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वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल? विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब NEET पेपर लीक तक विपक्ष ने जितने भी धरने/प्रदर्शन हुए हैं सभी अपने असली मुद्दे से भटके हैं। दूसरे विपक्ष का किसी न किसी बहाने संसद को बाधित करना रहा है। तीसरे, अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मुग़ल आक्रांताओं के गुणगान की बजाए उनकी असलियत पुस्तकों में लाई गयी होती कोई प्रधान का इस्तीफा नहीं मांगता। सभी धरनों में भोजन मिलना पहली बार देखा गया है। जो इस बात को साबित करता है कि हमारा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथों बिका हुआ है। जनता समझती है ये नेता जनता के हित में काम कर रहे हैं जबकि संसद से लेकर सड़क तक जो भी उपद्रव हो रहा है सब विदेशी फंडिंग से हो रहा है। जिसका तक़रीबन हर चैनल पर जिक्र किया जा रहा है। चुनावों में जनता से मदद मांगी जाती है लेकिन धरनों में भारत विरोधियों की शरण में, ये क्या तमाशा है?     
राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है। https://www.facebook.com/share/r/1F4fka4oWh/

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।
कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।
स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।
वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

न सांसद हैं-न विधायक फिर भी लेटरहेड पर ‘अशोक स्तंभ’: TMC प्रवक्ता साकेत गोखले ने किया ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अधिनियम’ का उल्लंघन

                                           साकेत गोखले (फोटो साभार-india today)
मोदी सरकार पर संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाने वाले ही संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। बने फिर रहे हैं संविधान की रक्षक के चौधरी। 

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र विवादों में आ गया है। उन्होंने पत्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से सरकार को संपर्क करने का आग्रह किया है, लेकिन पत्र के लिए जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ बना हुआ है, साथ ही मोटे अक्षरों में ‘पूर्व सांसद’ लिखा हुआ है। नियम के मुताबिक, पूर्व सांसद को ऐसे लेटरहेड के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह हों।

क्या लिखा है खत में

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद ने खत में केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह सोनम वांगचुक से संपर्क कर उनका भूख हड़ताल खत्म करवाए। वांगचुक NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में 28 जून 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गोखले ने सोशल मीडिया पर अपने उस पत्र की कॉपी को साझा किया।

गोखले ने यह पत्र 15 जुलाई 2026 को लिखा है। इसमें वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि उनका वजन महज दो सप्ताह में 8 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है। उन्होंने मंत्री से अपील की है कि वे कम से कम उनसे संवाद करें और देश भर के लाखों छात्रों की चिंता का समाधान करें।

                                                           (साभार-x@sakeygokhale)

साकेत गोखले ने अपने निजी स्टेशनरी पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करके कानून का उल्लंघन किया है, क्योंकि पूर्व सांसदों और विधायकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का इस तरह से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। यह भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 (State Emblem of India – Prohibition of Improper Use Act, 2005) के तहत बनाए गए थे।

इन नियमों के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल पूर्व सांसद और विधायक, बल्कि पूर्व मंत्री, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी किसी तरह से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं कर सकते हैं। नियम 10 में कहा गया है, “इन नियमों के तहत अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति (जिनमें सरकार के पूर्व पदाधिकारी, जैसे पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व विधानसभा सदस्य, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी शामिल हैं) किसी भी प्रकार से प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा।”

इस कानून में उन अधिकारियों की सूची दी गई है जो अपने स्टेशनरी पर इस प्रतीक चिन्ह का उपयोग कर सकते हैं, और इस सूची में पूर्व सांसदों और विधायकों को शामिल नहीं किया गया है। केवल संसद और विधान सभाओं या परिषदों के वर्तमान सदस्यों को ही इसका उपयोग करने की अनुमति है और वह भी आधिकारिक कार्यों के लिए। नियम में ये बताया गया है कि किस-किस काम के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही अधिनियम की अनुसूची 1 में अधिकारियों की पूरी सूची दी गई है, जो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

किन लोगों को राज्य प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति है

2007 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग करने की अनुमति भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, लोकसभा और राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रालय और विभाग, राज्य सरकारों के विभाग, भारतीय दूतावास और उच्चायोग, केंद्र एवं राज्य सरकार के वे कार्यालय जिन्हें नियमों के अंतर्गत अनुमति दी गई हो, कुछ वैधानिक निकाय और आयोग, यदि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किया गया हो। इनके लिए भी उपयोग केवल आधिकारिक कार्य, सरकारी पत्राचार, सील, दस्तावेज, भवन, वाहन आदि तक सीमित होता है।

यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि किसी भी तरह से यह धारणा न बने कि कोई मैसेज आधिकारिक है या किसी संवैधानिक प्राधिकरण या सरकारी कार्यालय से आया है। गोखले ने अपने निजी लेटरहेड पर प्रतीक चिन्ह लगाकर यही भ्रम पैदा की है, जिसे कानून रोकना चाहता है।

नियम 10(1) के तहत साफ कहा गया है कि सरकार के सभी पूर्व पदाधिकारियों चाहे वह पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल या पूर्व जज हों, वे आधिकारिक स्टेशनरी या किसी भी दूसरे रूप में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग नहीं कर सकते। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक पद को छोड़ता है, रिटायर होता है या उसका कार्यकाल समाप्त होता है, उसका राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार भी तुरंत खत्म हो जाता है।

जाना पड़ सकता है जेल

2005 के अधिनियम में आगे यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो बिना पूर्व अनुमति के प्रतीक चिन्ह या उसके मिलते-जुलते रूप का उपयोग करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सरकार से संबंधित है या एक आधिकारिक दस्तावेज है, तो उसे दो साल तक की जेल की सजा हो सकती है या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है अथवा जुर्माना और सजा दोनों ही दिया जा सकता है।
भारत के राज्य चिह्न (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 की धारा 3 में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति राज्य चिह्न या उससे मिलते-जुलते चिन्ह का उपयोग इस तरह नहीं करेगा कि जिससे यह आभास हो कि यह सरकार से संबंधित है या यह केंद्र सरकार या राज्य सरकार का आधिकारिक दस्तावेज है, जब तक कि केंद्र सरकार या अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति न मिल जाए।”
धारा 7 (1) में दंड के बारे में बताया गया है, “धारा 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाला कोई भी व्यक्ति दो वर्ष तक के कारावास या पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा। यदि वह अपने अपराध को दोहराता है तो हर बार अपने अपराध के लिए कम से कम छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास और पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”
यह कानून किसी भी व्यापार, व्यवसाय के उद्देश्य से प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने पर दंड का प्रावधान भी करता है। इसलिए नियम में साफ कहा गया है कि सभी के निजी काम, निजी कंपनी, एनजीओ, सोसायटी, राजनीतिक दल, निजी कॉलेज, स्कूल या यूनिवर्सिटी, निजी अस्पताल, व्यापारिक प्रतिष्ठान, यूट्यूब चैनल, वेबसाइट या मीडिया संस्थान, अधिवक्ता, डॉक्टर, इंजीनियर या दूसरे पेशेवर अपनी निजी पहचान के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।
हालाँकि गोखले ने लेटरहेड पर खुद को ‘पूर्व सांसद’ के रूप में सही तरीके से लिखा है, लेकिन लेटरहेड पर अशोक स्तंभ की उपस्थिति यह बताती है कि उन्होंने लेटरहेड कानून का उल्लंघन किया है। पूर्व सांसदों को अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक पत्राचार पर राजकीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, यह प्रतिबंध सभी पूर्व सदस्यों पर समान रूप से लागू होता है।
साकेत गोखले जुलाई 2023 के उपचुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस की तरफ से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। चूँकि वे गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुइज़िन्हो फलेरो के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुने गए थे, इसलिए उन्होंने राज्यसभा नियमों के अनुसार खाली सीट का पूरा कार्यकाल नहीं बल्कि शेष कार्यकाल पूरा किया। इसलिए गोखले की राज्यसभा सदस्यता अप्रैल 2026 में खत्म हो गई। पार्टी ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा। इसलिए वे पूर्व सांसद हैं।

टीएमसी के बाद अब INDI गठबंधन में भी टूट, उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ और समाजवादी पार्टी में भी टूट


जो काम मोदी सरकार-3 को 400 सांसद होने पर करना था वही काम होने जा रहा है 240 सांसदों के होते। As you sow you will reap यानि हिन्दी में जो बोया वही काटो यानि कांग्रेस ने जो बोया वही आज INDI गठबंधन को काटना पड़ रहा है। इतिहास में झाँकने पर मालूम होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर बीजेपी तत्कालीन भारतीय जनसंघ तक जितनी भी पार्टियां है सभी कांग्रेस से निकली है। जनसंघ वर्तमान बीजेपी जैसी पार्टियां तो अपना अस्तित्व बनाने में सफल रही और कुछ सिर्फ क्षेत्रीय पार्टी। 
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सत्ताधारी महागठबंधन में शामिल दलों की एकजुटता की चूलें हिलाकर रख दी हैं संसद के उच्च सदन की दूसरी सीट पर प्रियंका गांधी के करीबी कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की करारी शिकस्त के बाद सत्ताधारी महागठबंधन यानी INDI ब्लॉक की दीवारें पूरी तरह दरकती दिख रहीं हैं इस चुनावी मुकाबले ने गठबंधन के भीतर चल रहे अविश्वास का एक ऐसा ‘एनकाउंटर’ किया है, जिसके जख्म के निशान अब मुख्यमंत्री आवास की दीवारों पर नजर आ रहे हैं चुनाव के इस लिटमस टेस्ट में बुरी तरह जख्मी नजर आ रही कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल(RJD) और वामपंथी दल माले(CPI-ML) पर खुलेआम क्रॉस वोटिंग और भितरघात का आरोप मढ़ा है वहीं राजद ने भी अब पलटवार करते हुए कांग्रेस को ही असली ‘गद्दार’ बता दिया है और उसे गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की मांग तेज कर दी है
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार बैजनाथ मिश्रा का मानना है कि यह चुनाव परिणाम महज एक सीट की हार नहीं, बल्कि महागठबंधन के भीतर आपसी भरोसे का पूरी तरह अंत है ऐसे में चुनाव के बाद घायल अवस्था में पड़ी कांग्रेस के नेता जहां तल्ख तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं राजद भी पूरी तरह आक्रामक है राजद के राष्ट्रीय महासचिव भोला प्रसाद यादव ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी खुद की अंदरूनी कलह और कमजोरी को छिपाने के लिए सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ रही है उन्होंने कहा कि जो दल अपने विधायकों को संभाल नहीं सकता, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है
खैर, जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक कांग्रेस ने जितनी पार्टियों में टूट और विधान सभाओं को भंग किया ऐसा कभी नहीं हुआ। आज अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी वही काम कर रही है क्योकि बीजेपी को पास कराना है महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को पारित करवाना जिसके लिए जरुरत है संसद में दो-तिहाई बहुमत। 
पार्टी छोड़कर आने वाले किसी भी विधायक से लेकर सांसद तक किसी को बीजेपी अपनी पार्टी में शामिल करने की बजाए अपनी सहयोगी पार्टियों की तरफ हस्तांतरण किया जा रहा है।    
देश में विपक्ष की सियासत इस समय दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन के एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर राज्यों के सियासी गलियारों तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची भगदड़ ने भारतीय दलबदल विरोधी कानून की गलियों और राजनीतिक शुचिता के दावों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के दूसरी छोटी पार्टी में विलय के बाद अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 सांसदों की बगावत सुर्खियों में है। इसको लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत तो गालीगलौज तक पर उतर आए हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुनबे में टूट की सुगबुगाहट आ रही है। ये महज छिटपुट सियासी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे एक गहरे ढांचागत बदलाव का संकेत हैं। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि मजबूत दिखाई देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले भी अब अंदरूनी अंतर्विरोधों और एनडीए की राष्ट्रवादी राजनीति के आकर्षण के कारण ढह रहे हैं।

ममता के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी सांसदों का विलय
इस पूरे राजनीतिक भूचाल की शुरुआत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से हुई, जहां भाजपा ने टीएमसी को रोंदकर सरकार बनाई। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

उद्धव गुट को एक और झटका: शिवसेना की बगावत
दूसरी ओर महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा और अब लोकसभा स्तर पर पार्टी को एक और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। पार्टी के छह प्रमुख सांसदों, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना के बागी रुख ने उद्धव ठाकरे खेमे की रीढ़ तोड़ दी है। इस टूट ने पार्टी नेतृत्व की उस संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके लिए कभी बाल ठाकरे की शिवसेना जानी जाती थी।

हताशा से भरे सांसद संजय राउत गाली गलौज पर उतरे
शिवसेना उद्धव गुट के इन सांसदों के गुट ने अभी किस पार्टी में विलय किया है, यह तो साफ नहीं हुआ है, लेकिन इस बिखराव की तल्खी तब खुलकर सामने आ गई जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना आपा खो बैठे। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज पर उतर आए। राउत का यह गुस्सा और तीखे आरोप दरअसल उस लाचारी और हताशा को दर्शाते हैं, जो एक समय महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र रहे दल के भीतर अपनी जमीन खिसकने के कारण पैदा हुई है। गाली-गलौज की यह राजनीति बताती है कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

समाजवादी पार्टी पर भी मंडरा रहे हैं बड़ी टूट के बादल
संसद के इस दलबदल चक्र की तपिश अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के इस सनसनीखेज दावे ने यूपी की सियासत में खलबली मचा दी है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 26 सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं और उनके भीतर गहरी फूट पड़ चुकी है। राजनीति में इस तरह के दावों को अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है। समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में चार सांसद हैं। ऐसे में 25 सांसदों के टूटने की खबरों से पार्टी में हड़कंप की स्थिति बन गई है और सांसदों को रोकने के रणनीति बनाई जा रही है।

‘सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस चर्चा को हवा दे दी है। मौर्य का यह कहना कि’सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’, दरअसल सपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है। यह बयान दिखाता है कि सत्ता पक्ष विपक्ष के किलों में लगी दरारों को भांप चुका है और केवल सही वक्त का इंतजार कर रहा है। अखिलेश यादव के लिए अपने इस बड़े कुनबे को एकजुट रखना आने वाले दिनों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कमजोर पड़ता क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व और केंद्रीय सत्ता का आकर्षण
इन तीनों राज्यों के घटनाक्रमों को अगर एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के क्षेत्रीय दल इस समय एक बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। जब तक ये दल सत्ता में रहते हैं या मजबूत दिखते हैं, तब तक इनका अंतर्विरोध दबा रहता है। लेकिन जैसे ही चुनावी हार या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, वैसे ही सांसदों और विधायकों का मोहभंग होने लगता है। टीएमसी, शिवसेना और सपा जैसी पार्टियों का ढांचा अक्सर एक ही परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। ऐसे में जब जमीनी स्तर पर नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो महत्वाकांक्षी नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगने लगता है। केंद्रीय सत्ता का संरक्षण और उसके साथ मिलने वाले लाभ इन सांसदों को अपनी मूल पार्टी की विचारधारा को छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल आत्ममंथन करें कि ऐसी नौबत क्यों आई
संजय राउत के बयानों और विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह भी साफ है कि विपक्ष की राजनीति में अब गरिमापूर्ण संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है। जब कोई नेता या सांसदों का समूह पार्टी छोड़ता है, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई। इसके विपरीत, बागी नेताओं को गद्दार घोषित करना, उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और व्यक्तिगत कीचड़ उछालना अब एक आम चलन बन गया है। यह रवैया राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति और दलबदल की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उसे निजी दुश्मनी और गाली-गलौज के स्तर पर ले जाना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।

दलों ने आंतरिक लोकतंत्र नहीं सुधारा तो भविष्य और चुनौतीपूर्ण
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का यह खेल उस आम मतदाता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो किसी पार्टी की विचारधारा, उसके घोषणापत्र और उसके नेता का चेहरा देखकर अपना वोट देता है। जब चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ या दबाव में आकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाता है, तो जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था कम होने लगती है। टीएमसी, शिवसेना और संभावित रूप से सपा के भीतर चल रहा यह घटनाक्रम यह चेतावनी है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी अंदरूनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं सुधारा और जनमत का सम्मान नहीं किया, तो उनके लिए आने वाला भविष्य और चुनौतीपूर्ण होगा। सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कीमत पर पाई गई सत्ता लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

क्या है दलबदल विरोधी कानून का लक्ष्मण रेखा
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू दलबदल विरोधी कानून मूल रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वार्थी पाला-बदल को रोकने के लिए बनाया गया था, जिसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में व्हिप (पार्टी निर्देश) के उल्लंघन में मतदान करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त की जा सकती है; हालांकि, इस कानून की सबसे बड़ी कानूनी खिड़की इसके ‘विभाजन और विलय’ संबंधी प्रावधानों में छिपी है, जिसके मुताबिक यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ मिलकर एक अलग गुट बनाते हैं और किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में अपने गुट का आधिकारिक रूप से विलय कर लेते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई लागू नहीं होती और उनकी सांसदी या विधायकी पूरी तरह सुरक्षित रहती है। जैसा कि हाल ही में टीएमसी के 20 सांसदों ने किया।

अब ममता भी कांग्रेस में जाने को तैयार; चाहिए राज्यसभा सीट

                                     सोनिया गाँधी और खरगे के साथ ममता बनर्जी (साभार: आज तक)
 शरद पवार कांग्रेस से अलग हुए सोनिया गाँधी को विदेशी महिला कहकर और ममता बनर्जी भी यही आरोप लगाकर कांग्रेस से अलग हुई। लेकिन आज दोनों ही उसी विदेशी महिला के चरणों में नतमस्तक। 
पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस(TMC) में लगातार भगदड़ मची हुई है। एक के बाद एक नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। इस बीच मीडिया में सूत्रों के हवाले से कई दिनों से खबरें चल रही हैं कि कांग्रेस पार्टी और सोनिया गाँधी ने ममता बनर्जी को अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने का प्रस्ताव दिया है। अब ABP न्यूज ने सूत्रों के हवाले से यह बताया है कि ममता बनर्जी सशर्त इस बात के लिए जारी हो गई हैं।

ABP न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया गाँधी की ओर से मिले ऑफर पर ममता बनर्जी तैयार हैं लेकिन उन्होंने अभिषेक बनर्जी के जरिए राहुल गाँधी के सामने कुछ शर्तें भी रखवाई हैं। बताया जा रहा है कि अभिषेक बनर्जी ने राहुल गाँधी के साथ मीटिंग में इस विषय पर बात की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस लीडरशिप के सामने TMC की तरफ से माँग रखी गई है कि ममता बनर्जी को राज्यसभा भेजा जाए और उन्हें राज्यसभा में नेता विपक्ष का पद भी दिया जाए। हालाँकि, इस पर कांग्रेस ने क्या कहा है यह बात अब तक सामने नहीं आई है।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से ही की थी और पार्टी में उन्होंने कई अहम पदों पर काम किया था। हालाँकि, पार्टी से मतभेदों के चलते वह 1998 में अलग हो गई थीं और बंगाल की राजनीति करने के लिए अलग TMC का गठन किया था। अब अगर वह वापस पार्टी में लौटती हैं तो फिर से इतिहास खुद को दोहरा सकता है।

TMC हो रही हवा-हवाई, ममता बनर्जी की करीबी सांसद सुष्मिता देव ने भी दिया इस्तीफा: असम मुख्यमंत्री से की मुलाकात

                मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव की मुलाकात (साभार : Indiatoday)
कहते है कि बुरे वक़्त में साया भी साथ छोड़ देता है। जिस तरह अखाड़े में दो पहलवानों की कुश्ती में एक हारता है और एक जीतता है ठीक उसी तरह चुनावों में उम्मीदवार बहुत होते हैं लेकिन जीतता सिर्फ एक ही है। लेकिन बंगाल का चुनाव तो एकदम अनोखा जान दिखाई पड़ता है जहाँ 
TMC के हारने पर पूरी पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह रही है। पार्टी छोड़ने वालों का यही सिलसिला जारी रहा तो शायद दो महीने से पहले ही ममता बनर्जी और उसकी पार्टी TMC इतिहास के गर्द में ऐसी दबेगी जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल होगा। जितनी दुर्दशा ममता और उसकी पार्टी TMC की हो रही है किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यही एक चुनाव ऐसा था जब चुनाव अभियान में ममता चोटिल होने का ड्रामा भी नहीं कर पायी। वरना हर चुनाव में हार सामने देख चोटिल होने का ड्रामा कर सहानुभूति वोट लेकर सत्ता में आ जाती थी। चोट भी ऐसी जो वोटिंग होते ही ठीक जो जाती थी। 

जितना तानाशाह का आतंक ममता के मुख्यमंत्री रहते बंगाल में देखने को मिला शायद ही भारत के इतिहास में ऐसा हुआ हो। INDI गठबंधन के शामिल किसी भी पार्टी में ममता के अत्याचारों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर सकी। किसी INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाली ममता उसी INDI गठबंधन की चौखट पर माथा टेक रही है। घुसपैठियों को दामाद की तरह पाला-पोसा जा रहा था और ममता की सत्ता जाते ही वो भी बंगाल छोड़ भागने शुरू हो गए। वैसे जितनी भी पार्टियां हैं बंगाल चुनाव से सीखते हुए घुसपैठियों को पालना बंद करे। जिन रोहिंग्यों को कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं तुम उनको दामाद बना संरक्षण दे रहे हो। उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनवा रहे हो।     

पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की पार्टी TMC बिखरने लगी है। बुधवार (10 जून) को ममता की बेहद करीबी राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुखेंदु शेखर के बाद इस्तीफा देने वाली वह दूसरी बड़ी नेता हैं।

इस्तीफे के बाद सांसद सुष्मिता देव ने असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से मुलाकात की है। इससे पहले TMC के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बागी रुख अपनाया था और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था माँगी थी। यह गुट बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दे सकता है।

पार्टी के अंदर मचे इस घमासान से ममता बनर्जी अब बिल्कुल अकेली पड़ती जा रही हैं। इससे पहले TMC के विधायक दल भी दोफाड़ हो चुका है। बागी गुट का नेतृत्व कर रही सांसद काकोली घोष के साथ फिलहाल 14 सांसदों के नाम साफ हो चुके हैं।

इनमें शताब्दी रॉय, सुपरस्टार देव (दीपक अधिकारी) और जून मालिया जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। सुष्मिता देव के इस्तीफे की असली वजह अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इसे TMC के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

बंगाल : TMC की काली करतूतों पर भड़की जनता बना रही नेताओं को निशाना, सड़क से लेकर कोर्ट तक कर रही पिटाई

                बंगाल में TMC नेता साड़ियों के ढेर में छिपा(बाएँ), TMC नेता के घर में मिला तिरपाल का ढेर(दाएँ)
60 के दशक में गायक मौहम्मद रफ़ी का बहुचर्चित गीत "रात भर का है मेहमां अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा....." है, सनातन विरोधियों को इस गीत को जरूर सुनना ही सबको सुनाना भी चाहिए। पीछे एक ब्लॉग में लिखा था कि बंगाल विधानसभा चुनाव सिर्फ चुनाव ही बल्कि भारतीय राजनीति का नया सवेरा है, जिसे सियासतखोरों ने सियासत नाम दे दिया। अपनी आने वाली भावी पीढ़ियों के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण कर जो तिजोरियों भर रहे हो, देख लो बंगाल में क्या हो रहा है? अत्याचार की भी एक सीमा होती है और जब टूटती है कोई नहीं बचता। 

बहुत जल्दी ममता बनर्जी और इसकी पार्टी अत्याचारों के ढेर में दब जाएगी। बंगाल में सनातन पर हमलों की पराकाष्ठा हो चुकी थी। घुसपैठियों को दामाद बनाकर पाला जा रहा था। वो भी भाग रहे हैं। हैरानी तो उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं पर होती है जो समाजवादी पार्टी को वोट देते हैं। समाजवादी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का ही दूसरा नाम है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 11 बजे के बाद खासकर अगर होली वाले दिन शुक्रवार है होली खेलने पर पाबन्दी थी। 84 कोसी परिक्रमा पर अड़चने डाली जाती थी। जबसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आयी है ये सब अड़चनें समाप्त हो गयी। फिर भी पता नहीं क्यों हिन्दू समाजवादी पार्टी को वोट देता है?       

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) का ‘जंगलराज’ सामने आ रहा है। TMC के काले कारनामे सामने आने के बाद जनता का गुस्सा भी फूट रहा है। ऐसा गुस्सा कि कहीं TMC नेता पर अंडे फेंके जा रहे हैं, तो कहीं जनता के गुस्से से बचने के लिए नेता साड़ियों के ढेर में छिपे हुए हैं।

एक मामले में उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी में TMC विधायक मदन मित्रा की कार को घेरकर लोगों ने अंडे और ईंटे फेंकी गई। ऐसे ही कोलकाता नगर निगम में पार्षद बप्पादित्य दासगुप्ता पर कोर्ट में पेशी के दौरान अंडे फेंके गए। दासगुप्ता को जबरन वसूली के आरोप में शनिवार (06 जून 2026) को गिरफ्तार किया गया था।

एक अन्य मामले में हावड़ा जिले के TMC नेता ब्रह्मानंद चक्रवर्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह साड़ियों के ढेर के भीतर छिपे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, चक्रवर्ती पर सरकारी योजना के नाम पर लोगों से कटमनी लेने के आरोप हैं। पुलिस के डर से वह साड़ियों के ढेर में छिप गए। हालाँकि, इसके बावजूद पुलिस चक्रवर्ती को ढूँढकर अपने साथ गिरफ्तार करके ले गई।

उधर, TMC नेता के बंद घर का ताला तोड़कर स्थानीय लोगों ने जमा करके रखे गए लगभग 50 हजार तिरपाल बरामद किए। यह सरकारी राहत सामग्री जनता को पहुँचानी थी, लेकिन TMC नेताओं ने अपनी संपत्ति समझकर रखी हुई थी। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक घर में फर्श से छत तक केवल तिरपाल के ढेर नजर आ रहे हैं। बताया गया कि यह बंद घर TMC नेता राजू बाग और उनके भाई बीजू बाग का है। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से ही दोनों भाई फरार चल रहे हैं।

यह कोई गिनी-चुनी घटनाएँ नहीं हैं। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं। जहाँ कटमनी का पैसा खाकर बैठे TMC नेता कहीं बिस्तर के नीचे छिपे पाए गए, तो कहीं लोगों ने गुस्से में आकर TMC नेता के करीबी को ही कूट दिया। इसके अलावा TMC नेता पर रिश्वत और जमाखोरी के मामलों में भी लगातार शिकंजा कसा जा रहा है।

बंगाल में TMC नेता के घर मिले 626 कारतूस-पिस्टल, ममता के गुंडों को पुलिस ने दबोचा: 1.07 रूपए करोड़ कैश भी बरामद

       TMC नेता ने खेत में दबा रखे थे ₹500 के नोटों से भरे बोरे, तृणमूल जिला परिषद सदस्य के घर से कैश बरामद
पश्चिम बंगाल में ममता के गुंडों और भ्रष्ट नेताओं का आतंक इस कदर बढ़ चुका है कि अब उनके घर शरीफों के रहने लायक नहीं, बल्कि बारूद के ढेर और अवैध संपत्तियों के गोदाम बन चुके हैं। TMC नेताओं के काले कारनामों का एक और खौफनाक सच सामने आया है। पुलिस ने भारी छापेमारी कर जिला परिषद के रसूखदार TMC नेता अजीत साहा और बडुरिया नगर पालिका के चेयरमैन दीपांकर भट्टाचार्य को दबोच लिया है।

शुभेंदु सरकार लगातार अपराधियों पर नकेल कसने का काम कर रही है। इसी कड़ी में तृणमूल कांग्रेस(TMC) के नेताओं के ठिकानों पर अकूत संपत्ति और नकदी मिलने का सिलसिला जारी है। किसी नेता के घर में मोटी रकम पकड़ी गई है तो किसी के फार्म हाउस से बोरों में भरा कैश बरामद किया गया है।

इनके पास से जो मिला, उसे देखकर पूरा बंगाल दहल गया है। TMC नेता अजीत साहा के घर जब पुलिस ने धावा बोला, तो वहाँ का नजारा किसी खूंखार अपराधी के ठिकाने जैसा था। घर के कोने-कोने से 27 लाख रुपए की गद्दी, 1 पिस्टल, 1 एयरगन और भारी मात्रा में 626 जिंदा कारतूस बरामद हुए हैं।

इतना ही नहीं, गुंडागर्दी और अय्याशी के सबूत के तौर पर 52 बोतल विदेशी शराब भी जब्त की गई है। यह वही साहा बंधु हैं जिन पर पहले भी हिंसा और जबरन वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं। दूसरी तरफ, ममता के एक और खास नेता दीपांकर भट्टाचार्य के पास से 80 लाख रुपए कैश मिले।

और तो और, TMC दफ्तर के पास जूट के खेत को खोदकर नोटों से भरे बैग और बोरे निकाले गए। इन नेताओं ने बंगाल को पूरी तरह लूट और आतंक का केंद्र बना दिया है। 

खेत में दबा रखे थे 500 रूपए के नोटों से भरे बोरे, खोला तो निकले 2.2 करोड़ रुपए… छापेमारी के बाद गिरफ्तार

TMC नेता और बदुरिया नगर निगम के चेयरमैन दीपांकर भट्टाचार्य की अकूत संपत्ति का खुलासा हुआ है। बुधवार (28 मई 2026) को पुलिस ने उनके खेत की खुदाई में 500 रूपए के नोटों से भरे बोरे और ट्रॉली बैग बरामद किए। तस्वीर सामने आई जिसमें पुलिस कंधों पर इन बोरों को ढोकर अपने वाहन में रख रही है। पुलिस ने बताया कि इसकी कीमत लगभग 2 करोड़ 24 लाख रूपए है। इसके अलावा बोरों में कुछ जरूरी दस्तावेज भी मिले हैं।

पुलिस को यह कामयाबी उनकी गिरफ्तारी के बाद हासिल हुई। पुलिस ने मंगलवार (26 मई 2026) को भट्टाचार्य को 80 लाख रूपए नकदी और 4000 तिरपाल के साथ उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने बताया कि इस रकम और सामान सरकारी था जो राहत के लिए लोगों में बाँटा जाना था। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने TMC नेता को कोर्ट में पेश कर 6 दिन की रिमांड पर लिया।

TMC नेता भट्टाचार्य से पूछताछ में पुलिस को इस खेत की जानकारी मिली। तभी पुलिस अपने साथ भट्टाचार्य को खेत में ले आई, जहाँ जमीन के नीचे कैश से बरे बोरे बरामद किए गए। इसके अलावा पुलिस ने आसपास के खेतों में भी ड्रोन से तलाशी ली। इसके बाद पुलिस ने भट्टाचार्य के पीए शमीम गाजी को भी गिरफ्तार कर लिया।

उत्तर 24 परगना से TMC नेता और उसके भाई के घर से मोटी रकम मिली

इससे पहले उत्तर 24 परगना के मछलंदपुर में पुलिस ने राशन घोटाले के आरोप में जेल में बंद TMC सरकार में खाद्य मंत्री रहे ज्योतिप्रिय मल्लिक के करीबी TMC जिला परिषद सदस्य अजीत साहा के घर मंगलवार (26 मई 2026) को छापेमारी की। यहाँ पुलिस को 27,80,200 रूपए नकदी, 666 जिंदा कारतूस, 61 खाली कारतूस, एक एयर गन, छर्रों का डिब्बा, एक स्पोर्ट्स शूटिंग राइफल और विदेशी शराब की 52 बोतलें भी पुलिस ने जब्त की। पुलिस ने अजीत साहा और उनके भाई सुजीत उर्फ सुबीर साहा को भी गिरफ्तार किया।

‘मैं नहीं मानती ये गंदा धर्म’: सनातन विरोधी टिप्पणी के लिए ममता बनर्जी पर 1 साल बाद हुई FIR, TMC नेता बोले- हम भी बयान के खिलाफ थे

    
क्या ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस इतिहास बनने के कगार पर पहुँच गयी है? जिस कुर्सी की खातिर "श्रीराम" नाम से, सनातन से चिढ़ती थी, वही इनको और इनकी पार्टी को इतिहास बना रहा है। कल जिस मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने सनातन और हिन्दुओं पर हमले करवाए आज वही मुस्लिम समाज भी इन्हे नहीं पूछ रहा। अगर वर्तमान मुख्यमंत्री सुभेंदु इसी तरह काम करते रहे बंगाल में कोई ममता या INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाला । कई साल हिन्दुओं ने हिन्दू विरोधी सरकारों के अत्याचार सहे हैं। चुनावों में उन्हें वोट तक नहीं डालने दिया जाता था जिस वजह से हिन्दू विरोधी सरकारें सत्ता में आती रहती थीं। फिलिस्तीन में इजराइल के हमलों पर तो INDI गठबंधन के हर नेता की जुबान खुलती थी लेकिन बंगाल में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों पर बोलने पर सबको सांप सूंघ जाता था। 




इफ्तार पार्टी हो या फिर नमाज के दौरान मुस्लिम महिलाओं की तरह ममता हिजाब धारण करने पर इनके हिन्दू ब्राह्मण होने पर सन्देह होता है, जिसका खुलासा कोई खोजी पत्रकार या ममता की ही पार्टी कर सकती है। 

श्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सिलीगुड़ी साइबर थाने में एक FIR दर्ज की गई है। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2025 में कोलकाता में आयोजित ईद कार्यक्रम के दौरान सनातन धर्म को ‘गंदा धर्म’ बताया था।

एफआईआर दर्ज होने के बाद से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वीडियो में उन्हें विवादित टिप्पणी करते सुन सकते हैं। वो कहती सुनाई पड़ रही हैं- “हम जानबूझकर एक गंदा धर्म, जिसे जुमला पार्टी ने बनाया, हम उसे नहीं मानते हैं।”

यह शिकायत वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इस बयान से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कुछ नेता पहले भी हिंदू धर्म को लेकर विवादित बयान देते रहे हैं।

रिंकी चटर्जी सिंह ने दावा किया कि उन्होंने 2025 में भी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई और उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।

वहीं, तृणमूल कॉन्ग्रेस के दार्जिलिंग यूनिट के महासचिव और वकील अत्री शर्मा ने भी बयान को अनुचित बताया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। 

बंगाल : पुलिस निकाल रही गुंडों की परेड; किसी को उठाया कच्छे में, किसी को अय्याशी करते हुए दबोचा: 1 हफ्ते में 70+ TMC नेता-कार्यकर्ता गिरफ्तार

                                   TMC नेताओं पर एक्शन जारी ( फोटो साभार-chatgpt)
पश्चिम बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कसी जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बांग्लादेशियों को बाहर निकाल रही है, वहीं ‘तोलाबाजी’ यानी सिंडिकेट, चुनाव बाद हिंसा और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान चला रही है। बीते एक हफ्ते में 70 से ज्यादा टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।

कोई बनियान-कच्छे में तो कोई लुंगी पहने हुआ गिरफ्तार

अपराधियों को हर हाल में गिरफ्तार करने के आदेश हैं। यही वजह है कि कई ऐसी तस्वीरें सामने आई जब इन लोगों को अचानक घरों, अड्डों और शराब के ठेकों से उठाया गया और सड़कों पर घुमाया गया। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बंगाल में अराजकता फैला दी थी और जनता दहशत में जीने के लिए मजबूर थी।

बंगाल पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया था। वह हावड़ा के डॉन कहलाता था। आकाश सिंह पर 2021 में पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने और 20 से ज्यादा बम फेंकने का आरोप है। एक कड़ा संदेश देने के लिए उसे हावड़ा की सड़कों पर सिर्फ अंडरवियर में घुमाया गया।

इसके बाद 25 मई 2026 को टीएमसी के गुंडे और कुख्यात सनी मोल्ला को पुलिस ने गिरफ्तार कर सड़कों पर बनियान-पैजामा में घुमाया। स्थानीय लोगों के अनुसार, सनी मोल्ला TMC से जुड़ा एक संविदा आधारित होम गार्ड था और लंबे समय से संकराइल और आसपास के इलाकों में रंगदारी और दबंगई का नेटवर्क चला रहा था। वह व्यापारियों, छोटे दुकानदारों से रंगदारी वसूलता था। विरोध करने पर धमकी देता, मारपीट करता और कारोबार बंद कराने की चेतावनी देता था। इलाके में लोग उसे ‘छोटा डॉन’ कहकर बुलाते हैं।

टीएमसी से जुड़ा और ‘बड़े भाई’ कहलाने वाले शमीम अहमद को भी पश्चिम बंगाल पुलिस ने बनियान- ऑफ पेंट में सड़कों पर घुमाया। दरअसल ये वह व्यक्ति है, जिस पर शिबपुर में इस्लामी हिंसा भड़काने, सड़कों पर बमबारी करने और BJP समर्थकों पर गोली चलाने के आरोप है।

जलपाईगुड़ी जिले में टीएमसी नेता पंचानन रॉय को एक कार में शराब पीते हुए पकड़ा गया था। वह स्थानीय पंचायत समिति के अध्यक्ष हैं और शराब पार्टी करते हुए गिरफ्तार किया गया। टीएमसी पार्षद मोनी गाजी को भी पुलिस रेड के दौरान शराब की बोतलों और आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। उस पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है।

 ऐसे अपराधी शुभेंदु शासन के आते ही छिपने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि इनलोगों को बनियान कच्छा शॉर्ट पैंट में ही पुलिस उठा कर ले गई। इनलोगों को सड़कों पर घुमा भी रही है, ताकि लोगों के मन में उनका भय खत्म हो सके, जो पिछले 15 सालों से व्याप्त है। सरकार ‘नो नोटिस एक्शन’ वाली छवि बना रही है। अपराधियों को देर रात छापेमारी कर भी गिरफ्तार किया जा रहा है। कई जिलों में लगातार तलाशी के बाद कई लोगों को दबोचा गया, ताकि लोगों को संदेश मिले कि ‘भागने पर भी बचना मुश्किल’ है।

बीते 18 मई से करीब एक हफ्ते में राज्य में भ्रष्टाचार वसूली और चुनाव बाद हिंसा को लेकर टीएमसी के 70 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पूर्व मंत्री सुजीत बसु भी शामिल हैं। वहीं पूर्व मंत्री के करीबी बंगाल के बिधाननगर नगर निगम के 34 नंबर वार्ड के टीएमसी पार्षद और बोरो चेयरमैन रंजन पोद्दार को बिधाननगर उत्तर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ तोलाबाजी यानी जबरन वसूली करने और लोगों को डराने-धमकाने का आरोप है।

बीते 23 मई 2026 को एक दिन में राज्यभर में 17 टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें कोलकाता और बिधाननगर के कई पार्षद शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बड़ंचा में दबंग तृणमूल नेता अबु बक्कर को हत्या के प्रयास और हथियार से हमला करने के आरोप में पकड़ा गया।

कोलकाता नगर निगम के पार्षद सुदीप पोल्ले और बिधाननगर के पार्षद बरुआ को तोलाबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हावड़ा से 2021 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोपित उपग्राम प्रधान गुरुपद माझी और उसके भाई राजू माझी को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा हुगली, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर कूचबिहार तक के टीएमसी गुंडों को पुलिस ने पकड़ा।

उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक पार्षद को घर के अंदर सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बनगांव नगर पालिका के वार्ड नंबर 22 से TMC पार्षद सुकुमार राय को पुलिस कॉलर पकड़कर थाने ले गई।

पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में शेख कमरुद्दीन को चुनावी आतंक, भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं कूच बिहार से भवरंजन बर्मन को बीजेपी कार्यकर्ता को पीटने और पैसे माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बीजेपी नेता पप्पू साना पर हमले और शुभेंदु अधिकारी के पीएम रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पुलिस ने कई इलाकों में लगातार छापेमारी की है और कई लोगों को हिरासत में लिया।

टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुल्मों से त्रस्त जनता की प्रतिक्रिया भी इस दौरान सामने आई। जब कोलकाता के युवा टीएमसी अध्यक्ष तपन बिस्वास और उसके साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उसे लोगों ने थप्पड़ मारे। कुछ ऐसा ही हाल हावड़ा से गिरफ्तार श्यामला मित्रा का हुआ। उसे भी लोगों ने पीटा।

दक्षिण 24 परगना से जब TMC नेता अरित्रा बोस को गिरफ्तार किए जाने के बाद महिलाएँ उसे पीटने के लिए चप्पल- झाड़ू लेकर दौड़ी। जब पुलिस उसे वैन में बैठाकर ले जा रही थी, तब झाड़ू, चप्पल और पानी की बोतलें पुलिस वैन पर फेंकने लगी। संदेशखाली में ईडी टीम पर हमले को लेकर गिरफ्तार टीएमसी नेता शाहजहाँ की मदद करने वाली दो महिला नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। इन पर शाहजहाँ को बचाने के लिए भीड़ जमा कर हिंसा भड़काने का आरोप है।

घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान

अवैध घुसपैठ और बॉर्डर नेटवर्क पर भी कार्रवाई तेज हुई है। बंगाल सरकार ने ‘होल्डिंग सेंटर’ शुरू किए हैं और पुलिस-आरपीएफ-बीएसएफ के समन्वय से संदिग्ध घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है।

हाल ही में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मंगलवार सुबह (26 मई 2026) को बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तरी 24 परगना के हाकिमपुर चेक पोस्ट पर जमा किया गया।

हाल ही में सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि बगैर दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों की पहचान कर उसे पुलिस के हवाले करें, ताकि जनता से इनलोगों को अलग किया जा सके और देश से निकाला जा सके।

बीजेपी सरकार का पूरा अभियान ये दिखाता है कि अपराधियों और घुसपैठियों को अब ‘पहले जैसा संरक्षण’ नहीं दिया जाएगा। अपराधियों का जेल भेजा जाएगा और घुसपैठियों को ‘देश निकाला’ मिलेगा। चाहे ये लोग कहीं भी छिप जाएँ, पुलिस उन्हें ढूंढ निकालेगी और हर हाल में सलाखों के पीछे भेजेगी। इसलिए अपराधी कहीं जंगल में छिपे मिल रहे हैं तो कहीं घरों में छिप कर शराब पीते।

बंगाल : TMC के गुंडों से राधा गोविंद मंदिर मुक्त, कब्जा कर बना लिया था पार्टी कार्यालय, BJP आई तो फिर शुरू हुई पूजा-अर्चना


पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आते ही बीरभूम जिले के रामपुरहाट स्थित श्री श्री राधा गोविंद मंदिर के भोगघर से तृणमूल कांग्रेस (TMC)  का कब्जा हटा दिया गया है। BJP कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की मदद से वहाँ चल रहा पार्टी कार्यालय बंद कराया गया और जगह को दोबारा मंदिर समिति को सौंप दिया गया है।

कब्जा हटने के बाद परिसर में फिर से पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो गए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1990 में इलाके के लोगों ने चंदा जुटाकर की थी। मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। बाद में मंदिर के पास भोगघर का निर्माण शुरू किया गया था।

आरोप है कि TMC के कुछ कार्यकर्ताओं ने निर्माण कार्य रुकवाकर उस जगह पर कब्जा कर लिया और वहाँ पार्टी कार्यालय खोल दिया। इस घटना को लेकर इलाके में लंबे समय से नाराजगी बनी हुई थी। श्रद्धालुओं और मंदिर समिति का कहना था कि धार्मिक स्थल का उपयोग राजनीतिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। अब कब्जा हटने और मंदिर को उसकी पुरानी पहचान वापस मिलने के बाद स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है।

बंगाल : सत्ता बदलते ही 1600 करोड़ रूपए का घोटालेबाज़ महफूज आलम कानपुर भागा : उत्तर प्रदेश पुलिस ने दबोचा

                   1600 करोड़ के फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड महफूज आलम गिरफ्तार (साभार: इंडिया टूडे)
तृणमूल कांग्रेस(TMC) के संरक्षण में बंगाल के कोलकाता में छिपे 1600 करोड़ रुपए के हवाला कारोबार के सरगना महफूज आलम उर्फ पप्पू छुरी को कानपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। 24 लाख रुपए की लूट की जाँच के दौरान जिस बड़े हवाला नेटवर्क का खुलासा हुआ था।

महफूज ने गरीब और जरूरतमंद लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी बैंक खातों का विशाल जाल खड़ा किया और उन्हीं खातों के जरिए करोड़ों रुपए के अवैध लेनदेन को अंजाम दिया। पुलिस जाँच में अब तक करीब 1600 करोड़ रुपए के संदिग्ध ट्रांजेक्शन के सीधे प्रमाण मिले हैं, जबकि कुल लेनदेन 3200 करोड़ रुपए से अधिक बताया जा रहा है।

गरीबों के दस्तावेजों से खुलते थे फर्जी खाते

पुलिस जाँच में सामने आया है कि महफूज मजदूरों, रिक्शा चालकों, ठेला लगाने वालों और बेरोजगार युवकों को लोन दिलाने या आर्थिक मदद का झाँसा देकर उनके आधार, पैन और अन्य दस्तावेज जुटाता था। इसके बाद अलग-अलग बैंकों में उनके नाम पर खाते खुलवाए जाते थे।

पुलिस का दावा है कि इस पूरे नेटवर्क में कुछ बैंक कर्मचारियों की भी मिलीभगत थी, जिनकी मदद से करोड़ों रुपए का लेनदेन बिना शक के चलता रहा। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, आरोपित ने 16 बैंकों में 100 से ज्यादा खातों का इस्तेमाल किया।

आरती इंटरप्राइजेज और राजा इंटरप्राइजेज जैसी कई फर्जी कंपनियों के जरिए हवाला कारोबार संचालित किया गया। पुलिस को इस नेटवर्क के तार GST फ्रॉड और स्लॉटर हाउस से जुड़े आर्थिक अपराधों से भी जुड़े मिले हैं।

ससुराल बना ‘सेफ हाउस’, TMC के संरक्षण में था आरोपित, सत्ता बदलते धराया

पुलिस के अनुसार, महफूज लंबे समय से फरार चल रहा था और कोलकाता में अपनी ससुराल में छिपा हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उसे वहाँ कुछ TMC नेताओं का संरक्षण भी मिला हुआ था, जिसकी वजह से वह लगातार गिरफ्तारी से बचता रहा। कानपुर पुलिस उसकी लोकेशन ट्रैक करने के लिए कोलकाता पुलिस के संपर्क में भी थी।

पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलने और गिरफ्तारी का खतरा बढ़ने के बाद महफूज ने कानपुर लौटने का फैसला किया। पुलिस पहले ही उसकी गतिविधियों पर नजर रखे हुए थी और शहर पहुँचते ही उसे गिरफ्तार कर लिया। एसीपी अभिषेक पांडे के मुताबिक, पता लगाया जा रहा है कि फरारी के दौरान वह किन लोगों के संपर्क में था और किन-किन ठिकानों पर छिपा रहा।

ED, RBI और आयकर विभाग भी जाँच में जुटे

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब कई केंद्रीय एजेंसियाँ भी जाँच में शामिल हो गई हैं। पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED), आयकर विभाग और RBI पूरे नेटवर्क की वित्तीय जाँच कर रहे हैं। पुलिस अब इस एंगल से भी जाँच कर रही है कि कहीं हवाला के जरिए टेरर फंडिंग या अन्य संगठित अपराधों को पैसा तो नहीं पहुँचाया गया।

इस मामले में महफूज के बेटे मासूम और साले महताब आलम को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। वहीं उसकी बीवी समेत नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश जारी है। पुलिस के मुताबिक, अब तक आरोपित के खिलाफ पाँच गंभीर मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं और आने वाले दिनों में इस घोटाले में कई और बड़े नाम सामने आ सकते हैं।