उत्तर प्रदेश : सपा के सचेतक कमाल अख्तर ने पहले किया MP रुचि वीरा को बेईज्जत, अब दिया पद से इस्तीफा: कुछ दिन पहले विशंभर यादव ने MP कृष्णा पटेल को सिखाई थी ‘तमीज’, क्या फँस रहे अखिलेश?

                 अखिलेश यादव के आगे हाथ जोड़ खड़े होने वाले कुँवर रेवती रमण सिंह स्टूल पर पैर फैलाये बैठे 
उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने जो जख्म दिए है योगी ने तो उसका पासंग भी वसूल नहीं किया। पंचायत से लेकर लोक सभा और राज्य सभा में अधिकतर सदस्य मुलायम सिंह परिवार से हैं। इस पार्टी ने अपने परिवार के अलावा किसी का भला नहीं किया। हिन्दू त्यौहारों पर इतनी पाबंदियां थी कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के निकट रहने वाले हिन्दू खुलकर अपना त्यौहार नहीं मना सकते थे, लेकिन आज खुलकर मनाते हैं।  

उत्तर प्रदेश में सियासत नितरोज हिचकोले ले रही है जिसे समझना बहुत मुश्किल हो रहा है। इधर अखिलेश यादव राममन्दिर चढ़ावे की चोरी को लेकर योगी आदित्यनाथ और बीजेपी को घेर रहे हैं तो उधर इनकी ही समाजवादी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रभु श्रीराम की अगर यही लीला रही 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव में अखिलेश की नैया डूबने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। सूत्रों के हवाले से इस चुनाव में MY(मुस्लिम-यादव) भी नाकाम हो रहा है। जिस तरह 2017 से मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने सनातन पर कीजड़ फेंके जाने अन्य हिन्दुओं के अलावा यादव समाज भी समाजवादी पार्टी से नाराज है। दूसरे, योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि "अखिलेश यादव मथुरा मन्दिर पर खुलकर बोलकर दिखाएं।"         

कुँवर रेवती रमण सिंह ने अखिलेश यादव को उनकी औक़ात दिखा दी है। किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा होगा।
'व्हाइट हाउस' में रहने वाले सामंतवादी अखिलेश यादव जब उनसे मिलने प्रयागराज पहुँचे तो रेवती रमण सिंह ने एक स्टूल मँगाया। उस स्टूल को अखिलेश यादव के सामने रखा गया। फिर कुँवर साहब ने उसी पर पाँव रखा।
इसके पीछे भी कारण है। अब चुनाव है तो अखिलेश यादव उनके दरवाजे पर हाजिरी लगा रहे हैं।
ये वही अखिलेश यादव हैं जिन्होंने 2024 में कुँवर साहब की जगह राम मंदिर के विरोध में केस लड़ने वाले कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजा था।
इसके बाद सिंह परिवार ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी, जबकि कुँवर रेवती रमण सिंह सपा के सह-संस्थापक रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को पहली बार औक़ात तब दिखाई जब उन्होंने अपने बेटे को न केवल कांग्रेस का टिकट दिलवाया बल्कि प्रयागराज लोकसभा क्षेत्र से जिता भी दिया। 42 साल बाद इस सीट पर कांग्रेस जीती।
अखिलेश यादव को याद रखना चाहिए कि जब उनके पिता मुलायम सिंह यादव की कोई औक़ात नहीं हुआ करती थी, तब कुँवर साहब संयुक्त उत्तर प्रदेश में नेता-प्रतिपक्ष हुआ करते थे। 'जनता दल' के स्तम्भ थे। स्वयं 8 बार विधायक, 2 बार लोकसभा सांसद रहे। मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता को हराया। राज्यसभा सांसद बने। बेटे को भी विधायक, मंत्री और सांसद बनाया।
अखिलेश यादव को इस बेइज़्ज़ती के बाद अब याद करना चाहिए कि कैसे 2 वर्ष पूर्व जब कुँवर रेवती रमण सिंह लखनऊ में अस्पताल में भर्ती थे तब यही अखिलेश यादव उनका हालचाल तक लेने नहीं गए थे। प्रयागराज गए तो उनसे मिले नहीं।

अब चिड़िया चुग गई खेत तो...

समाजवादी पार्टी के अंदरखाने बीते एक हफ्ते में प्रदेश के अलग-अलग जिलों में समाजवादी पार्टी के नेता कभी मुखिया अखिलेश यादव के सामने अनाप-शनाप बातें तो कभी उनके खिलाफ नारेबाजी करते दिख रहे हैं। पार्टी में MY समीकरण हावी हो रहा है। इसके 2 हालिया उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें सपा की महिला सांसदों को यादव-मुस्लिम नेताओं के हाथों सार्वजनिक रूप से बेईज्जत होना पड़ा।

पिछले हफ्ते पीडीए की बैठक में मुरादाबाद से सांसद रुचि वीरा को न बुलाने और कार्यक्रम में पोस्टर और बैनर से उनका फोटो हटाने का विवाद गरमाया। इसके बाद लखनऊ में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बैठक बुलाई जिसमें मुरादाबाद के 5 बड़े नेताओं को शामिल किया गया।

बैठक में शामिल राज्यसभा सांसद जावेद अली, पूर्व मंत्री और विधायक कमाल अख्तर, जिला अध्यक्ष जयवीर यादव और पूर्व विधायक युसूफ अंसारी के सामने सांसद रुचि वीरा ने अपनी शिकायत रखी और इसके पीछे कमाल अख्तर की भूमिका की बात भी कह डाली।

हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैठक में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ही रुचि वीरा और कमाल अख्तर के बीच तीखी बहस हुई। इसके बाद रुचि वीरा ने कमाल अख्तर पर कार्रवाई की माँग कर डाली।

हालाँकि इसके बाद मंगलवार (30 जून 2026) को कमाल अख्तर ने अपने मुख्य सचेतक के पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे ने एक बार फिर यह जता दिया कि रुचि वीरा के साथ हुए उनके विवाद केवल बहस नहीं थी, बल्कि यह मामला अब संगठनात्मक स्तर तक पहुँच चुका है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के बांदा में समाजवादी पार्टी की बैठक हुई, जिसमें सांसद कृष्णा देवी और विधायक विशंभर यादव के बीच विवाद हो गया। इस दौरान विधायक ने सांसद कृष्णा देवी को उंगली दिखाते हुए तमीज से बात करने का ज्ञान दे डाला। लगभग आधे घंटे तक चली इस गहमागहमी दौरान सपा कार्यकर्ता दोनों को शांत करने की जद्दोजहद में लग रहे।

बांदा वाला मामला अब तक ठंडा नहीं हुआ था कि तीसरा मामला प्रयागराज से आ गया। जहाँ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पहुँचने पर अंजान आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाये और ‘गो बैक’ के नारे लगाए।

इसके बाद सपा के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने गुंडई दिखानी शुरू कर दी और काला झंडा दिखा रहे अंजान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आशीष दुबे और भदोही के जिला अध्यक्ष की जमकर पिटाई कर दी। पुलिस के पहुँचने पर मामला शांत हुआ।

यह सभी घटनाएँ समाजवादी पार्टी के अंदर चल रही उठापटक को जनता के सामने लेकर आ रही हैं। रुचि वीरा और सांसद कृष्णा देवी के साथ चल रहे विवाद समाजवादी पार्टी के लिहाज से इस बात को जनता के सामने लेकर आ रहे हैं कि सपा में महिला जनप्रतिनिधि की भूमिका कुछ खास बेहतर स्थिति में नहीं है।

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