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टीएमसी के बाद अब INDI गठबंधन में भी टूट, उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ और समाजवादी पार्टी में भी टूट


जो काम मोदी सरकार-3 को 400 सांसद होने पर करना था वही काम होने जा रहा है 240 सांसदों के होते। As you sow you will reap यानि हिन्दी में जो बोया वही काटो यानि कांग्रेस ने जो बोया वही आज INDI गठबंधन को काटना पड़ रहा है। इतिहास में झाँकने पर मालूम होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर बीजेपी तत्कालीन भारतीय जनसंघ तक जितनी भी पार्टियां है सभी कांग्रेस से निकली है। जनसंघ वर्तमान बीजेपी जैसी पार्टियां तो अपना अस्तित्व बनाने में सफल रही और कुछ सिर्फ क्षेत्रीय पार्टी। 
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सत्ताधारी महागठबंधन में शामिल दलों की एकजुटता की चूलें हिलाकर रख दी हैं संसद के उच्च सदन की दूसरी सीट पर प्रियंका गांधी के करीबी कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की करारी शिकस्त के बाद सत्ताधारी महागठबंधन यानी INDI ब्लॉक की दीवारें पूरी तरह दरकती दिख रहीं हैं इस चुनावी मुकाबले ने गठबंधन के भीतर चल रहे अविश्वास का एक ऐसा ‘एनकाउंटर’ किया है, जिसके जख्म के निशान अब मुख्यमंत्री आवास की दीवारों पर नजर आ रहे हैं चुनाव के इस लिटमस टेस्ट में बुरी तरह जख्मी नजर आ रही कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल(RJD) और वामपंथी दल माले(CPI-ML) पर खुलेआम क्रॉस वोटिंग और भितरघात का आरोप मढ़ा है वहीं राजद ने भी अब पलटवार करते हुए कांग्रेस को ही असली ‘गद्दार’ बता दिया है और उसे गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की मांग तेज कर दी है
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार बैजनाथ मिश्रा का मानना है कि यह चुनाव परिणाम महज एक सीट की हार नहीं, बल्कि महागठबंधन के भीतर आपसी भरोसे का पूरी तरह अंत है ऐसे में चुनाव के बाद घायल अवस्था में पड़ी कांग्रेस के नेता जहां तल्ख तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं राजद भी पूरी तरह आक्रामक है राजद के राष्ट्रीय महासचिव भोला प्रसाद यादव ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी खुद की अंदरूनी कलह और कमजोरी को छिपाने के लिए सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ रही है उन्होंने कहा कि जो दल अपने विधायकों को संभाल नहीं सकता, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है
खैर, जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक कांग्रेस ने जितनी पार्टियों में टूट और विधान सभाओं को भंग किया ऐसा कभी नहीं हुआ। आज अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी वही काम कर रही है क्योकि बीजेपी को पास कराना है महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को पारित करवाना जिसके लिए जरुरत है संसद में दो-तिहाई बहुमत। 
पार्टी छोड़कर आने वाले किसी भी विधायक से लेकर सांसद तक किसी को बीजेपी अपनी पार्टी में शामिल करने की बजाए अपनी सहयोगी पार्टियों की तरफ हस्तांतरण किया जा रहा है।    
देश में विपक्ष की सियासत इस समय दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन के एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर राज्यों के सियासी गलियारों तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची भगदड़ ने भारतीय दलबदल विरोधी कानून की गलियों और राजनीतिक शुचिता के दावों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के दूसरी छोटी पार्टी में विलय के बाद अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 सांसदों की बगावत सुर्खियों में है। इसको लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत तो गालीगलौज तक पर उतर आए हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुनबे में टूट की सुगबुगाहट आ रही है। ये महज छिटपुट सियासी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे एक गहरे ढांचागत बदलाव का संकेत हैं। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि मजबूत दिखाई देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले भी अब अंदरूनी अंतर्विरोधों और एनडीए की राष्ट्रवादी राजनीति के आकर्षण के कारण ढह रहे हैं।

ममता के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी सांसदों का विलय
इस पूरे राजनीतिक भूचाल की शुरुआत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से हुई, जहां भाजपा ने टीएमसी को रोंदकर सरकार बनाई। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

उद्धव गुट को एक और झटका: शिवसेना की बगावत
दूसरी ओर महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा और अब लोकसभा स्तर पर पार्टी को एक और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। पार्टी के छह प्रमुख सांसदों, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना के बागी रुख ने उद्धव ठाकरे खेमे की रीढ़ तोड़ दी है। इस टूट ने पार्टी नेतृत्व की उस संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके लिए कभी बाल ठाकरे की शिवसेना जानी जाती थी।

हताशा से भरे सांसद संजय राउत गाली गलौज पर उतरे
शिवसेना उद्धव गुट के इन सांसदों के गुट ने अभी किस पार्टी में विलय किया है, यह तो साफ नहीं हुआ है, लेकिन इस बिखराव की तल्खी तब खुलकर सामने आ गई जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना आपा खो बैठे। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज पर उतर आए। राउत का यह गुस्सा और तीखे आरोप दरअसल उस लाचारी और हताशा को दर्शाते हैं, जो एक समय महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र रहे दल के भीतर अपनी जमीन खिसकने के कारण पैदा हुई है। गाली-गलौज की यह राजनीति बताती है कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

समाजवादी पार्टी पर भी मंडरा रहे हैं बड़ी टूट के बादल
संसद के इस दलबदल चक्र की तपिश अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के इस सनसनीखेज दावे ने यूपी की सियासत में खलबली मचा दी है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 26 सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं और उनके भीतर गहरी फूट पड़ चुकी है। राजनीति में इस तरह के दावों को अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है। समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में चार सांसद हैं। ऐसे में 25 सांसदों के टूटने की खबरों से पार्टी में हड़कंप की स्थिति बन गई है और सांसदों को रोकने के रणनीति बनाई जा रही है।

‘सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस चर्चा को हवा दे दी है। मौर्य का यह कहना कि’सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’, दरअसल सपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है। यह बयान दिखाता है कि सत्ता पक्ष विपक्ष के किलों में लगी दरारों को भांप चुका है और केवल सही वक्त का इंतजार कर रहा है। अखिलेश यादव के लिए अपने इस बड़े कुनबे को एकजुट रखना आने वाले दिनों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कमजोर पड़ता क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व और केंद्रीय सत्ता का आकर्षण
इन तीनों राज्यों के घटनाक्रमों को अगर एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के क्षेत्रीय दल इस समय एक बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। जब तक ये दल सत्ता में रहते हैं या मजबूत दिखते हैं, तब तक इनका अंतर्विरोध दबा रहता है। लेकिन जैसे ही चुनावी हार या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, वैसे ही सांसदों और विधायकों का मोहभंग होने लगता है। टीएमसी, शिवसेना और सपा जैसी पार्टियों का ढांचा अक्सर एक ही परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। ऐसे में जब जमीनी स्तर पर नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो महत्वाकांक्षी नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगने लगता है। केंद्रीय सत्ता का संरक्षण और उसके साथ मिलने वाले लाभ इन सांसदों को अपनी मूल पार्टी की विचारधारा को छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल आत्ममंथन करें कि ऐसी नौबत क्यों आई
संजय राउत के बयानों और विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह भी साफ है कि विपक्ष की राजनीति में अब गरिमापूर्ण संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है। जब कोई नेता या सांसदों का समूह पार्टी छोड़ता है, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई। इसके विपरीत, बागी नेताओं को गद्दार घोषित करना, उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और व्यक्तिगत कीचड़ उछालना अब एक आम चलन बन गया है। यह रवैया राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति और दलबदल की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उसे निजी दुश्मनी और गाली-गलौज के स्तर पर ले जाना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।

दलों ने आंतरिक लोकतंत्र नहीं सुधारा तो भविष्य और चुनौतीपूर्ण
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का यह खेल उस आम मतदाता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो किसी पार्टी की विचारधारा, उसके घोषणापत्र और उसके नेता का चेहरा देखकर अपना वोट देता है। जब चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ या दबाव में आकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाता है, तो जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था कम होने लगती है। टीएमसी, शिवसेना और संभावित रूप से सपा के भीतर चल रहा यह घटनाक्रम यह चेतावनी है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी अंदरूनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं सुधारा और जनमत का सम्मान नहीं किया, तो उनके लिए आने वाला भविष्य और चुनौतीपूर्ण होगा। सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कीमत पर पाई गई सत्ता लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

क्या है दलबदल विरोधी कानून का लक्ष्मण रेखा
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू दलबदल विरोधी कानून मूल रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वार्थी पाला-बदल को रोकने के लिए बनाया गया था, जिसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में व्हिप (पार्टी निर्देश) के उल्लंघन में मतदान करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त की जा सकती है; हालांकि, इस कानून की सबसे बड़ी कानूनी खिड़की इसके ‘विभाजन और विलय’ संबंधी प्रावधानों में छिपी है, जिसके मुताबिक यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ मिलकर एक अलग गुट बनाते हैं और किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में अपने गुट का आधिकारिक रूप से विलय कर लेते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई लागू नहीं होती और उनकी सांसदी या विधायकी पूरी तरह सुरक्षित रहती है। जैसा कि हाल ही में टीएमसी के 20 सांसदों ने किया।

समाजवादी पार्टी के PDA मतलब Parivar Development Authority यानि अखिलेश यादव की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी!


कहते हैं "आसमान पर तारे बहुत हैं लेकिन तोड़ने के लिए अक्ल चाहिए" समाजवादी पार्टी वही कर रही है। PDA का नाम देकर खूब जनता को पागल बनाया जा रहा है और जनता बन रही है। PDA का मतलब बताया जाता है "पिछड़ा", "दलित" और "अल्पसंख्यक", जबकि इन लोगों का उद्धार यानि भला करने की बजाए अपने ही परिवार का भला किया। उनकी भावी पीढ़ियों तक के ऐश से रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम कर दिया गया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, जनता देख ले खुली आंख से। फिर भी जनता अंधी बन समाजवादी पार्टी को वोट देती है तो उससे बड़ा अँधा कोई नहीं। 
हिन्दुओं को जातियों में बांट जातिगत आधारित कई पार्टियां बन गयी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह भला इन पार्टियों के मुखियाओं के परिवारों का हुआ है और हो भी रहा है। हिन्दू है कि इनके मकड़जाल में फंस वोट दे देता है जबकि मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट होकर बीजेपी को हराने वाली पार्टी को वोट देता है। समझदार कौन हिन्दू या मुसलमान?   

           

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर यह बहस सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में लंबे समय से सैफई परिवार की निर्णायक भूमिका रही है। समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में समाजवादी विचारधारा और आम कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे लाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ पार्टी की कमान एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। आलोचकों का आरोप रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसदों और महत्वपूर्ण चुनावी सीटों तक पर सैफई परिवार का प्रभाव दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह यादव परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रही है।

परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे
मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह राजनीतिक वर्चस्व आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी जारी है। यादव परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे, कई मंत्री बने और पार्टी के संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस कदर हावी रहा है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश, डिंपल, धर्मेंद्र, अक्षय, आदित्य और तेज प्रताप यादव तक पार्टी की हर सुरक्षित और वीआईपी सीट परिवार के भीतर ही घूमती रहती है। समाजवादी सोच के आधार पर बनी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का यह हाल है कि साढ़े तीन दशक के बाद भी पार्टी अध्यक्ष मुलायम परिवार के अलावा कोई नहीं बन पाया है।

पांच भाईयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह थे सबसे तेज
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के बाबा का नाम मेवाराम था। मेवाराम के दो बेटे थे। सुगहर सिंह और बच्चीलाल सिंह। सुघर सिंह के पांच बेटे थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, रतन सिंह, राजपाल सिंह यादव, अभय राम सिंह और शिवपाल सिंह यादव। भाइयों में मुलायम सिंह तीसरे नंबर और शिवपाल सिंह सबसे छोटे हैं। मुलायम सिंह यादव ने दो शादी की है। मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे अखिलेश यादव हैं। अखिलेश यादव ने डिंपल यादव से शादी की है। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता है। प्रतीक यादव मुलायम की दूसरी पत्नी साधना सिंह के बेटे हैं। प्रतीक का पिछले महीने निधन हो गया। अपर्णा यादव की शादी प्रतीक यादव से हुई थी। इस तरह अपर्णा मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू हैं। मुलायम के भाई, बेटे, भतीजे के अलावा अब इस कुनबे की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में है।

शिक्षक से सपा के संस्थापक और मुख्यमंत्री तक का सफर
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समाजवादी आंदोलन से की। वर्ष 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए जसवंतनगर सीट से विधायक चुने गए। आपातकाल के दौरान जेल गए और बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1989-91, 1993-95 और 2003-07) रहे। इसके अलावा वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव कई बार लोकसभा सांसद रहे और लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे। सपा की राजनीतिक पहचान और संगठन का निर्माण मुख्य रूप से उनके नेतृत्व में हुआ। मुलायम यादव ने ही अयोध्या में कार सेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाईं थीं। मुलायम सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव भी पूरी तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं।

मुलायम के पांच भाइयों में सबसे बड़े, बेटा बना सांसद
मुलायम के पांच भाइयों में अभयराम सबसे बड़े हैं। धर्मेंद्र यादव उनके बेटे हैं। धर्मेंद्र तीन बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले 2004 में मैनपुरी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके बाद 2009 और फिर 2014 में बदायूं से जीत हासिल की। 2019 लोकसभा चुनाव में वह हार गए।

मुलायम सिंह के भाई, पौत्र को मैनपुरी से बनाया सांसद
मुलायम सिंह के पांच भाइयों में रतन सिंह दूसरे नंबर पर हैं। मैनपुरी के पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव रतन सिंह के पौत्र हैं। तेज प्रताप के पिता रणवीर सिंह हैं। तेज प्रताप ने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी की है। तेज प्रताप की शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी से हुई है। मतलब तेज प्रताप लालू के दामाद भी हैं।

सपा के रणनीतिकार और संगठन के प्रमुख चेहरे
रामगोपाल यादव मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से सपा की राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा सांसद चुने गए और पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर रहे। नीतिगत फैसलों और संसदीय रणनीति तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संगठन निर्माता और परिवार की राजनीतिक धुरी
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सपा संगठन की रीढ़ माने गए। वे कई बार जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे। 2016 में अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण परिवार में बड़ा संघर्ष सामने आया। बाद में उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई, हालांकि बाद में फिर सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

विरासत के उत्तराधिकारी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की दूसरी पीढ़ी के सबसे प्रमुख नेता हैं। उन्होंने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 और 2009 में भी वे कन्नौज से सांसद चुने गए। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया और अखिलेश यादव 38 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2017 में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष के बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। 2022 में वे करहल विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

मुलायम परिवार की बहू से संसद तक का सफर
डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। उन्होंने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं। 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जहां वह सांसद चुनी गईं। 2014 और 2019 में भी कन्नौज से चुनाव लड़ा, लेकिन 2019 में भाजपा उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचीं और वर्तमान में सांसद हैं।

अखिलेश के चचेरे भाई ने मैनपुरी से जीता पहला चुनाव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे और रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। उन्होंने 2004 में पहली बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीता। वे 2009 और 2014 में बदायूं लोकसभा सीट से सांसद बने। 2019 में भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए। 2022 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। इसके बावजूद वे पार्टी के प्रमुख प्रचारकों और रणनीतिक नेताओं में शामिल रहे हैं।

मुलायम के भतीजे का फिरोजाबाद से संसद तक का सफर
अक्षय यादव रामगोपाल यादव के पुत्र और मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। वे पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं और समय-समय पर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

मुलायम के भाई के पौत्र और लालू यादव के दामाद
तेज प्रताप यादव मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं। वे मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीता। 2019 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों में उनकी भूमिका फिर चर्चा में रही।

यादव परिवार की नई पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री
आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की नई राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी की युवा राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माना जाता है। वे लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। सपा में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि सैफई परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही है।

अखिलेश के चचेरे भाई को सपा की युवा ईकाई से जोड़ा
समाजवादी युवजन सभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव अनुराग यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दो पुत्र धर्मेंद्र यादव और अनुराग यादव हैं। अनुराग यादव उर्फ दीपू यादव समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में राष्ट्रीय सचिव रहे हैं। वर्ष 2013 में उन्हें यह संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई थी। वे चुनावी राजनीति में अपने भाई धर्मेंद्र यादव की तरह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे, लेकिन पार्टी संगठन और सैफई परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भूमिका रही है।

राम गोपाल यादव के अपने भांजे को एमएलसी बनाया
एमएलसी अरविंद सिंह यादव भी सैफई परिवार की राजनीतिक शाखा से जुड़े हुए हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। उनका संबंध मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के परिवार से है। रामगोपाल यादव की बहन गीता देवी हैं। अरविंद सिंह यादव गीता देवी के ही पुत्र हैं। इस प्रकार अरविंद यादव रामगोपाल यादव के भांजे हैं। अरविंद यादव का राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ। वे मैनपुरी जिले की करहल ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य बने। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद के दौरान उनका नाम चर्चा में आया था।

मुलायम के भतीजे को इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया
इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं। वे मुलायम सिंह यादव के सगे छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र हैं। अंशुल यादव लंबे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध जीता। वर्ष 2021 में वे फिर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने और निर्विरोध निर्वाचित हुए।

अखिलेश की भाभी को सैफई ब्लॉक प्रमुख बनाया
सैफई ब्लॉक प्रमुख मृदुला यादव का संबंध भी मुलायम सिंह यादव के परिवार से है। वह अखिलेश यादव की चचेरी भाभी लगती हैं। वह मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पुत्र रणवीर सिंह यादव की पत्नी हैं। रणवीर सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे थे। मृदुला यादव लंबे समय तक सैफई की स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं। वह सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर कई बार निर्वाचित हो चुकी हैं। सैफई ब्लॉक पर पिछले लगभग ढाई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार या उससे जुड़े सदस्यों का प्रभाव रहा है। पहले रणवीर सिंह यादव, फिर धर्मेंद्र यादव, उसके बाद तेज प्रताप यादव और बाद में मृदुला यादव इस पद तक पहुंचे।

अखिलेश की चचेरे भाई सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने
इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष आदित्य यादव का संबंध मुलायम परिवार से है। वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई तथा अखिलेश यादव के चाचा हैं। आदित्य यादव सैफई परिवार की नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में जसवंतनगर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़कर राजनीतिक शुरुआत की, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2016 में उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक की ओर से उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक और प्रदेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन में प्रतिनिधि चुना गया था। वर्ष 2021 में वे निर्विरोध रूप से इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर उनके पिता शिवपाल सिंह यादव लगभग 33 वर्षों तक काबिज रहे थे।

अखिलेश की चचेरी बहन इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक
इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक डॉ. अनुभा यादव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की चचेरी बहन लगती हैं। वह शिवपाल सिंह यादव की पुत्री हैं। शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। डॉ. अनुभा यादव की शादी आईएएस अधिकारी अजय यादव से हुई। डॉ. अनुभा यादव सैफई परिवार की उन महिला सदस्यों में शामिल हैं, जिन्हें सहकारी संस्थाओं में जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2021 में इटावा जिला सहकारी बैंक के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव के परिवार के कई सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में डॉ. अनुभा यादव भी बैंक की निदेशक चुनी गई थीं।

मुलायम सिंह यादव के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय
मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन 2003 में हुआ। इसके बाद साधना गुप्ता के साथ उनके संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने चुनावी हलफनामों में साधना गुप्ता को अपनी पत्नी के रूप में दर्ज किया। हालांकि साधना गुप्ता ने कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार की चर्चाओं में उनका नाम कई बार सामने आया। 2022 में उनका निधन हो गया।

राजनीति से दूरी लेकिन परिवार की चर्चित शाखा
प्रतीक यादव साधना गुप्ता के पुत्र हैं और मुलायम सिंह यादव के सौतेले पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी है और मुख्य रूप से व्यवसाय और फिटनेस के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। प्रतीक कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए और न ही समाजवादी पार्टी में कोई संगठनात्मक पद संभाला।

सपा परिवार की बहू लखनऊ से चुनाव लड़कर हारीं
अपर्णा यादव, प्रतीक यादव की पत्नी हैं। उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं। बाद में 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्तमान में वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।

समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है पूरी समाजवादी पार्टी; रामगोपाल यादव ने अमित शाह को सौंपी चिट्ठी


उत्तर प्रदेश में चुनाव होने से पहले ही लगता है चुनाव परिणाम घोषित हो गया है। राहुल गाँधी की छत्रसाया में रहने वाली एक और पार्टी अपने अंत की ओर चल पड़ी है। महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस(TMC) में टूट और दल-बदल चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर भी बड़ा दावा सामने आया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि सपा में जल्द ही बड़ी टूट हो सकती है।

उन्होंने कहा, “समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र बंगाल छोड़िए, समूची सपा, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।”

एक बयान में राम गोपाल यादव ने कहा, “अब यूपी का नंबर है, राम गोपाल जी एक चिट्ठी अमित शाह को थमा दिए हैं और उनसे कह दिए हैं उनसे कि इतने लोगों का नाम है। इन लोगों को अपने पास ले लीजिए, हम लोगों की जान बचाकर रखिएगा।”

राजभर ने अपने बयान में कई घोटालों का भी जिक्र किया है जिसके बाद सियासी हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 : ममता की तरह धमकाने पर उतरे अखिलेश यादव, कहा- सरकार बनी तो करेंगे सख्त कार्रवाई: एनकाउंटर्स को बताया फर्जी

जिस तरह बंगाल में ममता बनर्जी मुसलमानों का डर दिखाकर हिन्दुओं को धमका रही थी, ठीक उसी रास्ते पर अखिलेश यादव चल निकले हैं। योगी आदित्यनाथ से पहले उत्तर प्रदेश में जो जंगल राज था उसी की वापसी करने की तैयारी की जा रही है। जो पुलिस समाजवादी पार्टी के मंत्री की भैंस ढूंढने कानून व्यवस्था को छिन बिन्न कर रखा था वही वापस लाने पुलिस को धमकाना शुरू कर दिया है। जब सत्ता से 10 साल दूर रहने की इतनी तड़प हो रही है कि पुलिस अधिकारियों को धमका रहे हैं हिन्दुओं का क्या होगा? क्या हिन्दू योगी राज से पहले की तरह समाजवादी पार्टी के राज में अपने त्यौहारों को खुलकर नहीं मना सकेंगे? बंगाल की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं को ही नहीं बल्कि सभी धर्मों को समाजवादी पार्टी के खिलाफ लामबंद होना होगा।  
चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने सत्ता के बिना किस तरह बिलबिला रहे हैं कि प्रदेश में सत्ताभोग नहीं तो चलो संसद पहुँच कर राजशाही करो। ऐसे नेताओं को ना ही देश की चिंता है और ना ही जनता की इन्हे चाहिए विलासिता जीवन और तिजोरी भरने का साधन।  
देखिए सोशल मीडिया पर वायरल ‎ये है असली रुप इन कांग्रेसी,सपा,आरजेडी,टीएमसी और अन्य पारिवारिक पार्टी का।
हिंदुओं के वोट पाने के लिए 2014 के बाद से हमें मजबूरन पूजा करने मंदिरों में जाना पड़ रहा है। लेकिन उससे आप कोई गलतफहमी मत पाल लेना कि हम अब बदल गए हैं, खुदा कसम हम वही है और वही रहेंगे जो 2014 पहले हुआ करते थे
देखिए न, हम जो भी तोड़फोड़ करते हैं हिंदुओं में ही करते हैं मुसलमानों को जातियों में बांटकर आपस में लड़ाने का काम ना हम तब करते थे और न आज कर रहे हैं, ऐसा गंदा काम करने की बात तो हम कभी सोचते भी नहीं
 2027 में रहम मेरे ऊपर ही करना किसी और पर नहीं,आपको खुदा का वास्ता  
आज राज्य की जनता योगी मॉडल अपनाने की मांग कर रही है, और समाजवादी पार्टी और INDI गठबंधन हिन्दुओं को जातियों में बाँट राज करने की हिमाकत कर रहे हैं। मुसलमानों को भी सोंचना होगा कि जो अपने धर्म का नहीं किसी दूसरे के मजहब नहीं हो सकता। अगर हिन्दुओं को ये लोग बांट रहे हैं तो बदनाम मुसलमान भी हो रहा है।   
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब धमकाने पर उतर आए हैं। अखिलेश यादव ने कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर बयान देते हुए धमकी दी है कि प्रदेश में उनकी सरकार बनती है तो जिन अधिकारियों ने फर्जी एनकाउंटर किए हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इसके साथ ही अखिलेश यादव ने रोजगार के मुद्दे पर योगी सरकार और केंद्र की BJP सरकार पर आरोप लगाया कि युवाओं को नौकरी देने के मोर्चे पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में आने पर उनकी पार्टी बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी।

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी उन्होंने वादा किया कि समाजवादी सरकार बनने पर एंबुलेंस व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा और गरीबों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर तथा मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। अखिलेश ने पेट्रोल-डीजल में कथित मिलावट का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे लोगों की गाड़ियों को नुकसान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश : किस ‘शर्त’ पर चुनावों में सपा के समर्थन को तैयार हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, क्यों हिंदू विरोधी अतीत को दे रहे हैं ‘क्लीनचिट’?

      स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आरती करतीं डिंपल यादव और अखिलेश यादव (फोटो साभार: X/Dimple Yadav)
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव निकट आ रहे हैं, सनातन को अपमानित करने वाली समाजवादी पार्टी ने कालनेमि बन हिन्दुओं को गुमराह करने साधु-संतों की शरण में जाना शुरू कर दिया है। हिन्दू यह भी नहीं भुला कि किस तरह समाजवादी नेता रामायण के पृष्ठ फाड़ रहे थे, सनातन के विरुद्ध बयानबाज़ी कर रहे थे और आज सत्ता पाने उसी सनातन की शरण में जा रही है। लेकिन हिन्दुओं को इन सनातन विरोधियों से बंगाल की तरह दूरी बनानी होगी।       
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गौहत्या पर प्रतिबंध की माँग को लेकर निकाली जा रही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्ठी यात्रा’ लगातार चर्चाओं में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल उठ रहे थे कि इसे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। अब अखिलेश यादव के एक बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने शुक्रवार (12 जून 2026) को एटा में कहा कि शंकराचार्य भी PDA हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट बँटवारे को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पूजनीय शंकराचार्य जी भी पीड़ित, दुखी, अपमानित हो रहे हैं इस सरकार में। वह भी PDA हो गए हैं, इसलिए हम उनके साथ हैं।” अखिलेश यादव के इस बयान और यात्रा में सपा नेताओं के शामिल होने पर उठ रहे सवालों को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने ऑपइंडिया से बात की है।

गलफहमी ना पालें अखिलेश: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

3 मई 2026 से शुरू हुई इस 81 दिवसीय यात्रा को लेकर संजय पांडेय ने कहा कि यात्रा को लेकर जनता का रुख सकारात्मक है और यात्रा के बाद से मुस्लिम और ईसाई भी समर्थन में आ गए हैं। वहीं, अखिलेश यादव के बयान पर उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कुछ भी अखिलेश जी ने बयान दिया है कि महाराज जी PDA का हिस्सा हो गए हैं, तो ये उनकी गलतफहमी है। महाराज जी सिर्फ सनातन धर्म के हैं। वो किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा, “अगर PDA अभी यह घोषणा कर दे कि सरकार बनने पर गाय को ‘राज्य माता’ घोषित किया जाएगा और गौकशी पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी, तो उन्हें शंकराचार्य जी का समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा। वे और उनके समर्थक PDA के साथ खड़े होंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया तो शंकराचार्य जी का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।”

संजय पांडेय ने कहा, “यह किसी विशेष दल का समर्थन करने का मामला नहीं है। अगर बीजेपी, कॉन्ग्रेस या PDA कोई भी दल अपने घोषणा पत्र में गाय को राज्य माता घोषित करने और गोकशी बंद कराने का लिखित व सार्वजनिक वादा करेगा तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं बल्कि गौ माता के प्राणों की रक्षा का है।”

सपा-कांग्रेस के नेताओं के यात्रा में शामिल होने पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी यात्रा को उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। दरअसल, उनकी यात्रा के मंचों पर सपा और कांग्रेस के नेता खूब नजर आ रहे हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख सरकार को लेकर गोरक्षा के विषय से आगे बढ़कर आक्रामक नजर आ रहा है।

कुछ दिनों पहले उनकी यात्रा जब इटावा के सैफई पहुँची तो उनके मंच पर अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव नजर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला था। इस बारे में भी संजय पांडेय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख स्पष्ट किया है।

संजय पांडेय ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल वाले आ रहे हैं तो वो सनातनी ही हैं। जब मुस्लिम समर्थन कर रहे हैं, गौ माता को राष्ट्र माता बोल रहे हैं जबकि उनके धर्म में पशु माना जाता है। तो जब वो तैयार हो गए हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हिंदू अगर आ रहा है, तो उसका स्वागत है। उसमें भाजपा के भी लोग आएँ, उनके लिए भी कोई रोक नहीं है।”

‘सपा के हिंदू विरोधी अतीत’ से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा, “शंकराचार्य जी महाराज, परंपरा से जुड़े हुए हैं और सपा की सच्चाई भी इनको मालूम है। सपा जहाँ गड़बड़ है, सपा जो गलत कर रही है धर्म विरोधी, तो सपा का भी विरोध रहेगा। अभी जब राजकुमार भाटी ने बयान दिया था ब्राह्मणों और धर्म के खिलाफ तो महाराज श्री ने उनकी भी निंदा की थी और कहा था कि समाजवादी पार्टी को जनता ठीक कर देगी।”

उन्होंने कहा, “जितना धर्म के अंश में वह काम करेंगे, उतना ही शंकराचार्य जी का उनके साथ समर्थन रहेगा, आशीर्वाद रहेगा। जो भी अधर्म करेगा, यहाँ तक कि हम शिष्य भी अगर अधर्म करेंगे तो हम लोग को वह मार के भगा देंगे। शंकराचार्य जी को केवल शास्त्र और धर्म से मतलब है और किसी से कोई उनका और मतलब नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसकी मूर्खता है।”

वहीं, मजहबी आधार पर आरक्षण की माँग करने वाली पार्टियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने हर तरह के आरक्षण का विरोध करने की बात कही हैं। उन्होंने कहा, “हम लोग तो किसी आधार पर आरक्षण नहीं चाहते हैं। किसी भी मजहब या किसी भी तरह से, आरक्षण से हम लोग का देश नष्ट ही हो जाएगा। शंकराचार्य जी का मानना है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए।”

मुलायम से अखिलेश यादव तक आतंकियों को बचाने समाजवादी पार्टी की नापाक कोशिशें


समाजवादी राजनीति का केवल कहने और दिखाने के लिए दर्शन सामाजिक न्याय, पिछड़ों की आवाज़ और लोकतांत्रिक संघर्ष है, लेकिन वास्तविकता में पार्टी के नेताओं की करनी इससे ठीक उलट है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! यही कारण है कि पीएम से लेकर सीएम तक और अन्य बीजेपी नेता लगातार चुनावी मंचों से सपा पर आतंकियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। सपा के कई फैसलों और बयानों ने बार-बार यह धारणा बनी कि उसने आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा। अदालतों की फटकार, सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल और आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की कोशिशें सपा की राजनीति पर अब भी सबसे बड़े सवालिया निशान हैं।

तुष्टिकरण के लिए आतंकियों के पोषक बने समाजवादी पार्टी के नेता
सबसे बड़ा प्रश्न केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का है जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिश की गई, सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए और कई बार आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाया गया। अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई मामलों में सरकार की मंशा पर तीखी टिप्पणियां करनी पड़ीं। यही घटनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में “तुष्टिकरण बनाम राष्ट्र सुरक्षा” की सबसे बड़ी बहस के रूप में सामने आती हैं।

आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
19 फरवरी 2022
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।

अयोध्या राम मंदिर हमले के आरोपियों पर नरमी का आरोप
14 फरवरी 2022
यूपी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी ने आरोप लगाया कि जब अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुकदमों को वापस लेने वाली फाइल पर साइन किए थे। बीजेपी ने इसे “राष्ट्र और आस्था दोनों के खिलाफ अपराध” बताया। यह आरोप इसलिए और गंभीर बना क्योंकि अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। आतंकवाद के ऐसे मामलों में नरमी दिखाना सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा दाग बन गया। काबिले जिक्र है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर में स्थित अस्थायी राम मंदिर पर आतंकी हमला 5 जुलाई 2005 को हुआ था।

अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
12 जुलाई 2021
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?

अखिलेश सरकार द्वारा आतंकवाद मामलों को वापस लेने की कोशिश
12 दिसंबर 2013
यूपी की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन मामलों की समीक्षा शुरू की, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे थे। सरकार ने करीब 14 आतंकवाद मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इनमें गोरखपुर ब्लास्ट, लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे गंभीर मामले शामिल थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह कदम न्याय व्यवस्था को कमजोर करने और कट्टरपंथी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसा है। बाद में अदालतों ने कई मामलों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए मुकदमे वापस लेने की अनुमति नहीं दी।

आतंकी खालिद मुजाहिद के परिजनों को सपा सरकार में मुआवजा!
31 मई 2013
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित वाराणसी और फैजाबाद के अदालत परिसरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी खालिद मुजाहिद अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया था। दरअसल, खालिद की मौत के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दी गई मुआवजे की राशि को परिवार ने लेने से ही इनकार कर दिया था। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव-2014 में जहां एक खास वर्ग के मुस्लिमों की नाराजगी का भय सता रहा है तो वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस निर्णय को मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने कहा कि सपा सरकार आतंकवाद के आरोपियों के प्रति इतनी नरम थी कि उसने प्रशासनिक मशीनरी पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण ने यह धारणा और मजबूत की कि सपा आतंकवाद के मामलों में हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के बजाय आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल और आतंकियों के प्रति सहानुभूति
19 सितंबर 2008
दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों को मार गिराया गया था। उस समय पूरे देश में आतंकवादी हमलों का भय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मुलायम सिंह यादव ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग की। दरअसल, सपा आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर एक विशेष वोट बैंक को साधना चाहती थी। जिस समय देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता चाहता था, उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अविश्वास खड़ा करना सपा की राजनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

वाराणसी ब्लास्ट आरोपी वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास
7 मार्च 2006
वाराणसी सीरियल ब्लास्ट में निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। लेकिन अखिलेश सरकार ने इस मामले के आरोपी वलीउल्लाह सहित कुछ आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कदम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि क्या सरकार आतंकवादियों को “पद्मभूषण” देना चाहती है? अदालत की यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक बन गई कि सरकार का कदम कितना विवादास्पद माना गया। आलोचकों ने कहा कि सपा सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जगह उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगी थी।

आतंकवादियों के प्रति फर्जी मुकदमे का सपा का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी ने कई बार यह तर्क दिया कि आतंकवाद के मामलों में कुछ युवकों को झूठा फंसाया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इस तर्क के जरिए आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा किया गया। जब अदालतों में कई आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत हुए और सजा भी हुई, तब सपा की राजनीतिक लाइन पर और सवाल उठे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा ने “निर्दोष” का नैरेटिव बनाकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की। यहां तक कि सपा सरकार को अदालतों से फटकार मिली। फिर भी उसने आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की नापाक कोशिशें कीं। समाजवादी पार्टी के कई बयानों ने यह धारणा और मजबूत हुई कि उसने हमेशा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरण और तुष्टिकरण के चश्मे से देखा।

हिन्दू विरोधी समाजवादी पार्टी : मुलायम से अखिलेश तक मुसलमानों को खुश रखने हिन्दुओं को गोली और गाली

जिस पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह से लेकर वर्तमान सर्वेसर्वा अखिलेश यादव हिन्दू होते हुए जब सिर्फ सत्ता की खातिर मुस्लिम वोटबैंक को खुश रखने जब सनातन पर ही हमलावर हो सकते हैं किसी और के क्या हो सकते हैं? हैरानी होती है समाजवादी पार्टी को वोट देने वाले हिन्दुओं पर चाहे वह किसी भी जाति से हों, जो हिन्दू विरोधी पार्टी को वोट देते हैं। जाति से पहले धर्म आता है जब धर्म ही नहीं रहेगा जाति क्या करेगी? सनातन को गाली देना और हिन्दुओं को जातियों में बांटकर राज करने की मंशा रखने वालों से जनहित की कामना करना अंधे कुएं में चीखने से कम नहीं।    
समाजवादी पार्टी ने वर्षों तक खुद को समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का चेहरा बताने की कोशिश की, लेकिन हकीकत में उसकी राजनीति का सबसे बड़ा सच हमेशा हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण ही रहा। मुलायम सिंह यादव के दौर में अयोध्या में कारसेवकों पर चली गोलियां केवल फायरिंग नहीं थीं, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था पर सीधा हमला था। “परिंदा भी पर नहीं मार सकता” जैसे अहंकारी बयान से लेकर राम मंदिर आंदोलन को सांप्रदायिक उन्माद बताने तक, सपा ने हमेशा हिंदू भावनाओं को संदेह और शत्रुता की नजर से देखा। समय बदला, चेहरे बदले, लेकिन सोच नहीं बदली। अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी वही राजनीति नए रूप में सामने आती रही है। कभी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, कभी कुंभ और कांवड़ यात्रा पर तंज, तो कभी रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेताओं पर नरम रुख…यह सब बताता है कि अखिलेश यादव की भी राजनीति में हिंदू आस्था के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि वोट बैंक का गुणा-भाग ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है।

हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के दौर में कारसेवकों पर गोलियां चली थीं, तो आज सपा नेताओं के बयानों से हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां चलाई जाती हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं द्वारा रामचरितमानस को बकवास कहना हो या सनातन परंपराओं को कटघरे में खड़ा करना, सपा नेतृत्व हर बार या तो चुप दिखाई दिया या बचाव की मुद्रा में खड़ा नजर आता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का बहुसंख्यक समाज बार-बार सपा की राजनीति को नकारता रहा है। जनता समझ चुकी है कि जो पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए बहुसंख्यकों की आस्था को चोट पहुंचाने में संकोच नहीं करती, वह समाज को जोड़ने नहीं, बांटने की राजनीति करती है। यही वजह है कि सपा को सत्ता से बेदखली का दर्द बार-बार झेलना पड़ा और हिंदू समाज का अविश्वास उसके साथ लगातार गहराता चला गया।

समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने हिंदुओं का, उनकी आस्था का और सनातन संस्कृति का विरोध और अपमान किया

कांवड़ यात्रा के नाम पर ध्रुवीकरण — अखिलेश यादव
जुलाई 2025
कांवड़ यात्रा मार्गों पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि सपा हमेशा कांवड़ यात्रा और सनातन परंपराओं को राजनीतिक चश्मे से देखती है।

मंदिरों पर कब्जा कर रही BJP – अखिलेश यादव
मई 2025
बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन विवाद पर अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा “मंदिरों पर अप्रत्यक्ष कब्जा” कर रही है। भाजपा नेताओं ने कहा कि सपा मंदिर प्रशासन को लेकर भ्रम फैलाकर धार्मिक राजनीति कर रही है।

गौशाला को ‘दुर्गंध’ बताने पर अखिलेख के खिलाफ मोर्चा खोला
2 अप्रैल 2025
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को घेरने की तैयारी कर ली है। दरअसल अखिलेश यादव ने पिछले दिनों कन्नौज में कहा था कि भाजपा वाले दुर्गंध पसंद करते हैं इसलिए गौशाला बना रहे हैं। हम सुगंध पसंद कर रहे थे इसलिए इत्र पार्क बना रहे थे। भाजपा ने दुर्गंध के मुद्दे को गाय और गौशाला का अपमान बताते हुए यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

राम लला की प्राण प्रतिष्ठा BJP-RSS का राजनीतिक कार्यक्रम बताया
11 जनवरी 2024
मुलायम सिंह यादव ने राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया था और अब उनके पुत्र राम मंदिर के विरोध पर उतर आए हैं। राम लला मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर अखिलेश यादव ने दूरी बनाते हुए कहा कि वह इसमें नहीं जाएंगे। उन्होंने इस भव्य-दिव्य राम जन्मभूमि न्यास के कार्यक्रम को बीजेपी और आरएसएस का कार्यक्रम बताया। सपा द्वारा इस कार्यक्रम को “राजनीतिक आयोजन” कहने के बाद भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा राम मंदिर आंदोलन से आज भी असहज है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने से इनकार
9 जनवरी 2024
विश्व हिंदू परिषद के प्रतिनिधि जब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण देने पहुंचे, तब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कहते हुए निमंत्रण लेने से इनकार कर दिया कि “हम उन्हें नहीं जानते, जो निमंत्रण देने आए हैं।” इस घटना के बाद भाजपा ने उन पर राम मंदिर आंदोलन और सनातन आस्था का अपमान करने का आरोप लगाया।

राम मंदिर का उद्घाटन मार्केटिंग इवेंट है – एसटी हसनसमाजवादी पार्टी राम मंदिर का शुरू से ही विरोध करती आ रही है और इसमें अड़ंगे डालने में लगी है। अब समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता ने एसटी हसन ने राम मंदिर के उद्घाटन को भाजपा का एक ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ और ‘मार्केटिंग इवेंट’ करार दे दिया। दूसरी ओर सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने अक्सर राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों या हिंदू धर्मगुरुओं पर तंज कसते हुए उन्हें पाखंडी या राजनीतिक फायदे के लिए काम करने वाला बताया है।

सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने हिंदू धर्म को धोखा बताया
28 अगस्त 2023
सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस प्रकरण के बाद दिए बयान से बवाल मच गया। हिंदू धर्म को धोखा बतानेवाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान की चारों तरफ निंदा होने लगी है। अयोध्या के साधु-संतों ने भी बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य बौखला गए हैं। उनको बोलने का ज्ञान नहीं है और स्वामी प्रसाद मौर्य ऊटपटांग बोलते हैं।

सपा समर्थकों ने पावन रामचरितमानस की प्रतियां जलाईं
29 जनवरी 2023
स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थन में कुछ लोगों द्वारा रामचरितमानस की प्रतियां जलाने का वीडियो वायरल हुआ। इस घटना के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेताओं के बयानों ने धार्मिक उन्माद पैदा किया। (Reddit)

रामचरितमानस बकवास है – स्वामी प्रसाद मौर्य
24 जनवरी 2023
रामचरितमानस विवाद के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि “यह सब बकवास है।” इस बयान के बाद संत समाज, अखाड़ा परिषद और कई हिंदू संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किए। भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेतृत्व जानबूझकर सनातन ग्रंथों को निशाना बना रहा है। समाजवादी पार्टी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि रामचरितमानस की कुछ चौपाइयां दलितों और पिछड़ों का अपमान करती हैं। उन्होंने मांग की कि “आपत्तिजनक हिस्सों को हटाया जाए या किताब पर प्रतिबंध लगाया जाए।” इस बयान के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुईं।

भगवा राजनीति देश के लिए खतरा — मुलायम सिंह यादव
अप्रैल 2009
लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान लखनऊ में बोलते हुए मुलायम सिंह यादव ने भाजपा और हिंदुत्व राजनीति पर हमला किया। यादव ने भगवा राजनीति को देश के लिए खतरा बता दिया। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री को घेरते हुए इसे हिंदू धार्मिक पहचान को कट्टरवाद से जोड़ने की कोशिश बताया।

देश मिथकों से नहीं विकास से चलता है – अमर सिंह
सितंबर 2007
रामसेतु विवाद के दौरान नई दिल्ली में समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने कहा कि “देश मिथकों से नहीं, विकास से चलता है।” रामसेतु पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के हलफनामे के बीच, रामसेतु को मिथक बताने वाला यह बयान बड़ा विवाद बन गया।

राम मंदिर आंदोलन ने देश बांटा – मुलायम सिंह यादव
अगस्त 2003
मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राम मंदिर आंदोलन ने “देश को बांटने का काम किया।” विश्व हिंदू परिषद और रामभक्त संगठनों ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान बताया।

अयोध्या की पूरी जमीन ही विवादित, निर्माण का अधिकार नहीं
27 फरवरी 2003
लोकसभा में बोलते हुए सपा सांसद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अयोध्या की पूरी जमीन विवादित है। जब तक इसका फैसला नहीं हो जाता तब तक किसी भी पक्ष को कोई भी निर्माण कार्य करने का अधिकार नहीं है और न किया जा सकता है। न ही हमारी पार्टी करने देगी।

साधु-संतों को ‘राजनीतिक एजेंट’ बताने पर विवाद
वर्ष 1995
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य सपा नेताओं ने अपने बयान में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई संतों और महंतों को “भाजपा के राजनीतिक एजेंट” कहा। संत समाज ने इसका तीखा विरोध किया। सपा नेता रामगोपाल यादव ने भाजपा पर राम के नाम के राजनीतिकरण और पेटेंट का आरोप लगाया था।

सपा राज में हनुमानगढ़ी के पास कारसेवकों पर गोलियां बरसाईं
2 नवंबर 1990
समाजवादी पार्टी के राज में अयोध्या की गलियों में एक बार फिर कारसेवकों की भारी भीड़ जुटी और हनुमानगढ़ी के पास पहुंचने पर सुरक्षा बलों ने दूसरी बार गोलियां बरसाईं। जोश और जुनून से भरे हजारों कारसेवकों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कोठारी बंधुओं समेत कई कारसेवकों की मौत हुई। हिंदू संगठनों ने इसे रामभक्तों पर दमन बताया। तब मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि देश की एकता के लिए हमें मस्जिद को बचाना पड़ा।
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मुलायम सरकार में अयोध्या में गोली कांड
30 अक्टूबर 1990
अयोध्या में हजारों की संख्या में कारसेवक बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे और बैरिकेडिंग तोड़कर आगे निकलने लगे। तब मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाने का आदेश दिया था, जिसमें कई कारसेवक मारे गए थे। राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई। यह घटना आज भी सपा के खिलाफ हिंदू विरोध का सबसे जीवंत उदाहरण है।