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पश्चिम मीडिया के नए ‘दुलरुआ’ बने सोनम वांगचुक, The Guardian ने हिंसा के जिम्मेदारों की जगह मोदी सरकार पर उठाए सवाल

                                                                                                                                      साभार 
विदेशी मीडिया गिद्धों की तरह इस ताक में रहती है कि कहीं भारत में कुछ हो और वो अपना प्रोपेगेंडा फैला सकें। लद्दाख में बीते 24 सितंबर को हिंसा हुई, इस हिंसा को भड़काने के आरोप में केंद्र सरकार ने ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया है। इसके बाद ‘द गार्जियन’ ने अपनी एक रिपोर्ट में लद्दाख हिंसा पर आँख मूंदकर इस गिरफ्तारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ‘असहमति’ के खिलाफ कार्रवाई का हिस्सा बताया है।
                                                          द गार्जियन की रिपोर्ट का अंश

द गार्जियन की रिपोर्ट के शुरुआती हिस्से पढ़ने पर ही समझ आ जाता है कि असल में यह कोई रिपोर्ट ना होकर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में प्रोपेगेंडा है। रिपोर्ट के शुरुआती हिस्से में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि मोदी सरकार ‘असहमति’ की आवाज, साधारण शब्दों में समझें तो अपना विरोध, नहीं सुन सकती है इसलिए वांगचुक की गिरफ्तारी हुई है।

अब इस दावे के बाद ठीक आगे की ही लाइन में गार्जियन ने वांगचुक का परिचय देते हुए लिखा कि वह मोदी सरकार के खिलाफ ‘लंबे आंदोलन‘ का नेतृत्व कर रहे हैं। बात सही है, वह लंबे आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, और इस नेतृत्व में माँगे भी मोदी सरकार से ही कर रहे थे। तो क्या मोदी सरकार ने वांगचुक को जेल में डाल दिया था नहीं, बल्कि उनसे बातचीत करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था।

भारत सरकार की कोशिश यह नहीं थी कि ‘असहमति’ की आवाज दबा दी जाए बल्कि यह थी कि उनकी आवाज को सुना जाए, कार्रवाई की जाए। उन्हें लद्दाख में हुई हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया है जिसमें 4 लोगों की मौत हुई है। यह बात गार्जियन ने जानबूझकर अपने खबर की शुरुआत जानकारी में छिपा ली है।

और यह केवल इकलौता प्रोपेगेंडा नहीं है। इसके आगे भी मनगढ़ंत कहानी लिखने की कोशिश की गई है।

                                                           द गार्जियन की रिपोर्ट का अंश

इस रिपोर्ट में हिंसा तक को सही ठहराने के भी तर्क दिए गए हैं। गार्जियन ने लिखा, “यह क्षेत्र (लद्दाख) पहले जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था लेकिन इसे मोदी सरकार ने एकतरफा तरीके से भंग कर दिया जिससे स्थानीय लोगों में गुस्सा और निराशा फैल गई।”

गार्जियन को लोगों का गुस्सा और निराशा तो दिखी लेकिन वह यह बताना भूल गया कि इसी लद्दाख में दशकों तक केंद्र शासित प्रदेश बनने के लिए प्रदर्शन हुए थे। जिस दिन इसे UT बनाया गया, उस दिन लद्दाख में लोग ढोल-नगाड़े बजाकर नाच रहे थे। आज पूर्ण राज्य की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे सोनम वांगचुक खुद मोदी सरकार का धन्यवाद करते नहीं थक रहे थे।

साफ है कि गार्जियन का मकसद सच बताना नहीं बल्कि मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा सैट करना है। एक नैरेटिव बनना है कि 2019 के बाद से जब से लद्दाख UT बना है, लोग परेशान हैं। इसका मतलब होता है कि यही परेशानी लोगों की हिंसा की वजह बनी है।

                                                     द गार्जियन की रिपोर्ट का अंश

गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में आगे भारत के लद्दाख में सैन्य निर्माण और बुनियादी ढांचे के निर्माण पर भी अपना दुखड़ा रोया है। गार्जियन को चिंता है कि भारत के सैन्य निर्माण से पर्यावरण पर प्रभाव पड़ रहा है। चीन की आक्रामकता की गार्जियन को सोनम वांगचुक की तरह ही कोई चिंता नहीं है।

गार्जियन जैसे विदेशी मीडिया संस्थान बार-बार भारत के सैन्य निर्माण और इन्फ्रास्ट्रक्चर को पर्यावरणीय संकट बताकर निशाना बनाते हैं। लेकिन यही मीडिया अन्य देशों के विशाल सैन्य अड्डों, सड़कों, सुरंगों और एयरबेस निर्माण को लेकर शायद ही कभी सवाल उठाता है।

भारत का सैन्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर कोई अपनी छाती ठोकने के लिए नहीं किया जा रहा है बल्कि सैन्य जरूरतों और चीन की आक्रामकता को देखते हुए किया जा रहा है। इस पर रोने के बजाय इसकी जरूरत को समझना चाहिए।

विदेशी चंदा, करोड़ों की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप: सरकार से पारदर्शिता की माँग करने वाले सोनम वांगचुक खुद कितने साफ?

                     विदेशी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप (फोटो साभार : Amar ujala & Canva)
CAA विरोध में बने शाहीन बागों से वाया बुर्का/हिजाब उपद्रव, तथाकथित आन्दोलनजीवी किसान और पहलवानों द्वारा धरना/प्रदर्शन करने पर हर कोई मोदी सरकार की खूब आलोचना कर रहा था, सच्चाई जाने बिना आलोचना बेमतलब होती है। दरअसल, बिकाऊ उपद्रवी ज्यादा कहीं टिक नहीं पाते। हकीकत में आज विपक्ष जो कुछ भी बोल या कर रहा है अपनी अक्ल से नहीं बल्कि भारत विरोधियों से मिले चंदे पर कर रहा है। नतीजा सबके सामने है कि मोदी विरोध में देश को ही आग में झोंकने की कोशिश कर रहे हैं। 
देश में आग लगाने की हर तरह से कोशिश की जा रही है। हिन्दुओं को जातियों में बांटने का दुस्साहस करने ईसाई और मुसलमानों को जातियों में बाँटने की हिम्मत नहीं। जिगरा चाहिए। ये वीडियो देखिए मुस्लिम कट्टरपंथियों को बेनकाब कर रही है:-

     
लद्दाख में अस्थिरता के बीच सोनम वांगचुक पर गंभीर आरोप, असली जन आंदोलन और राजनीतिक हेरफेर के बीच की रेखाएँ धुँधली होने का खतरा।

लद्दाख में जारी अशांति ने अब एक नया और चिंताजनक मोड़ ले लिया है। जिस समय यह क्षेत्र पहले से ही तनाव और हिंसक झड़पों के कारण अशांत है, उसी समय कुछ ऐसे आरोप सामने आए हैं, जो इसकी राजनीतिक और सामाजिक दिशा को बदल सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनोवेटर और पर्यावरणविद् के रूप में पहचाने जाने वाले सोनम वांगचुक, जिन्हें लद्दाख के आंदोलनों का चेहरा माना जाता है, अब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के केंद्र में हैं।

आंदोलन की आड़ में भावनाओं से खिलवाड़- बीजेपी

भाजपा के शीर्ष सूत्रों द्वारा लगाए गए ये आरोप महज गड़बड़ी का मामला नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देते हैं कि वांगचुक ने आंदोलन की आड़ में जनता की भावनाओं को भड़काकर निजी और संगठनात्मक हित साधने का प्रयास किया। सबसे बड़ा और ताज़ा घटनाक्रम गृह मंत्रालय का वह निर्णय है, जिसमें उसने सोनम वांगचुक द्वारा स्थापित स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की एफसीआरए (FCRA) रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया।

यह फैसला विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act), 2010 के तहत कई गंभीर उल्लंघनों के बाद लिया गया। यह कोई साधारण प्रशासनिक कदम नहीं है- इसका सीधा असर SECMOL की विदेशी चंदा प्राप्त करने की वैधता पर पड़ा है। इसके अलावा, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भी जाँच शुरू कर दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं विदेशी चंदा का दुरुपयोग तो नहीं हुआ। जाँच से जो आँकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।

संस्थाओं के फंडिंग में गड़बड़ी और नियम तोड़ना

सोनम वांगचुक की प्रमुख संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) के फंडिंग में अचानक से होने वाली बढ़ोतरी देखी गई। वित्तीय वर्ष 2023-24 में जहाँ यह राशि 6 करोड़ रुपए थी, वहीं अगले वर्ष यह बढ़कर 15 करोड़ रुपए से अधिक हो गई। पहली नजर में इसे जनता के बढ़ते समर्थन का नतीजा माना जा सकता है, लेकिन जाँच एजेंसियों का दावा है कि यह वित्तीय प्रवाह पूरी तरह पारदर्शी नहीं है।
HIAL से जुड़े सात बैंक खातों में से चार खाते कथित रूप से घोषित नहीं किए गए। और भी गंभीर बात यह है कि इस संस्था ने 1.5 करोड़ रुपए से अधिक विदेशी पैसा बिना FCRA रजिस्ट्रेशन के प्राप्त की, जो कि कानून की धारा 11 का सीधा उल्लंघन है।

9 बैंक खातों में से 6 की अधिकारियों को जानकारी नहीं

गड़बड़ी यहीं तक सीमित नहीं है। SECMOL के पास कुल नौ बैंक खाते बताए जा रहे हैं, जिनमें से छह खातों को अधिकारियों से छिपाया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं सुनियोजित तरीके से वित्तीय लेन-देन को छुपाने का प्रयास तो नहीं हुआ।
इसके साथ ही एक निजी कंपनी शेष्योन इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड (SIPL) भी जाँच के दायरे में आई है, जिसमें सोनम वांगचुक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। आरोप है कि HIAL से इस निजी कंपनी में 6.5 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) और फंड के दुरुपयोग के सवाल खड़े हो गए हैं। इतना ही नहीं, इस कंपनी का शुद्ध लाभ (Net Profit) एक वर्ष में 6.13% से गिरकर सिर्फ 1.14% रह गया, जिससे संदेह और गहरा हो गया कि कहीं धनराशि को गलत तरीके से बाहर तो नहीं निकाला गया।
सबसे गंभीर आरोप सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति पर हैं।

सोनम वांगचुक ने ₹2.3 करोड़ विदेश भेजा

भाजपा सूत्रों का कहना है कि उनके पास कुल 9 व्यक्तिगत बैंक खाते हैं, जिनमें से 8 खातों का खुलासा नहीं किया गया। इन खातों में ज्यादा संख्या में विदेशी पैसा आने का दावा किया गया है। और भी चिंताजनक बात यह है कि 2021 से अब तक सोनम वांगचुक ने 2.3 करोड़ रुपए से अधिक की पैसा विदेश भेजी, जिनके प्राप्तकर्ताओं की पहचान ‘अज्ञात संस्थाओं’ के रूप में बताई जा रही है।
यह सीधे तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका पैदा करता है। विडंबना यह है कि सोनम वांगचुक अक्सर कॉरपोरेट जगत और सरकारों की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन आरोप है कि उनकी संस्थाओं ने सरकारी उपक्रमों (PSUs) और निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में CSR (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) फंड प्राप्त किए हैं। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह उनके सार्वजनिक बयानों और निजी कार्यों के बीच भारी विरोधाभास को उजागर करेगा।
इन आरोपों के असर बहुत दूरगामी हो सकते हैं। अब तक लद्दाख के आंदोलन को एक जमीनी स्तर का संघर्ष माना जाता था, जो स्थानीय लोगों की स्वायत्तता (खुद निर्णय लेने वाले), पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान की माँगों पर आधारित था। लेकिन अगर ये वित्तीय अनियमितताएँ साबित हो जाती हैं, तो यह आंदोलन एक व्यक्ति के निजी लाभ और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का माध्यम बनकर रह जाएगा। इसका सीधा नुकसान लद्दाख के आम लोगों की वैध माँगों को होगा, जो कमजोर पड़ सकती हैं।
यह भी सच है कि आरोप और सच्चाई में फर्क होता है। सोनम वांगचुक का काम और योगदान, विशेषकर शिक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में, अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकार और उद्योगों से पारदर्शिता की माँग करता है, तो उसे स्वयं भी उतनी ही पारदर्शिता दिखानी चाहिए। CBI की जाँच के परिणाम दो कहानियों में से एक को सामने लाएँगे या तो यह एक दूरदर्शी नेता के खिलाफ राजनीतिक साजिश का मामला होगा, या फिर एक आंदोलनकारी नेता के मुखौटे के पीछे छिपे वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश होगा।​ लद्दाख और देश की जनता को अब सत्य की प्रतीक्षा है, क्योंकि यही सच न केवल सोनम वांगचुक की छवि बल्कि लद्दाख के भविष्य को भी निर्धारित करेगा।

लद्दाख के लोगों को बरगलाने में एक का नहीं हाथ, सोनम वांगचुक-कांग्रेस मिलकर कर रहे काम: छिपाया सरकार से बातचीत होने का सच, हाथ में दिए जा रहे पत्थर


राहुल गाँधी द्वारा अचानक से अपने पोस्ट्स में 'Gen Z' लिखा जाना अचानक नहीं था। नेपाल में जो हुआ उसे देख-समझकर ऐसा किया गया था। हालाँकि, दिल्ली और हैदराबाद सहित एक के बाद एक विश्वविद्यालयों में ABVP की जीत उनके अरमानों पर लगातार पानी फेर रही थी। अतः लेह से आग फैलाए जाने की साज़िश रची गई।

लेह में जो लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उनमें अधिकतर छात्र व युवा ही हैं। 'पूर्ण राज्य' बनाने का मतलब क्या होता है?
जो क्षेत्र दशकों तक मुफ़्ती-अब्दुल्ला परिवारों की जागीर बना रहा, उसे बाहरी शिकंजे से मुक्त कराया गया। केंद्र सरकार ने ध्यान दिया तो कामकाज भी हुआ। फिर आंदोलन क्यों?
क्या चाहते हैं ये, फिर से मुफ़्ती-अब्दुल्ला परिवारों का राज, जो लद्दाख से थे ही नहीं। तब क्यों नहीं निकले सड़क पर, क्यों नहीं किया आंदोलन? यह जॉर्ज सोरोस, चीन के माध्यम से उसके द्वार लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमा प्रांत को अस्थिर करने की देशद्रोही राहुल गांधी की साजिश है
              लद्दाख में हुई हिंसा में कॉन्ग्रेस पार्षद स्टैनजिंग त्सेपांग और सोनम वांगचुक का आ रहा है नाम
अगस्त 2019 में जब लद्दाख को UT का दर्जा मिला तो सोनम वांगचुक, प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी का ‘हाथ जोड़कर’ धन्यवाद कर रहे थे। अब वही वांगचुक ‘हाथ में पत्थर लेने’ के लिए लोगों को उकसा रहे हैं। शांति के लिए मशहूर लद्दाख, हिंसा की चपेट में है, लोग मारे गए हैं और सुनियोजित डिजाइन के तहत हिंसा को उकसाने वाला अपने गाँव भाग गया है। कांग्रेस पार्षद के खुद हाथों में हथियार लिए लोगों को भड़काने के वीडियो-फोटो सामने आए हैं।
जिस लद्दाख में 5 अगस्त 2019 को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की माँग पूरी होने का जश्न मनाया जा रहा थी, वहीं बीते बुधवार को पथराव और आगजनी की गई। लद्दाख में बुधवार (24 सितंबर 2025) को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने समेत कई माँगों को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए।
इन हिंसक प्रदर्शनों में 4 लोग मारे गए हैं और दर्जनों लोग घायल हैं। बीजेपी के दफ्तर और सुरक्षाबल के वाहनों को प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी और कई जगहों पर पथराव किए जाने की भी खबरें हैं।

लद्दाख को UT बनाए जाने का जश्न मना रहे थे सोनम वांगचुक

इस हिंसा में केंद्रीय किरदार हैं सोनम वांगुचक, उनकी भूख हड़ताल के बीच ही यह हिंसा हुई है। वांगचुक ही अपने समर्थकों के साथ लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। मौजूदा वक्त में इस हिंसा के लिए लोगों को उकसाने में उनका नाम आ रहा है लेकिन कभी वो लद्दाख को UT बनाए जाने का जश्न मना रहे थे।
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था। एक बना जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख। सोनम वांगचुक ने उसी दिन केंद्र सरकार को धन्यवाद भी दिया था।
वांगचुक ने 5 अगस्त 2019 को X पर एक पोस्ट में लिखा, “धन्यवाद प्रधानमंत्री जी, लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा करने के लिए लद्दाख नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देता है। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दाखी नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा पाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद!"
लद्दाख को UT के दर्ज पर जश्न मनाने वालों में केवल वांगचुक ही शामिल नहीं थे, इसमें अंजुमन मोइन-उल-इस्लाम जैसे संगठन भी शामिल थे। इस संगठन ने 5 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार को धन्यवाद देते हुए एक पत्र जारी किया था। खुद सोनम वांगचुक ने यह पत्र अपने X अकाउंट पर शेयर किया था।
जो लेह आज हिंसा की चपेट है, जल रहा है उसी लेह में 5 अगस्त 2019 के बाद लोग लद्दाख को UT का दर्जा दिए जाने पर नाच-गा कर जश्न मना रहे थे।

लंबा है लद्दाख के लिए UT की माँग का इतिहास

लद्दाख के लोग जो अगस्त 2019 में जश्न मनाने के लिए सड़कों पर निकले थे वो यूँ ही नहीं था। दरअसल, मोदी सरकार ने उनकी दशकों से चली आ रही माँग को पूरा कर दिया था। लद्दाख को UT का दर्जा दिए जाने से पहले जून 2019 में बीजेपी के तत्कालीन सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल ने कहा था, “लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग किए जाने की माँग आज की नहीं है, बल्कि 1948 से ही लद्दाख के लोग अपनी अलग पहचान चाहते थे।”
नामग्याल का यह दावा सही भी है, 1949 में लद्दाख बुद्धिस्ट असोसिएशन (LBA) की विषय समिति के अध्यक्ष चीवांग रिग्जिन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ज्ञापन देकर लद्दाखियों के लिए ‘स्वशासन’ की माँग की थी।
लद्दाख के लिए UT की माँग को लेकर 1964 में एक बड़ा आंदोलन भी हुआ। यह आंदोलन बौद्ध संत और लद्दाख के तत्कालीन प्रमुख लामा कुशोक बकुला रिनपोछे के नेतृत्व में हुआ था। हालाँकि, इस प्रदर्शन में UT का दर्जा दिए जाने की माँग नहीं मानी गई।
1989 में एक बार फिर UT की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू हुआ। LBA ने भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपकर फिर से लद्दाख के लिए ‘स्वायत्तता’ की माँग की। LBA ने इसके लिए एक बड़ी रैली भी निकाली। 1995 में इसी माँग को लेकर LAHDC (Ladakh Autonomous Hill Development Council) की भी स्थापना की गई।
                                   1989 में UT की माँग को लेकर LBA की लेह चलो रैली
इसके बाद कई वर्षों तक UT की माँग को लेकर प्रदर्शन होते रहे। तब केंद्र सरकार का मानना था कि प्रदर्शनकारियों की माँगों को पूरा करने के लिए उन्हें अनुच्छेद 370 में बदलाव करना पड़ेगा जिसके लिए कांग्रेस सरकार तैयार नहीं थी।
2016 में भी UT की माँग कर रही सर्व धार्मिक संयुक्त कार्रवाई समिति (ARJAC) ने प्रस्ताव पारित कर लद्दाख के लिए अलग UT की माँग थी। लद्दाखियों की इस माँग को अंतत: 2019 में मोदी सरकार ने ही पूरा किया।

कैसे पूर्ण राज्य के दर्जे तक पहुँची माँग

लद्दाख को UT का दर्जा मिल गया और वहाँ केंद्र सरकार ने विकास पहुँचाना भी शुरू कर दिया। मोदी सरकार में लद्दाख को एक विश्वविद्यालय, होटल प्रबंधन संस्थान और पेशेवर कॉलेज की अनुमति दी गई। करोड़ों का विशेष पैकेज दिया गया। सड़कों, पुलों का निर्माण किया गया। यह शांति और विकास कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ से पचाया नहीं जा सका।
लोगों के बीच यह धारणा फैलानी शुरू कर दी गई कि यहाँ कंपनियाँ आकर सारी जमीन हड़प लेंगी। यहाँ बाहर के लोग आकर बस जाएँगे, जैसी बातें लोगों के बीच फैलानी शुरू कर दी गईं। 2023 की शुरुआत में सोनम वांगचुक ने ‘लद्दाख के संवैधानिक सुरक्षा उपायों’ की माँग को लेकर खुले आसमान के नीचे सोकर प्रदर्शन शुरू किया। धीरे-धीरे यह प्रदर्शन आगे बढ़ता रहा।
Leh Apex Body (LAB) और कारगिल डेमोक्रैटिक अलायंस (KAD) भी उनके समर्थन में आ गए। मार्च 2024 में सोमन वांगचुक और LAB-KDA से जुड़े लोगों ने लेह में फिर हड़ताल शुरू कर दी। सितंबर 2024 में LAB ने ‘दिल्ली चलो पदयात्रा’ की भी शुरुआत की थी।

छठी अनुसूची-पूर्ण राज्य के लिए जारी बातचीत?

लद्दाख के नेताओं ने 4 माँगों के साथ गृह मंत्रालय से संपर्क किया था, जिसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल कराने की माँग, एक अलग लोक सेवा आयोग की स्थापना और दो संसदीय सीटों की माँग शामिल थी। इनमें से आखिरी दो पर गृह मंत्रालय ने सैद्धांतिक सहमति भी दे दी थी।
लद्दाख में प्रदर्शनकारियों इसे संविधान की छठी अनुसूची में भी शामिल करने की माँग कर रहे हैं। मोटे तौर पर इसे समझें तो संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता प्रदान करने का प्रावधान जिसका मकसद आदिवासी समुदायों की संस्कृति, जमीन और संसाधनों की रक्षा करना है।
यह माँग खुद बीजेपी ने भी अपने घोषणा पत्र में रखी है, तो जाहिर है कि इसे माँग को आगे ले जाने पर पार्टी ने विचार भी किया होगा। प्रदर्शनकारियों की माँगों के लिए केंद्र सरकार से लगातार बातचीत चल रही है।
मार्च 2024 में वांगुचक के प्रदर्शन से पहले लद्दाख के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत की थी। इस बातचीत को लेकर गृह मंत्रालय ने कहा, “अमित शाह ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपाय प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।
यह कोई इकलौती बैठक नहीं थी। गृह मंत्रालय ने 24 सितंबर 2025 को प्रेस नोट में बताया, “भारत सरकार इन्हीं मुद्दों पर Apex Body Leh और Kargil Democratic Alliance के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रही है। उच्चाधिकार प्राप्त समिति और उप-समितियों के औपचारिक माध्यम से और नेताओं के साथ कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से उनके साथ कई बैठकें हुईं।”
केंद्र सरकार ने कहा कि लद्दाख के नेताओं के साथ 25 और 26 सितंबर को भी बैठकें आयोजित करने की योजना है। आगामी 6 अक्टूबर को भी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक होनी है लेकिन उससे पहले ही लद्दाख को दंगों की आग में झोंकने की कोशिश की गई है।

वांगचुक ने हिंसा भड़काने के लिए की थी प्लानिंग?

लेह में आगजनी और पत्थरबाजी तो बुधवार को हुई लेकिन इसके बीज पहले से ही बोये जा रहे थे। सोनम वांगचुक ने सितंबर 2024 में एक प्रेस कॉन्फ्रेस में ही स्थिति विस्फोटक होने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था, “सरकार ने उन्हें (लद्दाख के लोगों) लोकतंत्र न देकर उनके पंख काट दिए हैं और दूसरी ओर, उन्हें रोज़गार न देकर उनके हाथ काट दिए हैं। पाकिस्तान और चीन की सीमा से लगे लद्दाख में स्थिति विस्फोटक हो सकती है।”
अपनी विदेशी फंडिंग को लेकर सवालों में रहने वाले सोनम वांगचुक ने इन प्रदर्शनों में GenZ का रेफ्रेंस दिया। यह शब्द हाल ही में नेपाल में हुए GenZ प्रदर्शनों से चर्चा में आया है जहाँ आगजनी-लूटपाट-पथराव की घटनाएँ हुई। नेपाल में दर्जनों लोग मारे गए, मंत्रियों तक को मारा पीटा गया और सरकार बदल दी गई।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अपने प्रदर्शनों को नेपाल के प्रदर्शन से जोड़कर वांगचुक क्या हिंसा को सही ठहराने और सरकार का तख्ता पल्टने की प्रक्रिया को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं? सिर्फ सोनम ही नहीं कॉन्ग्रेस के एक पार्षद की भी इस हिंसा को भड़काने में भूमिका होने के आरोप लगाए गए हैं। बीजेपी ने पार्षद स्टैनजिंग त्सेपांग की हिंसा भड़काते हुए तस्वीरें और वीडियो शेयर किए हैं।
गृह मंत्रालय ने भी कहा है, “कई नेताओं द्वारा भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह करने के बावजूद, उन्होंने (वांगचुक) भूख हड़ताल जारी रखी और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में Gen Z के विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया।”
जब इस हिंसा को रोकने के लिए प्रयास करने की जरूरत थी तब वांगचुक कहाँ थे? गृह मंत्रालय बताता है, “सोनम वांगचुक ने अपने भड़काऊ बयानों के माध्यम से भीड़ को उकसाया था। संयोगवश, इस हिंसक घटनाक्रम के बीच, उन्होंने अपना उपवास तोड़ दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास किए बिना एम्बुलेंस से अपने गाँव चले गए।”
अवलोकन करें:-
‘नेपाल जैसे लगा दो धामी के घर को आग’: UKSSSC पेपर लीक की आड़ में Gen-Z वाली आग से देवभूमि सुलगाने की साजिश
जाहिर है कि जिस विषय पर सरकार बातचीत कर रही थी, जिन माँगों को लेकर बैठकें हुई थीं और आगे भी होनी थीं, उसमें इस तरह की हिंसा होना सुनियोजित ही हो सकता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बातचीत ही रास्ता है और उसी से इसका हल निकला चाहिए था लेकिन जिस तरह अराजकता भड़काने की कोशिश की गई, उससे साफ है कि कुछ लोगों को भारत की शांति नहीं पच रही है। वो कभी GenZ, तो कभी बांग्लादेश-श्रीलंका जैसे उदाहरणों के जरिए देश में अराजकता का माहौल पैदा करना चाहते हैं।

हाई कोर्ट में नकाब से चेहरा ढककर आई मुस्लिम महिला वकील, जज ने हटाने को कहा तो बोली- ये मेरा मौलिक अधिकार

                                                                                                   प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: Bing AI
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने हिजाब पहनी एक महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया। महिला वकील ने अपना चेहरा ढक रखा था। जब जज ने महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने को कहा तो उस महिला वकील ने चेहरा दिखाने से इनकार कर दिया। जज ने कहा कि कोई भी महिला वकील अपना चेहरा ढक कर अदालत में बहस नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति मोक्ष खजुरिया काज़मी और न्यायमूर्ति राहुल भारती की ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि महिला वकीलों को अपना चेहरा ढककर अदालत में उपस्थित होने की अनुमति नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने महिला वकील की बातें सुनने से इनकार कर दिया और इस केस में अगली तारीख दे दी।

दरअसल, यह मामला 27 नवंबर का है। उस दिन ‘मोहम्मद यासीन खान बनाम नाज़िया इकबाल’ से जुड़े घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान एक महिला हाई कोर्ट में पेश हुई। उसने खुद को सैयद ऐनैन कादरी नाम की एक वकील बताया और कोर्ट को कहा कि इस मामले को रद्द करने से जुड़ी याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रही है।

वह कोर्ट में वकील की पोशाक में आई, लेकिन उसने अपना चेहरा ढक रखा था। उस समय मामले की सुनवाई जस्टिस राहुल भारती कर रहे थे। जब न्यायाधीश राहुल भारती ने उस महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने का अनुरोध किया तो उसने इनकार कर दिया। महिला वकील ने जोर देकर कहा कि चेहरा ढककर आना उनका मौलिक अधिकार है। इसलिए कोर्ट उससे नकाब हटाने के लिए नहीं कह सकता।

इसके बाद जज राहुल भारती ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा, “यह न्यायालय याचिकाकर्ताओं के वकील के रूप में खुद को अधिवक्ता सुश्री सैयद ऐनैन कादरी बताने वाली महिला की उपस्थिति पर विचार नहीं करता, क्योंकि कोर्ट के पास एक व्यक्ति और एक पेशेवर के रूप में उनकी वास्तविक पहचान की पुष्टि करने का कोई आधार/अवसर नहीं है।” कोर्ट ने मामले को 5 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया।”

इसके बाद कोर्ट ने न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से पूछा कि क्या ऐसा कोई नियम है, जो महिला अधिवक्ताओं को अपना चेहरा ढककर पेश होने या अपना नहीं चेहरा ढकने के न्यायालय के अनुरोध को अस्वीकार करने का अधिकार देता है। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ने 5 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की जाँच करने के बाद न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने 13 दिसंबर को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा निर्धारित नियमों में ऐसे किसी अधिकार का उल्लेख नहीं है। बीसीआई नियमों के अध्याय IV (भाग VI) की धारा 49(1) (जीजी) के तहत महिला अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड का विवरण दिया गया है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने पाया कि BCI की इन प्रावधानों में महिला अधिवक्ताओं को काले रंग की पूरी आस्तीन वाली जैकेट या ब्लाउज, सफेद बैंड, साड़ी या अन्य मामूली पारंपरिक पोशाक के साथ-साथ काला कोट पहनने की अनुमति है। हालाँकि, न्यायालय ने बताया कि निर्धारित न्यायालय पोशाक में चेहरा ढकना शामिल नहीं है या इसकी अनुमति नहीं है।

इसके बाद न्यायालय ने कहा, “नियमों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए इस तरह की कोई पोशाक (चेहरा ढकना) स्वीकार्य है।” हालाँकि, बाद में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक अन्य वकील आगे आए। बाद में न्यायमूर्ति काज़मी ने 6 दिसंबर को मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया और 13 दिसंबर को उसे खारिज कर दिया।