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कार्यकर्ताओं को राम मंदिर-पौधरोपण का मुद्दा देकर खुद विदेश घूमने निकले अखिलेश : क्या UP चुनाव के लिए यही है आपकी राजनीति?

                                                            (AI तस्वीर साभार: Dall-e)
कहते हैं, “नेतृत्व की असली पहचान चुनावी मंच पर नहीं, मुश्किल समय में होती है।” जब जनता सवाल पूछ रही हो, सरकार फैसले ले रही हो और राजनीति अपने सबसे गर्म दौर में हो, तब यह भी देखा जाता है कि नेता मैदान में खड़ा है या हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सोशल मीडिया से राजनीति कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस समय राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जाँच कर रही है, पौधरोपण अभियान को लेकर बडे़ स्तर पर सक्रिय है। ऐसे वक्त में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव विदेश दौरे पर हैं। ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव निजी दौरे पर अमेरिका गए हैं, और वहाँ से लंदन की यात्रा कर वापस भारत लौटेंगे।

सांसद प्रियंका चतुर्वेदी का अखिलेश पर हमला 

राज्य सभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि, राम मन्दिर दान चोरी का मास्टर माइंड टिन्नू यादव तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी का पुराना कार्यकर्ता निकला जो अपने आका के कहने पर हिन्दूओं की आस्था पर चोट कर रहा था।
और ये सब पता चला टिन्नू यादव और अखिलेश यादव की 980 बार हुई फोन कॉल से.. वाह रे सपाई भड़वो बाप ने राम भक्तों पर गो**ली चलवाई और बेटे ने रामभक्तों का चन्दा ही चुरा लिया यानी दोनों ही बाप बेटे ने हिन्दूओं के साथ खेला किया है। ध्यान रहे..
जो अखिलेश राम मन्दिर से चोरी करवा सकता है वो 2027 में CM बनने के बाद राम मन्दिर को तुड़वा भी सकता हैं।

ये वही अखिलेश यादव हैं, जो अपनी विदेश यात्रा के ठीक एक दिन पहले अपनी राजनीति चमकाने के लिए मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम से मिलते हैं। उससे पहले योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को ‘भ्रष्टाचार’ बता देते हैं और अपने हिस्से का जनता को बरगलाकर खुद गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने विदेश चले जाते हैं।

हजारों किलोमीटर दूर से सोशल मीडिया पर राजनीति कर रहे अखिलेश यादव

दिलचस्प बात यह है कि विदेश जाने से पहले अखिलेश यादव अपनी सोशल मीडिया टीम को ठीक ढंग से समझाकर गए हैं। तभी तो उत्तर प्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर पहुँचने के बाद भी अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट बंद नहीं हो रहे हैं। उनकी टीम योगी सरकार को घेरते हुए हर घंटे पोस्ट शेयर कर रही है।

अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट भी योगी सरकार के बड़े पौधरोपण अभियान को निशाना बनाने वाली है। इस पोस्ट में उन्होंने अपना पुराना आरोप दोहराते हुए पूरे अभियान को ‘भ्रष्टारोपण’ अभियान बताया। इसके साथ उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंच पर पौधरोपण करते हुए एक वीडियो भी साझा किया।

इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने जैसे अभियान पर राजनीतिक हमला करते हुए उन्होंने इसे ‘एनकाउंटर’ तक कह दिया।

पहले भी राजनीति छोड़ विदेश घूमने गए समाजवादी पार्टी के मुखिया

यह पहली बार नहीं है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़ अचानक अखिलेश यादव विदेश घूमने निकल गए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश यात्रा पर रहे। पार्टी ने हर बार इन दौरों को निजी बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इनकी टाइमिंग पर चर्चा जरूर हुई।

जून 2018 में अखिलेश यादव परिवार के साथ एक विदेशी छुट्टी पर रवाना हुए थे। उस समय समाजवादी पार्टी उपचुनावों में मिली सफलता के बाद विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी। वहीं, लखनऊ के सरकारी बंगले को खाली करने और उसमें नुकसान के आरोपों को लेकर भी उनकी राजनीति के केंद्र में चर्चा हो रही थी। ऐसे समय में उनके विदेश जाने को लेकर सवाल भी उठे थे।

और 2020 में जब हाथरस कांड पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ था। कॉन्ग्रेस से लेकर विपक्षी दलों के नेता लगातार हाथरस पहुँच रहे थे। लेकिन उस समय अखिलेश यादव विदेश में थे।

2025 में संसद के बजट सत्र के आसपास भी अखिलेश यादव परिवार के साथ लंदन टूर पर गए थे। तब तक 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी कर चुकी थी और अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके थे। इस समय जब देश में राजनीति करनी चाहिए थी, तब वह जश्न मनाने विदेश में थे।

यानी न तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया, न प्रदेश में किसी मुद्दे पर सक्रियता से भाग लिया और न ही खुद पर आए आरोपों का जवाब देने की उन्हें फुरसत मिली क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश घूमने में व्यस्त थे।

आज राम मंदिर पर सिर्फ तीन लोग बोल रहे हैं।
1:-पहले कांग्रेसी जिन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी कि अयोध्या में किसी भी कीमत पर राम मंदिर ना बने अपने बड़े-बड़े वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर रोकने के लिए लगा दिया और राम को काल्पनिक पात्र बताया था.. कोर्ट में एफिडेविट दिए कांग्रेस ने.*
2:- दूसरा समाजवादी पार्टी जिन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा राम भक्तों की अयोध्या में.. हत्या करवा दी पूरा सरयू खून से लाल करवा दिया..सरयू मै घायलों को बोरी में डालकर फेंका था मुलायम सरकार ने। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक आजम खान को पार्टी और सरकार में नंबर दो बना दिया ।और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के अध्यक्ष जफरयाब जिलानी को कैबिनेट मंत्री का प्रोटोकॉल दिया*
3:- तीसरा आम आदमी पार्टी जिसका सबसे बड़ा नेता केजरीवाल कहता था कि मेरी नानी ने कहा है कि राम मंदिर भूलकर भी मत जाना क्योंकि राम कभी ऐसे मंदिर में नहीं रह सकते जो मस्जिद तोड़कर बनी है । और इसी AAP का मनीष सिसोदिया जो कहता था कि राम मंदिर नहीं बनना चाहिए वहां यूनिवर्सिटी बननी चाहिए।*
इनकी राजनीतिक लालसा तो देखिए आज यह तीनों कैटेगरी के हिंदूद्रोही इस तरह से हिंदुओं को भरमा रहे हैं जैसे यही सबसे बड़े राम भक्त हो..।*
इसका कारण कोई राम भक्त और सनातनी विचारधारा, हिंदुत्व की विचारधारा नहीं है सिर्फ एक ही मकसद है कि हिंदुओं को और ज्यादा कैसे बांटे?कैसे इनको एक से दो फिर दो से चार से चार से आठ करें... इनका यही मकसद है कि हिंदू समाज को कैसे तोड़ा जाए... सिर्फ अपने वोट के हित के लिए सिर्फ अपनी राजनीति एजेंडा के लिए... जिन लोगों ने कभी भी राम मंदिर के समर्थन भी नहीं किया.. चंदा देना तो बहुत दूर की बात... आज वह लोग बात करते हैं राम मंदिर की!!*

अखिलेश, तेजस्वी, राहुल… सब विदेश में बैठकर चमका रहे राजनीति

एक तरफ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में सत्ता हथियाने का ख्वाब बुन रहे हैं, दूसरी तरफ हर जरूरी मौकों पर विदेश यात्राएँ पर घूमने निकल पड़ते हैं। उन्होंने राम मंदिर चंदा चोरी के नाम पर हिंदुओं को जगाने का ढोंग कर, दलित छात्रा की हत्या पर अपने मतलब की राजनीति कर और पौधरोपण जैसे पॉजिटिव काम को भ्रष्टाचार बताकर, अपने समर्थकों को झुनझुना थमा दिया है और अब उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि इसे बजाना कैसे हैं?

अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी विदेश यात्रा पर सवाल उठे हों। अलग-अलग समय पर अन्य विपक्षी नेता भी यही करते आए हैं। उदाहऱण के लिए, तेजस्वी यादव, जो फिलहाल यूरोप में है, वहीं बैठकर पटना के बंटी यादव हत्याकांड के पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर लेते हैं। राहुल गाँधी भी तीन हफ्ते से यूरोप घूम रहे हैं, जिसके चलते कॉन्ग्रेस के खुद के ‘छात्रों की गूँज’ जैसे कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं।

तो इसीलिए यह सोच-विचार करना जरूरी है कि किस नेता को असल में जनता के मुद्दों की फिक्र है और किसे नहीं है। जहाँ एक ओर योगी सरकार राम मंदिर चढ़ावे की निष्पक्ष जाँच कर रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग को खत्म करने के लिए पौधरोपण कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश का विपक्ष विदेश घूमने में व्यस्त है।

संविधान के दो ही बड़े रक्षक है, पहला नंबर राहुल गांधी है जो अपनी अधिकांश सभाओं एवं पद यात्राओं में एक लाल रंग की पुस्तक होती है उसी को हाथ में लहराते हुए ,चाहे उन्होंने उस पुस्तक को खोल कर पढ़ा हो या नहीं, बह लाल किताब को बह भारत का संविधान कहते है, उसकी रक्षा का बह प्रण लेते दिखते है जब उनके नेहरू गांधी परिवार ने उस संविधान को अपने हिसाब से दसियों बार तोड़ा एवं बदला है।
दूसरे संविधान के रक्षक समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव है, जो 10 साल से सत्ता से बाहर रहकर ऊब चुके है। उन्हें भी राहुल गांधी की तरह संविधान से बहुत प्यार है। उनके एवं उनके पिताश्री के शासन काल में जिस तरह से दूसरे समुदाय के तुष्टिकरण के लिए अपनी सरकार आते ही
उन अपराधियों को छोड़ दिया गया जिन पर बहुत ही गंभीर आरोप थे । अतीक अहमद, मुख्तयार अंसारी एवं उनके गुर्गो के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। फिरौती, जवारदस्त हफ्ता वसूली करने बालों पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं। महिलाओं के अंदर घर से बाहर निकलने पर उनके परिजनों को भय, बच्चियां स्कूल जाने से भी डरती थी, बही लोग अब संविधान की रक्षा की बात कर रहे है।

राम मंदिर में बुलडोजर क्यों नहीं चला? अब डिंपल यादव ने उगला जहर; मुलायम परिवार की आँखों में खटक रहा राम मंदिर, ससुर ने कारसेवकों का कराया नरसंहार-पति ने चंदाचोरी पर फैलाई नफरत


अपने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने अयोध्या में राममन्दिर का समाजवादी पार्टी शुरू से विरोध करती रही है। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू 11 बजे के बाद होली तक नहीं खेल सकते थे। 84 कोसी परिक्रमा पर पाबन्दी आदि आदि इतना सबकुछ होने के बाद भी समझ में नहीं आता हिन्दू क्यों समाजवादी पार्टी को वोट देता है? समाजवादी पार्टी में जितने भी हिन्दू हैं क्या वह कालनेमि हिन्दू हैं? यदि नहीं तो खुलकर डिम्पल ने जो राममन्दिर के विरुद्ध जहर उगला है उसका विरोध करो। अगर दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बन गयी PDA यानि Phir Darayega Ali हरकत में आ जाएगा।   

समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार और नीट (NEET) पेपर लीक के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के समर्थन में उतरी हुई हैं। जंतर-मंतर पहुँचकर डिंपल यादव ने वांगचुक का समर्थन तो किया, लेकिन इस दौरान मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले को लेकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोला। डिंपल यादव ने राम मंदिर और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर एक ऐसा विवादित बयान दे दिया है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है।

राम मंदिर पर डिंपल का ‘बुलडोजर’ राग और पुराना इतिहास

डिंपल यादव ने भाजपा सरकार को घेरते हुए कहा कि देश में इस समय ‘बुलडोजर सरकार’ चल रही है, जो छात्रों के भविष्य पर बुलडोजर चला रही है। उन्होंने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले का जिक्र करते हुए सवाल उठाया। डिंपल ने कहा, “जब राम मंदिर में इतनी बड़ी चोरी हो गई तो वहाँ पर बुलडोजर थक गया है। तो आखिर बुलडोजर क्यों थम गया, सवाल इस बात का है।”

इस बयान के बाद अब डिंपल यादव खुद चौतरफा घिर गई हैं। आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या एक कर्मचारी पर लगे कथित चोरी के आरोप के आधार पर पवित्र राम मंदिर की तुलना किसी अवैध निर्माण से करना जरा भी उचित है? इतिहास गवाह है कि मुलायम सिंह यादव के समय में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई गई थीं, जिसे लोग नरसंहार तक कहते हैं।

इसके बाद अखिलेश यादव ने राम मंदिर के चंदे को लेकर बयानबाजी की थी। अब डिंपल यादव के इस बयान के बाद लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिंपल भी राम मंदिर पर बुलडोजर चलवाकर वहाँ पुराना बाबरी ढांचा वापस देखना चाहती हैं? पूरा यादव परिवार ही राम विद्रोही बनकर सामने आ रहा है।

अखिलेश का पुराना बयान और पूरा परिवार घेरे में

अखिलेश यादव ने भी पहले राम मंदिर के संदर्भ में एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हमें सांचा नहीं, बल्कि ‘ढांचा बदलना’ होगा। उनके इस पुराने बयान को डिंपल यादव के ताजा बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। देश जानता है कि पूरा मुलायम परिवार शुरू से ही राम विरोधी रहा है और डिंपल का यह बयान उसी सोच को आगे बढ़ाता है। अब जंतर-मंतर के बहाने इनके अंदर की कड़वाहट भी बाहर आ रही है। मुद्दा पेपर लीक मामले का है, लेकिन निशाना राम मंदिर पर आकर रूक जाता है।

अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण होने के बाद से ही यह मंदिर मुलायम परिवार की आँखों में और ज्यादा खटकने लगा है। राम मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी पर चोरी का आरोप क्या लगा, डिंपल यादव ने सीधे पूरे मंदिर परिसर पर बुलडोजर चलाने की माँग जैसी भाषा का इस्तेमाल कर दिया। जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से गूँज रहा है कि क्या एक कथित चोरी के बहाने पूरे राम मंदिर को निशाना बनाना और वहाँ बुलडोजर की बात करना तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा नहीं है?

सपा सांसदों का जमावड़ा

इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत सोनम वांगचुक के धरने से जुड़ी हुई है। सोनम वांगचुक शिक्षा में बड़े सुधार, नीट पेपर लीक मामले में सख्त एक्शन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर पिछले 21 दिनों से जंतर-मंतर पर कड़े धरने पर बैठे हैं। वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले यह बड़ा आंदोलन चला रहे हैं। इतने दिनों से लगातार अनशन पर रहने के कारण वांगचुक की तबीयत काफी बिगड़ चुकी है और शनिवार (18 जुलाई) सुबह ही अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच समाजवादी पार्टी के सांसदों का एक बड़ा दल लगातार जंतर-मंतर पहुँच रहा है। इससे पहले सपा सांसद प्रिया सरोज भी वांगचुक के अनशन स्थल पर पहुँची थीं और उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक उनके मुद्दों को उठाने का वादा किया था। खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सोनम वांगचुक से अपना अनशन समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन अब इस आंदोलन के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक बयानों के लिए होने लगा है।

उत्तर प्रदेश : सपा के सचेतक कमाल अख्तर ने पहले किया MP रुचि वीरा को बेईज्जत, अब दिया पद से इस्तीफा: कुछ दिन पहले विशंभर यादव ने MP कृष्णा पटेल को सिखाई थी ‘तमीज’, क्या फँस रहे अखिलेश?

                 अखिलेश यादव के आगे हाथ जोड़ खड़े होने वाले कुँवर रेवती रमण सिंह स्टूल पर पैर फैलाये बैठे 
उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने जो जख्म दिए है योगी ने तो उसका पासंग भी वसूल नहीं किया। पंचायत से लेकर लोक सभा और राज्य सभा में अधिकतर सदस्य मुलायम सिंह परिवार से हैं। इस पार्टी ने अपने परिवार के अलावा किसी का भला नहीं किया। हिन्दू त्यौहारों पर इतनी पाबंदियां थी कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के निकट रहने वाले हिन्दू खुलकर अपना त्यौहार नहीं मना सकते थे, लेकिन आज खुलकर मनाते हैं।  

उत्तर प्रदेश में सियासत नितरोज हिचकोले ले रही है जिसे समझना बहुत मुश्किल हो रहा है। इधर अखिलेश यादव राममन्दिर चढ़ावे की चोरी को लेकर योगी आदित्यनाथ और बीजेपी को घेर रहे हैं तो उधर इनकी ही समाजवादी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रभु श्रीराम की अगर यही लीला रही 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव में अखिलेश की नैया डूबने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। सूत्रों के हवाले से इस चुनाव में MY(मुस्लिम-यादव) भी नाकाम हो रहा है। जिस तरह 2017 से मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने सनातन पर कीजड़ फेंके जाने अन्य हिन्दुओं के अलावा यादव समाज भी समाजवादी पार्टी से नाराज है। दूसरे, योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि "अखिलेश यादव मथुरा मन्दिर पर खुलकर बोलकर दिखाएं।"         

कुँवर रेवती रमण सिंह ने अखिलेश यादव को उनकी औक़ात दिखा दी है। किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा होगा।
'व्हाइट हाउस' में रहने वाले सामंतवादी अखिलेश यादव जब उनसे मिलने प्रयागराज पहुँचे तो रेवती रमण सिंह ने एक स्टूल मँगाया। उस स्टूल को अखिलेश यादव के सामने रखा गया। फिर कुँवर साहब ने उसी पर पाँव रखा।
इसके पीछे भी कारण है। अब चुनाव है तो अखिलेश यादव उनके दरवाजे पर हाजिरी लगा रहे हैं।
ये वही अखिलेश यादव हैं जिन्होंने 2024 में कुँवर साहब की जगह राम मंदिर के विरोध में केस लड़ने वाले कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजा था।
इसके बाद सिंह परिवार ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी, जबकि कुँवर रेवती रमण सिंह सपा के सह-संस्थापक रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को पहली बार औक़ात तब दिखाई जब उन्होंने अपने बेटे को न केवल कांग्रेस का टिकट दिलवाया बल्कि प्रयागराज लोकसभा क्षेत्र से जिता भी दिया। 42 साल बाद इस सीट पर कांग्रेस जीती।
अखिलेश यादव को याद रखना चाहिए कि जब उनके पिता मुलायम सिंह यादव की कोई औक़ात नहीं हुआ करती थी, तब कुँवर साहब संयुक्त उत्तर प्रदेश में नेता-प्रतिपक्ष हुआ करते थे। 'जनता दल' के स्तम्भ थे। स्वयं 8 बार विधायक, 2 बार लोकसभा सांसद रहे। मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता को हराया। राज्यसभा सांसद बने। बेटे को भी विधायक, मंत्री और सांसद बनाया।
अखिलेश यादव को इस बेइज़्ज़ती के बाद अब याद करना चाहिए कि कैसे 2 वर्ष पूर्व जब कुँवर रेवती रमण सिंह लखनऊ में अस्पताल में भर्ती थे तब यही अखिलेश यादव उनका हालचाल तक लेने नहीं गए थे। प्रयागराज गए तो उनसे मिले नहीं।

अब चिड़िया चुग गई खेत तो...

समाजवादी पार्टी के अंदरखाने बीते एक हफ्ते में प्रदेश के अलग-अलग जिलों में समाजवादी पार्टी के नेता कभी मुखिया अखिलेश यादव के सामने अनाप-शनाप बातें तो कभी उनके खिलाफ नारेबाजी करते दिख रहे हैं। पार्टी में MY समीकरण हावी हो रहा है। इसके 2 हालिया उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें सपा की महिला सांसदों को यादव-मुस्लिम नेताओं के हाथों सार्वजनिक रूप से बेईज्जत होना पड़ा।

पिछले हफ्ते पीडीए की बैठक में मुरादाबाद से सांसद रुचि वीरा को न बुलाने और कार्यक्रम में पोस्टर और बैनर से उनका फोटो हटाने का विवाद गरमाया। इसके बाद लखनऊ में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बैठक बुलाई जिसमें मुरादाबाद के 5 बड़े नेताओं को शामिल किया गया।

बैठक में शामिल राज्यसभा सांसद जावेद अली, पूर्व मंत्री और विधायक कमाल अख्तर, जिला अध्यक्ष जयवीर यादव और पूर्व विधायक युसूफ अंसारी के सामने सांसद रुचि वीरा ने अपनी शिकायत रखी और इसके पीछे कमाल अख्तर की भूमिका की बात भी कह डाली।

हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैठक में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ही रुचि वीरा और कमाल अख्तर के बीच तीखी बहस हुई। इसके बाद रुचि वीरा ने कमाल अख्तर पर कार्रवाई की माँग कर डाली।

हालाँकि इसके बाद मंगलवार (30 जून 2026) को कमाल अख्तर ने अपने मुख्य सचेतक के पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे ने एक बार फिर यह जता दिया कि रुचि वीरा के साथ हुए उनके विवाद केवल बहस नहीं थी, बल्कि यह मामला अब संगठनात्मक स्तर तक पहुँच चुका है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के बांदा में समाजवादी पार्टी की बैठक हुई, जिसमें सांसद कृष्णा देवी और विधायक विशंभर यादव के बीच विवाद हो गया। इस दौरान विधायक ने सांसद कृष्णा देवी को उंगली दिखाते हुए तमीज से बात करने का ज्ञान दे डाला। लगभग आधे घंटे तक चली इस गहमागहमी दौरान सपा कार्यकर्ता दोनों को शांत करने की जद्दोजहद में लग रहे।

बांदा वाला मामला अब तक ठंडा नहीं हुआ था कि तीसरा मामला प्रयागराज से आ गया। जहाँ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पहुँचने पर अंजान आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाये और ‘गो बैक’ के नारे लगाए।

इसके बाद सपा के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने गुंडई दिखानी शुरू कर दी और काला झंडा दिखा रहे अंजान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आशीष दुबे और भदोही के जिला अध्यक्ष की जमकर पिटाई कर दी। पुलिस के पहुँचने पर मामला शांत हुआ।

यह सभी घटनाएँ समाजवादी पार्टी के अंदर चल रही उठापटक को जनता के सामने लेकर आ रही हैं। रुचि वीरा और सांसद कृष्णा देवी के साथ चल रहे विवाद समाजवादी पार्टी के लिहाज से इस बात को जनता के सामने लेकर आ रहे हैं कि सपा में महिला जनप्रतिनिधि की भूमिका कुछ खास बेहतर स्थिति में नहीं है।

सालार मसूद की दरगाह पर 10 साल में आए चढ़ावे का नहीं मिला हिसाब, ‘घोटाले’ से जुड़ा सपा के पूर्व मंत्री का भी नाम

                              बहराइच की सालार मसूद दरगाह (फाइल फोटो साभार: AajTak)
राममन्दिर में आए चढ़ावे की चोरी को लेकर पूरा मीडिया और राम विरोधी चील-कौओं की तरह चीख-चिल्ला रहे हैं लेकिन मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों में हो रहे घोटालों पर सबको सांप सुंघा हुआ है। किसी में बोलने की हिम्मत नहीं। 
वक़्फ़ बोर्ड की भी हिम्मत नहीं कि इनसे अवान्तुकों से मिलने वाली राशि का हिसाब ले सके। क्योकि ये सभी जानते हैं कि हिन्दुओं को इनके ही देवी-देवताओं के विरुद्ध भड़काना आसान है, लेकिन जहाँ मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों में हो रहे घोटालों पर मुंह खोला बाजा बज जाएगा। इन दरगाहों पर जो चढ़ावा आता है 99% हिन्दुओं का होता है। दरगाह चाहे सालार की हो या अजमेर की दोनों गाज़ियों की हैं। इन गाज़ियों की दरगाहों पर जाने वाले कालनेमि हिन्दू हैं। क्योकि दूसरे धर्म के लोगों को इस्लाम कबूलवाने और उसके कहे मुताबिक इस्लाम नहीं कबूलने पर जान लेने वाले को गाज़ी कहते हैं। इसीलिए ऐसे लोगों की दरगाह पर जाने वाले हिन्दुओं को कालनेमि हिन्दू कहा जाता है।     

उत्तर प्रदेश के बहराइच की सालार मसूद दरगाह एक बार फिर विवादों में है। इस बार मामला दरगाह पर आने वाले चढ़ावे और उसके वित्तीय रिकॉर्ड से जुड़ा है। आरोप है कि दरगाह में पिछले कई वर्षों में आए चढ़ावे और दान का पूरा हिसाब उपलब्ध नहीं है। जिलाधिकारी की ओर से रिकॉर्ड माँगे जाने के बाद भी कई सालों का वित्तीय ब्योरा नहीं मिल पाया।

इसके बाद दरगाह में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका जताई जा रही है। मामले में भाजपा (बीजेपी) नेताओं ने करोड़ों रुपए की हेराफेरी का आरोप लगाया है, जबकि समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री यासर शाह का नाम भी विवाद में सामने आया है। दूसरी तरफ दरगाह इंतजामिया कमेटी सभी आरोपों को बेबुनियाद बता रही है।

दरगाह के चढ़ावे को लेकर बवाल

बहराइच की सालार मसूद दरगाह को देश की प्रसिद्ध दरगाहों में गिना जाता है। यहाँ हर साल लाखों मुस्लिम पहुँचते हैं और नकद दान के अलावा सोना, चाँदी और अन्य कीमती वस्तुएँ चढ़ाते हैं। हाल के दिनों में दरगाह के चढ़ावे और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सवाल उठने लगे।

विवाद तब और बढ़ गया जब दरगाह से जुड़े कुछ लोगों और भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि दरगाह में आने वाले चढ़ावे का सही हिसाब-किताब नहीं रखा गया। आरोप यह भी है कि वर्षों से जमा हुई धनराशि और अन्य संपत्तियों के उपयोग में गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं। इसी बीच कुछ पुश्तैनी खादिमों ने दावा किया कि दरगाह में चढ़ाई गई सोने-चाँदी की कीमती ज्वेलरी अब दिखाई नहीं दे रही है। उनका कहना है कि अगर आभूषण सुरक्षित हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया जाना चाहिए।

भाजपा के आरोप

विवाद को लेकर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कुँवर बासिल अली ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और पूरे मामले की SIT से जाँच कराने की माँग की है।कुँवर बासिल अली का आरोप है कि दरगाह वक्फ नंबर-19 की बेशकीमती संपत्तियों और चढ़ावे के प्रबंधन में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुई हैं।

बासित अली ने माँग की है कि पिछले लगभग 20 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। उनका आरोप है कि दरगाह में आने वाले दान, चढ़ावे और चंदे की रकम में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई है। उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष जाँच होने पर करोड़ों रुपए के वित्तीय गड़बड़ी का सच सामने आ सकता है।

मामला बढ़ने के बाद प्रदेश सरकार के प्रभारी मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी से विस्तृत रिपोर्ट माँगी है। रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर देने को कहा गया है। इससे साफ है कि प्रशासन भी आरोपों को गंभीरता से देख रहा है।

डीएम ने माँगा ब्योरा, लेकिन रिकॉर्ड नहीं मिला

बहराइच के जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी ने दरगाह के वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी माँगी तो कई सवाल खड़े हुए। जाँच के दौरान यह बात सामने आई कि पिछले 10 वर्षों के चढ़ावे और आय-व्यय से जुड़े कई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह प्रबंधन की ओर से पूरा वित्तीय ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

इसी वजह से बड़े वित्तीय गोलमाल या घोटाले की आशंका जताई जा रही है। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को पत्र भेजकर जाँच की आवश्यकता बताई है। जाँच में एक कर्मचारी की नियुक्ति पर भी सवाल उठे हैं, जबकि वर्तमान समय में 170 कर्मचारियों के काम करने का दावा कमेटी कर रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर दरगाह में हर साल बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता रहा है, तो उसका पूरा लेखा-जोखा कहाँ है और रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं है।

सपा के पूर्व मंत्री की मिलीभगत के आरोप

इस पूरे विवाद में समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री यासर शाह का नाम भी सामने आया है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि दरगाह की इंतजामिया कमेटी में शामिल कुछ लोगों के साथ मिलकर वित्तीय अनियमितताओं को संरक्षण दिया गया।

कुँवर बासित अली ने मुख्यमंत्री से की गई शिकायत में यासर शाह की भूमिका की भी जाँच कराने की माँग की है। उनका आरोप है कि दरगाह से जुड़े आर्थिक मामलों में पूर्व मंत्री की भी भूमिका रही है और इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

दरगाह कमेटी ने क्या सफाई दी?

वहीं दरगाह इंतजामिया कमेटी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कमेटी के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट दिलशाद अहमद का कहना है कि भ्रष्टाचार और गबन के आरोप पूरी तरह निराधार हैं।

कमेटी का दावा है कि दरगाह का हर वित्तीय लेनदेन नियमों के अनुसार होता है और सभी प्रक्रियाएँ वक्फ बोर्ड के नियमों के तहत संचालित की जाती हैं। कमेटी के अनुसार, चढ़ावे की गिनती सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। इसलिए हेराफेरी की संभावना नहीं है। कमेटी ने यह भी कहा है कि कर्मचारियों की नियुक्तियाँ और अन्य प्रशासनिक कार्य भी पूरी पारदर्शिता के साथ किए जाते हैं।

कब-कब विवादों में रही सालार मसूद दरगाह?

बहराइच की सालार मसूद दरगाह पिछले कुछ वर्षों में कई बार विवादों में रही है। 2025 में दरगाह में लगने वाले जेठ मेले और उर्स को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हुआ, जब बहराइच प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के मद्देनजर मेले की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँचा और कई दिनों तक राजनीतिक व सामाजिक बहस का विषय बना रहा।
जून 2026 में एक नया विवाद तब सामने आया, जब प्रदेश सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने दरगाह परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराने की माँग की। उनका कहना था कि दरगाह के ऐतिहासिक और पुरातात्विक पहलुओं की जाँच होनी चाहिए।

टीएमसी के बाद अब INDI गठबंधन में भी टूट, उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ और समाजवादी पार्टी में भी टूट


जो काम मोदी सरकार-3 को 400 सांसद होने पर करना था वही काम होने जा रहा है 240 सांसदों के होते। As you sow you will reap यानि हिन्दी में जो बोया वही काटो यानि कांग्रेस ने जो बोया वही आज INDI गठबंधन को काटना पड़ रहा है। इतिहास में झाँकने पर मालूम होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर बीजेपी तत्कालीन भारतीय जनसंघ तक जितनी भी पार्टियां है सभी कांग्रेस से निकली है। जनसंघ वर्तमान बीजेपी जैसी पार्टियां तो अपना अस्तित्व बनाने में सफल रही और कुछ सिर्फ क्षेत्रीय पार्टी। 
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सत्ताधारी महागठबंधन में शामिल दलों की एकजुटता की चूलें हिलाकर रख दी हैं संसद के उच्च सदन की दूसरी सीट पर प्रियंका गांधी के करीबी कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की करारी शिकस्त के बाद सत्ताधारी महागठबंधन यानी INDI ब्लॉक की दीवारें पूरी तरह दरकती दिख रहीं हैं इस चुनावी मुकाबले ने गठबंधन के भीतर चल रहे अविश्वास का एक ऐसा ‘एनकाउंटर’ किया है, जिसके जख्म के निशान अब मुख्यमंत्री आवास की दीवारों पर नजर आ रहे हैं चुनाव के इस लिटमस टेस्ट में बुरी तरह जख्मी नजर आ रही कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल(RJD) और वामपंथी दल माले(CPI-ML) पर खुलेआम क्रॉस वोटिंग और भितरघात का आरोप मढ़ा है वहीं राजद ने भी अब पलटवार करते हुए कांग्रेस को ही असली ‘गद्दार’ बता दिया है और उसे गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की मांग तेज कर दी है
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार बैजनाथ मिश्रा का मानना है कि यह चुनाव परिणाम महज एक सीट की हार नहीं, बल्कि महागठबंधन के भीतर आपसी भरोसे का पूरी तरह अंत है ऐसे में चुनाव के बाद घायल अवस्था में पड़ी कांग्रेस के नेता जहां तल्ख तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं राजद भी पूरी तरह आक्रामक है राजद के राष्ट्रीय महासचिव भोला प्रसाद यादव ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी खुद की अंदरूनी कलह और कमजोरी को छिपाने के लिए सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ रही है उन्होंने कहा कि जो दल अपने विधायकों को संभाल नहीं सकता, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है
खैर, जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक कांग्रेस ने जितनी पार्टियों में टूट और विधान सभाओं को भंग किया ऐसा कभी नहीं हुआ। आज अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी वही काम कर रही है क्योकि बीजेपी को पास कराना है महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को पारित करवाना जिसके लिए जरुरत है संसद में दो-तिहाई बहुमत। 
पार्टी छोड़कर आने वाले किसी भी विधायक से लेकर सांसद तक किसी को बीजेपी अपनी पार्टी में शामिल करने की बजाए अपनी सहयोगी पार्टियों की तरफ हस्तांतरण किया जा रहा है।    
देश में विपक्ष की सियासत इस समय दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन के एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर राज्यों के सियासी गलियारों तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची भगदड़ ने भारतीय दलबदल विरोधी कानून की गलियों और राजनीतिक शुचिता के दावों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के दूसरी छोटी पार्टी में विलय के बाद अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 सांसदों की बगावत सुर्खियों में है। इसको लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत तो गालीगलौज तक पर उतर आए हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुनबे में टूट की सुगबुगाहट आ रही है। ये महज छिटपुट सियासी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे एक गहरे ढांचागत बदलाव का संकेत हैं। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि मजबूत दिखाई देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले भी अब अंदरूनी अंतर्विरोधों और एनडीए की राष्ट्रवादी राजनीति के आकर्षण के कारण ढह रहे हैं।

ममता के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी सांसदों का विलय
इस पूरे राजनीतिक भूचाल की शुरुआत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से हुई, जहां भाजपा ने टीएमसी को रोंदकर सरकार बनाई। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

उद्धव गुट को एक और झटका: शिवसेना की बगावत
दूसरी ओर महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा और अब लोकसभा स्तर पर पार्टी को एक और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। पार्टी के छह प्रमुख सांसदों, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना के बागी रुख ने उद्धव ठाकरे खेमे की रीढ़ तोड़ दी है। इस टूट ने पार्टी नेतृत्व की उस संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके लिए कभी बाल ठाकरे की शिवसेना जानी जाती थी।

हताशा से भरे सांसद संजय राउत गाली गलौज पर उतरे
शिवसेना उद्धव गुट के इन सांसदों के गुट ने अभी किस पार्टी में विलय किया है, यह तो साफ नहीं हुआ है, लेकिन इस बिखराव की तल्खी तब खुलकर सामने आ गई जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना आपा खो बैठे। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज पर उतर आए। राउत का यह गुस्सा और तीखे आरोप दरअसल उस लाचारी और हताशा को दर्शाते हैं, जो एक समय महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र रहे दल के भीतर अपनी जमीन खिसकने के कारण पैदा हुई है। गाली-गलौज की यह राजनीति बताती है कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

समाजवादी पार्टी पर भी मंडरा रहे हैं बड़ी टूट के बादल
संसद के इस दलबदल चक्र की तपिश अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के इस सनसनीखेज दावे ने यूपी की सियासत में खलबली मचा दी है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 26 सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं और उनके भीतर गहरी फूट पड़ चुकी है। राजनीति में इस तरह के दावों को अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है। समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में चार सांसद हैं। ऐसे में 25 सांसदों के टूटने की खबरों से पार्टी में हड़कंप की स्थिति बन गई है और सांसदों को रोकने के रणनीति बनाई जा रही है।

‘सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस चर्चा को हवा दे दी है। मौर्य का यह कहना कि’सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’, दरअसल सपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है। यह बयान दिखाता है कि सत्ता पक्ष विपक्ष के किलों में लगी दरारों को भांप चुका है और केवल सही वक्त का इंतजार कर रहा है। अखिलेश यादव के लिए अपने इस बड़े कुनबे को एकजुट रखना आने वाले दिनों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कमजोर पड़ता क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व और केंद्रीय सत्ता का आकर्षण
इन तीनों राज्यों के घटनाक्रमों को अगर एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के क्षेत्रीय दल इस समय एक बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। जब तक ये दल सत्ता में रहते हैं या मजबूत दिखते हैं, तब तक इनका अंतर्विरोध दबा रहता है। लेकिन जैसे ही चुनावी हार या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, वैसे ही सांसदों और विधायकों का मोहभंग होने लगता है। टीएमसी, शिवसेना और सपा जैसी पार्टियों का ढांचा अक्सर एक ही परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। ऐसे में जब जमीनी स्तर पर नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो महत्वाकांक्षी नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगने लगता है। केंद्रीय सत्ता का संरक्षण और उसके साथ मिलने वाले लाभ इन सांसदों को अपनी मूल पार्टी की विचारधारा को छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल आत्ममंथन करें कि ऐसी नौबत क्यों आई
संजय राउत के बयानों और विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह भी साफ है कि विपक्ष की राजनीति में अब गरिमापूर्ण संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है। जब कोई नेता या सांसदों का समूह पार्टी छोड़ता है, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई। इसके विपरीत, बागी नेताओं को गद्दार घोषित करना, उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और व्यक्तिगत कीचड़ उछालना अब एक आम चलन बन गया है। यह रवैया राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति और दलबदल की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उसे निजी दुश्मनी और गाली-गलौज के स्तर पर ले जाना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।

दलों ने आंतरिक लोकतंत्र नहीं सुधारा तो भविष्य और चुनौतीपूर्ण
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का यह खेल उस आम मतदाता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो किसी पार्टी की विचारधारा, उसके घोषणापत्र और उसके नेता का चेहरा देखकर अपना वोट देता है। जब चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ या दबाव में आकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाता है, तो जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था कम होने लगती है। टीएमसी, शिवसेना और संभावित रूप से सपा के भीतर चल रहा यह घटनाक्रम यह चेतावनी है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी अंदरूनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं सुधारा और जनमत का सम्मान नहीं किया, तो उनके लिए आने वाला भविष्य और चुनौतीपूर्ण होगा। सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कीमत पर पाई गई सत्ता लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

क्या है दलबदल विरोधी कानून का लक्ष्मण रेखा
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू दलबदल विरोधी कानून मूल रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वार्थी पाला-बदल को रोकने के लिए बनाया गया था, जिसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में व्हिप (पार्टी निर्देश) के उल्लंघन में मतदान करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त की जा सकती है; हालांकि, इस कानून की सबसे बड़ी कानूनी खिड़की इसके ‘विभाजन और विलय’ संबंधी प्रावधानों में छिपी है, जिसके मुताबिक यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ मिलकर एक अलग गुट बनाते हैं और किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में अपने गुट का आधिकारिक रूप से विलय कर लेते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई लागू नहीं होती और उनकी सांसदी या विधायकी पूरी तरह सुरक्षित रहती है। जैसा कि हाल ही में टीएमसी के 20 सांसदों ने किया।

समाजवादी पार्टी के PDA मतलब Parivar Development Authority यानि अखिलेश यादव की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी!


कहते हैं "आसमान पर तारे बहुत हैं लेकिन तोड़ने के लिए अक्ल चाहिए" समाजवादी पार्टी वही कर रही है। PDA का नाम देकर खूब जनता को पागल बनाया जा रहा है और जनता बन रही है। PDA का मतलब बताया जाता है "पिछड़ा", "दलित" और "अल्पसंख्यक", जबकि इन लोगों का उद्धार यानि भला करने की बजाए अपने ही परिवार का भला किया। उनकी भावी पीढ़ियों तक के ऐश से रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम कर दिया गया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, जनता देख ले खुली आंख से। फिर भी जनता अंधी बन समाजवादी पार्टी को वोट देती है तो उससे बड़ा अँधा कोई नहीं। 
हिन्दुओं को जातियों में बांट जातिगत आधारित कई पार्टियां बन गयी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह भला इन पार्टियों के मुखियाओं के परिवारों का हुआ है और हो भी रहा है। हिन्दू है कि इनके मकड़जाल में फंस वोट दे देता है जबकि मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट होकर बीजेपी को हराने वाली पार्टी को वोट देता है। समझदार कौन हिन्दू या मुसलमान?   

           

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर यह बहस सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में लंबे समय से सैफई परिवार की निर्णायक भूमिका रही है। समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में समाजवादी विचारधारा और आम कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे लाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ पार्टी की कमान एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। आलोचकों का आरोप रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसदों और महत्वपूर्ण चुनावी सीटों तक पर सैफई परिवार का प्रभाव दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह यादव परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रही है।

परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे
मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह राजनीतिक वर्चस्व आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी जारी है। यादव परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे, कई मंत्री बने और पार्टी के संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस कदर हावी रहा है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश, डिंपल, धर्मेंद्र, अक्षय, आदित्य और तेज प्रताप यादव तक पार्टी की हर सुरक्षित और वीआईपी सीट परिवार के भीतर ही घूमती रहती है। समाजवादी सोच के आधार पर बनी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का यह हाल है कि साढ़े तीन दशक के बाद भी पार्टी अध्यक्ष मुलायम परिवार के अलावा कोई नहीं बन पाया है।

पांच भाईयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह थे सबसे तेज
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के बाबा का नाम मेवाराम था। मेवाराम के दो बेटे थे। सुगहर सिंह और बच्चीलाल सिंह। सुघर सिंह के पांच बेटे थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, रतन सिंह, राजपाल सिंह यादव, अभय राम सिंह और शिवपाल सिंह यादव। भाइयों में मुलायम सिंह तीसरे नंबर और शिवपाल सिंह सबसे छोटे हैं। मुलायम सिंह यादव ने दो शादी की है। मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे अखिलेश यादव हैं। अखिलेश यादव ने डिंपल यादव से शादी की है। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता है। प्रतीक यादव मुलायम की दूसरी पत्नी साधना सिंह के बेटे हैं। प्रतीक का पिछले महीने निधन हो गया। अपर्णा यादव की शादी प्रतीक यादव से हुई थी। इस तरह अपर्णा मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू हैं। मुलायम के भाई, बेटे, भतीजे के अलावा अब इस कुनबे की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में है।

शिक्षक से सपा के संस्थापक और मुख्यमंत्री तक का सफर
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समाजवादी आंदोलन से की। वर्ष 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए जसवंतनगर सीट से विधायक चुने गए। आपातकाल के दौरान जेल गए और बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1989-91, 1993-95 और 2003-07) रहे। इसके अलावा वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव कई बार लोकसभा सांसद रहे और लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे। सपा की राजनीतिक पहचान और संगठन का निर्माण मुख्य रूप से उनके नेतृत्व में हुआ। मुलायम यादव ने ही अयोध्या में कार सेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाईं थीं। मुलायम सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव भी पूरी तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं।

मुलायम के पांच भाइयों में सबसे बड़े, बेटा बना सांसद
मुलायम के पांच भाइयों में अभयराम सबसे बड़े हैं। धर्मेंद्र यादव उनके बेटे हैं। धर्मेंद्र तीन बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले 2004 में मैनपुरी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके बाद 2009 और फिर 2014 में बदायूं से जीत हासिल की। 2019 लोकसभा चुनाव में वह हार गए।

मुलायम सिंह के भाई, पौत्र को मैनपुरी से बनाया सांसद
मुलायम सिंह के पांच भाइयों में रतन सिंह दूसरे नंबर पर हैं। मैनपुरी के पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव रतन सिंह के पौत्र हैं। तेज प्रताप के पिता रणवीर सिंह हैं। तेज प्रताप ने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी की है। तेज प्रताप की शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी से हुई है। मतलब तेज प्रताप लालू के दामाद भी हैं।

सपा के रणनीतिकार और संगठन के प्रमुख चेहरे
रामगोपाल यादव मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से सपा की राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा सांसद चुने गए और पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर रहे। नीतिगत फैसलों और संसदीय रणनीति तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संगठन निर्माता और परिवार की राजनीतिक धुरी
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सपा संगठन की रीढ़ माने गए। वे कई बार जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे। 2016 में अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण परिवार में बड़ा संघर्ष सामने आया। बाद में उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई, हालांकि बाद में फिर सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

विरासत के उत्तराधिकारी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की दूसरी पीढ़ी के सबसे प्रमुख नेता हैं। उन्होंने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 और 2009 में भी वे कन्नौज से सांसद चुने गए। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया और अखिलेश यादव 38 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2017 में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष के बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। 2022 में वे करहल विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

मुलायम परिवार की बहू से संसद तक का सफर
डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। उन्होंने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं। 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जहां वह सांसद चुनी गईं। 2014 और 2019 में भी कन्नौज से चुनाव लड़ा, लेकिन 2019 में भाजपा उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचीं और वर्तमान में सांसद हैं।

अखिलेश के चचेरे भाई ने मैनपुरी से जीता पहला चुनाव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे और रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। उन्होंने 2004 में पहली बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीता। वे 2009 और 2014 में बदायूं लोकसभा सीट से सांसद बने। 2019 में भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए। 2022 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। इसके बावजूद वे पार्टी के प्रमुख प्रचारकों और रणनीतिक नेताओं में शामिल रहे हैं।

मुलायम के भतीजे का फिरोजाबाद से संसद तक का सफर
अक्षय यादव रामगोपाल यादव के पुत्र और मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। वे पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं और समय-समय पर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

मुलायम के भाई के पौत्र और लालू यादव के दामाद
तेज प्रताप यादव मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं। वे मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीता। 2019 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों में उनकी भूमिका फिर चर्चा में रही।

यादव परिवार की नई पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री
आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की नई राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी की युवा राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माना जाता है। वे लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। सपा में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि सैफई परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही है।

अखिलेश के चचेरे भाई को सपा की युवा ईकाई से जोड़ा
समाजवादी युवजन सभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव अनुराग यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दो पुत्र धर्मेंद्र यादव और अनुराग यादव हैं। अनुराग यादव उर्फ दीपू यादव समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में राष्ट्रीय सचिव रहे हैं। वर्ष 2013 में उन्हें यह संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई थी। वे चुनावी राजनीति में अपने भाई धर्मेंद्र यादव की तरह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे, लेकिन पार्टी संगठन और सैफई परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भूमिका रही है।

राम गोपाल यादव के अपने भांजे को एमएलसी बनाया
एमएलसी अरविंद सिंह यादव भी सैफई परिवार की राजनीतिक शाखा से जुड़े हुए हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। उनका संबंध मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के परिवार से है। रामगोपाल यादव की बहन गीता देवी हैं। अरविंद सिंह यादव गीता देवी के ही पुत्र हैं। इस प्रकार अरविंद यादव रामगोपाल यादव के भांजे हैं। अरविंद यादव का राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ। वे मैनपुरी जिले की करहल ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य बने। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद के दौरान उनका नाम चर्चा में आया था।

मुलायम के भतीजे को इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया
इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं। वे मुलायम सिंह यादव के सगे छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र हैं। अंशुल यादव लंबे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध जीता। वर्ष 2021 में वे फिर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने और निर्विरोध निर्वाचित हुए।

अखिलेश की भाभी को सैफई ब्लॉक प्रमुख बनाया
सैफई ब्लॉक प्रमुख मृदुला यादव का संबंध भी मुलायम सिंह यादव के परिवार से है। वह अखिलेश यादव की चचेरी भाभी लगती हैं। वह मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पुत्र रणवीर सिंह यादव की पत्नी हैं। रणवीर सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे थे। मृदुला यादव लंबे समय तक सैफई की स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं। वह सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर कई बार निर्वाचित हो चुकी हैं। सैफई ब्लॉक पर पिछले लगभग ढाई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार या उससे जुड़े सदस्यों का प्रभाव रहा है। पहले रणवीर सिंह यादव, फिर धर्मेंद्र यादव, उसके बाद तेज प्रताप यादव और बाद में मृदुला यादव इस पद तक पहुंचे।

अखिलेश की चचेरे भाई सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने
इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष आदित्य यादव का संबंध मुलायम परिवार से है। वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई तथा अखिलेश यादव के चाचा हैं। आदित्य यादव सैफई परिवार की नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में जसवंतनगर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़कर राजनीतिक शुरुआत की, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2016 में उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक की ओर से उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक और प्रदेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन में प्रतिनिधि चुना गया था। वर्ष 2021 में वे निर्विरोध रूप से इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर उनके पिता शिवपाल सिंह यादव लगभग 33 वर्षों तक काबिज रहे थे।

अखिलेश की चचेरी बहन इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक
इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक डॉ. अनुभा यादव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की चचेरी बहन लगती हैं। वह शिवपाल सिंह यादव की पुत्री हैं। शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। डॉ. अनुभा यादव की शादी आईएएस अधिकारी अजय यादव से हुई। डॉ. अनुभा यादव सैफई परिवार की उन महिला सदस्यों में शामिल हैं, जिन्हें सहकारी संस्थाओं में जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2021 में इटावा जिला सहकारी बैंक के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव के परिवार के कई सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में डॉ. अनुभा यादव भी बैंक की निदेशक चुनी गई थीं।

मुलायम सिंह यादव के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय
मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन 2003 में हुआ। इसके बाद साधना गुप्ता के साथ उनके संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने चुनावी हलफनामों में साधना गुप्ता को अपनी पत्नी के रूप में दर्ज किया। हालांकि साधना गुप्ता ने कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार की चर्चाओं में उनका नाम कई बार सामने आया। 2022 में उनका निधन हो गया।

राजनीति से दूरी लेकिन परिवार की चर्चित शाखा
प्रतीक यादव साधना गुप्ता के पुत्र हैं और मुलायम सिंह यादव के सौतेले पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी है और मुख्य रूप से व्यवसाय और फिटनेस के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। प्रतीक कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए और न ही समाजवादी पार्टी में कोई संगठनात्मक पद संभाला।

सपा परिवार की बहू लखनऊ से चुनाव लड़कर हारीं
अपर्णा यादव, प्रतीक यादव की पत्नी हैं। उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं। बाद में 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्तमान में वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।

समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है पूरी समाजवादी पार्टी; रामगोपाल यादव ने अमित शाह को सौंपी चिट्ठी


उत्तर प्रदेश में चुनाव होने से पहले ही लगता है चुनाव परिणाम घोषित हो गया है। राहुल गाँधी की छत्रसाया में रहने वाली एक और पार्टी अपने अंत की ओर चल पड़ी है। महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस(TMC) में टूट और दल-बदल चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर भी बड़ा दावा सामने आया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि सपा में जल्द ही बड़ी टूट हो सकती है।

उन्होंने कहा, “समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र बंगाल छोड़िए, समूची सपा, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।”

एक बयान में राम गोपाल यादव ने कहा, “अब यूपी का नंबर है, राम गोपाल जी एक चिट्ठी अमित शाह को थमा दिए हैं और उनसे कह दिए हैं उनसे कि इतने लोगों का नाम है। इन लोगों को अपने पास ले लीजिए, हम लोगों की जान बचाकर रखिएगा।”

राजभर ने अपने बयान में कई घोटालों का भी जिक्र किया है जिसके बाद सियासी हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 : ममता की तरह धमकाने पर उतरे अखिलेश यादव, कहा- सरकार बनी तो करेंगे सख्त कार्रवाई: एनकाउंटर्स को बताया फर्जी

जिस तरह बंगाल में ममता बनर्जी मुसलमानों का डर दिखाकर हिन्दुओं को धमका रही थी, ठीक उसी रास्ते पर अखिलेश यादव चल निकले हैं। योगी आदित्यनाथ से पहले उत्तर प्रदेश में जो जंगल राज था उसी की वापसी करने की तैयारी की जा रही है। जो पुलिस समाजवादी पार्टी के मंत्री की भैंस ढूंढने कानून व्यवस्था को छिन बिन्न कर रखा था वही वापस लाने पुलिस को धमकाना शुरू कर दिया है। जब सत्ता से 10 साल दूर रहने की इतनी तड़प हो रही है कि पुलिस अधिकारियों को धमका रहे हैं हिन्दुओं का क्या होगा? क्या हिन्दू योगी राज से पहले की तरह समाजवादी पार्टी के राज में अपने त्यौहारों को खुलकर नहीं मना सकेंगे? बंगाल की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं को ही नहीं बल्कि सभी धर्मों को समाजवादी पार्टी के खिलाफ लामबंद होना होगा।  
चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने सत्ता के बिना किस तरह बिलबिला रहे हैं कि प्रदेश में सत्ताभोग नहीं तो चलो संसद पहुँच कर राजशाही करो। ऐसे नेताओं को ना ही देश की चिंता है और ना ही जनता की इन्हे चाहिए विलासिता जीवन और तिजोरी भरने का साधन।  
देखिए सोशल मीडिया पर वायरल ‎ये है असली रुप इन कांग्रेसी,सपा,आरजेडी,टीएमसी और अन्य पारिवारिक पार्टी का।
हिंदुओं के वोट पाने के लिए 2014 के बाद से हमें मजबूरन पूजा करने मंदिरों में जाना पड़ रहा है। लेकिन उससे आप कोई गलतफहमी मत पाल लेना कि हम अब बदल गए हैं, खुदा कसम हम वही है और वही रहेंगे जो 2014 पहले हुआ करते थे
देखिए न, हम जो भी तोड़फोड़ करते हैं हिंदुओं में ही करते हैं मुसलमानों को जातियों में बांटकर आपस में लड़ाने का काम ना हम तब करते थे और न आज कर रहे हैं, ऐसा गंदा काम करने की बात तो हम कभी सोचते भी नहीं
 2027 में रहम मेरे ऊपर ही करना किसी और पर नहीं,आपको खुदा का वास्ता  
आज राज्य की जनता योगी मॉडल अपनाने की मांग कर रही है, और समाजवादी पार्टी और INDI गठबंधन हिन्दुओं को जातियों में बाँट राज करने की हिमाकत कर रहे हैं। मुसलमानों को भी सोंचना होगा कि जो अपने धर्म का नहीं किसी दूसरे के मजहब नहीं हो सकता। अगर हिन्दुओं को ये लोग बांट रहे हैं तो बदनाम मुसलमान भी हो रहा है।   
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब धमकाने पर उतर आए हैं। अखिलेश यादव ने कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर बयान देते हुए धमकी दी है कि प्रदेश में उनकी सरकार बनती है तो जिन अधिकारियों ने फर्जी एनकाउंटर किए हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इसके साथ ही अखिलेश यादव ने रोजगार के मुद्दे पर योगी सरकार और केंद्र की BJP सरकार पर आरोप लगाया कि युवाओं को नौकरी देने के मोर्चे पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में आने पर उनकी पार्टी बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी।

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी उन्होंने वादा किया कि समाजवादी सरकार बनने पर एंबुलेंस व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा और गरीबों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर तथा मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। अखिलेश ने पेट्रोल-डीजल में कथित मिलावट का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे लोगों की गाड़ियों को नुकसान हो रहा है।