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‘मैं नहीं मानती ये गंदा धर्म’: सनातन विरोधी टिप्पणी के लिए ममता बनर्जी पर 1 साल बाद हुई FIR, TMC नेता बोले- हम भी बयान के खिलाफ थे

    
क्या ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस इतिहास बनने के कगार पर पहुँच गयी है? जिस कुर्सी की खातिर "श्रीराम" नाम से, सनातन से चिढ़ती थी, वही इनको और इनकी पार्टी को इतिहास बना रहा है। कल जिस मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने सनातन और हिन्दुओं पर हमले करवाए आज वही मुस्लिम समाज भी इन्हे नहीं पूछ रहा। अगर वर्तमान मुख्यमंत्री सुभेंदु इसी तरह काम करते रहे बंगाल में कोई ममता या INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाला । कई साल हिन्दुओं ने हिन्दू विरोधी सरकारों के अत्याचार सहे हैं। चुनावों में उन्हें वोट तक नहीं डालने दिया जाता था जिस वजह से हिन्दू विरोधी सरकारें सत्ता में आती रहती थीं। फिलिस्तीन में इजराइल के हमलों पर तो INDI गठबंधन के हर नेता की जुबान खुलती थी लेकिन बंगाल में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों पर बोलने पर सबको सांप सूंघ जाता था। 




इफ्तार पार्टी हो या फिर नमाज के दौरान मुस्लिम महिलाओं की तरह ममता हिजाब धारण करने पर इनके हिन्दू ब्राह्मण होने पर सन्देह होता है, जिसका खुलासा कोई खोजी पत्रकार या ममता की ही पार्टी कर सकती है। 

श्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सिलीगुड़ी साइबर थाने में एक FIR दर्ज की गई है। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2025 में कोलकाता में आयोजित ईद कार्यक्रम के दौरान सनातन धर्म को ‘गंदा धर्म’ बताया था।

एफआईआर दर्ज होने के बाद से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वीडियो में उन्हें विवादित टिप्पणी करते सुन सकते हैं। वो कहती सुनाई पड़ रही हैं- “हम जानबूझकर एक गंदा धर्म, जिसे जुमला पार्टी ने बनाया, हम उसे नहीं मानते हैं।”

यह शिकायत वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इस बयान से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कुछ नेता पहले भी हिंदू धर्म को लेकर विवादित बयान देते रहे हैं।

रिंकी चटर्जी सिंह ने दावा किया कि उन्होंने 2025 में भी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई और उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।

वहीं, तृणमूल कॉन्ग्रेस के दार्जिलिंग यूनिट के महासचिव और वकील अत्री शर्मा ने भी बयान को अनुचित बताया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। 

‘इस्तीफा नहीं दूँगी, अब मैं आजाद परिंदा हूँ’, मेरे पेट पर लात मारी : ममता बनर्जी ; लेकिन आरोपों का एक भी सबूत पेश नहीं किया

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने 15 साल से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी को कुर्सी से उतार दिया है। हार के बाद पहली बार मीडिया के सामने आईं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बेहद आक्रामक नजर आईं। उन्होंने न केवल चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर धांधली के आरोप लगाए, बल्कि खुद के साथ मारपीट होने का भी सनसनीखेज दावा किया। हालाँकि, इन गंभीर आरोपों के समर्थन में उन्होंने कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं किया।

‘मेरे पेट और पीठ पर मारी लात’

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि जब वे मतगणना केंद्र के अंदर गईं, तो उनके साथ बदसलूकी की गई। उन्होंने दावा किया, “उन्होंने मेरे पेट में लात मारी, मुझे पीछे से पीटा और मेरे साथ हाथापाई की। उस समय वहाँ के CCTV कैमरे बंद कर दिए गए थे।” ममता का आरोप है कि करीब 200 बाहरी गुंडों और CRPF के जवानों ने मिलकर उनके काउंटिंग एजेंट्स को डराकर बाहर निकाल दिया। उनके मुताबिक, जब वे 30 हजार वोटों से आगे चल रही थीं, तब ‘खेल’ करके उन्हें हराया गया।

चुनाव आयोग को बताया ‘विलेन’

ममता ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें लोकतंत्र का ‘विलेन’ करार दिया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच ‘सेटिंग’ थी। ममता ने ईवीएम (EVM) पर भी सवाल उठाए और कहा कि मतदान के कई दिनों बाद भी मशीनों में 80-90% चार्ज कैसे रह सकता है? उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले लाखों वोटरों के नाम जानबूझकर वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे।

‘इस्तीफा नहीं दूँगी, अब मैं आजाद परिंदा हूँ’

हार के बावजूद ममता बनर्जी के तेवर नरम नहीं पड़े हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि वे राजनीति से पीछे नहीं हटेंगी और इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा, “अब मेरे पास कोई कुर्सी नहीं है, मैं एक आम नागरिक और एक आजाद परिंदा हूँ। अब मैं पूरे देश में घूमकर ‘इंडिया गठबंधन’ (INDI Alliance) को मजबूत करूँगी।”
ममता बनर्जी ने बताया कि राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं ने उन्हें फोन कर अपना समर्थन दिया है।


शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को दी पटखनी, भबानीपुर में 15000+ वोटों से CM को हराया: बोले- यह हिंदुत्व की जीत; हिन्दुओं सेकुलरिज्म के नशे से निकलो


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े उलटफेर के तहत तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके गढ़ भबानीपुर में करारी हार का सामना करना पड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,105 वोटों से हरा दिया है।

मतगणना के अंतिम राउंड के बाद सामने आए नतीजों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी को कुल 73,917 वोट मिले जबकि ममता बनर्जी 58,812 वोटों के साथ पीछे रह गईं। यह हार न सिर्फ चुनावी दृष्टि से बड़ी मानी जा रही है बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका खास महत्व है।

शुभेंदु ने कहा, “ममता बनर्जी को हराना बेहद जरूरी था। यह ममता बनर्जी की राजनीति से रिटायरमेंट की शुरुआत है। इस बार भी वह 15,000 से ज्यादा वोटों से हार गईं। मुसलमानों ने खुलकर उन्हें वोट दिया। वार्ड नंबर 77 में जितने भी मुसलमान वोट डालने आए, उन्होंने ममता को ही वोट दिया। वहीं हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समाज ने मुझे आशीर्वाद दिया और जिताया। यह जीत हिंदुत्व की जीत है।”

इस जीत को हिन्दुत्व की जीत कहने का कारण भी है, क्योकि हिन्दू और हिन्दू महिलाओं पैट हुए दर्दनाक अत्याचारों ने ममता को हारा है। जबसे ममता मुख्यमंत्री बनी तभी से घुसपैठिए और मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं पर अत्याचार होने शुरू हो गए। इतने अत्याचारों के बावजूद 15 सालों तक ममता का सत्ता बने रहने की वजह थी बोगस वोटिंग। जैसाकि वोटिंग के दौरान कई मतदाताओं ने साफ कहा कि पहली बार वोट डालने का मौका मिला है पहले तो घर से निकले बगैर ही हमारा वोट पड़ जाता था। और जैसे ही मौका मिला अत्याचारों का बदला ले लिया। 

लेकिन बंगाल से बाहर हिन्दुओं को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। मुसलमानों ने बीजेपी को हराने एकजुट होकर ममता और इसकी पार्टी को वोट दिया। लेकिन बेशर्म हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में रहता है। जब मुसलमान एकजुट होकर बीजेपी को हराने के लिए वोट कर सकता है तो हिन्दू क्यों नहीं एकजुट होकर बीजेपी को वोट देता? चुनावों में मुसलमान अपनी जातिगत लड़ाई को छोड़ एकजुट होकर वोट कर सकता है हिन्दुओं तुम क्यों जातिगत सियासत में बंटते हो?  

इस जीत के साथ शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। वह पहले ऐसे भाजपा नेता बन गए हैं जिन्होंने ममता बनर्जी को दो बार चुनाव में हराया है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से भी ममता बनर्जी को हराया था।

नाम महुआ मोइत्रा और सयानी घोष, दोनों TMC की फायरब्रांड नेता हैं।
लेकिन इस चुनाव में फायरब्रांड राजनीति ने TMC को ताकत देने के बजाय नुकसान पहुंचाया।
बेवजह का aggression, तीखी भाषा, personal attacks और फालतू की टिप्पणी इन सबने मिलकर TMC की नैया डुबोने का काम किया।
योगी आदित्यनाथ जैसे नेता , जिनसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है , उन पर हल्की भाषा में टिप्पणी करना TMC के लिए उल्टा पड़ गया।
राजनीति में विरोध जरूरी है , लेकिन विरोध के नाम पर अपमान जनता हमेशा याद रखती है।
चुनाव सिर्फ भाषणों से नहीं जीते जाते। चुनाव जनता की भावना , भाषा की मर्यादा, संगठन की ताकत और जमीन पर काम से जीते जाते हैं।
TMC के कई नेताओं ने इस चुनाव में मुद्दों से ज्यादा अहंकार दिखाया। जनता से संवाद कम हुआ , विरोधियों पर व्यक्तिगत हमला ज्यादा हुआ। और जब भाषा का संतुलन बिगड़ता है, तो जनता बैलेट से जवाब देती है।
नतीजा सामने है ....
TMC बुरी तरह चुनाव हार गई। BJP प्रचंड बहुमत के साथ बंगाल में इतिहास रच गई। और ममता बनर्जी अपनी खुद की सीट तक नहीं बचा पाईं।
इस चुनाव ने साफ संदेश दिया है:

राजनीति में आग उगलना आसान है, लेकिन जनता के गुस्से की आग में पूरी पार्टी जल सकती है।

‘मुझे झाँ* फर्क नहीं पड़ता’: ममता बनर्जी ने मोदी के लिए किया अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल; और कितनी गन्दी गालियां सुनेगा मोदी; मीडिया खामोश


नरेंद्र मोदी भारत का पहला ऐसा प्रधानमंत्री है जिसे सबसे ज्यादा गालियां पड़ी हैं। फिर भी मस्त हाथी की तरह अपने काम में लगा हुआ है। हद तो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुंडों द्वारा दी जाने वाली गाली दे दी। लेकिन सारा मीडिया इस गुण्डई गाली पर खामोश है। अगर यही गाली किसी बीजेपी वाले ने दे दी होती सारा मीडिया breaking news चलाकर उछाल रहा होता।   

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस(TMC) की प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद अभद्र और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है।

अरामबाग टीवी के पत्रकार शफीकुल इस्लाम द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में ममता बनर्जी कहती सुनाई दीं, “वह (नरेंद्र मोदी) दूरदर्शन का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और राजनीतिक प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने महिला आरक्षण बिल के बारे में कुछ कहा था। मैं उनके भाषण नहीं सुनती।”

इसके बाद उन्होंने हैरान करते हुए कहा, “अमार ब** लागे ना”। जानकारी के लिए बता दें कि ‘ब**’ एक बेहद आपत्तिजनक बंगाली शब्द है जिसका इस्तेमाल जननांगों के बाल के रूप में किया जाता है। जिस तरह हिंदी में ‘मुझे झाँ** फर्क नहीं पड़ता’ का इस्तेमाल होता है, उसी तरह बंगाली में इसका इस्तेमाल किया गया है। ममता बनर्जी के इस बयान पर लोगों में आक्रोश है और उन पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाषा के स्तर को और नीचे गिराने के आरोप लग रहे हैं।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया हो। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी ममता बनर्जी ने ‘B#ra’ जैसे सेक्सिस्ट शब्द का इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा था। इसका इस्तेमाल पुरुषों के जननांग के लिए किया जाता है।

उस समय भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने कहा था, “आज के समय में ममता बनर्जी जितनी घृणित और आपत्तिजनक कोई भी नेता नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल के लोग अब उनसे तंग आ चुके हैं।”

चोटिल होने, मिडिल ईस्ट वॉर, फ्यूल संकट और ‘लॉकडाउन’ की राजनीति: डर फैलाकर वोट बटोरने की जुगत में ममता बनर्जी

                                                 ममता बनर्जी (फोटो साभार: AI ChatGPT)
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने की खबरों ने वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, स्वाभाविक रूप से सतर्क हो गए हैं।

इसी बीच देश के भीतर एक अलग ही बहस छिड़ गई कि क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है? क्योंकि ममता बनर्जी ने लॉकडाउन लगने की अफवाहों को फैलाना का काम जोरदार तरीके से किया। हालाँकि केंद्र सरकार ने उनकी इन हरकतो के सफल होने से पहले ही जनता तक संदेश पहुँचा दिया है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें।

ममता बनर्जी का लॉकडाउन बयान: आशंका या सियासत?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार फ्यूल संकट के बहाने देश में लॉकडाउन लगा सकती है।

ममता बनर्जी ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में चुनाव प्रचार करते हुए कहा, “वे (केंद्र सरकार) लॉकडाउन लगा सकते हैं। लोग घरों में बंद रहेंगे। 2021 में लॉकडाउन के समय मैंने लड़ाई लड़ी थी, अब भी लड़ सकती हूँ।” उन्होंने LPG सिलेंडर की बुकिंग 25-35 दिन बाद मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ गए। पेट्रोल की कीमत बढ़ गई। क्या केंद्र सरकार फिर लॉकडाउन की तैयारी कर रही है?

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने खारिज किए अफवाह

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “लॉकडाउन की अफवाहें पूरी तरह झूठी हैं। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। हम ऊर्जा, सप्लाई चेन और जरूरी चीजों पर नजर रख रहे हैं। लोग शांत रहें, जिम्मेदार रहें।”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, “मैं लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूँ कि कोई लॉकडाउन नहीं होगा। कुछ नेता बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। कोविड जैसा लॉकडाउन कभी नहीं होगा।”

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने खुद पैनिक न करने को कहा है। जमाखोरी पर चेतावनी दी गई है। राज्य सरकारें होर्डिंग न करें। पूरी स्थिति केंद्र के नियंत्रण में है।

तो फिर डर क्यों फैला रही हैं ममता बनर्जी?

राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में ममता डर फैला रही हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ईंधन संकट का मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा साबित हो रहा है। वे लोगों में डर पैदा करके कह रही हैं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन लगा रही है, LPG 25 दिन बाद मिलेगा, खाना कैसे पकाएँगे, ट्रांसपोर्ट कैसे चलेगा।

लेकिन असल में केंद्र सरकार पहले से ही एक्शन ले रही है, जिसमें एक्साइज ड्यूटी कम की, एक्सपोर्ट पर ड्यूटी लगाई, सप्लाई चेन को मजबूत किया।

दरअसल, ममता का मकसद साफ है, वो है- आम जनता को भड़काना, मोदी सरकार को बदनाम करना और टीएमसी के वोट बैंक को मजबूत करना। वे जानती हैं कि डर का माहौल बन गया तो लोग सोचेंगे ‘मोदी सरकार फेल हो गई’।

दरअसल, ममता खुद के राज्य में LPG और पेट्रोल की सप्लाई सुधारने में कुछ नहीं कर रही। सिर्फ आरोप लगा रही हैं। चुनावी फायदे के लिए लोगों को अनावश्यक चिंता में डालना गलत है। आम आदमी पहले से परेशान है, उस पर ममता का ये डर और बढ़ा रहा है।

ममता बनर्जी ने पहले भी लोगों को भड़काया, वो हैबिचुएल ऑफेंडर

ममता बनर्जी का ये तरीका नया नहीं। वे हर मुद्दे को राजनीति बना लेती हैं। वो डर की राजनीति करती रही हैं शुरुआत से। कभी वामपंथ का डर दिखाकर, कभी कॉन्ग्रेस का डर दिखाकर, कभी बीजेपी का डर दिखाकर, तो कभी हिंदुओं का डर दिखाकर। देखें- कैसे लोगों को भड़काकर वोट बटोरती रही हैं ममता बनर्जी-

CAA के नाम पर: जब नागरिकता संशोधन कानून आया तो ममता ने पूरे बंगाल में हंगामा मचा दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि मुसलमानों के अधिकार छिन जाएँगे। उन्होंने पूरे बंगाल में शाहीन बाग स्टाइल में प्रदर्शन तक करवाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है। इसके बावजूद ममता ने सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भ्रम फैलाया और अब तक वो इस मुद्दे पर भ्रम ही फैला रही हैं।

SIR के नाम पर: एसआईआर के दौरान जब कुछ जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं तो ममता ने इसे भी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि आम मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं। ममता ने इसे राजनीतिक हथियार बनाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और दिल्ली तक प्रदर्शन कर डाले।

कोरोना के नाम पर: बता दें कि साल 2021 के चुनाव के समय आंशिक लॉकडाउन चल रहा था। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने दावा करते हुए कहा कि केंद्र ने कुछ नहीं किया, सिर्फ टीएमसी लड़ रही है। लेकिन असल में केंद्र ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, फंड सब दिया। ममता ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए किया।

केंद्रीय योजनाओं के नाम पर: पीएम आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर ममता हमेशा हमला करती हैं। कहती हैं केंद्र कुछ नहीं दे रहा। लेकिन हकीकत ये है कि बंगाल में लाखों लोग इन योजनाओं से फायदा ले रहे हैं। ममता सिर्फ क्रेडिट लेने के चक्कर में विरोध करती हैं।

इस तरह ममता हर बार डर और भ्रम फैलाकर वोट बटोरती हैं।

ममता की ये राजनीति आम आदमी को पहुँचा रही है नुकसान

आज ईंधन संकट है तो हर राज्य प्रभावित है। केरल, तमिलनाडु, असम के मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। लेकिन वे मीटिंग में समाधान ढूँढ रहे हैं। ममता अकेली हैं जो लॉकडाउन का डर दिखा रही हैं। उनका बयान सुनकर लोग पैनिक खरीदारी कर रहे हैं। LPG सिलेंडर की होर्डिंग बढ़ रही है। छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट वाले, गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता का रिकॉर्ड क्या है- संदेशखाली, टीएमसी के गुंडागर्दी, भर्ती घोटाले। अब ईंधन संकट को भी वोट में बदलने की कोशिश। लेकिन इस बार लोग समझ रहे हैं।

ममता का डर लोगों को नहीं, खुद को बचाने का है

ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। लेकिन असल में बंगाल की जनता महँगाई, बेरोजगारी, अपराध से परेशान है। ईंधन संकट राष्ट्रीय समस्या है। इसमें सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ममता अगर सच में चिंतित हैं तो राज्य में होर्डिंग रोकें, सप्लाई सुधारें, केंद्र के साथ मिलकर काम करें। लेकिन नहीं, वे तो बस डर फैलाकर वोट माँग रही हैं।

आम जनता के लिए सबसे जरूरी है कि वह अफवाहों से दूर रहे और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करे। क्योंकि संकट के समय घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। वैसे भी, ममता बनर्जी की हरकतों को पूरा देश देख रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता भी देख रही है। डर की राजनीति अब पुरानी हो गई है। अब विकास और समाधान की राजनीति चाहिए। मोदी सरकार पहले की तरह इस संकट से भी देश को निकाल लेगी। ममता का डर सिर्फ चुनावी चाल है। लोग अब समझ चुके हैं।

ममता को झटका : बंगाल में ओवैसी-कबीर का नया गठबंधन, बहुकोणीय मुकाबले में मुस्लिम मतों का बंटना तय


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम चीफ प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की मुश्किलें बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली है। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के चर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय और जटिल रही है, जहां जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक रणनीति एक साथ मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नये आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम वोट बैंक की पुनर्संरचना कर परिणामों को प्रभावित करेगा। खासकर उस राज्य में, जहां करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है, वहां इस नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राज्य की सौ से अधिक सीटों पर इस गठबंधन का टीएमसी को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खामियाजा ममता बनर्जी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा।

मुस्लिम वोट बैंक: पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर निर्णायक

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है, जो राज्य की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और कुछ हद तक नदिया जैसे जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक यह वोट बैंक काफी हद तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा है, जिसने खुद को अल्पसंख्यकों के भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकालकर ममता ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और अपने वोट बैंक को नाराज कर लिया है। हुमायूं कबीर अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में मस्जिद बनवा रहे हैं, जिसका नाम भी उन्होंने बाबरी मस्जिद ही रखा है। हुमायूं कबीर और ओवैसी का गठबंधन ममता बनर्जी के इसी स्थिर समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है।

 ओवैसी की एंट्री: रणनीतिक सेंधमारी खिलाएगी नया गुल

ओवैसी की राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है, जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है। बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एआईएमआईएम की मुस्लिम वोटों में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दी है। ओवैसी-कबीर की जोड़ी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर जाता है, तो यह सीधे तौर पर तृणमूल के नुकसान और विपक्ष, खासकर भाजपा, के लिए लाभ का कारण बन सकता है।
हुमायूं कबीर फैक्टर: स्थानीय प्रभाव और असंतोष की राजनीति
हुमायूं कबीर का राजनीतिक महत्व उनके स्थानीय प्रभाव और टीएमसी से अलगाव के कारण बढ़ जाता है। टीएमसी से निष्कासन के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाकर खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दावा कि ममता की टीएमसी में मुस्लिम समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा, एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकती है। उनके द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं।
मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों को उठाकर हुमायूं कबीर ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को सीधे छूने की कोशिश की है। यह मुद्दा भावनात्मक रूप से कुछ वर्गों को प्रभावित कर सकता है। यह तो तय है कि इसका सियासी चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। लेकिन यह कितना व्यापक असर डालेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। बंगाल की राजनीति परंपरागत रूप से धार्मिक मुद्दों पर भी आधारित रही है। एक ओर जहां हिंदू समुदाय की मां दुर्गा में आस्था है, वहीं दूसरे धर्म के लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। यहां सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित जरूर करते हैं।
ममता के मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भाजपा को मिलेगा लाभ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुस्लिम धर्म के आधार पर नया गठबंधन आने से यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन एकजुट मुस्लिम वोटिंग ने टीएमसी को बढ़त दिलाई। अब अगर यही वोट बैंक विभाजित होता है, तो इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जहां वह पहले मामूली अंतर से पीछे रह गई थी। इसके अलावा एंटी एन्कंबेंसी फैक्टर भी ममता बनर्जी की टीएमसी को मुश्किलों में डाल सकता है।
बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता बंगाल का विधानसभा चुनाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया गठबंधन चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से बदल पाएगा। इसका जवाब कई कारकों पर निर्भर करता है। गठबंधन की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, और मतदाताओं का वास्तविक रुझान। अभी तक के संकेत बताते हैं कि यह गठबंधन सीधे सत्ता परिवर्तन का कारण भले न बने, लेकिन कई सीटों पर “स्पॉइलर” की भूमिका निभा सकता है। दरअसल, बड़े तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। अब ओवैसी-कबीर के गठबंधन के भी आ जाने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन इस बदलाव का प्रतीक है, जो चुनावी समीकरणों को जटिल बना सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मतदाता ही करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव टीएमसी को झटका देने वाला हो सकता है।
पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।
राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

ममता राज का हिंदू विरोध फिर उजागर, ‘जिहादियों’ ने भगवान राम की मूर्ति का सिर काटा, TMC नेता बोले- राम केवल उत्तर भारत के देवता


पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।

राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

राम केवल उत्तर भारतीयों के देवता, हम काली के भक्त – सिन्हा
नंदीग्राम में प्रभु श्रीराम की मूर्ति का सिर काटने की घटना इसलिए और चिंताजनक हो गई है, क्योंकि टीएमसी सरकार इसकी परवाह करने की बजाए प्रभु श्रीराम का अपना भगवान ही नहीं मानती। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने जहां इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेता औरे पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के बयान ने आग में घी का काम किया है। सिन्हा ने अपने विवादित बयान में कहा है कि रामचंद्र तो केवल उत्तर भारत के देवता हैं। सिन्हा ने उल्टे भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में रामचंद्र नहीं चलेगा। बंगाल के लोग तो मां काली के भक्त हैं। भाजपा नेताओं ने सिन्हा की बयान की आलोचना करते हुए इसे भगवान श्रीराम का अपमान बताया है। ऐसे में हर स्तर पर मुख्यमंत्री, सरकार और प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आस्था का सम्मान बना रहे और कानून-व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत हो।

ममता का राज हिंदू विरोधी घटनाओं के लिए रहा है कुख्यात
पश्चिम बंगाल में समय-समय पर धार्मिक स्थलों या प्रतीकों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मंदिरों में तोड़फोड़, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने या धार्मिक जुलूसों के दौरान तनाव जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन घटनाओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएं सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बनती हैं। इसलिए इनका समाधान केवल राजनीतिक विमर्श से नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई से ही संभव है। लेकिन ममता सरकार ने अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते इनमें लापहवाही ही दिखाई है। किसी भी राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना होती है। चाहे घटना किसी भी धर्म से जुड़ी हो, प्रशासन को निष्पक्षता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। दोषियों की पहचान, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है, ताकि यह संदेश जाए कि ऐसी घटनाओं को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति की हदें पार कीं

पश्चिम बंगाल पिछले डेढ़ दशक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति का गवाह रहा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए खुलकर खजाना खोला है और इसमें राज्य की माली हालत की भी चिंता नहीं की है। अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए ममता सरकार ने सारी सीमाएं ही लांघ ली है और आंखें बंद कर इन पर पैसा लुटाया जा रहा है। इसका अंदाजा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2010-11 में राज्य का जो अल्पसंख्यक बजट मात्र 472 करोड़ था, वह आज 5,600 करोड़ को पार कर चुका है। अल्पसंख्यक युवाओं का वोट बैंक पक्का करने के लिए करोड़ों रुपये का ऋण दिया गया है। खास बात यह कि तृणमूल सरकार ने इनसे ऋण वापसी पर कोई फोकस नहीं किया है। इतना ही नहीं इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक मानदेय में भी कई गुना की वृद्धि की गई है। दूसरी ओर प्रभु श्रीराम के नाम से लेकर हिंदुत्व और सनातन विरोध के कई उदाहरण ममता बनर्जी के हैं। इससे यह शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल सरकार ने अल्पसंख्यकों और घुसपैठियों को खूब पाला-पोसा है।

राम नाम मास्क बांटने पर बीजेपी नेता गिरफ्तार
राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है।

ममता बनर्जी: संवैधानिक संस्थाओं के अपमान के बाद अब राष्ट्रपति का अपमान, चुनाव में मजा चखाएंगे आदिवासी


पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी अपनी मनमानी कार्यशैली और अकर्मण्यता से बाज नहीं आ रही हैं। उन्होंने पहले चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं की पुरजोर खिलाफत की है। इस बार तो राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद का खुलेआम अपमान किया है। ममता सरकार ने जानते-बूझते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर दिया है। इसके पीछे आदिवासी वोट बैंक को राष्ट्रपति से दूर रखने की सियासी रणनीति सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे राष्ट्रपति का ही नहीं, बल्कि संविधान का अपमान बताया है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना के आरोप लगे हों। इससे पहले भी उन्होंने कई बार केंद्रीय संस्थाओं और संवैधानिक पदों को लेकर तीखे बयान देकर अपमानित किया है। अब जब राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक सीमा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। पश्चिम बंगाल से उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक मतभेद चाहे कितने भी तीखे क्यों न हों, संवैधानिक मर्यादाओं से समझौता किसी भी सूरत में देश बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगकर उसकी हालत इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे तो खाई वाली कर दी है।

संवैधानिक मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसकी संवैधानिक मर्यादाओं में बसती है। इन मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद होता है, जिसे संविधान ने राष्ट्र के प्रथम नागरिक का स्थान दिया है। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार या उसका मुखिया राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल की अनदेखी करता है, तो यह केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं के अपमान से जुड़ा विषय बन जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से जुड़ा विवाद इसी गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। सीएम ममता बनर्जी को यह समझना होगा कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के साथ टकराव का संदेश केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत है। जब संस्थाओं का सम्मान दांव पर लग जाता है, तो नुकसान केवल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मर्यादा और जिम्मेदारी भी दी है। यदि इन मर्यादाओं का सम्मान नहीं होगा, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होगी। इस पूरे विवाद की यही सबसे बड़ी चेतावनी है।

राष्ट्रपति के कार्यक्रम में ममता सरकार की उदासीनता और कुप्रबंधन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हालिया विवाद संवैधानिक प्रोटोकॉल के उल्लंघन से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रपति के सिलीगुड़ी दौरे पर थीं। ममता बनर्जी या उनके किसी भी मंत्री ने उनकी अगवानी नहीं की, जिसे राष्ट्रपति ने अपने पद और आदिवासी समुदाय के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने सार्वजनिक मंच से राज्य सरकार की उदासीनता और कार्यक्रम के कुप्रबंधन पर सवाल उठाए। तृणमूल सरकार की ओर से वह सम्मानजनक व्यवहार और औपचारिक व्यवस्था नहीं दिखाई गई, जो सामान्यतः राष्ट्रपति के दौरे के समय अनिवार्य मानी जाती है। ममता बनर्जी ने इस अक्षम्य गलती को मानने के बजाए, उल्टा राष्ट्रपति पर ही सवाल उठाकर आग में घी का काम किया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कार्यक्रमों के समन्वय और आयोजन को लेकर राज्य सरकार में आपसी मतभेद थे। ममता बनर्जी से गलती को स्वीकारने के बजाए उल्टे आरोप लगा दिए, जिससे यह मतभेद से बढ़कर एक संवैधानिक गतिरोध में बदल गया।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति पद का सम्मान करना अनिवार्य
अब गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में रिपोर्ट मांगे जाने से इस विवाद को और भी गहरा दिया है, जिससे केंद्र और पश्चिम बंगाल के बीच पहले से जारी तनाव एक नए स्तर पर पहुँच गया है। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख माना गया है। राष्ट्रपति केवल औपचारिक पद नहीं हैं, बल्कि वह राष्ट्र की एकता, गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक हैं। संसद का संचालन हो, सरकार का गठन हो या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कई संवैधानिक औपचारिकताएं, इन सभी में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण राष्ट्रपति के कार्यक्रमों और दौरों के दौरान राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करें। यह केवल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का हिस्सा है। यदि किसी स्तर पर इस मर्यादा की अनदेखी होती है तो उसे केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जाता, बल्कि उसे संविधान के प्रति असम्मान के रूप में देखा जाता है।

ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता
राष्ट्रपति पद की गरिमा के कारण सार्वजनिक प्रतिक्रिया अक्सर संयमित होती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ममता सरकार की उदासीनता और लापरवाह कार्यशैली ने राष्ट्रपति की नाराजगी और असंतोष बढ़ा दिया है। यह असंतोष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति का पद किसी दल या सरकार से नहीं, बल्कि पूरे संविधान से जुड़ा होता है। जब इस पद से जुड़े प्रोटोकॉल की अनदेखी होती है, तो यह संकेत देता है कि राजनीतिक टकराव अब संवैधानिक मर्यादाओं तक पहुंच गया है। यही कारण है कि ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता व्यक्त की जा रही है।

राष्ट्रपति का नहीं, संविधान और लोकतंत्र का अपमान- पीएम मोदी
इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यह केवल राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र का अपमान है। पीएम मोदी ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि आज देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है और कल बंगाल की टीएमसी सरकार ने महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू घोर अपमान किया है। राष्ट्रपति मुर्मू संथाल समुदाय के एक बड़े उत्सव में भाग लेने गई थीं, लेकिन टीएमसी सरकार ने इस आयोजन का बहिष्कार किया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति देश की एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च प्रतीक होते हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार उनके प्रोटोकॉल की अनदेखी करती है, तो यह पूरे राष्ट्र की संवैधानिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है।

आदिवासी समुदायों में ममता सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष
इस विवाद को केवल प्रोटोकॉल की चूक मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे आदिवासी राजनीति का पहलू भी जुड़ा हुआ है। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी समाज में एक नई राजनीतिक चेतना और सम्मान की भावना पैदा हुई है। ऐसे में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां आदिवासी आबादी महत्वपूर्ण है, वहां पर आदिवासी समुदाय के कार्यक्रम का बहिष्कार करना अपने आप में राजनीतिक भेदभाव का प्रतीक है। इसलिए भी देशभर के आदिवासी समुदायों में ममता बनर्जी सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष व्याप्त है।

संघीय व्यवस्था का अपमान, प्रशासनिक भूल या राजनीतिक रणनीति
भारत एक संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों और संस्थाओं के सम्मान को लेकर एक साझा मर्यादा कायम रहती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में आए दिन इसकी धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। वह कभी राज्यपाल से टकरा जाती हैं तो कभी अदालतों के निर्णयों पर सवाल उठाती फिरती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी हो जाए कि वह संवैधानिक शिष्टाचार को ही चुनौती देने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि लगातार संवैधानिक संस्थाओं के साथ टकराव की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यह केवल भूल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है। लोकतंत्र की असली ताकत उसके संस्थानों में विश्वास से आती है। यदि राजनीतिक दल और सरकारें इन संस्थानों का सम्मान नहीं करेंगी, तो जनता के बीच भी उनका विश्वास कमजोर होगा। राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका जैसे पद और संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई भी कुत्सित प्रयास अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की नापाक कोशिश है।

चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों पर ममता के लगातार हमले
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वभाव में आक्रामकता दिखाई है। लेकिन सवाल तब उठता है जब यह आक्रामकता संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच जाती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन संस्थाओं के सम्मान की एक सीमा भी होती है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान किया हो। इससे पहले चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उनका टकराव चुनाव आयोग से भी हो चुका है। उन्होंने कई मौकों पर चुनाव आयोग के निर्णयों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खुलकर आलोचना की थी। इसी प्रकार ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कई बार केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ भी मुखर रही है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से ईडी और सीबीआई की कार्रवाइयों पर सवाल उठाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के छापों के दौरान भी मुख्यमंत्री ने अनाश्यक दखलंदाजी की और महत्वपूर्ण फाइलों को उठाकर ले गईं। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह संवैधानिक संस्था की सार्वजनिक अवमानना करनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी को सत्ता–संरक्षण देने के भंवर में फंस गई है। इस साल की शुरुआत में 8 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।

बंगाल : ममता के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे Rahul, चुनाव से पहले इंडी गठबंधन टूटा


पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने वामपंथी दलों के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया है। इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। अब तक विपक्षी राजनीति में जो संभावित तालमेल दिखता था, वह अचानक बिखरता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस रणनीतिक फैसले से किसे लाभ होगा और किसे नुकसान? राहुल गांधी के इस कदम का कांग्रेस पार्टी को फायदा हो या ना हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को जरूर नुकसान होने वाला है। क्योंकि कांग्रेस को जो भी वोट मिलेगा, वह तृणमूल कांग्रेस के हिस्से का होगा। ऐसे में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की एकला चलो की लड़ाई का फायदा बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव में मिलने जा रहा है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का दांव का क्या उसके लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं होगा? कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में जीरो सीट मिली थी। ऐसे में अगले चुनाव में जीरो से शुरुआत करने वाली कांग्रेस का बिना किसी राजनीतिक बैसाखी के अपना सफर तय कर पाएगी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी समीकरण फिर उफान पर

राज्य से तृणमूल कांग्रेस सरकार का कुशासन हटाने और बीजेपी का सुशासन लाने के लिए नौ अलग-अलग स्थानों कूचबिहार, कृष्णानगर, कुल्टी, गरबेटा, रैदिघी, इस्लामपुर, हसनाबाद, संदेशखाली और आमता से BJP की परिवर्तन यात्रा का शानदार आगाज हो गया है। यात्रा को मिले जनता-जनार्दन के अपार समर्थन ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक नए जोश से भर दिया है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक तीन और चार मार्च को ‘डोल यात्रा’ और 4 मार्च को ‘होली’ के कारण कहीं रैली का आयोजन नहीं होगा। परिवर्तन यात्रा इसके बाद पांच मार्च से फिर से शुरू होगी। यह पश्चिम बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने के बाद पूरी होगी। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने राज्यव्यापी ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत कर चुनावी रणभूमि को नई दिशा दे दी है। नौ दिशाओं से एक साथ यात्रा का आगाज को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं,  बल्कि एक व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। यह पहल बीजेपी के लिए संगठनात्मक ऊर्जा, राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति तीनों का संगम बनती दिखाई दे रही है।

कांग्रेस की बड़ी चुनौती खोए जनाधार को पुनर्जीवित करना
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शून्य सीटों पर सिमटना पड़ा था। यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का संकेत भी था। ऐसे में, शून्य से शुरुआत करने वाली पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने खोए हुए जनाधार को पुनर्जीवित करना है। बिना मजबूत गठबंधन के मैदान में उतरना, कुछ विश्लेषकों के अनुसार, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम भी साबित हो सकता है। क्योंकि फिलहाल तो पार्टी मतदाताओं को ठोस विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करती नजर नहीं आती। ऐसे में कांग्रेस का वामपंथी दलों से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरना बेहत चुनौतीपूर्ण निर्णय है। यह तर्क भी अपने आप में ही दिलचस्प है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी और पश्चिम बंगाल में राज करने के बाद भी अब स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस को किसी सहारे के साथ नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए लड़ना पड़ रहा है। “एकला चलो” की यह रणनीति जितनी चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं ज्याद जोखिम भरी भी है। आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि “एकला चलो” की रणनीति कांग्रेस के लिए कितनी आत्मघाती साबित होती है। इतना निश्चित है कि बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले से अधिक रोचक और प्रतिस्पर्धी हो चुका है।

तृणमूल कांग्रेस बनान कांग्रेस का असर ममता बनर्जी पर
कांग्रेस के अलग रास्ता चुनने से सबसे अधिक असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को मिलने वाला हर अतिरिक्त वोट कहीं न कहीं तृणमूल के संभावित समर्थन आधार से कटेगा। बंगाल में विपक्षी वोटों का बिखराव पहले भी निर्णायक साबित हुआ है। यदि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक विशेषकर कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक और पारंपरिक समर्थकों को वापस खींचने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल की सीटों पर पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति में केवल वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि उसका वितरण अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में 5–10 प्रतिशत वोट भी जुटा लेती है, तो वह परिणामों को प्रभावित कर सकती है। भले ही उसे सीटें न मिलें, पर उसका वोट शेयर बीजेपी की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार तय कर सकता है। यही कारण है कि गठबंधन टूटने को केवल कांग्रेस का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य में संभावित बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

कांग्रेस और टीएमसी के “एकला चलो” से बीजेपी को लाभ
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच “एकला चलो” की प्रतिस्पर्धा का लाभ भाजपा को मिल सकता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच माना जा रहा है। यदि विपक्षी वोटों में विभाजन होता है, तो भाजपा को कई सीटों पर सीधे लाभ की संभावना बन सकती है। बहुकोणीय मुकाबले में अक्सर वह दल आगे निकल जाता है, जिसका कोर वोट बैंक अपेक्षाकृत स्थिर और संगठित हो। भाजपा ने बूथ लेवल पर अपना कोर वोटर बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को पुनर्जीवित करने की है। बिना मजबूत बूथ स्तर की संरचना के, केवल राजनीतिक संदेश के सहारे चुनावी सफलता हासिल करना कठिन होता है। कांग्रेस को पहले अपने पुराने कार्यकर्ताओं को पुनः सक्रिय करना होगा और युवाओं को जोड़ने की कवायद करनी होगी। क्योंकि आज की राजनीति के दौर में महिला और युवा वर्ग पूरी तरह से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है।

केरल में अलग समीकरण, बंगाल में पड़ेगा बहुत गहरा असर
हालाँकि केरल और बंगाल दोनों राज्यों में गठबंधन टूटने की खबर है, लेकिन दोनों जगह राजनीतिक समीकरण भिन्न हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं और सत्ता का सीधा मुकाबला करते रहे हैं। वहीं बंगाल में परिस्थिति अधिक जटिल है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख शक्ति है और भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभरी है। ऐसे में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना बंगाल में अधिक जोखिमपूर्ण माना जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद तृणमूल कांग्रेस को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक खिसके नहीं। साथ ही, भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए उसे अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना होगा। कांग्रेस और वाम दलों की मौजूदगी से कई सीटों पर बहु-कोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है, जो चुनावी गणित के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जाएगा।

नौ दिशाओं से एक संदेश: सत्ता परिवर्तन की तूफानी तैयारी
राज्य के नौ अलग-अलग हिस्सों से एक साथ शुरुआत करने का निर्णय प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों है। इससे भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की आकांक्षाओं को समेटने का प्रयास है। उत्तर से दक्षिण और ग्रामीण से शहरी इलाकों तक समानांतर रैलियाँ संगठन की व्यापकता और चुनावी गंभीरता को रेखांकित करती हैं। यात्रा में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी इसे और अहम बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित कोलकाता रैली, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से यह स्पष्ट है कि पार्टी बंगाल को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर भाजपा ने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। अब वह उसी आधार को विधानसभा चुनाव में व्यापक समर्थन में बदलने जा रही है। चुनावी अभियान को सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों के साथ संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है। इसी के चलते दो दिन के विराम के बाद पांच मार्च से रैलियों का पुनः आरंभ कर अभियान को और तेज गति दी जाएगी।

मतदाता सूची संशोधन में 63 लाख फर्जी नाम हटने का मिलेगा फायदा
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद संशोधित मतदाता सूची के प्रकाशन के तुरंत बाद यात्रा का आरंभ होना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। लगभग 63 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता संरचना में बदलाव आया है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने समर्थन आधार को पुनर्गठित करने में जुटे हैं। भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह नए मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करे। राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए युवा और महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा रोजगार, स्टार्टअप, कौशल विकास और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस को तुष्टिकरण और बढ़ते महिला अपराध और भ्रष्टाचार के आरोपरों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में दोनों दलों के बीच यह प्रतिस्पर्धा चुनावी दंगल को और रोचक बनाएगी।

TMC का विरोध पड़ा महँगा? पार्टी की गुंडागर्दी पर रील बनाने वाले इन्फ्लुएंसर की गिरफ्तारी पर विवाद

                                     शमिक अधिकारी (साभार: Instagram/yournonsane)
कोलकाता पुलिस ने 25 साल के सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शमिक अधिकारी को यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया है। शमिक को ऑनलाइन ‘नॉनसेन’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें गुरुवार (5 फरवरी 2026) को दमदम से पकड़ा गया। पहले उन्हें गलत तरीके से कैद करने, हमला करने और महिला की इज्जत से खिलवाड़ करने के आरोप में पकड़ा किया गया था, लेकिन बाद में 22 साल की पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने रेप का केस भी जोड़ दिया।

शमिक को शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को कोर्ट में पेश किया गया और अब उन्हें 16 फरवरी 2026 तक पुलिस कस्टडी में रखा गया है। पुलिस के मुताबिक, महिला ने शिकायत की थी कि शमिक ने उसे 2 फरवरी 2026 की रात करीब साढ़े नौ बजे से अगले दिन शाम 5 बजे तक अपने बेहाला वाले घर में जबरन रोका रखा।

इस दौरान महिला का आरोप है कि उसे मारा-पीटा गया, धमकाया गया। उसने कहा कि शमिक ने उसे गलत तरीके से छुआ, कपड़े खींचे और फिर जबरन यौन हमला किया।

पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता का मेडिको-लीगल टेस्ट एमआर बांगुर अस्पताल में हुआ। एक महिला पुलिस अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया और इसके बाद भारतीय न्याय संहिता की रेप वाली धारा FIR में जोड़ी गई। पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिले और वह काफी आघात में थी, इसलिए शिकायत करने में देरी हुई।

पुलिस ने आगे कहा कि शमिक ने पीड़िता को अश्लील फोटो भेजकर धमकाया था। जाँचकर्ताओं के मुताबिक टावर लोकेशन से पता चला कि शिकायत में बताए समय पर दोनों आरोपित और पीड़िता अपराध वाली जगह पर मौजूद थे।

शमिक की तरफ से कहा गया कि दोनों पुराने दोस्त हैं और लंबे समय से जानते हैं। उस रात गलतफहमी हुई थी, लेकिन कोई जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जाँच में कुछ बचा ही नहीं है तो पुलिस कस्टडी की क्या जरूरत है।

वायरल रील जिसने छेड़ दी राजनीतिक बहस

शमिक कोई आम इंफ्लुएंसर नहीं हैं। इंस्टाग्राम पर उनके करीब 4.20 लाख और फेसबुक पर 4 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। लेकिन राजनीतिक सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट ‘@yournonsane’ पर 21 जनवरी को एक रील पोस्ट की। पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले की बात है।

यह रील वायरल हो गई, 30 लाख से ज्यादा व्यूज और 3.5 लाख से ज्यादा लाइक्स आए। इसमें शमिक ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला किया था। वीडियो में वे खुद को आम वोटर दिखाते हैं जो वोट डालने जा रहा है। वहाँ एक लोकल टीएमसी गुंडा वोटरों को सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को वोट देने का दबाव डालता है और नहीं मानने पर धमकी देता है।

वीडियो में आगे राज्य की स्थिति दिखाने वाले फ्लैशबैक थे। इसमें 26 हजार सरकारी टीचर्स की नौकरी जाने और उसका भावनात्मक असर दिखाया गया। रात में अकेली चलती महिला को कुछ लोग पीछे चल रहे हैं।

रील में आरजी कर रेप-मर्डर केस का भी जिक्र था। उस केस में कोलकाता कोर्ट ने दोषी संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई और राज्य सरकार को पीड़िता के माता-पिता को 17 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, हालाँकि पीड़िता के माता-पिता ने कहा कि उन्हें न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं।

वीडियो ने सीधे सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाया और चुनाव से ठीक पहले आया, इसलिए कई लोगों ने इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना। वायरल होने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

TMC ने BJP से लिंक का किया दावा

रील वायरल होने के बाद कई टीएमसी लीडर्स और सपोर्टर्स ने दावा किया कि शमिक का बीजेपी से लिंक है। उनका कहना था कि वह सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं।

TMC प्रवक्ता रिजू दत्ता ने सोशल मीडिया पर कड़ा बयान दिया और शमिक को ‘बीजेपी यूट्यूबर’ कहा। पोस्ट में उन्होंने कहा कि वही शख्स जो पश्चिम बंगाल सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा में नाकाम होने का आरोप लगा रहा था, अब खुद महिला की इज्जत से खिलवाड़ और मारपीट के केस में फंसा है।

दत्ता ने केस में दर्ज धाराओं का जिक्र किया और बताया कि पीड़िता ने करीब 12 घंटे कैद रखने, मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया है। एक विवादास्पद टिप्पणी में उन्होंने शमिक को बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय से जोड़ा और कहा कि महिलाओं का गलत इस्तेमाल करने वाले बीजेपी में शामिल हो जाते हैं।

अब टीएमसी की बात है कि यह सीधा-सादा क्रिमिनल मामला है और विपक्ष अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दे रहा है।

गिरफ्तारी पर उठे सवाल, झूठे मामले में फँसाने का शक

दूसरी तरफ बीजेपी सपोर्टर्स और कई इंफ्लुएंसर्स ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए हैं। कई लोगों ने इशारा किया कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई हो सकती है, खासकर क्योंकि शमिक की रील ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की थी।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यौन उत्पीड़न की शिकायत झूठी बनाई गई है ताकि उन्हें चुप कराया जाए। उनका तर्क है कि वायरल वीडियो के ठीक बाद और चुनाव से पहले गिरफ्तारी हुई, जिससे शक पैदा होता है।

बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय ने ममता बनर्जी की सरकार पर कड़ा हमला बोला। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘तानाशाही शासन’ बन गया है जहाँ आलोचकों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण FIR से निशाना बनाया जाता है।

मालवीय ने लिखा, “यह टीएमसी का शासन मॉडल है: अभिव्यक्ति की आजादी को दबाओ, आलोचकों को डराओ, पुलिस का इस्तेमाल करो और सत्ता में बने रहने के लिए प्रतिष्ठा बर्बाद करो। लेकिन बंगाल देख रहा है। और बंगाल चुप नहीं रहेगा। बीजेपी हर उस शख्स के साथ खड़ी है जो ममता बनर्जी के शासन का शिकार बना है।”

उन्होंने आगे कहा, “पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मिलकर हम डर को हराएँगे, सत्ता के दुरुपयोग को बेनकाब करेंगे और लोकतंत्र बहाल करेंगे। यह न्याय नहीं है। यह राजनीतिक उत्पीड़न है। और इसका अंत होगा।”

साथी इंफ्लुएंसर्स ने किया शमिक का समर्थन

शमिक को कुछ साथी कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया यूजर्स का भी समर्थन मिला है। एक एक्स यूजर ने सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलने वाले इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ क्यों केस हो रहे हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक आक्रोश क्यों नहीं होता।

समर्थकों का कहना है कि शासन और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसके लिए कानूनी परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि दूसरे लोग कहते हैं कि क्रिमिनल आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए और राजनीतिक बहस से अलग जाँच होनी चाहिए।

फिलहाल शमिक अधिकारी ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। आने वाले दिनों में कोर्ट की कार्यवाही और जाँच के नतीजे इस मुद्दे में बड़ी भूमिका निभाएँगे।

केस एक अपराध की शिकायत से शुरू हुआ था, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस बन गया है जो आरोपी पर लगे आरोपों के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी, राजनीतिक दुश्मनी और चुनाव के समय सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठा रहा है।