साकेत गोखले (फोटो साभार-india today)
मोदी सरकार पर संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाने वाले ही संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। बने फिर रहे हैं संविधान की रक्षक के चौधरी।
तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र विवादों में आ गया है। उन्होंने पत्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से सरकार को संपर्क करने का आग्रह किया है, लेकिन पत्र के लिए जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ बना हुआ है, साथ ही मोटे अक्षरों में ‘पूर्व सांसद’ लिखा हुआ है। नियम के मुताबिक, पूर्व सांसद को ऐसे लेटरहेड के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह हों।
क्या लिखा है खत में
तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद ने खत में केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह सोनम वांगचुक से संपर्क कर उनका भूख हड़ताल खत्म करवाए। वांगचुक NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में 28 जून 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गोखले ने सोशल मीडिया पर अपने उस पत्र की कॉपी को साझा किया।
गोखले ने यह पत्र 15 जुलाई 2026 को लिखा है। इसमें वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि उनका वजन महज दो सप्ताह में 8 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है। उन्होंने मंत्री से अपील की है कि वे कम से कम उनसे संवाद करें और देश भर के लाखों छात्रों की चिंता का समाधान करें।
(साभार-x@sakeygokhale)साकेत गोखले ने अपने निजी स्टेशनरी पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करके कानून का उल्लंघन किया है, क्योंकि पूर्व सांसदों और विधायकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का इस तरह से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। यह भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 (State Emblem of India – Prohibition of Improper Use Act, 2005) के तहत बनाए गए थे।
इन नियमों के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल पूर्व सांसद और विधायक, बल्कि पूर्व मंत्री, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी किसी तरह से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं कर सकते हैं। नियम 10 में कहा गया है, “इन नियमों के तहत अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति (जिनमें सरकार के पूर्व पदाधिकारी, जैसे पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व विधानसभा सदस्य, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी शामिल हैं) किसी भी प्रकार से प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा।”
इस कानून में उन अधिकारियों की सूची दी गई है जो अपने स्टेशनरी पर इस प्रतीक चिन्ह का उपयोग कर सकते हैं, और इस सूची में पूर्व सांसदों और विधायकों को शामिल नहीं किया गया है। केवल संसद और विधान सभाओं या परिषदों के वर्तमान सदस्यों को ही इसका उपयोग करने की अनुमति है और वह भी आधिकारिक कार्यों के लिए। नियम में ये बताया गया है कि किस-किस काम के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही अधिनियम की अनुसूची 1 में अधिकारियों की पूरी सूची दी गई है, जो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
किन लोगों को राज्य प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति है
2007 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग करने की अनुमति भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, लोकसभा और राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रालय और विभाग, राज्य सरकारों के विभाग, भारतीय दूतावास और उच्चायोग, केंद्र एवं राज्य सरकार के वे कार्यालय जिन्हें नियमों के अंतर्गत अनुमति दी गई हो, कुछ वैधानिक निकाय और आयोग, यदि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किया गया हो। इनके लिए भी उपयोग केवल आधिकारिक कार्य, सरकारी पत्राचार, सील, दस्तावेज, भवन, वाहन आदि तक सीमित होता है।
यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि किसी भी तरह से यह धारणा न बने कि कोई मैसेज आधिकारिक है या किसी संवैधानिक प्राधिकरण या सरकारी कार्यालय से आया है। गोखले ने अपने निजी लेटरहेड पर प्रतीक चिन्ह लगाकर यही भ्रम पैदा की है, जिसे कानून रोकना चाहता है।
नियम 10(1) के तहत साफ कहा गया है कि सरकार के सभी पूर्व पदाधिकारियों चाहे वह पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल या पूर्व जज हों, वे आधिकारिक स्टेशनरी या किसी भी दूसरे रूप में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग नहीं कर सकते। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक पद को छोड़ता है, रिटायर होता है या उसका कार्यकाल समाप्त होता है, उसका राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार भी तुरंत खत्म हो जाता है।
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