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सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र का विरोध करने वालों को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से झटका, कोर्ट ने कहा- संस्कार सिखाना गलत नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी प्रार्थनाएं कराने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह फैसला बिल्कुल सही है, क्योंकि किसी भी छात्र को जबरदस्ती ये प्रार्थनाएं गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। राज्य के सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र के पाठ को शुरू करने के सरकारी आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर हाई कोर्ट ने एक बड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि स्कूलों में संस्कार सिखाना गलत नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने न केवल इस याचिका को  खारिज किया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और नैतिक शिक्षा को किसी संकीर्ण सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह फैसला देश में ‘सांस्कृतिक जागरूकता बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता’ की बहस में एक मील का पत्थर साबित होगा।

वंदना के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की मंशा राजनीतिक तुष्टिकरण

इस पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जबकि राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग का 12 जून 2026 को एक सर्कुलर जारी किया। इसमें शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ-साथ सरस्वती वंदना और छुट्टी के समय गायत्री मंत्र के गायन का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के आते ही देश का एक खास वर्ग सक्रिय हो उठा। हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देने वालों में छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद शामिल थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकारी धन से चलने वाले स्कूलों में इन मंत्रों का पाठ संविधान का उल्लंघन है, जो धार्मिक शिक्षा देने पर रोक लगाते हैं। हालांकि, इसके पीछे छिपी कुत्सित मंशा साफ तौर पर राजनीतिक तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक विरासत को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने की थी।

किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं

राज्य सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखा। सरकार ने कहा कि ये मंत्र और वंदनाएं किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और अच्छे संस्कारों का हिस्सा हैं। इनका मकसद बच्चों में अनुशासन, बड़ों के प्रति आदर और पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाना है। सरकार ने यह भी बताया कि यह नियम लागू हो चुका है और किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग के इस नियम के मुताबिक, राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ करना होता है। इसके साथ ही महापुरुषों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। दोपहर के खाने से पहले भोजन मंत्र और स्कूल की छुट्टी होने से पहले गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ किया जाता है।

देश के राज्यों की स्थिति: कहां-कहां गूंजते हैं ये मंत्र?
भारत के कई राज्यों में सुबह की प्रार्थना सभाओं में सरस्वती वंदना और वैदिक मंत्रों का गायन एक पुरानी और स्थापित परंपरा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ में शैक्षणिक परिसरों में अनुशासन, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाले वैदिक श्लोकों को जबरन अल्पसंख्यक अधिकारों के हनन से जोड़कर समाज में एक विभाजनकारी विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया गया। उनकी मंशा भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शिक्षा से दूर रखकर छात्रों को अपनी ही जड़ों से काटने की थी।
1. किन राज्यों में लागू: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों के अधिकांश सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना और शांति पाठ को नैतिक शिक्षा का अभिन्न अंग माना गया है।
2. सांस्कृतिक शुरुआत: इन राज्यों का मानना है कि विद्या की देवी सरस्वती की वंदना किसी विशिष्ट पूजा पद्धति की अनिवार्य ही नहीं, बल्कि ज्ञान की साधना की एक सांस्कृतिक शुरुआत भी है।

3. रोक की स्थिति: देश के किसी भी राज्य में कानूनन सरस्वती वंदना पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन केरल, तमिलनाडु और कुछ गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारी स्तर पर ऐसी प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने से परहेज किया जाता है। वहां केवल राष्ट्रगान या धर्मनिरपेक्ष प्रार्थनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। 

मन पर तीन प्रभाव डालती है यह वंदना

मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का मानना है कि सुबह की सभा में सामूहिक मंत्रोच्चार का बच्चों के मानस पर गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गायत्री मंत्र और सरस्वती वंदना केवल धार्मिक श्लोक नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर छिपी ध्वनि तरंगें और शब्द विन्यास वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं:

  1. एकाग्रता और मानसिक शांति: गायत्री मंत्र का सस्वर पाठ मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करता है, जिससे छात्रों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति का विकास होता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: सुबह-सुबह सामूहिक स्वर में तमसो मा ज्योतिर्गमय या ‘शिल्प-ज्ञान-विवर्धिनी’ जैसे श्लोकों का उच्चारण बाल मन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाता है।
  3. संस्कार और अनुशासन: यह बच्चों के मन में शुरू से ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गौरव का भाव पैदा करता है और उन्हें नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है, जो आज की आधुनिक और तनावपूर्ण जीवनशैली में बेहद जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में पक्ष-विपक्ष का राजनीतिक घमासान
अदालत के बाहर इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में पक्ष-विपक्ष आमने सामने आ गए हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री अरुण साव और शिक्षा मंत्री ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह कदम हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2000 के सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य छात्रों को भारतीय ज्ञान प्रणालियों से जोड़ना है। भाजपा के अनुसार, यह नई पीढ़ी में देशभक्ति, अनुशासन और उच्च नैतिक संस्कारों को सिंचित करने का एक ऐतिहासिक अभियान है। दूसरी ओर तुष्टिकरण की नीति के चलते विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे हिन्दुत्व के एजेंडे को लागू करने और शिक्षा के ‘भगवाकरण’ का प्रयास बताया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर धार्मिक और संवेदनशील मुद्दों को हवा दे रही है।
फैसले से कानून और संस्कृति के बीच बेहतरीन संतुलन
वास्तविकता यह है कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए कानून और संस्कृति के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम किया है। अदालत ने यह स्पष्ट करके विपक्ष और याचिकाकर्ताओं के डर को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यह आदेश ‘बाध्यकारी’ या ‘दबाव डालने वाला’ नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 28(1) भले ही राज्य पोषित संस्थानों में ‘धार्मिक कर्मकांड या संकीर्ण धार्मिक शिक्षा’ पर रोक लगाता हो, लेकिन वह देश की साझा सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना सिखाने वाले सार्वभौमिक विचारों पर पाबंदी नहीं लगाता। स्कूल केवल किताबी ज्ञान देने वाले कारखाने नहीं हैं; वे नागरिक गढ़ने के केंद्र हैं। ऐसे में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी पावन परंपराओं को विवादों के घेरे में खींचना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। हाई कोर्ट के इस फटकार के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि तुष्टिकरण की संकीर्ण राजनीति अब शिक्षा के पवित्र प्रांगण से दूर रहेगी।

 

तमिलनाडु : कार्तिगई दीपम विवाद : सनातन विरोधी DMK सरकार ने HC के आदेश के बाद भी नहीं मनाने दिया उत्सव

                                कार्तिगई दीपम विवाद, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
तमिलनाडु के प्राचीन थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर में कार्तिगई दीपम उत्सव के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 1 दिसंबर 2025 को स्पष्ट आदेश दिया था कि थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के शिखर पर स्थित प्राचीन ‘दीपाथून’ स्तंभ पर पवित्र दीप जलाया जाए। लेकिन डीएमके सरकार ने इस आदेश की खुलेआम अवहेलना की।

बुधवार (3 दिसंबर 2025) की शाम 6 बजे दीप जलाने का समय था, लेकिन मंदिर प्रशासन ने पारंपरिक तरीके से उचीपिल्लैयार मंदिर के पास ही दीप जला दिया, जो पहाड़ी के नीचे है। इससे नाराज हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़पें हो गईं। कोर्ट ने सरकार को ‘जानबूझकर अवज्ञा’ का दोषी ठहराया और कहा कि यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।

यह घटना सिर्फ एक धार्मिक रस्म का मामला नहीं है। यह तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत, अदालती आदेशों की मर्यादा और राजनीतिक साजिशों का मिश्रण है। डीएमके सरकार पर हिंदू विरोधी होने का पुराना आरोप लगता रहा है। विपक्षी भाजपा और हिंदू संगठन इसे सनातन धर्म के खिलाफ साजिश बता रहे हैं।

याचिकाकर्ता राम रविकुमार ने कोर्ट में कहा कि मंदिर प्रशासन ने दीपाथून पर कोई इंतजाम नहीं किया। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर 2025 को आदेश दिया कि दीप जलाया जाए, क्योंकि यह मंदिर की संपत्ति है। उन्होंने साल 1923 के एक कोर्ट डिक्री का हवाला दिया, जिसपर प्रिवी काउंसिल ने भी मुहर लगाई थी।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद बुधवार (03 दिसंबर 2025) की शाम को जब हिंदू कार्तिगई दीपम के लिए पहाड़ी पर चढ़ने लगे, तो उन्हें रोक लिया गया। हाई कोर्ट के आदेश की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई। सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) को सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने धारा 144 लगा दी। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड तोड़े, पत्थर फेंके और नारेबाजी की।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दर्जनों लोग घायल हुए। कोर्ट ने इसे ‘अवमानना’ करार दिया और कहा, “यह आदेश की खुली अवहेलना है। लोकतंत्र का अंत हो जाएगा अगर अधिकारी कानून से ऊपर समझें।” जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता को 10 लोगों के साथ प्रतीकात्मक रूप से दीप जलाने की इजाजत दी और सीआईएसएफ को सुरक्षा का आदेश दिया। लेकिन अपील के बाद पुलिस ने सबको रोक लिया। हालाँकि अब गुरुवार (04 दिसंबर 2025) को कोर्ट ने इस मामले में अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी है।

सरकार के सूत्रों ने सफाई दी कि वे हिंदुओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि शांति बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि कोई सच्चा भक्त कोर्ट नहीं गया और 100 साल पुरानी परंपरा का पालन हो रहा है। लेकिन भाजपा नेता के.अन्नामलई ने कहा, “डीएमके का सनातन धर्म से दुश्मनी अब छिपी नहीं। हिंदू धार्मिक निधि विभाग खुद भक्तों के खिलाफ अपील कर रहा है।”

कार्तिगई दीपम को लेकर विवाद क्या? क्यों DMK सरकार कर रही हिंदुओं का दमन

 कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो कार्तिगई मास की पहली पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह प्रकाश के विजय का प्रतीक है। थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवास स्थान में से पहला है, इस उत्सव का केंद्र रहा है।

थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर छठी शताब्दी में पांड्य राजाओं द्वारा बनाया गया था और पहाड़ी को काटकर तराशा गया है। मंदिर के पुजारी रोजाना तीन बार पूजा करते हैं, जिसमें अभिषेक, अलंकरण, नैवेद्य और दीप आराधना शामिल है। ये प्रक्रिया अब भी जारी है।

लेकिन बीते कुछ समय से इस्लामी कट्टरपंथी इस पहाड़ी पर कब्जे और इसके नाम बदलने की कोशिश में हैं। कुछ समय पहले मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पहाड़ी पर नमाज की माँग की, लेकिन पुलिस ने रोक दिया।

प्रिवी काउंसिल का फैसला और ‘सिकंदर हिल्स’ का दावा

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी का इतिहास संगम युग तक जाता है। संत नक्कीरार ने भगवान मुरुगन के 6 पवित्र निवासों में इसे पहला बताया है। यह तेवर स्थलम भी है, जहाँ शिव और मुरुगन की पूजा होती है। पहाड़ी 500 फुट ऊँची है और मंदिर चट्टान को काटकर बनाया गया। भक्त घिरी वीधी (परिक्रमा पथ) पर चक्कर लगाते हैं, जो मंदिर की संपत्ति है।

विवाद की जड़ 19वीं-20वीं शताब्दी के मुस्लिम दावों में है। कुछ लोग इसे ‘सिकंदर हिल्स’ कहते हैं, लेकिन 1931 में प्रिवी काउंसिल ने साफ किया कि यह मंदिर की संपत्ति है। पाँच सदस्यीय पैनल ने कहा, “पहाड़ी का खाली हिस्सा समय से परे मंदिर के कब्जे में है।”

प्रिवी काउंसिल ने 1923 के अधीनस्थ जज के फैसले को बहाल किया, जिसमें मस्जिद स्थल को छोड़कर पूरी पहाड़ी मंदिर की बताई गई। प्रिवी काउंसिल ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया, जिसमें 1144 का दस्तावेज ‘मलाईप्रकरम’ (पहाड़ी परिक्रमा) का जिक्र है।

फैसले में कहा गया कि मुगल आक्रमणकारियों ने राजस्व भूमि छीनी, लेकिन मंदिर या पहाड़ी कभी धर्मनिरपेक्ष हाथों में नहीं गई। कुछ मस्जिदें और घर बने, लेकिन वे हिंदुओं पर जबरन कब्जे का परिणाम था। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी मंदिर के अधिकार मान्य किए थे। फैसले में प्रिवी काउंसिल ने लिखा, “कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने पवित्र पहाड़ी में हस्तक्षेप किया।” यह फैसला 2025 में भी प्रासंगिक है, क्योंकि जस्टिस स्वामीनाथन ने इसे ही आधार बनाया।

जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले को नहीं मान रही डीएमके सरकार

हालाँकि हिंदू-विरोधी मिजाज वाली सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (डीएमके) सरकार ने कानून-व्यवस्था के नाम पर 1 दिसंबर 0025 के कोर्ट के निर्देश को चुनौती दी है। मामला तब और बिगड़ा जब याचिकाकर्ता राम रविकुमार सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) के जवानो के साथ कोर्ट के फैसले पर पहाड़ी चढ़ने लगे।

लेकिन मदुरै के पुलिस कमिश्नर जे. लोगनाथन के नेतृत्व वाली राज्य पुलिस ने हस्तक्षेप किया और उन्हें रोक दिया। मदुरै जिला कलेक्टर ने रोकथाम वाले आदेश जारी किए थे, दावा किया कि जनता की सुरक्षा और मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति खतरे में है।

हिंदू मुननेत्र मंड्रम संगठन के सदस्यों और अन्य कार्यकर्ताओं ने मंदिर के सामने इकट्ठा होकर मांग की कि कोर्ट के निर्देशित स्थान पर दीप जलाया जाए। कुछ लोग पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश में लगे। इससे धक्का-मुक्की हुई और एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। हिंदू मुननेत्र मंड्रम के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मंदिर प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले का पालन करने के लिए बिल्कुल कोई इंतजाम नहीं किया।

खास बात ये है कि मंदिर प्रबंधन ने पहले ही कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, दावा किया कि इससे सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन जज स्वामीनाथन ने सख्त हिदायत दी थी कि शाम 6 बजे तक दीप जलाना है, वरना 6:05 बजे अवमानना की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। इसके बावजूद डीएमके सरकार और प्रशासन ने कोर्ट की नहीं सुनी।

हिंदुओं को नीचा दिखाकर मुस्लिमों का पक्ष ले रही DMK सरकार

डीएमके सरकार का ये रवैया चिंताजनक तो है, लेकिन हैरान करने वाला नहीं, क्योंकि हिंदू-नफरत करने वाली द्रविड़ पार्टी का इतिहास यही है। राज्य सरकार और हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने पहले ही फैसले के खिलाफ अपील कर दी है। ऊपर से डीएमके और उसके सहयोगी जिला प्रशासन से कह रहे हैं कि कोर्ट के आदेश का पालन न करें।

डीएमके कोर्ट के आदेश तोड़ने के लिए बिना झिझक तैयार है, सिर्फ हिंदू धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिए। न्यायपालिका ने तथ्यों और सबूतों के आधार पर हिंदुओं का साथ दिया है, लेकिन सरकार सांप्रदायिक सौहार्द का विकृत कथा चलाने पर तुली है। उनकी टेढ़ी नजर में सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता तभी बनी रहती है जब हिंदुओं के खर्च पर हो और उनके धार्मिक अधिकारों पर कब्जा हो।

वहीं, जब डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) (बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के राजनीतिक विंग) ने जब इस पवित्र स्थान पर जानवरों की कुर्बानी की कोशिश की, तो ये मूल्य कभी खतरे में नहीं पड़े। जब इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के नेता और रामनाथपुरम सांसद के. नावास कानी (आईएमयूएल) ने एक अन्य विधायक और समर्थकों के साथ पवित्र पहाड़ी पर नॉन-वेज बिरयानी खाई, तो भी खतरा नहीं था। कानी ने यहाँ तक घोषणा कर दी कि जगह वक्फ बोर्ड की है।

दिल्ली के सुल्तानों के प्रतिनिधि के नाम पर इसे सिक्कंदर हिल्स नाम देने की कोशिशें भी चल रही थीं, जो मदुरै पर शासन करते थे, जिससे हिंदुओं ने विरोध किया। डीएमके ने इन उकसाने वाली हरकतों को सौहार्द और शांति के लिए खतरा नहीं माना, सिर्फ इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म का एक बड़ा हिस्सा अपमानित हो रहा था, जिसे पार्टी चुपचाप समर्थन देती है। लेकिन जब हिंदू कानूनी तरीके से अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, तो इनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।

इसी तरह, हाईकोर्ट द्वारा इसे हिंदू मंदिर घोषित करने के बाद भी मुस्लिमों का पहाड़ी पर अवैध कब्जा जारी है और डीएमके सरकार ने इन उल्लंघनों को बर्दाश्त किया है।

द्रविड़वाद के झंडाबरदार हमेशा थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी से जुड़े झूठे मुस्लिम दावों का साथ देते रहे हैं और असली हिंदू चिंताओं तथा वैध अधिकारों का विरोध करते रहे हैं। यहाँ तक कि अपने प्रभाव वाले मीडिया आउटलेट्स के जरिए मामले को राजनीतिक रंग भी देने की कोशिश करती है, ताकि मुस्लिम उसके पक्ष में लामबंद हो सकें।

ऐसे ही एक मामले में तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदुओं को अन्नदान करने से रोक दिया, जबकि कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट तौर पर कहा था कि वो इस काम में अड़ंगा न लगाए। क्योंकि इसकी वजह ये थी कि डीएमके सरकार अपने ईसाई समर्थकों को खुश करने में जुटी रही। ये मामला कुछ ही समय पहले का है।

HC के आदेश का पालन न करने पर DMK पर क्यों उठाई जा रही उंगली?

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा सिर्फ सरकार कर रही है, इसका सत्ताधारी डीएमके पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। तो हम बता दें कि तमिलनाडु सरकार में हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग नाम से अलग मंत्रालय है। ये मंत्रालय ही हिंदू मंदिरों से जुड़े तमाम फैसले करता है।

मौजूदा समय में थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित मुरुगन मंदिर में भी प्रशासकों की तैनाती है, जो तमिल नाडु की डीएमके सरकार की तरफ से की गई है। ऐसे में वो डीएमके के निर्देश पर ही हाई कोर्ट तक के फैसले को नहीं मान रहे। यहाँ तक कि हाई कोर्ट की कार्यवाही तक से गैर-हाजिर रहे। फिर यहाँ खुद मंदिर के प्रशासक को आगे बढ़कर हिंदुओं के हित में काम करना चाहिए था और हाई कोर्ट का आदेश भी था, लेकिन यहाँ सरकार द्वारा बिठाया मंदिर प्रशासक ही हिंदू विरोधी डीएमके सरकार के लक्ष्य को पूरा करने में जुटा रहा।

इतना ही नहीं, एक तरफ तो वो खुलकर हिंदू विरोध करती है, तो दूसरी तरह हिंदू मंदिरों के पैसों को डकार भी जाती है। इन सब बातों को जानते हुए भी डीएमके को कब तक नजरअंजाद किया जाए? जब उसका अतीत ही हिंदू और सनातन विरोध से भरा पड़ा है।

सनातन का बार-बार अपमान करती रही है डीएमके

बीते कुछ समय के घटनाक्रम को देखें तो डीएमके सांप्रदायिक सौहार्द या कानून-व्यवस्था के पीछे छिप जाती है, लेकिन हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों के प्रति अपनी नफरत जाहिर करने से कभी नहीं हिचकिचाई। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के उपमुख्यमंत्री बेटे और ‘गर्वित ईसाई’ उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में सनातन धर्म के विनाश की खुली अपील की।

डीएमके सांसद ए राजा ने तो और आगे बढ़कर कहा कि उदयनिधि की अपमानजनक टिप्पणियाँ तो काफी हल्की थीं। सनातन धर्म की तुलना तो एचआईवी और कुष्ठ रोग से तुलना करनी चाहिए। यही नहीं, हिंदू धर्म को जंजीर कहने वाले कमल हासन को डीएमके ने बाकायदा राज्यसभा भी भेजा है। वहीं, डीएमके सरकार के मंत्री ने तो हिंदू धर्म को लेकर सेक्स पोजिशन तक की घटिया टिप्पणी की थी।

डीएमके ने न सिर्फ हिंदू धर्म को निशाना बनाया है, बल्कि ऐसे कदम भी उठाए हैं जो धर्म का अपमान करते हैं। तमिलनाडु सरकार ने जुलाई में चेन्नई के किलपुक में वाडेल्स रोड का नाम बदलकर आर्चबिशप एज्रा सरगुनम रोड रख दिया, जो मृत एंटी-हिंदू ईसाई प्रचारक और बिशप एज्रा सरगुनम को सम्मान देने के लिए था। उसने हिंदुओं को मारने का सार्वजनिक आदेश भी दिया था। यही नहीं, डीएमके सरकार में तो दुर्दांत आतंकियों की भव्य आखिरी यात्रा भी निकलती है, जो कोर्ट से सजा पाए हो।

हिंदुओं से नफरत करने वालों की डीएमके में होती है पूछ

हिंदू धर्म से नफरत करने वाले लोग डीएमके में जगह पाते हैं, क्योंकि पूरी पार्टी अपनी खतरनाक धर्मनिरपेक्षता के बहाने हिंदू-विरोध को मूर्त रूप देती है। वे (डीएमके के लोग) सनातन के कट्टर आलोचक ईवी पेरियार की पूजा करते हैं और अब्राहमिक मजहबों खासकर इस्लाम और ईसाई धर्म को आदर देते हैं।

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर बार-बार होने वाले टकराव इसी का हिस्सा हैं। डीएमके सरकार हिंदुओं के अधिकारों पर कुचलने के लिए तुली है, भले ही इसके लिए कोर्ट के आदेश तोड़ने पड़ें या उन्हें चुनौती देनी पड़े। इसके अलावा डीएमके या ‘धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ’ कभी मुस्लिमों या अन्य मजहबों के अनुयायियों के साथ ऐसा हौसला नहीं दिखातीं, जो उनकी असली मंशा और मकसद बयान करता है।

केरल ; काउंसलिंग के दौरान जज ने महिला पर कीं अश्लील टिप्पणियाँ, यौन दुर्व्यवहार का भी लगा आरोप: तूल पकड़ने के बाद हाईकोर्ट ने किया ट्रांसफर, जाँच का आदेश जारी


जब कभी कोर्ट में महिला उत्पीड़न का कोई 
भी केस होता है तो महिला से दूसरे पक्ष का वकील ऐसे-ऐसे सवाल करता है कि महिला के परिवारजन प्रश्न सुनते ही शर्म से सिर झुका उस पीड़िता पर ही शंका करते देखे गए हैं। कोई विवाद नहीं होता लेकिन केरल हाई कोर्ट जज द्वारा कुछ पूछे जाने पर विवाद शायद पहली बार सुनने को मिल रहा है। 

जिस न्यायालय को लोकतंत्र में न्याय की आखिरी उम्मीद माना जाता है, वहीं अगर जजों पर अश्लीलता के आरोप लगने लगें तो जनता का विश्वास हिलना स्वाभाविक है। केरल से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न्यायपालिका की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

केरल हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के जज उदयकुमार वी. का तबादला कर दिया है। उदयकुमार वी. पर महिलाओं के साथ काउंसलिंग के दौरान यौन दुर्व्यवहार और अश्लील टिप्पणियाँ करने का आरोप है।

क्या है पूरा मामला?

‘बार ऐंड बेंच’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला ने कोल्लम के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज को पत्र लिखकर जज उदयकुमार वी. के खिलाफ शिकायत दी थी। महिला ने अपने पत्र में दावा किया कि उदयकुमार ने काउंसलिंग के दौरान यौन दुर्व्यवहार किया और उनको लेकर अश्लील टिप्पणियाँ कीं।

यह मामला सामने आने के बाद न्यायपालिका में हड़कंप मच गया। इसके बाद केरल हाईकोर्ट ने चवरा फैमिली कोर्ट के जज उदयकुमार वी को कोल्लम मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल में ट्रांसफर कर दिया गया। इसके अलावा हाईकोर्ट ने कोल्लम में मोटर ऐक्सिडेंट क्लेम्स ट्राइब्यूनल के जज प्रसन्ना गोपालन का ट्रांसफर फैमिली कोर्ट में कर दिया है। जिला न्यायालय के रजिस्ट्रार ने दोनों जजों के म्यूचुअल ट्रांसफर का आदेश जारी कर दिया है।

जज उदयकुमार के खिलाफ जाँच का आदेश जारी

इस मामले की गंभीरता को देखता हुए हाईकोर्ट ने जज के खिलाफ उदयकुमार वी. के खिलाफ जाँच के आदेश जारी किए हैं। केरल हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) को मामले की जाँच का आदेश दिया है। रजिस्ट्रार द्वारा की गई इस जाँच की रिपोर्ट समिति को सौंपी जाएगी और समिति आने वाले सप्ताह में इस रिपोर्ट पर विचार करेगी।

फैमिली कोर्ट्स में परिवारिक समस्याओं को निपटारा किया जाता है। न्यायालयों पर बोझ और सुनवाई में देरी को देखते हुए ये कोर्ट बनाए गए थे लेकिन परिवार से जुड़े कोर्ट में ही महिलाओं के साथ इस तरह दुर्व्यवहार किया जाए तो इससे न्यायापालिका की साख पर बट्टा लगता है।

तीन तलाक ‘सही’, हलाला 'सही', लेकिन ‘खुला’ पर बिलबिला उठते हैं इस्लामी कट्टरपंथी: मुस्लिम महिला की माँग को तेलंगाना हाई कोर्ट ने माना, कुरान के हवाले से कहा- शौहर की मर्जी के बगैर भी बीवी हो सकती है अलग


मुस्लिम महिला को ‘खुला’ यानी तलाक माँगने का अधिकार बिल्कुल सही है। इसके लिए शौहर की सहमति नहीं चाहिए। यह टिप्पणी तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान की है। कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर महिला अपने शौहर के साथ नहीं रहना चाहती है, तब महिला को अधिकार है कि वह ‘खुला’ से तलाक ले सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि बीवी के लिए विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिए मुफ्ती या दार-उल-कजा से खुलनामा (विवाह विच्छेद का प्रमाण पत्र) लेना जरूरी नहीं है। मुफ्ती की राय केवल सलाह के लिए होती है। इसके साथ कोर्ट ने साफ किया कि अगर पत्नी खुला माँगती है और केस अदालत तक पहुँचता है। ऐसे मामले में खुला तत्काल रूप से प्रभावी हो जाता है। बेशक ही मामला दोनों पक्षों का निजी क्यों न हो।

जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य और जस्टिस बीआर मधुसूदन राव की बेंच ने कहा कि मुस्लिम बीवी का ‘खुला’ माँगने का अधिकार सही है। इसके लिए पति की स्वीकृति या कारण बताने की जरूरत नहीं है। इसलिए कोर्ट की भूमिका केवल निकाह को खत्म कराने के लिए मुहर लगाने तक ही सीमित है।

बेंच ने कहा, “कोर्ट की एकमात्र भूमिका निकाह समाप्ति पर न्यायिक मुहर लगाना है, जो कि खुला के दौरान दोनो पक्षों के लिए तनावपूर्ण हो जाती है…पारिवारिक न्यायालय को केवल यह पता लगाना है कि दोनों पक्षों के बीच आपसी मतभेद सुलझ सकते है या नहीं। इसी आधार पर खुला की माँग वैध मानी जाएगी। इसके लिए विस्तारित जाँच नहीं होनी चाहिए, बल्कि केंद्रित जाँच काफी है।”

तेलंगाना हाई कोर्ट ने यह फैसला एक मुस्लिम दंपति के मामले में सुनाया है। मामले में एक मुस्लिम बीवी ने अपने शौहर को खुला की माँग की, लेकिन शौहर ने उसकी माँग को ठुकरा दिया। इसके बाद बीवी ने फैमिली कोर्ट में केस दर्ज कराया। यहाँ कोर्ट ने बीवी के पक्ष में फैसला सुनाया।

इसके बाद गैर-सरकारी संगठन सदा-ए-हक शरई परिषद ने मुस्लिम व्यक्ति को तलाक प्रमाण-पत्र सौंप दिया। परिषद निकाह के बाद छिड़े गृह कलह के समाधान कराने का काम करता है। लेकिन व्यक्ति ने इस प्रमाण-पत्र के विरोध में तेलंगाना हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। अब तेलंगाना हाई कोर्ट ने मुस्लिम व्यक्ति को फटकार लगाई है और मुस्लिम महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने इस मामले में कुरान की आयतों में ‘खुला’ का अध्ययन किया। साथ ही इस मामले में इतिहास की परतें भी खोली। जिसमें कहा गया, “कुरान के अध्याय-2 की आयत 228 और 229 में बीवी को अपने शौहर के साथ निकाह को रद्द करने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। खुला की वैधता के लिए शौहर की सहमति कोई पूर्व शर्त नहीं है।”

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शौहर अपनी बीवी की खुला की माँग को स्वीकार नहीं करता है, तो इस्लाम में इस मामले पर कोई भी प्रक्रिया नहीं है। चाहे वह कुरान, सुन्नत या पैगंबर हो।

क्या है खुला

खुला के तहत अगर बीवी अपने शौहर से अलग होती है तो उसे अपने शौहर से उसकी जायदाद लौटानी पड़ेगी। पर यह जरूरी है कि दोनों इसके लिए रजामंद हों। उल्लेखनीय है कि खुला की पहल केवल बीवी ही कर सकती है। कुरान और हदीस में इसका जिक्र है।

वहीं, भारत में मुस्लिमों के बीच मान्य पुस्तक फतवा-ए-आलमगीरी में कहा गया है कि जब निकाह के बाद शौहर-बीवी इस बात पर राज़ी हैं कि अब वे साथ नहीं रह सकते तो बीवी कुछ संपत्ति शौहर को वापस करके स्वयं को उसके बंधन से मुक्त कर सकती है। जायदाद में बीवी अपनी मेहर की रकम छोड़ सकती है या फिर कोई अन्य रकम/संपत्ति दे सकती है।

खुला को लेकर मुस्लिमों की आपत्ति

‘खुला’ को लेकर हनफी सहित कुछ तबके के उलेमाओं का कहना है कि इसके तहत मुस्लिम महिला तभी तलाक ले सकती है, जब उसका शौहर तैयार हो। अगर शौहर मना कर दे तो महिला के पास मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939 के प्रावधानों के तहत अदालत जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने साल 2021 में ‘खुला’ के संबंध में कहा था कि इस प्रक्रिया में पति की स्वीकृति एक शर्त है। वहीं, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कुरान एक मुस्लिम बीवी को एक प्रक्रिया निर्धारित किए बिना उसकी निकाह को रद्द करने के लिए ‘खुला’ का अधिकार देता है।

मद्रास हाई कोर्ट ने भी ‘खुला’ पर सुनाया था फैसला

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के ‘खुला’ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाएँ ‘खुला’ के तहत अपने शौहर से तलाक लेने की अधिकारी हैं। हालाँकि, कोर्ट ने इसके लिए कुछ प्रावधान बताए हैं।
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘खुला’ के तहत तलाक लेने के लिए मुस्लिम महिलाओं को फैमिली कोर्ट जाना होगा। किसी निजी शरीयत परिषद को इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे प्रमाण-पत्र की कोई मान्यता नहीं है।

अहमदाबाद की चंदोला झील से पूरी तरह हटाया जाएगा अवैध कब्जा, मुस्लिम पक्ष की याचिकाएँ हाई कोर्ट ने की खारिज: अवैध बांग्लादेशियों का गढ़ बन चुका है इलाका, एक्शन में 50 से ज्यादा बुलडोजर


गुजरात के अहमदाबाद में चंदोला झील के आसपास अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई को गुजरात हाई कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं को खारिज कर दिया, जो इस कार्रवाई को रोकना चाहते थे।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने बताया कि झील क्षेत्र में बने अवैध निर्माण, खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों के अड्डे, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा थे। कुछ लोगों के आतंकवादी संगठनों से संबंध होने का भी खुलासा हुआ।

अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर ज्ञानेंद्र सिंह मलिक ने कहा कि लल्लू बिहारी नामक शख्स ने आलीशान फार्महाउस बनाकर अवैध बांग्लादेशियों को शरण दी थी। तीन दिन पहले 1,000 से ज्यादा घुसपैठियों को पकड़ा गया। कार्रवाई में 50 से अधिक बुलडोजर लगाए गए।

पुलिस महानिदेशक विकास सहाय ने बताया कि गुजरात में 450 अवैध बांग्लादेशी पकड़े गए और 6,500 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। यह कार्रवाई झील को अतिक्रमण से मुक्त करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी बताई जा रही है।

तेलंगाना : 400 एकड़ की हरियाली तबाह कर रही कांग्रेस सरकार, हाईकोर्ट ने नीलामी पर लगाई रोक: पेड़-पौधे, झीलों और घाटियों को बचाने के लिए चल रहा विरोध प्रदर्शन

                  तेलंगाना में भूमि विवाद पर चला बुलडोजर और छात्रों ने किया विरोध प्रदर्शन ( साभार : NDTV)
हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) और तेलंगाना सरकार के बीच कांचा गाचीबोवली में 400 एकड़ जमीन को लेकर विवाद बढ़ गया है। यहाँ राज्य सरकार द्वारा जंगलों के पेड़ काटवाए और चट्टानों को हटावाए जा रहे हैं। इस पर तेलंगाना हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। वहीं, विश्वविद्यालय के छात्रों ने राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
 

दरअसल, तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार ने यहाँ आईटी पार्क के विकास के लिए 400 एकड़ जमीन की नीलामी करने का फैसला किया है। यहाँ पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक रूप से स्थित विशाल भूखंडों की माँग बढ़ गई है। यहाँ कई कंपनियों ने अपने मुख्यालय स्थापित कर लिए हैं। हालाँकि, तेलंगाना सरकार और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के बीच का ये मामला अब हाईकोर्ट पहुँच गया है।

मंगलवार (01 अप्रैल 2025) को छात्रों ने तेलंगाना इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन (TIIC) को ज़मीन सौंपने के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दायर की। बुधवार को HC में सुनवाई के दौरान अगले आदेश तक जमीन पर किसी भी गतिविधि पर रोक लगा दी। दरअसल, 30 मार्च से ही बुलडोजर आदि लगाकर वहाँ जमीनों की सफाई की जा रही थी।

उधर, इसके विरोध में 1 अप्रैल 2025 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच दो जगहों पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के 500 छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना दिया, जबकि अन्य 150 छात्र प्रशासनिक भवन के सामने विरोध कर रहे थे। उन्होंने विश्वविद्यालय की भूमि पर अतिक्रमण रोकने की माँग की।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार ज़मीन साफ करने में लग गई है। बुलडोजर और भारी मशीनरी से पेड़ों को काटा जा रहा है। यह क्षेत्र इकॉलॉजिक रूप से महत्व रखता है और इसे बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। उधर, सरकार का कहना है कि यह वनभूमि नहीं है। इसे साल 2003 में निजी स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी को ट्रांसफर किया गया था।

बावजूद इसके, प्रशासन ने भूमि समतलीकरण के लिए काम शुरु कर दिया है। इस बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। पुलिस ने दो छात्र समेत 53 लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस पर बल प्रयोग और छात्रों से बदतमीजी करने का आरोप है। वहीं, लाठीचार्ज करने के आरोपों को पुलिस ने मानने से इनकार किया।

ABVP के पीएचडी छात्र निशांत रेड्डी ने प्रशासन की चुप्पी पर नाराजगी जताते हुए कहा, “पिछले तीन दिनों से विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया है। हम छात्र इस जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि असली हितधारक चुप हैं।” छात्रों ने सुरक्षा बढ़ाने पर भी असंतोष जताया, क्योंकि बिना आईडी कार्ड के परिसर में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है।

गाचीबोवली पुलिस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारतीय जनता युवा मोर्चा के कुछ सदस्यों को भी गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय छात्र संघ ने 2 अप्रैल से अनिश्चितकालीन विरोध और कक्षाओं के बहिष्कार की घोषणा की। उन्होंने प्रशासन पर राज्य सरकार को विश्वविद्यालय की जमीन सौंपने का आरोप लगाया और इस मामले में लिखित गारंटी की माँग की।

जमीन विवाद का राजनीतिक मोड़

  • जमीनी विवाद ने अब राजनीतिक मोड़ ले लिया है। विपक्षी दल तेलंगाना सरकार पर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील आईटी हब का निर्णय रद्द करने के लिए दबाव बना रहे हैं। भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने विवाद पर चुटकी लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की ‘मोहब्बत की दुकान’ अब हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी तक पहुँच गई है।
BRS का कहना है कि राहुल गाँधी को उनकी पार्टी के उद्देश्यों के खिलाफ काम करना भारी पड़ गया है। BRS ने आंदोलनकारी छात्रों और पत्रकारों की गिरफ्तारी की भी आलोचना की। BRS के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने कहा कि यह ‘नासमझी’ भरा कदम है, क्योंकि यह हैदराबाद को शुद्ध वायु से वंचित करेगा।
वहीं, विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता अल्लेती महेश्वर रेड्डी की अध्यक्षता में पार्टी विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल घटनास्थल पर जाने वाला था। उन्होंने पूछा कि राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार कांचा गाचीबोवली में सैकड़ों बुलडोजर और मशीनों से पेड़ों को हटाकर 400 एकड़ जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश क्यों कर रही है। विधायक के आवास के पास कई पुलिस अधिकारी तैनात किए गए।
महेश्वर रेड्डी का कहना है कि पुलिस ने उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी। ना ही पुलिस ने बताया कि उन्हें क्यों रोका जा रहा है। रेड्डी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने भाजपा के बाकी नेताओं और विधायकों को भी उनके घरों से बाहर निकलने से रोक दिया। BJP नेता पायल शंकर को 1 अप्रैल को आंदोलन में भाग लेने के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय जाते समय हिरासत में लिया गया था।
प्रदेश के BJP प्रवक्ता एनवी सुभाष ने सवाल किया, “सरकार कब से रियल एस्टेट डीलर बन गई है।” उन्होंने पुलिस की प्रतिक्रिया को लोकतांत्रिक अधिकारों पर अस्वीकार्य हमला बताया और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि उस समय तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेता रहे वर्तमान सीएम ए. रेवंत रेड्डी ने 2007-08 में सवाल उठाया था।
उन्होंने कहा कि रेवंत रेड्डी ने TRS नेता रहते हुए कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा दिल्ली में एक डेवलपर को जमीन सौंपने के इसी तरह के कदम का विरोध किया था। उन्होंने पूछा, “अब क्या बदल गया है? क्या मुख्यमंत्री सिर्फ़ खाली खजाने को भरने, गाँधी परिवार को खुश करने और उनके मुफ़्त उपहारों के एजेंडे को निधि देने के लिए अपने पिछले रुख को छोड़ रहे हैं।”

कई साल पुराना है विवाद

हैदराबाद यूनिवर्सिटी और सराकार के बीच ये विवाद सालों पुराना है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने दावा किया है कि 1975 में उसे 2324 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी। इनमें से 400 एकड़ का यह भूभाग भी शामिल है। साल 2022 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यूनिवर्सिटी के पास इस भूमि के हस्तांतरण के कोई अधिकारिक दस्तावेज नहीं है।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे सरकार की भूमि माना। हालाँकि, पर्यावरणविदों का कहना है कि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। यहाँ 455 से अधिक प्रजातियों की वनस्पति और जीव मौजूद हैं। एनजीओ वटा फाउंडेशन ने ज़मीन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने और ‘डीम्ड फोरेस्ट’ का दर्जा देने की माँग की।

मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट संविधान का क्यों नहीं पालन कर रहे? जज को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग का प्रावधान : कौन थे जस्टिस रामास्वामी जिन पर सबसे पहले चला महाभियोग?

                          सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस वी. रामास्वामी (साभार: सुप्रीम कोर्ट/ट्रिब्यून)
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मामला सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तीन जजों का एक एक कमिटी बनाई है, जो इस मामले की जाँच कर रही है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की माँग लगातार तेज होने लगी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की एक लंबी प्रक्रिया है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया।

हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। इसके बाद CJI की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था।

CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने माँग की है कि इस मामले स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद को आपराधिक आरोप तय करना चाहिए या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें हटाना चाहिए। इसी तरह कई पूर्व जज और वरिष्ठ वकील भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की है।

क्या होता है महाभियोग? कैसे हटाए जाते हैं जज?

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की शक्तियों एवं उन्हें हटाने के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही संसद के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट को हटाने के लिए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 218 में कहा गया है कि हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए भी यही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को ‘प्रमाणित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद द्वारा कार्यवाही शुरू की जाती है और इसके दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश देते हैं। दरअसल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाभियोग का आधार और प्रक्रिया को उच्च स्तर का रखा गया है।
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968’ में विस्तृत रूप से बताई गई है। इस अधिनियम में जज को पद से हटाने के उद्देश्य से कार्यवाही आरंभ करने के लिए सबसे पहला चरण सदस्यों की संख्या बताई गई। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे।
अध्यक्ष या सभापति सांसदों या संबंधित लोगों से परामर्श कर सकते हैं और नोटिस से संबंधित प्रासंगिक आरोपों की जाँच करते हैं। इसके आधार पर वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति (जो भी इसे प्राप्त करते हैं) संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे।
इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देता है। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाता है।
रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाता है और सदन में बहस होती है। प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होना चाहिए। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या के का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए।
यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस दौरान अगर संसद भंग हो जाती है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो महाभियोग प्रस्ताव विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की ‘आंतरिक जाँच प्रक्रिया’ क्या होती है?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के अलावा भी शिकायत की जा सकती हैं। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को चिट्ठी लिखकर या अन्य माध्यमों से संपर्क करके जाँच की माँग की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के सीजे एएम भट्टाचार्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोपों के बाद 1995 में एक आंतरिक तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई।
सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।
साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।
इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।
अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।
समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।
यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।
यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

वो जज, जिस पर चला था पहली बार महाभियोग

भारत में आज तक 6 बार जजों को हटाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इनमें से किसी को हटाया नहीं जा सका। सभी ने या तो खुद त्याग-पत्र दे दिया या फिर आरोप खारिज हो गए। इन 6 में से सिर्फ जस्टिस रामास्वामी और जस्टिस सेन के मामले में ही जाँच समिति ने आरोपों को सही पाया था। इनमें से 5 जजों पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे, जबकि एक में यौन कदाचार के आरोप लगे थे।
जस्टिस वीरा रामास्वामी (जी. रामास्वामी) भारत के पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें महाभियोग के जरिए हटाने का प्रयास किया गया था। रामास्वामी का निधन 8 मार्च 2025 को 96 साल की उम्र में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया। वी. रामास्वामी का के खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालाँकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। रामास्वामी को सन 1971 में मद्रास हाई कोर्ट में जज बनाया गया था। इस असामान्य कदम के कारण काफी बवाल हुआ था। यह विवाद उनके कार्यकाल में आगे भी चलता रहा।
रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया। उन्होंने अपने फायदे के लिए सरकारी वाहनों एवं संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया। उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आधिकारिक आवास में महंगे फर्नीचर, कालीन, एयरकंडिशन सिस्टम सहित अन्य विलासिता वाले सामान खरीदे।
इसको लेकर सन 1993 में जमकर राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था। उनके खिलाफ महाभियोग की माँग उठने लगी। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी अपनी मंजूरी दी थी। हालाँकि, रामास्वामी को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। आरोपों की समीक्षा करने के बाद तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें मामले के सुलझने तक सेवा से दूर रहने की सलाह दी।
उन्हें 18 जुलाई 1990 को आधिकारिक पत्र मिला और उन्होंने तुरंत 23 जुलाई 1990 से छह सप्ताह की छुट्टी माँग ली। तथ्यों का सत्यापन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक कमिटी गठित की। इस कमिटी ने कहा कि उसे अनुचित व्यवहार का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के 108 सदस्यों ने 9वीं लोकसभा के अध्यक्ष से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की।
तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के सहयोगी भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों ने लोकसभा में इस महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद तत्कालीन स्पीकर रबि राय ने 12 मार्च 1991 को समिति गठित की। समिति ने पाया कि रामास्वामी ने सार्वजनिक धन का उपयोग निजी फायदे के लिए किया और वैधानिक नियमों की अवहेलना की।
इस समिति ने रामास्वामी को 14 में से 11 आरोपों में दोषी ठहराया। वहीं, रामास्वामी ने स्पीकर द्वारा गठित समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया। 10 मई 1993 को समिति द्वारा यह निर्धारित किए जाने के बाद कि आरोपों में दम है, प्रस्ताव को चर्चा के लिए लोकसभा में लाया गया। हालाँकि, उस समय की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के कई नेता रामास्वामी के समर्थन में आ गए।
इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में 401 सांसदों में से सिर्फ 196 ने मतदान किया। कॉन्ग्रेस और कुछ अन्य दलों के 205 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में हुए मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस तरह यह प्रस्ताव गिर गया और वे हटाए जाने से बच गए। इस तरह वे अपना कार्यकाल पूरा होने तक आगे भी काम जज के रूप में काम करते रहे। आखिरकार 8 मार्च 2025 को उनका निधन हो गया।
कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।
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वो जज, जिनके खिलाफ CBI कोर्ट में लंबित है मामला

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी लगा था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा था। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।
उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।
बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने बालाकृष्णन के फैसले को पलट दिया और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। साल 2011 में जस्टिस यादव जिस दिन सेवानिवृत्त हो रहे थे, उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। आज 14 साल बाद भी यह मामला स्पेशल CBI कोर्ट में लंबित है।

कोई सिगरेट धूक रहा, कोई टॉयलेट में बैठकर तो कोई बेड पर लेटकर जज के सामने हो रहा पेश: दिल्ली से गुजरात तक ऑनलाइन सुनवाई में अलग ही चल रही ‘नौटंकी’

                                कोर्ट की ऑनलाइन कार्यवाही के दौरान धूम्रपान (साभार: बार एंड बेंच)
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 25 मार्च को वर्चुअल सुनवाई के दौरान सिगरेट पीने पर वादी सुशील कुमार को तलब किया है। कोर्ट ने सुशील कुमार को 29 मार्च 2025 को अदालत में उपस्थित रहने और अपना स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट में सुशील कुमार स्पष्टीकरण दें कि कार्यवाही के दौरान धूम्रपान करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।

वसीयत से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे जज (पश्चिम) शिव कुमार ने 25 मार्च 2025 को दिए गए अपने आदेश में कहा, “आवेदक संख्या 1/श्री सुशील कुमार को एन.डी.ओ.एच. (अगली सुनवाई की तिथि) पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के लिए न्यायालय नोटिस द्वारा जारी किया जाता है।” उन्होंने इस मामले को सुनवाई के लिए 29 मार्च का दिन सूचीबद्ध किया है।

कोर्ट ने कहा कि जब अन्य मामलों की सुनवाई चल रही थी, तब सुशील कुमार फोन पर बात कर रहे थे। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें ऐसा करने से मना भी किया, क्योंकि इससे कार्यवाही में बाधा आ रही थी। इसके बाद भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया। इसके बाद उन्हें म्यूट मोड पर रख दिया गया। जब उनसे इस ‘दुर्व्यवहार’ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कोर्ट से माफी माँग ली और कहा कि वे दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे।

इसके कुछ ही देर बाद कोर्ट आदेश लिखने में लगा तो सुशील कुमार कैमरा के सामने ही सिगरेट पीने लगे। इस दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का काम सँभाल रहे कोर्ट के कर्मचारी ने देख लिया। इसको लेकर जब उनसे सवाल किया गया तो सुशील कुमार वेब मीटिंग छोड़कर चले गए। वहीं, सुशील कुमार के वकील भी अगली सुनवाई की तारीख लेकर कोर्ट रूम से चले गए।

शौचालय में बैठकर वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही में शामिल हुआ शख्स

हाल ही में वर्चुअल सुनवाई के दौरान गुजरात में ऐसे दो मामले सामने आए हैं। एक मामले में एक व्यक्ति शौचालय में बैठकर कोर्ट की कार्यवाही में भाग ले रहा था। वहीं, दूसरे मामले में सुनवाई के दौरान एक व्यक्ति बेड पर लेटा हुआ था। गुजरात हाई कोर्ट में 17 जनवरी को सुनवाई के दौरान धवलभाई कनुभाई अंबालाल पटेल नाम का व्यक्ति शौचालय में बैठकर अदालत की कार्यवाही में शामिल हुआ था।
हाई कोर्ट के जस्टिस एमके ठक्कर की पीठ ने इस मामले में पटेल के व्यवहार की निंदा की थी। इसके साथ ही कोर्ट की गरिमा को कम करने के लिए 42 वर्षीय पटेल पर 2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। न्यायालय ने पटेल पर सामुदायिक सेवा का दंड भी लगाया। उन्हें दो सप्ताह तक हाई कोर्ट परिसर में स्थित बगीचों में पानी देने और सफाई करने का निर्देश दिया। उन्हें रोजाना 8 घंटे काम करना तय हुआ।
पटेल अपने पिता के खिलाफ एक मामले से संबंधित सुनवाई में वर्चुअली शामिल हुए थे। ऑनलाइन सुनवाई के दौरान उन्होंने अभद्र व्यवहार किया। इसके कारण अदालत ने उन्हें डिस्कनेक्ट कर दिया। कुछ समय बाद पटेल सुनवाई में फिर शामिल हुए। इस बार वे शौचालय में बैठे हुए थे। इसके बाद उन्हें फिर हटा दिया गया। बाद में अदालत ने सोला पुलिस स्टेशन को इसकी जाँच करने का निर्देश दिया।

बेड पर लेटे हुए कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुआ

इसी तरह 13 फरवरी को न्यायमूर्ति एमके ठक्कर की अदालत में कार्रवाई के दौरान वामदेव गाँधी नामक एक व्यक्ति अपने बिस्तर पर लेटे हुए था। वह अदालत की कार्यवाही को लेटकर ऐसे देख रहा था, जैसे कि वह कोई फिल्म देख रहा हो और उसका उसका आनंद ले रहा हो। जब अदालत की नजर वामदेव गाँधी की हरकत पर पड़ी तो कोर्ट ने उन पर 25,000 रुपए का जुर्माना ठोक दिया।
अदालत ने कहा, “न्याय तक पहुँच और व्यापक जनहित के लिए ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा प्रदान की गई है। सुनवाई में जुड़ने वाले व्यक्ति को अदालत की गरिमा को बनाए रखना होगा। इस तरह का आचरण अदालत की गरिमा और शिष्टाचार से समझौता करता है। इसलिए इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अगर इस तरह के कृत्य से सख्ती से नहीं निपटा जाता है तो इससे जनता की नज़र में अदालत की गरिमा कम हो सकती है।”

मंदिर उत्सव में सत्ताधारी CPM के झंडे, संगीत कार्यक्रम में ‘वामपंथ’ का गुणगान: केरल हाई कोर्ट ने देवस्वोम बोर्ड को लताड़ा, कहा- क्या ये कोई कॉलेज फेस्ट है?

                                     केरल हाई कोर्ट और मंदिर उत्सव (साभार: ऑपइंडिया अंग्रेजी)
केरल हाई कोर्ट ने 10 मार्च को कोलम के कडक्कल देवी मंदिर उत्सव के दौरान राजनीतिक प्रतीकों और संगीत के प्रदर्शन पर नाराजगी व्यक्त की है। केरल हाई कोर्ट ने मंगलवार (18 मार्च 2025) को मंदिर परिसर के अंदर ऐसी गतिविधियों की अनुमति देने के लिए त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड को फटकार लगाई। उत्सव के दौरान सत्ताधारी पार्टी CPI(M) और उसके छात्र विंग के झंडे लगाए गए थे।

इसको लेकर एडवोकेट विष्णु सुनील ने केरल हाई कोर्ट ने याचिका दाखिल की। याचिका में सुनील ने कहा कि कडक्कल देवी मंदिर उत्सव के दौरान CPI(M) और उसकी युवा शाखा डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के राजनीतिक झंडे लगाए। इसके साथ ही वामपंथी राजनीतिक समूहों से जुड़े क्रांतिकारी गीत भी बजाए गए। इसके अलावा, कई तरह श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाया गया।

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि मंदिर उत्सव के दौरान गायक अलोशी एडम को संगीत प्रदर्शन के बुलाया गया था, जो बेहद गैरकानूनी था। इससे भक्तों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची है। उन्होंने तर्क दिया यह प्रदर्शन कभी भी मंदिर उत्सव का हिस्सा नहीं रहा। एडवोकेट ने कहा कि यह प्रदर्शन धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, जो संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिर का प्रबंधन करने वाला त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड यह सुनिश्चित करने में विफल रहा कि मंदिर परिसर का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए न किया जाए। इसके बाद न्यायमूर्ति अनिल के नरेन्द्रन और न्यायमूर्ति मुरली कृष्णा की खंडपीठ ने मंदिर परिसर के अंदर राजनीतिक प्रदर्शन के आयोजन की आलोचना की।

संगीत समारोह को लेकर कोर्ट ने मंदिर बोर्ड से माँगा जवाब

कोलम के कडक्कल देवी मंदिर का प्रबंधन करने वाले बोर्ड को फटकार लगाते हुए केरल हाई कोर्ट ने म्यूजिक परफॉर्मेंस के लिए उससे जवाब माँगा है। अदालत ने कहा, “आपने मंच पर किस तरह की सजावट की है? क्या यह कोई कॉलेज उत्सव है? आपने ऐसा करने के लिए भक्तों से पैसे लिए हैं! यह मंदिर का उत्सव है। क्या इसमें फिल्मी गानों के बजाय भक्ति गीतों की प्रस्तुति नहीं होनी चाहिए?”
एडवोकेट विष्णु सुनील की याचिका को स्वीकार कर लिया और कडक्कल देवी मंदिर सलाहकार समिति एवं अन्य प्रतिवादियों से इस पर जवाब माँगा। उत्सव के वीडियो देखने के बाद अदालत ने एक अंतरिम आदेश पारित किया है। इस आदेश में कहा गया है, “वीडियो क्लिप देखने के बाद हम पाते हैं कि 10 मार्च को वार्षिक उत्सव में होने वाली गतिविधियाँ मंदिर में स्वीकार नहीं की जा सकतीं।”

म्यूजिक परफॉर्मेंस मंदिर फंड का दुरुपयोग: हाई कोर्ट

इस मामले में केरल हाई कोर्ट ने मंदिर बोर्ड को चेतावनी देते हुए कहा कि उनके द्वारा प्रबंधित किसी भी मंदिर में ऐसी घटनाएँ नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने निर्देश में आगे कहा, “त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड यह सुनिश्चित करेगा कि उसके प्रबंधन के तहत किसी भी मंदिर के उत्सव में ऐसी गतिविधि न हो।” वहीं, मंदिर बोर्ड ने कहा कि मंदिर सलाहकार समिति ने उसे सूचित किए बिना ही संगीत कार्यक्रम आयोजित किया था।
हालाँकि, कोर्ट मंदिर बोर्ड यानी त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के इस दलील से सहमत नहीं हुआ। हाई कोर्ट ने कहा, “हम बोर्ड द्वारा अपनाए गए रुख से प्रथम दृष्टया प्रभावित नहीं हैं। जैसा कि वीडियो में देखा जा सकता है कि LED स्क्रीन और फ्लैश लाइट से सुसज्जित मंच पर विभिन्न व्यवस्थाओं के लिए बड़ी रकम खर्च की गई है।” कोर्ट ने कहा कि मंदिर के धन के इस तरह के दुरुपयोग को रोका जा सकता था।
न्यायालय ने कहा, “किसी भी संगठन या भक्तों के समूह को मंदिर उत्सवों के आयोजन के लिए भक्तों या जनता से धन एकत्र करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। किसी भी तरह के धन संग्रह का काम बोर्ड की अनुमति से ही होना चाहिए, जैसा कि आमतौर पर निर्माण गतिविधियों के मामले में किया जाता है। इसके साथ ही एकत्र किए गए सभी धन का सरकार द्वारा ऑडिट किया जाएगा।”
सुनवाई के दौरान त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि मुख्य सतर्कता और सुरक्षा अधिकारी (पुलिस उपनिरीक्षक) को घटना की जाँच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। साथ ही मंदिर सलाहकार समिति को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। कोर्ट ने कहा कि पिछले निर्णयों में उसने मंदिर समितियों द्वारा एकत्रित मंदिर फंड की सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

AAP का भ्रष्टाचार: INDI गठबंधन वाले कांग्रेस ने ही ‘कट्टर ईमानदार’ का सर्टिफिकेट कैंसल कर I.N.D.I. गठबंधन में डाल दी फूट; क्या मुस्लिम बीजेपी को वोट न देकर सरकार बनवाएंगे?

                                  आप संयोजक अरविंद केजरीवाल, दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी 
क्या दिल्ली विधानसभा चुनाव 
I.N.D.I. गठबंधन का रायता फैला देगा? इसलिए नहीं कि कांग्रेस उस आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मैदान में है, जबकि बाकि पार्टियां अरविन्द केजरीवाल के समर्थन में। संभावनाएं है कि कांग्रेस 10/15 सीटें निकाल सकती है। अगर कांग्रेस 10 सीट भी निकाल लेती है जो I.N.D.I. गठबंधन को बिखरने को मजबूर कर देगा। जिस तरह कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ना गठबंधन को चुभता था उससे कहीं ज्यादा केजरीवाल के साथ खड़ा होने की कीमत चुकानी होगी। 

कांग्रेस द्वारा मुस्लिम बहुल क्षेत्र सीलम पुर से अपना चुनावी शंकनाद करना साबित कर रहा है कि कांग्रेस अपने खोए वोटबैंक को वापस हासिल कर खड़ा होने की शुरुआत करना I.N.D.I. गठबंधन के लिए खतरे की घंटी है क्योकि I.N.D.I. गठबंधन का वोटबैंक मुसलमान ही है।   

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद को कट्टर ईमानदार कहते हैं। वो अपनी पार्टी को ईमानदारी का पर्याय बताते हुए उसे ईमानदारी का सर्टिफिकेट देते हैं, लेकिन इंडी गठबंधन में शामिल उनकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस के ही नेता ने उनके ईमानदारी के ‘सर्टिफिकेट’ को कैंसिल कर दिया है। कांग्रेस नेता ने आम आदमी पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोपों को न सिर्फ दोहराया है, बल्कि साफ कहा है कि सरकारी एजेंसियों की कार्रवाईयों के चलते शराब नीति के घोटाले से आने वाला पैसा बंद हो गया है, इसलिए दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी को जनता से मदद माँगनी पड़ रही है।

तेलंगाना कांग्रेस नेता किरण कुमार चमाला ने AAP की ईमानदारी पर सीधा सवाल उठाते हुए पूछा कि आप अब क्यों क्राउडफंडिंग का सहारा ले रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी ने साउथ लॉबी और तेलंगाना की MLC के कविता के साथ मिलकर दिल्ली की शराब नीति में भ्रष्टाचार किया था। उनका दावा है कि जब तक केंद्र सरकार ने इस गड़बड़ी पर चोट नहीं की, तब तक AAP ने शराब नीति के जरिए पैसे बनाए।

चमाला ने कहा, “दिल्ली CM आतिशी अब चुनावों के लिए 40 लाख रुपये जुटाने के लिए जनता से क्राउडफंडिंग माँग रही हैं। उन्हें यह बताना चाहिए कि जब तक ‘साउथ ग्रुप’ सक्रिय था, तब तक उनकी पार्टी ने शराब घोटाले से कमाई की। अब जब भ्रष्टाचार की पोल खुल गई है, तो उन्हें जनता से मदद माँगनी पड़ रही है।”

केंद्र सरकार की कार्रवाई के बाद शराब घोटाले की कमाई बंद हो गई, जिससे आम आदमी पार्टी की असलियत सामने आ गई। तेलंगाना कांग्रेस नेता ने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली की शराब नीति से हासिल किए पैसों के जरिए गोवा चुनाव लड़ा और नतीजा यह है कि वहाँ बीजेपी की सरकार है।

एक तरह से ये केंद्र सरकार की तारीफ ही है कि उसने भ्रष्टाचार पर गहरा चोट किया है और शराब की कमाई को बंद कर दिया। कांग्रेस नेता का ये बयान आम आदमी पार्टी को बुरी तरह से एक्सपोज करता है कि उसका भ्रष्टाचार बंद हो गया तो उसे क्राउडफंडिंग की राह पकड़नी पड़ी।

शराब घोटाले से आतिशी का सीधा कनेक्शन रहा है, क्योंकि घोटाले से जुड़े लोगों की वो रिश्तेदार हैं। ऑपइंडिया ने अपने लेख में बताया था कि आतिशी की बहन रोजा बसंती की शादी पत्रकार भूपेंद्र चौबे से हुई है, जो ‘इंडिया अहेड न्यूज़’ में बड़े पद पर थे और चैनल का सारा काम वही देख रहे थे। बकौल कपिल मिश्रा, आतिशी के जीजा वाले इस चैनल को हवाला के माध्यम से शराब घोटाले का 17 करोड़ रुपया पहुँचाया गया। ‘India Ahead News’ चैनल में कमर्शियल हेड के रूप में तैनात रहे अरविंद कुमार सिंह को CBI ने शराब घोटाले में गिरफ्तार भी किया था। जून 2021 से लेकर जनवरी 2022 तक हवाला के जरिए हुए पैसों के लेनदेन में उन्हें जाँच एजेंसी ने शामिल बताया था।

अरविंद कुमार सिंह चैनल में प्रोडक्शन कंट्रोलर भी थे। गोवा में AAP का चुनाव प्रचार देख रही कंपनी ‘Chariot Media’ के खाते में 17 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए जाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। CBI ने आरोप लगाया था कि हवाला नेटवर्क के जरिए ये पैसे भेजे गए थे। 14 फरवरी, 2022 को गोवा में विधानसभा चुनाव हुए थे। दिल्ली के शराब घोटाले में हुआ ये था कि एक नई शराब नीति बना कर ‘साउथ लॉबी’ यानी, दक्षिण भारत की कुछ शराब कंपनियों को फायदा पहुँचाया गया और बदले में करोड़ों रुपए की घूस ली गई।

AAP को मिली घूस की रकम 100 करोड़ रुपए बताई गई थी। कविता के करीबी अरुण पिल्लई ने ‘साउथ लॉबी’ की तरफ से बैठकों में हिस्सा लिया था। वहीं Indospirit के मालिक समीर महेन्द्रू ने भी घूस में करोड़ों रुपए दिए थे। इस पूरे खेल में कोरोना के दौरान नुकसान दिल्ली की जनता का हुआ, अरविंद केजरीवाल अपने आवास ‘शीशमहल’ को सुख-सुविधाओं से लैस करने में व्यस्त रहे।

दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार

अब दिल्ली हाई कोर्ट ने शराब घोटाले और शीशमहल के मामले को लेकर दिल्ली सरकार को फटकार भी लगाई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी सरकार पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 14 रिपोर्ट्स विधानसभा में पेश नहीं की गईं। इनमें से दो रिपोर्ट्स लीक हो चुकी हैं, जिनमें केजरीवाल के सरकारी बंगले पर करोड़ों रुपये खर्च और शराब नीति से सरकारी खजाने को 2000 करोड़ रुपये का नुकसान होने की बात सामने आई है।
जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने दिल्ली सरकार की ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए कहा, “आपने विधानसभा सत्र बुलाने में कदम पीछे खींच लिए। इससे आपकी ईमानदारी पर संदेह होता है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि CAG रिपोर्ट को समय पर पेश करना सरकार की जिम्मेदारी थी।

क्या ‘सर्टिफिकेट’ अब भी दिखाएगी आम आदमी पार्टी या…?

आम आदमी पार्टी की ‘कट्टर ईमानदारी’ पर न केवल राजनीतिक विरोधी, बल्कि सहयोगी दल भी सवाल खड़े कर रहे हैं। कोर्ट की फटकार और भ्रष्टाचार के आरोपों ने पार्टी की छवि को बड़ा झटका दिया है। मौजूदा समय में आम आदमी पार्टी के लिए यह बड़ी दुविधा वाली बात हो गई है कि वो जनता के बीच क्या मुँह लेकर जाए? ‘कट्टर ईमानदारी’ वाला सर्टिफिकेट खारिज होने के बाद क्या वो इसे महज एक राजनीतिक नारा बताकर अपना पलड़ा झाड़ ले? या बेशर्मों की तरह वो अपने सर्टिफिकेट पर डटी रहे। ऐसे में आम आदमी पार्टी को ECI और CAG की रिपोर्ट्स को सामने लाना इसलिए भी जरूरी है ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके और ‘अगर’ कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है, तो इस मुद्दे पर भी दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।