ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा आज पूरे धार्मिक उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो गई। रथ यात्रा से पहले सदियों पुरानी 'छेरा पहरा' रस्म निभाई गई, जिसमें पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक के रूप में सोने की झाड़ू से रथ मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई की। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के समक्ष राजा और प्रजा सभी समान हैं तथा सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव भोई राजवंश के वर्तमान प्रमुख हैं और वर्ष 1970 में मात्र 17 वर्ष की आयु में सिंहासन पर बैठे थे। परंपरा के अनुसार वे श्री जगन्नाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष और भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक माने जाते हैं। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां वे आठ दिन तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से भगवान श्रीमंदिर लौटते हैं और 27 जुलाई को नीलाद्रि बिजे की रस्म के साथ इस वर्ष की रथ यात्रा का समापन होगा। सोने की मूठ वाली झाड़ू से मार्ग साफ करने की यह परंपरा केवल विनम्रता और सेवा का संदेश ही नहीं देती, बल्कि इसे समृद्धि, पवित्रता और नकारात्मकता के नाश का प्रतीक भी माना जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा : सोने की झाड़ू लगाकर गजपति महाराज ने निभाई 'छेरा पहरा' रस्म
ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा आज पूरे धार्मिक उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो गई। रथ यात्रा से पहले सदियों पुरानी 'छेरा पहरा' रस्म निभाई गई, जिसमें पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक के रूप में सोने की झाड़ू से रथ मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई की। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के समक्ष राजा और प्रजा सभी समान हैं तथा सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव भोई राजवंश के वर्तमान प्रमुख हैं और वर्ष 1970 में मात्र 17 वर्ष की आयु में सिंहासन पर बैठे थे। परंपरा के अनुसार वे श्री जगन्नाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष और भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक माने जाते हैं। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां वे आठ दिन तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से भगवान श्रीमंदिर लौटते हैं और 27 जुलाई को नीलाद्रि बिजे की रस्म के साथ इस वर्ष की रथ यात्रा का समापन होगा। सोने की मूठ वाली झाड़ू से मार्ग साफ करने की यह परंपरा केवल विनम्रता और सेवा का संदेश ही नहीं देती, बल्कि इसे समृद्धि, पवित्रता और नकारात्मकता के नाश का प्रतीक भी माना जाता है।
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