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न सांसद हैं-न विधायक फिर भी लेटरहेड पर ‘अशोक स्तंभ’: TMC प्रवक्ता साकेत गोखले ने किया ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अधिनियम’ का उल्लंघन

                                           साकेत गोखले (फोटो साभार-india today)
मोदी सरकार पर संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाने वाले ही संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। बने फिर रहे हैं संविधान की रक्षक के चौधरी। 

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र विवादों में आ गया है। उन्होंने पत्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से सरकार को संपर्क करने का आग्रह किया है, लेकिन पत्र के लिए जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ बना हुआ है, साथ ही मोटे अक्षरों में ‘पूर्व सांसद’ लिखा हुआ है। नियम के मुताबिक, पूर्व सांसद को ऐसे लेटरहेड के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह हों।

क्या लिखा है खत में

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद ने खत में केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह सोनम वांगचुक से संपर्क कर उनका भूख हड़ताल खत्म करवाए। वांगचुक NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में 28 जून 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गोखले ने सोशल मीडिया पर अपने उस पत्र की कॉपी को साझा किया।

गोखले ने यह पत्र 15 जुलाई 2026 को लिखा है। इसमें वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि उनका वजन महज दो सप्ताह में 8 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है। उन्होंने मंत्री से अपील की है कि वे कम से कम उनसे संवाद करें और देश भर के लाखों छात्रों की चिंता का समाधान करें।

                                                           (साभार-x@sakeygokhale)

साकेत गोखले ने अपने निजी स्टेशनरी पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करके कानून का उल्लंघन किया है, क्योंकि पूर्व सांसदों और विधायकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का इस तरह से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। यह भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 (State Emblem of India – Prohibition of Improper Use Act, 2005) के तहत बनाए गए थे।

इन नियमों के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल पूर्व सांसद और विधायक, बल्कि पूर्व मंत्री, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी किसी तरह से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं कर सकते हैं। नियम 10 में कहा गया है, “इन नियमों के तहत अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति (जिनमें सरकार के पूर्व पदाधिकारी, जैसे पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व विधानसभा सदस्य, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी शामिल हैं) किसी भी प्रकार से प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा।”

इस कानून में उन अधिकारियों की सूची दी गई है जो अपने स्टेशनरी पर इस प्रतीक चिन्ह का उपयोग कर सकते हैं, और इस सूची में पूर्व सांसदों और विधायकों को शामिल नहीं किया गया है। केवल संसद और विधान सभाओं या परिषदों के वर्तमान सदस्यों को ही इसका उपयोग करने की अनुमति है और वह भी आधिकारिक कार्यों के लिए। नियम में ये बताया गया है कि किस-किस काम के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही अधिनियम की अनुसूची 1 में अधिकारियों की पूरी सूची दी गई है, जो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

किन लोगों को राज्य प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति है

2007 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग करने की अनुमति भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, लोकसभा और राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रालय और विभाग, राज्य सरकारों के विभाग, भारतीय दूतावास और उच्चायोग, केंद्र एवं राज्य सरकार के वे कार्यालय जिन्हें नियमों के अंतर्गत अनुमति दी गई हो, कुछ वैधानिक निकाय और आयोग, यदि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किया गया हो। इनके लिए भी उपयोग केवल आधिकारिक कार्य, सरकारी पत्राचार, सील, दस्तावेज, भवन, वाहन आदि तक सीमित होता है।

यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि किसी भी तरह से यह धारणा न बने कि कोई मैसेज आधिकारिक है या किसी संवैधानिक प्राधिकरण या सरकारी कार्यालय से आया है। गोखले ने अपने निजी लेटरहेड पर प्रतीक चिन्ह लगाकर यही भ्रम पैदा की है, जिसे कानून रोकना चाहता है।

नियम 10(1) के तहत साफ कहा गया है कि सरकार के सभी पूर्व पदाधिकारियों चाहे वह पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल या पूर्व जज हों, वे आधिकारिक स्टेशनरी या किसी भी दूसरे रूप में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग नहीं कर सकते। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक पद को छोड़ता है, रिटायर होता है या उसका कार्यकाल समाप्त होता है, उसका राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार भी तुरंत खत्म हो जाता है।

जाना पड़ सकता है जेल

2005 के अधिनियम में आगे यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो बिना पूर्व अनुमति के प्रतीक चिन्ह या उसके मिलते-जुलते रूप का उपयोग करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सरकार से संबंधित है या एक आधिकारिक दस्तावेज है, तो उसे दो साल तक की जेल की सजा हो सकती है या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है अथवा जुर्माना और सजा दोनों ही दिया जा सकता है।
भारत के राज्य चिह्न (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 की धारा 3 में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति राज्य चिह्न या उससे मिलते-जुलते चिन्ह का उपयोग इस तरह नहीं करेगा कि जिससे यह आभास हो कि यह सरकार से संबंधित है या यह केंद्र सरकार या राज्य सरकार का आधिकारिक दस्तावेज है, जब तक कि केंद्र सरकार या अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति न मिल जाए।”
धारा 7 (1) में दंड के बारे में बताया गया है, “धारा 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाला कोई भी व्यक्ति दो वर्ष तक के कारावास या पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा। यदि वह अपने अपराध को दोहराता है तो हर बार अपने अपराध के लिए कम से कम छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास और पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”
यह कानून किसी भी व्यापार, व्यवसाय के उद्देश्य से प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने पर दंड का प्रावधान भी करता है। इसलिए नियम में साफ कहा गया है कि सभी के निजी काम, निजी कंपनी, एनजीओ, सोसायटी, राजनीतिक दल, निजी कॉलेज, स्कूल या यूनिवर्सिटी, निजी अस्पताल, व्यापारिक प्रतिष्ठान, यूट्यूब चैनल, वेबसाइट या मीडिया संस्थान, अधिवक्ता, डॉक्टर, इंजीनियर या दूसरे पेशेवर अपनी निजी पहचान के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।
हालाँकि गोखले ने लेटरहेड पर खुद को ‘पूर्व सांसद’ के रूप में सही तरीके से लिखा है, लेकिन लेटरहेड पर अशोक स्तंभ की उपस्थिति यह बताती है कि उन्होंने लेटरहेड कानून का उल्लंघन किया है। पूर्व सांसदों को अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक पत्राचार पर राजकीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, यह प्रतिबंध सभी पूर्व सदस्यों पर समान रूप से लागू होता है।
साकेत गोखले जुलाई 2023 के उपचुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस की तरफ से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। चूँकि वे गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुइज़िन्हो फलेरो के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुने गए थे, इसलिए उन्होंने राज्यसभा नियमों के अनुसार खाली सीट का पूरा कार्यकाल नहीं बल्कि शेष कार्यकाल पूरा किया। इसलिए गोखले की राज्यसभा सदस्यता अप्रैल 2026 में खत्म हो गई। पार्टी ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा। इसलिए वे पूर्व सांसद हैं।

टीएमसी में बगावत पर वर्ल्ड मीडिया : अदम्य योद्धा का दुखद राजनीतिक अंत; ममता को छोड़ भागने वालों को पार्टी से नहीं अपनी तिजोरी से मतलब


ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस(TMC) में मचे अभूतपूर्व राष्ट्रीय विद्रोह (20 लोकसभा सांसदों और अब शायद 65 विधायकों का दलबदल) की गूंज अब कोलकाता और दिल्ली तक सीमित नहीं रही। भारत के इस सबसे बड़े राजनीतिक उलटफेर को ग्लोबल मीडिया ने भी अपने मुख्य पन्नों पर प्रमुखता से जगह दी
 द न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी, द गार्जियन और ले मोंडे आदि मीडिया संस्थाओं ने ममता बनर्जी की बिखरती पार्टी पर विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित किये

दुनिया भर के विश्लेषकों ने ममता बनर्जी को ‘जुझारू और अदम्य लड़ाकू’ (Tenacious Leader) नेता बताया यह भी बताया कि कैसे अपने ही भतीजे अभिषेक बनर्जी के अंधमोह और कॉरपोरेट सिंडिकेट (I-PAC) के चक्रव्यूह में फंसकर उन्होंने अपनी ही बनायी सल्तनत पर से अपना पूरा नियंत्रण खो दिया

शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस टूट में अन्तर 

महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना में भी दो फाड़ हुए। एक शिंदे गुट दूसरा उद्धव ठाकरे गुट। लेकिन वो फाड़ हुए थे विचारधारा को लेकर। लेकिन तृणमूल में जो टूट हुई है यह विचारधारा को नहीं बल्कि अवसरवादिता को लेकर। जब तक ममता राज में इन लोगों को मलाई खाने को मिलती रही ममता के हर अनुचित कदम का साथ देते रहे, अब जब देखा मलाई की बजाए प्रहार सहने पड़ेंगे उसी ममता को बीच मंझधार में छोड़कर भाग रहे हैं। यानि जहाँ दिखी तवा परत वहीँ बिताई सारी रात। ममता के असली वफादार सिपाही वही हैं जो संकट की इस घडी में साथ खड़े हैं। शिवसेना में तो नेता मान लिया गया उस नेता के नेतृत्व में चुनाव भी लड़ लिए परन्तु तृणमूल से अलग हुआ गुट किसे नेता मानेगा? अगर तिजोरी के चक्कर में फ़िलहाल किसी को नेता मान लिया क्या उसके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की हिम्मत है किसी में? 15 सालों तक इनकी नैतिकता कहां थी? ऐसे लोगों को नेता नहीं अवसरवादी कहते हैं। इन्हे पार्टी से नहीं अपनी तिजोरी से मतलब होता है। 

मित्र और शत्रु की सही पहचान संकट के समय होती है। जो संकट में साथ नहीं दे उसे अवसरवादी कहते हैं। दूसरे, सत्ता परिवर्तन होते ही घुसपैठियों का भागना भी ममता को भारी पड़ रहा है। यही वजह है कि जितने भी नेता TMC को छोड़ भाग रहे हैं, उन्हें डर है कि कहीं घुसपैठियों को बसाने में सरकार उन्हें न लपेट ले। इसलिए अपने आपको दूध का धुला साबित करने पाखंडी नेता मुसीबत के समय ममता को अकेला छोड़ भगदड़ में लगे हैं। अगर बंगाल में घुसपैठियों की भरमार थी तब पार्टी छोड़ भागने वालों ने क्यों नहीं विरोध किया? जब हिन्दू त्यौहारों पर हमले और हिन्दू महिलाओं का बलात्कार हो रहा था तब क्यों नहीं इनका जमीर जागा? तब तो ये सब ममता की गोद में बैठ मलाई खाने में लगे थे, और अब मलाई खिलाने वाली उसी ममता की गोद को छोड़कर भागने वाले कभी किसी पार्टी के नहीं हो सकते। कल तक NDA और बीजेपी को कोसने वाले क्यों NDA की गोदी में जा रहे हैं? ममता का शासन चाहे जैसा था इन अवसरवादियों की हरकतों को अपने आंचल में समेट सबको बचा रही थी लेकिन जब ममता को उनका सहारा चाहिए छोड़कर भाग रहे हो। NDA हो या बीजेपी अगर इन अवसरवादियों को शामिल करती है तो नुकसान उठाना पड़ सकता है।       

वैश्विक मीडिया की नजरों में ममता बनर्जी की क्रोनोलॉजी

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ममता बनर्जी के राजनीतिक ग्राफ को 3 मुख्य हिस्सों में बांटकर दुनिया के सामने पेश किया है, जो इस संकट की कड़वी हकीकत बयां करता है
  • वैश्विक लेखों में कहा गया है कि ममता बनर्जी ने 3 दशक पहले अपने दम पर वामपंथ के क्रूर शासन के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खाकर तृणमूल कांग्रेस खड़ी की थी। वह भारत की सबसे जुझारू महिला नेताओं में शुमार थीं, जिन्होंने जमीन से उठकर कोलकाता की सत्ता पर कब्जा किया था
  • द गार्जियन’ के एक विशेष लेख के अनुसार, ममता बनर्जी की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अघोषित ‘युवराज’ घोषित करना रही। इसके चलते पार्टी के संस्थापक और सबसे वफादार जमीनी चेहरे (ओल्ड गार्ड) पूरी तरह अलग-थलग पड़ते चले गये
  • विदेशी अखबारों ने लिखा है कि चुनावी रणनीतिकार एजेंसी आई-पैक (I-PAC) के कॉरपोरेट दखल ने विधायकों और सांसदों के टिकट तय करने शुरू कर दिये, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का भरोसा कालीघाट से टूट गया। इसी का नतीजा रहा कि 2026 के चुनाव में जनता ने उन्हें नकार दिया और पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी

दलबदल और साइन-गेट ने धूमिल की छवि

  • वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि किसी राष्ट्रीय दल के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों का एक साथ पाला बदलकर एनडीए (NDA) को समर्थन दे देना भारतीय संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी बगावतों में से एक है
  • डॉ काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चल रही साइन-गेट(फर्जी हस्ताक्षर मामले) की सीआईडी जांच ने साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर का अनुशासन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है
  • ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट में दिल्ली में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की भावुक मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि जो क्षेत्रीय क्षत्रप कभी दिल्ली की सत्ता में ‘किंगमेकर’ बनने का सपना देख रही थीं, आज वे राष्ट्रीय राजनीति में अपने वजूद को बचाने के लिए बेहद असहाय और अकेली खड़ी नजर आ रही हैं
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी के लिए अब इस गहरे दलदल से बाहर निकलना लगभग असंभव प्रतीत होता है राज्य में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की नयी सरकार का तेजी से पैर पसारना और सचिवालय ‘नबान्न’ की दीवारों का भगवाकरण यह दिखाता है कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति अब पूरी तरह बदल चुकी है
विदेशी मीडिया ने अपने निष्कर्ष में लिखा है कि तृणमूल कांग्रेस इस समय बिल्कुल उसी तरह के लिविंग इन्फर्नो (अंदरूनी विनाश) से गुजर रही है, जैसा कुछ साल पहले महाराष्ट्र की शिवसेना और एनसीपी ने झेला था महुआ मोईत्रा और कल्याण बनर्जी जैसे गिने-चुने वफादार नेताओं के तीखे बयानों के बावजूद यूसुफ पठान जैसे बड़े चेहरों की रहस्यमयी चुप्पी यह साफ बयां करती है कि ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी की कमान हमेशा के लिए फिसल चुकी है 

भारत में घुसे बांग्लादेशी मियाँ-बीवी (रमजान-सादिना) ने 14 साल में खड़ा कर लिया करोड़ों का साम्राज्य: कभी सड़क किनारे बेचते थे नारियल-ताड़

        सड़क पर नारियल बेचने वाले बांग्लादेशी रमजान-सादिना निकले करोड़ों के मालिक(फोटो साभार : ChatGPT)
अक्सर फल-सब्ज़ी और खोमचे वाले को लोग गरीब कहते हैं, जबकि वह किसी वेतनभोगी से ज्यादा खुशहाल होते हैं। वेतनभोगी एक छोटा-सा मकान लेने से पहले हज़ार बार सोंचता है लेकिन ये खड़े-खड़े शानदार मकान का सौदा करने की हिम्मत रखते हैं। दिल्ली गोलचा सिनेमा के पीछे तिराहे बहराम खां पर रेहड़ी पर फल बेचने वाले मकान मालिक बने बैठे हैं। 
दो बार एक जूस बेचने वाले और एक गोलगप्पे बेचने वाले के बच्चों की शादी में जाने का मौका मिला। कोई वेतनभोगी उस तरह की शादी नहीं कर सकता जिस तरह की शानदार शादी इन लोगों ने की। 
इतना ही नहीं, जामा मस्जिद पर कल्लन स्वीट्स के थोड़ा-सा आगे शाम के समय एक माँ-बेटी भीख मांगती थी। कई दिन से नहीं दिखने पर जानकर दुकानदारों से पूछने पर मालूम हुआ की लड़की का निकाह हो गया। उन्होंने जो खुलासा किया वाकई चौकाने वाला था। महावीर वाटिका में निकाह हुआ, दहेज़ में कार, चिकन और मटन(कोई दूसरा मीट नहीं)  की दावत। दहेज़ में कार सुनकर हैरानी तो हुई लेकिन उन्होंने बताया कि इसकी दो कारें पहले ही किराये पर चल रही है। 
भीखना मांगना अपने आपमें एक बहुत बड़ा व्यापार है। शायद ध्यान हो, कुछ महीने पहले शायद मुंबई से एक भिखारी को गिरफ्तार करने पर मालूम हुआ कि वह करोड़ों का मालिक है और सैकड़ों भिखारी उसके अंतर्गत भीख मांग रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहुत उस करोड़पति व्यापारी की फोटो भी खूब वायरल हुई थी। देखिए वीडियो 

              
पश्चिम बंगाल के हावड़ा से पुलिस ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठिया दंपती रमजान गाजी और उसकी बीवी सादिना बेगम को गिरफ्तार कर लिया है। जाँच में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।

कभी सड़क किनारे कच्चा नारियल (डाब) और ताड़ के फल बेचने वाला यह दंपती महज कुछ ही सालों में करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन बैठा। अब पुलिस और जाँच एजेंसियाँ इस बात का पता लगा रही हैं कि क्या इस खेल के पीछे सत्ताधारी पार्टी TMC के स्थानीय नेताओं का हाथ है।

दलालों के सहारे आए, प्रमोटर बनकर छाए

यह दंपती करीब 14 साल पहले दलालों की मदद से बांग्लादेश से अवैध तरीके से भारत घुसा था। शुरुआत में दोनों ने पेट पालने के लिए फल बेचे। इसके बाद रमजान गाजी ने चालाकी से स्थानीय प्रमोटरों से साँठगाँठ कर ली। वह पुराने मकान तोड़ने और जमीन की खरीद-बिक्री के धँधे में उतर गया।

कारोबार चमकते ही रमजान ने मलबा ढोने के लिए अपना ट्रक खरीद लिया और जमीनों की डीलिंग करने लगा। इसी अवैध कमाई से उसने कई जमीनें खरीदीं और अपना एक आलीशान दोमंजिला पक्का मकान भी बना लिया। पुलिस अब इनके पूरे सिंडिकेट और पॉलिटिकल नेटवर्क को खंगाल रही है। 

TMC हो रही हवा-हवाई, ममता बनर्जी की करीबी सांसद सुष्मिता देव ने भी दिया इस्तीफा: असम मुख्यमंत्री से की मुलाकात

                मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव की मुलाकात (साभार : Indiatoday)
कहते है कि बुरे वक़्त में साया भी साथ छोड़ देता है। जिस तरह अखाड़े में दो पहलवानों की कुश्ती में एक हारता है और एक जीतता है ठीक उसी तरह चुनावों में उम्मीदवार बहुत होते हैं लेकिन जीतता सिर्फ एक ही है। लेकिन बंगाल का चुनाव तो एकदम अनोखा जान दिखाई पड़ता है जहाँ 
TMC के हारने पर पूरी पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह रही है। पार्टी छोड़ने वालों का यही सिलसिला जारी रहा तो शायद दो महीने से पहले ही ममता बनर्जी और उसकी पार्टी TMC इतिहास के गर्द में ऐसी दबेगी जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल होगा। जितनी दुर्दशा ममता और उसकी पार्टी TMC की हो रही है किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यही एक चुनाव ऐसा था जब चुनाव अभियान में ममता चोटिल होने का ड्रामा भी नहीं कर पायी। वरना हर चुनाव में हार सामने देख चोटिल होने का ड्रामा कर सहानुभूति वोट लेकर सत्ता में आ जाती थी। चोट भी ऐसी जो वोटिंग होते ही ठीक जो जाती थी। 

जितना तानाशाह का आतंक ममता के मुख्यमंत्री रहते बंगाल में देखने को मिला शायद ही भारत के इतिहास में ऐसा हुआ हो। INDI गठबंधन के शामिल किसी भी पार्टी में ममता के अत्याचारों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर सकी। किसी INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाली ममता उसी INDI गठबंधन की चौखट पर माथा टेक रही है। घुसपैठियों को दामाद की तरह पाला-पोसा जा रहा था और ममता की सत्ता जाते ही वो भी बंगाल छोड़ भागने शुरू हो गए। वैसे जितनी भी पार्टियां हैं बंगाल चुनाव से सीखते हुए घुसपैठियों को पालना बंद करे। जिन रोहिंग्यों को कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं तुम उनको दामाद बना संरक्षण दे रहे हो। उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनवा रहे हो।     

पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की पार्टी TMC बिखरने लगी है। बुधवार (10 जून) को ममता की बेहद करीबी राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुखेंदु शेखर के बाद इस्तीफा देने वाली वह दूसरी बड़ी नेता हैं।

इस्तीफे के बाद सांसद सुष्मिता देव ने असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से मुलाकात की है। इससे पहले TMC के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बागी रुख अपनाया था और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था माँगी थी। यह गुट बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दे सकता है।

पार्टी के अंदर मचे इस घमासान से ममता बनर्जी अब बिल्कुल अकेली पड़ती जा रही हैं। इससे पहले TMC के विधायक दल भी दोफाड़ हो चुका है। बागी गुट का नेतृत्व कर रही सांसद काकोली घोष के साथ फिलहाल 14 सांसदों के नाम साफ हो चुके हैं।

इनमें शताब्दी रॉय, सुपरस्टार देव (दीपक अधिकारी) और जून मालिया जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। सुष्मिता देव के इस्तीफे की असली वजह अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इसे TMC के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

ममता बनर्जी का ‘शराब घोटाला’: 55 होलसेलर बाहर, चुनिंदा बिचौलियों की एंट्री; क्या ममता केजरीवाल से शराब घोटाले से बचने की सलाह लेने के लिए मिली थी?


दिल्ली की पूर्व केजरीवाल सरकार की शराब नीति के बाद अब पश्चिम बंगाल की 2017 में लागू नई आबकारी नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है। राज्य की तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) का गठन किया गया।

बंगाल में सरकार बने जुम्मा-जुम्मा आठ दिन नहीं हुए नितरोज ममता बनर्जी के कार्यकाल में हुए घोटाले सामने ही नहीं आ रहे कार्यवाही भी हो रही है और एक तरफ दिल्ली सरकार है जो अरविन्द केजरीवाल के कार्यकाल में हुए घोटालों पर सोई हुई है। CAG रिपोर्ट पर कितना शोर मचाया चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात वाली बात हो गयी

 

एजेंसी ने राज्य के सभी 55 प्राइवेट शराब होलसेलर्स की जगह लेकर शराब वितरण पर सीधा राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इसने वितरण और थोक विक्रेता दोनों के रूप में काम करने की कोशिश की, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुआ। खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वसूले गए।

दरअसल टीएमसी सरकार के कार्यकाल में हुए राज्य में शराब व्यापार से जुड़ी एक रिपोर्टें सामने आई है। इसमें उत्पाद शुल्क विभाग के एक गोपनीय दस्तावेज से पता चलता है कि शराब वितरण नेटवर्क का इस तरह से पुनर्गठन किया गया था, जिससे कुछ खास प्राइवेट शराब विक्रेताओं को लाभ हुआ और इस तरह सिस्टम काम कर रहा था, जिससे उनका एकाधिकार स्थापित हुआ।

रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 में शराब वितरण नीति में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारे पर ये बदलाव किए गए।

ऑपइंडिया को एक रिपोर्ट की कॉपी मिली है, जिसमें दावा किया गया है कि नए सिस्टम में धीरे-धीरे थोक वितरण के पुराने मॉडल को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह ऐसी व्यवस्था की गई जिससे चुनिंदा बिचौलियों की शराब वितरण के सिस्टम में एकाधिकार हो गया।

इससे पता चलता है कि जिसे आधिकारिक तौर पर शराब वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह वास्तव में निजी बोतलबंद शराब विक्रेताओं और शराब निर्माताओं से पैसा वसूलने का एक सिस्टम बन गया।

आबकारी विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें इन बदलावों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लागू हुए राज्य की नई आबकारी नीति के बाद शराब निर्माताओं से उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीका बदल गया। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मुक्त प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत वितरण के पारंपरिक सिद्धांतों को एक कड़े नियंत्रण वाले नेटवर्क से बदल दिया गया, जिसने कुछ चुनिंदा वितरकों के हाथों में पूरा सिस्टम आ गया।

टीएमसी ने शराब वितरण की पूरी प्रक्रिया को सेंट्रलाइज कर दिया

रिपोर्ट में एक चार्ट दिखाया गया है, जो बताता है कि शराब उत्पाद पारंपरिक रूप से बाजार में कैसे पहुँचते थे और पिछली ममता सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में यह प्रणाली कैसे विकसित हुई।

                                                        (रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट)

यह चार्ट निर्माता के गोदाम यानी ‘मदर गोदाम’ से शुरू होता है, जहाँ से उत्पाद कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी (C&FA) को भेजे जाते हैं। C&FA माल को सिस्टम में आगे बढ़ने से पहले भंडारण और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में कार्य करती है।

वहाँ से उत्पाद आमतौर पर वितरकों या सुपर स्टॉकिस्टों को आपूर्ति किए जाते हैं। ये वितरक कंपनी के अधिकृत व्यावसायिक भागीदार होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं तक कैसे पहुँचे।

यह चार्ट दर्शाता है कि वितरक, निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे बिक्री टीमों का प्रबंधन करते हैं, बाजार से ऑर्डर प्राप्त करते हैं, स्टॉक की आवाजाही को संभालते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद सभी खुदरा दुकानों पर उपलब्ध हों। कई उद्योगों में, वितरक खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं को लोन भी मुहैया कराते हैं, जिससे बाजार में नकदी की कमी नहीं होती है।

थोक विक्रेता इस सिस्टम में एक और अहम कड़ी हैं। वे वितरकों से थोक में उत्पाद खरीदते हैं और फिर उनको खुदरा विक्रेताओं तक छोटी-छोटी खेप में पहुँचाते हैं। छोटे विक्रेताओं का लाभ खरीद मूल्य और उपभोक्ताओं को बेचने के मूल्य में अंतर से मिलता है।

एक बाजार के निर्माण में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। कई बार वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा भी बाजार को मिलता है।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में किए गए बदलावों ने वितरण व्यवस्था पर एक छोटे- से ग्रुप का कब्जा हो गया। प्रतिस्पर्धा कम हो गया और उनका एकाधिकार होने से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का उन्हें अवसर मिला। इसकी वजह से पारंपरिक बाजार सिद्धांतों को काफी नुकसान हुआ।

वितरक और थोक विक्रेता क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रिपोर्ट में वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच अंतर को विस्तार से बताया गया है। वितरक आम तौर पर निर्माताओं के साथ समझौते करते हैं और आधिकारिक चैनल पार्टनर के रूप में कार्य करते हैं। वितरक न केवल उत्पादों की बिक्री के लिए बल्कि उनकी मार्केटिंग, आपूर्ति नेटवर्क के रखरखाव और बाजार तक पहुँच के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। वे आमतौर पर बड़े क्षेत्रों में काम करते हैं और खुदरा विक्रेताओं, थोक विक्रेताओं और कभी-कभी सीधे उपभोक्ताओं से भी संपर्क करते हैं।

दूसरी ओर, थोक विक्रेता मुख्य रूप से बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदते हैं और उन्हें खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं। वे मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं ,जिनका उद्देश्य भंडारण, प्रबंधन और थोक खरीद के माध्यम से लाभ कमाना होता है। वितरक आमतौर पर वितरण से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को वहन करते हैं, जबकि थोक विक्रेता माल की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लागू किए गए शराब वितरण सुधारों ने इन भेदों को धुंधला कर दिया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जो स्थापित व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

2017 में सरकार द्वारा नियंत्रित वितरण संरचना में बदलाव

2017 को पश्चिम बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीएसबीसीएल) का गठन हुआ, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी थी और जिसने राज्य में पैकेटबंद शराब के थोक वितरण का कार्यभार संभाला। डब्ल्यूबीएसबीसीएल के माध्यम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने शराब के कारोबार में कदम रखा।

                                                         (रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉर्ट)

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अस्तित्व में आने से पहले, थोक वितरण का काम बड़े पैमाने पर 1909 के बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत संचालित निजी लाइसेंस धारकों द्वारा किया जाता था। ये निजी थोक विक्रेता निर्माताओं से उत्पाद खरीदते थे और उन्हें पूरे राज्य में खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति करते थे।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन के बाद निगम शराब खरीदने वाला और वितरण करने वाला दोनों बन गया। इसने पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से शराब खरीदना शुरू किया और इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 5200 खुदरा दुकानों को बेचना शुरू किया।

बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 20 के तहत शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन विदेशी शराब क्षेत्र के कई आपूर्तिकर्ता कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं के बजाय केवल पंजीकृत ब्रांड मालिक या आयातक के रूप में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें निगम को उत्पाद बेचने और बिल जारी करने की अनुमति दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जो अधिनियम की भावना के विपरीत थी।

खुदरा विक्रेताओं और निर्माताओं ने शिकायत क्यों की?

रिपोर्ट में नए मॉडल से उत्पन्न होने वाले कई परिचालन और वित्तीय गड़बड़ियों के बारे में बताया गया है।

एक अहम शिकायत ऋण सुविधाओं के अभाव से संबंधित थी। पूर्व की निजी थोक प्रणाली के तहत खुदरा विक्रेताओं को अक्सर उधार पर उत्पाद प्राप्त होते थे। इससे उन्हें बड़ी अग्रिम राशि का भुगतान किए बिना स्टॉक बनाए रखने की सुविधा मिलती थी।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अधिग्रहण के बाद खुदरा विक्रेताओं को कथित तौर पर खरीद की पूरी लागत अग्रिम रूप से चुकानी पड़ी। चूँकि शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का लगभग 70-80% हिस्सा करों और शुल्कों का होता है, इसलिए इससे खुदरा विक्रेताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इस बदलाव के कारण सप्लाई चेन में पूँजी की कमी हुई। छोटे खुदरा विक्रेता विशेष रूप से प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें अब लोन से मदद नहीं मिल रही थी, बल्कि ज्यादा निवेश करना पड़ रहा था। इसकी वजह से बाजार में कथित तौर पर गिरावट आई और राजस्व प्रभावित हुआ।

मोनोपॉली की शुरुआत

रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूबीएसबीसीएल के आने से हालात बदल गए। नई नीति के माध्यम से टीएमसी सरकार ने शराब निर्माताओं और बॉटलर्स को बाध्य किया कि वे केवल WBSBCL के नियुक्त वितरकों के माध्यम से ही व्यापार करें। व्होलसेलर्स की जगह आए नए वितरकों पर आरोप लगे कि वे बॉटलर्स से अनुचित दरें वसूलते थे। प्रत्येक क्रेट पर गोडाउन रेंटल (4 रूपए) और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट (3 रूपए) के नाम पर भारी रकम वसूली गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वितरकों को मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा राज्य के राजस्व खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर टीएमसी नेताओं को जाता था। रिपोर्ट के हवाले से आरोप लगाए गए कि यह पूरी अवैध वसूली सिंडिकेट के जरिए सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के करीबी परिसरों, जैसे- 9, कैमक स्ट्रीट, कोलकाता तक पहुँचाई जाती थी।

रिपोर्ट के अनुसार, “विकेंद्रीकृत व्यवसाय, निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और बहु-आपूर्ति बिंदुओं की अवधारणा ने एकाधिकारवादी व्यवसाय मॉडल को जन्म दिया।”

बोतल बनाने वाली कंपनियों पर सिस्टम में शामिल होने का दबाव

रिपोर्ट और संबंधित विवरणों में यह भी दावा किया गया है कि नई व्यवस्था का विरोध करने वाले बोतल निर्माताओं को काफी दबाव का सामना करना पड़ा। इसका उदाहरण अक्सर आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के रूप में दिया जाता है। कंपनी ने उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को कई पत्र लिखकर गैरकानूनी हस्तक्षेप और दबाव को लेकर चिंता व्यक्त की।

एक पत्र में, कंपनी ने कहा कि उसने ‘कुछ उत्पाद शुल्क अधिकारियों द्वारा अवैध हस्तक्षेप’ के संबंध में बार-बार चिंता व्यक्त की थी, जो उनसे गैरकानूनी माँग पूरा नहीं करने पर परेशान कर रहे थे।

कंपनी ने आगे अनुरोध किया कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाए और कार्रवाई की जाए।

रिपोर्ट में उन 5 अधिकारियों के नाम बताए गए हैं जो डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन की दिशा में नीतिगत ढाँचे को तैयार करने में शामिल थे। इनमें पूर्व विशेष आयुक्त (राजस्व) और महाप्रबंधक (संचालन) गौतम घोष, वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त शांतनु आचार्य, उपायुक्त संचयन गांगुली, अतिरिक्त आयुक्त राजर्षि चक्रवर्ती और विशेष आयुक्त कुनास बिस्वास शामिल थे।

पहले, शुल्क का संग्रह मुख्य रूप से विनिर्माण चरण में होता था, जिसे आम तौर पर राजस्व संग्रह का सबसे सुरक्षित और सबसे कुशल तरीका माना जाता है। नए मॉडल में शुल्क संग्रह को विनिर्माण चरण और वितरक चरण के बीच विभाजित किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप राजस्व प्राप्ति में देरी हुई और वितरण नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हुआ, क्योंकि वितरक अक्सर अतिरिक्त शुल्क वक्त पर जमा करने में विफल रहते थे। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे न केवल प्रणाली जटिल हो गई बल्कि राजस्व दक्षता भी कमजोर हो गई।

बंगाल : करोड़ों की वसूली में TMC नेता सब्यसाची दत्ता को देर रात घर में घुसकर पुलिस ने किया गिरफ्तार

                    करोड़ों की वसूली में TMC नेता सब्यसाची दत्ता गिरफ्तार (फोटो साभार : ETVbharat)
पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने TMC को एक और बड़ा झटका दिया है। पुलिस ने बिधाननगर नगर निगम के पूर्व चेयरमैन और दिग्गज TMC नेता सब्यसाची दत्ता को गिरफ्तार कर लिया है। सब्यसाची दत्ता पर करोड़ों रुपए की रंगदारी और उगाही करने का गंभीर आरोप है।

बिधाननगर नॉर्थ पुलिस ने सोमवार (8 जून) को उन्हें राजारहाट स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया। राज्य में सरकार बदलने के बाद से TMC नेताओं पर कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। सब्यसाची दत्ता बिधाननगर-राजारहाट इलाके के बेहद प्रभावशाली नेता माने जाते हैं।

जानकारी के अनुसार, सब्यसाची दत्ता पर दंगा करने का आरोप है एक व्यापारी ने सब्यसाची के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई थी इसी एफआईआर के आधार पर पुलिस ने तृणमूल के पूर्व विधायक को गिरफ्तार किया सब्यसाची ने 26वें चुनाव में तृणमूल के टिकट पर बारासात से चुनाव लड़ा था इससे पहले वे राजारहाट-न्यूटाउन निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल के विधायक रह चुके हैं सब्यसाची बिधाननगर नगरपालिका के महापौर भी रह चुके हैं

पुलिस काफी समय से इन आरोपों की जाँच कर रही थी। यह गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई है जब TMC में बड़ी बगावत के संकेत मिल रहे हैं। पार्टी के करीब 20 विधायक दिल्ली में एनडीए (NDA) के बड़े नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। ये सभी विधायक जल्द ही एनडीए में शामिल होना चाहते हैं।

देर रात हुए गिरफ्तार

उस शिकायत के आधार पर, सब्यसाची को सोमवार रात को उनके न्यूटाउन स्थित फ्लैट से गिरफ्तार कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया लंबी पूछताछ के बाद, जब उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो पुलिस ने उन्हें देर रात गिरफ्तार कर लिया उन्हें मंगलवार(9 जून) को बिधाननगर अदालत में पेश किया जाएगा हालांकि, बिधाननगर उत्तर पुलिस स्टेशन ने इस संबंध में अब तक कोई घोषणा नहीं की है सब्यसाची के खिलाफ जबरन वसूली या मानसिक उत्पीड़न के आरोप नए नहीं हैं न सिर्फ व्यापारी और आम लोग, बल्कि पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ कई आरोप लग चुके हैं पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं

पहले भी होती रही है शिकायत

मधुसूदन चक्रवर्ती ने पहले भी कई बार पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी हालांकि, तृणमूल सरकार के दौरान पुलिस की निष्क्रियता के आरोप लगे थे आरोप है कि पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन सरकार बदलने के बाद वही पुलिस अब सक्रिय हो गई है राज्य में सत्ता में आने के बाद से भाजपा सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को किसी भी तरह से बख्शा नहीं जाएगा तब से पुलिस लगातार सक्रिय है तृणमूल नेताओं और पार्षदों को एक के बाद एक गिरफ्तार किया जा रहा है इस बार सब्यसाची का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है

क्या वाकई बंगाल में बदलाव हुआ है? फाल्टा से रहे ममता की पार्टी का उम्मीदवार जहाँगीर खान गिरफ्तार, नेपाल बॉर्डर से पकड़ाया अभिषेक बनर्जी का करीबी

बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने पर जिस रफ़्तार से TMC नेताओं पर कानूनी डंडा चल रहा है यह हकीकत है या कोई सपना? उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ द्वारा गुंडों और माफिया गैंग पर होती कार्यवाही पर तो सारा INDI गठबंधन चिल्ला रहा है लेकिन बंगाल में सब खामोश। जबकि दोनों जगह बीजेपी। इतना ही नहीं मुसलमान तक वर्तमान सरकार की कार्यवाहियों से खुश हैं। वही पुलिस वही मुस्लिम! अब कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं हो रहा। इतना ही नहीं जनता TMC नेताओं को जूतों का हार पहना रही है, अंडे और टमाटर फेंक रही है। क्या वाकई वामपंथियों से लेकर ममता राज तक जनता इतनी दुखी थी? सारा विपक्ष खामोश? जिसको देखो अपनी पार्टी को बचाए रखने की कोशिश में लगा है।अपने-अपने नेताओं तक की फ़िक्र नहीं। अजीब तमाशा चल रहा है बंगाल में।          

पश्चिम बंगाल पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने TMC नेता जहाँगीर खान को नेपाल बॉर्डर से गिरफ्तार कर लिया है। जहाँगीर खान फाल्टा विधानसभा सीट से TMC के उम्मीदवार थे लेकिन चुनाव के दौरान हुईं गड़बड़ियों के बाद फिर से मतदान हुआ था। इसके बाद यहाँ दोबारा मतदान हुआ और जहाँगीर खान ने मैदान छोड़ दिया था।

जहाँगीर खान को ममता बनर्जी के भतीजी और TMC के सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। जहाँगीर खान का यूपी के चर्चित IPS ऑफिसर अजयपाल शर्मा की चुनाव के दौरान तनातनी खूब चर्चा में रही थी। जहाँगीर खाने ने अजयपाल शर्मा को चुनौती देते हुए कहा था कि वो सिंघम हैं तो मैं पुष्पा हूँ झुकूँगा नहीं।

जहाँगीर के खिलाफ हत्या के प्रयास, जबरन वसूली और दंगा भड़काने समेत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज हैं। जहाँगीर के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी दर्ज है और ED उस मामले की जाँच कर रही है।

TMC के पूर्व विधायक तपन चटर्जी के घर मिला सरकारी राहत सामग्री तिरपाल-कंबल-फुटबॉल का जखीरा, पुलिस ने किया गिरफ्तार: लोगों ने लगाए ‘चोर-चोर’ के नारे

                                                           पूर्व MLA तपन चटर्जी गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल पुलिस ने रविवार (31 मई 2026) को को पूर्व बर्धमान जिले के पूर्वस्थली उत्तर से पूर्व TMC विधायक तपन चटर्जी के घर पर छापेमारी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस को सरकारी राहत सामग्री जमा करके रखने की सूचना मिली थी। तलाशी के दौरान घर से बड़ी संख्या में तिरपाल, कंबल, फुटबॉल, वॉलीबॉल और अन्य सामान बरामद हुआ जो आमतौर पर आपदा प्रभावित लोगों, युवा क्लबों और शैक्षणिक संस्थानों में बाँटने के लिए होता है।

राहत सामग्री के साथ-साथ घर से भारी मात्रा में खेल सामग्री भी बरामद हुई जिनमें फुटबॉल और वॉलीबॉल शामिल हैं। आमतौर पर ये सामान युवा क्लबों और शैक्षणिक संस्थानों में बाँटने के लिए होते हैं। बताया जा रहा है कि ये सामान घर के किचन से जुड़े एक कमरे में जमा करके रखा गया था। पुलिस की छापेमारी के दौरान TMC नेता के घर के बाहर केंद्रीय बलों की भी तैनाती की गई थी।

छापेमारी के दौरान पुलिस ने तपन चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया है। सरकारी राहत सामग्री के कथित दुरुपयोग और हेराफेरी के मामले में उनसे पूछताछ की जा रही है। जब पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर जा रही थी। तब स्थानीय लोगों ने पूर्व विधायक के खिलाफ ‘चोर-चोर’ के नारे लगाए। घर पर छापेमारी के बाद अब पुलिस तपन चटर्जी से जुड़े कई गोदामों की भी तलाशी ले रही है।

यह कार्रवाई राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद TMC नेताओं द्वारा सरकारी राहत सामग्री की कथित जमाखोरी और हेराफेरी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा मानी जा रही है। इस बरामदगी के बाद ममता बनर्जी सरकार के दौरान सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और वितरण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।

बीते कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में TMC नेताओं से जुड़े ऐसे कई मामले सामने आए हैं। उत्तर 24 परगना जिले में बदुरिया नगर पालिका के चेयरमैन दीपंकर भट्टाचार्य को पुलिस ने उस समय गिरफ्तार किया था, जब उनके ठिकानों से भारी मात्रा में नकदी और हजारों सरकारी तिरपाल बरामद हुए थे। वहीं, पूर्व मेदिनीपुर में पूर्व TMC विधायक तरुण कुमार मैती से जुड़े इलाकों से भी राहत तिरपाल बरामद किए गए थे। इसके अलावा कई अन्य TMC नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ वसूली, हथियार बरामदगी और राहत सामग्री जमा करके रखने के मामलों में भी कार्रवाई हुई है।

बंगाल में TMC नेता के घर मिले 626 कारतूस-पिस्टल, ममता के गुंडों को पुलिस ने दबोचा: 1.07 रूपए करोड़ कैश भी बरामद

       TMC नेता ने खेत में दबा रखे थे ₹500 के नोटों से भरे बोरे, तृणमूल जिला परिषद सदस्य के घर से कैश बरामद
पश्चिम बंगाल में ममता के गुंडों और भ्रष्ट नेताओं का आतंक इस कदर बढ़ चुका है कि अब उनके घर शरीफों के रहने लायक नहीं, बल्कि बारूद के ढेर और अवैध संपत्तियों के गोदाम बन चुके हैं। TMC नेताओं के काले कारनामों का एक और खौफनाक सच सामने आया है। पुलिस ने भारी छापेमारी कर जिला परिषद के रसूखदार TMC नेता अजीत साहा और बडुरिया नगर पालिका के चेयरमैन दीपांकर भट्टाचार्य को दबोच लिया है।

शुभेंदु सरकार लगातार अपराधियों पर नकेल कसने का काम कर रही है। इसी कड़ी में तृणमूल कांग्रेस(TMC) के नेताओं के ठिकानों पर अकूत संपत्ति और नकदी मिलने का सिलसिला जारी है। किसी नेता के घर में मोटी रकम पकड़ी गई है तो किसी के फार्म हाउस से बोरों में भरा कैश बरामद किया गया है।

इनके पास से जो मिला, उसे देखकर पूरा बंगाल दहल गया है। TMC नेता अजीत साहा के घर जब पुलिस ने धावा बोला, तो वहाँ का नजारा किसी खूंखार अपराधी के ठिकाने जैसा था। घर के कोने-कोने से 27 लाख रुपए की गद्दी, 1 पिस्टल, 1 एयरगन और भारी मात्रा में 626 जिंदा कारतूस बरामद हुए हैं।

इतना ही नहीं, गुंडागर्दी और अय्याशी के सबूत के तौर पर 52 बोतल विदेशी शराब भी जब्त की गई है। यह वही साहा बंधु हैं जिन पर पहले भी हिंसा और जबरन वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं। दूसरी तरफ, ममता के एक और खास नेता दीपांकर भट्टाचार्य के पास से 80 लाख रुपए कैश मिले।

और तो और, TMC दफ्तर के पास जूट के खेत को खोदकर नोटों से भरे बैग और बोरे निकाले गए। इन नेताओं ने बंगाल को पूरी तरह लूट और आतंक का केंद्र बना दिया है। 

खेत में दबा रखे थे 500 रूपए के नोटों से भरे बोरे, खोला तो निकले 2.2 करोड़ रुपए… छापेमारी के बाद गिरफ्तार

TMC नेता और बदुरिया नगर निगम के चेयरमैन दीपांकर भट्टाचार्य की अकूत संपत्ति का खुलासा हुआ है। बुधवार (28 मई 2026) को पुलिस ने उनके खेत की खुदाई में 500 रूपए के नोटों से भरे बोरे और ट्रॉली बैग बरामद किए। तस्वीर सामने आई जिसमें पुलिस कंधों पर इन बोरों को ढोकर अपने वाहन में रख रही है। पुलिस ने बताया कि इसकी कीमत लगभग 2 करोड़ 24 लाख रूपए है। इसके अलावा बोरों में कुछ जरूरी दस्तावेज भी मिले हैं।

पुलिस को यह कामयाबी उनकी गिरफ्तारी के बाद हासिल हुई। पुलिस ने मंगलवार (26 मई 2026) को भट्टाचार्य को 80 लाख रूपए नकदी और 4000 तिरपाल के साथ उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने बताया कि इस रकम और सामान सरकारी था जो राहत के लिए लोगों में बाँटा जाना था। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने TMC नेता को कोर्ट में पेश कर 6 दिन की रिमांड पर लिया।

TMC नेता भट्टाचार्य से पूछताछ में पुलिस को इस खेत की जानकारी मिली। तभी पुलिस अपने साथ भट्टाचार्य को खेत में ले आई, जहाँ जमीन के नीचे कैश से बरे बोरे बरामद किए गए। इसके अलावा पुलिस ने आसपास के खेतों में भी ड्रोन से तलाशी ली। इसके बाद पुलिस ने भट्टाचार्य के पीए शमीम गाजी को भी गिरफ्तार कर लिया।

उत्तर 24 परगना से TMC नेता और उसके भाई के घर से मोटी रकम मिली

इससे पहले उत्तर 24 परगना के मछलंदपुर में पुलिस ने राशन घोटाले के आरोप में जेल में बंद TMC सरकार में खाद्य मंत्री रहे ज्योतिप्रिय मल्लिक के करीबी TMC जिला परिषद सदस्य अजीत साहा के घर मंगलवार (26 मई 2026) को छापेमारी की। यहाँ पुलिस को 27,80,200 रूपए नकदी, 666 जिंदा कारतूस, 61 खाली कारतूस, एक एयर गन, छर्रों का डिब्बा, एक स्पोर्ट्स शूटिंग राइफल और विदेशी शराब की 52 बोतलें भी पुलिस ने जब्त की। पुलिस ने अजीत साहा और उनके भाई सुजीत उर्फ सुबीर साहा को भी गिरफ्तार किया।

बंगाल : BJP के डर से भागने लगे बांग्लादेशी, उत्तर 24 परगना जिले में 100+ घुसपैठिए परिवारों की भीड़ जमा दिखी

जिस बंगाल-बांग्लादेश बॉर्डर पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की भीड़ लगने उन सभी सनातन विरोधियों के मुंह में जम गया है। अब नहीं कह पा रहे कि घुसपैठियों के नाम पर बीजेपी हिन्दू-मुस्लिम कर मुसलमानों को डरा रही है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं होती। ये CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन आदि जितने भी धरने और प्रदर्शन हुए उन सब में  अधिकतर जमावड़ा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का होता था। धीरे-धीरे जितने भी आन्दोलनजीवी हैं सब घरों में छुपकर बैठ जाएंगे। 
सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि घुसपैठियों के निकलने पर भारत में उपद्रवों पर लगने वाली लगाम से परेशान होकर विदेशों में बैठे भारत विरोधी ताकतों ने क्रॉकरोच जनता पार्टी बनाई है।      
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को डर सताने लगा है, इसीलिए ये लोग वापस अपने देश लौट रहे हैं। ताजा नजारा उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर चेक पोस्ट का है, जहाँ 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठी अपने परिवारों के साथ बांग्लादेश लौटने के लिए इकट्ठे हुए।

दरअसल, यह नजारा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का हालिया आदेश के बाद सामने आया है। 21 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को आदेश दिया कि कहीं भी कोई बांग्लादेशी घुसपैठी पकड़ा जाए, तो सीधा सीमा सुरक्षा दल (BSF) को सौंप दो। उन्होंने कहा कि अब इन्हें अदालत नहीं ले जाया जाएगा बल्कि सीधे वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा।

सीएम शुभेंदु अधिकारी ने यह आदेश पिछले साल अप्रैल में संसद में पारित आव्रजन और विदेशी अधिनियम 2025 के तहत दिया। इस कानून के तहत विदेशियों के भारत में प्रवेश, प्रवास और निकास को नियंत्रित किया जा सकता है। इस आदेश के बाद बंगाल सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘होल्डिंग सेंटर‘ बना रही है, जिसमें ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ के तहत देश से निकाला जाएगा।

बंगाल : खुद को हावड़ा का बड़ा गैंगस्टर बताने वाले TMC गुंडे आकाश सिंह की पुलिस ने कच्छा-बनियान में निकाली परेड, गंजा करके सड़क पर घुमाया

     हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को पुलिस ने कच्छा-बनियान में सिर मुंडवाकर सड़कों पर घुमाया (फोटो साभार: X)
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही राज्य में अपराध पर नकेल कसनी शुरू हो गई है। इसी क्रम में पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया। इस परेड का वीडियो भी सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आकाश सिंह खुद को हावड़ा का बड़ा गैंगस्टर बताता था, जो TMC की सरकार में फल-फूल रहा था। जैसे ही राज्य में बीजेपी सरकार आई और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में आकाश सिंह का भी नंबर आया। पुलिस ने आकाश सिंह को पुलिस पर गोली चलाने, रंगदारी गिरोह चलाने और कई आपराधिक गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार किया।

 गिरफ्तारी के बाद आकाश सिंह को मालीपांचघरा और गोलाबाड़ी थाना क्षेत्रों में क्राइम रिकंस्ट्रक्शन के लिए ले जाया गया। पुलिस ने बताया कि इसका मकसद यह समझना था कि आरोपित ने अपराध की योजना कैसे बनाई, किन लोगों की मदद ली और वारदात को किस तरह अंजाम दिया गया। इस समय आकाश सिंह को हाफ पैंट और टी-शर्ट में देखा गया।

लेकिन शनिवार (23 मई 2026) को जब पुलिस आकाश सिंह को दोबारा घटनास्थल पर लेकर पहुँची, तब उसे बाल और दाढ़ी कटे हुए थे और वह केवल कच्छा और बनियान में नजर आया। इस दौरान उसके साथ पुलिस बल भी तैनात रहा। सामने आए वीडियो में आकाश सिंह को पुलिसकर्मियों के साथ सड़कों पर घूमता हुआ देखा जा सकता है।

पुलिस ने यह भी बताया कि इस प्रक्रिया में कई अहम सबूत हाथ लगे हैं और जो आगे की जाँच में कामगार साबित होंगे। उधर सोशल मीडिया पर पुलिस की इस प्रक्रिया की आलोचना की जा रही है।

राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ

पश्चिम बंगाल के हावड़ा में आरोपी गैंगस्टर आकाश सिंह को लेकर पुलिस द्वारा किए गए एक 'रिकंस्ट्रक्शन' अभ्यास ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। आरोप लग रहे हैं कि राज्य में BJP सरकार के सत्ता में आने के बाद पुलिस ने आरोपी अपराधियों को सार्वजनिक रूप से सिर्फ अंडरगारमेंट्स में घुमाना शुरू कर दिया है।
हावड़ा के आपराधिक नेटवर्क में एक कुख्यात हस्ती माने जाने वाले आकाश सिंह को रविवार को पुलिस ने उन कई कथित अपराध स्थलों पर ले जाया, जिनका संबंध जांच के दायरे में चल रहे पुराने मामलों से है। मालीपंचघरा और गोलाबाड़ी पुलिस स्टेशनों की पुलिस टीमों ने सिंह को कई "अपराध स्थलों" पर ले जाकर, पुराने मामलों की फिर से जांच करने के उद्देश्य से चल रहे एक पुनर्निर्माण अभ्यास का हिस्सा बनाया।
ऑपरेशन के दौरान, सिंह को बनियान और शॉर्ट्स पहने देखा गया, जब पुलिस भारी सुरक्षा के बीच उसे शहर के अलग-अलग हिस्सों से ले जा रही थी। इन दृश्यों ने तुरंत लोगों का ध्यान खींचा, क्योंकि हाल ही में सामने आए एक अन्य मामले में एक और आरोपी को अंतर्वस्त्रों में घुमाया गया था। राज्य में पुलिस के आचरण को लेकर पहले ही एक बहस छिड़ गई थी,जो अब और बढ़ रही है।

बंगाल : अब ‘नो कोर्ट, सीधा डिपोर्ट’: मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अवैध बांग्लादेशियों को BSF को सौंपने का दिया आदेश, बोले- अदालत ना ले जाएँ

       शुभेंदु अधिकारी और अवैध बांग्लादेशी प्रवासी, BSF को सौंपने का आदेश (फोटो साभार : NDTV & Jagran)
बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने पर बीजेपी सरकार ने घुसपैठ पर अब तक का सबसे बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एलान किया है कि राज्य में पकड़े गए अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को अब कोर्ट में पेश नहीं किया जाएगा, बल्कि सीधे बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपकर वापस भेजा जाएगा। ‘पता लगाओ, हटाओ और देश-निकाला दो’ अभियान के तहत यह नया नियम 20 मई से लागू हो चुका है।

जिन बांग्लादेशियों को अपनी कुर्सी की खातिर ममता बनर्जी दामाद बनाकर पाल रही थी, अब दामादों को जिस तरह देश-निकाला किया जा रहा है, हर बीजेपी राज्य को शुभेंदु के रास्ते पर चलना होगा। ये अवैध घुसपैठियों की वजह से भारतीयों को मिलने वाली सुविधाएं बाधित हो रही है। जब तक देश से घुसपैठियों- पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्या- को बाहर नहीं किया जाएगा देश में असुरक्षा का डर हमेशा बना रहेगा। इन घुसपैठियों का समर्थन करने वाली पार्टियों से पूछना चाहिए कि जिन रोहिंग्यों को जब कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं फिर क्यों भारत में रखने के लिए हिन्दू-मुसलमान कर माहौल ख़राब कर रहे हो? क्या ये घुसपैठिये तुम्हारे दामाद हैं?         

अब कोर्ट के चक्कर नहीं, सीधे बॉर्डर पर ‘नो एंट्री’

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हावड़ा में साफ कहा कि पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को कड़े निर्देश दे दिए गए हैं। हावड़ा स्टेशन या राज्य में कहीं भी कोई अवैध बांग्लादेशी पकड़ा जाता है, तो उसे अदालत ले जाने की जरूरत नहीं है। पुलिस पहले उसे अच्छे से खाना खिलाएगी और फिर सीधे उत्तर 24 परगना के पेट्रापोल या बशीरहाट बॉर्डर पर BSF के हवाले कर देगी, जहाँ से उन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा।

किसे मिलेगी राहत और कौन होगा बाहर?

इस नए नियम से उन लोगों को अलग रखा गया है जो नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के दायरे में आते हैं। बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थी अगर प्रताड़ना की वजह से भारत आए हैं, तो वे CAA के तहत नागरिकता का दावा कर सकते हैं। लेकिन जो इस दायरे में नहीं आते और अवैध रूप से रह रहे हैं, उन्हें तुरंत डिपोर्ट किया जाएगा। हर हफ्ते ऐसे लोगों की रिपोर्ट पुलिस महानिदेशक (DGP) के जरिए मुख्यमंत्री दफ्तर भेजी जाएगी।

2025 के नए कानून से मिला सरकार को पावर

अब तक का नियम था कि बिना कागजात मिलने वाले विदेशी नागरिक को ‘विदेशी अधिनियम 1946’ के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जाता था। यह अदालती प्रक्रिया सालों चलती थी। लेकिन अब सरकार संसद से अप्रैल 2025 में पास हुए ‘प्रवासन और विदेशियों अधिनियम, 2025’ के तहत कार्रवाई कर रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने 14 मई को ही इस संबंध में आदेश जारी किया था, जिसका बंगाल सरकार पालन कर रही है।

‘गाय की कुर्बानी तो होगी, 1400 साल से होती आ रही है’: हुमायूँ कबीर ने शुभेंदु अधिकारी को दिया चैलेंज, कहा- आग से मत खेलो, मुश्किलें खड़ी होंगी


पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखने वाले आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के चीफ और विधायक हुमायूँ कबीर ने बकरीद से पहले विवादित बयान देने शुरू कर दिए हैं। हुमायूँ कबीर ने गाय की कुर्बानी को लेकर विवादित बयान दिया है। हुमायूँ कबीर ने कहा कि 1400 साल पहले से कुर्बानी हो रही है और जब तक दुनिया रहेगी, तब तक कुर्बानी होती रहेगी।

हुमायूँ कबीर ने सीधे-सीधे सरकारी आदेश को ताक पर रखते हुए कहा, “कुर्बानी कोई मना करेगा भी तो उसे नहीं सुना जाएगा। सत्ता में शुभेंदु अधिकारी आ गए हैं, ये ठीक है कि लोगों ने उनको वोट दिए हैं, वो सरकार चलाएँगे लेकिन मेरा कहना है कि 1400 साल पहले से ये कुर्बानी होती आ रही है। जितने दिन तक दुनिया रहेगी, ये कुर्बानी होगी।”

उन्होंने कहा, “संविधान का सम्मान करना चाहिए लेकिन कुर्बानी होगी। गाय की भी होगी, बकरे की भी होगी और ऊंट की भी होगी। कुर्बानी के लिए जो पशु जायज हैं, उनकी कुर्बानी होंगी। बीजेपी सरकार को मैं चेतावनी देता हूँ, शुभेंदु अधिकारी से सीधे तौर पर कह रहा हूँ कि आग से मत खेलो। अगर वे कुर्बानी पर रोक लगाने की कोशिश करते हैं, तो इससे उनके लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी। मुस्लिम समुदाय किसी भी हाल में कुर्बानी के मामले में कोई समझौता नहीं करेगा।”

कबीर ने कहा कि वे मुसलमानों को गाय खाने से मना कर रहे हैं, उनकी सरकार है, वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन कुर्बानी तो होगी ही। उन्होंने कहा, “37% से अधिक मुसलमान गाय का गोश्त खाते हैं। सबसे पहले स्लॉटर हाउस बंद करना चाहिए। ईद की नमाज पढ़ने के लिए सरकार को हमें बड़ा मैदान देना चाहिए। अगर मैदान की व्यवस्था नहीं होगी, तो सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।”

बंगाल : TMC के जहाँगीर खान ने फाल्टा सीट पर मतदान से 2 दिन पहले ही नाम वापस लिया, कहा था- पुष्पा झुकेगा नहीं: चुनाव के दौरान यहीं पर EVM पर चिपकाए थे टेप

                       अभिषेक बनर्जी और TMC उम्मीदवार जहाँगीर खान (फोटो साभार : News18)
ममता के सत्ता में रहते बहुत बड़े खलीफा बन रहे जहांगीर खान चुनाव से पहले ही खुद ही हो गया चारों खाने चित। 21 तारीख को वोटिंग होनी है। यानि प्रशासक अगर सख्त हो अच्छे से अच्छा खलीफा पानी पीता नज़र आता है। ममता के राज में गुंडागर्दी मचाने वाले आज पनाह मांग रहे हैं। पश्चिम बंगाल की फालता विधानसभा सीट से एक बड़ी खबर सामने आई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवार जहाँगीर खान ने चुनावी मैदान छोड़ दिया है। जहाँगीर खान ने मतदान से महज दो दिन पहले अपना नाम वापस ले लिया है।

प्रचार खत्म होने के कुछ ही घंटे पहले हुए इस हैरान करने वाले फैसले से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जहाँगीर खान ने साफ किया है कि अब वह इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रहेंगे।

बीजेपी नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि TMC को अपनी करारी हार का अंदाजा हो चुका है। नेताओं का कहना है कि इसी डर से उम्मीदवार ने मैदान छोड़ दिया है। फाल्टा विधानसभा सीट पिछले 15 सालों से TMC का मजबूत गढ़ रही है।

बता दें कि बंगाल चुनाव के दौरान EVM पर बीजेपी के बटन पर टेप चिपकाए गए थे, जिससे कोई बीजेपी को वोट ना दे सके। बाद में चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान कराने का फैसला किया था। 

बंगाल : ‘मुसलमानो, गायों की कुर्बानी मत देना’ : भाजपा आने के बाद नखोदा मस्जिद के इमाम ने बकरीद से पहले की अपील, कहा- पहले अलग थी बात, अब बदल गई है सरकार

                          बकरीद से पहले मौलाना की अपील (फोटो साभार- डेली हिंदी, नवभारत टाइम्स और किसान तक)
बंगाल में पशु वध अधिनियम को लेकर हुई सख्ती के बाद नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने मुसलमानों से अपील की है कि बकरीद पर गायों की कुर्बानी न दी जाए।

इमाम की इस अपील साफ शब्दों में बता रही है कि बंगाल में ममता के राज में किस तरह गौ हत्या करना आम बात थी। लेकिन सरकार बदलते ही अब तेवर बदलने शुरू हो गए हैं। इस अपील से यह भी जाहिर होता है कि किस तरह ममता के राज में सनातन का खुलेआम क़त्ल हो रहा है। अब देखना यह है कि खुले में किसी भैसे, बैल या ऊंट की कुर्बानी दे जाएगी या नहीं।   

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने जो पशु वध को लेकर नए नियम जारी किए हैं उसके बाद गाय की कुर्बानी देना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो गया है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय के लोग गाय की नहीं बल्कि बकरियों की कुर्बानी को प्राथमिकता दें।

मौलाना कासमी ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को समझाया कि पहले की सरकार की बात अलग थी इस सरकार की बात अलग है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 से लागू है, लेकिन मौजूदा सरकार इसे पहले की तुलना में अधिक सख्ती से लागू कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने मुसलमानों को छूट तो दी, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला।

कासमी ने सरकार के लिए भी अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि सरकार यदि पशु वध के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं करा सकती, तो उसे गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देशभर में गोवध और गोमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने माँग की कि हर इलाके में आधुनिक बूचड़खाने बनाए जाएँ और बाजारों में पशु चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में पशु वध को लेकर नई अधिसूचना जारी की है। इसके तहत बिना सरकारी स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के किसी भी पशु के वध पर रोक लगा दी गई है। अधिकारियों को प्रमाण पत्र जारी करने से पहले पशुओं की उम्र और उनकी शारीरिक स्थिति की जांच करनी होगी।

बंगाल : TMC के गुंडों से राधा गोविंद मंदिर मुक्त, कब्जा कर बना लिया था पार्टी कार्यालय, BJP आई तो फिर शुरू हुई पूजा-अर्चना


पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आते ही बीरभूम जिले के रामपुरहाट स्थित श्री श्री राधा गोविंद मंदिर के भोगघर से तृणमूल कांग्रेस (TMC)  का कब्जा हटा दिया गया है। BJP कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की मदद से वहाँ चल रहा पार्टी कार्यालय बंद कराया गया और जगह को दोबारा मंदिर समिति को सौंप दिया गया है।

कब्जा हटने के बाद परिसर में फिर से पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो गए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1990 में इलाके के लोगों ने चंदा जुटाकर की थी। मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। बाद में मंदिर के पास भोगघर का निर्माण शुरू किया गया था।

आरोप है कि TMC के कुछ कार्यकर्ताओं ने निर्माण कार्य रुकवाकर उस जगह पर कब्जा कर लिया और वहाँ पार्टी कार्यालय खोल दिया। इस घटना को लेकर इलाके में लंबे समय से नाराजगी बनी हुई थी। श्रद्धालुओं और मंदिर समिति का कहना था कि धार्मिक स्थल का उपयोग राजनीतिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। अब कब्जा हटने और मंदिर को उसकी पुरानी पहचान वापस मिलने के बाद स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है।