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‘आधी रात को निकाले हजारों प्रवासी’: बांग्लादेशी घुसपैठियों पर भारत की सख्त पुश-बैक नीति के खिलाफ Financial Times का विलाप

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार-chatgpt)

भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद मानने वालों की कमी नहीं। विपक्ष तो यह काम कर ही रहा है, लेकिन कुछ मीडिया वाले भी पीछे नहीं। जो समाचार-पत्र घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए विलाप करता हो उसके राष्ट्रहित समाचार प्रकाशित करने पर भी शंका होती है। क्या घुसपैठियों पर विलाप करने के लिए उनके दामादों के आकाओं ने किसी रूप में इनाम दिया है? क्या दामाद घुसपैठियों का विलाप करने वाले समाचारपत्र को नहीं मालूम कि ये दामाद किस तरह भारत की अर्थव्यवस्था में दीमक का काम कर रहे हैं?      

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।

नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।

दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक ​​कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।

घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट

1 जुलाई 2026 को Financial Times ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 

लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।

कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”

इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।

लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”

आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।

इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”

बेशक Financial Times ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।

धार्मिक रंग देने की कोशिश

लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।
असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।

आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।

संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।

Financial Times ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।

अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।

बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।

न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले

शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।

गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”

असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।

दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन

अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।

स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।

लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।

दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।

एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।

Financial Times के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।

कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।

यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।

भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

महबूबा मुफ्ती से आरफा तक चाहती हैं कि हम न जानें इस्लामी लुटेरों-आक्रांताओं का सच, क्योंकि नफरत फैलेगी: अजीत डोभाल से यूँ ही नहीं चिढ़ा लेफ्ट-लिबरल गैंग

                                          अजीत डोभाल के बयान के बाद पीछे पड़े लिबरल और कट्टरपंथी
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने 10 जनवरी 2026 को ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं से प्रेरित करने के लिए शब्द कहे, उससे इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों का धड़ा आहत होकर बैठा है।

नतीजतन NSA को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक, नफरत फैलाने वाला, देश को बाँटने वाला व इनसिक्योर बताकर सेकुलर भारत के लिए खतरा बताया जा रहा है। उन्हें घेरने वालों में इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम, अलगाववादियों का समर्थन करने वाली जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती जैसों के नाम हैं।

नीचे देख सकते हैं महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट किया, “यह बहुत दुखद है कि डोभाल जैसे उच्च पद के अधिकारी, जिनका काम देश को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाना है, उन्होंने नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक विचारधारा को अपनाया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की। 21वीं सदी में सदियों पुराने घटनाओं के लिए Revenge लेने की बात करना केवल एक इशारा है, जो गरीब और अशिक्षित युवाओं को एक पहले से ही परेशान और लक्ष्य बन रही अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला करने के लिए उकसाता है।”

इसी तरह, आरफा खानम शेरवानी ने डोभाल को ऐसा इनसिक्योर अधिकारी बताया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

इनके अलावा कंचना यादव जैसे लोग भी अजीत डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़कर अपना एंगल देने में लगे हैं। वो अपने फॉलोवर्स को ये बता रहे हैं कि डोभाल अपने बच्चों को तो विदेशों में पढ़ा रहे हैं और आपके बच्चों को भड़का रहे हैं। कंचना का ट्वीट देखिए-

ऐसे ही लिबरल धड़े का जाना-माना नाम स्वाति चतुर्वेदी- लिखती हैं- आपके बच्चे मंदिर तोड़ने वालों से बदला लेंगे और डोभाल के बच्चे बाहर विदेश में बिजनेस करके लक्जरी जीवन जीएँगे।

ऊपर दिए सारे ट्वीट को देख ऐसा लग रहा है मानो डोभाल ने देश के युवाओं से बदला लेने की बात कही है, उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ युवाओं को भड़काया है। जबकि हकीकत इससे पूरी अलग है। अजीत डोभाल ने कार्यक्रम में युवाओं से जो कहा, उसका कहीं से कहीं तक अर्थ हिंसा से जुड़ा नहीं था।

क्या कहा था अजीत डोभाल ने?

कार्यक्रम में अजीत डोभाल ने देश के युवाओं को देश के इतिहास के प्रति जागरूक किया था। उन्होंने युवाओं से ये कहा था स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके लिए पीढ़ियों ने अपार बलिदान दिए। इतिहास की सच्चाइयों को समझ कर युवाओं को देश के पुनर्निर्माण में जुटना चाहिए।

उनके जिस शब्द पर वामपंथी और कट्टरपंथी ने बवाल मचाया हुआ है उसे भी उन्होंने किस संदर्भ में कहा था इसे उनके पूरे बयान से समझिए। डोभाल ने कहा था-

भारत के अतीत को सिर्फ दुख के साथ याद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई लोगों को फाँसी दी गई, गाँव जला दिए गए, हमारी सभ्यता को नुकसान पहुँचाया गया। मंदिर लूटे गए और लोग बेबस होकर यह सब होते देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है कि हर युवा के भीतर आग होनी चाहिए। ‘बदला’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला एक शक्तिशाली ताकत है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा और भारत को उसके अधिकारों, विचारों और विश्वासों के आधार पर फिर महान बनाना होगा।

डोभाल के बयान से साफ है कि वो कहीं भी ‘बदले’ शब्द को हिंसा से जोड़कर नहीं बोल रहे थे बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण की बात कर रहे हैं। उन्होंने इतिहास से सीख लेकर राष्ट्र को पुनर्निर्मित करने की बात कही, न कि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की। उनका मकसद अपने श्रोता युवाओं में देशभक्ति जगाने का था, द्वेष फैलाने का नहीं।

हालाँकि, उनके बयान को वामपंथी और कट्टरपंथी अपने एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। उन्हें शायद डर है कि कहीं सच में लोग उस इतिहास को लेकर सजग न हो जाएँ जहाँ देश को तोड़ने वालों और संपत्तियों को लूटने वालों का जिक्र है। इनकी दिक्कतें इसलिए हैं क्योंकि जिन्होंने भारत को समय-समय पर नष्ट करने का प्रयास किया वो ही इनके पसंदीदा ‘नायक’ हैं।

इस्लामी आक्रांताओं को क्यों कर रहे हो बदनाम- लिबरल और कट्टरपंथियों का तर्क

दिलचस्प बात ये है कि डोभाल के बयान को विकृत ढंग से पेश करने के चक्कर में ये लोग खुद ही इसको स्वीकार कर बैठे कि देश के मंदिर को लूटने वाली घटनाएँ बिलकुल सच हैं। महबूबा मुफ्ती के ट्वीट से स्पष्ट है कि वह मान रही हैं कि 21वीं सदी से पहले ये घटनाएँ हुईं थीं। लेकिन फिर भी वो इससे मुँह इसलिए मोड़ रही हैं क्योंकि वो नहीं चाहती इतिहास को बार-बार उकेरा जाए जिससे पता चले सच क्या था।

वहीं आरफा खानम हैं, जिनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा ये बताने-समझाने पर रहता है कि मुगलों ने देश के लिए क्या किया… उनके लिए अगर कोई ये बता दे कि उन्होंने देश में और देश के लोगों के साथ क्या किया तो उन्हें इससे आपत्ति होने लगती है।

कंचना यादव और स्वाति चतुर्वेदी का भी यही पैटर्न है। वह अच्छे से जान-समझ रही हैं कि डोभाल ने क्या बोला है, लेकिन उनकी बात चूँकि वामपंथी एजेंडे पर सही नहीं बैठ रही इसलिए उन्होंने उस बयान के खुद ही मायने गढ़ लिए।

असली गलती किसकी?

ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग लोगों को समझने की जरूरत है कि इतिहास को इनके हिसाब से पेश करने का एक दौर बीत चुका है। अब वो समय नहीं है कि इस्लामी आक्रांताओं के कुकृत्यों को महिमामंडन करने का काम हो। इतिहास का अर्थ वही होता है जो बीता समय का सच हो। अगर उसे बताने से एक समुदाय पर सवाल उठ रहे हैं, तो समस्या उस रिलिजन या मजहब में है न कि इतिहास में।

आज अगर देश को लूटे जाने के इतिहास को गहराई से पढ़ने पर ‘लुटेरे’ इस्लामी आक्रांता ही निकलकर आ रहे हैं तो इसमें इतिहास बताने वाले की क्या गलती है? गलती उसकी है जिसने ये किया, गलती उसकी है जिसने हमेशा ये समझा कि दुनिया वही इतिहास पढ़ेगा जो वो वर्ग पढ़ाना चाहेगा। गलती उस वर्ग की है जिसे लगा कि उन्होंने कह दिया तो अकबर हमेशा ‘महान’ बना रहेगा और औरंगजेब को लोग हमेशा ‘मंदिर का निर्माण’ कराने वाले के तौर पर जानेंगे।

मुस्लिम पीड़ित का नैरेटिव VS सच्चाई: ओलंपियन शाहिद के घर पर कार्रवाई ‘मुआवजा’ और ‘सहमति’ से हुई, फिर भी लिबरल-वामपंथी और सपा-कांग्रेसी गैंग ने फैलाया प्रोपेगेंडा

ओलंपिक विजेता हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद के घर बुलडोजर से ढहाने पर लिबरल-वामपंथी-विपक्ष और इस्लामी कट्टरपंथी ने खूब रोना रोया
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ओलंपिक पदक विजेता और पद्मश्री से सम्मानित हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद के पुश्तैनी मकान पर बुलडोजर चलाया गया। प्रशासन ने कहा कि पुलिस लाइन से कचहरी तक सड़क चौड़ीकरण किया जा रहा है और इसी कड़ी में 13 मकानों को गिराने की कार्रवाई हुई।

इन्हीं मकानों की सूची में मोहम्मद शाहिद का घर भी शामिल था। अब मोहम्मद शाहिद के घर ढहाने को लेकर लिबरल-वामपंथी गैंग ने जबरन विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्षी दलों और लिबरल-वामपंथी गैंग ने बुलडोजर की इस कार्रवाई को बीजेपी सरकार के खिलाफ मुद्दा बना लिया और इसे ‘मुस्लिम पीड़ित’ के नैरेटिव से जोड़कर खूब प्रचारित किया।

मोहम्मद शाहिद के घर पर बुलडोजर चलाने का विरोध

विपक्ष ने बीजेपी को ‘जुल्मी सरकार’ बताते हुए ‘नाइंसाफी’ करने के इल्जाम लगाए, जो उनकी नजर में ‘अमानवीय’ तरीके से बुलडोजर कार्रवाई कर रही है। इस्लामी कट्टरपंथियों यहाँ ‘मुस्लिम पीड़ित’ का राग अलापने लग गए। दलितों के हितैषी बनने वाले चंद्रशेखर आजाद ने बीजेपी पर खिलाड़ियों का अपमान करने का आरोप लगाते हुए परिवार को मुआवजा देने की माँग की।

समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, “जुल्म करनेवाले न भूलें नाइंसाफी की भी एक उम्र होती है।” उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा, “पूरा घर जमींदोज कर दिया। ये सिर्फ एक घर नहीं था बल्कि देश की खेल विरासत की पहचान थी। काशी की धरती पर प्रतिभाओं और सम्मानित विभूतियों का अपमान करने वाली भाजपा सरकार को जनता माफ नहीं करेगी।”

कांग्रेस नेता मोहम्मद वसीम ने ‘देश में मुसलमानों की हालत’ पर सवाल उठाए। इस्लामी कट्टरपंथी भी विरोध की इस दौड़ में पीछे नहीं रहे और योगी सरकार से मोहम्मद शाहिद के घर ढहाने के पीछे कारण पूछा। एक X यूजर मंजर हुसैन ने लिखा, “एक राष्ट्रीय नायक का घर अब मलबे में पड़ा है। सीएम योगी, कोई जवाब है?”

लिबरल-वामपंथी और कट्टरपंथी संगठनों का शोर

मामले को हवा देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और लिबरल पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर भी मोर्चा खोला। X पर मोहम्मद शाहिद के घर बुलडोजर चलाने के कई वीडियो पोस्ट किए गए। इनमें एक वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति पुलिस अधिकारी के हाथ जोड़कर रहा है। इस वीडियो को लिबरल गैंग और इस्लामी मीडिया ने गलत संदर्भों के साथ जमकर वायरल किया।

राणा अय्यूब ने अपने X अकाउंट पर ये वीडियो पोस्ट कर लिखा, “उत्तर प्रदेश में, हॉकी के दिग्गज मोहम्मद शाहिद का घर उन 13 घरों में से एक था जिन्हें बुलडोजर से गिरा दिया गया। क्या आपको उन लोगों की चुप्पी सुनाई दे रही है जिन्हें बोलना चाहिए?”

कांग्रेस इकोसिस्टम भी मोहम्मद शाहिद के घर पर बुलडोजर चलाए जाने का विरोध करता नजर आया है। खुद को ‘गाँधीवादी’ बताने वाले सैयद फैसल इकबाल कहते हैं, “अगर यह इस्लामोफोबिया नहीं है, तो और क्या है? जब एक राष्ट्रीय नायक के परिवार को भी नहीं बख्शा जाता और जिन्हें बोलना चाहिए वे चुप रहते हैं – तो उनकी चुप्पी मिलीभगत है।”

यहाँ तक की अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद, लुटियन्स मीडिया ने भी इस वीडियो को पोस्ट कर बीजेपी सरकार पर आरोप लगाते हुए ‘मुस्लिम-विरोधी होने की छवि पेश की’ और सोशल मीडियो पर लोगों की सहानूभूति बँटोरी।

इसी तरह वाराणसी की एक प्रशासनिक कार्रवाई विपक्ष और लिबरल-वामपंथी के लिए बीजेपी सरकार को घेरने का नया मुद्दा बन गई। वो भी बिना किसी असलियत के ज्ञान के, यही लोग जो सरकार पर विकास को लेकर सवाल उठाते हैं और धर्म की राजनीति का आरोप लगाते हैं। यहाँ साफ नजर आता है कि धर्म की राजनीति कहाँ से आती है और कैसे मुस्लिम-विरोधी प्रोपेगेंडा को हवा दी जाती है।

लिबरल-वामपंथी गैंग को आखिर चिंता किस बात की है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरे विवाद में जितने लिबरल, वामपंथी, इस्लामी कट्टरपंथी और कांग्रेसी हंगामा मचा रहे हैं, उन्हें असल में चिंता किस बात की है? क्योंकि मोहम्मद शाहिद की बीवी परवीन को इस कार्रवाई पर कोई आपत्ति नहीं है। मीडिया से बात करते हुए परवीन ने साफ कहा कि प्रशासन से उन्हें मुआवजा मिल चुका है और वे इस कार्रवाई से सहमत हैं। परवीन ने यह भी कहा, “सिर्फ हमारा घर नहीं बल्कि इलाके में दूसरे मकान भी तोड़े गए हैं।”

इतना ही नहीं घर के कुल 9 हिस्सेदारों में से 6 लोगों को बाकायदा मुआवजा दिया जा चुका है। यानि परिवार के भीतर से विरोध की कोई आवाज नहीं उठी लेकिन बाहर बैठे कथित सेक्युलर जमात और ‘खेल विरासत’ का रोना रोने वाले नेताओं को यह मौका मिल गया कि वे सरकार पर इल्जाम लगाने लगें। सवाल ये है कि जब परिवार खुद संतुष्ट है तो यह लिबरल-वामपंथी जमात क्यों मातम मना रही है?

मुस्लिम व्यक्ति का घर तोड़ा गया?

यहाँ एक और बड़ा झूठ फैलाया गया कि केवल मोहम्मद शाहिद का घर तोड़ा गया क्योंकि वो एक मुस्लिम हैं और सरकार मुस्लिम-विरोधी है। जबकि असलियत यह है कि पुलिस लाइन से कचहरी तक सड़क परियोजना के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए 13 मकानों को ध्वस्त किया गया। इन्हीं में मोहम्मद शाहिद का घर भी शामिल था। यानि प्रशासन ने किसी मुस्लिम को टारगेट नहीं किया बल्कि योजना के मुताबिक सभी 13 मकान तोड़े, न कि धर्म के आधार पर।

और हाँ, योगी सरकार का बुलडोजर हमेशा कानून के दायरे में ही चलता है। इस मामले में भी परिवार को पहले ही नोटिस दिया गया था। उस नोटिस में साफ-साफ लिखा था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए जिन हिस्सों की जरूरत है, उन पर मालिकों की सहमति ली जा चुकी है। अब जब परिवार सहमत था और मुआवजा भी मिल चुका था तो फिर ‘जुल्म’ और ‘नाइंसाफी’ का झूठा नैरेटिव खड़ा करने का क्या औचित्य है?

पूरा घर जमींदोज नहीं, केवल एक हिस्सा गिराया

जहाँ तक पूरा घर जमींदोज करने की बात है और वायरल वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति के गिड़गिड़ाने की बात है। तो PWD ने साफ कहा है कि चार मंजिला घर का केवल एक हिस्सा गिराया गया है और उनको मुआवजा दिया जा चुका है।

सरकार ने मुआवजा पहले ही दे दिया है। मोहम्मद शाहिद के घर में 9 हिस्सेदार बताए गए। इनमें से 6 को मुआवजा दे दिया गया जबकि बाकी 3 अलग-अलग वजहों से पैसा लेने से इनकार कर दिया। प्रशासन ने अपनी कार्रवाई के दौरान केवल उसी हिस्से को ढहाया जिसे मुआवजा मिल गया था। जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया, उनके हिस्से को नहीं छेड़ा गया है।

यानी विपक्ष और लिबरल मीडिया का यह आरोप भी पूरी तरह झूठा है कि ‘पूरा घर जमींदोज’ कर दिया गया। सच यही है कि प्रशासन ने सिर्फ उतना ही हिस्सा गिराया, जिसका भुगतान पहले से कर दिया गया था।

यह प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही है जैसी किसी भी विकास परियोजना में होती है। लेकिन चूँकि यहाँ मामला एक मुस्लिम खिलाड़ी का था तो कांग्रेस, वामपंथी, लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी गैंग ने इसे मुस्लिम पीड़ित बनाम बीजेपी सरकार का एजेंडा खड़ा करने का मौका समझा और इसे भुनाने की कोशिश में जुट गए।

भारत को घुड़की देने वाले जस्टिन ट्रूडो की कुर्सी पर संकट, कनाडा के सांसदों का अल्टीमेटम- 4 दिन के भीतर PM पद से इस्तीफा दो; क्या विपक्ष भारत विरोधियों की कठपुतली बनने की बजाए देशहित में खड़े होंगे?

भारत में विपक्ष भारत विरोधी विदेशी ताकतों के दम पर देश को बांग्लादेश बनाने का सपना देख रहे हैं, उन्हें कनाडा से सीखना चाहिए कि बिना किसी सबूत के खालिस्तानियों के दबाव में भारत को धमकी देना बहुत भारी पड़ रहा है। एक तरफ हमारा विपक्ष है जो टूलकिट के हाथ कठपुतली बने हुई है। यहाँ गलती जनता की भी है जो सच्चाई को नज़रअंदाज कर इन उपद्रवियों की चालों में फंस रहे हैं। जनता को आंखे खोलनी होंगी। कांग्रेस द्वारा पंजाब में न बन सकने वाली सरकार बनाने के लिए संत भिंडरावाला से सौदा किया और सरकार बनने पर जब मांगे पूरी करने को बोला तो एक संत को आतंकवादी बना दिया। और आज वही खालिस्तान देश के लिए खतरा बन रहा है।   
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। उनकी कुर्सी पर भी अब संकट गहरा गया है। विपक्षियों के हमले के बीच उनकी खुद की ही पार्टी के सांसदों ने उन्हें इस्तीफा देने का अल्टीमेटम थमा दिया है। इस्तीफा ना देने पर उनके खुलाफ विद्रोह की चेतावनी भी दी गई है।

कनाडाई मीडिया के अनुसार, जस्टिन ट्रूडो का विरोध करने वाले लिबरल पार्टी के सांसदों ने उन्हें 28 अक्टूबर, 2024 तक पद छोड़ देने को कहा है। पद ना छोड़ने पर इन सांसदों ने खुली बगावत की चुनौती दी है। ट्रूडो के खिलाफ इस मुहिम में कम से कम 30 सांसद शामिल हैं।

ट्रूडो को हटाने को लेकर एक पत्र भी यह सांसद अपने साथियों को थमा रहे हैं। इस पत्र पर कई सांसदों के हस्ताक्षर भी करवाए गए हैं। बुधवार (23 अक्टूबर, 2024) को कनाडाई संसद के भीतर हुई एक बैठक में विरोध करने वाले सांसदों ने जस्टिन ट्रूडो को इस्तीफा देने को कह दिया। उनके सामने विरोध वाला पत्र भी पढ़ा गया।

लिबरल पार्टी के सांसद सीन केसी ने कहा कि यह कनाडा के हित में होगा कि जस्टिन ट्रूडो अपना इस्तीफा सौंप दें। उन्होंने कहा कि इसी से लिबरल पार्टी की सरकार बच सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता होता तो कंजर्वेटिव पार्टी आसानी से जीत दर्ज कर लेगी।

लिबरल पार्टी के सांसदों ने कहा है कि ट्रूडो के इस्तीफे के बाद नए नेता की तलाश की जाएगी, इससे पार्टी के खिलाफ देश में बने माहौल को ठंडा करने में मदद मिलेगी। एक सांसद केन मैकडोनाल्ड ने कहा है कि ट्रूडो को अब लोगों की बात सुननी ही पड़ेगी।

कनाडा की संसद में लिबरल पार्टी के लगभग 150 सांसद हैं और इनमें से लगभग 30 खुले तौर पर ट्रूडो के विरोध में उतर आए हैं। यदि यह संख्या बढ़ती है तो ट्रूडो को कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है। ट्रूडो की सरकार पहले बैसाखियों के सहारे चल रही है।

वहीं दूसरी तरफ ट्रूडो के कई कैबिनेट मंत्रियों ने भी दोबारा चुनाव ना लड़ने का मन बना लिया है। उनके चुनाव ना लड़ने के पीछे ट्रूडो के चलते लिबरल पार्टी की अलोकप्रियता कारण बताई जा रही है। कनाडा के सर्वे भी ट्रूडो और उनकी पार्टी की बुरी हालत बयाँ कर रहे हैं।

कनाडा के सरकारी चैनल CBC के सर्वे में लगातार एक वर्ष से कंजर्वेटिव नेतृत्व, लिबरल पार्टी से 19% आगे चल रहा है। जहाँ 42% लोग कंजर्वेटिव पार्टी और पियरे पोलिवर को पसंद कर रहे हैं तो वहीं मात्र 23% की पसंद लिबरल पार्टी और ट्रूडो हैं। सर्वे से यह भी पता चल रहा है कि आगामी चुनावों में 95% संभावना है कि वह कंजर्वेटिव पार्टी बहुमत हासिल कर लेगी।

इसके उलट इस बात की केवल 1% संभावना है कि लिबरल पार्टी सत्ता में आए। प्रधानमंत्री के तौर पर भी ट्रूडो की अप्रूवल रेटिंग रसातल को जा रही हैं। ट्रूडो को वर्तमान में कनाडा के प्रधानमंत्री के तौर 65% लोग पसंद नहीं करते हैं। इसमें सुधार भी नहीं हो रहा है।

प्रधानमंत्री ट्रूडो की यह मुश्किलें भारत से राजनयिक झगड़ा मोल लेने के बाद और बढ़ गई हैं। उन्होंने हाल ही में अपने पुराने आरोप दोहराए थे कि भारत ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या करवाई। इसको लेकर भारत ने अपने राजनयिक भी कनाडा से वापस बुला लिए थे और कनाडाई राजनयिकों को देश से निकलने को कहा था।

प्रधानमंत्री ट्रूडो ने यह आरोप लगाने के बाद संसद की एक कमिटी की सुनवाई में खुद कबूला था कि उनके पास भारत के खिलाफ कोई सबूत मौजूद नहीं हैं। इस बीच कनाडा में इस मामले में सबूत दिखाने की माँग भी उठ चुकी है। ऐसे में ट्रूडो के लिए यह नया राजनीतिक संकट और बड़ी चुनौती है और अगर वह इससे पार नहीं पाते तो उनके राजनीतिक करियर का अंत भी हो सकता है।

भारत के लिए 7 चुनौतियों पर जयपुर डायलॉग में गंभीर चर्चा : मानसिक गुलामी से निकलता भारत, तिलमिलाता लिबरल गिरोह

                                                                                                                   साभार: swarajyamag
आज भारत में इस्लामिक कट्टरपंथी शायद अपनी सीमा को पार कर रही है। 
हैदराबाद में पैंगबर को लेकर निजी चैट सार्वजनिक होने पर हिंदू छात्र को 20 लोगों ने बेरहमी से पीटा। आरोप है कि मुस्लिम लड़कों ने पीटकर लगवाए अल्लाह हू अकबर के नारे। प्राइवेट पार्ट पर लात मारी, वीडियो बनाया और जान से मारने की धमकी दी। कहाँ है #mob lynching, #intolerance, #not in my name,गंगा-जमुनी तहजीब के ढोंगी नारे और संविधान की दुहाई देने वाले आदि गैंग कहाँ है? किसी बीजेपी शासित राज्य किसी मुस्लिम के अप्रिय घटना होने पर पिकनिक मनाने पहुँचने वाले छद्दम धर्म निरपेक्ष किस बिल में घुसे बैठे हैं? क्या इन सबके घरों में कोई मातम है, जो किसी की आवाज़ नहीं निकल रही। क्योकि पिटने वाला हिन्दू है और हैदराबाद भाजपा शासित नहीं।

ऐसी ही गंभीर चुनौतियों पर Jaipur Dialogues पर प्रतिदिन चर्चा करता है। जिसके लिए संजय दीक्षित, आईएएस(रिटायर्ड) प्रशंसा के पात्र हैं। जब देश में नूपुर शर्मा को लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों के सिर पर "तन से सिर जुदा" सवार होने के बावजूद इस्लाम पर गंभीर चर्चाएं करने में संकोच नहीं किया। उन चर्चाओं में इस्लाम पर खुलकर हर आयत पर बहुत ही सार्थक चर्चा हुई। 
जयपुर में भारत की आजादी के अमृत काल के तहत दो दिवसीय जयपुर डायलॉग फोरम आयोजित किया गया। पिछले हफ्ते (5-6 नवंबर 2022) हुए इस फोरम में विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन हस्तियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर यहाँ चर्चा की। देश का इतिहास कैसा रहा, वर्तमान किन परिस्थितियों से गुजर रहा है, भविष्य में क्या-क्या चुनौतियाँ आ सकती हैं, इन बिंदुओं पर भी तरह-तरह के मत रखे गए।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी, आनंद रंगनाथन, अंबर जैदी, ओमेंद्र रत्नू, नीरज अत्री, गुरु प्रकाश, कपिल मिश्रा, आर जगन्नाथन, शाजिया इल्मी, विक्रम संपत, सुशांत सरीन – ये कुछ चंद बड़े नाम हैं, जिन्होंने जयपुर डायलॉग फोरम में विभिन्न सत्रों में विचार मंथन को धार दिया। बहुत सारी बातें और चर्चाओं के बीच यहीं पर देश के लिए 7 चुनौतियों पर भी चर्चा हुई।

देवी-देवताओं का अपमान, देश को बनाते मजाक का पात्र

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि देश अब मानसिक गुलामी के दौर से निकल रहा है। 2014 में आया परिवर्तन का दौर निरंतर जारी है। साथ ही उन्होंने चेताया कि एक समूह के द्वारा देश को मजाक का पात्र बनाया जा रहा है। यहाँ तक कि देवी-देवताओं का अपमान करने से नहीं चूक रहे लोग।
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि पिछले 50 वर्षों में फिल्मों में सिखों और सेना के जवानों का खुला उपहास किया गया, जो आज भी जारी है। उन्होंने कहा, “जहाँ भी दुनिया में लेफ्ट लिबरल है, वहाँ उदारता नहीं है। वो हमारे दिमाग में बड़े सटीक नैरेटिव भरते हैं। युवा पीढ़ी को इसे समझना होगा।” उन्होंने कहा, “जैसे ही नेरेटिव वाला विष निकलेगा, हमारी शक्ति सामने आ जाएगी।”

‘सभी धर्म एक समान’ सिर्फ दिखावा, एक खास धर्म पर चर्चा भी असंभव

आनंद रंगनाथन ने कथित लिबरलों और वामपंथ पर प्रहार करते हुए कहा कि वे ‘सभी धर्म एक समान’ का ढोल पीटते हैं लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं मानते। इसी मामले पर भरत गुप्त ने कहा कि इस्लाम का इतिहास बताने वाली बहुत अधिक पुस्तकें नहीं हैं। ऐसे में जो उपलब्ध है, उसकी ही ठीक-ठीक व्याख्या होनी चाहिए।
अजय चुंगरू ने इस मामले की तह में जाते हुए कहा कि सभी धर्मों में सवाल उठाने की स्वतंत्रता नहीं है। यहाँ तक कि नास्तिक बनने की स्वतंत्रता भी नहीं है। उन्होंने बताया कि 13 इस्लामिक देश ऐसे हैं, जहाँ नास्तिकों को मार दिया जाता है। जबकि हिंदू धर्म में नास्तिक को भी अभिव्यक्ति की आजादी है।

हिंदुत्व को नीचा दिखाने के लिए इतिहास से खेल

इतिहासकार विक्रम संपत ने तरह-तरह के उदाहरण देकर समझाया कि कैसे देश में विभिन्न तरीकों से हिन्दुत्व का विरोध किया गया… जो मुगल काल से आजादी के बाद भी जारी रहा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब नए इतिहास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि फिल्मों में हिन्दुस्तान की बेटी-महिलाओं की नीलामी के दृश्य दिखाकर देश-विदेश में हमारी संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया गया।
‘भारत- भूत, वर्तमान और भविष्य’ विषय पर चर्चा करते हुए ओमेंद्र रत्नू ने कहा कि हिंदू समाज का गौरवशाली इतिहास रहा है। दूसरे धर्म के या कथित लिबरल इतिहासकारों ने लेकिन इसकी गलत जानकारी देकर भ्रमित किया।
इस पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए तुफैल चतुर्वेदी ने कहा कि दूसरे धर्म के लोग भारत में राज और कारोबार करने नहीं, बल्कि धर्म का प्रचार-प्रसार करने आए थे। उन्होंने यह भी बताया कि भारत की खोज करने वाले भी पादरी ही थे।

आतंक और जिहाद के साए में कश्मीरी हिंदू

‘धारा 370 हटाने के बाद 3 साल का मूल्यांकन’ – जयपुर डायलॉग फोरम में यह भी एक विषय था। इस पर अजय चुंगरू ने कहा कि कश्मीर से धारा 370 हटा दी गई लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने इसका सम्मान नहीं किया। भारत ने इसे विकास से जोड़ जरूर दिया बावजूद कश्मीरी सत्ता की सीढ़ी गिने-चुने मुस्लिमों तक सीमित करने के प्रयास होते रहे।
इसी विषय पर गुरु प्रकाश ने कहा कि 5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 और 35a हटाने से पहले कश्मीर में संवैधानिक फ्रॉड जारी था। सुशील पंडित ने इस मामले को आगे बढ़ाते हुए आरोप लगाया कि अब घाटी में पर्यटन के नाम पर जेहाद के लिए फंडिंग की जा रही है।

धर्मांतरण

इस मामले पर पत्रकार अंबर जैदी ने चिंता जताते हुए कहा कि कश्मीर और केरल में व्यापक स्तर पर धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। लड़कियों को सेक्स टॉय बनाकर देश के बाहर भेजा जा रहा है, लेकिन कोई कथित लिबरल उस पर सवाल खड़ा नहीं कर रहा है।
जय आहूजा ने कहा कि देश में मेवात एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ के ढाई सौ गाँव हिंदू-विहीन हो चुके हैं। जिस गाँव में मुस्लिम आबादी अधिक है, वहाँ भारतीय कानून के बजाय शरिया लागू हो चुका है। मुस्लिम-बहुल आबादी वाले क्षेत्रों की समस्या पर उन्होंने याद दिलाया कि धारा 370 हटाने पर भी कश्मीर के कानूनों में बदलाव नहीं आ पाया है।

लोकतंत्र के कमजोर होते खंभे

‘लोकतंत्र या वोट खरीद’ विषय पर चर्चा वाले सत्र में महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार भाऊ तोरसेकर ने कहा कि लोकलुभावन नारे, बातें, उपहार, शराब, नकदी आदि ने लोकतंत्र को चोट पहुँचाई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सत्ताधारी को जिम्मेदार बनाना होगा।
कपिल मिश्रा ने इस विषय पर चर्चा में कहा कि भारत दुनिया का सबसे सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था का देश है। लेकिन न्यायपालिका, मीडिया और ब्यूरोक्रेसी ने अपना धर्म नहीं निभाया और इस कारण से विधायिका पथभ्रष्ट हो गई।
ओमकार चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र में मुफ्त की बंदरबाँट पर राज्यों पर कई लाख करोड़ रुपए का कर्ज हो गया है। भारत दुनिया की पाँचवीं सशक्त अर्थव्यवस्था घोषित हुई है, लेकिन अभी इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए।

हिंदुओं का शोषण, मंदिरों पर नियंत्रण

आनंद रंगनाथन ने ‘जिसका साथ उसका विकास’ नारा देते कहा कि भारत में हिंदू 9वें नागरिक हैं। उन्होंने बताया कि जेएनयू में कहा जाता है कि भारत हिंदू राष्ट्र बन गया है जबकि सच्चाई यह है कि भारत में हिंदुओं का निरंतर शोषण हो रहा है। सरकार मंदिरों का नियंत्रण कर रही है। पंडित और पूजा के अधिकार बदल दिए गए हैं। यहाँ तक की दान-दक्षिणा भी सरकारी खजाने में जमा हो रही है। उनके अनुसार हिंदुओं की दुर्दशा का कारण अल्पसंख्यकों का ताकतवर होना नहीं बल्कि बहुसंख्यकों का लगातार कमजोर होना है।
इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु जैन ने कहा कि समाज की संस्कृति निरंतर प्रदूषित हो रही है। यौन हिंसा बढ़ रही है। सनातन संस्कृति को मजबूत करने से ही देश फिर विश्व गुरु बनेगा।
पंडित सतीश शर्मा ने कहा कि हिंदू विरोधी तंत्र को तोड़ने के लिए अभिमन्यु की बजाए अर्जुन बनना होगा। धार्मिक मामले और न्यायपालिका पर बात करते हुए पत्रकार आर जगन्नाथन ने कहा कि धर्म और आस्था के मामलों में अदालत को निजी राय नहीं देनी चाहिए।
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‘जयपुर डायलॉग-2022’ को संबोधित करने, चर्चा में भाग लेने आए सभी वक्ताओं, विद्वानों का पूर्व आईएएस व जयपुर डायलॉग के चेयरमैन संजय दीक्षित और अध्यक्ष सुनील कोठारी ने आभार जताया।