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CJP प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर हैरान रह जाएंगे, लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ और TFF से कनेक्शन

                                                                                               साभार 
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनके न सिर्फ लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ से कनेक्शन हैं, बल्कि उससे मिली फंडिंग से सरकार विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास का विदेशी फंडिंग से जुड़ा कनेक्शन सामने आते ही सवालों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि किसी पत्रकार या शोधकर्ता को विदेशी संस्था से अनुदान क्यों मिला; असली सवाल यह है कि पैसा किससे आया, किस काम के लिए आया, किन लोगों और संस्थाओं तक पहुंचा और उस फंडिंग से तैयार होने वाले कंटेंट का प्रभाव किस दिशा में जाता है? जब एक ही विदेशी फाउंडेशन पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों के अलग-अलग प्रोजेक्ट को लगातार वित्तीय सहायता देता दिखाई दे, और उन नामों के काम में वैचारिक समानताएं भी नजर आएं, तो इसे महज संयोग कहकर आगे बढ़ जाना आसान जरूर है, लेकिन सवालों से बच निकलना इतना आसान नहीं। क्योंकि सौरव दास और अमेरिका स्थित ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का संबंध इसी बड़े सवाल का एक सिरा है। उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि TFF ने सौरव दास को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया है।

सौरव दास और लेफ्ट लिबरल गैंग का विदेशी फंडिंग का कनेक्शन

सौरव दास और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का रिश्ता इसी बड़े नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। जब उसी फाउंडेशन की विस्तृत ग्रांट सूची में न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक अधिकारों से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के नाम भी दिखाई देते हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि इस फंडिंग का व्यापक उद्देश्य और उसका प्रभाव क्या है। सौरभ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी उस नेटवर्क को समझने में है, जिसमें पैसा अलग-अलग नामों और परियोजनाओं तक पहुंचता है। यदि कोई संस्था भारत में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में पैसा लगा रही है, तो यह जानने का अधिकार जनता को है कि उसके संसाधनों का स्रोत क्या है, प्राथमिकताएं क्या हैं और जवाबदेही किसकी है।

 CJP के सौरव दास और TFF का कनेक्शन क्या है?

सौरव दास का नाम TFF की अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित ग्रांट पाने वाले लोगों में मिलता है। फाउंडेशन के अनुसार उन्हें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया गया। TFF की वेबसाइट पर इस ग्रांट के साथ सौरव दास की कुछ रिपोर्टों के लिंक भी दिए गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषणों में उनके अनुदान की राशि और वर्ष को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। यहीं से असली खेल शुरू होता है। यदि किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर रिपोर्टिंग के लिए विदेशी फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि कौन-सा काम उस अनुदान के तहत हुआ, उसका दायरा क्या था और फंडर तथा प्राप्तकर्ता के बीच जवाबदेही की व्यवस्था क्या थी।
TFF से लेफ्ट लिबरल गैंग को फंडिंग की सूची छोटी नहीं
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार यह अप्रैल 2019 से भारत में सूचना तक पहुंच को बढ़ावा देने और खोजी अनुदानों के माध्यम से एक अधिक जागरूक और जवाबदेह समाज बनाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। फाउंडेशन का दावा है कि उसका लक्ष्य समस्याओं के मूल कारणों पर काम करना और रणनीति के माध्यम से जवाबदेही की संस्कृति को और मजबूत बनाना है। TFF की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और विस्तृत हो जाती है। फाउंडेशन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूज़लॉन्ड्री को रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया। मनीलाइफ फाउंडेशन के RTI सेंटर को भी समर्थन दिया गया। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को evidence-based medicine की fact-checking के लिए अनुदान दिया गया है। न्यूज लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकारों और द कारवां से जुड़े रिपोर्टरों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए फेलोशिप या अनुदान दिए गए हैं। बाद के वर्षों में फाउंडेशन की सूची और फैलती दिखाई देती है। इसमें preventive detention, custodial या extrajudicial deaths, Indian Pharmacopoeia, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पतालों में संक्रमण, HIV संक्रमण, communal harmony और policy-making में think tanks की भूमिका जैसे विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ता और संस्थाएं शामिल हैं।
द वायर, न्यूजलॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज तक पहुंच
TFF की वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उसने ऐसे मीडिया और शोध नेटवर्क को समर्थन दिया है, जिनकी पहचान सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर विवादित रिपोर्टिंग की रही है। द वायर से जुड़े पत्रकारों ने TFF फेलोशिप के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम किया। Report for the World की एक प्रोफाइल भी बताती है कि द वायर की पत्रकार बंजोत कौर ने 2020 में Thakur Foundation Fellowship के तहत public health पर investigative reporting project किया था। TFF के अपने रिकॉर्ड में न्यूजलॉन्ड्री को कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए अनुदान का उल्लेख है। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को भी evidence-based medicine पर fact-checking के लिए आर्थिक सहायता दी गई थी।
सौरव दास का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है
सौरव दास का मामला इस पूरे नेटवर्क को समझने के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो TFF की अपनी वेबसाइट पर public-health reporting के फंड लेने वाले के रूप में दर्ज हैं। दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े कुछ प्रकाशित काम public health के बजाए सरकार की नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों से संबंधित हैं। कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों ने इसी अंतर पर सवाल उठाए हैं। यहां किसी के विचारों पर रोक लगाने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिस काम के लिए आर्थिक सहायता मिली, उसका घोषित उद्देश्य और प्रकाशित काम आपस में मेल क्यों नहीं खा रहा है।
विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर बहस अक्सर राजनीतिक हो जाती है। सरकार जब विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी NGO पर सवाल उठाती है तो उसे कई बार नागरिक स्वतंत्रता पर हमला कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता की मांग कोई दमन नहीं है। NGO और मीडिया संस्थानों को यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनके किस काम को, कौन पैसा दे रहा है। यही पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए। हर grant की राशि, उद्देश्य, deliverables, final output और funding disclosure सार्वजनिक होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों के सामने यह बताना चाहिए कि किसी रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में बाहरी फंडिंग लगी है या नहीं।
TFF के बॉस की एक्टिविस्ट सेना में शामिल हुआ सौरभ
कोविड कई लोगों के लिए एक दुखद याद थी, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जैकपॉट साबित हुई। जब भारत अपनी सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहा था, तब अमेरिका में बैठा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन का फाउंडर दिनेश ठाकुर चुपचाप भारत में अपनी सेना तैयार कर रहा था। यह उसके हितों के काम करने वाले एक्टिविस्ट्स की एक सेना थी। यही समय दिल्ली के RTI एक्टिविस्ट सौरव दास के मुताबिक उसके लिए सबसे खुशी लेकर आया। क्योंकि उसको आखिरकार उस सेना में जगह मिल गई, जिसमें शामिल होने की वे लंबे समय से कोशिश कर रहा था।
फाइजर बनाम रैनबैक्सी की एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यह कहानी 2021 से शुरू नहीं होती, यह 2003 से शुरू होती है। तब फाइजर बनाम रैनबैक्सी का वार चरम पर था। अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर और भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के बीच एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई चल रही थी। फाइजर अपनी सबसे अधिक बिकने वाली दवा ‘लिपिटर’ का पेटेंट गंवा चुकी थी और रैनबैक्सी लॉन्च करने के लिए तैयार थी।
ठाकुर रैनबैक्सी कंपनी छोड़कर उसके ही खिलाफ हुए 
दरअसल, अपनी जेनेरिक दवा, जो लिपिटर से कहीं सस्ती थी। लिपिटर फाइजर की सबसे अधिक बिकने वाली दवा थी, जिसकी बिक्री अरबों डॉलर में थी और जिसे फाइजर गंवाने की कगार पर थी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तीन भारतीय दिनेश ठाकुर, स्वामीनाथन और दिनेश कस्तूरी इस सारे खेल में शामिल हुऐ। तब दिनेश ठाकुर अमेरिका की फार्मा कंपनी ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) में काम कर रहा था। उसने BMS छोड़ दी और रैनबैक्सी USA से जुड़े। वहां 2 साल (2003-05) तक काम किया। फिर रैनबैक्सी छोड़ने के बाद उसने डेटा में हेरफेर (data manipulation) को लेकर US FDA में रैनबैक्सी के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई। चूंकि वह कंपनी का अंदरूनी व्यक्ति था, इसलिए उनके पास सारी गोपनीय जानकारी थी। रैनबैक्सी केस हार गई और उस पर $500 मिलियन का जुर्माना लगा।
US फार्मा माफिया के इशारे पर भारतीय कंपनियों पर निशाना
व्हिसलब्लोअर इनाम के तौर पर दिनेश ठाकुर को US सरकार से $48 मिलियन मिले। इस केस ने रैनबैक्सी को बर्बाद कर दिया और आखिरकार 2015 में इसे सन फार्मा को बेच दिया गया। यह केस फाइजर (Pfizer) के लिए जैकपॉट साबित हुआ और उसका कॉम्पिटिशन खत्म हो गया। कई कामों में हाथ आजमाने के बाद, दिनेश ठाकुर ने खराब फार्मा कंपनियों को टारगेट करने के मकसद से फार्मा एक्टिविज्म शुरू किया, लेकिन क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है कि उनके टारगेट हमेशा भारतीय फार्मा कंपनियां होती हैं और फायदा US फार्मा कंपनियों को होता है? या फिर वह US फार्मा माफिया के इशारे पर काम करता है?
यूएस सरकार से मिले पैसे से दिनेश ने 2018 में बनाया TFF
यूएस सरकार से मिले $48 मिलियन के साथ, दिनेश ठाकुर ने 2018 में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (TFF) नाम का NGO शुरू किया। इसे टैक्स छूट का दर्जा मिला और उसने अप्रैल 2019 से ग्रांट देना शुरू किया। यानि कोविड से कुछ महीने पहले। अब ‘ठाकुर की आर्मी’ बनाने का समय आ गया था। बिकने के लिए तैयार भारतीय इसकी आर्मी में शामिल होने लगे। 2019 से 2026 के बीच, उसने कई भारतीय पत्रकारों, इन्फ्लुएंसर्स, वकीलों और एक्टिविस्ट को फंड दिया। इन्हीं में सीजेपी का प्रवक्ता सौरभ भी शामिल था। वह उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्हें TFF से फंडिंग मिली। सुचेता दलाल ने ‘मनीलाइफ फाउंडेशन’ (MLF) की सह-स्थापना की, जिसे TFF से $100K मिले और उसी समय उन्होंने सन फार्मा को टारगेट करना शुरू कर दिया। सन फार्मा का स्टॉक 40% गिर गया। यह TFF के कहने पर किया था?
मोदी सरकार ने शोषण से बचाकर आत्मनिर्भरता पर दिया जोर
कोविड का समय अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पैसे कमाने का मौका था, लेकिन भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों को भारतीयों का शोषण नहीं करने दिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। और इसी के साथ ठाकुर की सेना ने भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन और दिनेश ठाकुर दोस्त हैं। सिर्फ वायर को ही TFF से फंडिंग नहीं मिली, बल्कि उसके चार पत्रकारों प्रियंका पुल्ला, श्रेया दासगुप्ता, बनजोत कौर और अदिति प्रधान को भी TFF से फंडिंग मिली। लेकिन यह पैसा मुफ्त नहीं था। उनका काम भारत को निशाना बनाना था। यह काम प्रियंका पुल्ला ने बेहतर किया। दिनेश ठाकुर उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ब्लूमबर्ग में प्रमोट किया। 2022 उसने अफ्रीका में भारतीय फार्मा कंपनियों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत बायोटेक ने ‘द वायर’ पर किया 100 करोड़ रुपये केस
असल में, ‘द वायर’ ने इतनी गंदगी फैलाई कि भारत बायोटेक ने उस पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया और उन्हें 14 खबरें हटानी पड़ीं। इनमें से लगभग सभी खबरें भारतीय वैक्सीन की कवरेज से जुड़ी थीं, जिनमें ठाकुर की फंडिंग वाली और पुल्ला की लिखी खबरें भी शामिल थीं। 2013 में “भारतीय जेनेरिक दवाओं के खिलाफ ठाकुर के एजेंडे वाली कहानियों” का पर्दाफ़ाश हुआ था, लेकिन 2021 तक आते-आते लेफ्ट लिबरल गैंग के दो पत्रकारों को TFF से फंडिंग मिली; और ठाकुर भारतीय फार्मा के मसीहा बन गए! स्क्रॉल मीडिया ने दिनेश ठाकुर के लिए भारत को निशाना बनाते हुए बहुत सारे लेख लिखे।
कोविड में फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था गिद्ध सौरभ
जब हर कोई पैसे कमा रहा था, तो सौरव दास को भी पैसे कमाने का हक है, लेकिन उस समय तक वे कोई बड़ा नाम नहीं थे। 2021 में फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन के लिए मंज़ूरी पाने की कोशिश कर रही थी, जबकि भारत सरकार ने भारतीय वैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट को मंजूरी दे दी थी। इसलिए सौरव दास ने RTI दाखिल की। सौरभ दास ने आरटीआई दाखिल कर सरकार से पूछा कि उन्होंने भारत बायोटेक एंड सीरम इंस्टीट्यूट को किस आधार पर मंजूरी दी? सरकार ने आंकड़े देने से इनकार कर दिया। सौरभ ने यह सब दिनेश ठाकुर के इशारे पर सीरम इंस्टीट्यूट को प्रभावित करने के लिए किया था। सौरभ को उसी इकोसिस्टम के अन्य लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। इसलिए सरकार से मनाही मिलने के बावजूद, वह आरटीआई दाखिल करता रहता है। जब पूरा देश कोविड से लड़ रहा था, तब ये गिद्ध फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था।

‘हीरो’ से ‘गद्दार’ बने सोनम वांगचुक: अनशन खत्म करते ही टूट पड़ा इस्लामी-वामपंथी गिरोह

       
                                         सोनम वांगचुक ने तोड़ा अनशन (X/Sonam Wangchuk)
सोनम वांगचुक ने गुरुवार (23 जुलाई 2026) को देर रात केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में अपना 26 दिन लंबा अनशन खत्म कर दिया। इस दौरान एपेक्स बॉडी ऑफ लेह-लद्दाख के कई प्रमुख सदस्य भी उनके साथ मौजूद रहे।

सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर लिखा, “इससे पहले अलग-अलग राजनीतिक दलों के 65 सांसदों ने मुझसे अनशन खत्म करने की अपील की थी। कुछ सांसद मुझसे मिलने आए थे जबकि कुछ ने पत्र लिखकर अनुरोध किया था। विभिन्न शर्तों पर लंबी बातचीत और देश में संभावित हिंसा को देखते हुए मैंने यह फैसला लिया।” उन्होंने प्रदर्शनकारियों से अपील करते हुए कहा, “हर जगह किसी भी तरह की हिंसा न होने दें और इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहें।”

 उन्होंने एक अन्य पोस्ट में बताया कि केंद्र सरकार और सभी राजनीतिक दलों के सांसदों ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि परीक्षा व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों की जवाबदेही पर संसद में चर्चा होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने आश्वासन दिया है कि हालिया NEET पेपर लीक मामले में आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाएगा। साथ ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया जाएगा।

हालाँकि, इस शांति से इस्लामी-वामपंथी गुट वांगचुक पर ही भड़क गया। दावा किया गया कि जैसे ही उन्हें सोनम वांगचुक के अनशन खत्म करने की जानकारी मिली उन्होंने उनके खिलाफ हमले शुरू कर दिए।

जिससे शक होता है कि मोदी और अमित के लिए अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने वाली इसी इस्लामी-वामपंथी गुट की लड़कियां हैं। इस तरह की अश्लील भाषा किसी सभ्य परिवार की लड़की नहीं कर सकती। ये गैंग ये ना समझे कि सरकार झुक गयी है, उन्हें शायद नहीं मालूम कि इसके बाद क्या खेल होने वाला है। भारत विरोधी विदेशियों भीख पर आंदोलन करने वाले मोदी सरकार को जो हल्के में ले रहे हैं वही इनकी भयंकर भूल है। आग तो लगा दी अब इस आग में कौन-कौन जलेगा यह भविष्य की गर्भ में छिपा है।    

एक एक्स (X) यूजर ने दावा किया कि सोनम वांगचुक को राम मंदिर में हुई चोरी और एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से जुड़े विवाद से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ‘प्लांट’ किया गया था। यूजर ने यह भी कहा कि अब मामला उनके नियंत्रण से बाहर हो गया है और जेन-जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहते ही हैं अब चाहे सोनम वांगचुक उनका समर्थन करें या नहीं।

एक यूजर ने सवाल किया कि कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके का नाम इस पोस्ट में क्यों नहीं है। उसने यह भी पूछा कि क्या सोनम वांगचुक ने अपना पक्ष बदल लिया है और क्या उन्होंने अब तक सभी को गुमराह किया।

एक अन्य यूजर ने दावा किया कि इस आंदोलन का असली मकसद गैर-लोकतांत्रिक तरीकों और ताकत के जरिए मोदी सरकार को हटाना है। जाहिद जावली नाम के यूजर ने कहा कि इस आंदोलन का उद्देश्य सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके जैसे नेताओं से भी बड़ा है। इसके बाद उसने इन आरोपों को लोगों का विरोध प्रदर्शन बताते हुए कहा कि ‘तानाशाही शासन’ हर मोर्चे पर विफल हो चुका है और उसके पास व्यवस्था को सुधारने के लिए सही लोग नहीं हैं।

वहीं, सलाहुद्दीन अय्यूब ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ ‘समझौता’ कर लिया है और आंदोलन की माँगों को नजरअंदाज कर दिया है।

कॉन्ग्रेस समर्थक एक यूजर ने भी सोनम वांगचुक को ‘समझौता कर लेने वाला’ बताया। उसने आरोप लगाया कि वांगचुक ने जेन-जी के साथ विश्वासघात किया है। साथ ही उसने कहा कि BJP के खिलाफ किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता और राहुल गाँधी ही एकमात्र विकल्प हैं।

एक अन्य यूजर ने सोनम वांगचुक का मजाक उड़ाते हुए कहा कि उन्हें भाजपा में शामिल हो जाना चाहिए और ‘हिंदू रक्षक, देशभक्त और राष्ट्रवादी’ बन जाना चाहिए। शख्स ने हिंदू धर्म या भारत के प्रति निष्ठा जताने तक का भी मजाक बना दिया। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि यह समूह हिंदू धर्म और भारत के प्रति किस तरह की सोच रखता है।

इस बीच, ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने सोनम वांगचुक को ‘बेकार’ बताते हुए लिखा, “अब उनके घर जाने, अच्छा खाना खाने और आराम करने का समय आ गया है। अब उनकी जरूरत नहीं है।” 

सोनम वांगचुक ने 28 जून को जंतर-मंतर पर अपना अनशन शुरू किया था। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में हिस्सा लिया था जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार और नीट पेपर लीक मामले के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर शुरू किया गया था। हालाँकि, इसके कुछ ही समय बाद इस प्रदर्शन ने एक हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया। पुलिसकर्मियों और संस्थाओं को निशाना बनाया गया और धीरे-धीरे यह आंदोलन छात्रों को आगे रखकर भारत में सत्ता परिवर्तन की कोशिश का प्रोपेगेंडा बनता जा रहा है।

राम मंदिर ध्वजारोहण होते ही भारत में पाकिस्तानपरस्त और वामपंथी से लेकर पाकिस्तान तक सब परेशान: सता रही मुस्लिम वोट बैंक की चिंता

                                  राम मंदिर के धर्म ध्वज समारोह में PM मोदी (फोटो: narendramodi.in)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्म ध्वज की स्थापना एक रस्म से आगे बढ़कर एक ऐतिहासिक घटना है। यह वह क्षण है, जिसमें सदियों की प्रतीक्षा, संघर्ष और करोड़ों-करोड़ राम भक्तों की भावनाएँ एक प्रतीक के रूप में आसमान में लहरा उठीं।

भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्घोष इस ध्वज को देश का बड़ा वर्ग गर्व, आस्था और सभ्यता के पुनरुत्थान के रूप में देख रहा है तो वहीं तथाकथित लिबरल वर्ग इससे दुखी है। वामपंथी गुटों से लेकर लिबरल्स और पाकिस्तान तक सब परेशान हैं।

इनकी परेशानी का असली कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब फैसला दिया गया था तब मस्जिद बनाने के लिए भी मिली जमीन पर मस्जिद के नाम पर नींव तक खुदी जबकि हिन्दुओं ने अपने पुरुषोत्तम श्रीराम का मन्दिर बना लिया। मन्दिर बनने से पहले ये ही लोग मन्दिर चंदे में हेराफेरी का आरोप लगाने वाले मस्जिद पर जमा हुए चन्दे का कहां इस्तेमाल हो रहा है क्यों नहीं बताते? मुसलमानों को एकजुट होकर कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि हिन्दुओं ने तो भव्य मन्दिर निर्मित कर लिया तुम्हारी मस्जिद का क्या हुआ? हकीकत में बाबरी मस्जिद पर चल रही दुकान बंद होने की परेशानी इन्हे चैन से नहीं रहने दे रही।      

लिबरल्स की एक जमात इस बात से दुखी हो गई है कि राम मंदिर पर ध्वज फहराने के लिए खुद प्रधानमंत्री क्यों चले गए। जब प्रधानमंत्री मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में पहुँचे थे, तब भी इस जमात के पेट में मरोड़ उठने लगी थीं। वामपंथी पार्टी CPI के महासचिव डी राजा भी इन दुखी लोगों की जमात में शामिल हैं। राजा ने इसके विरोध में X पर एक लंबा पोस्ट लिखा है।

राजा ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी देश के सामने अयोध्या में भगवा झंडा फहरा रहे हैं और इसे ‘भारतीय सभ्यता के पुनरुत्थान’ का प्रतीक बता रहे हैं। यह सिर्फ संशोधनवाद नहीं है बल्कि यह एक संकीर्ण, बहिष्कारवादी विचारधारा के साथ हमारे संवैधानिक इतिहास को फिर से लिखने का एक बेशर्म प्रयास है। यह बेहद चिंताजनक है कि देश के सर्वोच्च पद का इस्तेमाल हमारे संविधान में निहित बहुलवाद का जश्न मनाने के बजाय RSS के वैचारिक एजेंडे को वैध बनाने के लिए किया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि हम सबका झंडा तिरंगा है और इस घटना को तमाशा बताया है। यकीनन तिरंगा इस राष्ट्र की पहचान है जो आजादी के बाद आया है। उसका सम्मान है और पूरा राष्ट्र उसके सम्मान में नतमस्तक है। पर डी राजा ये क्यों भूल गए कि भगवा झंडा और राम राज्य का प्रतीक ध्वज हजारों वर्ष पुराने इस राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधि है। हिंदुओं के मन में उसके लिए अपार श्रद्धा है।

डी राजा हिंदुओं की आस्था की तुलना तमाशे से कर सकते हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहने वाला है। क्योंकि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज सहिष्णुता को अपने मन में, अपनी आत्मा में आत्मसात किए हुए है। डी राजा को समझने की जरूरत है कि क्या वो ऐसा किसी और मजहब के प्रतीक के लिए कहने की हिम्मत जुटा पाएँगे। जवाब सीधा सा है नहीं, और इसकी वजह आप-हम सब जानते हैं। डी राजा ऐसे कहने वाले अकेले नहीं है।

वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ‘द हिंदू’ की पत्रकार सुहासिनी हैदर भी इससे दुखी हैं और लोगों को भी भ्रम में डालने की कोशिश कर रही हैं। हैदर ने X पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा, “विचित्र विरोधाभास – पिछले कुछ वर्षों से अन्य सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के लिए कहा गया है लेकिन संविधान की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आज धार्मिक ध्वज फहराएँगे।”

सुहासिनी हैदर जिस संविधान की दुहाई दे रही हैं क्या वो प्रधानमंत्री को अपना धर्म मानने से रोकता है? क्या वो देश के हर नागरिक को अपना धर्म मानने की आजादी का अधिकार नहीं देता है। सुहासिनी को मतलब ना संविधान से ना धर्म उन्हें बस मतलब अपने प्रोपेगेंडा से है। जाहिर है कि राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा सभी जगह फहराया जाता है, खुद राम मंदिर के परिसर में भी बीते 15 अगस्त 2025 को तिरंगा फहराया गया था।

इन वामपंथियों द्वारा तिरंगे को भगवा का विरोधी साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन वो भूल गए हैं कि भगवा हमेशा से इस राष्ट्र कि चेतना का आधार था, है और रहेगा। हालाँकि, इसके होने से तिरंगा की शान में ना कमी आती है और ना होगी।

सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका कथित ‘बाबरी मस्जिद’ को फिर से बनाए जाने की वकालत भी कर रहा है। अयोध्या से करीब 850 किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में तो सत्तारूढ़ TMC के एक विधायक हुमायूँ कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को बाबरी नाम की मस्जिद बनाने का एलान भी कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी ऐसे स्वर दिखे हैं। ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’ नाम के एक हैंडल ने फिर ‘बाबरी’ बनाने की बात कही है।

राम मंदिर के धर्म ध्वज से जुड़ी एक पोस्ट पर जवाब देते हुए हैंडल ने लिखा, “बाबरी का विनाश न तो हिंदुओं के लिए कोई सभ्यतागत उपलब्धि है और न ही व्यापक उम्माह के लिए, यह तो बस एक प्रतीक है जिसे हागिया सोफिया की तरह उलटा जा सकता है।” हैंडल से आगे लिखा गया, “इस बीच, पंजाब, सिंध, बंगाल और कश्मीर जैसे हिंदू सभ्यता के उद्गम स्थलों से हिंदू धर्म का सफाया हो चुका है, जिसे उलटा नहीं जा सकता।”

राजीव निगम नाम के एक यूजर ने धर्म ध्वज की स्थापना को नौटंकी बताया है। अभिनेता अनुपम खेर ने X पर एक पोस्ट में लिखा कि हमारे जीते जी अयोध्या में हमें श्री राम मंदिर पर ध्वजारोहण समारोह का शुभ अवसर प्राप्त हुआ इससे बड़े सौभाग्य की बात क्या हो सकती है। इस पर राजीव निगम से लिखा, “फुल नौटंकी चालू आहे” यानी पूरी तरह से नौटंकी चल रही है।

सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की भरमार है जो प्रभु राम के धर्म ध्वज की स्थापना किए जाने से दुखी हैं। भारत में वामपंथी और लिबरल तो दुखी हैं ही, साथ में ही पड़ोसी देश पाकिस्तान भी रो रहा है। वो भारत पर आरोप लगाते हुए UN तक से गुहार लगाने पहुँच गया है।

पाकिस्तान भी परेशान, UN तक लगाई गुहार

देश में तो प्रोपेगेंडा फैलाने वाले परेशान हैं हीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान भी परेशान है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा बयान जारी कर राम मंदिर के धर्म ध्वज की स्थापना पर सवाल उठाए हैं।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, “पाकिस्तान ने अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की जगह पर बने तथाकथित ‘राम मंदिर’ पर झंडा फहराने पर गहरी चिंता जताई है। सदियों पुरानी इबादत गाह बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को फासीवादी सोच से प्रेरित कट्टरपंथी भीड़ ने गिरा दिया था।”

पाकिस्तान ने आगे कहा, “भारत में बाद की कानूनी प्रक्रिया, जिसमें जिम्मेदार लोगों को बरी कर दिया गया और गिराई गई मस्जिद की जगह पर मंदिर बनाने की इजाज़त दी गई, अल्पसंख्यकों के प्रति भारतीय सरकार के भेदभाव वाले रवैये के बारे में बहुत कुछ बताती है।” पाकिस्तान ने कहा, “भारतीय मुसलमान लगातार बढ़ते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने का सामना कर रहे हैं।”

पाक ने कहा, “UN और संबंधित इंटरनेशनल संस्थाओं को इस्लामिक विरासत की सुरक्षा और सभी माइनॉरिटीज के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा पक्का करने में एक कंस्ट्रक्टिव भूमिका निभानी चाहिए। पाकिस्तान भारत सरकार से अपील करता है कि वह मुसलमानों समेत सभी धार्मिक समुदायों की सुरक्षा पक्का करे।”

पाकिस्तान के दुख को समझा भी जा सकता है। वो खुद भुखमरी और गृह युद्ध जैसी स्थितियों से जूझ रहा है और फौज हर तरफ से पिट रही है। ऐसे में आवाम का ध्यान भटकाने के लिए ऐसी हरकतों का सहारा लेना पड़ रहा है। भारत के वामपंथियों की आदत ही खराब हो गई है। इस वर्ग को हर ऐसे क्षण में खामी तलाशने की आदत सी हो गई है, जैसे उन्हें भारत की आत्मा को समझना ही नहीं बल्कि उससे स्वयं को अलग रखना है।

यह वही विचारधारा है जिसने 2019 में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी निराशा ही जताई थी। तब भी तर्कों की लंबी फेहरिस्त पेश की गई कभी सेक्युलरिज्म खतरे में है, कभी राजनीति धर्म के बिना भी चल सकती है और कभी इतिहास मिटाया जा रहा है। पर सच यह है कि जो इतिहास मिटाया गया था, वह अब फिर से स्थापित हुआ है। जिनकी स्मृति सैकड़ों वर्षों तक दबा दी गई थी, आज वह फिर सबके हृदय में प्रफुल्लित हो रही है। यह धर्म ध्वज उसी स्मृति का प्रत्यक्ष रूप है।

आज जब ध्वज फहरा रहा है, तभी यह सदा पीड़ित लिबरल समूह उसमें भी राजनीति, बहुसंख्यक वर्चस्व, राजनीतिक हिंदुत्व जैसी चीजें ढूँढ रहा है। सवाल यह है कि जब किसी समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान होता है तो यह वर्ग असंतोष क्यों महसूस करता है?

ऐसा लगता है कि भारत की प्राचीन पहचान को स्वीकार करना उन्हें असुविधाजनक लगता है। यह वर्ग भूल जाता है कि राम मंदिर का निर्माण किसी सत्ता की इच्छा से कहीं आगे बढ़कर समाज की सामूहिक स्मृति और सैकड़ों वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। आज राम मंदिर पर स्थापित धर्म ध्वज से कुछ लोगों को समस्या है, क्योंकि उन्हें यह मानना मुश्किल लगता है कि भारत का सांस्कृतिक चरित्र जाग रहा है और वह भी आत्मविश्वास के साथ। यह काल भारत के स्व: के बोध का काल है। राम मंदिर के शिखर पर फहराया यह ध्वज ‘भारत माँ’ के मस्तक पर तिलक की तरह है।

केरल : ‘अच्छे कपड़े पहनने वाले झूठे, लिपस्टिक वाली से सावधान’ : विजय राघवन, CPM नेता

                                      सीपीएम नेता विजय राघवन (फोटो साभार: ऑन मनोरमा)
सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य और पूर्व सांसद ए विजयराघवन अपने सेक्सिस्ट (लिंगभेदी) बयान पर अड़े हुए हैं, जिसमें उन्होंने पत्रकारों के पहनावे और लिपस्टिक लगाने को लेकर टिप्पणी की थी। यह घटना केरल के त्रिशूर में गुरुवार (10 अक्टूबर 2024) को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सामने आई।

ऑन मनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व सांसद विजयराघवन ने हाल ही में नीलांबूर में आयोजित एक सीपीएम सार्वजनिक बैठक में कहा था, “जो पत्रकार अच्छे कपड़े पहनते हैं, वे झूठ बोलते हैं। अच्छे शर्ट और पैंट पहनने वालों और लिपस्टिक लगाने वालों से सावधान रहना चाहिए।” यानि क्या पार्टी में लिपिस्टिक लगाने वाली महिलाओं से सावधान रहना चाहिए? 

जब एक महिला पत्रकार ने उनके इस विवादित बयान पर सवाल किया, तो विजयराघवन ने उसे प्यार भरी टिप्पणी बताते हुए कहा, “यह तो पत्रकारों के प्रति प्रेम से की गई टिप्पणी थी।” हालाँकि, सवाल पर जोर देने के बाद उन्होंने इस मामले को डायवर्ट करने की कोशिश और पूछा, “आपको लिपस्टिक से इतनी परेशानी क्यों है? क्या लिपस्टिक कोई गलत शब्द है?”

पत्रकारों ने जब उन्हें घेरा, तो उनका लहजा बदल गया और उन्होंने कहा, “आमतौर पर आप लोग हमारे बारे में काफी कुछ कहते हैं, तो बदले में आपको भी कुछ सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। मीडिया भी झूठ बोलकर लोगों को गुमराह कर सकता है, और ऐसे मामलों में उनके पहनावे और शब्दों का असर होता है।”

इस बयान के बाद से विजयराघवन की आलोचना हो रही है, खासकर उनके महिलाओं के पहनावे पर की गई टिप्पणी को लेकर, जिसे लिंगभेदी और अपमानजनक माना जा रहा है। बता दें कि विजयराघवन लोकसभा और राज्यसभा के भी सदस्य रह चुके हैं। वो सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य भी हैं।

पश्चिम बंगाल : ‘सिर्फ राम मंदिर के खिलाफ प्रलाप कर रही हो, मुस्लिमों पर बोल कर दिखाओ’: हिन्दू द्वारा SFI नेता को चुनौती देने पर वामपंथी गुंडों ने किया हमला

पश्चिम बंगाल में दीपसिता धर के प्रोपेगंडा का जवाब देने पर हिन्दू शख्स पर हमला
पश्चिम बंगाल के बीरभूम में वामपंथी संगठन SFI (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) की ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी दीपसिता धर की रैली में संगठन के गुंडों ने एक हिन्दू शख्स पर हमला कर दिया और उसकी पिटाई की। बता दें कि ये छात्र संगठन CPI(M), यानी ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी)’ से सम्बद्ध है। रामपुरहाट में दीपसिता धर की रैली के दौरान एक हिन्दू शख्स ने राम मंदिर और हिन्दू समाज के खिलाफ उनकी गलतबयानी का विरोध किया।

शनिवार (13 जनवरी, 2024) को आयोजित इस रैली में उक्त हिन्दू शख्स ने निडरता से जवाब देते हुए कहा, “तुम उसी समय से हिन्दुओं के खिलाफ प्रलाप कर रही हो। मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ – मुस्लिम समाज के खिलाफ कुछ भी बोल कर दिखाओ। तुमने मुस्लिमों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा, लेकिन राम मंदिर के निर्माण पर ही अटकी हुई हो।” उक्त व्यक्ति ने सिर्फ सवाल पूछा और किसी प्रकार की शारीरिक चोट पहुँचाने की कोई कोशिश भी नहीं की, फिर भी उसे घेर लिया गया।

दीपसिता धर के समर्थकों ने उसकी पिटाई कर दी। साथ ही उसे धक्के देकर रैली से बाहर निकाल दिया गया। इस दौरान दीपसिता धर ने SFI के गुंडों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया और बाद में ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए कहने लगीं कि उक्त शख्स ने उनके भाषण का सिर्फ एक अंश ही सुना था। कम्युनिस्ट पार्टी की नेता ने बेशर्मी दिखाते हुए उसकी तुलना ‘लघु दृष्टि’ के मरीज से कर दी और कहा कि उन्होंने काफी कुछ कहा, लेकिन उसने सिर्फ राम मंदिर को लेकर बातें सुनी।

दीपसिता धर हावड़ा के बाली से विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं। 2021 में हुए चुनाव में उन्हें मात्र 22,040 (18%) वोट ही प्राप्त हुए थे। TMC और भाजपा प्रत्याशियों के बाद वो तीसरे नंबर पर आई थीं। बताया जाता है कि उनका मकसद भाजपा की वैशाली डालमिया को किसी तरह हरवाना था। वो मात्र 6237 वोट से ये सीट हारी थीं। साथ ही वो दिल्ली की सीमाओं को घेर कर हुए किसान आंदोलन में भी खासी सक्रिय रही थीं।

‘मौत मुबारक, नरक में जाओ: युवा राष्ट्रवादी इन्फ्लुएंसर की मृत्यु पर AltNews वाले ज़ुबैर और RLD वाले कनौजिया ने मनाया जश्न, कहा – ‘आत्मा गाजा में भटके’

मोहम्मद ज़ुबैर और प्रशांत कनौजिया (साभार- HT and India Tooday)
सोशल मीडिया एक्स पर ‘IAS Smoking Skills’ हैंडल के नाम से पोस्ट करने वाले राष्ट्रवादी इन्फ्लुएंसर की अचानक से मौत हो गई है। इस हैंडल के पीछे जो राष्ट्रवादी चेहरा था उसे लोग यश के नाम से जानते थे। रविवार (29 अक्टूबर, 2023) को जैसे ही ह्रदय गति रुक जाने से उनके मौत की सूचना मिली नेटिजन्स स्तब्ध रह गए क्योंकि यश की उम्र 30 वर्ष से भी कम थी।

सामाजिक-राजनितिक सहित विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर पोस्ट करने वाले यश को जहाँ नेटिजन्स श्रद्धांजलि दे रहे हैं, वहीं अक्सर लोगों की पहचान उजागर कर उन्हें बहशियों के हाथो सौंप देने वाला मोहम्मद ज़ुबैर, यहाँ भी अपनी हरकत से बाज नहीं आया। लगातार एक के बाद एक पोस्ट कर यश की मौत का मजाक उडाता रहा। वहीं अब भारी विरोध और सोशल मीडिया पर जलील किए जाने के बाद ज़ुबैर ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया है।

इतना ही नहीं RLD के प्रशांत कनोजिया ने भी यश के मारे जाने का मजाक उड़ाते हुए लिखा, “यह लड़का गाजा में मारे जा रहे फ़िलिस्तीनी बच्चों पर नाच कूद रहा था @Smokingskills07। परंतु आज पता चला धर्म की रक्षा करने का ढोंग करने वाले इस व्यक्ति की मौत हो गई। बच्चों के लाशों पर मज़ा ले रहा था आज कुदरत ने इसके मज़े ले लिए। परिवार को मेरी संवेदना है और उम्मीद है उनका बेटा नर्क में जाए और उसकी आत्मा गाजा में भटकती रहे। गुमनामी की मौत मुबारक!”

देखिए किस तरह से नेटिजन्स स्मोकिंग्स किल्स हैंडल चलाने वाले यश को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। यश की मौत हार्ट अटैक से बताई जा रही है। यश को याद करते हुए टीवी पत्रकार प्रदीप भंडारी ने लिखा, “मैं तो बहुत सदमे में हूँ। यश @Smokingskills07 हमने अभी इस सप्ताह बात की है। आप बहुत छोटे, मिलनसार, स्नेही थे। आप हमेशा कहते थे – ”भैया आप आगे बढ़ो, मैं आपके साथ हूँ। मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा कि आप हमारे साथ नहीं हैं. ओम शांति।”

वहीं चचा मॉन्क नामक हैंडल ने लिखा, “यह जानकर आश्चर्य और दुःख हुआ कि भाई! @Smokingskills07 अब नहीं है। ॐ शांति  जीवन बेहद अप्रत्याशित है। हम जीवन के प्रत्येक मिनट के लिए भगवान के प्रति आभारी रहें।”

जहाँ लोग दुःखी हैं यश की मौत से वहीं ऑल्टन्यूज़ का फाउंडर सदस्य मोहम्मद ज़ुबैर लगातार पोस्ट कर यश की मौत का मजाक उड़ाता रहा और लोगों के विरोध को देखते हुए एक पोस्ट कर अपने पुराने सभी पोस्ट जो उसने यश की मौत का मजाक उड़ाने के लिए किए थे डिलीट कर दिया। और अपने बचाव में लिखा, “मैंने उसके पुराने ट्वीट्स को उजागर करने वाले अपने ट्वीट्स हटा दिए हैं। लेकिन जिस तरह से उसने लगातार छोटे फ़िलिस्तीनी बच्चों की मौत का मज़ाक उड़ाया और जश्न मनाया….”

वहीं दूसरे नेटिजन्स ने ज़ुबैर के डिलीट किए गए सभी ट्वीट का स्क्रीनशॉट पोस्ट कर दिया। बाला नामक एक्स हैंडल ने पोस्ट करते हुए लिखा, “खून में ही इसके जहर है, अपने ट्वीट डिलीट मत कर ज़ुबैर, हम जानते हैं कि तू क्या है?”

यश की मौत पर श्रद्धांजलि देते हुए और ज़ुबैर की खैर खबर लेते हुए इस्कॉन के प्रवक्ता राधा रमण दास ने लिखा, “@Smokingskills07 की दिल का दौरा पड़ने से असामयिक मृत्यु की खबर ह्रदय विदारक है। उनकी उम्र 30 साल भी नहीं थी। ओम  शांति। हरे कृष्ण। और ये बेशर्म आतंकवादी 🐖 उनके जाने का जश्न मना रहा है। मूर्ख को यह नहीं पता कि उनका दोबारा जन्म होगा।”

                                                   पोस्ट पोस्टका स्क्रीनशॉट

मोहम्मद ज़ुबैर की ये हरकत नया नहीं है इसके पहले भी वह जहाँ जिहादियों, आतंकियों का बचाव करता आया है वहीं फैक्ट चेक के नाम पर सही लोगों के पहचान को संकट में डालने, यहाँ तक कि मौत के मुँह में भेज देने भी बाज नहीं आया। सोशल मीडिया पर लोग ज़ुबैर के इन्हीं कारनामों की चर्चा करते हुए उसे लानत भेज रहे हैं। 

‘न्यूज़क्लिक’ को चीन की फंडिंग का मामला : मुंबई में तीस्ता सीतलवाड़ के ठिकाने पर छापा, सीताराम येचुरी के घर भी पहुँची दिल्ली पुलिस

न्यूज क्लिक मामले में तीस्ता सीतलवाड़ और सीताराम येचुरी के घर पर छापे (फोटो साभार: सीताराम येचुरी फेसबुक अकाउंट/ पेन इंटरनेशनल वेबसाइट )
न्यूज क्लिक (Newsclick) मामले में दिल्ली पुलिस ने सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी तो मुंबई पुलिस ने प्रोपेगेंडा एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के घर की भी तलाशी ली। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मंगलवार (3 अक्टूबर 2023 ) को डिजिटल न्यूज वेबसाइट न्यूज़क्लिक और मीडिया कंपनी से जुड़े पत्रकारों के 30 ठिकानों पर छापेमारी की।

वेबसाइट की फंडिंग की जाँच के तहत ये छापेमारी शुरू की गई है। वेबसाइट के खिलाफ केस 17 अगस्त को दर्ज किया गया था। केस गैरकानूनी गतिविधियांँ (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधानों के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 120 बी (आपराधिक साजिश के लिए सजा) के तहत दर्ज किया गया।

इससे पहले दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने भी केस दर्ज किया था। इसके साथ ही ईडी ने भी कार्रवाई की थी। हाई कोर्ट ने उस वक्त न्यूज क्लिक के प्रमोटरों को गिरफ्तारी से राहत दे दी थी।

दिल्ली में न्यूज़क्लिक के कार्यालय में तलाशी के साथ ही तीस्ता सीतलवाड के मुंबई आवास पर भी तलाशी ली जा रही है। सीतलवाड थिंक टैंक ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक हैं। वो भी न्यूज़क्लिक में आर्टिकल लिखती रही हैं।

उधर दूसरी तरफ दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद में न्यूज़क्लिक वेबसाइट से जुड़े कुछ पत्रकारों के घरों पर दिल्ली पुलिस की छापेमारी सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी के घर भी हुई। इस बारे में येचुरी ने खुद मीडिया को जानकारी दी है।

सीपीआई (एम) के महासचिव येचुरी ने कहा, “पुलिस मेरे घर पर आई थी, क्योंकि मेरा एक साथी जो मेरे साथ वहाँ रहता है, उसका बेटा न्यूज़क्लिक के लिए काम करता है। पुलिस उससे पूछताछ करने आई थी।”

उन्होंने आगे कहा, पुलिस ने उनका लैपटॉप और फोन ले लिया। वे क्या जाँच कर रहे हैं, कोई नहीं जानता। अगर यह मीडिया को दबाने की कोशिश है, तो देश को इसके पीछे की वजह पता होना चाहिए।”

न्यूज़क्लिक से जुड़े कई लोगों जिनमें वेबसाइट के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ, पत्रकार अभिसार शर्मा, औनिंद्यो चक्रवर्ती और भाषा सिंह, साथ ही व्यंग्यकार संजय राजौरा के घर पर कथित तौर पर पुलिस ने छापेमारी की है। अभिसार शर्मा ने अपने एक्स हैंडल से पोस्ट कर इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि पुलिस उनके फोन और लैपटॉप जब्त कर रही है। इसी तरह भाषा सिंह ने बताया कि पुलिस ने उनका फोन जब्त कर लिया है।

DUSU चुनाव में वामपंथी दल AISA और SFI के उम्मीदवारों को NOTA से भी कम वोट: NOTA को मिले 16559


इस साल हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन यानी डूसू (DUSU) चुनावों में बड़ी संख्या में वोटर्स ने ‘इनमें से कोई भी नहीं’ (NOTA) विकल्प का इस्तेमाल किया। शुक्रवार (22 सितंबर) को वोट करने वाले 53,452 छात्र-छात्राओं में से 16,559 विद्यार्थियों ने नोटा का विकल्प चुना।

नोटा की संख्या में बढ़ोतरी दर्शाता है कि ताकत और पैसे के इस चुनावी खेल में विद्यार्थियों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। वहीं, वामपंथी दलों की हालत और भी बुरी है। डूसू चुनाव के कुछ वामपंथी उम्मीदवारों को नोटा से भी कम वोट मिले हैं।

हैरानी की बात यह है कि स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए) समेत वामपंथी दलों को मिले कुल वोटों के मुकाबले नोटा की संख्या बहुत अधिक रही।

नोटा ने बनाया मुकाबला कड़ा

शनिवार (23 सितंबर) को काउंटिंग के दौर में ये नोटा ही था, जिसकी वजह से एनएसयूआई और एबीवीपी के बीच कड़ा मुकाबला हुआ था। डीयू के 32 कॉलेजों में एबीवीपी (ABVP) की जीत हुई थी तो 9 कॉलेजों में क्लीन स्वीप किया। यानी कि इन 9 कॉलेजों के सभी पदों पर सिर्फ ABVP के ही उम्मीदवार जीते हैं। 
एबीवीपी ने यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष पद सहित 3 सीटों पर जीत दर्ज की है। एनसीयूआई (NSUI) के खाते में एक सीट गई है। ABVP के तुषार डेढ़ा अध्यक्ष (23460 वोट), अपराजिता सचिव (24543 वोट), सचिन बैसला संयुक्त सचिव (24,955 वोट) तथा NSUI के अभी दहिया (22331 वोट) को उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल हुई है।

नॉर्थ कैंपस में पीछे रह गई AISA

विद्यार्थियों का कहना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनिंदा कॉलेजों में ही अब वामपंथी संगठन सक्रिय हैं। नॉर्थ कैंपस में ही उनकी तूती बोलती थी, लेकिन साल 2023 के चुनावों में वो यहाँ भी फीके पड़ गए। ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ) ने सभी पदों पर चुनाव लड़ा था।
आइसा ने अध्यक्ष पद के लिए आयशा अहमद खान, उपाध्यक्ष के लिए अनुष्का चौधरी, सचिव के लिए आदित्य प्रताप सिंह और संयुक्त सचिव के लिए अंजलि कुमारी को मैदान में उतारा था। आयशा 3335 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रही थीं। वहीं उपाध्यक्ष की उम्मीदवार अनुष्का को 3492 वोट पड़े। उनके मुकाबले नोटा को 3,914 वोट पड़े।
इसी तरह सचिव पद पर उतरे आदित्य प्रताप सिंह को 3884 वोट मिले। यहाँ भी नोटा उनसे 5108 वोट से बाजी मार ले गया। आइसा की संयुक्त सचिव पद की उम्मीदवार अंजलि को 4195 वोट मिले। उनकी तुलना में इस पद पर भी नोटा 4786 वोट से बाजी मार ले गया।

SFI को भी मुँह की खानी पड़ी

इसी तरह एसएफआई (SFI) के पैनल में अध्यक्ष पद के उम्मीदवार आरिफ सिद्दीकी को नोटा के 2,757 वोट के मुकाबले महज 1,838 वोट पड़े। इसके उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार अंकित को 2,906 वोट मिले, जबकि नोटा को 3,914 वोट मिले। वहीं संगठन के संयुक्त सचिव को 3,311 वोट मिले जबकि नोटा को 4,786 वोट पड़े।
वामपंथी छात्र संगठनों में सबसे अधिक वोट हासिल करने वाली सचिव पद की एसएफआई की उम्मीदवार अदिति त्यागी रहीं। उन्हें 5150 वोट मिले, लेकिन वो तीसरे स्थान पर सिमटकर रह गईं। संयुक्त सचिव पर निष्ठा सिंह को 3311 वोट मिले। वे चौथे स्थान पर रहीं, लेकिन नोटा उनसे बाजी मार गया।
डूसू चुनावों में सचिव पद के लिए नोटा का विकल्प सबसे अधिक चुना गया। इस पद पर सबसे अधिक 5108 वोट नोटा को पड़े। उसके बाद संयुक्त सचिव पद के लिए 4786 नोटा को वोट पड़े। वहीं, उपाध्यक्ष पद के लिए 3914 और अध्यक्ष पद के लिए 2751 विद्यार्थियों ने नोटा को चुना।

भारत के लिए 7 चुनौतियों पर जयपुर डायलॉग में गंभीर चर्चा : मानसिक गुलामी से निकलता भारत, तिलमिलाता लिबरल गिरोह

                                                                                                                   साभार: swarajyamag
आज भारत में इस्लामिक कट्टरपंथी शायद अपनी सीमा को पार कर रही है। 
हैदराबाद में पैंगबर को लेकर निजी चैट सार्वजनिक होने पर हिंदू छात्र को 20 लोगों ने बेरहमी से पीटा। आरोप है कि मुस्लिम लड़कों ने पीटकर लगवाए अल्लाह हू अकबर के नारे। प्राइवेट पार्ट पर लात मारी, वीडियो बनाया और जान से मारने की धमकी दी। कहाँ है #mob lynching, #intolerance, #not in my name,गंगा-जमुनी तहजीब के ढोंगी नारे और संविधान की दुहाई देने वाले आदि गैंग कहाँ है? किसी बीजेपी शासित राज्य किसी मुस्लिम के अप्रिय घटना होने पर पिकनिक मनाने पहुँचने वाले छद्दम धर्म निरपेक्ष किस बिल में घुसे बैठे हैं? क्या इन सबके घरों में कोई मातम है, जो किसी की आवाज़ नहीं निकल रही। क्योकि पिटने वाला हिन्दू है और हैदराबाद भाजपा शासित नहीं।

ऐसी ही गंभीर चुनौतियों पर Jaipur Dialogues पर प्रतिदिन चर्चा करता है। जिसके लिए संजय दीक्षित, आईएएस(रिटायर्ड) प्रशंसा के पात्र हैं। जब देश में नूपुर शर्मा को लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों के सिर पर "तन से सिर जुदा" सवार होने के बावजूद इस्लाम पर गंभीर चर्चाएं करने में संकोच नहीं किया। उन चर्चाओं में इस्लाम पर खुलकर हर आयत पर बहुत ही सार्थक चर्चा हुई। 
जयपुर में भारत की आजादी के अमृत काल के तहत दो दिवसीय जयपुर डायलॉग फोरम आयोजित किया गया। पिछले हफ्ते (5-6 नवंबर 2022) हुए इस फोरम में विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन हस्तियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर यहाँ चर्चा की। देश का इतिहास कैसा रहा, वर्तमान किन परिस्थितियों से गुजर रहा है, भविष्य में क्या-क्या चुनौतियाँ आ सकती हैं, इन बिंदुओं पर भी तरह-तरह के मत रखे गए।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी, आनंद रंगनाथन, अंबर जैदी, ओमेंद्र रत्नू, नीरज अत्री, गुरु प्रकाश, कपिल मिश्रा, आर जगन्नाथन, शाजिया इल्मी, विक्रम संपत, सुशांत सरीन – ये कुछ चंद बड़े नाम हैं, जिन्होंने जयपुर डायलॉग फोरम में विभिन्न सत्रों में विचार मंथन को धार दिया। बहुत सारी बातें और चर्चाओं के बीच यहीं पर देश के लिए 7 चुनौतियों पर भी चर्चा हुई।

देवी-देवताओं का अपमान, देश को बनाते मजाक का पात्र

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि देश अब मानसिक गुलामी के दौर से निकल रहा है। 2014 में आया परिवर्तन का दौर निरंतर जारी है। साथ ही उन्होंने चेताया कि एक समूह के द्वारा देश को मजाक का पात्र बनाया जा रहा है। यहाँ तक कि देवी-देवताओं का अपमान करने से नहीं चूक रहे लोग।
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि पिछले 50 वर्षों में फिल्मों में सिखों और सेना के जवानों का खुला उपहास किया गया, जो आज भी जारी है। उन्होंने कहा, “जहाँ भी दुनिया में लेफ्ट लिबरल है, वहाँ उदारता नहीं है। वो हमारे दिमाग में बड़े सटीक नैरेटिव भरते हैं। युवा पीढ़ी को इसे समझना होगा।” उन्होंने कहा, “जैसे ही नेरेटिव वाला विष निकलेगा, हमारी शक्ति सामने आ जाएगी।”

‘सभी धर्म एक समान’ सिर्फ दिखावा, एक खास धर्म पर चर्चा भी असंभव

आनंद रंगनाथन ने कथित लिबरलों और वामपंथ पर प्रहार करते हुए कहा कि वे ‘सभी धर्म एक समान’ का ढोल पीटते हैं लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं मानते। इसी मामले पर भरत गुप्त ने कहा कि इस्लाम का इतिहास बताने वाली बहुत अधिक पुस्तकें नहीं हैं। ऐसे में जो उपलब्ध है, उसकी ही ठीक-ठीक व्याख्या होनी चाहिए।
अजय चुंगरू ने इस मामले की तह में जाते हुए कहा कि सभी धर्मों में सवाल उठाने की स्वतंत्रता नहीं है। यहाँ तक कि नास्तिक बनने की स्वतंत्रता भी नहीं है। उन्होंने बताया कि 13 इस्लामिक देश ऐसे हैं, जहाँ नास्तिकों को मार दिया जाता है। जबकि हिंदू धर्म में नास्तिक को भी अभिव्यक्ति की आजादी है।

हिंदुत्व को नीचा दिखाने के लिए इतिहास से खेल

इतिहासकार विक्रम संपत ने तरह-तरह के उदाहरण देकर समझाया कि कैसे देश में विभिन्न तरीकों से हिन्दुत्व का विरोध किया गया… जो मुगल काल से आजादी के बाद भी जारी रहा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब नए इतिहास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि फिल्मों में हिन्दुस्तान की बेटी-महिलाओं की नीलामी के दृश्य दिखाकर देश-विदेश में हमारी संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया गया।
‘भारत- भूत, वर्तमान और भविष्य’ विषय पर चर्चा करते हुए ओमेंद्र रत्नू ने कहा कि हिंदू समाज का गौरवशाली इतिहास रहा है। दूसरे धर्म के या कथित लिबरल इतिहासकारों ने लेकिन इसकी गलत जानकारी देकर भ्रमित किया।
इस पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए तुफैल चतुर्वेदी ने कहा कि दूसरे धर्म के लोग भारत में राज और कारोबार करने नहीं, बल्कि धर्म का प्रचार-प्रसार करने आए थे। उन्होंने यह भी बताया कि भारत की खोज करने वाले भी पादरी ही थे।

आतंक और जिहाद के साए में कश्मीरी हिंदू

‘धारा 370 हटाने के बाद 3 साल का मूल्यांकन’ – जयपुर डायलॉग फोरम में यह भी एक विषय था। इस पर अजय चुंगरू ने कहा कि कश्मीर से धारा 370 हटा दी गई लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने इसका सम्मान नहीं किया। भारत ने इसे विकास से जोड़ जरूर दिया बावजूद कश्मीरी सत्ता की सीढ़ी गिने-चुने मुस्लिमों तक सीमित करने के प्रयास होते रहे।
इसी विषय पर गुरु प्रकाश ने कहा कि 5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 और 35a हटाने से पहले कश्मीर में संवैधानिक फ्रॉड जारी था। सुशील पंडित ने इस मामले को आगे बढ़ाते हुए आरोप लगाया कि अब घाटी में पर्यटन के नाम पर जेहाद के लिए फंडिंग की जा रही है।

धर्मांतरण

इस मामले पर पत्रकार अंबर जैदी ने चिंता जताते हुए कहा कि कश्मीर और केरल में व्यापक स्तर पर धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। लड़कियों को सेक्स टॉय बनाकर देश के बाहर भेजा जा रहा है, लेकिन कोई कथित लिबरल उस पर सवाल खड़ा नहीं कर रहा है।
जय आहूजा ने कहा कि देश में मेवात एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ के ढाई सौ गाँव हिंदू-विहीन हो चुके हैं। जिस गाँव में मुस्लिम आबादी अधिक है, वहाँ भारतीय कानून के बजाय शरिया लागू हो चुका है। मुस्लिम-बहुल आबादी वाले क्षेत्रों की समस्या पर उन्होंने याद दिलाया कि धारा 370 हटाने पर भी कश्मीर के कानूनों में बदलाव नहीं आ पाया है।

लोकतंत्र के कमजोर होते खंभे

‘लोकतंत्र या वोट खरीद’ विषय पर चर्चा वाले सत्र में महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार भाऊ तोरसेकर ने कहा कि लोकलुभावन नारे, बातें, उपहार, शराब, नकदी आदि ने लोकतंत्र को चोट पहुँचाई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सत्ताधारी को जिम्मेदार बनाना होगा।
कपिल मिश्रा ने इस विषय पर चर्चा में कहा कि भारत दुनिया का सबसे सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था का देश है। लेकिन न्यायपालिका, मीडिया और ब्यूरोक्रेसी ने अपना धर्म नहीं निभाया और इस कारण से विधायिका पथभ्रष्ट हो गई।
ओमकार चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र में मुफ्त की बंदरबाँट पर राज्यों पर कई लाख करोड़ रुपए का कर्ज हो गया है। भारत दुनिया की पाँचवीं सशक्त अर्थव्यवस्था घोषित हुई है, लेकिन अभी इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए।

हिंदुओं का शोषण, मंदिरों पर नियंत्रण

आनंद रंगनाथन ने ‘जिसका साथ उसका विकास’ नारा देते कहा कि भारत में हिंदू 9वें नागरिक हैं। उन्होंने बताया कि जेएनयू में कहा जाता है कि भारत हिंदू राष्ट्र बन गया है जबकि सच्चाई यह है कि भारत में हिंदुओं का निरंतर शोषण हो रहा है। सरकार मंदिरों का नियंत्रण कर रही है। पंडित और पूजा के अधिकार बदल दिए गए हैं। यहाँ तक की दान-दक्षिणा भी सरकारी खजाने में जमा हो रही है। उनके अनुसार हिंदुओं की दुर्दशा का कारण अल्पसंख्यकों का ताकतवर होना नहीं बल्कि बहुसंख्यकों का लगातार कमजोर होना है।
इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु जैन ने कहा कि समाज की संस्कृति निरंतर प्रदूषित हो रही है। यौन हिंसा बढ़ रही है। सनातन संस्कृति को मजबूत करने से ही देश फिर विश्व गुरु बनेगा।
पंडित सतीश शर्मा ने कहा कि हिंदू विरोधी तंत्र को तोड़ने के लिए अभिमन्यु की बजाए अर्जुन बनना होगा। धार्मिक मामले और न्यायपालिका पर बात करते हुए पत्रकार आर जगन्नाथन ने कहा कि धर्म और आस्था के मामलों में अदालत को निजी राय नहीं देनी चाहिए।
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