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राँची में सोरेन सरकार की कँटीली तारें भी नहीं आईं काम, बैरिकेड फाँदकर विधानसभा के पास पहुँचे 15000+ छात्र: झारखंड में वाटरकैनन पर नाचे प्रदर्शनकारी

आखिरी बैरिकेड तोड़कर दीवार तक पहुँचे हजारों छात्र, वाटर कैनन के बीच नाचते दिखे प्रदर्शनकारी (फोटो साभार: हिंदुस्तान, एक्स)
इंडी गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि छात्रों की बाकी मांगें मान लेंगे, लेकिन CBI जांच नहीं होगी। जांच हमारी सरकार और CID ही करेगी।
अब जरा सोचिए...
जिस सरकार पर ही छात्रों और विपक्ष की तरफ से नौकरी में गड़बड़ी और पैसे लेकर नौकरी बेचने जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं, अगर वही सरकार अपनी एजेंसी से अपनी ही सरकार के खिलाफ जांच करवाएगी तो क्या सच सामने आएगा?
आरोप है कि झारखंड में नौकरियों की मंडी लगी हुई है और दलालों के जरिए दूसरे राज्यों से पैसे वाले लोगों को लाकर क्लास-1, क्लास-2 और क्लास-3 की नौकरियां बेचने का खेल चल रहा है।
अगर ये आरोप झूठे हैं तो फिर CBI जांच से डर कैसा?
ईमानदारी है तो CBI को जांच करने दीजिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं है...
सवाल ये है कि जांच आरोपी की पसंद की एजेंसी करेगी या सच की?
झारखंड की राजधानी राँची में JPSC, JSSC समेत विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्रों का आंदोलन सोमवार (10 अगस्त 2026) को उग्र रूप लेता दिखाई दिया। हजारों की संख्या में छात्र नई विधानसभा के घेराव के लिए सड़कों पर उतरे और बैरिकेड्स को पार करते हुए विधानसभा परिसर की दीवार तक पहुँच गए। छात्र आंदोलन के बीच JPSC के पूर्व चेयरमैन एल खांग्याते को CID ने गिरफ्तार कर लिया गया है। परीक्षा धांधली के मामले में छापेमारी के दौरान इन्होंने इस्तीफा दिया था।

प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, लेकिन पानी की बौछार के बावजूद छात्र पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। कुछ प्रदर्शनकारी खेतों के रास्ते भी विधानसभा की दीवार तक पहुँच गए। पुलिस और छात्रों के बीच कई जगहों पर गतिरोध की स्थिति बनी रही।

हजारों छात्रों ने तोड़े बैरिकेड, वाटर कैनन के बावजूद नहीं रुका मार्च

छात्र सुबह पुरानी विधानसभा से नई विधानसभा की ओर विधानसभा घेराव के लिए निकले थे। पूरे झारखंड से पहुँचे अभ्यर्थियों के कारण मार्च में बड़ी संख्या में भीड़ जुटी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 हजार से अधिक छात्र मार्च में शामिल हो चुके थे और दूसरे छात्र भी लगातार राँची पहुँच रहे थे।

प्रदर्शनकारियों के हाथों में तिरंगा था और आंदोलन में किसी राजनीतिक दल या संगठन का झंडा-बैनर नहीं दिखाई दिया। छात्रों ने आगे बढ़ते हुए पहले बैरिकेड को पार किया, फिर तीसरे और चौथे बैरिकेड को भी तोड़ दिया। जगन्नाथपुर मंदिर के पास चौथा बैरिकेड पार करने के बाद प्रदर्शनकारी नई विधानसभा से करीब 500 मीटर की दूरी तक पहुँच गए।

इसके बाद पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए वाटर कैनन चलाया। वाटर कैनन से पानी की तेज बौछार के बावजूद प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। कुछ छात्र पानी की बौछार के बीच नाचते नजर आए। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने आखिरी बैरिकेड भी पार कर लिया और कुछ छात्र खेतों के रास्ते विधानसभा की दीवार तक पहुँच गए।

पुलिस लगातार छात्रों से आगे नहीं बढ़ने की अपील करती रही, लेकिन प्रदर्शनकारी अपनी माँगों पर अड़े रहे। इस दौरान छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो भी आंदोलन में शामिल रहे। पिछले नौ दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे महतो पहले एंबुलेंस से मार्च में पहुँचे और बाद में छात्रों ने उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया। उनके हाथ में शिबू सोरेन की तस्वीर भी थी।

17वें दिन भी आंदोलन जारी, वार्ता बेनतीजा रहने के बाद विधानसभा मार्च

JPSC और JSSC की नियुक्ति परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों के आंदोलन का सोमवार को 17वाँ दिन है। इससे पहले रविवार को छात्रों और सरकार के प्रतिनिधिमंडल के बीच तीसरे दौर की बातचीत हुई, लेकिन इसमें भी छात्रों की प्रमुख माँगों पर सहमति नहीं बन सकी।

इसके बाद छात्रों ने विधानसभा घेराव का ऐलान किया और बड़ी संख्या में अभ्यर्थी राँची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जुटे। छात्र नेता रवींद्र पासवान ने कहा था कि पुलिस प्रशासन जहाँ भी उन्हें रोकेगा, छात्र वहीं बैठ जाएँगे और उनका आंदोलन सांकेतिक है। उनका कहना था कि छात्र अपनी माँगों पर कायम हैं और सरकार के फैसले से वे संतुष्ट नहीं हैं।

CGL परीक्षा रद्द करने और CBI जाँच की माँग

छात्रों और सरकार के बीच सबसे बड़ा विवाद JSSC CGL परीक्षा को लेकर है। प्रदर्शनकारी इस परीक्षा को रद्द करने के साथ-साथ पूरी अनियमितता की जाँच CBI से कराने की माँग कर रहे हैं। छात्रों की माँगों में परीक्षा रद्द करना, उसके बाद जाँच कराना और परीक्षा प्रणाली में जरूरी सुधार करना शामिल है।

उनका कहना है कि जब तक CGL परीक्षा रद्द नहीं की जाती और CBI जाँच के आदेश नहीं दिए जाते, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा।

वहीं सरकार CBI जाँच की माँग पर सहमत नहीं हुई है। सरकार की ओर से रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में न्यायिक जाँच कराने की बात कही गई है। साथ ही वित्तीय अनियमितता सामने आने पर प्रवर्तन निदेशालय यानी ED से जाँच कराने का विकल्प भी रखा गया है।

विधानसभा के 750 मीटर दायरे में धारा 163, पेंटबॉल गन को लेकर भी चर्चा

छात्रों के विधानसभा घेराव के मद्देनजर राँची प्रशासन ने नई विधानसभा परिसर के 750 मीटर के दायरे में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू की है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत पुलिस ने जगह-जगह बैरिकेडिंग की और कंटीले तार लगाए। वाटर कैनन भी तैनात किए गए थे।

इसके बावजूद छात्रों ने एक के बाद एक बैरिकेड पार किए और विधानसभा की ओर बढ़ते रहे। प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आने के बाद पुलिस के पास कथित पैलेट गन होने की चर्चा भी हुई। हालाँकि राँची के सिटी एसपी पारस राणा ने स्पष्ट किया कि ये पैलेट गन नहीं, बल्कि पेंटबॉल गन हैं।

पेंटबॉल गन आम तौर पर एक खेल में इस्तेमाल होती है, जिसमें संपीड़ित हवा की मदद से रंग से भरी छोटी गेंदें चलाई जाती हैं। गेंद किसी व्यक्ति या सतह से टकराकर फटती है और उस पर रंग छोड़ देती है। प्रदर्शन के संदर्भ में ऐसी गन का इस्तेमाल कथित तौर पर उपद्रव करने वालों की पहचान करने के लिए किया जा सकता है।

क्योंकि उनके कपड़ों पर लगा रंग बाद में पहचान में मदद कर सकता है। कुछ पेंटबॉल सिस्टम में पेपर बॉल का इस्तेमाल भी संभव है, जिसमें मिर्च जैसी सामग्री भरी जा सकती है। पेंटबॉल गन को पैलेट गन से अलग बताया गया है। पैलेट गन में धातु के छर्रे इस्तेमाल होते हैं, जो शरीर को गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं और आंखों के लिए खतरनाक हो सकते हैं।

इसके विपरीत पेंटबॉल गन में आम तौर पर नरम जेलाटिन की रंगीन गेंदें इस्तेमाल होती हैं, जो टकराने पर फटकर रंग छोड़ती हैं और सामान्य परिस्थितियों में उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को गंभीर रूप से घायल करना नहीं, बल्कि निशान छोड़ना होता है।

फिलहाल रांची में छात्रों का मार्च पुलिस बैरिकेडिंग और वाटर कैनन के बीच विधानसभा की दीवार तक पहुँच चुका है और छात्र फिलहाल पीछे हटने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं।

वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल? विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब NEET पेपर लीक तक विपक्ष ने जितने भी धरने/प्रदर्शन हुए हैं सभी अपने असली मुद्दे से भटके हैं। दूसरे विपक्ष का किसी न किसी बहाने संसद को बाधित करना रहा है। तीसरे, अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मुग़ल आक्रांताओं के गुणगान की बजाए उनकी असलियत पुस्तकों में लाई गयी होती कोई प्रधान का इस्तीफा नहीं मांगता। सभी धरनों में भोजन मिलना पहली बार देखा गया है। जो इस बात को साबित करता है कि हमारा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथों बिका हुआ है। जनता समझती है ये नेता जनता के हित में काम कर रहे हैं जबकि संसद से लेकर सड़क तक जो भी उपद्रव हो रहा है सब विदेशी फंडिंग से हो रहा है। जिसका तक़रीबन हर चैनल पर जिक्र किया जा रहा है। चुनावों में जनता से मदद मांगी जाती है लेकिन धरनों में भारत विरोधियों की शरण में, ये क्या तमाशा है?     
राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है। https://www.facebook.com/share/r/1F4fka4oWh/

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।
कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।
स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।
वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

चेहरे चमक गए, पर मुद्दे धुंधले पड़े: CJP की अंदरूनी लड़ाई ने आंदोलन की साख पर उठाए सवाल


NEET पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।

लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।

साभार : सोशल मीडिया 

CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।

अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।

दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है। 

दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”

असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।

जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।

इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।

वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।

उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।

जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।

किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।

ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।