Showing posts with label #Muslim woman. Show all posts
Showing posts with label #Muslim woman. Show all posts

तीन तलाक ‘सही’, हलाला 'सही', लेकिन ‘खुला’ पर बिलबिला उठते हैं इस्लामी कट्टरपंथी: मुस्लिम महिला की माँग को तेलंगाना हाई कोर्ट ने माना, कुरान के हवाले से कहा- शौहर की मर्जी के बगैर भी बीवी हो सकती है अलग


मुस्लिम महिला को ‘खुला’ यानी तलाक माँगने का अधिकार बिल्कुल सही है। इसके लिए शौहर की सहमति नहीं चाहिए। यह टिप्पणी तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान की है। कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर महिला अपने शौहर के साथ नहीं रहना चाहती है, तब महिला को अधिकार है कि वह ‘खुला’ से तलाक ले सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि बीवी के लिए विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिए मुफ्ती या दार-उल-कजा से खुलनामा (विवाह विच्छेद का प्रमाण पत्र) लेना जरूरी नहीं है। मुफ्ती की राय केवल सलाह के लिए होती है। इसके साथ कोर्ट ने साफ किया कि अगर पत्नी खुला माँगती है और केस अदालत तक पहुँचता है। ऐसे मामले में खुला तत्काल रूप से प्रभावी हो जाता है। बेशक ही मामला दोनों पक्षों का निजी क्यों न हो।

जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य और जस्टिस बीआर मधुसूदन राव की बेंच ने कहा कि मुस्लिम बीवी का ‘खुला’ माँगने का अधिकार सही है। इसके लिए पति की स्वीकृति या कारण बताने की जरूरत नहीं है। इसलिए कोर्ट की भूमिका केवल निकाह को खत्म कराने के लिए मुहर लगाने तक ही सीमित है।

बेंच ने कहा, “कोर्ट की एकमात्र भूमिका निकाह समाप्ति पर न्यायिक मुहर लगाना है, जो कि खुला के दौरान दोनो पक्षों के लिए तनावपूर्ण हो जाती है…पारिवारिक न्यायालय को केवल यह पता लगाना है कि दोनों पक्षों के बीच आपसी मतभेद सुलझ सकते है या नहीं। इसी आधार पर खुला की माँग वैध मानी जाएगी। इसके लिए विस्तारित जाँच नहीं होनी चाहिए, बल्कि केंद्रित जाँच काफी है।”

तेलंगाना हाई कोर्ट ने यह फैसला एक मुस्लिम दंपति के मामले में सुनाया है। मामले में एक मुस्लिम बीवी ने अपने शौहर को खुला की माँग की, लेकिन शौहर ने उसकी माँग को ठुकरा दिया। इसके बाद बीवी ने फैमिली कोर्ट में केस दर्ज कराया। यहाँ कोर्ट ने बीवी के पक्ष में फैसला सुनाया।

इसके बाद गैर-सरकारी संगठन सदा-ए-हक शरई परिषद ने मुस्लिम व्यक्ति को तलाक प्रमाण-पत्र सौंप दिया। परिषद निकाह के बाद छिड़े गृह कलह के समाधान कराने का काम करता है। लेकिन व्यक्ति ने इस प्रमाण-पत्र के विरोध में तेलंगाना हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। अब तेलंगाना हाई कोर्ट ने मुस्लिम व्यक्ति को फटकार लगाई है और मुस्लिम महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने इस मामले में कुरान की आयतों में ‘खुला’ का अध्ययन किया। साथ ही इस मामले में इतिहास की परतें भी खोली। जिसमें कहा गया, “कुरान के अध्याय-2 की आयत 228 और 229 में बीवी को अपने शौहर के साथ निकाह को रद्द करने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। खुला की वैधता के लिए शौहर की सहमति कोई पूर्व शर्त नहीं है।”

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शौहर अपनी बीवी की खुला की माँग को स्वीकार नहीं करता है, तो इस्लाम में इस मामले पर कोई भी प्रक्रिया नहीं है। चाहे वह कुरान, सुन्नत या पैगंबर हो।

क्या है खुला

खुला के तहत अगर बीवी अपने शौहर से अलग होती है तो उसे अपने शौहर से उसकी जायदाद लौटानी पड़ेगी। पर यह जरूरी है कि दोनों इसके लिए रजामंद हों। उल्लेखनीय है कि खुला की पहल केवल बीवी ही कर सकती है। कुरान और हदीस में इसका जिक्र है।

वहीं, भारत में मुस्लिमों के बीच मान्य पुस्तक फतवा-ए-आलमगीरी में कहा गया है कि जब निकाह के बाद शौहर-बीवी इस बात पर राज़ी हैं कि अब वे साथ नहीं रह सकते तो बीवी कुछ संपत्ति शौहर को वापस करके स्वयं को उसके बंधन से मुक्त कर सकती है। जायदाद में बीवी अपनी मेहर की रकम छोड़ सकती है या फिर कोई अन्य रकम/संपत्ति दे सकती है।

खुला को लेकर मुस्लिमों की आपत्ति

‘खुला’ को लेकर हनफी सहित कुछ तबके के उलेमाओं का कहना है कि इसके तहत मुस्लिम महिला तभी तलाक ले सकती है, जब उसका शौहर तैयार हो। अगर शौहर मना कर दे तो महिला के पास मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939 के प्रावधानों के तहत अदालत जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने साल 2021 में ‘खुला’ के संबंध में कहा था कि इस प्रक्रिया में पति की स्वीकृति एक शर्त है। वहीं, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कुरान एक मुस्लिम बीवी को एक प्रक्रिया निर्धारित किए बिना उसकी निकाह को रद्द करने के लिए ‘खुला’ का अधिकार देता है।

मद्रास हाई कोर्ट ने भी ‘खुला’ पर सुनाया था फैसला

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के ‘खुला’ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाएँ ‘खुला’ के तहत अपने शौहर से तलाक लेने की अधिकारी हैं। हालाँकि, कोर्ट ने इसके लिए कुछ प्रावधान बताए हैं।
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘खुला’ के तहत तलाक लेने के लिए मुस्लिम महिलाओं को फैमिली कोर्ट जाना होगा। किसी निजी शरीयत परिषद को इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे प्रमाण-पत्र की कोई मान्यता नहीं है।

आखिर कब तक जेहादी उर्फ़ आतंकी हिन्दू त्यौहारों पर उपद्रव करते रहेंगे? संत तुकाराम-संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर पुणे में यात्रा कर रहे थे हिंदू, मुस्लिम महिला ने फेंके माँस-हड्डियों के टुकड़े: कहा- किसी से डरती नहीं, जो करना है कर लो; क्या फर्क इस जेहादी और आतंकवादी में?

               पुणे में आषाढ़ी वारि जुलूस पर फेंका गया माँस का टुकड़ा (साभार- the free press journal)
जब तक केन्द्र और राज्य सरकारें इन जेहादियों को आतंकवादियों के बराबर मान कार्यवाही नहीं करेगी हिन्दुओं को अपने त्यौहार मनाने मुश्किल हो जाएंगे। मोदी सरकार ने पहलगाम का बदला इसलिए लिया था कि आतंकी पाकिस्तान से थे? लेकिन अपने घर में जो आतंकी पल रहे उन पर क्यों नहीं कार्यवाही की जाती? ये जेहादी मोदी सरकार को वोट नहीं देने वाले, मोदी सरकार इस ग़लतफ़हमी नहीं रहे कि इनके वोट मिल जाएंगे। कितने समय से हिन्दू त्योहारों पर अड़चने डाली जा रही है और सरकारें खामोश बैठी है। जो कार्यवाही होती है उसे कार्यवाही नहीं मुंह पोंछना कहते हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला विपक्ष पता नहीं किस मातम में है। सब के सब अब सूरदास बने बैठे हैं। अगर स्थिति विपरीत देखों किस तरह कालनेमि सियापा कर रहे होते। सड़क से लेकर संसद तक चील-कौओं की तरह चीख-चीखकर विधवा विलाप कर रहे होते। अब सब बेशर्म हिन्दू विरोधियों के घरों में मातम हो रहा है क्या?      

पुणे के कैंप इलाके में हिन्दुओं में काफी गुस्सा है। दरअसल 21 जून को साल में एक बार निकलने वाली आषाढ़ी वारी तीर्थयात्रा निकली थी। इस दौरान 57 साल की नसीम शेख ने तीर्थयात्रियों पर हड्डियाँ और माँस के टुकड़े फेंक दिए।

नसीम शेख सोलापुर रोड पर मम्मा देवी चौक के पास गैबीपीर दरगाह के पास अपनी झोपड़ी के बाहर खड़ी थी। सालाना आषाढ़ी वारि इस रास्ते से होकर गुजरता है जो पंढरपुर तक जाता है। इसे पंढरपुर आषाढ़ी वारि भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस जुलूस का हिन्दुओं के लिए काफी महत्व है। सदियों पुरानी इस परंपरा में भक्त संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर जाते हैं। इसका समापन आषाढ़ी एकादशी के दिन भगवान विट्ठल मंदिर में होता है।

नसीम शेख के खिलाफ छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अक्कलवंत राठौड ने एफआईआर दर्ज कराई है। एफआईआर के मुताबिक, ” ये घटना दिनदहाड़े हुई जब जुलूस इलाके से गुजर रहा था। राठौड़ ने बताया कि माया धूमल नाम की भक्त जुलूस में शामिल थी जिसे नसीम शेख की फेंकी गई एक पोटली से चोट लगी। इसमें हड्डियाँ और माँस के टुकड़े थे। जब राठौड़ ने शेख से बात की तो वह गालियाँ देने लगी और कहा, ” जो चाहो करो, मैं डरने वाली नहीं हूँ। ” इस घटना से भक्तों में काफी गुस्सा है।

महाराष्ट्र सरकार ने आषाढ़ी वारि जुलूस के लिए कई नियम लागू किए हैं। इस दौरान जुलूस के गुजरने वाले क्षेत्र में माँस और शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके अलावा पंढरपुर में भी माँस-मदिरा की बिक्री बंद है।

वारि जुलूस में दूर-दूर से आकर लोग शामिल होते हैं। हर समुदाय में लोकप्रिय इस जुलूस पर सुरक्षा व्यवस्था का खास ख्याल रखा जाता है। लेकिन नसीम शेख के फेंके गए माँस और हड्डियों के टुकड़े ने लोगों को उकसाने का काम किया है।

पिछले कई सालों से इस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ हिन्दू मंदिरों के बाहर या धार्मिक कार्यक्रम में माँस, हड्डियाँ, गाय के सिर फेंके गए। असम के धुबरी जिले में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इस साल बकरीद के दौरान दो बार हनुमान मंदिर के बाहर गाय के सिर फेंके गए। घटना के बाद राज्य सरकार ने देखते ही गोली मारने के आदेश देने पड़े। बदरपुर और लखीपुर के शिव मंदिरों के पास भी माँस के टुकड़े मिले थे। इसके बाद कई मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया था।

यूपी के लखनऊ, प्रयागराज, अमेठी और सोनभद्र के मंदिरों के बाहर भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं। इसके बाद इलाके में तनाव फैल गया। इस साल मार्च में भी महाकुंभ मेले के बाद हिन्दू घरों के बाहर गाय के कटे सिर मिले, जो सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती है।

ये पूरा पैटर्न यूपी से असम तक फैल गया है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश और झारखंड के पास हिन्दू समारोह में माँस फेंकने की खबरें आई हैं। कई बार सीसीटीवी फुटेज में पुलिस ने आरोपियों को ऐसा कर बाइक या पैदल भागते हुए देखा गया।

दरअसल कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन लगातार हिन्दू धार्मिक स्थलों, समारोहों को अपवित्र करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की साजिश कर रहे हैं। बार-बार ऐसी होने वाली घटनाओं के बावजूद सख्ती बरतने में राजनीतिक हिचकिचाहट ऐसे तत्वों को बढ़ावा देता है।

‘हिन्दू डॉक्टर ने मरीज को मुस्लिम जानकर इलाज से किया इनकार’: पहलगाम अटैक के बाद ‘विक्टिम मुस्लिम’ नैरेटिव गढ़ने को The Quint ने परोसी फर्जी कहानी

                            द क्विंट' ने हिन्दू डॉक्टर चंपाकली सरकार को किया बदनाम (साभार: ऑपइंडिया इंग्लिश)
सोशल मीडिया पर रविवार (26 अप्रैल ,2025) को ‘मुस्लिम पीड़ित’ की झूठी कहानी फैलाई गई, जिसमें दावा किया गया कि कोलकाता की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ चंपाकली सरकार ने एक मुस्लिम मरीज का इलाज करने से इनकार कर दिया। आरोप था कि कस्तूरी दास मेमोरियल सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर चंपाकली ने कंगकोना खातून नामक महिला को उसके मजहब के चलते चिकित्सा सेवा देने से मना कर दिया।

रिपोर्ट में डॉ सरकार को विलेन दिखाने के लिए एक अपुष्ट कॉल रिकॉर्डिंग भी पेश की गई। यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि उस ऑडियो क्लिप की अब तक कोई फॉरेंसिक जाँच नहीं हुई है और उसकी असलियत की पुष्टि नहीं हो सकी है।

हालाँकि, यह दावा पूरी तरह झूठा और भ्रामक निकला। यह घटना पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आई उन कई फर्जी खबरों में से एक है, जो सोशल मीडिया और कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा फैलाई जा रही हैं। इसके पीछे की मंशा इस्लामी आतंकवादियों द्वारा किए गए हिंदुओं के नरसंहार जैसे गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाना और हिंदुओं को गलत तरीके से खलनायक के रूप में प्रस्तुत करना प्रतीत होता है।

‘द क्विंट’ और कुछ अन्य मीडिया संस्थानों द्वारा इन फर्जी कहानियों को पुनः प्रकाशित कर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, जिससे सांप्रदायिक तनाव और गलतफहमियों को बढ़ावा मिला।

वामपंथी प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘द क्विंट’ ने डॉ चंपाकली सरकार के हवाले से यह बयान दिया, “आपके मजहब के लोग मेरे धर्म के लोगों को मार रहे हैं, आप लोग हत्यारे हैं।”

                                                     ‘द क्विंट’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इसमें आगे आरोप लगाया गया है, “डॉक्टर ने कहा – आपके पति को हिंदुओं द्वारा मार दिया जाना चाहिए ताकि आप उस दर्द को महसूस कर सकें जो हिंदुओं ने झेला है। आपको अपने इलाज के लिए केवल मदरसों और मस्जिदों में जाना चाहिए, जहाँ मुस्लिमों को आतंकवादी बनना सिखाया जाता है।”

डिजिटल मीडिया पोर्टल ‘द क्विंट’ के हवाले से, ये बात सामने आई है जिसमें डॉ सरकार को एक कथित कॉल रिकॉर्डिंग के आधार पर खलनायक के रूप में दिखाया गया है। आरोप है कि यह रिकॉर्डिंग असत्यापित है और इसे बिना पुष्टि के रिपोर्ट में प्रमुखता दी गई। रिपोर्ट में कंगकोना खातून, उनके पति और भाभी महफूजा (जो पेशे से वकील हैं) के बयानों को गलत रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

वहीं, डॉ सरकार के पक्ष को बहुत ही सीमित जगह दी गई, जबकि पूरी रिपोर्ट उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकार अलीज़ा नूर ने इस ख़बर को लिखा, जिन पर पहले भी ‘मुस्लिम पीड़ित’ की कहानी को स्थापित करने के लिए एक फर्जी खबर फैलाने के आरोप लग चुके हैं।

                                                   ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्टस के अनुसार, डॉक्टर को मरीज के मजहब का पता नहीं था और उसके सरनेम ‘खातून’ की जानकारी मिलने के बाद डॉक्टर नाराज हो गई।

शिकायत के अनुसार, डॉक्टर पिछले 7 महीनों से महिला का इलाज कर रही थी, डॉक्टर मरीज का पहला नाम कोंकणा से जानती थी। आरोप लगाया गया है कि उसका सरनेम ‘खातून’ देखकर डॉक्टर ने कथित तौर पर कहा की वो मुस्लिम महिला का इलाज नहीं करेंगी। बकौल रिपोर्ट, डॉक्टर ने हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का हवाला दिया और मजहबी कट्टरता के आरोप लगाए।

इस फर्जी खबर को मुस्लिम मिरर, डेक्कन क्रॉनिकल, मकतूब मीडिया और सियासत जैसी इस्लामी प्रचार साइटों द्वारा प्रोपेगंडा के तहत फैलाने का काम किया गया।

दावे बनाम सच्चाई, क्या था असल मामला?

कंगकोना खातून पिछले 7 महीने से अपनी नियमित जाँच के लिए डॉ सरकार के पास जा रही थीं। इतने लंबे समय तक इलाज के दौरान डॉक्टर को मरीज की मजहबी पहचान का पता न चलना असंभव सा लगता है। यदि डॉक्टर पूर्वाग्रही होतीं, तो शुरुआत से ही इलाज करने से इनकार कर देतीं। खातून का कहना है कि डॉक्टर को उसके उपनाम के बारे में हाल ही में जानकारी मिली और तभी से उनके व्यवहार में बदलाव आया।

दिलचस्प बात यह है कि यह खुलासा पहलगाम आतंकी हमले के दो दिन बाद हुआ। उसके मुताबिक, गुरुवार (24 अप्रैल, 2025) को डॉक्टर ने उसका इलाज करने से मना कर दिया, जिसके बाद 25 अप्रैल को उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। हालाँकि, जब जाँच शुरू हुई और तथ्य सामने आए, तो उसके आरोपों की बुनियाद कमजोर पड़ गई।

                                  डॉक्टर को महिला के पूरे नाम से ही जा रहा था पेमेंट, देख सकते हैं सरनेम

कोलकाता के प्रसिद्ध एनेस्थेसियोलॉजिस्ट डॉ प्रमोद रंजन रॉय ने गुरुवार (24 अप्रैल 2025) को सोशल मीडिया पर एक स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें दिखाया गया था कि कंगकोना खातून ने डॉ चंपाकली सरकार को परामर्श शुल्क का भुगतान किया था। यह स्क्रीनशॉट उसी दिन का था जिस दिन खातून ने आरोप लगाया था कि उनका उचित इलाज नहीं किया गया और उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब किसी तरह का इलाज किया ही नहीं गया, तो मरीज ने डॉक्टर को जाँच के लिए परामर्श शुल्क क्यों अदा किया?

इस मुद्दे पर अब और भी स्पष्टता आ गई है। मंगलवार, (29 अप्रैल, 2025) को ‘पश्चिम बंगाल डॉक्टर्स फोरम’ (WBDF) द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि उन्होंने डॉ चंपाकली सरकार द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की समीक्षा की है, और उस समीक्षा के आधार पर उनके बयान को सही और विश्वसनीय माना है।

                                                         WBDF द्वारा प्रेस विज्ञप्ति

WBDF ने अपने बयान में कहा, “संबंधित डॉक्टर से सीधे संपर्क करने और तथ्यों की पुष्टि करने के बाद, हमने पाया कि बताए गए तथ्य प्रसारित किए जा रहे आरोपों के विपरीत हैं। वास्तव में, जिस मरीज़ की बात हो रही है, उसे मरीज़ के अनुरोध पर डॉक्टर ने उसके घर पर देखा था। सबूत के तौर पर, हमने परामर्श शुल्क की ऑनलाइन भुगतान रसीद की पुष्टि की है, जिस पर उचित समय और दिनांक अंकित है, जो बताता है कि परामर्श वास्तव में हुआ था।” WBDF के बयान ने कंगकोना खातून के झूठ की हवा निकाल दी।

यह बताया गया है कि खातून ने डॉ चंपक और सरकार के बीच एक निजी बातचीत सुनी थी, जो उनके खातून से संबंधित नहीं थी।

इसमें यह भी बताया गया है कि पहले भी डॉक्टरों को झूठे आरोपों के तहत इसी तरह निशाना बनाया गया है। ऑपइंडिया ने इस मामले को लेकर ‘पश्चिम बंगाल डॉक्टर्स फोरम’ (WBDF) के सदस्य डॉ. कौशिक चाकी से संपर्क किया, जिन्होंने प्रेस विज्ञप्ति की प्रामाणिकता की पुष्टि की।

डॉ चंपाकली सरकार का क्या कहना है

डॉ प्रमोद रंजन रॉय द्वारा शेयर किए गए वीडियो में पीड़िता डॉ चंपाकली सरकार ने अपना बयान दिया है।
उन्होंने अपने बयान में लिखा, “मैं डॉ CK सरकार हूँ। मैं पिछले 30 सालों से बेहाला, साउथ 24 परगना में प्रैक्टिशनर हूँ। मैं मेडिकल नैतिकता में विश्वास रखती हूँ। मेरे लिए सभी मरीज एक समान हैं। मैं अपने सभी मरीजों को समान प्राथमिकता देती हूँ। मेरी नजर में जाति, धर्म और नस्ल का कोई महत्व नहीं है। मैं मरीजों का सही और नैतिक तरीके से इलाज करने की पूरी कोशिश करती हूँ। कुछ लोगों को मुझसे दिक्कत थी। आप लोग अफवाहों पर ध्यान न दें। मेरे करियर को बर्बाद करने की कोशिश की गई है। मुझे सोशल मीडिया और न्यूज रिपोर्ट से जानकारी मिली है। संकट के समय में इस तरह की अफवाहें फैलाई जाती हैं। मुझे उम्मीद है कि आप लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे।”
साथ ही, डॉक्टर ने निजी कारणों से अपने 3 दशक लंबे करियर को बर्बाद करने की कोशिश करने के लिए खातून के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात भी कही है।
डॉ चंपाकली सरकार ने ‘द टेलीग्राफ’ को बताया, “मेरे 80 प्रतिशत मरीज़ मुस्लिम हैं। क्या मैं कुछ ऐसा कहूँगी जिससे मुझे सबसे ज़्यादा दुःख पहुँचे? मैंने परनाश्री पुलिस स्टेशन में शिकायत भी दर्ज कराई है कि मुझे बदनाम किया जा रहा है।”
डॉक्टर ने यह भी कहा की यह असत्यापित ऑडियो कॉल रिकॉर्डिंग फ़र्जी है। उन्होंने ‘द क्विंट’ से कहा, “नहीं, यह सब फ़र्ज़ी है, यह मेरी कॉल रिकॉर्डिंग नहीं है।”
यह हिंदू समुदाय को बदनाम करने का पहला प्रयास नहीं है। हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद, ऐसी साजिशों की कोशिश हुई हैं जिनका इस्तेमाल आकर आतंकी हमलों के पीछे मजहबी घृणा वाली वास्तविकता से ध्यान बँटाया जा सके, कश्मीरियों और मुस्लिमों को हिन्दुओं द्वारा निशाना बनाए जाने की झूठी कहानी गढ़ी जा सके।
इस रणनीति के तहत ‘मुस्लिम पीड़ित’ कार्ड का इस्तेमाल किया गया, ताकि बहस का केंद्र आतंकवाद से हटकर सांप्रदायिक पीड़ाओं की ओर मोड़ा जा सके। इसी सिलसिले में, एक और फ़र्ज़ी खबर सोशल मीडिया पर फैलाई गई, जिसमें दावा किया गया कि बेंगलुरु में एक मुस्लिम कॉर्पोरेट कर्मचारी की मौत उसके हिंदू सहकर्मियों द्वारा ‘गायत्री मंत्र’ ज़बरदस्ती जपवाने और पहलगाम हमले पर प्रतिक्रिया न देने के कारण हुई।
इस फर्जी खबर का पर्दाफाश ऑपइंडिया ने किया। यह कहानी मूल रूप से एक लिंक्डइन यूजर इशान सक्सेना की मनगढ़ंत पोस्ट पर आधारित थी, जिसे तथाकथित पत्रकार अलीजा नूर ने बिना किसी तथ्य की जाँच के रिपोर्ट किया। इस खबर को वामपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द क्विंट‘ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया, लेकिन जब सच्चाई सामने आई, तो बिना किसी माफ़ीनामे के चुपचाप हटा दिया गया। यह दिखाता है कि किस तरह तथ्यों की पुष्टि किए बिना ‘नैरेटिव’ गढ़ने की कोशिश की जाती है, और जब वो फिट नहीं बैठती, तो उसे दबा दिया जाता है।
नूर, जिन्होंने पहले कोलकाता के डॉक्टर की कहानी लिखी थी, अब ताज़ा खुलासे के बाद अपने एक्स (Twitter) और इंस्टाग्राम अकाउंट डिलीट कर चुकी हैं। इसी प्रोपेगेंडा तंत्र ने जामिया मिलिया इस्लामिया की एक कश्मीरी छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना को भी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया था। लेकिन जब बाद में मामला  सामने आया कि आरोपित मेवात का मोहम्मद आबिद है, तो यह पूरा नैरेटिव अचानक शांत हो गया।

‘अगर हम लोग (मुस्लिम) खड़े हुए तो आप लोगों (हिंदुओं) को चलने का रास्ता नहीं मिलेगा’: हिजाब वाली ने वक्फ कानून पर धमकाया, देखिए Video

वक्फ संशोधन एक्ट-2025 के खिलाफ जितने भी लोग सड़क पर हैं क्या किसी ने अपने आकाओं से पूछा कि तुमने वक़्फ़ की कितनी जमीन पर कब्ज़ा कर रखा है? उस जमीन का कितना किराया देते हो और उसके पलटे कितने करोड़ हर महीने कमा रहे हो?    
वक्फ संशोधन एक्ट-2025 के खिलाफ एक मुस्लिम महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में महिला ने चेतावनी दी कि अगर दुनिया भर के मुस्लिम एकजुट हो गए, तो हिंदुओं के पास खड़े होने की जमीन भी नहीं बचेगी।

हिजाब पहनी महिला ने कहा, “पूरी दुनिया में मुसलमान से ज्यादा तादात किसी की नहीं है। अगर हम लोग खड़े हुए, तो आप लोगों (हिंदुओं) को चलने का रास्ता नहीं मिलेगा इंसाल्लाहताला.. जितनी जल्दी हो सके, आप अपने वक्फ बिल को वापस लीजिए।”

वक्फ (संशोधन) एक्ट को अप्रैल 2025 में संसद ने पारित किया। यह एक्ट वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाने और गैर-मुस्लिम सदस्यों को बोर्ड में शामिल करने जैसे सुधार लाता है। लेकिन कई मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे मुस्लिम अधिकारों पर हमला बताया।

इस कानून के खिलाफ पश्चिम बंगाल में लगातार हिंसा हो रही है। हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं। मंदिरों, हिंदुओं की संपत्तियों, वाहनों को निशाना बनाया जा रहा है, तो घर में घुसकर पिता-बेटे की हत्या कर दी गई।

पश्चिम बंगाल : ‘मुस्लिम राष्ट्र के कुछ आचार-विचार होते हैं’: जिस मुस्लिम महिला की खुलेआम हुई पिटाई उसे TMC विधायक हमीदुल रहमान ने बताया ‘दुष्ट जानवर’; कहाँ है #mob lynching गैंग?

चोपरा के विधायक हमीदुल रहमान ने इस्लाम का हवाला देकर मुस्लिम महिला की पिटाई का किया बचाव
पश्चिम बंगाल में एक मुस्लिम महिला की खुलेआम पिटाई होने पर #mob lynching गैंग क्यों खामोश है? क्या बंगाल में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री होते मुस्लिम राज स्थापित हो गया है? 

पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर में खुलेआम एक भीड़ के सामने एक मुस्लिम महिला की पिटाई की गई। वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि क्या राज्य में शरिया कानून लागू हो गया है? ऐसा इसीलिए, क्योंकि जिस ताजेमुल उर्फ़ JCB ने इस घटना को अंजाम दिया है वो ‘त्वरित न्याय’ के लिए जाना जाता है, पुलिस-कोर्ट तक की उसके सामने कोई कीमत नहीं। वो चोपरा से TMC विधायक हमीदुल रहमान का करीबी है। अब विधायक ने इस पर और निंदनीय बयान दिया है।

BJP और CPI(M) – दोनों ही विपक्षी दलों ने कहा कि ताजेमुल तृणमूल कांग्रेस का कार्यकर्ता है। वीडियो में मुस्लिम महिला के अलावा एक पुरुष को भी जमीन पर पटक कर पीटे जाते हुए देखा गया। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिए कि तृणमूल कांग्रेस के विधायक हमीदुल रहमान ने अपने करीबी का बचाव करते हुए जिस महिला की पिटाई हुई उसे ही ‘दुष्ट जानवर’ कह दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि उक्त महिला की गतिविधियाँ ‘असामाजिक’ थीं।

हालाँकि, उन्होंने कहा कि इस प्रकरण से उनका या पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी TMC का कोई लेना-देना नहीं है। विधायक हमीदुल रहमान ने इसे गाँव का मसला बताते हुए कहा कि महिला ने भी गलती की है, उसने अपने पति और बेटा-बेटी को छोड़ दिया। चोपरा के विधायक ने कहा कि ‘मुस्लिम राष्ट्र’ के हिसाब से कुछ संहिता और न्याय होते हैं। हालाँकि, उन्होंने ये भी जोड़ा कि जो हुआ वो बहुत ज़्यादा था और कानून अपना काम करेगा।

अवलोकन करें:-

पश्चिम बंगाल की ‘शरिया अदालत’ : मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे सर झुका चुकी ममता: महिला मुख्यमंत्

फ़िलहाल पुलिस ने आरोपित ताजेमुल को गिरफ्तार कर लिया है। इस्लामपुर के पुलिस सुपरिटेंडेंट जॉबी थॉमस K ने कहा कि पुलिस ने सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के बाद पुलिस ने केस दर्ज किया है। उन्होंने घटना के पीछे जाँच की बात कही है। TMC विधायक हमीदुल रहमान का कहना है कि पीड़िता या उसके पति ने कोई FIR नहीं दर्ज कराई है, केवल मीडिया इसे फैला रही है। उस क्षेत्र में ‘सालिशी सभा’ नाम का कंगारू कोर्ट चलता है।

उत्तर प्रदेश : मुस्लिम महिला की मांग : ‘मौलाना तौकीर को विदेश से हो रही फंडिंग, ED करे जाँच’: जीते हैं ऐश की जिंदगी, हिंदू और मुस्लिम के बीच फैलाते हैं नफरत

मुस्लिम महिला द्वारा मौलाना तौकीर पर देश विरोधी ताकतों से फंडिंग मिलने का आरोप (चित्र साभार- Z न्यूज़)
कालचक्र जब घूमता है, अच्छे-अच्छे सुरमा भोपाली नप जाते हैं। 2014 से भारत में जितने भी प्रदर्शन, धरने और सनातन पर प्रहार हो रहे हैं, सभी विदेशी भीख पर। 'सर तन से जुदा' गैंग भी भूल रहा है कि इस्लाम के ही विरुद्ध एक्स-मुस्लिम खड़ा हो चुका है। जो नूपुर शर्म विवाद से अधिक सक्रिय हो गया है। सबूत के तौर पर नूपुर विवाद के दिनों के Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर "इस्लाम क्या कहता है" देखकर आँखों खोलो। इन एक्स-मुसलमानों के तीखे सवालों के आगे बड़े-बड़े मौलानाओं/मौलवियों को वातानुकूलित कमरों में बैठे होने के बावजूद पसीने पोंछते देखा जा सकता है। 

अपने विवादित बयानों के लिए कुख्यात बरेली के मौलाना तौकीर रजा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच की माँग उठी है। यह माँग आला हजरत खानदान की बहू और आला हजरत हेल्पिंग समिति चलाने वाली निदा खान द्वारा उठाई गई है। निदा ने मौलाना तौकीर के खिलाफ ED की जाँच की माँग करते हुए कहा कि उन्हें बाहर से फंडिंग हो रही है और हिन्दुओं और मुस्लिमों में दरार डालते रहते हैं।

निदा खान ने तमाम केस होने के बावजूद अब तक मौलाना तौकीर की गिरफ्तारी न होने पर हैरानी जताई है। शनिवार (6 मार्च 2024) को एक वीडियो जारी करते हुए निदा खान ने कहा कि उन्हें धमकी मिल रही। बुर्का पहन कर बनाए गए इस वीडियो की शुरुआत निदा ने अपना परिचय आला हजरत खानदान की बहू के रूप में दिया है। उनके इस बयान को वीडियो में 3:07 मिनट पर सुना जा सकता है।

निदा खान ने वीडियो में कहा है कि वो मौलाना तौकीर के बारे में ये पढ़ती और सुनती आई हैं कि उन्होंने बहुत सारे धरने-प्रदर्शन किए हैं। उदहारण के तौर पर निदा ने CAA और NRC का नाम लिया। मौलाना तौकीर पर हिन्दू और मुस्लिमों को आपस में लड़ाने का आरोप लगाते हुए निदा ने उनके अंतिम धरने में साम्प्रदायिक तनाव फैलने की बात कही है।

वीडियो में आगे कहा गया है कि अभी उत्तर प्रदेश में लॉ एन्ड आर्डर बेहद सख्त है, जिसकी वजह से मौलाना तौकीर रजा दंगा फैलाने में नाकाम हैं। साल 2010 में हुए बरेली दंगों की याद दिलाते हुए निदा ने उसके आरोपित के तौर पर मौलाना तौकीर का नाम लिया है। निदा ने हैरानी जताते हुए कहा है कि 3 गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद मौलाना तौकीर रजा खुलेआम घूम रहे हैं।

तौकीर की कथित बीमारी पर भी निदा ने सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि तौकीर रजा की मेडिकल रिपोर्ट कभी बाहर नहीं आती है। इस बार भी मेडिकल रिपोर्ट गायब बताई गई है। निदा ने आगे बताया है कि मौलाना तौकीर रज़ा और उनका बेटा दोनों ही ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीते हैं। तौकीर का बेटा ऑस्ट्रेलिया में रहता है। उन्होंने मौलाना तौकीर को मिलने वाले पैसों के स्रोत पर सवाल उठाया है।

निदा ने पूछा कि तौकीर के पास न तो कोई व्यापार है और न ही कोई फैक्ट्री, फिर वे भारत में और उनका बेटा ऑस्ट्रेलिया में मजे की जिंदगी कैसे बीता रहा है? उन्होंने सरकार से पैसों की जाँच ED से कराने की माँग की। तौकीर को मिल रहे पैसों को निदा ने ‘नफरत फैलाने वाली फंडिंग’ बताया है। उन्होंने तौकीर को विक्टिम कार्ड खेलने में माहिर और लोगों को अपनी बातों से ब्रेनवॉश करने वाला बताया।

निदा खान का यह भी दावा है कि मौलाना तौकीर रजा के खिलाफ आवाज उठाने के बाद उनको लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। इनमें निदा के कत्ल की भी धमकी शामिल है। निदा ने मौलाना तौकीर रजा के समर्थकों को भी आड़े हाथों लिया और अंत में कहा कि मौलाना तौकीर के पास कोई फंडिंग तो है। इस फंडिंग उन्होंने देश के लिए हानिकारक बताई है।

शोएब जमई मुस्लिमों का प्रतिनिधि और अधिवक्ता सुबुही खान को अपनी बात रखने का भी हक़ नहीं?

शोएब जमई 'मुस्लिम पक्ष' हो गया और सुबुही खान नहीं, क्यों?
अधिवक्ता सुबुही खान ने लाइव टीवी शो में इस्लामी कट्टरपंथी शोएब जमई को पीट दिया। हिंसा किसी भी चीज का जवाब नहीं हो सकता है, लेकिन एक पढ़ी-लिखी महिला ने जब मजबूर होकर किसी को शो से भागने के लिए कहा, तो इसके पीछे ज़रूर वाजिब कारण रहा होगा। यहाँ एक मुस्लिम महिला के अधिकारों की चिंता किसी को नहीं है लेकिन एक इस्लामी कट्टरपंथी के लिए आँसू बहाए जा रहे हैं। शोएब जमई जैसे गुंडे को अगर दो-चार हाथ या लात पड़ भी गए तो इसमें हंगामा करने का क्या मतलब है?

शोएब जमई तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुस्लिमों को मिला कर हिन्दुओं पर शासन करने की बातें कर रहा था, क्या इसके लिए उस पर हेट स्पीच का मामला नहीं चलना चाहिए? जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कहा है कि पुलिस हेट स्पीच का स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करे, तो क्या उसमें इस्लामी कट्टरपंथियों की गिनती नहीं होती? शोएब जमई के लिए आँसू बहाने वालों को बताना चाहिए कि क्या वो उसकी विचारधारा का समर्थन करते हैं?

उदाहरण के लिए ‘ज़ेहरा कैलीग्राफी’ नामक कंपनी के CEO का ट्वीट देखिए। उसने दावा कर दिया कि मुस्लिम पक्ष की बात नहीं सुनी गई और उन्हें जलील किया गया। ज़ेहरा खुद एक महिला हैं, ऐसे में उन्हें इसका जवाब देना चाहिए कि क्या सुबुही खान मुस्लिम नहीं हैं? सुबुही खान का पक्ष ‘मुस्लिम पक्ष’ क्यों नहीं हो सकता और शोएब जमई कैसे मुस्लिमों का प्रतिनिधि बन गया? इसके लिए तो न कोई मतदान हुआ है, न ऐसी कोई घोषणा हुई है।

फिर तो मुस्लिम समाज को मतदान कर के आपस में ये निर्णय ले लेना चाहिए कि उनका आधिकारिक प्रतिनिधि कौन है और कौन नहीं। अब पत्रकार से यूट्यूबर बने अजीत अंजुम को देख लीजिए। वो शोएब जमई को ऐसे सलाह दे रहे हैं जैसे वो उनके घर के आदमी हों। अजीत अंजुम ने कह दिया कि शोएब जमई पब्लिसिटी के लिए हो रहे स्टंट का हिस्सा बन कर अपने कौम का नुकसान कर रहे, कुछ महीने उन्हें घर में बैठना चाहिए।

अजीत अंजुम ने शायद इतनी सहानुभूति और चिंता तो अपने बेटे के लिए भी नहीं जताई होगी। लोग अजीत अंजुम को कह रहे हैं कि वो शोएब जमई को भी अपनी तरह यूट्यूब चैनल बनाने की सलाह दे दें। फिर दोनों मिल कर भी प्रोपेगंडा कर सकते हैं। जहाँ अजीत अंजुम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ झूठ फैलाएँगे, वहीं शोएब जमई ISIS जैसे आतंकी संगठनों की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए हिन्दू विरोधी बातें करेंगे।

अगर सुबुही खान को मुस्लिमों या मुस्लिम महिलाओं का पक्ष रखने की अनुमति नहीं है तो फिर किसे है? राजस्थान के उदयपुर में दर्जी कन्हैया लाल तेली का सिर कलम करने वाले दोनों हत्यारों को? दुनिया भर के मुस्लिम युवाओं को कट्टर बनाने के लिए वीडियो बनाने वाले इस्लामी मुबल्लिग ज़ाकिर नाइक को? या फिर पाकिस्तान में बैठे उन आतंकियों को, जो अल्लाह और जिहाद के नाम पर खून बहाते हैं? या फिर सीधे ISIS को, जिसके नाम में ही इस्लाम है।

शोएब जमई का समर्थन करने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने कन्हैया लाल तेली और महाराष्ट्र के अमरावती के उमेश कोल्हे की हत्या की निंदा नहीं की थी। ये वही लोग हैं, जो ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म की निंदा करते हैं, क्योंकि हिन्दू लड़कियों के साथ ‘लव जिहाद’ करने वाले कट्टरपंथियों का वो समर्थन करते हैं। शोएब जमई के पक्ष में बयान देने वाले वही लोग हैं, जो महिला विरोधी हैं। ये नहीं चाहते कि एक मुस्लिम महिला को खुल कर अपनी बात रखने का अधिकार मिले।

अवलोकन करें:-

चल निकल यहाँ से, तेरे बाप को भी मारूँगी… सुबुही खान ने बताया न्यूज शो में ही शोएब जमई को क्यों पीट

शोएब जमई लगातार नफरत भरी बातें कर रहा है। वो हिंसा भरे बयान दे रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश को मिला कर मुस्लिम PM बनाने के उसके बयान को क्या देशद्रोह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्या? ऐसे देशद्रोही के लिए लिबरल गिरोह के लोग सहानुभूति जता रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये कि न्यूज़ डिबेट्स में ऐसे व्यक्ति को बुलाया ही नहीं जाना चाहिए। किसी को नफरत फैलाने के लिए मंच देने का क्या तुक है भला?