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अभिजीत दीपके के देश से गद्दारी के सबूत, स्वतंत्रता दिवस से पहले फिर अराजकता फैलाने की बड़ी साजिश, बड़े अराजक निकले गुरु और चेला

एक प्रसिद्ध हिंदी कहावत है- “एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा”। इसका अर्थ है कि एक बुराई या समस्या के साथ दूसरी बुराई या समस्या का जुड़ जाना, जिससे स्थिति और भी अधिक खराब हो जाती है। इसे और सरल शब्दों में समझ सकते हैं कि जब कोई दुष्ट या बुरे स्वभाव का व्यक्ति किसी बुरी संगति में पड़ जाता है, तो वो और अधिक अराजक हो जाता है। यह कहावत आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके पर पूरी तरह से लागू होता है। क्योंकि गुरु अरविंद केजरीवाल खुद अपने आप को अराजक (अनार्किस्ट) बात चुके हैं, वहीं एक नए खुलासे से पता चलता है कि चेला अभिजीत दीपके तो अपने गुरु केजरीवाल से भी ज्यादा अराजक है। 

स्वतंत्रता दिवस पर अराजकता फैलाने की प्लानिंग, लोगों ने भगाया

15 अगस्त,2026 को पूरा देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, लेकिन अभिजीत दीपके ने अपने गुरु अरविंद केजरीवाल की तरह दिल्ली की सड़कों पर फिर अराजकता पैदा करने की प्लानिंग की है। उन्होंने इस प्लान का नाम ‘जंतर-मंतर सीजन 2′ दिया है। लेकिन अभिजीत और उसके साथियों को दिल्ली के एक रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क से उलटे पांव भागना पड़ा। दीपके अपनी टीम के मेंबर सौरभ दास, आशुतोष रंका और कुछ समर्थकों के साथ रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में जंतर-मंतर सीजन 2 का प्लान बनाने आए थे। सोसाइटी के लोगों को जब इसकी भनक लगी तो वे वहां बड़ी संख्या में पहुंच गए और पार्क से सभी को भगा दिया। लोगों का कहना था कि यह सोसाइटी का पार्क है कोई धरना या प्रदर्शन की जगह नहीं। यहां यह नौटंकी नहीं चलेगी।

‘जंतर-मंतर सीजन 2’ में चाहिए पीएम मोदी और अमित शाह का इस्तीफा

रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए अभिजीत ने कहा कि जल्द “जंतर-मंतर सीजन 2 शुरू होने जा रहा है। अभिजीत ने अपने समर्थकों से पूछा कि अब किसका इस्तीफा चाहिए। समर्थकों ने कहा मोदी और अमित शाह का इस्तीफा। इससे पता चलता है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से गुरु केजरीवाल का मिशन पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अभिजीत दीपके अपने गुरु का मुख्य मिशन यानी प्रधानमंत्री मोदी का इस्तीफा लेने के लिए “जंतर-मंतर सीजन 2 की तैयारी में लगा है। विक्टिम कार्ड खेलते हुए दीपके ने आरोप लगाया कि प्रशासन और राजनीतिक दबाव के चलते उन्हें वालंटियर्स की इनडोर मीटिंग के लिए हॉल की बुकिंग आखिरी समय में रद्द करनी पड़ी, जिसके बाद उन्हें खुले में बैठक करनी पड़ी।

 

20 जुलाई को दिल्ली में दिखा अभिजीत दीपके का अराजक चेहरा

20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में संसद मार्ग और जंतर-मंतर के पास युवाओं और छात्रों (कॉकरोच जनता पार्टी) के नेतृत्व में बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था। नीट परीक्षा में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ यह मार्च संसद के बेहद करीब पहुंच गया था, जहां पुलिस के साथ झड़प, आंसू गैस के इस्तेमाल और पथराव के कारण भारी अफरातफरी और तनाव का माहौल बन गया था। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प में एसीपी सहित कई पुलिसकर्मी घायल हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में सैकड़ों आपराधिक पृष्ठभूमि (हिस्ट्रीशीटर) के लोग भीड़ में शामिल थे। इससे पता चलता है कि अभिजीत दीपके और उसके इकोसिस्टम का इरादा बांग्लादेश और नेपाल की तरह दिल्ली को जलाना था, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर उनके नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया।

अभिजीत दीपके ने अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में चलाया था प्रोपेगैंडा 

2019 में अभिजीत दीपके आप (AAP) का राष्ट्रीय सोशल मीडिया समन्वयक था। अभिजीत दीपके ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया था और जम्मू-कश्मीर के लोगों को भड़काने की कोशिश की थी। अभिजीत ने सोशल मीडिया के माध्यम से कश्मीर में कार्रवाई को लेकर फर्जी खबरें (Fake News) फैलाई थीं। ट्वीटर पर एक चैट में अभिजीत दीपके ने लिखा था, “I’m afraid of losing him, I don’t want him to die. But that’s a reality in Kashmir everyday” यानी “मुझे उसे खोने का डर है, मैं नहीं चाहता कि उसकी मौत हो। लेकिन कश्मीर में हर दिन यही सच्चाई है।”

कश्मीर में लोग लगातार मौत के साए/डर में जी रहे हैं- अभिजीत दीपके

अभिजीत दीपके ने नाम का खुलासा किए बिना अपने किसी कश्मीरी दोस्त के हवाले से सोशल मीडिया पर कश्मीर और देश में डर का माहौल बनाने की कोशिश की थी। साथ ही पाकिस्तान सहित अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को बताना चाहता था कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से लोग डर के साए में जी रहे हैं। अभिजीत ने ट्वीटर पर लिखा था, “People are living in a constant fear of death. I had this chat with one of my friend last night.” यानी “लोग लगातार मौत के साए/डर में जी रहे हैं। कल रात मेरी अपने एक दोस्त से यही बातचीत हुई थी।” इस पोस्ट से पता चलता है कि अभिजीत दीपके का एकमात्र मकसद कश्मीर में सक्रिय अलगाववादियों/आतंकवादियों के लिए समर्थन जुटाना था। दिल्ली की तत्कालीन केजरीवाल सरकार और पार्टी से जुड़े होने के कारण, वह ऐसा प्रोपेगैंडा चला रहा था, जिससे भारत-विरोधी शक्तियों को मदद मिल रही थी। 

अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में खड़ा होने की अपील

इस दौरान अभिजीत दीपके ने ट्विटर (अब X) पर कई पोस्ट किए थे, जिन्हें लेकर सोशल मीडिया पर काफी विवाद हुआ था। 5 अगस्त 2019 को अभिजीत दीपके ने ट्वीटर पर लिखा था, “कश्मीर के साथ खड़ा होने की जरूरत है। आज जो कुछ कश्मीर में हो रहा है, कल आपके राज्य में भी हो सकता है।” हैरानी की बात है कि 5 अगस्त 2019 को गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का संकल्प और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश किया, जिसे राज्यसभा ने उसी दिन पास किया। अभिजीत दीपके ने पास होने के थोड़ी देर बाद देर रात 1 बजकर 22 मिनट पर कश्मीर के साथ खड़े होने का ट्वीट कर दिया था। इसकी टाइमिंग देखकर लगता है कि अनुच्छेद 370 हटने से इसे कितना बड़ा झटका लगा था।

 कश्मीर में कार्रवाइयों की तुलना इजराइल से की थी

अभिजीत दीपके की मानसिकता देश और सेना विरोधी है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंद कर कर्फ्यू लगा दी गई थी। इस दौरान अभिजीत दीपके ने कश्मीर में इंटरनेट बंदी और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों की तुलना इजराइल की नीतियों से करते हुए सरकार और सुरक्षा बलों की आलोचना की थी। इसके बाद 26 सितंबर 2019 को अभिजीत दीपके ने कश्मीर के लोगों को भड़काने के लिए सोशल मीडिया में पोस्ट किया था, “कश्मीर में कब जागोंगे ? अब तो 370 भी हट गया।”
धारा 370 की क्या ज़रूरत थी?- अभिजीत दीपके
अभिजीत दीपके ने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “धारा 370 की क्या ज़रूरत थी? जम्मू और कश्मीर को भारत के अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की तुलना में अलग अधिकारों की आवश्यकता क्यों थी? आज़ादी के बाद 550 से अधिक देशी रियासतें (Princely states) बिना धारा 370 जैसी किसी शर्त के भारत के अधीन आई थीं। धारा 370 एक बहुत बड़ी विफलता (fiasco) थी, शेख अब्दुल्ला इसका इस्तेमाल एक अलग कश्मीर बनाने के लिए करना चाहते थे।”
देश और कश्मीर विरोधी प्रोपेगैंडा के लिए LRO ने दर्ज कराई थी शिकायत
अभिजीत दीपके द्वारा लगातार देश और कश्मीर विरोधी ट्वीट के बाद ‘लीगल राइट्स आब्जर्वेटरी’ (LRO) ने पुणे में एक आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई थी। उन पर कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ भड़काऊ और झूठा प्रचार करने तथा अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। लीगल राइट्स आब्जर्वेटरी (LRO) ने अपनी शिकायत में चार मांगें की थीं…
  1. देशद्रोह (राजद्रोह) और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने से संबंधित आईपीसी (IPC) की धाराओं के तहत अभिजीत दीपके के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए,
  2. यूएपीए (UAPA) के तहत अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया जाए और हुर्रियत तथा अन्य कश्मीरी अलगाववादी/आतंकवादी समूहों के साथ उसके गुप्त संबंधों की पूछताछ की जाए,
  3. यह पता लगाने, जांच करने और उजागर करने के लिए कि क्या उसने बड़े पैमाने पर भारत-विरोधी दुष्प्रचार चलाने के लिए संदिग्ध स्रोतों से धन प्राप्त किया है, उसके पिछले 5 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की जांच की जाए,
  4. किसी विदेशी खुफिया एजेंसी के साथ उसकी संभावित साँठगाँठ की जाँच के लिए उसके विदेशी दौरों के विवरण की जाँच की जाए।
दिल्ली दंगा के आरोपी उमर खालिद का समर्थक
अब सवाल उठता है कि महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अभिजीत दीपके का कश्मीर, अनुच्छेद 370 और उमर खालिद के प्रति इतना प्रेम क्यों है? दरअसल, यह प्रेम देश विरोधी इकोसिस्टम के गठजोड़ का नतीजा है, जो एक-दूसरे की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद करते हैं। वर्ष 2016 में उमर खालिद ने जेएनयू में कश्मीर के आत्मनिर्णय (Self-determination) की वकालत थी। इस दौरान प्रदर्शन में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” का नारा लगा था। इसके बाद उमर खालिद पर 2020 दिल्ली दंगों के आरोप लगे। इसके बावजूद अभिजीत दीपके ने उमर खालिद का समर्थन किया है और समय समय पर उमर खालिद की जमानत को लेकर आवाज उठाते रहते हैं। सोशल मीडिया में उन्होंने सवाल उठाया था कि उमर खालिद पिछले 5 साल से बिना ट्रायल के जेल में हैं। उनके अलग तरीके से व्यवहार क्यों किया जा रहा है?
अभिजीत दीपके को अराजकता फैलाने की ट्रेनिंग कैसे मिली है। किस तरह गुरु अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सड़कों पर अराजकता का प्रदर्शन किया है… 
गणतंत्र दिवस से ठीक पहले सड़क पर ही धरने पर बैठ थे गुरु केजरीवाल
अभिजीत दीपके का गुरु अरविंद केजरीवाल कितना बड़ा अराजकतावादी हैं, इसका प्रमाण जनवरी 2014 में गणतंत्र दिवस से ठीक पांच दिन पहले मिला था। गणतंत्र दिवास की तैयारियों को लेकर दिल्ली में राजपथ (वर्तमान में कर्तव्य पथ) पर परेड के लिए सेना, सुरक्षा बलों और विभिन्न राज्यों की झांकियों का पूर्वाभ्यास हो रहा था। ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल ने रेल भवन के पास अनिश्चितकालीन धरना दिया था। हालांकि यह प्रदर्शन दो दिनों (20 और 21 जनवरी 2014) तक चला था, लेकिन 20 जनवरी 2014 को गृह मंत्रालय की तरफ जाने से रोके जाने के बाद केजरीवाल अपने मंत्रियों और समर्थकों के साथ रेल भवन के बाहर सड़क पर ही धरने पर बैठ गए थे और कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात बिताई। गणतंत्र दिवस समारोह के ठीक पहले उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में इस तरह के प्रदर्शन से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया था।
मैं मानता हूं कि मैं अनार्किस्ट हूं- अरविंद केजरीवाल
आम आदमी पार्टी के रेलवे भवन के आगे धरने के ऐलान के कारण चार मेट्रो स्टेशन – पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, उद्योग भवन और रेस कोर्स रोड बंद कर दिया गया था। केंद्रीय सचिवालय स्टेशन पर इंटरचेंज की सुविधा भी नहीं थी। सरकारी और निजी क्षेत्र के अधिकारियों और कर्मचारियों को ऑफिस आने-जाने वालों के साथ ही आम लोगों असुविधा हो रही थी। ऐसे में अरिवंद केजरीवाल अपने मंत्रियों के साथ सड़क पर धरना दे रहे थे। 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस को लेकर दिल्ली में पूरी तरह अफरा-तफरी का माहौल था। इस दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा था, ” कुछ लोग कह रहे है कि मैं अनार्किस्ट हूं। मैं अव्यवस्था फैला रहा हूं। मैं मानता हूं कि मैं अनार्किस्ट हूं। मैं अव्यवस्था फैला रहा हूं।”
जुलाई 2026 में पेपर लीक और छात्र आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों से कहा था कि वे मुकदमों से न डरें, क्योंकि उनकी कानूनी मदद के लिए बड़े से बड़ा वकील खड़ा किया जाएगा।
अरविंद केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेताओं ने सैकड़ों समर्थकों के साथ 20 जनवरी, 2014 को दक्षिण दिल्ली में एक कथित ड्रग और वेश्यावृत्ति रैकेट पर छापा मारने से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए रेल भवन के बाहर धरना दिया था। पुलिस ने उनके खिलाफ दायर चार्जशीट में दावा किया कि 19 जनवरी, 2014 को सहायक पुलिस आयुक्त ने रेल भवन और संसद मार्ग के पास नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, विजय चौक इलाकों में निषेधाज्ञा लागू की थी, जिसके खिलाफ जाकर उन्होंने यह विरोध प्रदर्शन किया। उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए अपने 6 मंत्रियों के साथ केजरीवाल ने अपना विरोध जताने के लिए नॉर्थ ब्लॉक स्थित गृह मंत्रालय की तरफ जाने की कोशिश की।
जब एलजी ऑफिस में हड़ताल पर बैठे केजरीवाल
जून 2018 में अरविंद केजरीवाल की अराजकता फिर देखने को मिली जब वह अपने सहयोगी मंत्रियों के साथ एलजी अनिल बैजल के ऑफिस में हड़ताल पर बैठ गए। केजरीवाल और उनके मंत्री अपनी मांगों के समर्थन में 11 जून, 2018 की शाम से 20 जून, 2018 तक एलजी अनिल बैजल के कार्यालय में धरना देते रहे। 

जेएनयू में देश विरोधी नारों का समर्थन
देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशाल्लाह, इंशाल्लाह’ ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी’, ‘इंडियन आर्मी मुर्दाबाद’ और ‘कितने अफजल मारोगे-हर घर से अफजल निकलेगा’ ये देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसे नारा लगाने वालों के साथ खड़े नजर आते हैं। अरविंद केजरीवाल की तत्कालीन दिल्ली सरकार ने जेएनयू के पूर्व छात्र अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ केस चलाने के मामले में महीनों से रोड़ा बनी। वहीं तत्कालीन विधानसभा में नेता विपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा था कि बीते 22 फरवरी और 23 अगस्त 2019 को विधानसभा में टुकड़े-टुकड़े गैंग का मामला उठाया था, लेकिन सीएम केजरीवाल ने मार्शल बुलाकर भाजपा के विधायकों को सदन से बाहर निकलवा दिया। वह सिर्फ टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करना चाहते हैं। गुप्ता ने कहा कि मुकदमा चलाने की अनुमति न देकर मुख्यमंत्री केजरीवाल कानून को काम करने से रोक रहे हैं और गलत उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
केजरीवाल की शह पर गुंडागर्दी करते हैं आप विधायक
19 फरवरी, 2018 की रात 12 बजे दिल्ली के तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल के घर पर विधायकों की बैठक थी। इसमें शामिल होने के लिए राज्य के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को भी बुलाया गया था, लेकिन उसी दौरान आम आदमी पार्टी के दो विधायकों ने दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से धक्का-मुक्की और बदसलूकी की। सवाल है कि सीएम के इशारे के बिना क्या कोई विधायक उनकी मौजूदगी में ऐसी हरकत करने की हिम्मत कर सकता है? अगर ऐसा नहीं था तो केजरीवाल को स्वयं इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करवानी चाहिए थी। वे राज्य के संवैधानिक पद पर बैठे हैं इसलिए उनकी जिम्मेवारी थी कि कम से कम पुलिस को इस बात की सूचना खुद देते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 
अधिकारियों को गुलाम समझती है केजरी एंड कंपनी
4 अक्टूबर, 2017 को तत्कालीन दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कहा था, ”दिल्ली के मालिक हम हैं”। आप समझ सकते हैं जिस व्यक्ति ने जनता का सेवक बनने का वादा कर सत्ता हासिल की वे स्वयं को दिल्ली का मालिक कहते हैं। जाहिर है मूल सोच में ही जब खोट हो तो उसके परिणाम भी घातक ही होंगे। दिल्ली में कुछ ऐसा ही हो रहा है। अधिकारियों को सरेआम बेईमान कहना, उन्हें गालियां देना और मनमानी करने वाला बताना, कम से कम एक सीएम को तो शोभा नहीं देता है। केजरीवाल एंड कंपनी ने जब से सत्ता का स्वाद चखा उनका व्यवहार सामंती हो चला है। 
बीजेपी नेताओं से बदसलूकी
जब दिल्ली में चल रहे सीलिंग मुद्दे पर बैठक के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पहुंचे बीजेपी नेताओं के साथ केजरीवाल के गुंडों पर मारपीट का आरोप लगा था। इस घटना के बाद दिल्ली बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष मनोज तिवारी और अन्य नेताओं ने थाने पहुंचकर केजरीवाल एवं उनके गुर्गों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मनोज तिवारी का आरोप है कि आम आदमी पार्टी के नेता जरनैल सिंह ने उनके एक नेता से ऐसी धक्का-मुक्की की कि उनके हाथ में चोट आ गई। मनोज तिवारी ने ये भी आरोप लगाया ‌कि वे समय लेकर वहां पहुंचे थे, लेकिन केजरीवाल ने उनसे अभद्र भाषा में बात की और अपमान किया।
कपिल मिश्रा पर भी करवाया जा चुका है हमला
दिल्ली में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा पर अनशन के दौरान हमला करवाने का आरोप भी केजरीवाल की पार्टी पर लग चुका है। आरोप लगे थे कि आरोपी अंकित भारद्वाज आम आदमी पार्टी का समर्थक था। दरअसल, कपिल मिश्रा ने अपनी आंखों के सामने केजरीवाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था। इसी बात पर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो उनसे नाराज हो गए थे। 

CJP प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर हैरान रह जाएंगे, लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ और TFF से कनेक्शन

                                                                                               साभार 
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनके न सिर्फ लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ से कनेक्शन हैं, बल्कि उससे मिली फंडिंग से सरकार विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास का विदेशी फंडिंग से जुड़ा कनेक्शन सामने आते ही सवालों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि किसी पत्रकार या शोधकर्ता को विदेशी संस्था से अनुदान क्यों मिला; असली सवाल यह है कि पैसा किससे आया, किस काम के लिए आया, किन लोगों और संस्थाओं तक पहुंचा और उस फंडिंग से तैयार होने वाले कंटेंट का प्रभाव किस दिशा में जाता है? जब एक ही विदेशी फाउंडेशन पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों के अलग-अलग प्रोजेक्ट को लगातार वित्तीय सहायता देता दिखाई दे, और उन नामों के काम में वैचारिक समानताएं भी नजर आएं, तो इसे महज संयोग कहकर आगे बढ़ जाना आसान जरूर है, लेकिन सवालों से बच निकलना इतना आसान नहीं। क्योंकि सौरव दास और अमेरिका स्थित ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का संबंध इसी बड़े सवाल का एक सिरा है। उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि TFF ने सौरव दास को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया है।

सौरव दास और लेफ्ट लिबरल गैंग का विदेशी फंडिंग का कनेक्शन

सौरव दास और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का रिश्ता इसी बड़े नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। जब उसी फाउंडेशन की विस्तृत ग्रांट सूची में न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक अधिकारों से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के नाम भी दिखाई देते हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि इस फंडिंग का व्यापक उद्देश्य और उसका प्रभाव क्या है। सौरभ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी उस नेटवर्क को समझने में है, जिसमें पैसा अलग-अलग नामों और परियोजनाओं तक पहुंचता है। यदि कोई संस्था भारत में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में पैसा लगा रही है, तो यह जानने का अधिकार जनता को है कि उसके संसाधनों का स्रोत क्या है, प्राथमिकताएं क्या हैं और जवाबदेही किसकी है।

 CJP के सौरव दास और TFF का कनेक्शन क्या है?

सौरव दास का नाम TFF की अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित ग्रांट पाने वाले लोगों में मिलता है। फाउंडेशन के अनुसार उन्हें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया गया। TFF की वेबसाइट पर इस ग्रांट के साथ सौरव दास की कुछ रिपोर्टों के लिंक भी दिए गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषणों में उनके अनुदान की राशि और वर्ष को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। यहीं से असली खेल शुरू होता है। यदि किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर रिपोर्टिंग के लिए विदेशी फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि कौन-सा काम उस अनुदान के तहत हुआ, उसका दायरा क्या था और फंडर तथा प्राप्तकर्ता के बीच जवाबदेही की व्यवस्था क्या थी।
TFF से लेफ्ट लिबरल गैंग को फंडिंग की सूची छोटी नहीं
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार यह अप्रैल 2019 से भारत में सूचना तक पहुंच को बढ़ावा देने और खोजी अनुदानों के माध्यम से एक अधिक जागरूक और जवाबदेह समाज बनाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। फाउंडेशन का दावा है कि उसका लक्ष्य समस्याओं के मूल कारणों पर काम करना और रणनीति के माध्यम से जवाबदेही की संस्कृति को और मजबूत बनाना है। TFF की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और विस्तृत हो जाती है। फाउंडेशन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूज़लॉन्ड्री को रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया। मनीलाइफ फाउंडेशन के RTI सेंटर को भी समर्थन दिया गया। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को evidence-based medicine की fact-checking के लिए अनुदान दिया गया है। न्यूज लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकारों और द कारवां से जुड़े रिपोर्टरों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए फेलोशिप या अनुदान दिए गए हैं। बाद के वर्षों में फाउंडेशन की सूची और फैलती दिखाई देती है। इसमें preventive detention, custodial या extrajudicial deaths, Indian Pharmacopoeia, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पतालों में संक्रमण, HIV संक्रमण, communal harmony और policy-making में think tanks की भूमिका जैसे विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ता और संस्थाएं शामिल हैं।
द वायर, न्यूजलॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज तक पहुंच
TFF की वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उसने ऐसे मीडिया और शोध नेटवर्क को समर्थन दिया है, जिनकी पहचान सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर विवादित रिपोर्टिंग की रही है। द वायर से जुड़े पत्रकारों ने TFF फेलोशिप के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम किया। Report for the World की एक प्रोफाइल भी बताती है कि द वायर की पत्रकार बंजोत कौर ने 2020 में Thakur Foundation Fellowship के तहत public health पर investigative reporting project किया था। TFF के अपने रिकॉर्ड में न्यूजलॉन्ड्री को कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए अनुदान का उल्लेख है। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को भी evidence-based medicine पर fact-checking के लिए आर्थिक सहायता दी गई थी।
सौरव दास का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है
सौरव दास का मामला इस पूरे नेटवर्क को समझने के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो TFF की अपनी वेबसाइट पर public-health reporting के फंड लेने वाले के रूप में दर्ज हैं। दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े कुछ प्रकाशित काम public health के बजाए सरकार की नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों से संबंधित हैं। कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों ने इसी अंतर पर सवाल उठाए हैं। यहां किसी के विचारों पर रोक लगाने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिस काम के लिए आर्थिक सहायता मिली, उसका घोषित उद्देश्य और प्रकाशित काम आपस में मेल क्यों नहीं खा रहा है।
विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर बहस अक्सर राजनीतिक हो जाती है। सरकार जब विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी NGO पर सवाल उठाती है तो उसे कई बार नागरिक स्वतंत्रता पर हमला कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता की मांग कोई दमन नहीं है। NGO और मीडिया संस्थानों को यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनके किस काम को, कौन पैसा दे रहा है। यही पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए। हर grant की राशि, उद्देश्य, deliverables, final output और funding disclosure सार्वजनिक होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों के सामने यह बताना चाहिए कि किसी रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में बाहरी फंडिंग लगी है या नहीं।
TFF के बॉस की एक्टिविस्ट सेना में शामिल हुआ सौरभ
कोविड कई लोगों के लिए एक दुखद याद थी, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जैकपॉट साबित हुई। जब भारत अपनी सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहा था, तब अमेरिका में बैठा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन का फाउंडर दिनेश ठाकुर चुपचाप भारत में अपनी सेना तैयार कर रहा था। यह उसके हितों के काम करने वाले एक्टिविस्ट्स की एक सेना थी। यही समय दिल्ली के RTI एक्टिविस्ट सौरव दास के मुताबिक उसके लिए सबसे खुशी लेकर आया। क्योंकि उसको आखिरकार उस सेना में जगह मिल गई, जिसमें शामिल होने की वे लंबे समय से कोशिश कर रहा था।
फाइजर बनाम रैनबैक्सी की एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यह कहानी 2021 से शुरू नहीं होती, यह 2003 से शुरू होती है। तब फाइजर बनाम रैनबैक्सी का वार चरम पर था। अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर और भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के बीच एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई चल रही थी। फाइजर अपनी सबसे अधिक बिकने वाली दवा ‘लिपिटर’ का पेटेंट गंवा चुकी थी और रैनबैक्सी लॉन्च करने के लिए तैयार थी।
ठाकुर रैनबैक्सी कंपनी छोड़कर उसके ही खिलाफ हुए 
दरअसल, अपनी जेनेरिक दवा, जो लिपिटर से कहीं सस्ती थी। लिपिटर फाइजर की सबसे अधिक बिकने वाली दवा थी, जिसकी बिक्री अरबों डॉलर में थी और जिसे फाइजर गंवाने की कगार पर थी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तीन भारतीय दिनेश ठाकुर, स्वामीनाथन और दिनेश कस्तूरी इस सारे खेल में शामिल हुऐ। तब दिनेश ठाकुर अमेरिका की फार्मा कंपनी ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) में काम कर रहा था। उसने BMS छोड़ दी और रैनबैक्सी USA से जुड़े। वहां 2 साल (2003-05) तक काम किया। फिर रैनबैक्सी छोड़ने के बाद उसने डेटा में हेरफेर (data manipulation) को लेकर US FDA में रैनबैक्सी के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई। चूंकि वह कंपनी का अंदरूनी व्यक्ति था, इसलिए उनके पास सारी गोपनीय जानकारी थी। रैनबैक्सी केस हार गई और उस पर $500 मिलियन का जुर्माना लगा।
US फार्मा माफिया के इशारे पर भारतीय कंपनियों पर निशाना
व्हिसलब्लोअर इनाम के तौर पर दिनेश ठाकुर को US सरकार से $48 मिलियन मिले। इस केस ने रैनबैक्सी को बर्बाद कर दिया और आखिरकार 2015 में इसे सन फार्मा को बेच दिया गया। यह केस फाइजर (Pfizer) के लिए जैकपॉट साबित हुआ और उसका कॉम्पिटिशन खत्म हो गया। कई कामों में हाथ आजमाने के बाद, दिनेश ठाकुर ने खराब फार्मा कंपनियों को टारगेट करने के मकसद से फार्मा एक्टिविज्म शुरू किया, लेकिन क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है कि उनके टारगेट हमेशा भारतीय फार्मा कंपनियां होती हैं और फायदा US फार्मा कंपनियों को होता है? या फिर वह US फार्मा माफिया के इशारे पर काम करता है?
यूएस सरकार से मिले पैसे से दिनेश ने 2018 में बनाया TFF
यूएस सरकार से मिले $48 मिलियन के साथ, दिनेश ठाकुर ने 2018 में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (TFF) नाम का NGO शुरू किया। इसे टैक्स छूट का दर्जा मिला और उसने अप्रैल 2019 से ग्रांट देना शुरू किया। यानि कोविड से कुछ महीने पहले। अब ‘ठाकुर की आर्मी’ बनाने का समय आ गया था। बिकने के लिए तैयार भारतीय इसकी आर्मी में शामिल होने लगे। 2019 से 2026 के बीच, उसने कई भारतीय पत्रकारों, इन्फ्लुएंसर्स, वकीलों और एक्टिविस्ट को फंड दिया। इन्हीं में सीजेपी का प्रवक्ता सौरभ भी शामिल था। वह उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्हें TFF से फंडिंग मिली। सुचेता दलाल ने ‘मनीलाइफ फाउंडेशन’ (MLF) की सह-स्थापना की, जिसे TFF से $100K मिले और उसी समय उन्होंने सन फार्मा को टारगेट करना शुरू कर दिया। सन फार्मा का स्टॉक 40% गिर गया। यह TFF के कहने पर किया था?
मोदी सरकार ने शोषण से बचाकर आत्मनिर्भरता पर दिया जोर
कोविड का समय अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पैसे कमाने का मौका था, लेकिन भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों को भारतीयों का शोषण नहीं करने दिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। और इसी के साथ ठाकुर की सेना ने भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन और दिनेश ठाकुर दोस्त हैं। सिर्फ वायर को ही TFF से फंडिंग नहीं मिली, बल्कि उसके चार पत्रकारों प्रियंका पुल्ला, श्रेया दासगुप्ता, बनजोत कौर और अदिति प्रधान को भी TFF से फंडिंग मिली। लेकिन यह पैसा मुफ्त नहीं था। उनका काम भारत को निशाना बनाना था। यह काम प्रियंका पुल्ला ने बेहतर किया। दिनेश ठाकुर उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ब्लूमबर्ग में प्रमोट किया। 2022 उसने अफ्रीका में भारतीय फार्मा कंपनियों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत बायोटेक ने ‘द वायर’ पर किया 100 करोड़ रुपये केस
असल में, ‘द वायर’ ने इतनी गंदगी फैलाई कि भारत बायोटेक ने उस पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया और उन्हें 14 खबरें हटानी पड़ीं। इनमें से लगभग सभी खबरें भारतीय वैक्सीन की कवरेज से जुड़ी थीं, जिनमें ठाकुर की फंडिंग वाली और पुल्ला की लिखी खबरें भी शामिल थीं। 2013 में “भारतीय जेनेरिक दवाओं के खिलाफ ठाकुर के एजेंडे वाली कहानियों” का पर्दाफ़ाश हुआ था, लेकिन 2021 तक आते-आते लेफ्ट लिबरल गैंग के दो पत्रकारों को TFF से फंडिंग मिली; और ठाकुर भारतीय फार्मा के मसीहा बन गए! स्क्रॉल मीडिया ने दिनेश ठाकुर के लिए भारत को निशाना बनाते हुए बहुत सारे लेख लिखे।
कोविड में फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था गिद्ध सौरभ
जब हर कोई पैसे कमा रहा था, तो सौरव दास को भी पैसे कमाने का हक है, लेकिन उस समय तक वे कोई बड़ा नाम नहीं थे। 2021 में फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन के लिए मंज़ूरी पाने की कोशिश कर रही थी, जबकि भारत सरकार ने भारतीय वैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट को मंजूरी दे दी थी। इसलिए सौरव दास ने RTI दाखिल की। सौरभ दास ने आरटीआई दाखिल कर सरकार से पूछा कि उन्होंने भारत बायोटेक एंड सीरम इंस्टीट्यूट को किस आधार पर मंजूरी दी? सरकार ने आंकड़े देने से इनकार कर दिया। सौरभ ने यह सब दिनेश ठाकुर के इशारे पर सीरम इंस्टीट्यूट को प्रभावित करने के लिए किया था। सौरभ को उसी इकोसिस्टम के अन्य लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। इसलिए सरकार से मनाही मिलने के बावजूद, वह आरटीआई दाखिल करता रहता है। जब पूरा देश कोविड से लड़ रहा था, तब ये गिद्ध फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था।

‘अभिजीत दिपके-सौरव दास पर POCSO लगाकर हो जीरो FIR’ : बंगाल की महिला वकील ने क्राइम ब्रांच में शिकायत देकर की माँग; नाबालिग बच्चियों को आंदोलन में क्यों शामिल होने दिया?

                            दिपके- दास पर जीरो एफआईआर दर्ज करने की माँग (फोटो साभार-X@abp)
NEET पेपर लीक को लेकर जंतर मंतर पर हुए सीजेपी के विरोध- प्रदर्शन में बच्चों के शामिल होने पर विवाद शुरू हो गया है। वकील रिंकी चटर्जी ने सौरव दास, अभिजीत दिपके और CJP के विरोध प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ POCSO एक्ट की धाराओं के तहत जीरो FIR दर्ज करने की बंगाल के सिलीगुड़ी क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई है। उनका कहना है कि प्रदर्शन में 12 साल की बच्ची को शामिल क्यों किया गया था? अगर हिंसक हुए आंदोलन में बच्ची या बच्चियों की मौत हो गयी होती कौन जिम्मेदार होता? 

वैसे ऐसी ही FIR हर उस प्रदर्शन/पत्थरबाजों पर भी हो जहाँ छोटे बच्चों और महिलाओं को ढाल बनाकर आगे कर दिया जाता है ताकि उनकी मौत होने पर सियासती रोटियां और लाशों पर बैठ मालपुए खाए जा सके।

  

एडवोकेट रिंकी चटर्जी सिंह के मुताबिक, “विरोध प्रदर्शन में बच्चों को शामिल करने के लिए आयोजकों के खिलाफ POCSO एक्ट की धारा 13, 14, और 15 और BNS की धारा 153 के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए।”

वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने कहा कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन हो रहा था। इस दौरान लाठीचार्ज हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया।

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक लाइव वीडियो पोस्ट किया, जिसमें कहा गया कि उन्होंने युवाओं को उनकी भद्दी गालियों के लिए माफ कर दिया है और उनके भविष्य को देखते हुए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।

वकील के मुताबिक, CJP के ऑर्गनाइजर अभिजीत दिपके और सौरव दास ने बाद में 12 साल की लड़कियों पर पुलिस के लाठीचार्ज और उनके साथ दुर्व्यवहार को लेकर पीएम मोदी से माफी की माँग की और इसको लेकर वीडियो पोस्ट किया।

इसको लेकर वकील रिंकी चटर्जी ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी छोटी बच्चियों को विरोध प्रदर्शन में कौन लेकर आया और जिस उम्र में सुरक्षा देने की जरूरत होती है, उस उम्र में उसे विरोध प्रदर्शन में शामिल कैसे किया गया। उन्होंने इसके लिए आयोजकों पर पोक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की माँग की।

उन्होंने सवाल किया कि विरोध प्रदर्शन को कौन फंड कर रहा है, और पैसा कहाँ से आ रहा है? यह बिल्कुल ‘डीप स्टेट’ का काम है। उनका कहना है कि इसमें कुछ दलाल और देशद्रोही शामिल हैं। हमारे अपने देश के लोग जो इसका भला नहीं चाहते। वे सभी मोदी सरकार को गिराने की कोशिश में एक साथ आ गए हैं।

दरअसल जंतर मंतर के प्रदर्शन के दौरान नाबालिग बच्चों के शामिल होने पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि पुलिस के लाठीचार्ज में इनमें से कई बच्चे घायल हुए हैं।

सेलेक्टिव क्यों हैं राहुल गांधी और CJP? झारखंड में सड़क पर उतरे युवाओं का सवाल


झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में गड़बड़ी, घोटालों और पेपर लीक को लेकर बवाल मचा हुआ है। छात्र और युवा सड़क पर उतर कर परीक्षा रद्द करने और सीबीआई से जांच कराने की मांग कर रहे हैं। लेकिन 29 जुलाई,2026 को लोकसभा में 53 मिनट तक परीक्षा और पेपर लीक पर भाषण देने वाले राहुल गांधी ने एक बार भी झारखंड के छात्रों और युवाओं की मांगों का जिक्र नहीं किया। वहां पर परीक्षाओं में हो रही धांधली का मुद्दा नहीं उठाया, क्योंकि झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम की सरकार है। वहीं 29 जुलाई को ही झारखंड के बीजेपी सांसदों ने संसद भवन परिसर में झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान सांसदों ने हेमंत सरकार और सरकार में शामिल कांग्रेस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। सांसदों ने पूछा राहुल गांधी मौन क्यों है? इतना सब होने के बावजूद राहुल गांधी की आंखें क्यों नहीं खुलीं?

खड़गे, सोनिया, राहुल का दोहरा चरित्र – आदित्य साहू
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सह राज्यसभा सांसद आदित्य साहू ने कहा कि कांग्रेस दोहरी राजनीति करती है। दिल्ली में मांग करती है कि जांच हो और झारखंड में पूरी तरह मौन है। 19 अभ्यर्थी उत्पाद सिपाही दौड़ में मारे गए हैं। कांग्रेस झारखंड में मांग करे कि उन मृत बच्चों के परिजनों को हेमंत सरकार एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा तत्काल भुगतान करे। भाजपा की मांग है कि दिल्ली से कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी झारखंड की धरती पर जाएं, वहां की जनता इनका चेहरा देखना चाहती है और इनसे पूछना चाहती है कि आप लोगों का यह दोहरा चरित्र क्यों?

झारखंड में परीक्षा में धांधली के विरोध में सड़क पर उतरे छात्र और युवा
बुधवार 29 जुलाई को रांची में हजारों छात्रों ने जेपीएससी 14वीं प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों में धांधली के विरोध में सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से अल्बर्ट एक्का चौक तक संविधान यात्रा निकाली। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं से युवाओं का भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने झारखंड सरकार और आयोग से भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने, परीक्षा प्रणाली में सुधार करने और अभ्यर्थियों के साथ न्याय सुनिश्चित करने की मांग की। छात्रों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। अब छात्र और युवा सवाल कर रहे हैं कि राहुल गांधी सेलेक्टिव क्यों है? जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं पर अपनी आखें खोलें, परीक्षा रद्द करें और सीबीआई से जांच कराएं।

सरकार ने छात्रों को प्रदर्शन में हिस्सा लेने से रोका, बस मालिकों को धमकी
झारखंड की कांग्रेस और जेएमएम सरकार युवाओं के इस प्रदर्शन को दबाना और कुचलना चाहती है।  छात्रों को प्रदर्शन स्थलों तक पहुंचने से रोकने और यातायात व बस सेवाओं को प्रभावित करने की खबरें सामने आईं। रांची, हजारीबाग और अन्य शहरों में परीक्षा में गड़बड़ी व पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रशासन द्वारा सुरक्षा का हवाला देकर छात्रों के जत्थों और वाहनों को रास्ते में ही रोका गया। प्रदर्शन स्थल की ओर जाने वाली कई बस सेवाओं और परिवहन के साधनों के मार्ग में फेरबदल किया गया या उन्हें बीच में ही रोक दिया गया। प्रशासन की ओर से बस सेवाएं बंद रखने या बदलने का दबाव, और धमकाने जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिलीं।

विरोध के बीच JPSC की मुख्य परीक्षा अगले आदेश तक स्थगित
बढ़ते विवाद और विरोध के बीच झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) ने संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2025 को आगामी आदेश तक के लिए स्थगित कर दिया है। कथित अनियमितताओं की जांच सीआईडी (CID) द्वारा की जा रही है, जिसके तहत पूर्व उप परीक्षा नियंत्रक और अन्य संबंधित लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। लेकिन सवाल है छात्रों के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर हंगामा करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी कहां हैं? क्या छात्रों की आवाज़ सिर्फ वहीं सुनाई देती है, जहां राजनीतिक एजेंडा साधना हो? क्या झारखंड के छात्रों के अधिकार, उनका भविष्य और उनका इन पार्टियों के लिए कोई मायने नहीं रखता? जब मुद्दा राजनीति का नहीं, छात्रों के भविष्य का हो, तब यह चुनिंदा संवेदनशीलता और सुविधानुसार चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है।

JPSC की कुल 10 पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच CBI के पास
झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की पहली और दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा सहित कुल 10 पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच पहले से ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के पास है। 6 भर्ती जांच के दायरे में और 9 भर्ती परीक्षा स्थगित हो गई हैं। हालिया विवादों और 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों की जांच राज्य स्तर पर क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) द्वारा की जा रही है, जिसमें अब तक 10 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।


चेहरे चमक गए, पर मुद्दे धुंधले पड़े: CJP की अंदरूनी लड़ाई ने आंदोलन की साख पर उठाए सवाल


NEET पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।

लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।

साभार : सोशल मीडिया 

CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।

अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।

दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है। 

दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”

असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।

जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।

इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।

वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।

उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।

जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।

किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।

ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।

सोनम वांगचुक का अनशन हेडलाइन, ग्रामीणों का सत्याग्रह फुटनोट क्यों?


सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी में उन बेरोजगार युवकों को ‘कॉकरोच’ बताया जो सोशल मीडिया को किसी पर भी अटैक करने का हथियार बनाते हैं। खलिहरों की एक जमात ने इसमें वायरल होने का मौका देखा। बीजेपी और नरेंद्र मोदी विरोधी एजेंडा को पुश करने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम की दुकान खोल ली। सोशल मीडिया में फॉलोअर, लाइक, शेयर, ट्रेंड का धंधा चकाचक चलने के बाद, जब इस दुकान की लॉन्चिंग जमीन पर हुई तो उसे जन समर्थन ही नहीं मिला।


फिर भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर उन्होंने एक टेंट गाड़ रखा है। सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) नाम के एक ‘आंदोलनजीवी’ को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बिठा रखा है। 17 दिन के अनशन के बाद भी जनसमर्थन नहीं मिलने के बाद, यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास हो रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार ही असंवेदनशील है, क्योंकि वांगचुक के समर्थन में सोशल मीडिया पर भारत के विपक्षी नेताओं की छाती में दूध उतर आया है। मीडिया भी इस तमाशे को हाइप देने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही।

अब दिल्ली के जंतर मंतर से सीधे मध्य प्रदेश चलते हैं। यहाँ केन-बेतवा लिंक परियोजना के कथित प्रभावितों का छतरपुर में प्रदर्शन चल रहा है। बारिश से नदी उफान पर है। फिर भी ग्रामीण अपनी माँगों के समर्थन में जल सत्याग्रह कर रहे हैं। कभी चिता पर लेटकर तो कभी सांकेतिक फाँसी के जरिए।

क्या इनके समर्थन में आपने किसी नेता, किसी अभिनेता को देखा-सुना है? क्या सोशल मीडिया पर इनके समर्थन में आपने ट्रेंड या रील की बाढ़ देखी है? क्या मेनस्ट्रीम मीडिया को इनके प्रदर्शन पर चर्चा करते आपने देखा है?

इन सभी सवालों का जवाब है- नहीं। क्या इस उपेक्षा की वजह यह है कि जंतर-मंतर देश की संसद से सटा हुआ है और मध्य प्रदेश का छतरपुर इसी संसद से सैकड़ों किलोमीटर दूर है? या फिर ये सोच कि जंतर-मंतर के तमाशे में नामचीन ​खलिहर शामिल हैं जो टीआरपी और वायरल कंटेंट देते हैं, जबकि छतरपुर के प्रदर्शन में इस देश के वे सामान्य लोग हैं जिन्हें शायद ही पता हो कि टीआरपी और वायरल कंटेंट आखिर किस चिड़िया का नाम है?

मैं यहाँ इस चर्चा में नहीं जाना चाहता कि ये दोनों प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। इन चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए हैं। इसमें भी नहीं जाना चाहता कि इनकी माँगें कितनी जायज है और जो ये माँग रहे हैं क्या वही पूरी समस्या का समाधान है। इस पर गूगल करेंगे तो आपको सारी जानकारी मिल जाएगी।

पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर आंदोलन/प्रदर्शन/सत्याग्रह/अनशन का एक ही लक्ष्य होता है- सत्ता को झुकाकर समझौते के लिए बाध्य करना। अतीत के आंदोलनों के अनुभव बताते हैं कि सरकार उन प्रदर्शनों के सामने कभी नहीं झुकती, जिसके साथ व्यापक समाज का समर्थन नहीं हो। वह उनके साथ भी समझौता नहीं करती, जिस प्रदर्शन का उद्देश्य किसी परिणाम तक पहुँचने की जगह एक समझौते के बाद दूसरे समझौते के लिए दबाव बनाना हो। साथ ही सीजेपी की शुरुआत से ही यह स्पष्ट है कि आज जिस समझौते के लिए वांगचुक को अनशन पर बिठाया गया है, उसके पीछे कुछ ‘आंदोलनजीवी’ हैं। आज के समय में ऐसा हर गिरोह बेनकाब हो चुका है। किसी के पास भी नैतिक मूल्य नहीं बचा है।

साफ है कि सोनम वांगचुक के अनशन से केवल शशि थरूर, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे ​​ही ‘भावुक’ हो पा रहे हैं और सत्ता नहीं झुक रही तो इसका मतलब उसका असंवेदनशील होना नहीं है। तानाशाह होना नहीं है। मक्कार होना नहीं है।

यदि सरकार असंवेदनशील होती तो मध्य प्रदेश की इसी बीजेपी सरकार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावितों के लिए 202.5 करोड़ रुपए के अतिरिक्त पुनर्वास पैकेज को मँजूरी नहीं दी होती। स्थानीय विधायक ने कहा है कि इस पैकेज के तहत प्रभावित परिवारों को 12.5 लाख रुपए का पुनर्वास अनुदान एक ही बार में दिया जाएगा।

ऐसे में सवाल सरकार से नहीं, CJP से है। यदि वांगचुक की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि वे मृत्यु के कगार तक पहुँच चुके हैं, फिर भी उनके समर्थन में समाज का वह व्यापक समर्थन क्यों नहीं आ रहा है? जाहिर है वांगचुक और उनके साथियों के लिए संदेश है कि ‘हठ छोड़ो, आत्ममंथन करो’। लेकिन जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट और मंच को ‘डांस इंडिया डांस’ का स्टेज समझने वाले कॉकरोचों से इसकी उम्मीद बेमानी है।

क्या अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल अपराध है?

सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह सोनम वांगचुक या किसी को भी अपनी माँगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से रोके। अनशन कोई अपराध नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी ऐसी स्थिति में तभी बनती है, जब उसे लगे कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन सार्वजनिक व्यवस्था, उसके खुद के जीवन की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था पर प्रभाव डाल सकता है।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत व्यवस्था, सुरक्षा, नैतिकता आदि के आधार पर सरकार उचित प्रतिबंध अवश्य लगा सकती है।

भूख हड़ताल से कब रोक सकती है पुलिस?

इस मामले में पुलिस की जिम्मेदारी तभी बनती है, जब उसे लगे कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। हिंसा होने की आशंका है। ट्रैफिक बाधित हो रहा है। सरकारी कामकाज प्रभावित हो रहा है। या फिर अनशनकारी की स्वयं की जान को खतरा है।

ऐसी स्थिति में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अनुसार मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकते हैं। धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। राज्यों के पुलिस अधिनियम भी प्रदर्शन की जगह बदलने या अनुमति रद्द करने जैसे अधिकार देते हैं।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबरन अस्पताल ले जा सकते हैं?

यदि डॉक्टर को लगे कि अनशन करने वाले की जान खतरे में है तो उसे जबरन भी अस्पताल ले जाया जा सकता है। अस्पताल में भर्ती कर निगरानी की जा सकती है। कई मामलों में अदालतें कह चुकी हैं कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबर्दस्ती भोजन दे सकते हैं?

अनशन करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने के प्रावधान को स्पष्ट तौर पर परिभाषित करता कोई कानून नहीं है। पर व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि मेडिकल राय, मजिस्ट्रेट के आदेश या अदालती निर्देशों पर यह भी किया जा सकता है।

क्या भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं?

ऐसे मामलों पर गिरफ्तारी पूरी तरह परिस्थिति पर निर्भर करती है। जैसे- अवैध जमावड़ा, प्रशासनिक ड्यूटी में बाधा, सार्वजनिक रास्ता रोकना, आदेशों की अवहेलना वगैरह।

आमरण अनशन की स्थिति में सरकार आमतौर पर क्या करती है?

ऐसी स्थिति में प्रशासन बातचीत से रास्ता निकालने का प्रयास करता है। मेडिकल टीम अनशन करने वाले की नियमित जाँच करती है। गंभीर स्थिति होने पर अस्पताल ले जाती है।

मणिपुर में इरोम शर्मिला को लंबे समय तक हिरासत में रखकर नाक के माध्यम से पोषण दिया जाता था। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए शासनकाल में इसी दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन शुरू करने के बाद हिरासत में ले लिया गया था। लेकिन बाद में रिहा कर निर्धारित स्थान पर अनशन की अनुमति दे दी गई थी। ठीक उसी काल खंड में स्वामी रामदेव के आंदोलन पर पुलिस ने कानून-व्यवस्था को आधार बनाकर बल प्रयोग किया था।