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डोनाल्ड ट्रंप ने की मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने की शुरुआत, कतर के चैनल अल-जजीरा से संबंध

                               ट्रंप ने मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी समूह घोषित किया (साभार- Al Arabiya)
इस्लामी आतंकवाद को एक बड़ा झटका देते हुए, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 नवंबर 2025 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इसमें उनके प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) की कुछ शाखाओं को विदेशी आतंकी संगठन/फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (FTO) और खासतौर पर स्पेशली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट्स (SDGTs) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

इस कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट राष्ट्रपति को एक ज्वाइंट रिपोर्ट सौंपेंगे। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की किसी भी शाखा या सब-डिविजन जैसे लेबनान, जॉर्डन और मिस्र में सक्रिय चैप्टर्स को FTO और SDGT घोषित करने की बात भी शामिल होगी।

ट्रंप के पहले कार्यकाल की महत्वाकांक्षाओं को ये कदम पूरा करता है। उस दौरान उन्होंने इस आतंकी संगठन के खिलाफ समीक्षा का आदेश दिया था, लेकिन नौकरशाही विरोध के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी।

ट्रंप की ओर से मुस्लिम ब्रदरहुड की समीक्षा के आदेश को गति देने का काम कांग्रेस के दोनों पार्टियों के प्रयासों ने किया। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड टेररिस्ट डेजिग्नेशन एक्ट-2025 और रिपब्लिकन नेताओं का यह तर्क शामिल था कि मुस्लिम ब्रदरहुड एक ‘अंतरराष्ट्रीय इस्लामवादी संगठन’ है।

व्हाइट हाउस ने कहा है कि पूरे मुस्लिम ब्रदरहुड को एक साथ आतंकी संगठन घोषित नहीं किया जाएगा, पर ट्रंप का ये कदम अमेरिका की नीति में एक बड़ा बदलाव हो सकता है। ट्रंप का ये कदम इस समय में काफी अहम है जब वे गाजा में शांति बहाल करने की कोशिश में लगे हैं।

इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष महज जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि मूल रूप से धार्मिक संघर्ष है, जहाँ दोनों पक्षों के क्षेत्रीय दावे युद्ध का कारण बने हैं।

ऑपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने 1988 के अपने चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ संपत्ति बताया और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने का संकल्प लिया जब तक कि आखिरी यहूदी की हत्या न हो जाए। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन मिलता रहा है और उसने 7 अक्टूबर 2023 के नरसंहार के बाद इजरायली नागरिकों और सेना पर हवाई हमले किए।

2017 के दस्तावेजों में हमास ने खुद को मुस्लिम ब्रदरहुड से दूर दिखाने की कोशिश की, ताकि मिस्र के साथ संबंध बेहतर हो सकें। उसने यहूदियों और जायोनिस्टों में फर्क करने की बात भी कही। लेकिन 2023 की हिंसा ने उसकी दोहरी नीति और यहूदियों के प्रति नफरत को सामने ला दिया। 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के पाखंड और नफरत को पूरी तरह उजागर कर दिया।

मुस्लिम ब्रदरहुड को औपचारिक रूप से आतंकी संगठन घोषित करना अमेरिकी सरकार के लिए हमेशा ही कठिन रहा है। यह संगठन डिसेंट्रलाइज्ड है और अलग-अलग देशों में इसकी शाखाएँ हैं। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञों और खुफिया अधिकारियों के लिए पूरे संगठन पर एक साथ आतंकी ठप्पा लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है।

इसी वजह से ट्रम्प के हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर केवल विशिष्ट शाखाओं को ही FTO या SDGT घोषित किया जाएगा।

मुस्लिम ब्रदरहुड: सोशियो-पॉलिटिकल मूवमेंट से वैश्विक इस्लामी नेटवर्क तक

1928 में मिस्र के इस्माइलिया में स्थापित मुस्लिम ब्रदरहुड या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ आज भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों में से एक है। इसकी स्थापना एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी।

उसने इसे पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और उस्मानी साम्राज्य के बाद इस्लामी मूल्यों के खत्म होने की आशंका के आधार पर शुरू किया था। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिक आंदोलन के रूप में शुरू किया। ये चैरिटी और इस्लामी वकालत पर केंद्रित था।

अपने शुरुआती वर्षों में मुस्लिम ब्रदरहुड ने कमजोर और उदासीन सरकारों की ओर से पैदा की गई खाइयों को भरा। इसने मिस्र में गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनाईं, साथ ही इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सर्वोच्चता) को सेक्यूलेरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) और साम्राज्यवाद का इलाज बताया।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मकसद में एक बात साफ है कि भले ही इसकी शुरुआत हिंसा से जुड़ी न रही हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा इसका रास्ता रहा है।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो कहता है- “अल्लाह हमारा मकसद है, पैगंबर हमारे मार्गदर्शक हैं; क़ुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी तवक्को है।”

1930 के दशक तक मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) के सदस्य लाखों की संख्या में पहुँच गए और उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया। 1936 में यह इस्लामी संगठन राजनीति में उतरा, धर्मनिरपेक्ष वफ्द पार्टी का विरोध किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विरोध-प्रदर्शन किए।

हालाँकि MB की पैरामिलिट्री विंग (अर्धसैनिक शाखा) ‘सीक्रेट अप्परैटस’, जिसे स्पेशल अप्परैटस या अल-निजाम अल-खास भी कहा जाता है, ने हिंसा, राजनीतिक हत्याओं और विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिया।

1948 में सीक्रेट अप्परैटस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री महमूद एल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने इस्लामी संगठन पर बैन लगाया था। 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए अल-बन्ना की हत्या कर दी।

मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अप्परैटस के सदस्य कठिन शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण लेते थे। उन्हें हथियारों का इस्तेमाल और अंडरग्राउंड ऑपरेशंस को अंजाम देने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

धोखे और गोपनीयता (तकिय्या) में खुद को पारंगत करके, इस अप्परैटस से जुड़े जिहादी राजनीतिक दलों, सेनाओं, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शैक्षिक संस्थानों और यहाँ तक कि एनजीओ में भी घुसपैठ और उसे अलग-थलग करते थे।

1966 में फाँसी की सजा पाने वाले सैयद कुत्ब के नेतृत्व में मुस्लिम ब्रदरहुड और अधिक कट्टरपंथी हो गया। अपनी लेखों, खासतौर पर माइलस्टोन्स (मा’आलिम फि अल-तारीक) के जरिए, कुत्ब ने तकफीर (मुसलमानों को धर्मत्यागी/काफिर घोषित करना) जैसी बातों को बढ़ावा दिया और कहा कि नए राष्ट्र-राज्य ‘गैर-इस्लामी’ हैं।

मुस्लिम ब्रदरहुड और अल जजीरा कनेक्शन

दोहा स्थित अल-जजीरा भले ही मुस्लिम ब्रदरहुड की ओर से घोषित शाखा न हो, लेकिन इसे इस्लामी संगठन का चेहरा (मेगाफोन) माना जाता है। 2017 में सऊदी अरब, यूएई और मिस्र का कतर के साथ राजनयिक विवाद हुआ क्योंकि कतर पर मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास का समर्थन करने का आरोप था।

सऊदी अरब ने अल-जजीरा और उसके सहयोगी चैनलों को बंद करने की माँग भी की थी, क्योंकि उसका आरोप था कि कतर अल-जजीरा का इस्तेमाल इस्लामी उग्रवाद भड़काने और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे जिहादी संगठनों को समर्थन देने के लिए करता है। उस समय अल-जजीरा ने निर्वासित मुस्लिम ब्रदरहुड नेता यूसुफ अल-करदावी की बातें ब्रॉडकास्ट की थी।

अरब स्प्रिंग के दौरान अल-जजीरा की पक्षपाती और प्रोपेगेंडा से भरी रिपोर्टिंग को भी भूला नहीं जा सकता। जनवरी 2024 में एक यमनी-ब्रिटिश पत्रकार अदनान अल-अमेरी ने खुलासा किया कि अल-जजीरा कतर सरकार के इशारे पर मुस्लिम ब्रदरहुड का एजेंडा चलाता है।

अल-जजीरा का लगातार चलता भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

कतर स्थित इस्लामी प्रोपेगेंडा चलाने वाला अल-जजीरा भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार पक्षपाती बयानबाजी करता रहता है। चाहे 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हों, नागरिकता संशोधन अधिनियम या अयोध्या राम मंदिर मुद्दा, अल-जजीरा लगातार मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को गढ़ता रहा है और भारतीय हिंदू बहुमत को दोषी ठहराता रहा है।

अल-जजीरा को मुस्लिम पीड़ितत्व (विक्टिमहुड) की नकली कहानियाँ गढ़ने की आदत है जबकि वह इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद की असल घटनाओं को कम आंककर दिखाता है।

2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमलों के दौरान भी अल-जजीरा ने मुस्लिम भीड़ के हिंदुओं की हत्या, बलात्कार, घरों की लूटपाट और मंदिरों की तोड़फोड़ को ‘राजनीतिक बदला’ बताने की कोशिश की।

इस इस्लामी प्रोपेगेंडा संगठन ने भारतीय मीडिया पर भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्टिंग करने वाले इस्लामोफोबिक हैं। अल-जजीरा कश्मीर मुद्दे पर भी भारत विरोधी भूमिका निभाता है और कश्मीरी पंडितों के कष्टों को कम आंकता रहा है।

अल-जजीरा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी झूठ फैलाता रहा है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को पहले ही क्लीन चिट दे दी है।

भारत में मुस्लिम ब्रदरहुड की छाया

हालाँकि मुस्लिम ब्रदरहुड का भारत में प्रत्यक्ष तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन इसकी विचारधारा का भारत में इस्लामी संगठनों पर काफी असर पड़ा है। ध्यान देने वाली बात ये है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरण दी थी।

प्रतिबंधित इस्लामी आतंकी संगठन जैसे स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं पर जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

दोनों ने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, धर्मनिरपेक्ष एजेंडे का विरोध करने और बहुसंख्यक समुदाय के साथ मुख्यधारा सरकार को ‘मुसलमानों का उत्पीड़न करने वाले’ के तौर पर पेश करने पर भरोसा किया।

इस घटना के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, पाकिस्तान और तुर्की, मिस्र और इराक जैसे मध्य पूर्वी देशों के लोगों ने भारत में बने उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान शुरू किया।

2021 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने भारत के खिलाफ़ #BoycottIndianProducts अभियान शुरू किया, जिसका लक्ष्य भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाना था। यह अभियान सोशल मीडिया पर उस समय शुरू हुआ जब असम में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ चलाए गए बेदखली अभियान के दौरान हिंसा हुई थी, क्योंकि कुछ अतिक्रमणकारियों ने पुलिस पर हमला कर दिया था।


जुमे पर नमाज नहीं पढ़ी तो होगी 2 साल की जेल, भरना पड़ेगा जुर्माना: मलेशिया में तालिबानी फरमान का हो रहा विरोध, इसी मुल्क में है भारत का भगोड़ा जाकिर नाइक

                         जुमे की नमाज नहीं पढ़ी, तो होगी जेल ( प्रतिकात्मक फोटो साभार-chatgpt )
मलेशिया के टेरेंगानु राज्य में जुमे की नमाज पढ़ने में नहीं शामिल होने वाले मुस्लिमों पुरुषों को 2 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। शरिया कानून को सख्ती से लागू करते हुए सरकार ने ये फरमान सुनाया है।

इसमें कहा गया है कि अगर बिनी किसी उचित कारण बताए शुक्रवार की नमाज में अनुपस्थित रहे, तो मुस्लिम पुरुषों को जेल जाना पड़ेगा। साथ ही 3000 रिंगिट यानी 61,000 रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

पहले लगातार 3 जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य था

टेरेंगानू में पीएएस यानी पैन मलेशियाई इस्लामिक पार्टी की सरकार है। पहले लगातार तीन शुक्रवार को नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को ये सजा दी जाती थी। लेकिन अब हर जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य कर दिया गया है।

राज्य के कार्यकारी परिषद के सदस्य मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने बेरिटा हरियन अखबार को बताया, “नमाज केवल मजहबी प्रतीक नहीं है, बल्कि मुस्लिमों की खुदा के आज्ञा मानने से भी जुड़ा हुआ है।”

तालिबान बन जाएँगे हम- अजीज

इस पर मलेशियाई वकील अजीरा अजीज ने तर्क दिया है कि कुरान में कहा गया है कि ‘मजहब में कोई जबरदस्ती नहीं’ होती। सरकार का फरमान इसके खिलाफ है। उन्होंने कहा, “जुमे की नमाज अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन इसे अपराध बनाना गलत है। हमें सभी मलेशियाई लोगों की चिंता है, वरना हम तालिबान बन जाएँगे।”

रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया के इस राज्य में कोई विपक्षी पार्टी नहीं है। 12 लाख की आबादी है, जिसमें अधिकतर स्थानीय मुस्लिम हैं। सत्ताधारी पीएएस पार्टी ने 2022 में सभी 32 सीटों पर जीत हासिल की थी। ये हथकंडा पीएएस को अपनी सत्ता बचाने के लिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि दो साल के अंदर चुनाव होने वाले हैं।

इस्लाम मलेशिया का आधिकारिक मजहब है। मलेशिया का संविधान राज्यों को इस्लामी मामलों पर कानून बनाने का अधिकार देता है। लेकिन उसका क्षेत्र परिवार या व्यक्तिगत स्तर पर होना चाहिए।

दूसरे राज्य ने भी कानून बनाना चाहा था

2019 में, मलेशियाई राज्य केलंतन ने अपने शरिया कानून को विस्तार देना चाहा था। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। यहाँ मलेशियाई संघ का कानून सबसे अहम है। इस फैसले को पीएएस नेताओं ने इस्लामी सत्ता पर हमले के रूप में प्रचारित किया और जमकर बवाल काटा।

तेरेंगानु के नए फरमान के खिलाफ भी लोग सड़कों पर आ गए हैं। कई लोगों ने कानूनी दबाव के जरिए मजहबी रिवाजों को मनवाने की ‘समझदारी’ पर सवाल उठाए हैं। इनका कहना है कहा, “धर्मनिष्ठा दिल से आनी चाहिए, न कि लोगों के डर से”। कुछ लोगों ने चेताया है कि ऐसे कानून दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं।

मलेशिया में ही है भगोड़ा जाकिर नाइक

भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।

भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।

स्पेन के जिस शहर पर रहा मुसलमानों का रहा सदियों तक कब्जा, वहाँ खुले में ईद-बकरीद भी नहीं मना पाएँगे मुस्लिम: इस्लामी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए ईसाई हुए एकजुट

                                                                                                                                साभार: कैनवा
यूरोप में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को अब सरकारें भी महसूस कर रही हैं। इसी क्रम में स्पेन में जुमिला नाम के शहर में ईद-बकरीद जैसे त्योहारों को पब्लिक प्लेस पर मनाने पर बैन लगा दिया गया है। स्पेन का जुमिला शहर कभी सदियों तक मुसलमानों के कब्जे में रहा था। खुद स्पेन के बड़े हिस्से पर इस्लामी सल्तनत ने राज किया था, लेकिन अब जुमिला की लोकल अथॉरिटी ने बाकायदा एक प्रस्ताव पास किया है। इसके मुताबिक, ‘ईसाइयों’ के शहर में ‘इस्लामी’ त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोक दिया गया है।

ईसाइयों की पार्टी ने ‘गायब’ रहकर पास कराया प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्ताव को कंजर्वेटिव मानी जाने वाली पीपल्स पार्टी (पीपी) ने पेश किया था और वामपंथी पार्टियों ने इसका विरोध किया। वहीं, वोटिंग के दौरान दक्षिणपंथी पार्टी ‘वॉक्स’ अनुपस्थित रही थी लेकिन फिर भी इस प्रस्ताव को पास करा लिया गया है।

इस प्रस्ताव में कहा गया है, “नगरपालिका खेल सुविधाओं का उपयोग हमारी पहचान से अलग की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा इसका आयोजन न किया जाए।”

‘वॉक्स’ पार्टी ने इस फैसले पर कहा, “वॉक्स के चलते स्पेन के सार्वजनिक जगहों पर इस्लामी त्योहारों पर प्रतिबंध लगाने का पहला कदम पारित हो गया है। स्पेन हमेशा से ईसाइयों का रहा है और हमेशा रहेगा।”

क्या कह रहे हैं विरोधी दल और मुस्लिम नेता?

इस फैसला का विरोधी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है। स्पैनिश फेडरेशन ऑफ इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख मुनीर बेनजेलून अंडालूसी अज़हरी ने एक अखबार से बातचीत में दावा किया कि यह प्रतिबंध इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा, “30 वर्षों में पहली बार मुझे डर लग रहा है। वे किसी दूसरे धर्म पर नहीं सिर्फ हमारे धर्म पर हमला कर रहे हैं।”
वहीं, मर्सिया क्षेत्र के समाजवादी नेता फ्रांसिस्को लुकास ने इस फैसले को लेकर कहा, “पीपी पार्टी संविधान का उल्लंघन करती है और सिर्फ सत्ता की चाह में सामाजिक एकता को खतरे में डाल रही है।” शहर के पूर्व समाजवादी मेयर जुआना गार्डियोला ने कहा, “यहाँ सदियों पुरानी मुस्लिम विरासत का क्या होगा?”

कोर्ट में जाएगा मामला?

जानकारी के मुताबिक, स्थानीय कानून विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया जा सकता है। यह फैसला स्पेन के संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है।

इस अनुच्छेद में कहा गया है, “व्यक्तियों और समुदायों की विचारधारा, धर्म और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाती है और उनकी अभिव्यक्ति पर कोई अन्य प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, सिवाय इसके कि कानून द्वारा संरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो।”

जुमिला और इस्लाम

जुमिला शहर का इतिहास रोमन साम्राज्य से जुड़ा है। 8वीं शताब्दी में अरबों द्वारा कब्जा किए जाने के पहले यह रोमन साम्राज्य का हिस्सा होता था। इसके बाद यह सदियों तक अरबों का शहर रहा और इसका नाम युमिल-ला हुआ करता था।

इसके बाद 13वीं शताब्दी के मध्य में कैस्टिले के अल्फोंसो X के नेतृत्व में ईसाइयों ने इस पर हमला कर वापस इसे अपने कब्जे में ले लिया था। मौजूदा समय में जुमिला की आबादी करीब 27,000 है, जिसमें करीब 7.5% आबादी मुस्लिमों की है।

78 वर्ष बर्बाद कर दिए भारत का वास्तविक इतिहास सामने लाने का शंखनाद करने में ; ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो; अकबर ने 30000 काफिरों (हिन्दू) का नरसंहार करवाया, औरंगजेब ने तोड़े मंदिर: 8वीं के बच्चों को मुगलों का असली इतिहास पढ़ाएगा NCERT, इस्लामी सल्तनत में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों का भी जिक्र

                                                                                                                              साभार - वेदांतु
भारत ने 78 वर्ष बर्बाद कर दिए भारत के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने में। यह भारत का दुर्भाग्य है कि झूठा इतिहास लिखने और बताने वालों को देश अपने सिर पर बैठाये रहा। 1555 में फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस की भविष्यवाणी सच साबित हो रही है कि हिन्द(हिन्दुस्तान) को असली आज़ादी 2014 में मिलेगी। देशहित में जितनी जल्दी हो असली इतिहास सामने लाना चाहिए। एक लम्बे समय से भारत के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने के लिए देशप्रेमी चीख रहे थे। लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथ के पैरों में अपनी पगड़ी रख चुके पाखंडी धर्मनिरपेक्ष और देशप्रेम से जनता को गुमराह करने वाले नेता और उनकी पार्टियां वास्तविक इतिहास बताने वालों को फिरकापरस्त, साम्प्रदायिक और हिन्दू मुस्लिम एकता के दुश्मन बताकर बदनाम किया जाता रहा। अब जो देश का असली इतिहास सामने आना शुरू हुआ है निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को सच्चाई से रूबरू होकर हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर जल्दी निर्णय करना चाहिए। बहुत हो गयी हिन्दू मुस्लिम की नौटंकी।  
इतना ही नहीं जिसे देखो यही यह कहता/सुनाता नज़र आता है कि जो जीता वही सिकंदर। मेरे पिताश्री के अनुसार सच्चाई यह कि सिकंदर द्वारा भारत की पावन धरती पर पैर रखते ही हिन्दू सम्राट पोरस ने इतनी कुटाई की कि ज़िंदगी में भारत की और मुड़कर नहीं देखने की हिम्मत नहीं हुई। अब असली इतिहास सामने आने का शंखनाद हो चुका है। इतिहास के नाम हुए सारे पाखंड क़दमों में रोंदे जायेंगे।  

देखिए ऊपर 2013 में लिखा मेरा स्तम्भ। जो इस हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते लिखा था। इससे पहले लिखा था शीर्षक लाल किला किसने और कब बनवाया? जिस पर मेरे अपनी गली में कुछ जेहादी प्रवत्ति के लोगों ने सिर्फ मुझे, संपादक को गालियों देने के अलावा मेरे मृतक परमपूजनीय माता-पिता के लिए भी अपमानित शब्दों का इस्तेमाल किया। आक्रांताओं जिन्हे मुग़ल बादशाह के नामों से पढ़ाया गया, नहीं मालूम पाखंडी इतिहासकारों को कि इन सनातन विरोधियों के समय में यमुना नदी सुभाष मैदान तक बहती थी। यानि लालकिला यमुना नदी के बीच था। ये तो ब्रिटिश काल में यमुना नदी का कटाव किया गया था। इसीलिए सुभाष पार्क से शांतिवन के क्षेत्र को दरिया गंज कहा जाता है। लेकिन जब उपरोक्त  स्तम्भ आया सबकी बोलती बंद हो गयी। 

जब शाहजहां ने दिल्ली की सल्तनत ली तब फारस(जिसे आज ईरान कहते हैं) के राजदूत का लालकिला में मिलन होता है। अब पूछो कि शाहजहां क्या लाल किला अपनी माँ के पेट से लेकर आया था?   


 

यदाकदा ब्लॉग भी लिखता रहा हूँ कुछ का नीचे लिंक दिया गया है। ऐय्याश अकबर को महान बताने वालों से पूछो कि वो सिर्फ औरतों के लिए मीना बाजार क्यों लगाता था। जिसमे दूध पीते लड़के तक को ले जाने की इजाजत नहीं थी। और खुद बुरका ओढ़ ख़ूबसूरत हसीन लड़कियों/औरतों को तलाशता था, मिलने पर परदे में चल रहे अपने सिपाहियों को हरम में लेकर जाने का इशारा करता था। इस ऐय्याशी के मीना बाजार को बंद करवाने में हिन्दू शेरनी किरण देवी की वीरता थी। जमीन पर पटक कर अपनी कटारों से जैसे ही मारने जाने पर जिन्दगी की भीख मांगी थी कि आज के बाद कभी मीना बाजार नहीं लगाने का वायदा किया था। देखिए ऊपर पेंटिंग जो शायद बीकानेर म्युसियम में है।   

चरित्रोपाख्यान: अकबर और रंग कुमारी की कहानी

आगरा स्थित अकबराबाद में एक साहूकार रहा करता था। रंग कुमारी उसी की बेटी थी। कहते हैं उसका सौंदर्य ऐसा था कि जो भी एक बार देख ले मोहित हो जाता। उस समय आगरा अकबर की राजधानी थी और वह वहीं से शासन चलाया करता था। वह फतेहपुर सीकरी में अपना दरबार लगाया करता था। अकबर को शिकार का शौक था और वह अक्सर शिकार खेलने जाया करता था।
एक बार शिकार खेलने के दौरान ही अकबर की नज़र रंग कुमारी पर पड़ी और वह तुरंत ही उस पर मोहित हो गया। अकबर उसे हर हाल में पाना चाहता था। अकबर के बारे में पुस्तक लिख चुके डर्क कोलियर कहते हैं कि अकबर के महल में कम से कम 5000 महिलाएँ होती ही होती थीं। बेल्जियम के लेखक के अनुसार, अकबर अनगिनत महिलाओं के साथ सो चुका था और यह सब तभी शुरू हो गया था जब वह काफ़ी कम उम्र का था। इतिहासकारों की मानें तो अकबर की 300 के क़रीब पत्नियाँ थीं।
अकबर ने कई राजपूत राजघरानों की लड़कियों से शादी कर रखी थी। ख़ैर, वापस रंग कुमारी की कहानी पर आएँ तो अकबर ने अपनी एक दासी को उसके पास भेजा। वह दासी अकबर का सन्देश लेकर रंग कुमार के पास गई। सन्देश यही था कि अकबर ने रंग कुमारी को अपने महल में बुलाया है। रंग कुमारी चालाक महिला थीं। उन्होंने अकबर के पास जाना स्वीकार नहीं किया, लेकिन वह जानती थीं कि वह एक शक्तिशाली बादशाह है। इसीलिए, रंग कुमारी ने अकबर को अपने घर पर बुलाया।
दासी ने अकबर को जाकर रंग कुमारी का सन्देश कहा। जब अकबर रंग कुमारी के पास पहुँचा तो वह बिस्तर लगा रही थी। फिर क्या था, अकबर की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि वह अपने उद्देश्य में सफल हो रहा है। लेकिन, रंग कुमारी भी पतिव्रता हिन्दू महिला थीं। रंग कुमारी ने अकबर को काफ़ी इज्जत दी। बिस्तर लगाने के बाद अकबर से कहा कि वह शौचालय से निपट कर आना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि वह जल्दी ही आ जाएँगी।
                                  ‘चरित्रोपाख्यान’ के अंग्रेजी अनुवाद का अंश (अनुवादक: प्रीतपाल सिंह बिंद्रा )
शौचालय जाने के बहाने निकली रंगा कुमारी ने दरवाजा तेज़ी से बंद कर दिया और इस तरह से अकबर अंदर कमरे में ही क़ैद हो गया। इसके बाद कुमारी अपने पति को लेकर उस कमरे में आ गईं। अपनी पत्नी के साथ छेड़छाड़ से क्रुद्ध रंग कुमारी के पति ने गुस्से में न सिर्फ़ अकबर के ताज को ज़मीन पर पटक कर अपने पैरों तले रौंद डाला बल्कि अपना जूता निकाल कर अकबर को कई जूते लगाए भी।
बादशाह अकबर अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा के डर से यह सब बर्दाश्त करता रहा। कहीं न कहीं उसके मन में यह एहसास भी हो गया कि उसने ग़लत किया है। लज्जा के मारे वह चुपचाप खड़ा रहा। इसके बाद रंग कुमारी और उसके पति ने मिल कर अकबर को एक भू-गर्भित कालकोठरी में क़ैद कर दिया। हिंदुस्तान का बादशाह होकर औरतों पर ग़लत नज़र डालने वाले अकबर की ये कहानी शायद ही कहीं और पढ़ी-पढ़ाई गई हो।
अगले दिन की सुबह होते ही पति-पत्नी अकबर को लेकर शहर के क़ाज़ी के पास पहुँचे। न्यायालय में रंग कुमारी और उसके पति ने अकबर के कुकृत्यों को बताने के बाद कहा, “यह एक संत है, चोर है, साहूकार है या फिर बादशाह है, आप ख़ुद पता कर लीजिए।” इतना कह कर निकल गए। लज्जा के मारे अकबर का सिर ऊपर उठ ही नहीं रहा था। पूरे प्रकरण के दौरान वह सिर झुकाए खड़ा रहा।
‘चरित्रोपाख्यान’ में पूछा गया है कि अगर कोई व्यक्ति इस तरह से पराई स्त्री पर नज़र डालता है और उसके घर में घुस जाता है, क्या उसे दण्डित नहीं किया जाना चाहिए? बादशाह अकबर को इस घटना के बाद अच्छी सीख मिली और उसके बाद उसने किसी पराई स्त्री के घर में घुसना बंद कर दिया। उपर्युक्त कहानी सिख ग्रन्थ ‘चरित्रोपाख्यान’ में वर्णित है, जिसके रचयिता गुरु गोविन्द सिंह माने गए हैं।

Rang Kumari’s husband had no idea the intruder pursuing his wife was Emperor Akbar. He thrashed Akbar with shoes and locked him inside the room.

The next day he informed the civil judge (Qazi) and handed over the intruder. Akbar was totally humiliated and couldn’t speak a word. pic.twitter.com/1H9MHSZHdn

— True Indology (@TIinExile) August 21, 2019    

NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब अब मुग़ल तथा इस्लामी आक्रान्ताओं की सच्चाई बताएगी। ‘समाज की खोज: भारत और उससे आगे भाग 1’ किताब में मुस्लिम आक्रांताओं की क्रूरता को भी बच्चों को पढ़ाया जाएगा। इस किताब में दिल्ली सल्तनत और मुगलों के शासनकाल को एक नए दृष्टिकोण से दिखाया गया है।

इस पुस्तक में बाबर को ‘क्रूर विजेता’, अकबर के शासन को ‘क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण’ और औरंगजेब को ‘मंदिरों व गुरुद्वारों को नष्ट करने वाला’ बताया गया है। किताब में सल्तनत काल को लूट, विध्वंस और धार्मिक असहिष्णुता से भरा बताया गया है।

इंडियन एक्स्प्रेस के अनुसार, NCERT ने बताया है कि यह नई पुस्तक 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच के राजनीतिक घटनाक्रम, विद्रोहों और धार्मिक संघर्षों को केंद्र में रखती है, जिसे अब पहली बार कक्षा 8 में पढ़ाया जा रहा है। इससे पहले इसे 7वीं कक्षा में पढ़ाया जाता था।

सल्तनत काल और धार्मिक स्थलों पर हमले

नई पुस्तक में बताया गया है कि अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने श्रीरंगम, मदुरै, चिदंबरम और संभवतः रामेश्वरम जैसे प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थलों पर आक्रमण किए। दिल्ली सल्तनत के दौरान बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों पर कई बार हमले हुए। किताब के अनुसार, इन हमलों का उद्देश्य केवल लूट नहीं था, बल्कि मूर्तिभंजन यानी धार्मिक प्रतीकों का विनाश भी इसका मुख्य उद्देश्य था।

जजिया कर और गैर-मुस्लिम प्रजा

पुस्तक में ‘जजिया’ कर के बारे में भी बताया गया है। बताया गया है कि कुछ मुस्लिम शासकों द्वारा गैर-मुसलमानों (हिन्दुओं) पर लगाया गया था। किताब के अनुसार, यह कर उनके लिए सार्वजनिक अपमान का कारण भी बन गया। नई किताब के अनुसार, इस कर ने इस्लाम अपनाने के लिए एक प्रकार का वित्तीय और सामाजिक दबाव पैदा किया। कक्षा 7 की पुरानी किताब में जज़िया को भूमि कर के साथ वसूला गया कर बताया गया था, जबकि नई किताब इसे एक स्वतंत्र और अलग कर के रूप में पेश करती है।

बाबर – एक विजेता की दोहरी छवि

बाबर की आत्मकथा में उसे एक सुसंस्कृत और बौद्धिक रूप से जिज्ञासु व्यक्ति बताया गया है, लेकिन नई किताब में कहा गया है कि वह एक क्रूर विजेता था। किताब में बताया गया है कि उसने कई शहरों में नरसंहार किए, महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाया और लूटे गए शहरों के मारे गए लोगों की खोपड़ियों से मीनारें बनवाने पर गर्व महसूस किया। वहीं, पुरानी किताब में बाबर को केवल एक ऐसा शासक बताया गया था जिसे अपने सिंहासन से हटने के बाद काबुल और फिर दिल्ली और आगरा पर कब्ज़ा करने का अवसर मिला।

अकबर – सहिष्णुता और क्रूरता का मिश्रण

अकबर को नई किताब में एक ऐसा शासक बताया गया है जिसमें सहिष्णुता और क्रूरता दोनों के तत्व थे। नई किताब बताती है कि जब उसने चित्तौड़गढ़ के किले पर आक्रमण किया, तो लगभग 30,000 नागरिकों के नरसंहार का आदेश दिया।
किताब के अनुसार, अपनी जीत की घोषणा करते हुए उसने कहा कि उसने काफिरों के किलों और कस्बों पर कब्जा कर इस्लाम की स्थापना की और तलवार के बल पर मंदिरों को नष्ट कर काफिरों के प्रभाव को मिटा दिया। फिर अकबर ने बाद में विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई, फिर भी प्रशासन में गैर-मुसलमानों की संख्या अल्प ही रही।

औरंगजेब – धार्मिकता और राजनीति

नई किताब औरंगजेब के शासन को राजनीतिक और मजहबी दृष्टिकोणों से देखती है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उसके कई निर्णय राजनीतिक थे, उसके फरमान यह भी दिखाते हैं कि उसमें मजहबी कट्टरता भी थी।
उसने अपने राज्य के गवर्नरों को मंदिरों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट करने के आदेश दिए। उसने काशी, मथुरा, सोमनाथ के मंदिरों, जैन धार्मिक स्थलों और सिख गुरुद्वारों को ध्वस्त करने का आदेश दिया।

आर्थिक और सामाजिक स्थिति

पुस्तक यह भी बताती है कि सल्तनत और मुगल शासन के अधीन एक मजबूत प्रशासनिक ढाँचा था और 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच आर्थिक गतिविधियाँ काफी जीवंत थीं। शहरों और बुनियादी ढाँचे में काफी प्रगति हुई, लेकिन 1600 के दशक के अंत में आर्थिक संकट और दबाव का दौर शुरू हुआ। इसके बावजूद, भारतीय समाज ने कस्बों, मंदिरों और अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं के पुनर्निर्माण में लचीलापन और अनुकूलन क्षमता दिखाई।

मराठा और शिवाजी का योगदान

अध्याय के अंत में मराठों का वर्णन किया गया है, जिसमें शिवाजी को एक कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी नेता कहा गया है। उन्हें एक धार्मिक हिंदू बताया गया है जो अन्य धर्मों का सम्मान करते थे और अपवित्र हो चुके मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाते थे।
किताब के भीतर मराठों को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता माना गया है। पुरानी किताब में शिवाजी को केवल एक कुशल प्रशासक और मराठा राज्य की नींव रखने वाला बताया गया था, लेकिन नई किताब में उनके धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को भी महत्व दिया गया है।
अवलोकन करें:-
ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
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बादशाह अकबर की जूतों से क्यों हुई पिटाई?: कौन थी किरण देवी जिससे अय्याश अकबर ने ज़िंदगी की भीख मां


नई किताब में दिल्ली सल्तनत के उत्थान-पतन, विजयनगर साम्राज्य, मुगलों का शासन, उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध और सिखों के उदय को विस्तार से दर्शाया गया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि पहले दिल्ली सल्तनत और मुगल इतिहास की पढ़ाई कक्षा 7वीं में होती थी।
लेकिन अब नए पाठ्यक्रम संरचना में बदलाव करते हुए, इसे 8वीं कक्षा में शामिल किया गया है। यह नई किताब पहले से कहीं ज्यादा आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक और तथ्यों पर आधारित है। इसमें शासकों की धार्मिक और सैन्य नीतियों का खुलकर अंदाजा लगाया गया है, जिसकी जानकारी पहले की किताबों में हल्की फुलकी ही दी गई थी।

अल्लाह के हुक्म से ‘पैगंबर’ बना अब्दुल रज्जाक, बनवाई काबा मस्जिद: लोगों ने गैर-इस्लामिक बता लगा दी आग

                                       अब्दुल द्वारा बनाई गई मस्जिद (फोटो साभार: Freepresskasmir)
जम्मू कश्मीर के बारामूला में एक ढोंगी पीर पकड़ा गया है। उसने जम्मू कश्मीर में ही सऊदी अरब की काबा मस्जिद जैसी एक इमारत बनवा ली थी। वह खुद को पैगम्बर के रूप में दिखाता था। उसने अपने खेत में एक इमारत बनवा रखी थी जहाँ वह गाँजा-चरस पीता था। उसकी मुरीदों में महिलाओं की बड़ी संख्या थी।

जम्मू कश्मीर पुलिस ने बारामूला से अब्दुल रज्जाक नाम के शख्स को पकड़ा है। अब्दुल रज्जाक खुद को जम्मू कश्मीर के सूफी संत नूरदीन नूरानी का अवतार बताता था। अब्दुल रज्जाक ने यही करके बड़ी संख्या में अपने मुरीद इकट्ठा कर लिए थे। उससे मिलने बड़ी संख्या में महिलाएँ भी आती थीं।

उसने अपने खेत में एक झोपड़ी भी बना ली थी। यहाँ वह लोगों को ताबीज बना कर देता था। वह यहाँ आए लोगों को चरस गांजा पिलाता था और खुद भी पीता था। आसपास के लोगों ने उसे मानसिक रूप से बीमार बताया है। उसकी बीवी तक उसे छोड़ कर चली गई थी।

अब्दुल रज्जाक खुद को पैगंबर तक बताने लगा था। उसने दावा किया था कि अल्लाह ने उसे बारामूला में ही काबा जैसी मस्जिद बनवाने का हुक्म दिया है। काबा वही मस्जिद है जहाँ हर साल करोड़ों मुस्लिम हज और उमरा के लिए जानते हैं। अब्दुल रज्जाक बताता था कि वह डुप्लीकेट काबा मस्जिद गरीबों के लिए बनवा रहा है, जो सऊदी अरब नहीं पहुँच पाते।

उसने इसका निर्माण चालू भी कर दिया था। कुछ ही दिनों में वह इसका उद्घाटन करने वाला था। हालाँकि, इसी बीच इस पूरे कारनामे की खबर किसी ने स्थानीय पत्रकारों को दे दी। वह उसके यहाँ उसके मुरीद बन कर गए और उसकी हरकतों के बारे में जानकारी हासिल की।

इस कथित पैगंबर का उन्होंने वीडियो भी बना लिया और उसकी सच्चाई सोशल मीडिया पर डाल दी। वीडियो वायरल होने पर उसके बारे में लोग जान गए और फिर पुलिस को भी यह सूचना दी गई। उसको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसकी फर्जी काबा मस्जिद भी लोगों ने ध्वस्त कर दी और आग लगा दी। इसके वीडियो भी वायरल हो रहे हैं।

इस मस्जिद को कश्मीर के एक मौलाना ने गैर इस्लामी बताया और कहा कि शरिया में इसकी कोई जगह नहीं है।

हाई कोर्ट में नकाब से चेहरा ढककर आई मुस्लिम महिला वकील, जज ने हटाने को कहा तो बोली- ये मेरा मौलिक अधिकार

                                                                                                   प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: Bing AI
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने हिजाब पहनी एक महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया। महिला वकील ने अपना चेहरा ढक रखा था। जब जज ने महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने को कहा तो उस महिला वकील ने चेहरा दिखाने से इनकार कर दिया। जज ने कहा कि कोई भी महिला वकील अपना चेहरा ढक कर अदालत में बहस नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति मोक्ष खजुरिया काज़मी और न्यायमूर्ति राहुल भारती की ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि महिला वकीलों को अपना चेहरा ढककर अदालत में उपस्थित होने की अनुमति नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने महिला वकील की बातें सुनने से इनकार कर दिया और इस केस में अगली तारीख दे दी।

दरअसल, यह मामला 27 नवंबर का है। उस दिन ‘मोहम्मद यासीन खान बनाम नाज़िया इकबाल’ से जुड़े घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान एक महिला हाई कोर्ट में पेश हुई। उसने खुद को सैयद ऐनैन कादरी नाम की एक वकील बताया और कोर्ट को कहा कि इस मामले को रद्द करने से जुड़ी याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रही है।

वह कोर्ट में वकील की पोशाक में आई, लेकिन उसने अपना चेहरा ढक रखा था। उस समय मामले की सुनवाई जस्टिस राहुल भारती कर रहे थे। जब न्यायाधीश राहुल भारती ने उस महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने का अनुरोध किया तो उसने इनकार कर दिया। महिला वकील ने जोर देकर कहा कि चेहरा ढककर आना उनका मौलिक अधिकार है। इसलिए कोर्ट उससे नकाब हटाने के लिए नहीं कह सकता।

इसके बाद जज राहुल भारती ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा, “यह न्यायालय याचिकाकर्ताओं के वकील के रूप में खुद को अधिवक्ता सुश्री सैयद ऐनैन कादरी बताने वाली महिला की उपस्थिति पर विचार नहीं करता, क्योंकि कोर्ट के पास एक व्यक्ति और एक पेशेवर के रूप में उनकी वास्तविक पहचान की पुष्टि करने का कोई आधार/अवसर नहीं है।” कोर्ट ने मामले को 5 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया।”

इसके बाद कोर्ट ने न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से पूछा कि क्या ऐसा कोई नियम है, जो महिला अधिवक्ताओं को अपना चेहरा ढककर पेश होने या अपना नहीं चेहरा ढकने के न्यायालय के अनुरोध को अस्वीकार करने का अधिकार देता है। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ने 5 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की जाँच करने के बाद न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने 13 दिसंबर को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा निर्धारित नियमों में ऐसे किसी अधिकार का उल्लेख नहीं है। बीसीआई नियमों के अध्याय IV (भाग VI) की धारा 49(1) (जीजी) के तहत महिला अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड का विवरण दिया गया है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने पाया कि BCI की इन प्रावधानों में महिला अधिवक्ताओं को काले रंग की पूरी आस्तीन वाली जैकेट या ब्लाउज, सफेद बैंड, साड़ी या अन्य मामूली पारंपरिक पोशाक के साथ-साथ काला कोट पहनने की अनुमति है। हालाँकि, न्यायालय ने बताया कि निर्धारित न्यायालय पोशाक में चेहरा ढकना शामिल नहीं है या इसकी अनुमति नहीं है।

इसके बाद न्यायालय ने कहा, “नियमों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए इस तरह की कोई पोशाक (चेहरा ढकना) स्वीकार्य है।” हालाँकि, बाद में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक अन्य वकील आगे आए। बाद में न्यायमूर्ति काज़मी ने 6 दिसंबर को मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया और 13 दिसंबर को उसे खारिज कर दिया।