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क्या भारत का विपक्ष इंटरनेशनल भिखारी है? CAA विरोधी प्रदर्शन में हिंसा भड़काने के लिए NewsClick ने चीन के पैसे का किया इस्तेमाल, अमेरिका के रास्ते तीस्ता सीतलवाड़ को मिला पैसा: रिपोर्ट

न्यूजक्लिक के तीस्ता सीतलवाड़ और नेविल रॉय सिंघम के संबंधों पर चार्जशीट में बड़ा खुलासा
70 के दशक में निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर की बहु-चर्चित फिल्म "आंखें" में महमूद पर फिल्माया बहु-चर्चित गीत "दे दे अल्लाह के नाम पर, इंटरनेशनल भिखारी आये हैं..." हमारे दिशाहीन विपक्ष की क्या ऐसी स्थिति हो गयी है? भारत में जब कभी सरकार के विरोध में शाहीन बाग बनते हैं, जनता भी केंद्र सरकार के विरुद्ध चर्चा करने लगते हैं, लेकिन जब उनकी जाँच में विदेशी धन का खेल सामने आता है, उसे देख सोंचने को विवश होना पड़ता है कि क्या जिन्हे जनहितैषी नेता मानकर वोट देते हैं, मालूम पड़ता है कि वह नेता नहीं, सफेदपोशी भिखारी है। CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक विदेशी धन का खुलासा हुआ। जिस तरह भिखारी का काम सिर्फ भीख मांगना और उससे आगे भिखारी कुछ सोंचता ही नहीं, वही हालत हमारे नेताओं की हो गयी है। विदेशों में बैठे मोदी विरोधी तो इन नेताओं को फंडिंग कर रहे हैं, ऊपर से George Soros भी आ गया जो 1000 करोड़ रूपए खर्च कर रहा है। 

अगर जनहित में काम करने की बजाए विदेशी भीख पर काम करने वाले नेता और उनकी पार्टियां क्या इन हरकतों से देश का नाम रोशन कर रहे हैं? जिस खालिस्तान के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की जान गई, वही खालिस्तान किसान आंदोलन में नज़र आया, और कांग्रेस समेत सारा विपक्ष उस आंदोलन अपना-अपना समर्थन देता नज़र आया, क्यों? लाल किला पर चढाई कर दी, इस विपक्ष को तब भी शर्म नहीं आयी। अगर इन नेताओं और पार्टियों में देशप्रेम भावना होती, तुरंत इस आंदोलन का बहिष्कार कर केंद्र के साथ खडा होना चाहिए था, लग गया मालपुए खाने। क्या ऐसे नेता और पार्टियां एक भी वोट की हक़दार हैं? 

न्यूज़क्लिक केस में बड़ा खुलासा हुआ है। न्यूजक्लिक के साथ काम करने वाले लोगों ने जाँच के दौरान चौंकाने वाले बयान दर्ज कराए हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट में इन गवाहों के बयान को रखा गया है, जिसमें बताया गया है कि न्यूजक्लिक ने CAA विरोधी हिंसा के दौरान मुस्लिमों को हिंसा और दंगों में शामिल होने के लिए उकसाने के लिए उन्हें ‘आदेश’ दिया था। इसके लिए उन्हें सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों तक पैसे पहुँचाने के लिए भारी मात्रा में नकदी दी गई थी।

इन गवाहों ने बताया है कि दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों में इस्तेमाल किए गए हथियारों को खरीदने के लिए न्यूजक्लिक के माध्यम से चीनी पैसों का इस्तेमाल किया गया। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में आतंकवादियों को भी पैसे पहुँचाए गए थे।

इन गवाहों की पहचान छिपाई गई है। ये गवाह न्यूजक्लिक में काम करते थे। यूएपीए की धारा 41 के तहत इनकी पहचान को छिपाते हुए दिल्ली पुलिस ने इनके बयानों को चार्जशीट के माध्यम से कोर्ट में पेश किया है। इन गवाहों ने बताया है कि उन्हें धर्म विशेष (हिंदुओं) के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए सीएए विरोधी और शाहीन बाग के प्रदर्शनों में भेजा गया था। इसके लिए न्यूजक्लिक ने अपने कर्मचारियों को पैसे देकर बाँटने के लिए कहा, ताकि अराजकता और हिंसा को भड़काया जा सके।

इस दौरान कई वॉट्सऐप ग्रुपों का इस्लेमात किया गया, खासतौर पर 2 ग्रुपों के बारे में बताया गया है, जिसमें एक ग्रुप का इस्तेमाल CAA विरोधी प्रदर्शनों, किसानों के प्रदर्शनों और शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया गया। दूसरा ग्रुप कश्मीर में हिंसा और तनाव भड़काने में लगा था। ये लोग न्यूजक्लिक में पत्रकार के रूप में काम कर रहे थे और न्यूजक्लिक का एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे। इन्हीं लोगं ने संवेदनशाली कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नक्शों में छेड़छाड़ भी की थी।

जिन लोगों तक पैसे पहुँचाए गए, उसमें से एक नाम शरजील इमाम का है। वो सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा का मुख्य आरोपित है। उसने प्रबीर पुरकायस्थ से पैसे लिए और अपने नापाक एजेंडे को आगे बढ़ाता रहा। इस चार्जशीट में सभी गवाहों के बायन दर्ज हैं और उन्हें दिल्ली पुलिस कोर्ट में पेश कर चुकी है।

नेविल रॉय सिंघम से मिला पैसा तीस्ता सीतलवाड तक पहुँचाया

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, न्यूजक्लिक को विदेश से आए पैसों को तीस्ता सीतलवाड़ तक पहुँचाए गए। चार्जशीट में पुलिस ने बताया है कि अमेरिका से मिले पैसों को तीस्ता सीतलवाड़ के पोर्टल ‘सबरंग इंडिया’ को नया जीवन देने में किया गया। चार्जशीट के मुताबिक, ‘न्यूज सिंडिकेशन स्कैम’ के माध्यम से आर्टिकल लेखकों और स्तंभकारों को न्यूजक्लिक से मिले पैसे दिए गए और इन लेखों का इस्तेमाल सबरंग इंडिया पर प्रकाशित करने के लिए किया गया।
खास बात ये है इन आर्टिकल्स को सबरंग इंडिया पर प्रकाशित करते समय इन्हें ‘सबरंग इंडिया’ द्वारा लिखा दिखाया गया, और असली लेखकों के नाम छिपा लिए गए। चार्जशीट के मुताबिक, इससे तीस्ता सीतलवाड़ को करीब 3 लाख, 1 करोड़ से ज्यादा रुपए उनके कर्मचारियों के लिए और 39 लाख रुपए उनके परिवार के निजी खर्च के लिए मिले।
दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में बताया है कि जाँच एजेंसियों के रडार पर होने के बावजूद तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा दागी विदेशी धन पाने का यह “सबसे सुविधाजनक तरीका” था। पुलिस ने कहा कि ई-मेल, गवाहों की जाँच, वित्तीय उकसावे और संरक्षित गवाहों की गवाही के विश्लेषण से यह स्थापित हुआ कि तीस्ता सीतलवाड, प्रबीर पुरकायस्थ और नेविल रॉय सिंघम एक “खास तिकड़ी” का हिस्सा थे। बता दें कि नेविल रॉय सिंघम न्यूजक्लिक के संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ का लंबा समय से साथी है और एक अमेरिकी करोड़पति है। उसका जुड़ाव चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से है और वो चीनी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए प्रबीर पुरकायस्थ और न्यूजक्लिक के माध्यम से भारत के अंदर काम कर रहा था।
चार्जशीट के मुताबिक, तीनों लोग (प्रबीर पुरकायस्थ, तीस्ता सीतलवाड़ और नेविल रॉय सिंघम) एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुए साथ में काम कर रहे थे। इसमें नेविल रॉय सिंघम की ओर से पैसा आता और सभी लोग मिलकर लेफ्ट विंग अतिवाद (LWE) एजेंडे को आगे बढ़ा रहे थे। पुलिस के मुताबिक, तीस्ता सीतलवाड़ और नेविल रॉय सिंघम के बीच ई-मेल्स का जो आदान प्रदान हुआ, उसमें इस बात का खुलासा हुआ है कि नेविल रॉय सिंघम ने तीस्वा सीतलवाड़ के पोर्टल सबरंग इंडिया और तीस्ता के एनजीओ सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) को प्रबीर पुरकायस्थ के माध्यम से फंडिंग दी।
चार्जशीट के मुताबिक, इस मामले की जाँच के लिए 13 दिसंबर 2023 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की टीम ने मुंबई जाकर जाँच की और तीस्ता सीतलवाड़ और उसके शौहर जावेद आनंद को नोटिस भी थमाया था। जावेद आनंद सबरंग इंडिया का सह-संपादक भी है। स्पेशल सेल ने इन लेन-देन की जानकारी भी माँगी। स्पेशल सेल ने सबरंग इंडिया और न्यूजक्लिक के फाउंडर-एडिटर के बीच मैनपॉवर शेयरिंग, सैलरी डिटेल्स और आर्टिकल/वीडियो के प्रोडक्शन को लेकर साइन हुए एग्रीमेंट की भी जाँच की।
न्यूजक्लिक पर चीनी माध्यम से 80 करोड़ प्राप्त करने के आरोप हैं। एफआईआर में इस बात का जिक्र है कि न्यूजक्लिक ने भारत की संप्रभुता पर चोट करने और देश में नफरत का माहौल तैयार करने के लिए चीनी संगठनों से पैसे लिए। कुछ दिन पहले ही दिल्ली की कोर्ट ने प्रबीर पुरकायस्थ की 10 दिनों की कस्टडी बढ़ा दी थी। बता दें कि इस मामले में अमित चक्रवर्ती, जिसे प्रबीर के साथ ही गिरफ्तार किया गया था, वो अब सरकारी गवाह बन चुका है।
दिल्ली पुलिस ने पिछले साल 3 अक्टूबर को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत न्यूज़क्लिक के संस्थापक और संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया था। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने न्यूजक्लिक के दफ्तर को छापेमारी के बाद सील कर दिया गया था। पुलिस ने बताया कि अक्टूबर 2023 में दिल्ली और सात अन्य राज्यों में 88 स्थानों पर छापे मारे गए, जिसमें एफआईआर में शामिल व्यक्तियों के साथ-साथ डेटा विश्लेषण के दौरान सामने आए लोगों को भी निशाना बनाया गया। इसके अलावा, प्रबीर पुरकायस्थ पर 2019 के लोकसभा चुनावों में तोड़फोड़ करने की साजिश रचने और पीपुल्स अलायंस फॉर डेमोक्रेसी एंड सेक्युलरिज्म (पीएडीएस) के साथ सहयोग करने का आरोप है।

‘न्यूज़क्लिक’ को चीन की फंडिंग का मामला : मुंबई में तीस्ता सीतलवाड़ के ठिकाने पर छापा, सीताराम येचुरी के घर भी पहुँची दिल्ली पुलिस

न्यूज क्लिक मामले में तीस्ता सीतलवाड़ और सीताराम येचुरी के घर पर छापे (फोटो साभार: सीताराम येचुरी फेसबुक अकाउंट/ पेन इंटरनेशनल वेबसाइट )
न्यूज क्लिक (Newsclick) मामले में दिल्ली पुलिस ने सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी तो मुंबई पुलिस ने प्रोपेगेंडा एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के घर की भी तलाशी ली। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मंगलवार (3 अक्टूबर 2023 ) को डिजिटल न्यूज वेबसाइट न्यूज़क्लिक और मीडिया कंपनी से जुड़े पत्रकारों के 30 ठिकानों पर छापेमारी की।

वेबसाइट की फंडिंग की जाँच के तहत ये छापेमारी शुरू की गई है। वेबसाइट के खिलाफ केस 17 अगस्त को दर्ज किया गया था। केस गैरकानूनी गतिविधियांँ (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधानों के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 120 बी (आपराधिक साजिश के लिए सजा) के तहत दर्ज किया गया।

इससे पहले दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने भी केस दर्ज किया था। इसके साथ ही ईडी ने भी कार्रवाई की थी। हाई कोर्ट ने उस वक्त न्यूज क्लिक के प्रमोटरों को गिरफ्तारी से राहत दे दी थी।

दिल्ली में न्यूज़क्लिक के कार्यालय में तलाशी के साथ ही तीस्ता सीतलवाड के मुंबई आवास पर भी तलाशी ली जा रही है। सीतलवाड थिंक टैंक ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक हैं। वो भी न्यूज़क्लिक में आर्टिकल लिखती रही हैं।

उधर दूसरी तरफ दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद में न्यूज़क्लिक वेबसाइट से जुड़े कुछ पत्रकारों के घरों पर दिल्ली पुलिस की छापेमारी सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी के घर भी हुई। इस बारे में येचुरी ने खुद मीडिया को जानकारी दी है।

सीपीआई (एम) के महासचिव येचुरी ने कहा, “पुलिस मेरे घर पर आई थी, क्योंकि मेरा एक साथी जो मेरे साथ वहाँ रहता है, उसका बेटा न्यूज़क्लिक के लिए काम करता है। पुलिस उससे पूछताछ करने आई थी।”

उन्होंने आगे कहा, पुलिस ने उनका लैपटॉप और फोन ले लिया। वे क्या जाँच कर रहे हैं, कोई नहीं जानता। अगर यह मीडिया को दबाने की कोशिश है, तो देश को इसके पीछे की वजह पता होना चाहिए।”

न्यूज़क्लिक से जुड़े कई लोगों जिनमें वेबसाइट के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ, पत्रकार अभिसार शर्मा, औनिंद्यो चक्रवर्ती और भाषा सिंह, साथ ही व्यंग्यकार संजय राजौरा के घर पर कथित तौर पर पुलिस ने छापेमारी की है। अभिसार शर्मा ने अपने एक्स हैंडल से पोस्ट कर इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि पुलिस उनके फोन और लैपटॉप जब्त कर रही है। इसी तरह भाषा सिंह ने बताया कि पुलिस ने उनका फोन जब्त कर लिया है।

गुजरात दंगा : 5 झूठ जो नरेंद्र मोदी और हिन्दुओं को फँसाने के लिए फैलाए गए

                                  गोधरा में जिंदा जला दिए गए थे 59 हिन्दू (फोटो साभार: एशियन एज)
सुप्रीम कोर्ट ने 24 जून, 2022 को बड़ा फैसला लेते हुए 2002 के गुजरात दंगों में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एसआईटी के द्वारा दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखा। कोर्ट ने ये फैसला 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में हिंसा के दौरान मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया। इस याचिका में मामले की जाँच के लिए गठित एसआईटी द्वारा पीएम मोदी और 62 अन्य को क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को ही अयोग्य करार दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने गुजरात दंगों में साजिश के आरोपों को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के साथ ही गोधरा में ट्रेन जलाए जाने और उसके बाद भड़के दंगे की आँच में सियासी रोटियाँ सेंकने की कोशिश करने वालों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। याचिका दायर करने वालों का आरोप था कि गुजरात के तत्कालीन सीएम रहे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया था।

गोधरा के दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही पीएम मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। हालाँकि, उनके विरोधी काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे में इन दुष्प्रचारों को खारिज करना भी जरूरी था। फिर भी गोधरा ट्रेन जलने की घटना और उसके बाद हुए दंगों के बारे में गलत सूचनाओं, अफवाहों, और फर्जी खबरों से अपने करियर को गढ़ने की कोशिश करने वाले दुष्प्रचारकों के उन मिथकों का जिक्र भी जरूरी है। इसी तरह से यहाँ ऐसे कई मिथक हैं, जो कि गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में महिलाओं और बच्चों सहित 59 हिंदुओं को जिंदा जलाने की घटना के बाद पैदा हुए। 

अपनी कुर्सी की खातिर और मोदी विरोध में इन छद्दम धर्म-निरपेक्षो और गंगा-जमुनी तहजीब के नारे लगा आतंकवादियों और जेहादियों को बचाने के लिए हिन्दुओं और हिन्दुत्व को भी कलंकित करने का कोई मौका नहीं गंवाया। दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के लिए कपिल मिश्रा और केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को आरोपित बता दिया, लेकिन किसी मीडिया, छद्दम धर्म-निरपेक्ष पार्टी और गंगा-जमुनी तहजीब नारों से हिन्दुओं को भ्रमित करने वालों ने CAA विरोध में लग रहे मोदी और हिन्दू विरोधी नारों को नज़रअंदाज कर जनता को गुमराह करते रहते हैं। बेशर्म जयचन्दी हिन्दू मुंह में दही जमाकर इन कट्टरपंथियों का साथ देते रहे। ठीक यही स्थिति गुजरात दंगों की थी। गुजरात दंगों पर झूठ बोल-बोलकर हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत के बीज बोते रहे।  देखिए वो 5 झूठ:-

गर्भवती कौसर बानो का बलात्कार और पेट से भ्रूण बाहर निकालना

गुजरात दंगों के बाद कई लेफ्ट लिबरल मीडिया ने बड़े पैमाने पर ये खबर फैलाई कि एक गर्भवती मुस्लिम महिला का हिन्दुओं की भीड़ ने पहले बलात्कार किया और फिर तलवार से उसके पेट को फाड़कर उसके भ्रूण को बाहर निकाल लिया और उसे आग में फेंक दिया।
कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि वो कौसर बानो की भाभी सायरा बानो थी। सायरा बानो ने दावा किया, “उन्होंने मेरी भाभी की बहन कौसर बानो के साथ जो किया वह भयानक और जघन्य था। वह नौ माह की गर्भवती थी। उन्होंने उसका पेट काट दिया, उसके भ्रूण को तलवार से निकाल लिया और उसे धधकती आग में फेंक दिया। फिर उन्होंने उसे भी जला दिया।” कई कहानियाँ ऐसी भी हैं कि भ्रूण को तलवार से मार दिया गया था, जबकि कुछ में भ्रूण को तलवार की नोक पर घुमाया गया और फिर आग में फेंक दिया गया।
साल 2010 में आई एक रिपोर्ट में कौसर का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने भ्रूण को बरकरार पाया। 2 मार्च 2002 को शव परीक्षण करने वाले डॉ जे एस कनोरिया ने विशेष अदालत में सहायक दस्तावेज पेश किए और कहा कि महिला के गर्भ में भ्रूण बरकरार था। भ्रूण का वजन 2500 ग्राम और लंबाई 45 सेमी थी।
इसके अलावा पोस्टमार्टम व गवाहों के जरिए ये भी पता चला कि कौसर बानो की मौत दम घुटने, डर और सदमे से हुई थी और उसके शरीर पर किसी भी तरह की बाहरी या अंदरूनी चोट का कोई निशान नहीं था। उसके शरीर पर किसी तलवार का निशान भी नहीं था। ये पोस्टमार्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था। दंगों के दौरान कनोरिया दौरान सरकारी सिविल अस्पताल में कार्यरत थे और उन्होंने बयान दिया था कि पोस्टमॉर्टम के बाद कौसर बानो के भ्रूण को हटा दिया गया था। पोस्टमॉर्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था।

चूल्हे से साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग

लिबरल्स हमेशा एक और मिथक फैलाते हैं, जिसमें दावे किए जाते हैं कि ‘आकस्मिक आग’ के कारण साबरमती एक्सप्रेस में आग लगी। हालाँकि, 27 फरवरी 2002 की गोधरा ट्रेन जलने की घटना की जाँच के लिए गुजरात सरकार द्वारा नियुक्त जाँच आयोग ‘नानावती-मेहता आयोग‘ ने इस दावे का खंडन किया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, “गवाह ने इस बात से इनकार किया है कि कोच में एक बर्तन में ज्वलनशील तरल पदार्थ गिरने से कोच में ऐसी आग लग सकती थी। गवाह ने अपने कार्यालय द्वारा उस कोच की जाँच के समय ली गई तस्वीरों को पेश किया था।”
इसके अलावा गोधरा के दंगों के बाद एफएसएल में वैज्ञानिक मुकेश जोशी 2002 में तीन बार गोधरा गए थे। उन्होंने देखा था, “कोच एस/6 के बाहरी हिस्से पर पत्थरों से टकराने के कारण उसके निशान पड़े हुए हैं। कोच एस/6 और एस/7 के बाहरी हिस्से में भी जलने के निशान थे।”
नानावटी-मेहता आयोग ने घटना के विभिन्न प्रत्यक्षदर्शियों से भी बात की थी। इसमें कईयों ने बताया कि जैसे ही ट्रेन चली भीड़ ने डिब्बे के बाईं ओर से पथराव शुरू कर दिया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था, “सज्जनलाल रानीवाल ने कहा है कि जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म से बाहर निकली, बाईं ओर खड़ी भीड़ ने उस पर पथराव करना शुरू कर दिया। इसके चलते उन्हें उनके डिब्बे की खिड़कियों के दरवाजे और शटर बंद करने के लिए कहा गया था। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो सज्जनलाल के ऐसा कहने का और कोई कारण नहीं होता। वो तब तक खिड़कियाँ तब तक बंद नहीं करते, जब तक कि उसे ऐसा करने के लिए मजबूर न किया गया हो।”
आयोग ने आगे कहा, “यात्रियों ने यह भी कहा है कि चूँकि ट्रेन के बाईं ओर के लोगों ने ट्रेन पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था, इसलिए उन्हें अपने कोच की खिड़कियाँ बंद करने की जरूरत थी। कुछ गवाहों के मुताबिक, ट्रेन पर फेंके गए पत्थरों के कारण एक या दो खिड़कियों के शीशे भी टूटे थे। इसी कारण कोच में यात्रियों को उस तरफ की खिड़कियों के टिन/धातु के शटर बंद करने जरूरत थी। हरिप्रसाद ने कहा था कि जिस समय ट्रेन स्टेशन से बाहर निकली, उसी समय से ट्रेन पर पथराव शुरू हो गया था और इस वजह से यात्रियों ने अपने कोच की खिड़कियाँ बंद कर दी थीं। उनके साक्ष्य पर संदेह का कोई कारण नहीं है।”

शॉर्ट सर्किट से ट्रेन में आग

साबरमती एक्सप्रेस में आग को लेकर मुकुल सिन्हा के जन संघर्ष मंच ने एक और शिगूफा छोड़ा था, जिसमें साजिश की थ्योरी को ‘शॉर्ट सर्किट’ करार दिया गया था। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग का यह कहना था, “शॉर्ट सर्किट जन संघर्ष मंच द्वारा प्रचारित एक और संभावना है। कोच में शॉर्ट सर्किट होने की संभावना को दर्शाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है और आयोग के समक्ष कोई सामग्री पेश नहीं की गई है। इस संभावना के समर्थन में कारण यह बताया गया है कि पहले कोच में धुआँ था और कुछ देर बाद आग की लपटें दिखाई दीं। आयोग की जाँच में कोच एस/6 के एक भी यात्री से यह नहीं पूछा गया कि क्या कोच में शॉर्ट-सर्किट जैसा कुछ हुआ है।”
इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा निरीक्षण के दौरान पक्षकारों की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की उपस्थिति में यह देखा गया कि बिजली के तार कोच के ऊपरी हिस्सों में थे। अगर शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लगती तो उस जगह बैठे यात्रियों को सबसे पहले इसका पता चलता। ऐसे में नीचे की बैठे यात्री खुद को बचाने के लिए ऊपर की बर्थ पर नहीं चढ़ते। उल्टे जो लोग ऊपर की बर्थ पर बैठे थे, वे फौरन नीचे आ जाते। यात्रियों ने तुरंत चारों दरवाजों से कोच छोड़ दिया होता और इतने लोगों की जान नहीं जाती।”
दुष्प्रचार फैलाने वाले जहाँ इसे आकस्मिक आग की घटना बताते हैं। वहीं जस्टिस नानावती-मेहता समिति की रिपोर्ट (पीडीएफ) ने स्पष्ट किया है कि गोधरा में किस साजिश के कारण 59 हिन्दुओं की मौत हुई। गोधरा रेलवे स्टेशन के ठीक बाद, ‘सिग्नल फलिया’ नामक एक सड़क और एक इलाका है। रिपोर्ट के मुताबिक, “यह पुलिया तक फैली हुई है और आगे ए केबिन की ओर जाती है। यह मुख्य रूप से घाँची मुस्लिमों का इलाका है।” यहाँ जब भी कोई ट्रेन आती, तो बहुत सारे अनधिकृत विक्रेता, मुख्य रूप से घाँची मुस्लिम प्लेटफॉर्म नाश्ता, कोल्ड ड्रिंक, बीड़ी आदि बेचते थे।
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ट्रेन सुबह 7: 43 बजे प्लेटफॉर्म पर करीब पाँच घंटे की देरी से पहुँची। वहाँ पर इसका केवल 5 मिनट स्टॉप था। सबूतों वाले हिस्से में रिपोर्ट में नरसंहार के एक दिन बाद 28 फरवरी 2002 की मीडिया रिपोर्टों का हवाला है। इसमें मुख्यधारा के मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि एक भीड़ ने हिंदुओं को आग लगा दी थी। उन्होंने उल्लेख किया कि हिंदू कारसेवा से लौट रहे थे और भीड़ ने ट्रेन के डिब्बों में पेट्रोल डालकर आग लगा दी।
सिग्नल फलिया पर ट्रेन के रोके जाने को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने उल्लेख किया था कि सिग्नल फलिया पर किसी ने चेन खींची थी। ट्रेन के रुकते ही कोच एस 6 और एस 7 पर पथराव से इसकी खिड़कियाँ टूट गईं। इसके बाद पेट्रोल बम अंदर फेंक दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने भी चश्मदीद गवाहों के बयान दिए कि कैसे भीड़ ने पथराव के बाद कोच को आग लगा दी थी।

कारसेवकों उकसाने वाली मुस्लिम लड़की किडनैप करने की कोशिश

गुजरात दंगों पर चौथी काल्पनिक कहानी एक ‘हाथापाई’ नैरेटिव गढ़ा गया कि ‘कारसेवकों’ ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग ने इस परिकल्पना को खारिज करते हुए कहा कि कारसेवकों द्वारा एक मुस्लिम लड़की का अपहरण वास्तविकता से परे था। आयोग ने कहा, “इन सभी गवाहों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्रियों के साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि ट्रेन में भीड़भाड़ और ट्रेन के अंदर और बीच के स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर कभी-कभार नारे लगाने के अलावा, रामसेवकों ने कुछ नहीं किया था और पहले कोई घटना नहीं हुई थी।”
आयोग के मुताबिक, हाथापाई के बाद मुस्लिम महिला के अपहरण के ‘प्रयास’ सही नहीं लगता। रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर वे वास्तव में वडोदरा जाने के लिए स्टेशन गए होते, तो वे साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हो जाते, क्योंकि यह उन्हें पहले वडोदरा ले जाती, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उनका अपहरण करने का कथित प्रयास उस समय किया गया, जब वे बुक स्टॉल के पास थे। इसका मतलब यह होगा कि वे लगभग प्लेटफॉर्म के ढके हुए हिस्से के बीच में थे और वे रेलवे ऑफिसों के काफी करीब थे।”
मुस्लिम महिला की गवाही को खारिज करते हुए आयोग कहता है, “सबूत बताते हैं कि स्टेशन पर कई लोग थे। वहाँ यात्रियों के अलावा कई मुस्लिम वेंडर भी थे। रेलवे कर्मचारी अपने कार्यालयों में मौजूद रहे। कुछ पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। अगर वो अपने बचाव में चिल्लाई होती तो वो लोग तो जरूर सुनते जो उसके आसपास थे। लेकिन कोई भी उसके पक्ष का समर्थन करने के लिए आगे नहीं आया।”
आयोग की रिपोर्ट कहती है, “उसके (मुस्लिम महिला) सबूतों के अनुसार, वो बुकिंग क्लर्क के ऑफिस में गई, वहाँ क्या हुआ इसकी जानकारी उन्होंने किसी को नहीं दी। उस ऑफिस के अंदर उनके पास किसी भी चीज से डरने का कोई कारण नहीं था। बावजूद इसके मेमू ट्रेन का इंतजार करने की बजाय वो तुरंत संबंधियों के पास लौट आई। उनका यह स्पष्टीकरण कि वह बहुत डरी हुई थीं और उन्हें चक्कर आ रहा था और इसलिए उन्होंने उस दिन वडोदरा वापस नहीं जाने का फैसला किया था, सच नहीं लगता।”

दागी आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और नरेंद्र मोदी की मुलाकात

लिबरल मीडिया अक्सर एक और शिगूफा छोड़ता रहा है। वो ये कि पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने 27 फरवरी 2022 को सीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके घर पर मुलाकात की थी। इस बैठक में विशेष रूप से पीएम मोदी को गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के मद्देनजर नरसंहार में शामिल होने के लिए फंसाने के लिए विशेष रूप से प्रकाश डाला गया था।
हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग के मुताबिक, हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने झूठ बोला था कि वो 27 फरवरी 2022 को नरेंद्र मोदी से मिला था। मोदी विरोधी लॉबी का फेस बने भट्ट ने 2011 में आरोप लगाया कि 2002 के गोधरा दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 फरवरी 2002 को अपने आवास पर एक बैठक बुलाई थी, ताकि हिन्दुओं को मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने दिया जाए, जिससे राज्य में गोधरा जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।
भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए एक हलफनामे में दावा किया था कि यह बैठक साबरमती एक्सप्रेस जलने की घटना के बाद हुई थी, जिसमें 59 अयोध्या कारसेवक मारे गए थे। उस कथित बैठक के समय भट्ट स्टेट इंटेलीजेंस के डिप्टी कमिश्नर थे। उन्होंने हलफनामे में आगे कहा कि बैठक में आठ शीर्ष पुलिस अधिकारी भी शामिल हुए थे। भट्ट ने यह भी आरोप लगाया कि दंगों की जाँच के लिए गठित एसआईटी गुजरात सरकार को बचाने की कोशिश कर रही है।
जबकि, नानावती-मेहता आयोग भट्ट के दावों का खंडन करता है। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने (संजीव भट्ट) बैठक में अपनी उपस्थिति को साबित करने के लिए झूठे दस्तावेज़, एक फैक्स संदेश का इस्तेमाल किया। जस्टिस जीटी नानावती और अक्षय मेहता की रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में कहा गया है, “सबूतों पर विचार करने पर यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि 27 फरवरी 2002 को सीएम आवास पर हुई बैठक को लेकर भट्ट झूठ बोल रहे हैं। बैठक में उपस्थित होने के उनके द्वारा किए गए दावे झूठे प्रतीत होते हैं।”
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गुजरात दंगा मामला : झूठे साक्ष्य गढ़े : तीस्ता सीतलवाड़ के साथ-साथ आर बी श्रीकुमार और संजीव भट्ट पर
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गुजरात दंगा मामला : झूठे साक्ष्य गढ़े : तीस्ता सीतलवाड़ के साथ-साथ आर बी श्रीकुमार और संजीव भट्ट पर
रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्यमंत्री मोदी के बयानों के बारे में भट्ट के दावे उनके द्वारा बनाई गई एक कहानी थी। आयोग ने कहा कि फैक्स संदेश की प्रति, जिसका उपयोग कर भट्ट ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक का दावा किया था, वास्तव में पीपी उपाध्याय द्वारा 2 मार्च 2002 को भेजी गई थी। ये पांडर्व पंचमहल की घटना को लेकर था।

गुजरात दंगा मामला : झूठे साक्ष्य गढ़े : तीस्ता सीतलवाड़ के साथ-साथ आर बी श्रीकुमार और संजीव भट्ट पर भी FIR

                          आरबी श्रीकुमार, तीस्ता सीतलवाड़ और संजीव भट्ट के विरुद्ध गुजरात ATS ने दर्ज किया केस
गुजरात पुलिस ने रिटायर्ड IPS आरबी श्रीकुमार, संजीव भट्ट और NGO संचालक तीस्ता सीतलवाड़ के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। क्राइम ब्रांच के पुलिस इंस्पेक्टर ने ये मामला दर्ज कराया है। मुंबई के जुहू तारा रोड स्थित निरन्त में रहने वाली तीस्ता सीतलवाड़, गाँधीनगर के सेक्टर-8 स्थित श्री लक्ष्मीदीपम में रहने वाले आरबी श्रीकुमार और अहमदाबाद के सुशील नगर सोसाइटी में रहने वाले संजीव भट्ट का नाम इस FIR में है।
संजीव भट्ट फ़िलहाल पालनपुर जिला जेल में कैद हैं। राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए दर्ज इस FIR में 24 जून, 2022 को आए सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “मामले के अंत में हमें यह प्रतीत होता है कि गुजरात राज्य के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ मिल कर कुछ लोगों ने सनसनी पैदा करने के संयुक्त प्रयास किए, जिसके तहत ऐसे ‘खुलासे’ किए गए, जिनकी असत्यता का उन्हें खुद भी भान था।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन लोगों ने खुलासे की एक बृहद जाँच के बाद SIT ने पोल खोल दी। गुजरात दंगों में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी को चेहरा बना कर एक पूरा का पूरा गिरोह पिछले 2 दशक से इस मामले को हवा देने में लगा हुआ था। मुद्दे को गर्म रखने के लिए इन लोगों ने जानबूझ कर कुटिल चाल चली, जिससे इनकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं – ऐसा कहते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने ऐसा करने वाले लोगों को जाँच के बाद न्याय के दायरे में लाने की सलाह दी।

                                         सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद गुजरात ATS ने दर्ज किया मामला

गुजरात दंगों को लेकर अफवाह फैलाने और झूठे खुलासे करने वाले इन तीनों के खिलाफ IPC की धारा-478, 471 (लोगों को भड़काने के लिए इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों का कपटपूर्ण इस्तेमाल), 194 (किसी को दोषी साबित करने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ना), 211 (किसी निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की मंशा से झूठे आरोप लगाना), 218 (लोक सेवकों द्वारा रिकार्ड्स को गलत तरीके से फ्रेम करना) और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया है।

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तीस्ता सीतलवाड़ को ATS ने घर से उठाया : SC ने कहा - इनके खिलाफ होनी चाहिए जाँच

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तीस्ता सीतलवाड़ को ATS ने घर से उठाया : SC ने कहा - इनके खिलाफ होनी चाहिए जाँच

तीस्ता सीतलवाड़ और आरबी श्रीकुमार को आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया है। गुजरात पुलिस ने FIR में घटनाक्रम का विवरण देते हुए बताया है कि दंगों में कैसे पुलिस ने कानून सम्मत कार्रवाई और जाँच की। तीस्ता सीतलवाड़ को अब मुंबई से अहमदाबाद ले जाया जाएगा। सांताक्रुज पुलिस थाने में इसके लिए ज़रूरी प्रक्रिया पूरी की गई। तीस्ता सीतलवाड़ खुद के सामाजिक कार्यकर्ता होने का दावा करती हैं।

तीस्ता सीतलवाड़ को ATS ने घर से उठाया : SC ने कहा - इनके खिलाफ होनी चाहिए जाँच

तीस्ता सीतलवाड़
2002 में साबरमती ट्रेन में 59 रामभक्तों को जिन्दा जलाने के बाद हुए गोधरा दंगे को नरेंद्र मोदी विरोधियों ने दंगे की असलियत को दरकिनार कर सोनिया गाँधी ने तो मोदी को "मौत का सौदागर" कह दिया था। मुसलमान भी मोदी को मुस्लिम विरोधी समझकर आज अपशब्द बोलते हैं, क्योकि दंगे की असली वजह जनता के सामने आने ही नहीं दी। 
गुजरात दंगों में तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद 25 जून 2022 गुजरात एटीएस टीम ने तीस्ता को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। उनके ऊपर दंगों के दौरान गुजरात की छवि खराब करने का आरोप है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, तीस्ता के खिलाफ यह कार्रवाई आईपीसी की धारा 498 के तहत दर्ज एफआईआर पर हुई। उन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गुजरात दंगों से जुड़े मामले में उनकी भूमिका पर और छानबीन की जरूरत है। अब 25 जून को गुजरात एटीएस की टीम उन्हें संता क्रूज पुलिस थाने लेकर गई है। वहाँ से उन्हें अहमदाबाद ले जाया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने भी फैसला पढ़कर तीस्ता का जिक्र किया था। अपने हाल में दिए इंटरव्यू में कहा था कि तीस्ता सीतलवाड़ की एनजीओ ने गुजरात दंगों में फर्जी जानकारी फैलाने का काम किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जाकिया जाफरी की याचिका को खारिज किया था। इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी ने जो पीएम मोदी समेत 55 नेताओं को क्लिन चिट दी थी उस पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने कहा था कि तीस्ता इस मामले में शुरू से घुसी रहीं और जाफरी की भावनाओं का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए किया।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ये भी कहा था कि जो लोग कानून से खिलवाड़ करते हैं उनके खिलाफ एक्शन लिया जाना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने तीस्ता का नाम भी लिया था।

तीस्ता को लेकर मालूम हो कि ये वही कथित सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिनके ऊपर आरोप था कि इन्होंने 2002 के दंगा पीड़ितों की मदद के लिए इन्होंने अपने एनजीओ के जरिए पैसा इकट्ठा किया। लेकिन बाद में अपनी सुविधाओं और खर्चे की पूर्ति के लिए उसका इस्तेमाल कर लिया। ये आरोप उस दौरान प्रकाश में आया था, जब गुलबर्ग हाउसिंग सोसायटी के एक निवासी ने इस मामले में शिकायत की थी।