पूर्वजों का कहना है कि द्वार/घर में आए किसी भी प्राणी का जल एवं भोजन से आदर-सत्कार करें। जिस घर में आज भी इस मूलमंत्र को अपनाया जाता है उस परिवार का संरक्षण स्वयं प्रभु करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश हम अपनी सनातनी पद्धति को त्याग पश्चिमी सभ्यता में डूब गए हैं और कोई अन्याय होने पर भाग्य को दोष देने लगते हैं। परिवार की रक्षा स्त्री के हाथ होती है क्योकि वह लक्ष्मी एवं अन्नपूर्णा माता होती है। याद रखो भाग्यवान के द्वार/घर मेहमान आता है कम्बख्त के द्वार/घर नहीं।
पुरी धाम की वह रात आज भी इतिहास के सबसे रहस्यमय और दिव्य प्रसंगों में गिनी जाती है। समुद्र की लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकरा रही थीं। अंधेरी रात में भी श्री मंदिर के शिखर पर लहराता महाप्रभु जगन्नाथ का पवित्र पतित पावन बाना अद्भुत तेज बिखेर रहा था। लेकिन उस समय मंदिर के अंदर एक ऐसा डर जन्म ले चुका था, जिसने सालों से सेवा कर रहे पुजारियों और सेवकों के दिलों को कंपा दिया था। श्री मंदिर के विशाल अक्षय भंडार में रखा अनाज तेजी से खत्म होने लगा था। ओडिशा में भयंकर अकाल पड़ा था। खेत सूख गए थे, कुएं खाली हो गए थे और गाँव-गाँव में भूखे लोगों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। हजारों गरीब और भूखे लोग जगन्नाथ पुरी की ओर भागे चले आ रहे थे, क्योंकि उनका अटूट विश्वास था कि जहाँ स्वयं जगन्नाथ वास करते हैं, वहाँ कोई भूखा नहीं सो सकता।मंदिर के मुख्य भंडारी पंडित दामोदर दिन-रात चिंता में डूबे रहते थे। वह हर दिन विशाल भंडार गृह के एक-एक मटके और पात्र का हिसाब करते थे। पहले जहाँ अनाज के पहाड़ आसमान छूते दिखते थे, अब वहाँ खाली पड़े बर्तन भय पैदा कर रहे थे। उस दिन शाम को जब दामोदर आखिरी बार भंडार गृह देखने पहुंचे, तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने कांपते हाथों से आखिरी मटके का ढक्कन उठाया। उसमें भी बहुत कम चावल बचा था। उनका गला सूख गया। वे तुरंत मंदिर के गर्भगृह की ओर दौड़े। सामने रत्नसिंहासन पर विराजमान महाप्रभु जगन्नाथ मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। दामोदर की आँखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “हे नाथ! यदि कल तक भंडार भरने का कोई उपाय नहीं निकला, तो हजारों भक्त भूखे रह जाएंगे। आपकी रसोई में कभी कमी नहीं हुई प्रभु... इस बार भी अपनी मर्यादा की रक्षा करें।”
पूरी रात दामोदर को नींद नहीं आई। मंदिर के विशाल प्रांगण में सन्नाटा छाया हुआ था। केवल कहीं-कहीं दीये की लौ टिमटिमा रही थी। आधी रात को अचानक उन्हें भंडार गृह की ओर से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। पहले उन्होंने सोचा कि शायद कोई चोर घुस आया है। वह तुरंत चाबियों का गुच्छा लेकर अंधेरे बरामदे से होते हुए आगे बढ़े। जैसे ही वह भंडार गृह के पास पहुंचे, अंदर से अनाज गिरने और मिट्टी के बर्तन खिसकने की आवाज और तेज हो गई। दामोदर की छाती जोरों से धड़कने लगी। उन्होंने धीरे से भारी लकड़ी का दरवाजा खोला... और अगले ही पल उनकी सांसें अटक गईं।
भंडार गृह के अंदर का दृश्य देखकर उनका शरीर कांप उठा। वहां कोई साधारण इंसान नहीं था। साक्षात महाप्रभु जगन्नाथ स्वयं अपने दिव्य बाल-युवा रूप में खड़े थे। उनका सांवला शरीर सुनहरी रोशनी से चमक रहा था। सिर पर रत्नजड़ित मुकुट था, जिसमें मोर पंख झूल रहा था। उनके बड़े-बड़े गोलाकार नेत्र करुणा और प्रेम से भरे थे। गले में फूलों की माला लटकी थी और पीतांबर की चमक पूरे भंडार गृह को रोशन कर रही थी। उनके हाथों में मिट्टी का एक विशाल मटका था। लेकिन वह कोई साधारण मटका नहीं था। महाप्रभु जैसे ही उसे नीचे की ओर झुकाते, उसमें से चमकते हुए चावल की धार नदी की तरह बहने लगती। देखते ही देखते खाली पड़ा भंडार गृह अनाज से भरने लगा।
दामोदर आश्चर्य से अवाक होकर देखते रहे। यह सपना है या सच, वह समझ नहीं पा रहे थे। उनके हाथ कांपने लगे। वह वहीं सुन्न होकर खड़े रह गए। तभी महाप्रभु ने मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा। उनके लाल होठों की मुस्कान में ऐसी दिव्य शांति थी कि दामोदर की सारी चिंता उसी पल दूर हो गई। भगवान ने कहा, “दामोदर... तुमने यह कैसे सोच लिया कि मेरे भक्त भूखे रहेंगे? तुम इंसान केवल उतना ही देख सकते हो, जितना तुम्हारी आँखें देख सकती हैं। लेकिन मेरा भंडार सीमित नहीं है। जहाँ भक्तों के लिए दया और प्रेम होता है, वहाँ माँ लक्ष्मी स्वयं वास करती हैं।”
इतना कहकर महाप्रभु ने मटके को और झुका दिया। चावल की धार पहले से भी तेज बहने लगी। कुछ ही पलों में पूरा कमरा अनाज के विशाल ढेर से भर गया। दामोदर आश्चर्यचकित होकर उस मटके को देखते रहे। लगातार अनाज निकल रहा था, लेकिन मटका खाली होने का नाम नहीं ले रहा था। तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण पात्र नहीं, स्वयं ईश्वर का अक्षय पात्र है।
अब दामोदर अपने आंसू नहीं रोक पाए। वह दौड़कर अनाज के ढेर पर घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने अपना सिर भगवान के श्रीचरणों में रख दिया। उनका शरीर कांप रहा था। वह रोते-रोते बोले, “मुझे क्षमा करें प्रभु। मैं मूर्ख था जो आपके भंडार को सीमित मान बैठा था। इस संसार का पालनहार कौन है, यह आज आपने मुझे दिखा दिया।”
महाप्रभु शांत भाव से मुस्कुराते रहे। उनके शरीर से निकलने वाली दिव्य रोशनी से पूरा भंडार गृह प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने दामोदर के सिर पर हाथ रखकर कहा, “जब तक इस मंदिर के द्वार पर आने वाले हर भूखे व्यक्ति के लिए तुम्हारे मन में करुणा रहेगी, तब तक यह भंडार कभी खाली नहीं होगा। याद रखना... मेरे लिए सबसे बड़ा भोग सोने-चांदी का नहीं, बल्कि एक भूखे को दिया गया अन्न है।”
अगले दिन सुबह जब मंदिर के सेवकों ने भंडार गृह खोला, तो वे हैरान रह गए। जो बर्तन कल तक खाली थे, आज वे छत तक अनाज से भरे हुए थे। पूरे मंदिर में यह खबर फैल गई। उसी दिन हजारों भूखे लोगों को महाप्रसाद बांटा गया। उसके अगले दिन भी... और उसके अगले दिन भी। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि, जितना अनाज निकाला जाता था, भंडार उतना ही भरा रहता था।
पंडित दामोदर उस दिन के बाद पूरी तरह बदल गए थे। उनके चेहरे पर एक अद्भुत शांति छा गई थी। वे अब हर भूखे व्यक्ति को भोजन कराते समय यही कहते थे, “यह अन्न हमारा नहीं... यह स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ का है। उनके घर में किसी चीज की कमी नहीं हो सकती।”
कहा जाता है कि, आज भी जगन्नाथ पुरी श्री मंदिर में जब लाखों भक्त महाप्रसाद ग्रहण करते हैं, तब वहाँ सेवा करने वाले बुजुर्ग पुजारी धीरे से मुस्कुरा देते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि, उस विशाल रसोईघर और अक्षय भंडार की रक्षा आज भी स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ कर रहे हैं।
पूरी रात दामोदर को नींद नहीं आई। मंदिर के विशाल प्रांगण में सन्नाटा छाया हुआ था। केवल कहीं-कहीं दीये की लौ टिमटिमा रही थी। आधी रात को अचानक उन्हें भंडार गृह की ओर से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। पहले उन्होंने सोचा कि शायद कोई चोर घुस आया है। वह तुरंत चाबियों का गुच्छा लेकर अंधेरे बरामदे से होते हुए आगे बढ़े। जैसे ही वह भंडार गृह के पास पहुंचे, अंदर से अनाज गिरने और मिट्टी के बर्तन खिसकने की आवाज और तेज हो गई। दामोदर की छाती जोरों से धड़कने लगी। उन्होंने धीरे से भारी लकड़ी का दरवाजा खोला... और अगले ही पल उनकी सांसें अटक गईं।
भंडार गृह के अंदर का दृश्य देखकर उनका शरीर कांप उठा। वहां कोई साधारण इंसान नहीं था। साक्षात महाप्रभु जगन्नाथ स्वयं अपने दिव्य बाल-युवा रूप में खड़े थे। उनका सांवला शरीर सुनहरी रोशनी से चमक रहा था। सिर पर रत्नजड़ित मुकुट था, जिसमें मोर पंख झूल रहा था। उनके बड़े-बड़े गोलाकार नेत्र करुणा और प्रेम से भरे थे। गले में फूलों की माला लटकी थी और पीतांबर की चमक पूरे भंडार गृह को रोशन कर रही थी। उनके हाथों में मिट्टी का एक विशाल मटका था। लेकिन वह कोई साधारण मटका नहीं था। महाप्रभु जैसे ही उसे नीचे की ओर झुकाते, उसमें से चमकते हुए चावल की धार नदी की तरह बहने लगती। देखते ही देखते खाली पड़ा भंडार गृह अनाज से भरने लगा।
दामोदर आश्चर्य से अवाक होकर देखते रहे। यह सपना है या सच, वह समझ नहीं पा रहे थे। उनके हाथ कांपने लगे। वह वहीं सुन्न होकर खड़े रह गए। तभी महाप्रभु ने मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा। उनके लाल होठों की मुस्कान में ऐसी दिव्य शांति थी कि दामोदर की सारी चिंता उसी पल दूर हो गई। भगवान ने कहा, “दामोदर... तुमने यह कैसे सोच लिया कि मेरे भक्त भूखे रहेंगे? तुम इंसान केवल उतना ही देख सकते हो, जितना तुम्हारी आँखें देख सकती हैं। लेकिन मेरा भंडार सीमित नहीं है। जहाँ भक्तों के लिए दया और प्रेम होता है, वहाँ माँ लक्ष्मी स्वयं वास करती हैं।”
इतना कहकर महाप्रभु ने मटके को और झुका दिया। चावल की धार पहले से भी तेज बहने लगी। कुछ ही पलों में पूरा कमरा अनाज के विशाल ढेर से भर गया। दामोदर आश्चर्यचकित होकर उस मटके को देखते रहे। लगातार अनाज निकल रहा था, लेकिन मटका खाली होने का नाम नहीं ले रहा था। तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण पात्र नहीं, स्वयं ईश्वर का अक्षय पात्र है।
अब दामोदर अपने आंसू नहीं रोक पाए। वह दौड़कर अनाज के ढेर पर घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने अपना सिर भगवान के श्रीचरणों में रख दिया। उनका शरीर कांप रहा था। वह रोते-रोते बोले, “मुझे क्षमा करें प्रभु। मैं मूर्ख था जो आपके भंडार को सीमित मान बैठा था। इस संसार का पालनहार कौन है, यह आज आपने मुझे दिखा दिया।”
महाप्रभु शांत भाव से मुस्कुराते रहे। उनके शरीर से निकलने वाली दिव्य रोशनी से पूरा भंडार गृह प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने दामोदर के सिर पर हाथ रखकर कहा, “जब तक इस मंदिर के द्वार पर आने वाले हर भूखे व्यक्ति के लिए तुम्हारे मन में करुणा रहेगी, तब तक यह भंडार कभी खाली नहीं होगा। याद रखना... मेरे लिए सबसे बड़ा भोग सोने-चांदी का नहीं, बल्कि एक भूखे को दिया गया अन्न है।”
अगले दिन सुबह जब मंदिर के सेवकों ने भंडार गृह खोला, तो वे हैरान रह गए। जो बर्तन कल तक खाली थे, आज वे छत तक अनाज से भरे हुए थे। पूरे मंदिर में यह खबर फैल गई। उसी दिन हजारों भूखे लोगों को महाप्रसाद बांटा गया। उसके अगले दिन भी... और उसके अगले दिन भी। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि, जितना अनाज निकाला जाता था, भंडार उतना ही भरा रहता था।
पंडित दामोदर उस दिन के बाद पूरी तरह बदल गए थे। उनके चेहरे पर एक अद्भुत शांति छा गई थी। वे अब हर भूखे व्यक्ति को भोजन कराते समय यही कहते थे, “यह अन्न हमारा नहीं... यह स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ का है। उनके घर में किसी चीज की कमी नहीं हो सकती।”
कहा जाता है कि, आज भी जगन्नाथ पुरी श्री मंदिर में जब लाखों भक्त महाप्रसाद ग्रहण करते हैं, तब वहाँ सेवा करने वाले बुजुर्ग पुजारी धीरे से मुस्कुरा देते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि, उस विशाल रसोईघर और अक्षय भंडार की रक्षा आज भी स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ कर रहे हैं।
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