Showing posts with label #HISTORY. Show all posts
Showing posts with label #HISTORY. Show all posts

राहुल गाँधी जवाब दो : ‘मैं एक महान दिवंगत आत्मा की माँ हूँ’: अब्दुल्ला के मित्र नेहरू ने बलिदानी मुखर्जी की माँ की क्यों माँग ठुकराई

आज जिसे देखो बेशर्मों और बेगैरतों की तरह कहता फिरता है कि नेहरू का नाम लिए बिना सत्ता पक्ष रह नहीं सकता। कांग्रेस की वकालत करने वाले बेशर्म हिन्दुओं आंखें खोलो और अपने आका कांग्रेसी नेताओं से पूछो क्यों हिन्दू ही नहीं देशहित में काम करने वालों की रहस्यमयी मौतें हुई? आज जब मन किया चल दिए कश्मीर मौज करने और माता वैष्णों माता मन्दिर। यह संभव हो पाया डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान से। नेहरू अब्दुल्लाह ने जम्मू कश्मीर जाने के परमिट सिस्टम लागु किया हुआ था। जिसे ख़त्म करवाने की खातिर कांग्रेस कैबिनेट मंत्री डॉ मुखर्जी को अपना बलिदान देना पड़ा था। हकीकत यह है कि इस कांग्रेस ने देश को ऐसे नासूर दिए हैं जिनका पता नहीं कितने सालों तक इलाज करना पड़ेगा। देश ने कई ऐसी पुण्य आत्माएं जैसे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आदि और भी हैं, जिनकी मौत की गुथ्थी आज तक रहस्यमयी बनी हुई हैं।  

एक बात और, महात्मा गाँधी की हत्या के लिए नाथूराम गोडसे को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पूछो इन कांग्रेसियों से (डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के अनुसार) गाँधी 40 मिनट तक जीवित थे क्यों नहीं उन्हें निकटतम हॉस्पिटल कलावती या विलिंग्डन(वर्तमान डॉ राम मनोहर लोहिया) ले जाकर बचाया गया? यह भी एक रहस्यमयी मौत है। मजे की बात पोस्टमॉर्टेम डॉ मुखर्जी से लेकर गाँधी तक किसी का नहीं हुआ, क्यों? दूसरे, अगर गोडसे कसूरवार था तो फिर क्यों उनके बयानों को सार्वजानिक होने पर प्रतिबन्ध लगाया था? अगर गोडसे ने गाँधी को नहीं मारा होता अब तक भारत का एक और विभाजन यानि पाकिस्तान बन चूका होता। सच्चाई जानने के लिए नई सड़क दिल्ली में साहित्य सदन जाकर 150 बयानों की किताब खरीद कर पढ़ सकते हैं। 

 

जब किसी की मौत होती है तो पुलिस जाँच करती है। किसी की मौत के साथ जब जनभावनाएँ जुड़ी हों या जाँच से कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला हो तो स्वतंत्र एजेंसियों से जाँच की भी व्यवस्था है। लेकिन, जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की जाँच नहीं हो सकी।

जून 23, 2026 को जब उनकी मौत को 67 साल होने आए हैं, देश सवाल तो पूछेगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की स्वंतंत्र जाँच क्यों नहीं कराई?

जून 2019 में भाजपा अध्यक्ष (तब कार्यकारी) जेपी नड्डा ने कहा था कि वो जवाहरलाल नेहरू ही थे, जिन्होंने डॉ मुखर्जी की मृत्यु की जाँच कराने से इनकार कर दिया था। बकौल नड्डा, इतिहास साक्षी है कि नेहरू ने पूरे देश की माँग को ठुकरा दिया था। बता दें कि हिन्दू राष्ट्रवाद के पुरोधाओं में से एक डॉ मुखर्जी ने ही 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जो बाद में भाजपा रूप में परिवर्तित हुआ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माता श्रीमती जोगमाया ने भी पंडित नेहरू को एक भावपूर्ण पत्र लिखकर अपने पुत्र की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच की माँग की थी। लेकिन, एक माँ की माँग को भी नहीं माना गया। उनकी माँ जोगमाया ने नेहरू को भेजे पत्र में लिखा था कि वो एक महान दिवंगत आत्मा की माता हैं और ये माँग करती हैं कि स्वतंत्र व सक्षम व्यक्तियों द्वारा अविलम्ब एक पूर्णरूपेण निष्पक्ष और खुली जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने आगे नेहरू को चेताते हुए कहा था कि यह एक महान दुःखान्त घटना है, जो स्वतंत्र भारत में घटी है और भारत की जनता ज़रूर निर्णय करेगी कि इसका कारण क्या था और इस बारे में आपकी सरकार ने क्या भूमिका निभाई? उन्होंने लिखा था कि किसी भी बड़े से बड़े व्यक्ति ने ही ये कृत्य क्यों न किया हो, क़ानून उसे सज़ा दे। साथ ही जनता सावधान हो जाए ताकि किसी और माँ को स्वतंत्र भारत में इस तरह से आँसू न बहाना पड़े।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 50 के दशक की शुरुआत में ‘एक विधान, एक प्रधान, एक निशान’ आंदोलन शुरू किया था। जम्मू कश्मीर में तब ‘प्रधानमंत्री’ का पद होता था। संविधान, झंडा और दूसरे राज्यों के लोगों के वहाँ न बसने का नियम तो हालिया अनुच्छेद 370 के प्रावधान निरस्त होने तक मौजूद थे। डॉ मुखर्जी इसी भेदभाव को ख़त्म करने के पक्ष्धर थे, जो तब असंभव सा लगता था। मई 11, 1953 को जम्मू कश्मीर में घुसने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया था।

श्रीनगर के जेल में ही उनकी मृत्यु हुई, जिसकी वजह हार्ट अटैक को बताया गया। तब शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री थे, जो उनके शव पर माल्यार्पण करने भी आए थे। अब जब पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूत बन कर उभर रही है और वहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों के प्रभाव के बावजूद पहली बार कड़ी टक्कर होने जा रही है, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज एक बार फिर से भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो उठे हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस और वामपंथी कैडरों में इसकी छटपटाहट देखी जा सकती है क्योंकि मार्च 2018 में जिस तरह से कोलकाता में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के माओवादी समर्थक छात्रों ने डॉ मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ डाला, उससे वामपंथी दलों की बेचैनी प्रदर्शित होती है। उससे कुछ दिनों पहले ही त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद जनता द्वारा लेनिन की प्रतिमा गिराई गई थी। लेकिन, बंगाल में बंगाल के ही सपूत की प्रतिमा को भी वामपंथियों ने नहीं बख़्शा।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जवाहरलाल नेहरू ने पहले अंतरिम केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया था क्योंकि कॉन्ग्रेस और हिन्दू महासभा के अधिवेशन साथ-साथ होते थे और महात्मा गाँधी की भी यही सलाह थी। उनके बारे में एक बार दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी अच्छी बात कही थी। उनकी पार्टी छोटी थी लेकिन वो बिना बनाए ही विरोधी दल के नेता बन गए थे। किसी ने डॉक्टर मुखर्जी से कहा कि आपको तो नेता बनाया नहीं गया है, चुना नहीं गया है फिर भी आप विरोधी दल के मान्य नेता कैसे?

उस समय युवा अटल बिहारी वाजपेयी ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहा- “जंगल में शेर को आज तक किसी ने राजमुकुट पहनाया है? वह तो स्वयं राजा है। डॉक्टर मुखर्जी जहाँ होंगे, वो वहीं अपनी आभा बिखेरेंगे। वो जहाँ होंगे, वहाँ विद्वता की बात करते हुए राष्ट्रप्रेम पर बल देंगे।” जब डॉ मुखर्जी गिरफ़्तार हुए थे तब वाजपेयी उनके साथ ही थे। उन्होंने वाजपेयी को वापस भेज दिया था।

उन्होंने कहा था कि अटल जाओ और दुनिया को बताओ कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने परमिट सिस्टम को तोड़ दिया है। तभी तो उनके बलिदान के कुछ ही दिनों बाद नेहरू को कश्मीर में परमिट सिस्टम हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा। तब क्षुब्ध अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिख कर अपना दर्द प्रकट किया था। ‘जम्मू की पुकार‘ शीर्षक की इस कविता की कुछ पंक्तियाँ आज भी झकझोड़ती है:

अत्याचारी ने आज पुन: ललकारा, अन्यायी का चलता है दमन दुधारा।
आँखों के आगे सत्य मिटा जाता है, भारत माता का शीश कटा जाता है।
क्या पुन: देश टुकड़ों में बँट जाएगा? क्या सबका शोणित पानी बन जाएगा?
कब तक जम्मू को यों ही जलने देंगे? कब तक जुल्मों की मदिरा ढलने देंगे?
चुपचाप सहेंगे कब तक लाठी गोली? कब तक खेलेंगे दुश्मन खून से होली?
प्रह्लाद-परीक्षा की बेला अब आई, होलिका बनी देखो अब्दुल्लाशाही।
माँ-बहनों का अपमान सहेंगे कब तक? भोले पाण्डव चुपचाप रहेंगे कब तक?
आओ खण्डित भारत के वासी आओ, कश्मीर बुलाता, त्याग उदासी आओ?

जब डॉक्टर मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया, तब अटल बिहारी वाजपेयी उनके राजनीतिक सचिव थे। वो तब तक सांसद भी नहीं बने थे और पत्रकारिता में अनवरत व्यस्त रहा करते थे। डॉक्टर मुखर्जी के बलिदान के बाद वीर सावरकर ने कहा था कि एक महान देशभक्त और महान सांसद शिष्ट नष्ट हो गया है। कहते हैं, उनके बलिदान के 8-9 महीनों बाद शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी से देश चकित हो गया था।

नेहरू और अब्दुल्ला अनन्य मित्र थे, ऐसे में लोग ये सवाल ज़रूर पूछ रहे थे कि क्या अगर डॉक्टर मुखर्जी का बलिदान नहीं हुआ होता तो शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी संभव होती? डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पाँच सूत्री माँगों में एक ये भी था कि पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं और सिखों के रहन-सहन की व्यवस्था की जाए। आज दशकों बाद सीएए के रूप में उनका ये स्वप्न पूरा हुआ।

सरदार पटेल ने भी इस बात की भविष्यवाणी की थी कि जवाहरलाल नेहरू अब शेख अब्दुल्ला की मैत्री के मोहजाल में फँसे हुए हैं लेकिन समय आते ही उन्हें अब्दुल्ला का असली रंग दिख जाएगा। महाराजा हरि सिंह भी अब्दुल्ला के इस चाल-चरित्र से वाकिफ थे, तभी उन्होंने उसे जेल में बंद किया था। लेकिन, नेहरू भारत में सत्ता हस्तांतरण के दौर के बीच भी महाराजा का विरोध करने कश्मीर दौड़ पड़े – अपने मित्र अब्दुल्ला के लिए!

आज समय ने सिद्ध कर दिया है कि नेहरू गलत थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी व सरदार पटेल जैसे लोग दूरद्रष्टा थे। जब ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ सरदार सरोवर बाँध के पास भारत का गर्व बन कर खड़ा है, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने और सीएए के अस्तित्व में आने से पता चलता है कि डॉक्टर मुखर्जी की नीतियाँ भविष्य के भले के लिए थीं। अफ़सोस ये कि उनकी मृत्यु की निष्पक्ष जाँच नहीं हो सकी।

केरल : विधायक फातिमा तहिलिया द्वारा दीपक जलाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचा दिया बवाल… निलाविलक्कु विवाद ; क्या सेक्युलर होने का ठेका सिर्फ हिंदुओं का?

                                                     साभार - इंडियन एक्सप्रेस, विकिपीडिया
केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की महिला विधायक फातिमा तहिलिया के एक रेस्टोरेंट उद्घाटन कार्यक्रम में पारंपरिक तेल का दीपक निलाविलक्कु जलाने पर शुरु हुआ विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।

3 जून 2026 को कोझिकोड में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ की बैठक में कहा गया था कि मुसलमानों का ऐसे धार्मिक कार्यों में शामिल होना, जिनका इस्लाम में कोई आधार नहीं है, सही नहीं माना जाता।

संगठन ने फातिमा तहिलिया को इस्लाम से बाहर निकालने की धमकी तक दे दी लेकिन आए दिन कट्टरता का ज्ञान देने वाले इस पर शांत बैठे हैं। सेक्युलरिज्म की बातें करने वालों को साँप सूँघ गया है।

सेक्युलरिज़्म तब खत्म होता है जब इस्लाम शुरू होता है: केरल के मुसलमान और गहरे इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि हिंदू अपने धर्म को सेक्युलर बनाने में लगे हैं।

केरल में निलाविलक्कु विवाद के बीच यह पहली बार नहीं है जब किसी मुस्लिम संगठन ने मुसलमानों को गैर-मुस्लिम धार्मिक परंपराओं से दूर रहने की सलाह दी हो। ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ पहले भी मुसलमानों को निलाविलक्कु जलाने से बचने की सलाह दे चुका है।
दरअसल, संगठन पर लंबे समय से अधिक कट्टर इस्लामी सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। फरवरी 2026 में संगठन ने एक प्रस्ताव पास कर मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी पर चिंता जताई थी। संगठन का कहना था कि महिलाओं को ऐसी गतिविधियों से दूर रहना चाहिए जो उन्हें उनकी ‘मुख्य जिम्मेदारियों’ से भटका सकती हैं।
इससे पहले 2021 में सामस्था से जुड़े छात्र संगठन सामस्था केरल सुन्नी छात्र संगठन (SKSSF) ने केरल से अलग मुस्लिम बहुल ‘मालाबार राज्य’ बनाने की माँग की थी। संगठन की पत्रिका ‘सत्यधारा’ के संपादक अनवर सादिक फैजी ने कहा था कि नया मालाबार राज्य बनाया जाए और उसकी राजधानी कोझिकोड हो। इस माँग के पीछे मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अधिक होने का तर्क दिया गया था।
2019 में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का विरोध दोहराते हुए कहा था कि महिलाओं को घर पर ही नमाज पढ़नी चाहिए। उस समय संगठन के महासचिव के. अलीकुट्टी मुसलियार ने कहा था कि धार्मिक मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में केवल धार्मिक नेताओं की बात मानी जानी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि कड़े धार्मिक विचारों के बावजूद सामस्था खुद को केरल का अपेक्षाकृत ‘मध्यमार्गी’ मुस्लिम संगठन बताता है। फरवरी 2026 में संगठन ने जमात-ए-इस्लामी की कथित ‘थियोक्रेटिक’ विचारधारा का विरोध करते हुए उसे ‘चरमपंथी’ करार दिया था।
2022 में सामस्था से जुड़े एक सुन्नी नेता नसर फैजी कूडाथायी ने कुडुम्बश्री स्वयंसेवकों को दिलाई जाने वाली उस संवैधानिक शपथ का विरोध किया था जिसमें मुस्लिम महिलाओं को पिता की संपत्ति में समान कानूनी अधिकार देने की बात कही गई थी। उनका कहना था कि यह कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है क्योंकि इस्लामी उत्तराधिकार नियमों में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में दोगुना हिस्सा मिलता है।
केरल में कई मुस्लिम संगठन पहले भी मुसलमानों को ‘ओणम’ में पूरी तरह शामिल न होने की सलाह दे चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि ओणम का संबंध महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथाओं से है। कुछ संगठनों ने कहा कि बहुदेववादी (Polytheistic) या ‘काफिर’ माने जाने वाले समुदायों के त्योहार मनाना ‘शिर्क’ की श्रेणी में आ सकता है।
2016 में कुछ सलाफी प्रचारकों ने खुले तौर पर ओणम और क्रिसमस को मुसलमानों के लिए ‘हराम’ बताया था। उनका कहना था कि इन त्योहारों की जड़ें गैर-इस्लामी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं।
अगस्त 2025 में एक मुस्लिम स्कूल शिक्षिका खादिजा का मामला भी सामने आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने मुस्लिम छात्रों से ओणम समारोह में हिस्सा न लेने को कहा था। शिक्षिका ने कथित तौर पर कहा था कि मुसलमानों को इस्लाम के अनुसार जीवन जीना चाहिए और ओणम जैसे बहुदेववादी त्योहारों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि दूसरे धर्मों की परंपराओं में शामिल होना ‘शिर्क’ की ओर ले जा सकता है।
कुल मिलाकर, केरल में मुस्लिम संगठनों, मौलानाओं और शिक्षकों के बीच मजहबी रीति-रिवाजों को लेकर कड़ा रुख देखने को मिलता रहा है। निलाविलक्कु विवाद के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि धार्मिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हाल ही में केरल के पलक्कड़ में बन रही एक अधूरी जिम बिल्डिंग राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई थी। वजह यह थी कि सोशल मीडिया पर इसे ‘इस्लाम-फ्रेंडली जिम‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। जिम के मुस्लिम मालिक नवास मुथु टी ने कहा था कि वह एक ऐसा नया मॉडल लाने जा रहे हैं, जिसमें ‘फिटनेस और आस्था’ को जोड़ा जाएगा और जो इस्लामी रीति-रिवाजों व परंपराओं के अनुसार होगा।
केरल के मुसलमान अपने धर्म का पालन करने को लेकर पूरी स्पष्टता रखते हैं। मुस्लिम संगठन भी यह सुनिश्चित करते हैं कि समुदाय, खासकर युवा, ‘सेक्युलरिज्म’ की तय सीमा से आगे न जाएँ और इस्लामी मान्यताओं से दूर न हों।
इसके उलट, केरल के हिंदुओं के व्यवहार को लेकर भी बहस होती रही है। मलयाली हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग दूसरे धर्मों की मान्यताओं को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है जबकि अन्य समुदाय अपनी मजहबी पहचान को खुलकर सामने रखते हैं। इसी संदर्भ में ओणम के ‘सेक्युलराइजेशन’ या ‘डी-हिंदुइजेशन’ (हिंदू पहचान कमजोर करने) की चर्चा भी होती है।
हालाँकि, ओणम नई फसल से जुड़ा त्योहार माना जाता है लेकिन इसका मुख्य आधार हिंदू धार्मिक कथा है। सदियों से ओणम को राजा महाबली की वापसी के उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। हाल के वर्षों में इसे केवल एक ‘हार्वेस्ट फेस्टिवल’ यानी फसल उत्सव तक सीमित करके पेश किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में ओणम की हिंदू धार्मिक जड़ों को कमजोर किया जा रहा है।
हिंदू त्योहारों के धार्मिक पक्ष को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है और उन्हें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम या कार्निवाल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। गैर-हिंदू समुदाय भी इन परंपराओं को नए तरीके से अपनाने या परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं।
तमिलनाडु में हिंदू विरोधी द्रविड़ लोग पोंगल या मकर संक्रांति के साथ भी यही कर रहे हैं। वहाँ पोंगल को उसके हिंदू धार्मिक संदर्भ से अलग कर केवल ‘तमिल कृषि पर्व’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे केरल में ओणम को ‘सांस्कृतिक त्योहार’ कहा जाता है।
केरल में एक वर्ग के बीच बीफ (गोमांस) खाने को लेकर भी बहस होती रही है। आलोचक कहते हैं कि कुछ लोग इसे “सेक्युलर पहचान” या “संस्कृति” के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं, जबकि हिंदू धार्मिक ग्रंथों में गाय की हत्या और गोमांस खाने का विरोध बताया गया है। वहीं कुछ लोग इसे स्थानीय खानपान, इतिहास और सांस्कृतिक मिश्रण का हिस्सा मानते हैं।
इसी तरह, केरल के हिंदुओं के एक हिस्से के लिए बीफ (गाय का मांस) खाना कूल, दिखावे और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है जबकि वेदों जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में गोहत्या और गाय का मांस खाने पर सख्त रोक है। गाय का मांस खाने को ‘हमारे इतिहास, मिली-जुली संस्कृति और खाने का हिस्सा’ बताने की साजिश की जाती है।

यह एक विडंबना है कि रेप करने वाले जिहादी जो प्यार का नाटक करके या नकली धार्मिक पहचान बताकर हिंदू महिलाओं को फँसाते हैं, वे हमेशा हिंदू महिलाओं को गाय का मांस खाने के लिए मजबूर करते हैं। यह काम काफिरों के धर्म का बड़ा मजाक उड़ाने और बेइज्जत करने की इस्लामी सोच का हिस्सा है। वे इन कामों को काफिरों पर इस्लामी जीत के काम के रूप में पसंद करते हैं।

यही ‘सेक्युलर-प्रोग्रेसिव’ लोग तब चुप्पी साध लेते हैं जब कुछ मुस्लिम व्यक्ति या संगठन रूढ़िवादी या विवादित बयान देते हैं और अपने समुदाय के लोगों को उन कामों से दूर रहने को कहते हैं, जिन्हें हिंदू धार्मिक परंपरा या अनुष्ठान मानते हैं। कुछ मौकों पर मुस्लिम संगठन अपनी सुविधानुसार संविधान और सेक्युलरिज्म का सहारा लेते नजर आते हैं, खासकर तब जब धार्मिक अधिकारों या पहचान से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं।
एक ओर मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और सिद्धांतों को लेकर बिना समझौते वाला रुख अपनाता है, भले ही उसके कुछ पहलुओं को दूसरे लोग रूढ़िवादी या पिछड़ा मानें। वहीं दूसरी ओर हिंदू समाज का एक हिस्सा दूसरे समुदायों को समायोजित करने को ही अपनी उदारता और बहुलतावाद का प्रतीक मानने लगा है। चाहे चाहें या न चाहें, भारत में सेक्युलरिज्म का बोझ हिंदू समाज ही उठाता है।

जिस चोल साम्राज्य को सनातन विरोधी विपक्ष ने ठुकराया मोदी ने उजागर किया; चोल साम्राज्य के महान राजा राजेंद्र चोल के नाम पर मोदी ने किया सिक्का जारी, धूमधाम से मनी जयंती: महादेव की आराधना के बाद बोले प्रधानमंत्री- चोल विरासत एकता-गौरव का प्रतीक

                                        तमिलनाडु में पीएम मोदी (फोटो साभार: X_Narendra Modi)
तमिलनाडु के अरियालुर जिले में बसे छोटे से गाँव गंगईकोंडा चोलपुरम में रविवार (27 जुलाई 2025) को एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ। इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती और उनकी दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 साल पूरे होने का जश्न मनाया। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के निर्माण की शुरुआत की स्मृति में भी यह उत्सव आयोजित किया गया।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने मंदिर में पूजा-अर्चना की, एक स्मारक सिक्का जारी किया और चोल वास्तुकला व शैव धर्म पर आधारित एक प्रदर्शनी का अवलोकन किया। यह समारोह न केवल चोल साम्राज्य की गौरवशाली विरासत को याद करने का अवसर था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता था।

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पीएम मोदी ने की पूजा-अर्चना

प्रधानमंत्री का स्वागत पारंपरिक तमिल रीति-रिवाजों के साथ किया गया। मंदिर के पुजारियों ने ‘पूर्ण कुंभम’ के साथ उनका अभिनंदन किया। पीएम मोदी ने वेष्टि (धोती), सफेद कमीज और गले में अंगवस्त्र पहनकर मंदिर की परिक्रमा की और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की।

                                    गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा करते पीएम मोदी

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, वो चोल वास्तुकला का एक अनुपम उदाहरण है। इस मंदिर की भव्यता और इसके नक्काशीदार गलियारे, मूर्तियाँ और प्राचीन शिलालेख आज भी दुनिया भर में प्रशंसा का विषय हैं।

समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन, वित्त मंत्री टी. थेनारासु, हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ निधि मंत्री पी.के. शेखर बाबू और परिवहन मंत्री एस.एस. शिवशंकर सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

प्रधानमंत्री ने मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा आयोजित चोल शैव धर्म और वास्तुकला पर आधारित प्रदर्शनी का भी दौरा किया। इस प्रदर्शनी में चोल साम्राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत को दर्शाया गया था। इसके बाद पीएम मोदी को चोल मंदिर की तस्वीर और स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।

राजेंद्र चोल-प्रथम की स्मृति में सिक्का जारी

समारोह का एक मुख्य आकर्षण था राजेंद्र चोल-प्रथम की स्मृति में एक स्मारक सिक्के का विमोचन। इस सिक्के के जरिए चोल साम्राज्य के इस महान सम्राट की उपलब्धियों को सम्मान दिया गया। राजेंद्र चोल-प्रथम (1014-1044 ई.) ने अपने शासनकाल में चोल साम्राज्य को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक विस्तारित किया था। उनकी समुद्री यात्रा और सैन्य विजयों ने भारत को वैश्विक मंच पर एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित किया था। गंगईकोंडा चोलपुरम को उन्होंने अपनी शाही राजधानी बनाया और वहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी उनकी दूरदर्शिता और स्थापत्य कौशल का प्रतीक है।

आदि तिरुवथिरई महोत्सव में शामिल हुए पीएम मोदी

यह समारोह आदि तिरुवथिरई महोत्सव का हिस्सा था, जो 23 जुलाई से शुरू हुआ और 27 जुलाई को समाप्त हुआ। यह उत्सव तमिल शैव भक्ति परंपरा का प्रतीक है, जिसे चोल शासकों ने विशेष रूप से प्रोत्साहित किया था। इस परंपरा को 63 नयनमार संतों और उनकी भक्ति कविताओं ने और समृद्ध किया।

इस साल यह उत्सव और भी खास था क्योंकि यह राजेंद्र चोल की जन्म नक्षत्र तिरुवथिरई (अर्द्रा) के साथ मेल खाता था। समारोह में शिवाचार्य और ओथुव (शिव भजनों में पारंगत गायक) ने भक्ति भजनों के साथ पीएम मोदी का स्वागत किया, जिससे माहौल और भी आध्यात्मिक हो गया।

मोदी ने चोल विरासत को बताया भारत की एकता का सूत्र

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में चोल साम्राज्य को भारत के स्वर्णिम युगों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि राजेंद्र चोल और उनके पिता राजराजा चोल ने भारत की सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

चोल साम्राज्य ने न केवल भारत में, बल्कि श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापार और कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। पीएम ने इस बात पर जोर दिया कि चोल शासकों ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया था और उनकी सरकार भी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विजन के साथ उसी दिशा में काम कर रही है।

उन्होंने काशी-तमिल संगमम और सौराष्ट्र-तमिल संगमम जैसे आयोजनों का जिक्र किया, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का प्रयास हैं।

पीएम मोदी ने यह भी बताया कि नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान तमिल शैव परंपरा के संतों ने आध्यात्मिक नेतृत्व किया था और तमिल संस्कृति से जुड़े पवित्र सेंगोल को संसद में स्थापित किया गया। यह क्षण भारत की सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है।

चोल साम्राज्य की प्रेरणा से सैन्य और प्रशासनिक सुधार

प्रधानमंत्री ने चोल साम्राज्य की सैन्य और प्रशासनिक उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने बताया कि राजराजा चोल ने एक शक्तिशाली नौसेना की नींव रखी, जिसे राजेंद्र चोल ने और मजबूत किया। चोल साम्राज्य ने ‘कुडवोलाई अमैप्पु’ प्रणाली के जरिए लोकतांत्रिक चुनाव की शुरुआत की थी, जो उस समय की वैश्विक मान्यताओं से कहीं आगे थी।

पीएम मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि चोल शासकों ने जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को महत्व दिया था। राजेंद्र चोल ने गंगा जल को उत्तर भारत से दक्षिण भारत लाकर चोल गंगा झील (अब पोन्नेरी झील) में स्थापित किया था, जिसे आज भी उनकी दूरदर्शिता का प्रतीक माना जाता है।

पीएम मोदी ने आधुनिक भारत को चोल विरासत से जोड़ा

पीएम मोदी ने कहा कि चोल साम्राज्य की आर्थिक और रणनीतिक उपलब्धियाँ आज भी भारत को प्रेरित करती हैं। उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ अपनी सरकार के प्रयासों का जिक्र किया।

मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए मिशन मोड में काम किया है। विदेशों से चुराई गई 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ भारत वापस लाई गई हैं, जिनमें से 36 तमिलनाडु की हैं। इनमें नटराज, लिंगोद्भव, दक्षिणामूर्ति और अर्धनारीश्वर जैसी मूर्तियाँ शामिल हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि भारत की शैव दर्शनशास्त्र वैश्विक मंच पर भी मान्यता प्राप्त कर रहा है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भारत की सफल लैंडिंग के बाद उस स्थान को ‘शिव-शक्ति’ नाम दिया गया, जो भारत की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रतीक है।

पीएम ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देते हुए हाल ही में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने भारत की संप्रभुता के खिलाफ किसी भी खतरे का जवाब देने की ताकत को दिखाया है। यह ऑपरेशन दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत अपने दुश्मनों के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं छोड़ेगा।

तमिलनाडु में स्थापित होंगी राजाराजा चोल और राजेंद्र चोल की मूर्तियाँ

प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि तमिलनाडु में जल्द ही राजराजा चोल और राजेंद्र चोल की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी, जो भारत के ऐतिहासिक गौरव को दर्शाएँगी। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को डॉ. कलाम और चोल शासकों जैसे लाखों युवाओं की जरूरत है, जो शक्ति और समर्पण से देश के सपनों को साकार करें।

गंगईकोंडा चोलपुरम में आयोजित यह समारोह न केवल चोल साम्राज्य की गौरवशाली विरासत का उत्सव है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा तमिलनाडु के लोगों के लिए एक यादगार पल रहा, जिसमें उन्होंने चोल शासकों की उपलब्धियों को नमन किया और भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के अपने विजन को दोहराया। यह समारोह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के मंत्र को और मजबूत करने का एक शानदार अवसर साबित हुआ।

78 वर्ष बर्बाद कर दिए भारत का वास्तविक इतिहास सामने लाने का शंखनाद करने में ; ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो; अकबर ने 30000 काफिरों (हिन्दू) का नरसंहार करवाया, औरंगजेब ने तोड़े मंदिर: 8वीं के बच्चों को मुगलों का असली इतिहास पढ़ाएगा NCERT, इस्लामी सल्तनत में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों का भी जिक्र

                                                                                                                              साभार - वेदांतु
भारत ने 78 वर्ष बर्बाद कर दिए भारत के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने में। यह भारत का दुर्भाग्य है कि झूठा इतिहास लिखने और बताने वालों को देश अपने सिर पर बैठाये रहा। 1555 में फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस की भविष्यवाणी सच साबित हो रही है कि हिन्द(हिन्दुस्तान) को असली आज़ादी 2014 में मिलेगी। देशहित में जितनी जल्दी हो असली इतिहास सामने लाना चाहिए। एक लम्बे समय से भारत के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने के लिए देशप्रेमी चीख रहे थे। लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथ के पैरों में अपनी पगड़ी रख चुके पाखंडी धर्मनिरपेक्ष और देशप्रेम से जनता को गुमराह करने वाले नेता और उनकी पार्टियां वास्तविक इतिहास बताने वालों को फिरकापरस्त, साम्प्रदायिक और हिन्दू मुस्लिम एकता के दुश्मन बताकर बदनाम किया जाता रहा। अब जो देश का असली इतिहास सामने आना शुरू हुआ है निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को सच्चाई से रूबरू होकर हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर जल्दी निर्णय करना चाहिए। बहुत हो गयी हिन्दू मुस्लिम की नौटंकी।  
इतना ही नहीं जिसे देखो यही यह कहता/सुनाता नज़र आता है कि जो जीता वही सिकंदर। मेरे पिताश्री के अनुसार सच्चाई यह कि सिकंदर द्वारा भारत की पावन धरती पर पैर रखते ही हिन्दू सम्राट पोरस ने इतनी कुटाई की कि ज़िंदगी में भारत की और मुड़कर नहीं देखने की हिम्मत नहीं हुई। अब असली इतिहास सामने आने का शंखनाद हो चुका है। इतिहास के नाम हुए सारे पाखंड क़दमों में रोंदे जायेंगे।  

देखिए ऊपर 2013 में लिखा मेरा स्तम्भ। जो इस हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते लिखा था। इससे पहले लिखा था शीर्षक लाल किला किसने और कब बनवाया? जिस पर मेरे अपनी गली में कुछ जेहादी प्रवत्ति के लोगों ने सिर्फ मुझे, संपादक को गालियों देने के अलावा मेरे मृतक परमपूजनीय माता-पिता के लिए भी अपमानित शब्दों का इस्तेमाल किया। आक्रांताओं जिन्हे मुग़ल बादशाह के नामों से पढ़ाया गया, नहीं मालूम पाखंडी इतिहासकारों को कि इन सनातन विरोधियों के समय में यमुना नदी सुभाष मैदान तक बहती थी। यानि लालकिला यमुना नदी के बीच था। ये तो ब्रिटिश काल में यमुना नदी का कटाव किया गया था। इसीलिए सुभाष पार्क से शांतिवन के क्षेत्र को दरिया गंज कहा जाता है। लेकिन जब उपरोक्त  स्तम्भ आया सबकी बोलती बंद हो गयी। 

जब शाहजहां ने दिल्ली की सल्तनत ली तब फारस(जिसे आज ईरान कहते हैं) के राजदूत का लालकिला में मिलन होता है। अब पूछो कि शाहजहां क्या लाल किला अपनी माँ के पेट से लेकर आया था?   


 

यदाकदा ब्लॉग भी लिखता रहा हूँ कुछ का नीचे लिंक दिया गया है। ऐय्याश अकबर को महान बताने वालों से पूछो कि वो सिर्फ औरतों के लिए मीना बाजार क्यों लगाता था। जिसमे दूध पीते लड़के तक को ले जाने की इजाजत नहीं थी। और खुद बुरका ओढ़ ख़ूबसूरत हसीन लड़कियों/औरतों को तलाशता था, मिलने पर परदे में चल रहे अपने सिपाहियों को हरम में लेकर जाने का इशारा करता था। इस ऐय्याशी के मीना बाजार को बंद करवाने में हिन्दू शेरनी किरण देवी की वीरता थी। जमीन पर पटक कर अपनी कटारों से जैसे ही मारने जाने पर जिन्दगी की भीख मांगी थी कि आज के बाद कभी मीना बाजार नहीं लगाने का वायदा किया था। देखिए ऊपर पेंटिंग जो शायद बीकानेर म्युसियम में है।   

चरित्रोपाख्यान: अकबर और रंग कुमारी की कहानी

आगरा स्थित अकबराबाद में एक साहूकार रहा करता था। रंग कुमारी उसी की बेटी थी। कहते हैं उसका सौंदर्य ऐसा था कि जो भी एक बार देख ले मोहित हो जाता। उस समय आगरा अकबर की राजधानी थी और वह वहीं से शासन चलाया करता था। वह फतेहपुर सीकरी में अपना दरबार लगाया करता था। अकबर को शिकार का शौक था और वह अक्सर शिकार खेलने जाया करता था।
एक बार शिकार खेलने के दौरान ही अकबर की नज़र रंग कुमारी पर पड़ी और वह तुरंत ही उस पर मोहित हो गया। अकबर उसे हर हाल में पाना चाहता था। अकबर के बारे में पुस्तक लिख चुके डर्क कोलियर कहते हैं कि अकबर के महल में कम से कम 5000 महिलाएँ होती ही होती थीं। बेल्जियम के लेखक के अनुसार, अकबर अनगिनत महिलाओं के साथ सो चुका था और यह सब तभी शुरू हो गया था जब वह काफ़ी कम उम्र का था। इतिहासकारों की मानें तो अकबर की 300 के क़रीब पत्नियाँ थीं।
अकबर ने कई राजपूत राजघरानों की लड़कियों से शादी कर रखी थी। ख़ैर, वापस रंग कुमारी की कहानी पर आएँ तो अकबर ने अपनी एक दासी को उसके पास भेजा। वह दासी अकबर का सन्देश लेकर रंग कुमार के पास गई। सन्देश यही था कि अकबर ने रंग कुमारी को अपने महल में बुलाया है। रंग कुमारी चालाक महिला थीं। उन्होंने अकबर के पास जाना स्वीकार नहीं किया, लेकिन वह जानती थीं कि वह एक शक्तिशाली बादशाह है। इसीलिए, रंग कुमारी ने अकबर को अपने घर पर बुलाया।
दासी ने अकबर को जाकर रंग कुमारी का सन्देश कहा। जब अकबर रंग कुमारी के पास पहुँचा तो वह बिस्तर लगा रही थी। फिर क्या था, अकबर की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि वह अपने उद्देश्य में सफल हो रहा है। लेकिन, रंग कुमारी भी पतिव्रता हिन्दू महिला थीं। रंग कुमारी ने अकबर को काफ़ी इज्जत दी। बिस्तर लगाने के बाद अकबर से कहा कि वह शौचालय से निपट कर आना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि वह जल्दी ही आ जाएँगी।
                                  ‘चरित्रोपाख्यान’ के अंग्रेजी अनुवाद का अंश (अनुवादक: प्रीतपाल सिंह बिंद्रा )
शौचालय जाने के बहाने निकली रंगा कुमारी ने दरवाजा तेज़ी से बंद कर दिया और इस तरह से अकबर अंदर कमरे में ही क़ैद हो गया। इसके बाद कुमारी अपने पति को लेकर उस कमरे में आ गईं। अपनी पत्नी के साथ छेड़छाड़ से क्रुद्ध रंग कुमारी के पति ने गुस्से में न सिर्फ़ अकबर के ताज को ज़मीन पर पटक कर अपने पैरों तले रौंद डाला बल्कि अपना जूता निकाल कर अकबर को कई जूते लगाए भी।
बादशाह अकबर अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा के डर से यह सब बर्दाश्त करता रहा। कहीं न कहीं उसके मन में यह एहसास भी हो गया कि उसने ग़लत किया है। लज्जा के मारे वह चुपचाप खड़ा रहा। इसके बाद रंग कुमारी और उसके पति ने मिल कर अकबर को एक भू-गर्भित कालकोठरी में क़ैद कर दिया। हिंदुस्तान का बादशाह होकर औरतों पर ग़लत नज़र डालने वाले अकबर की ये कहानी शायद ही कहीं और पढ़ी-पढ़ाई गई हो।
अगले दिन की सुबह होते ही पति-पत्नी अकबर को लेकर शहर के क़ाज़ी के पास पहुँचे। न्यायालय में रंग कुमारी और उसके पति ने अकबर के कुकृत्यों को बताने के बाद कहा, “यह एक संत है, चोर है, साहूकार है या फिर बादशाह है, आप ख़ुद पता कर लीजिए।” इतना कह कर निकल गए। लज्जा के मारे अकबर का सिर ऊपर उठ ही नहीं रहा था। पूरे प्रकरण के दौरान वह सिर झुकाए खड़ा रहा।
‘चरित्रोपाख्यान’ में पूछा गया है कि अगर कोई व्यक्ति इस तरह से पराई स्त्री पर नज़र डालता है और उसके घर में घुस जाता है, क्या उसे दण्डित नहीं किया जाना चाहिए? बादशाह अकबर को इस घटना के बाद अच्छी सीख मिली और उसके बाद उसने किसी पराई स्त्री के घर में घुसना बंद कर दिया। उपर्युक्त कहानी सिख ग्रन्थ ‘चरित्रोपाख्यान’ में वर्णित है, जिसके रचयिता गुरु गोविन्द सिंह माने गए हैं।

Rang Kumari’s husband had no idea the intruder pursuing his wife was Emperor Akbar. He thrashed Akbar with shoes and locked him inside the room.

The next day he informed the civil judge (Qazi) and handed over the intruder. Akbar was totally humiliated and couldn’t speak a word. pic.twitter.com/1H9MHSZHdn

— True Indology (@TIinExile) August 21, 2019    

NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब अब मुग़ल तथा इस्लामी आक्रान्ताओं की सच्चाई बताएगी। ‘समाज की खोज: भारत और उससे आगे भाग 1’ किताब में मुस्लिम आक्रांताओं की क्रूरता को भी बच्चों को पढ़ाया जाएगा। इस किताब में दिल्ली सल्तनत और मुगलों के शासनकाल को एक नए दृष्टिकोण से दिखाया गया है।

इस पुस्तक में बाबर को ‘क्रूर विजेता’, अकबर के शासन को ‘क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण’ और औरंगजेब को ‘मंदिरों व गुरुद्वारों को नष्ट करने वाला’ बताया गया है। किताब में सल्तनत काल को लूट, विध्वंस और धार्मिक असहिष्णुता से भरा बताया गया है।

इंडियन एक्स्प्रेस के अनुसार, NCERT ने बताया है कि यह नई पुस्तक 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच के राजनीतिक घटनाक्रम, विद्रोहों और धार्मिक संघर्षों को केंद्र में रखती है, जिसे अब पहली बार कक्षा 8 में पढ़ाया जा रहा है। इससे पहले इसे 7वीं कक्षा में पढ़ाया जाता था।

सल्तनत काल और धार्मिक स्थलों पर हमले

नई पुस्तक में बताया गया है कि अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने श्रीरंगम, मदुरै, चिदंबरम और संभवतः रामेश्वरम जैसे प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थलों पर आक्रमण किए। दिल्ली सल्तनत के दौरान बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों पर कई बार हमले हुए। किताब के अनुसार, इन हमलों का उद्देश्य केवल लूट नहीं था, बल्कि मूर्तिभंजन यानी धार्मिक प्रतीकों का विनाश भी इसका मुख्य उद्देश्य था।

जजिया कर और गैर-मुस्लिम प्रजा

पुस्तक में ‘जजिया’ कर के बारे में भी बताया गया है। बताया गया है कि कुछ मुस्लिम शासकों द्वारा गैर-मुसलमानों (हिन्दुओं) पर लगाया गया था। किताब के अनुसार, यह कर उनके लिए सार्वजनिक अपमान का कारण भी बन गया। नई किताब के अनुसार, इस कर ने इस्लाम अपनाने के लिए एक प्रकार का वित्तीय और सामाजिक दबाव पैदा किया। कक्षा 7 की पुरानी किताब में जज़िया को भूमि कर के साथ वसूला गया कर बताया गया था, जबकि नई किताब इसे एक स्वतंत्र और अलग कर के रूप में पेश करती है।

बाबर – एक विजेता की दोहरी छवि

बाबर की आत्मकथा में उसे एक सुसंस्कृत और बौद्धिक रूप से जिज्ञासु व्यक्ति बताया गया है, लेकिन नई किताब में कहा गया है कि वह एक क्रूर विजेता था। किताब में बताया गया है कि उसने कई शहरों में नरसंहार किए, महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाया और लूटे गए शहरों के मारे गए लोगों की खोपड़ियों से मीनारें बनवाने पर गर्व महसूस किया। वहीं, पुरानी किताब में बाबर को केवल एक ऐसा शासक बताया गया था जिसे अपने सिंहासन से हटने के बाद काबुल और फिर दिल्ली और आगरा पर कब्ज़ा करने का अवसर मिला।

अकबर – सहिष्णुता और क्रूरता का मिश्रण

अकबर को नई किताब में एक ऐसा शासक बताया गया है जिसमें सहिष्णुता और क्रूरता दोनों के तत्व थे। नई किताब बताती है कि जब उसने चित्तौड़गढ़ के किले पर आक्रमण किया, तो लगभग 30,000 नागरिकों के नरसंहार का आदेश दिया।
किताब के अनुसार, अपनी जीत की घोषणा करते हुए उसने कहा कि उसने काफिरों के किलों और कस्बों पर कब्जा कर इस्लाम की स्थापना की और तलवार के बल पर मंदिरों को नष्ट कर काफिरों के प्रभाव को मिटा दिया। फिर अकबर ने बाद में विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई, फिर भी प्रशासन में गैर-मुसलमानों की संख्या अल्प ही रही।

औरंगजेब – धार्मिकता और राजनीति

नई किताब औरंगजेब के शासन को राजनीतिक और मजहबी दृष्टिकोणों से देखती है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उसके कई निर्णय राजनीतिक थे, उसके फरमान यह भी दिखाते हैं कि उसमें मजहबी कट्टरता भी थी।
उसने अपने राज्य के गवर्नरों को मंदिरों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट करने के आदेश दिए। उसने काशी, मथुरा, सोमनाथ के मंदिरों, जैन धार्मिक स्थलों और सिख गुरुद्वारों को ध्वस्त करने का आदेश दिया।

आर्थिक और सामाजिक स्थिति

पुस्तक यह भी बताती है कि सल्तनत और मुगल शासन के अधीन एक मजबूत प्रशासनिक ढाँचा था और 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच आर्थिक गतिविधियाँ काफी जीवंत थीं। शहरों और बुनियादी ढाँचे में काफी प्रगति हुई, लेकिन 1600 के दशक के अंत में आर्थिक संकट और दबाव का दौर शुरू हुआ। इसके बावजूद, भारतीय समाज ने कस्बों, मंदिरों और अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं के पुनर्निर्माण में लचीलापन और अनुकूलन क्षमता दिखाई।

मराठा और शिवाजी का योगदान

अध्याय के अंत में मराठों का वर्णन किया गया है, जिसमें शिवाजी को एक कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी नेता कहा गया है। उन्हें एक धार्मिक हिंदू बताया गया है जो अन्य धर्मों का सम्मान करते थे और अपवित्र हो चुके मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाते थे।
किताब के भीतर मराठों को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता माना गया है। पुरानी किताब में शिवाजी को केवल एक कुशल प्रशासक और मराठा राज्य की नींव रखने वाला बताया गया था, लेकिन नई किताब में उनके धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को भी महत्व दिया गया है।
अवलोकन करें:-
ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
nigamrajendra28.blogspot.com
ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
पिताश्री एम.बी.एल. निगम श्री केवल रतन मलकानी अस्सी के दशक में विश्व चर्चित पत्रकार श्री केवल रतन मलकानी, मुख्य सम्प....

बादशाह अकबर की जूतों से क्यों हुई पिटाई?: कौन थी किरण देवी जिससे अय्याश अकबर ने ज़िंदगी की भीख मां


नई किताब में दिल्ली सल्तनत के उत्थान-पतन, विजयनगर साम्राज्य, मुगलों का शासन, उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध और सिखों के उदय को विस्तार से दर्शाया गया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि पहले दिल्ली सल्तनत और मुगल इतिहास की पढ़ाई कक्षा 7वीं में होती थी।
लेकिन अब नए पाठ्यक्रम संरचना में बदलाव करते हुए, इसे 8वीं कक्षा में शामिल किया गया है। यह नई किताब पहले से कहीं ज्यादा आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक और तथ्यों पर आधारित है। इसमें शासकों की धार्मिक और सैन्य नीतियों का खुलकर अंदाजा लगाया गया है, जिसकी जानकारी पहले की किताबों में हल्की फुलकी ही दी गई थी।