भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद मानने वालों की कमी नहीं। विपक्ष तो यह काम कर ही रहा है, लेकिन कुछ मीडिया वाले भी पीछे नहीं। जो समाचार-पत्र घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए विलाप करता हो उसके राष्ट्रहित समाचार प्रकाशित करने पर भी शंका होती है। क्या घुसपैठियों पर विलाप करने के लिए उनके दामादों के आकाओं ने किसी रूप में इनाम दिया है? क्या दामाद घुसपैठियों का विलाप करने वाले समाचारपत्र को नहीं मालूम कि ये दामाद किस तरह भारत की अर्थव्यवस्था में दीमक का काम कर रहे हैं?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।
दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।
घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट
1 जुलाई 2026 को Financial Times ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।
कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”
इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।
लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”
आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।
इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”
बेशक Financial Times ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।
धार्मिक रंग देने की कोशिश
आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।
संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।
Financial Times ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।
अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।
बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।
न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले
शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।
गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”
असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।
दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन
अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।
स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।
लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।
दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।
एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।
Financial Times के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।
कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।
यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।
भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
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