईसा मसीह की आत्मा आने का स्वांग भरते हुए गरीब और कम पढे़-लिखे लोगों को ईसाई बना रहे है। खास बात ये है कि इन नए-नकोरे ईसाइयों में से कइयों ने दस्तावेजों पर फिलहाल कुछ नहीं बदला है। दरअसल, अरविंद केजरीवाल की राजनीति पूरी तरह झूठ पर आधारित है। झूठे वादे और हसीन सपने दिखाकर ये जनता को भरमाते हैं। लेकिन अब एक के बाद एक उनके झूठ पर से पर्दा उठ रहा है। दिल्ली की जनता ने तो ‘झूठे’ केजरीवाल को सत्ता से बाहर ही कर दिया है। पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने गारंटी दी थी कि तीन महीने के अंदर नशा खत्म कर देंगे। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी अपना वादा पूरा नहीं किया। इसका खामियाजा यहां की युवा पीढ़ी को उठाना पड़ रहा है। आज पंजाब के युवा ड्रग ओवरडोज के शिकार हो रहे हैं और केजरीवाल-मान की गारंटी गायब है।

केजरीवाल जो चाहता है, वो मजबूर मान को करना पड़ता है
दरअसल, पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री की अपनी मजबूरी है। दरअसल, उनकी पार्टी और सरकार दिल्ली से चलती है। कई बार मुख्यमंत्री मान भी मजबूर होते हैं। केजरीवाल जो चाहता है, वो उसको करना पड़ता है। हालांकि मैंने फाइलों पर उल्टा सीधा लिखने के क्रम को तोड़ा है। अगर पंजाब सरकार की कोई चीज समझ में नहीं आती तो बुला लेते हैं। उनसे बात करके समझने की कोशिश की। कई बार मेरी बात उनको ठीक लगती है तो वह स्वीकार कर लेते हैं। टकराव की स्थिति मतभिन्नता से बनती है।

पंजाब में नशा और धर्मांतरण दो बड़ी समस्याएं बन गई हैं

आप सरकार आने के बाद से पंजाब में नशा और धर्मांतरण दो बड़ी समस्याएं बन गई हैं और सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने मीडिया से बातचीत में साफ-साफ कहते हैं कि राज्य की दो ही बड़ी समस्याएं हैं- नशा और धर्मातंरण। मुझसे मिलने आने वाले पंजाब के ज्यादातर लोग इन्हीं का जिक्र करते हैं। नशे के खिलाफ अभियान पर कटारिया ने कहा- इसके लिए मिलकर प्रयास कर सकते हैं। नशा पंजाब की जड़ों में इस कदर फैल गया है कि तत्काल सफलता तो बहुत दूर है, लेकिन कोशिश शुरू करें तो सकारत्मक परिणाम आएंगे। मैं जब से पंजाब आया हूं, रोज क्राइम रिपोर्ट देखता हूं। इसमें नशे के कारोबार और धर्मांतरण के मामले खूब आ रहे हैं।
सीमावर्ती जिलों में बच्चों में नशे की प्रवृति ने झकझोर दिया
राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया बताते है कि मैं सीमावर्ती जिलों के दौरे पर गया, वहां विलेज कमेटी के लोगों से मिला। वहां महिलाएं खड़ी थीं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि गवर्नर साहब और कुछ कर सको तो करना। हमारे बच्चों को नशे से बचा लो। उनकी आंखों में जो करुणा और दर्द था, उसने मुझे झकझोर दिया। महिला कह रही थी, जवान बेटा तड़प रहा है। उसे नशा लाकर देना होता है। हमने इसके खिलाफ अभियान शुरू किया है। मैं खुद पैदल यात्रा में शामिल हुआ। लोगों का गजब रिस्पॉन्स मिला।
बिखर चुकी कांग्रेस पार्टी में नेता घुटन महसूस कर रहे हैं
कांग्रेस से बहुत से नेताओं को बीजेपी में ज्वाइन करने पर कटारिया कहते हैं कि कांग्रेस तो बिखर रही है। उनकी विचारधारा को लोग पसंद नहीं करते। अब उनके नेताओं की मजबूरी है। क्योंकि वो पार्टी से जुड़े हुए हैं। कांग्रेस में पहले कई अच्छे लोग भी रहे हैं। प्रणब मुखर्जी से अच्छा व्यक्ति कौन हो सकता है, लेकिन वो भी घुटन महसूस करते थे। उनके जीवन में मूल्य बहुत प्रमुख थे, लेकिन उसके बाद तो केवल तुष्टीकरण के आधार पर देश को कमजोर करते चले गए। इससे कांग्रेस कमजोर होती गई। जो अच्छे लोग हैं, वह सब वहां अपने आप को अच्छा नहीं समझते थे। कई लोग उस कारण से भी निकले। बाहर से अच्छे लोग लेने में दिक्कत नहीं है। लेकिन कैडर उतना मजबूत हो कि बाहर वालों को अपने हिसाब से ढालकर ट्रेंड कर सकें। कोई नुकसान नहीं होगा। बीजेपी नेता अपने परिश्रम और विचार के आधार पर चुनाव लड़ते हैं। उनको जनता पहले भी पसंद करती थी। आज भी पसंद करती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयालजी से लेकर अब पीएम मोदी तक हमारे दिग्गज नेताओं ने जिस समर्पण भाव से संगठन खड़ा किया। उसकी प्रतिष्ठा जनता के बीच में है।
धर्मांतरण के चलते पंजाब में आठ गुना से ज्यादा बढ़ चुके हैं ईसाई
पंजाब में जहां तक धर्मांतरण की बात है तो साल 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में सिखों की संख्या जहां 57.69 प्रतिशत थी तो हिंदुओं की आबादी 38.49 प्रतिशत थी वहीं पंजाब में ईसाइयों की आबादी करीब डेढ़ प्रतिशत ही थी। ऐसे में अपनी आबादी बढ़ाने के लिए ईसाइयों द्वारा गरीब सिखों और हिंदुओं को ईसाई धर्म में शामिल किया जा रहा है। पंजाब में धर्म परिवर्तन का असर यह है कि प्रदेश में ईसाइयों के चर्च की संख्या बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान से सटे बॉर्डर इलाकों में यह चर्च बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही ईसाई धर्म को बढ़ावा देने के लिए दीवारों पर संदेश भी लिखे जा रहे हैं। हालात यह हैं कि अब ईसाई धर्म को मानने वाले 12 फीसदी से ऊपर जा चुके हैं। पिछले दिनों धर्मांतरण के खिलाफ निहंग सिखों ने भी जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन इन सब के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। इस अवैध धर्म परिवर्तन के खिलाफ सरकार कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है। अगर इसकी तह में जाएं तो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सनातन धर्म से नफरत की बात सामने आती है। केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रह चुके हैं और इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है।
पंजाब में मस्जिदें और चर्च बनना चिंता का विषयः  ज्ञानी हरप्रीत सिंह
अकाल तख्त की ओर से  ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा कि हमें धार्मिक रूप से कमजोर करने के लिए पंजाब की इस धरती पर बहुत जोर-शोर से ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा है। पंजाब में विभिन्न जगहों पर मस्जिदें और चर्च बन रहे हैं, जो हमारे लिए चिंता का विषय है। पंजाब के सिखों और हिंदुओं को गुमराह कर उन्हें ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है और यह सब सरकार की नाक के नीचे हो रहा है।
धर्म परिवर्तन के बारे में क्या कहता है संविधान
भारतीय संविधान के (अनुच्छेद 25-28) अनुसार कोई व्यक्ति अपनी पसंद से कोई भी धर्म चुन सकता है, और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति का धर्म जबरन या लालच देकर नहीं कराया जा सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए और 298 के अनुसार यह एक दंडनीय अपराध है। इसे लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कानून बने हैं। धर्म परिवर्तन करने के दो तरीके हैं। पहला कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए और दूसरा धार्मिक स्थल पर जाकर उनके निर्धारित शिष्टाचार का पालन करते हुए। अगर कोई अपना धर्म बदलना चाहता है तो उसे अपने ज़िले के कलेक्टर या किसी अन्य संबंधित अधिकारी को नोटिस देना होगा। नोटिस देने के 30 से 60 दिनों के अंदर धर्म परिवर्तन कराया जाएगा। इसके लिए आपको कोर्ट या किसी वकील से एक हलफनामा बनाना होगा और अपनी सारी जानकारी देनी होगी – जैसे आप किस धर्म में जा रहे हैं, नाम और पता आदि। धर्म बदलने के बाद धर्म गजट कार्यालय में अपना नया नाम और धर्म दर्ज कराना होता है।
लोगों को लुभाने के लिए मंच से चमत्कार के दावे, इसका लोग कर रहे विरोध
इस धर्मांतरण का सबसे ज्यादा विरोध इसके तरीकों को लेकर किया जा रहा है। ईसाई मिशनरी मंच पर खड़े होकर अपने अंदर ईसा मसीह की आत्मा आने की बात कहते हैं। वे तरह-तरह के स्वांग रचकर गरीब-अशिक्षित लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कहते हैं। वे चमत्कारिक तरीके से लंबे समय से बीमार चल रहे लोगों को ठीक करने का दावा करते हैं। वे उन बीमार लोगों का भी पल भर में इलाज करने का दावा करते हैं जिन बीमारियों का इलाज संभव नहीं है। मंच से कुछ लोग इस बात का भी दावा करते हैं कि उनकी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, उनकी बीमारी ठीक हो गई। इससे गरीब-अशिक्षित लोग प्रभावित होकर ईसाई धर्म की ओर मुड़ जाते हैं। इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाकर भी लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित किया जाता है। वे गरीबों को यह बताते हैं कि ईसाई धर्म अपनाने से वे अमेरिकी-यूरोपीय देशों के ईसाइयों की तरह धनवान बन जाएंगे। लेकिन यह संभव नहीं है और इसका कोई आधार नहीं है। यही कारण है कि सिख समुदाय की ओर से इन दावों को गैरकानूनी बताकर इनका विरोध किया जा रहा है।
पादरियों की संख्या 65 हजार से अधिक हो चुकी
साल 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में ईसाइयों की कुल जनसंख्या 3 लाख 48 हजार थी। लेकिन आज आलम यह है कि यहां पादरियों की संख्या 65,000 के करीब हो चुकी है। यही नहीं पंजाब में ईसाइयत के प्रचार का बेड़ा उठाए लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पंजाब में सिखों को ईसाई बनाने के तमाशे ने लाखों लोगों को चर्च तक पहुंचा दिया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालत यह है कि ईसाई मिशनरी यहां के सभी 23 जिलों में फैली हुई हैं। ये मिशनरियां माझा और दोआबा बेल्ट के अलावा मालवा में फिरोजपुर और फाजिल्का के सीमावर्ती इलाकों में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं।
पंजाब के सीमावर्ती इलाक़ों में तेजी से फैला ईसाई धर्म
चंडीगढ़ से अमृतसर और गुरदासपुर जाते हुए रास्ते में आपको जगह-जगह ईसाई पादरियों के पोस्टर और होर्डिंग दिखाई देंगे। पाकिस्तान से लगने वाले पंजाब के इलाक़ों में ईसाई धर्म का कितना प्रभाव है। इसका अंदाज़ा गांवों में बने चर्चों से लगाया जा सकता है। इनमें से अधिकांश नए चर्च निजी तौर पर प्रचार करने वाले पादरियों द्वारा स्थापित किए जा रहे हैं। कई जगहों पर ईसाई धर्म मानने वाले लोगों ने घरों में चर्च स्थापित कर लिए हैं। वह प्रचार के विभिन्न माध्यमों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ख़ूब प्रचार भी कर रहे हैं। भारत के 10 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून मौजूद हैं। यह कानून पहली बार 1967 में ओडिशा में बनाया गया था। उसके बाद इसे गुजरात, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में लागू किया गया। हरियाणा विधानसभा द्वारा भी धर्मांतरण विरोधी विधेयक पारित किया जा चुका है। इन सभी राज्यों में कानून का उल्लंघन करने पर सज़ा और जुर्माने की राशि अलग-अलग है।
ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित समुदाय के लोग नाम नहीं बदलते
पंजाब में ईसाई समुदाय की आबादी बहुत कम हैं। जानकारों का मानना है कि कम संख्या का एक कारण यह भी है कि बहुत से लोग धर्मांतरण के बाद अपना नाम नहीं बदलते हैं। इसके पीछे कारण है दलित समुदाय के लोगों को मिलने वाला आरक्षण है। सीमावर्ती इलाक़ों में जो धर्मांतरण हो रहा है उस में ज्यादातर लोग ग़रीब और दलित वर्ग से आते है। बहुत सारे दलित असल में ईसाई बन चुके है पर कागजों में दलित ही हैं क्योकि ईसाई समुदाय को कोई आरक्षण नहीं मिलता है। इसलिए बहुत सारे लोग असल में ईसाई घर्म को मानते हैं पर वो ना तो आपना नाम बदलते है और ना ही कोई चीज़ पहनते हैं जिससे ये पता लग सके कि ये लोग आपना धर्म बदल कर ईसाई धर्म अपना चुके है। पंजाब में ईसाई समुदाय की संख्या को देखा जाए तो पता चलता है कि जिन लोगों ने धर्मांतरण किया है उन में से अधिकांश दलित समुदाय के लोग हैं।
पंजाब के कई गांवों में ईसाई हुए बहुसंख्यक
पंजाब के हालात वैसे ही हो रहे हैं जैसे 1980 और 1990 के दशक में तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश के हुआ करते थे। गुरदासपुर के कई गांवों की छतों पर छोटे-छोटे चर्च बन गए हैं। पंजाब के सीमावर्ती इलाके में रहने वाले मजहबी सिख और वाल्मीकि हिंदू समुदायों के कई दलितों ने ईसाई धर्म अपना लिया है। यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट की मानें तो अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में 600-700 चर्च बन चुके हैं, इनमें से 70 फीसदी पिछले पांच वर्षों में ही बने हैं। पाकिस्तान बॉर्डर से लगभग 2 किलोमीटर पहले दुजोवाल गांव पड़ता है। इस गांव में लगभग 30 प्रतिशत लोग ईसाई हैं। गांव में दो गुरुद्वारे हैं और दो ही चर्च हैं।
मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरी के रास्ते पर चल रहे शिष्य केजरीवाल
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रहे हैं। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है। आम तौर पर माना जाता है कि शिष्य पर गुरु के उपदेशों का असर होता है। केजरीवाल पर भी उनके गुरु के उपदेश का असर दिखाई दे रहा हैे। वो उन्हीं के बताये रास्ते पर चल रहे हैं। जिस तरह मदर टेरेसा ने गरीबों की मुफ्त सेवा के बहाने दलितों और आदिवासियो के बीच पैठ बनाई। उसके बाद ईसाई मिशनरियों ने चमत्कारिक मुफ्त इलाज, मुफ्त शिक्षा और पैसे का लालच देकर और ऊंच-नीच, जात-पात का एहसास दिलाकर गरीब दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण कराया। उसी तरह केजरीवाल भी मुफ्त रेवड़ी कल्चर के जरिए गरीब दलितों, आदिवासियों, सिखों में पैठ बनाकर उनके बौद्ध और ईसाई धर्म में धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं।
मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने के कार्यक्रम में शामिल हुए थे केजरीवाल
गौरतलब है कि 4 सितंबर, 2016 को वेटिकन सिटी में मदर टेरेसा को पोप फ्रांसिस की मजूदगी में संत की उपाधि दी गई। उपाधि देने के लिए आयजित इस कार्यक्रम में दिल्ली के तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल भी शामिल हुए थे। अरविंद केजरीवाल मदर टेरेसा को बहुत मानते थे। इसी समय उन्होंने मदर टेरेसा को याद करते हुए एक लेख आउटलुक पत्रिका में लिखा था। लेख में केजरीवाल ने 1992 में मदर टेरेसा से मिलने और मिशनरीज ऑफ चैरिटी के कालिघाट आश्रम में बिताये गए पलों का जिक्र किया था। उस लेख का कुछ अंश यहां दिया जा रहा है…
मिशनरीज ऑफ चैरिटी और केजरीवाल का संस्मरण
“टाटा स्टील से इस्तीफा दे दिया और मदर टेरेसा से मिलने कोलकाता चला गया। ये सुबह का समय था और वहां लंबी कतारें लगी हुई थीं। वह सभी लोगों से कुछ सेकेंड के लिए मिल रही थी। जैसे ही मेरा नंबर आया उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और पूछा तुम क्या चाहते हो? मैंने मदर से कहा कि मां, मैं आपके साथ काम करना चाहता हूं।
उन्होंने मुझसे कलिघाट आश्रम जाने की बात कही। ये मिशनरीज ऑफ चैरिटी के अहम केंद्रों में से एक था। उन्होंने मुझसे वहां जाकर काम करने के लिए कहा। उस समय कोलकाता ऐसा स्थान था जहां दोनों तरह के लोग मिल जाते थे, जिसमें कुछ तो बहुत गरीब थे, वहीं कुछ बहुत अमीर। फिलहाल वहां अभी के हालात मुझे नहीं पता हैं। मुझे काम दिया गया कि मैं शहर में घूमकर गरीब, असहाय, बेबस लोगों को कलिघाट आश्रम ले जाऊं और उनकी सेवा करूं, मैंने ऐसा ही किया।
एक बार मैंने मदर से पूछा कि आप जरूरतमंद लोगों को सेवा मुहैया कराती हैं, आखिर आप उन्हें ठीक होने के बाद आत्मनिर्भर बनाने पर विचार क्यों नहीं करती हैं? इस पर उन्होंने कहा कि ये काम सरकार और दूसरे एनजीओ का है। उनका काम जरूरतमंदों की सेवा करना है। ये पूरा अनुभव मेरे लिए आध्यात्मिक था। मैं वहां कुछ महीने तक रहा।
जब मैं नागपुर में नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्स की ट्रेनिंग के लिए पहुंचा, जहां आईआरएस ट्रेनियों को भेजा जाता है, वहां मुझे मदर टेरेसा का आश्रम एकेडमी के बिल्कुल पास ही मिल गया। एकेडमी में ही मेरी सुनीता (पत्नी) से मुलाकात हुई। हम अकसर सप्ताह के आखिर में आश्रम जाते थे। नागपुर का आश्रम बिल्कुल अलग था। यहां कलिघाट आश्रम की तरह वॉलंटियर नहीं बल्कि नन्स होती थी जो सेवा कार्य करती थी। इसलिए यहां हमारे लिए ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं था।”
सेवा की आड़ में दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण
दरअसल मदर टरेसा ने गरीबों की सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियों के लिए भारत में एक मैदान तैयार किया, जिसमें वो धर्मांतरण का खेल बखूबी खेल सके। मदर टेरेसा ने तथाकथित नि:स्वार्थ सेवाभाव से भारतीय जनमानस में एक दीन-दुखियों के उद्धारक के रूप में अपनी छवि बनाई, उसका फायदा आगे चलकर ईसाई मिशनरियों ने भी उठाया। पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित और खुद को प्रगतिशील बताने वाले वामपंथियों, सेक्युलर और लिबरल गैंग ने मदर टरेसा का खूब महिमामंडन किया। उन्होंने मदर टेरेसा को गरीबों का मसीहा बताकर जनता के सामने पेश किया। लेकिन मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरियों का मकसद सेवा की आड़ में दलितों और आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराना था।

तमिलनाडु : विधानसभा में संविधान और राष्ट्रगान का अपमान: राज्यपाल ने बिना संबोधन किया वॉकआउट, स्टालिन सरकार की हो रही किरकिरी

आज जॉर्ज सोरोस की कठपुतली बना विपक्ष देश के राष्ट्रगान तक का अपमान करने पर उतर आया है। क्या ऐसे विपक्ष से देश की एकता और अखंडता की कल्पना की जा सकती है? तमिलनाडु मुख्यमंत्री देश को बताएं कि क्या राज्य का गीत राष्ट्रगान से अधिक महत्वपूर्ण है? जब राष्ट्र ही नहीं होगा राज्य कहाँ से होगा? क्या ऐसी सरकार का सत्ता में बने रहने का अधिकार है? आखिर देश विरोधी ताकतों की कब तक कठपुतली बन अराजकता का माहौल बनाया जाता रहेगा?          
तमिलनाडु विधानसभा में एक बार फिर राष्ट्रगान का अपमान किया गया है। राष्ट्रगान के अपमान से नाराज तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि अभिभाषण दिए बिना सदन से वॉकआउट कर गए। आज, 6 जनवरी को तमिलनाडु विधानसभा के इस साल के पहले सत्र की शुरुआत हुई। लेकिन परंपरा के अनुसार सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से ना कर राज्य गीत ‘तमिल थाई वाजथु’ के गायन से हुआ। राज्यपाल ने सदन को उसके संवैधानिक कर्तव्य की याद दिलाते हुए राष्ट्रगान की बात कही, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। इससे नाराज राज्यपाल बिना अभिभाषण दिए सदन से चले गए।

राजभवन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि आज तमिलनाडु विधानसभा में एक बार फिर भारत के संविधान और राष्ट्रगान का अपमान किया गया। राष्ट्रगान का सम्मान करना हमारे संविधान में निहित पहले मौलिक कर्तव्य में से एक है। राज्यपाल के अभिभाषण के आरंभ और अंत में इसे सभी राज्य विधानसभाओं में गाया जाता है। आज सदन में राज्यपाल के आगमन पर केवल तमिल थाई वाज़्थु गाया गया। राज्यपाल ने सदन को सम्मानपूर्वक उसके संवैधानिक कर्तव्य की याद दिलाई और स्पीकर के साथ सदन के नेता मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से जोरदार अपील की, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया। संविधान और राष्ट्रगान के प्रति इस तरह के निर्लज्ज अनादर के कारण राज्यपाल गहरी पीड़ा में सदन से चले गए।

तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान के अपमान का मामला सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है। लोग राष्ट्रगान ना गाने पर हैरानी जता रहे हैं। इससे स्टालिन सरकार की किरकिरी हो रही है।

पश्चिम बंगाल : पहली बार किसी गर्वनर को मुख्यमंत्री के खिलाफ करना पड़ा मानहानि का केस; संविधान में गंभीर कमियां, देखिए वीडियो


पिछले कुछ समय से संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने सफेदपोशी बदमाशी करते संविधान का खुलेआम उलंघन और अपने से उच्च पद से बैठे संवैधानिक व्यक्तिओं का मजाक बनाना अपना नैतिक अधिकार बना रखा है। शायद यही कारण है कि देश में अराजकता पनप रही है। बंगाल में जब से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी है, हिन्दुओं पर अत्याचार बंद होने का नाम नहीं ले रहे। उधर दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जेल में होते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहा, क्योकि यहाँ संविधान में कुछ नहीं लिखा। हैदराबाद से असदुद्दीन ओवैसी सांसद की शपथ लेते ही संसद में 'जय फिलिस्तीन' का नारा लगा देता है। क्या इसका मुख्य कारण हमारा वर्तमान संविधान है? 
जनता को पागल बनाकर सत्ता में बैठे और वर्तमान विपक्ष ये अराजक तत्व भारत विरोधी विदेशियों के मात्र एक कठपुतली बने हुए हैं। 2024 चुनावों में सोशल मीडिया पर जितने भी गंभीर चैनलों के अलावा कुछेक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों पर स्पष्ट बताया जा रहा था कि मोदी सरकार को हटाने अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। जनता जो इस बहकावे में आये कि 'मोदी आ गया तो संविधान बदल दिया जायेगा' संविधान में जिन कमियों का फायदा लेकर छद्दम सेक्युलरिस्ट्स हिन्दुओं पर निरंतर अत्याचार कर रहे हैं। 'डरपोक मुसलमान' इस गंभीरता को समझ एकजुट होकर बीजेपी को हराने के लिए वोट कर रहा है, लेकिन हिन्दू बुद्धिजीवी खामोश, हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं खामोश हैं क्यों? हिन्दू आरक्षण और जातपात में रो रहा है। वैसे चर्चा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस सन्दर्भ में याचिका स्वीकार कर ली है।     
संविधान को क्यों बदलाव होने चाहिए पर Sattology का यह यह वीडियो जरूर सुनना चाहिए। जिसमें आतंकवादियों के लिए आधी रात को कोर्ट लगाने वाले जजों से लेकर राहुल गाँधी द्वारा 'लाल किताब'(संविधान) को लेकर घूमने पर कार्यवाही करने की बात कही गयी है। संविधान की वह गंभीर चुनातियों से जनता बेखबर है। उसी का लाभ उठाकर छद्दम सेक्युलरिस्ट्स अपना खेल खेल रहे हैं। देखिए वीडियो:-

 
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जैसे संवैधानिक मर्यादाओं का पालन न करने की कसम ही खा रखी है। उनकी सरकार में ऐसा कई बार हुआ है कि संवैधानिक नैतिकता को ताक पर रख दिया गया है। एक बार फिर मुख्यमंत्री बनर्जी का वैसा ही हदें पार करने वाला रवैया सामने आया है। सीएम के इसी नकारात्मक आचरण के चलते ही देश के इतिहास में पहली बार किसी राज्यपाल को मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा है। ममता बनर्जी की बेसिर-पैर की टिप्पणी से आहत पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने कलकत्ता हाईकोर्ट में सीएम और टीएमसी नेताओं के खिलाफ मानहानि का केस किया है। यह शायद पहला मौका है जब किसी राज्यपाल को अपने ही राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा हो। लेकिन ममता बनर्जी के लिए संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने का यह पहला मौका नहीं है।

ममता का बेतुका बयान- महिलाएं राजभवन जाने से डरती हैं
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक दिन पहले ही बगैर किसी तथ्य और सबूत के यह बयान दे डाला कि राजभवन में असुरक्षा के कारण महिलाएं वहां जाने से डरती हैं। दरअसल, राज्य सचिवालय में एक प्रशासनिक बैठक के दौरान बनर्जी ने गुरुवार को दावा किया कि “महिलाओं ने उन्हें बताया है कि वे राजभवन में जाने से घबराती हैं।” ऐसा पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ऐसी टिप्पणी कर रही हों। इससे पहले भी बंगाल की सीएम ने 11 मई को हावड़ा में एक रैली में कहा था कि राज्यपाल आनंद बोस के बारे में अभी तक सब कुछ सामने नहीं आया है।

केंद्रीय मंत्री मेघवाल से मुलाकात के बाद मानहानि के केस का लिया फैसला
ममता बनर्जी के पब्लिकली दिए गए बयान को राज्यपाल ने गंभीरता से लिया और देश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि गवर्नर ने मानहानि केस मुख्यमंत्री के खिलाफ दायर करने का मन बनाया। राजभवन ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा कि राज्यपाल बोस ने दिल्ली में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल से मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ केस करने का फैसला लिया है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने सीएम ममता बनर्जी और टीएमसी के कुछ नेताओं के विरुद्ध कलकत्ता हाई कोर्ट में मानहानि का केस दायर किया है। राजभवन ने इससे पहले बनर्जी की टिप्पणियों की आलोचना सोशल मीडिया के जरिए की थी। इसमें कहा गया कि जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे “गलत और बदनामी वाली धारणा” न बनाएं। राज्यपाल ने एक्स पर कहा, ‘ये मुझे बदनाम करने की साजिश है। मेरे ऊपर बेबुनियाद आरोप लगाए गए हैं। सत्य की जीत होगी। मैं भ्रष्टाचार-हिंसा के खिलाफ लड़ाई नहीं रोक सकता।’

टीएमसी की नवनिर्वाचित दो विधायकों के जिद से मामले ने तूल पकड़ा
दरअसल, मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच मतभेद पहले भी रहे हैं। लेकिऩ अब इस मामले को तूल टीएमसी को दो नवनिर्वाचित विधायकों के चलते मिला। तृणमूल कांग्रेस की विधायक सायंतिका बनर्जी और रेयात हुसैन सरकार ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा परिसर में डॉ. बीआर अंबेडकर की प्रतिमा के सामने धरना दिया। एक दिन पहले शपथ ग्रहण समारोह के लिए स्थल को लेकर उन्होंने अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया। विधायकों ने कहा कि राज्यपाल को विधानसभा में आकर हमारा शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करना चाहिए या यह अधिकार अध्यक्ष को दे देना चाहिए। हम आपके (राज्यपाल) जैसे मनोनीत पद के विपरीत निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं।”

स्पीकर बिमान बनर्जी ने उपराष्ट्रपति से की हस्तक्षेप करने की मांग
पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने दो नवनिर्वाचित टीएमसी विधायकों के शपथ ग्रहण समारोह को लेकर गतिरोध को सुलझाने के लिए उपाध्यक्ष जगदीप धनखड़ से हस्तक्षेप की मांग की है। दो नवनिर्वाचित टीएमसी विधायकों के शपथ ग्रहण समारोह के स्थल को लेकर विवाद गुरुवार को तब और बढ़ गया जब बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर गतिरोध को सुलझाने में मदद मांगी, वहीं विधायकों ने राज्यपाल सी वी आनंद बोस के निर्देशानुसार राजभवन में शपथ लेने से इनकार कर दिया और विधानसभा परिसर में धरना दिया।

गवर्नर की प्रधान सचिव नंदिनी के मसले पर भी हुआ था ममता से विवाद
ममता बनर्जी के संवैधानिक नैतिकता को ताक पर रखने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी उनपर ऐसे कई आरोप लग चुके हैं। कुछ समय पहले राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने सीएम बनर्जी को भेजे एक पत्र में आरोप लगाया था कि पद से हटाए जाने के बावजूद उनकी प्रधान सचिव नंदिनी चक्रवर्ती कार्यालय आ रही हैं, ऐसे में राज्य सरकार को संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। बोस ने पत्र में दावा किया कि “चक्रवर्ती ने झूठी खबर फैलाई थी कि राज्यपाल सीबीआई और अन्य एजेंसियों के अधिकारियों को अपना सलाहकार नियुक्त करके राजभवन को राज्य के सचिवालाय के “समानांतर” बनाने का प्रयास कर रहे हैं। पत्र में कहा गया है कि राज्य सरकार को उनकी “गंभीर गलतियों ” की जांच करानी चाहिए।” काबिले गौर है कि पश्चिम बंगाल कैडर की वर्ष 1994 बैच की IAS अधिकारी चक्रवर्ती को राज्यपाल ने 12 फरवरी को अपनी प्रधान सचिव के पद से हटा दिया था, लेकिन वह फिर भी कार्यालय आती रहीं।

ममता बनर्जी ने संवैधानिक मर्यादाओं और सहकारी संघवाद की हत्या की- नड्डा
इससे पहले भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने भी आरोप लगाया था कि चक्रवात ‘यास’ से हुए नुकसान की समीक्षा के लिए पश्चिम बंगाल में हुई प्रधानमंत्री मोदी की बैठक से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नदारद रहीं और ऐसा करके उन्होंने ‘‘संवैधानिक मर्यादाओं और सहकारी संघवाद की हत्या’’की है। तब नड्डा ने सिलसिलेवार ट्वीट कर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी सहकारी संघवाद के सिद्धांतों को ‘‘बहुत पवित्र’’ मानते हुए उसका पालन करते हैं और लोगों को राहत देने के लिए दलगत भावना को पीछे छोड़ सभी मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर सक्रियता से काम कर रहे हैं, लेकिन अप्रत्याशित तरीके से ममता बनर्जी की क्षुद्र राजनीति ने एक बार फिर बंगाल के लोगों को परेशान किया है। उन्होंने लिखा, ‘‘जब प्रधानमंत्री मोदी चक्रवात यास के मद्देनजर पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मजबूती से खड़े हैं तो उचित होता कि ममता बनर्जी लोगों के कल्याण के लिए अपने अहम को विसर्जित कर देतीं।

राज्यपाल ने केंद्र को रिपोर्ट सौंपी, संदेशखाली में हो सकती है एनआईए जांच
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखाली में महिलाओं पर अत्याचार के मुद्दे पर भी सीएम और राज्यपाल के बीच विवाद की स्थिति बनी थी। यहां कई महिलाओं ने स्थानीय तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर नेता शाहजहां शेख और उनके समर्थकों पर जमीन हड़पने और यौन उत्पीड़न करने के आरोप लगाए हैं। राज्य की ममता बनर्जी सरकार पर विपक्षी बीजेपी सवाल उठा रही है। दरअसल बीजेपी नेताओं ने इन महिला के आरोपों की उच्चस्तरीय जांच की। इस रिपोर्ट राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग व अन्य एजेंसियों द्वारा केंद्र सरकार को मुहैया करवाई गई।  उत्पीड़न और जबरन जमीन कब्जाने के जिन लोगों पर आरोप लगाए जा रहे हैं, उनमें से ज्यादातर बांग्लादेश सीमा के पास रहते हैं। इस बाबत पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने भी केंद्र सरकार को अपनी विस्तृत रिपोर्ट दी।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने संदेशखाली की स्थिति भयावह बताया था
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने संदेशखाली में महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा की जांच के लिए तब वहां का दौरा किया था। संदेशखाली हिंसा को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी का इस्तीफा मांगा। संदेशखाली के हालात का जायजा लेने पहुंचीं राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने पश्चिम बंगाल सरकार पर वहां महिलाओं की आवाज को दबाने का आरोप लगाते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की। रेखा शर्मा ने कहा, ‘इलाके की महिलाओं से बात करने के बाद मुझे पता चला कि संदेशखाली में स्थिति कितनी भयावह है। कई महिलाओं ने अपनी आपबीती सुनाई। उनमें से एक ने कहा कि यहां टीएमसी पार्टी कार्यालय के अंदर उसके साथ बलात्कार किया गया था। हम अपनी रिपोर्ट में इसका भी उल्लेख करेंगे। हमारी मांग है कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए।’ 

कर्नाटक : कांग्रेसी सरकार द्वारा हिंदू मंदिरों की कमाई पर टैक्स लगाने वाले बिल को राज्यपाल ने किया नामंजूर: पूछा – दूसरे मजहबों पर क्यों नहीं?

      राज्यपाल थावरचंद गहलोत (बाएँ) और मुख्यमंत्री सिद्दारमैया (दाएँ) (साभार :News18 & The South First)
कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मंदिरों की कमाई पर टैक्स लगाने वाले कानून पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है। राज्यपाल ने पूछा है कि सिर्फ मंदिरों पर ही टैक्स क्यों लगाया जा रहा है, अन्य मजहबी स्थलों को ऐसे कानूनों से बाहर क्यों रखा गया है? यह कानून कर्नाटक की कांग्रेस सरकार लाई है और इसे हाल ही में राज्य की विधायिका से पास किया गया था।

रिपब्लिक की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्यपाल थावरचंद गहलोत को यह बिल उनकी स्वीकृति के लिए भेजा गया था। उन्होंने इसे मंजूरी देने से मना कर दिया। उन्होंने इस कानून को एक धर्म के साथ पक्षपात करने वाला बताया है। राज्यपाल ने पूछा कि सिर्फ मंदिरों पर ही टैक्स क्यों लगाया जा रहा है? राज्यपाल ने कहा है कि नए कानून के अंतर्गत सभी धार्मिक स्थलों पर टैक्स लगाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या इस कानून के अंतर्गत अन्य धार्मिक स्थल भी टैक्स के दायरे में लाए जाएँगे?

राज्य की कांग्रेस सरकार फरवरी माह में राज्य के हिन्दू मंदिरों की कमाई पर टैक्स लगाने वाला यह कानून लाई थी। इस कानून को ‘कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक 2024’ नाम दिया गया था।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार इस विधेयक के जरिए वार्षिक 1 करोड़ रूपए से अधिक दान पाने वाले मंदिरों से उनकी कमाई का 10% जबकि 10 लाख से 1 करोड़ रूपए तक दान पाने वाले मंदिरों से 5% टैक्स वसूलना चाहती थी।

इस कानून को कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने फरवरी, 2024 में राज्य विधानसभा में पास करवा लिया था। हालाँकि, कर्नाटक की विधान परिषद में इस विधेयक को भाजपा और जेडीएस के गठबंधन ने गिरा दिया था और पास नहीं होने दिया था।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने 1 मार्च, 2024 को कर्नाटक विधान परिषद में यह विधेयक दुबारा पेश करके पास करवा लिया था। इस दिन भाजपा और जेडीएस के सदस्यों ने सदन से वाकआउट किया था। इस विधेयक के दोनों सदनों से पास होने के बाद इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया था।

अब इसे राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मंजूर करने से मना कर दिया है और साथ ही सरकार से प्रश्न भी पूछे हैं। इससे पहले विधेयक के लाए जाने पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा और जेडीएस ने भी प्रश्न उठाए थे कि कांग्रेस सरकार मंदिरों से कमाई क्यों करना चाहती है?