साम्यवाद एक कैंसर है, इसे शुरुआत में ही रोकना होगा - ट्रंप

सुभाष चन्द्र

सच्चाई कभी छुप नहीं सकती, देर सवेर से बाहर निकल आती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का वामपंथियों के लिए बोले गए एक-एक शब्द 100%सत्य है। भारत में वामपंथियों को अपने टीवी शो में बुलाने वालों को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। याद करिए, 1962 में हुए चीन-भारत युद्ध के दौरान वामपंथियों ने साफ कहा था कि 'कोई कम्युनिस्ट फौजियों के लिए खून नहीं देगा', उसके बावजूद लोग और अब टीवी पर चौपालें लगाने वाले इन्हे सिरमौर बने का कोई मौका नहीं छोड़ते।       

डोनाल्ड ट्रंप ने सही कहा है कि साम्यवाद (Communism) एक कैंसर है और इसे शुरुआत में ही रोकना होगा, ये लूज़र ही रहा है और रहेगा, ये प्रणाली कभी कारगर साबित नहीं हुई

आज दुनिया के कुछ देश हैं चीन, रूस, उत्तर कोरिया, क्यूबा, लाओस और वियतनाम जो पूरी तरह वामपंथ के कब्जे में हैं जो अपने आप में एक तानाशाही व्यवस्था है सोवियत संघ के विघटन के बाद जो देश अलग हुए उन्होंने वामपंथ को बहुत हद तक छोड़ दिया 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
साम्यवादियों को लोकतांत्रिक देशों में घुसपैठ करना बहुत आसान होता है और ट्रंप यह जानते हैं कि अमेरिका में भी यह घुस चुका है इसलिए वो इसे रोकने की बात कर रहे हैं लेकिन लोकतंत्र वामपंथियों के लिए संजीवनी का काम करता है इसका मुख उद्देश्य हर लोकतांत्रिक देश की व्यवस्थाओं को ख़त्म करना होता है जिससे अराजकता फैले

भारत में वामपंथी लगभग ख़त्म होकर अंतिम सांसे ले रहे हैं लेकिन इनकी संख्या फिर भी इतनी है कि देश में उपद्रव कर सकें भारत में पहले एक मात्र CPI होती थी जिसका झुकाव सोवियत संघ की तरफ होता था लेकिन 1967 में CPI से विभाजित होकर CPM बन गई जो चीन से जुड़ गई

देश के विरुद्ध काम करना वामपंथियों का मुख्य उद्देश्य रहा है और तभी CPI ने 1962 के युद्ध में चीन को हमलावर मानने पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया था 

CPI की 1952 में लोकसभा में 16 सीट थी, 1957 में 27 और 1962 में 29 सीट थी - पार्टी से अलग होने के बाद सी.पी.एम., CPI और अन्य वामपंथी पार्टियों के लोकसभा में संख्या 5 बार 50 से ऊपर रही और 3 बार 47, 48 और 49 रही मतलब वामपंथियों का अच्छा खासा दबदबा था 1977 में पहली बार CPM बंगाल में सत्ता में आई और 34 वर्ष के शासन में बंगाल को खोखला कर दिया 

1967 में CPM बनने के बाद वामपंथी नक्सली आतंकी संगठन बंगाल की नक्सलबाड़ी से शुरू किया गया जिसने देश भर में फ़ैल कर हजारों लोगों की हत्या की लेकिन वामपंथी उन्हें गरीब और वंचित कह कर समर्थन देते थे आज मोदी के नेतृत्व में अमित शाह ने नक्सलवाद की कब्र खोद दी 

इसके अलावा CPM और CPI भी अंतिम सांसे ले रही है 2014 में लोकसभा में दोनों के  केवल 10 सदस्य थे, 2019 में 5 और 2024 में 6 सदस्य हैं लेकिन ये देश विरोध में सबसे आगे रहते हैं

अभी सुना है CPM के वरिष्ठ नेता MA Baby चीनी राजदूत से मिले और उसके आसपास ही कॉकरोच सोनम वांगचुक से भी मिले वृंदा करात भी वांगचुक को मिलने गई और आज केजरीवाल ने भी। कॉकरोचों के जरिए देश में कोई दंगा कराने की साजिश लगती है 

CPM की ट्रेड यूनियन है AITUC (All India Trade Union Congress) और कांग्रेस पार्टी की है INTUC (Indian National Trade Union Congress) और दोनों का लक्ष्य Industrial Unrest फैलाना रहा है दोनों का एक ही नारा था खासकर AITUC का “हर जोर जुलम की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है” इन दोनों को टक्कर दी संघ समर्थित BMS (भारतीय मजदूर संघ) ने

मिल मालिकों से मजदूरों को नौकरी मिलती थी सैलरी मिलती थी लेकिन वामपंथी उन्हें भड़काते थे तुम्हारा मालिक तुम्हारा खून चूस कर पैसा कमा रहा है, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो और मजदूरों को हड़ताल पर लगा देते थे काम बंद तो सैलरी बंद और मजदूरों के बच्चे भूखे मरते थे देश भर के औद्योगिक संगठन (फैक्टरियां) बंद हो गई और मजदूर रिक्शा चलाने पर मजबूर कर दिए गए 

कांग्रेस राज में 1970 के शुरू में बंगाल से Labour Unrest के कारण आदित्य विक्रम बिरला को writers building के बाहर कार से घसीट कर पीटा गया और वे लगभग नग्न अवस्था में बंगाल छोड़ कर आ गए और कभी वापस नहीं गए 2008 में रतन टाटा को सिंगुर की छोटी कार परियोजना बंद करनी पड़ी 

उसके बाद दौर आया 2011 में ममता बनर्जी का जो CPM के हिंसक राज से भी चार कदम आगे निकली आज जनमानस ने ऐसी स्थिर सरकार बनाई है कि उद्योगपति लौटने लगे हैं 

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