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‘गाय की कुर्बानी तो होगी, 1400 साल से होती आ रही है’: हुमायूँ कबीर ने शुभेंदु अधिकारी को दिया चैलेंज, कहा- आग से मत खेलो, मुश्किलें खड़ी होंगी


पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखने वाले आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के चीफ और विधायक हुमायूँ कबीर ने बकरीद से पहले विवादित बयान देने शुरू कर दिए हैं। हुमायूँ कबीर ने गाय की कुर्बानी को लेकर विवादित बयान दिया है। हुमायूँ कबीर ने कहा कि 1400 साल पहले से कुर्बानी हो रही है और जब तक दुनिया रहेगी, तब तक कुर्बानी होती रहेगी।

हुमायूँ कबीर ने सीधे-सीधे सरकारी आदेश को ताक पर रखते हुए कहा, “कुर्बानी कोई मना करेगा भी तो उसे नहीं सुना जाएगा। सत्ता में शुभेंदु अधिकारी आ गए हैं, ये ठीक है कि लोगों ने उनको वोट दिए हैं, वो सरकार चलाएँगे लेकिन मेरा कहना है कि 1400 साल पहले से ये कुर्बानी होती आ रही है। जितने दिन तक दुनिया रहेगी, ये कुर्बानी होगी।”

उन्होंने कहा, “संविधान का सम्मान करना चाहिए लेकिन कुर्बानी होगी। गाय की भी होगी, बकरे की भी होगी और ऊंट की भी होगी। कुर्बानी के लिए जो पशु जायज हैं, उनकी कुर्बानी होंगी। बीजेपी सरकार को मैं चेतावनी देता हूँ, शुभेंदु अधिकारी से सीधे तौर पर कह रहा हूँ कि आग से मत खेलो। अगर वे कुर्बानी पर रोक लगाने की कोशिश करते हैं, तो इससे उनके लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी। मुस्लिम समुदाय किसी भी हाल में कुर्बानी के मामले में कोई समझौता नहीं करेगा।”

कबीर ने कहा कि वे मुसलमानों को गाय खाने से मना कर रहे हैं, उनकी सरकार है, वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन कुर्बानी तो होगी ही। उन्होंने कहा, “37% से अधिक मुसलमान गाय का गोश्त खाते हैं। सबसे पहले स्लॉटर हाउस बंद करना चाहिए। ईद की नमाज पढ़ने के लिए सरकार को हमें बड़ा मैदान देना चाहिए। अगर मैदान की व्यवस्था नहीं होगी, तो सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।”

कहाँ हैं बांग्लादेश के 2 ‘चिकन नेक’, इनके कटते ही कैसे बदल जाएगा नक्शा: असम मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने क्यों की इसकी चर्चा?

    हिमंत सरमा और बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनुस (साभार-zeenews/ economipedia)
बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया मुहम्मद युनुस ने चीन यात्रा के दौरान भारत के सिलिगुड़ी चिकन नेक पर बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत के साथ पूर्वोत्तर राज्य लैंडलॉक्ड यानी जमीन से घिरे हैं ऐसे में चीन को बांग्लादेश में अपना आर्थिक प्रभाव अधिक बढ़ाना चाहिए।

इसके बाद तुर्की इस्लामिक समूह ‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ ने ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ नाम से एक नक्शा जारी किया। इसमें भारत के पूर्वोत्तर और पूर्वी हिस्सों को शामिल किया गया है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के इस बयान और तथाकथित नक्शे से गुस्साए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बांग्लादेश को चेतावनी दी है। डेरगांव में प्रेस ब्रीफिंग में सरमा ने कहा कि हमारे पास एक चिकन एक है लेकिन बांग्लादेश के पास दो चिकन नेक्स हैं। अगर बांग्लादेश हमारे चिकन नेक पर हमला करता है तो हम बांग्लादेश के दोनों चिकन नेक्स पर हमला करेंगे।

सरमा ने आगे कहा कि बांग्लादेश का चिकन नेक मेघालय से सटा है और बांग्लादेश की चटगाँव बंदरगाह को जोड़ता है। यह भारत के चिकन नेक से भी पतला है और बस पत्थर फेंकने की दूरी पर स्थित है।

इस बीच एक रिपोर्ट ये भी आई कि चीन बांग्लादेश को सिलीगुड़ी के पास भारतीय सीमा के करीब लालमुनिरहाट में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनाए गए एयरबेस को फिर से तैयार करने में मदद कर रहा है। वर्तमान में इस बंद पड़े एयरबेस पर बांग्लादेश की वायु सेना का नियंत्रण है। हालाँकि यह दशकों से बेकार पड़ा हुआ है।

14 बार जन्म ले तब बांग्लादेश कर पाएगा हमला

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “कोई भी देश यह भ्रम न पाले कि वह भारत का चिकन नेक छीन सकता है। ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने यह पहले ही साबित कर दिया है कि वह कितना मजबूती से खड़ा है। बांग्लादेश को भारत पर हमला करने से पहले 14 बार जन्म लेना होगा।”
इसके बाद बांग्लादेश में जारी किए गए तथाकथित ग्रेटर बांग्लादेश वाले मानचित्र पर मुख्यमंत्री हिमंत सरमा ने कहा कि बांग्लादेश एक ‘छोटा सा देश’ है। उसे पर इतना ध्यान देने की जरूरत नहीं है। लोग ऐसा नक्शा बना सकते हैं और छाप सकते हैं। हम भी बांग्लादेश को असम का हिस्सा दिखाने वाला नक्शा बना सकते हैं, लेकिन किसी के नक्शा बना देने भर से असलियत नहीं बदलती।

कौन से हैं बांग्लादेश के दो चिकन नेक?

भारत के सिलीगुड़ी गलियारा को चिकन नेक नाम से भी जाना जाता है। लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा और 60 किलोमीटर लंबा ये वह रास्ता है जो पूरे पूर्वोत्तर को भारत से जोड़ता है। इसी तरह बांग्लादेश के पास भी दो चिकन नेक्स है।
बांग्लादेश का पहला चिकन नेक चटगाँव बंदरगाह से बांग्लादेश के अन्य हिस्सों को जोड़ता है। त्रिपुरा के पास स्थित यह चिकन नेक मिरसराय उपजिले में लगभग 40 किलोमीटर की भूमि है।
बांग्लादेश का दूसरा चिकन नेक रंगपुर डिवीजन के दक्षिणी कॉरिडोर है जो मेघालय के पास है। यह चिकन नेक दक्षिण पश्चिम गौराहिल्स से पश्चिम बंगाल में दक्षिण दिनाजपुर तक रंगपुर को बाकी हिस्सों से जोड़ता है और यह लगभग 90 किलोमीटर लंबा है।

बांग्लादेश को कैसे नुकसान पहुँचा सकती है उसी की चिकन नेक

दक्षिण त्रिपुरा के पास वाला बांग्लादेश का चिकन नेक काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर इसे बंद कर दिया जाए तो बांग्लादेश का लगभग 20% हिस्सा देश से कट जाएगा। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि चटगाँव बांग्लादेश का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह है।
                                             बांग्लादेश के दो चिकन नेक्स (साभार- इंडिया टुडे)
चटगाँव शहर भी बांग्लादेश के लिए काफी जरूरी शहर है। हालाँकि जंगल और नदियों से भरा यह इलाका भारत के लिए एक मुसीबत ही है क्योंकि म्यांमार के घुसपैठियों, अवैध बांग्लादेशियों समेत अन्य उग्रवादियों के लिए बहुत ही उपयुक्त जगह रही है।
अब बात करते हैं बांग्लादेश के दूसरे चिकन नेक की। दूसरा चिकन नेक बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में है। असल में यह बांग्लादेश का पूरा उत्तरी भू-भाग है जो लगभग 16,000 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा में फैला है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए रंगपुर काफी अहम है। रंगपुर में ही जूट, चीनी, चावल और तंबाकू की मिल और बड़ी-बड़ी कंपनियां मौजूद हैं।
अगर बांग्लादेश के इन दोनों चिकन नेक बांग्लादेश के साथ से निकल जाता है तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी और उसका असल नक्शा ही पलट सकता है।

आमदनी से 3 गुना ज़्यादा है MCD का खर्च, कैसे चलेगी AAP की रेवड़ी वाली राजनीति?

दिल्ली नगर निकाय (MCD) चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) की जीत हुई है। AAP को 250 में से 134 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा को 104 और कॉन्ग्रेस को 09 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। राजधानी दिल्ली का 97 फीसदी इलाका एमसीडी के अंडर ही आता है। बाकी का तीन प्रतिशत इलाका नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) और दिल्ली कंटेन्मेंट बोर्ड (DCB) के पास है।

एमसीडी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, दिल्ली नगर निगम के दायरे में लगभग 2 करोड़ लोग आते हैं, जो इसे भारत का सबसे बड़ा नगर निगम बनाती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से दिल्ली नगर निगम विश्व में सबसे बड़ा निगम है और जनसंख्या की दृष्टि से दिल्ली नगर निगम की गिनती टोक्यो के बाद होती है। दिल्ली नगर निगम में लगभग 1.50 लाख कर्मचारी काम करते हैं।

इसी साल केंद्र सरकार ने दिल्ली के तीन निगमों को मिलाकर एक कर दिया था। तीनों नगर निगम एक करने के बाद एमसीडी का बजट बढ़कर 15,000 करोड़ रुपए से ज्यादा पहुँच गया है। इस बार भी 15,276 करोड़ रुपए बजट का प्रा वलवधान किया गया है। वर्ष 2022-23 के लिए अनुमानित इस बजट का ऐलान होना बाकी है।

भले ही आम आदमी पार्टी एमसीडी चुनाव जीत चुकी है, लेकिन आगे उसकी राह आसान नहीं होने वाली है। एमसीडी की आर्थिक स्थिति बता रही है कि यह आम आदमी पार्टी के लिए काँटों भरा ताज है। दरअसल, दिल्ली नगर निगम की जितनी आमदनी है, उससे कई गुना ज्यादा खर्च है। एमसीडी के खर्च से पहले उसकी आमदनी के बारे में जान लेते हैं। एमसीडी की सालाना आमदनी लगभग 4800 करोड़ रुपए है।

टैक्स आय का प्रमुख साधन

किसी भी नगर निगम की आय का मुख्य स्रोत वसूले जाने वाला टैक्स होता है। दिल्ली एमसीडी को संपत्ति टैक्स से अधिक आमदनी होती है। उन्हें प्लॉट, दुकानों, कमर्शियल इमारतों और जगह-जगह लगने वाले एडवरटाइजिंग का टैक्स मिलता है। इसके अलावा बॉर्डर पर वसूले जाने वाले टोल टैक्स, पार्किंग आदि से निगम अपनी कमाई करता है। दिल्ली सरकार जो स्टांप ड्यूटी वसूल करती है, उसमें भी नगर निगम का हिस्सा होता है।

दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार से मिलता है फंड

पाँचवे वित्त आयोग में व्यवस्था की गई थी कि विकास कार्यों के लिए एमसीडी को दिल्ली सरकार अपने बजट का 12.5% हिस्सा देगा। यह फंड राज्य सरकार तीन किस्तों में एमसीडी को देती है। इसके अलावा केंद्र सरकार का शहरी विकास मंत्रालय भी एमसीडी के लिए फंड जारी करता है।

नक्शों की मंजूरी से फंड की प्राप्ति

दिल्ली में नक्शे मंजूर करने का काम एमसीडी के पास ही है। यदि नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में केंद्र सरकार भी कोई इमारत बनाती है तो उसे एमसीडी से ही नक्शा मंजूर कराना होता है। इसके लिए एमसीडी शुल्क वसूलता है।

आय के अन्य स्रोत

इनके अतिरिक्त एमसीडी जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र, ट्रेड लाइसेंस जारी करने, रेस्टोरेंट लाइसेंस देने, पार्किंग के ठेके जारी करने से भी आमदनी करता है।

आमदनी से अधिक खर्च

एमसीडी को आम आदमी पार्टी के लिए काँटो भरा ताज इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि आमदनी के तुलना में यहाँ खर्च बहुत अधिक है। खर्च अधिक और आमदनी कम होने के कारण विकास कार्यों के लिए अक्सर फंड की कमी हो जाती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक एमसीडी के लिए काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन और रिटायर्ड कर्मचारियों के पेंशन पर सालाना 9300 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। एमसीडी को लाखों स्ट्रीट लाइटों का बिजली बिल भरना पड़ता है। इस पर सालाना करीब 100 करोड़ रुपए खर्च आता है।
सफाई व्यवस्था पर सालाना करीब 300 करोड़ रुपए खर्च होता है। बिजली बिल और सफाई पर सालना खर्च 400 करोड़ का खर्च होता है, लेकिन आमदनी नहीं होती। इसके अतिरिक्त सैनिटेशन, कूड़ा ढुलाई और दफ्तरों के मेंटनेंस पर भी खर्च होता है।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि एमसीडी की जितनी आमदनी है, उससे करीब तीन गुना खर्च है। आय और व्यय के बीच का जो अंतर है उसे पाटना आम आदमी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।