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मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट संविधान का क्यों नहीं पालन कर रहे? जज को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग का प्रावधान : कौन थे जस्टिस रामास्वामी जिन पर सबसे पहले चला महाभियोग?

                          सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस वी. रामास्वामी (साभार: सुप्रीम कोर्ट/ट्रिब्यून)
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मामला सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तीन जजों का एक एक कमिटी बनाई है, जो इस मामले की जाँच कर रही है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की माँग लगातार तेज होने लगी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की एक लंबी प्रक्रिया है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया।

हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। इसके बाद CJI की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था।

CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने माँग की है कि इस मामले स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद को आपराधिक आरोप तय करना चाहिए या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें हटाना चाहिए। इसी तरह कई पूर्व जज और वरिष्ठ वकील भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की है।

क्या होता है महाभियोग? कैसे हटाए जाते हैं जज?

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की शक्तियों एवं उन्हें हटाने के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही संसद के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट को हटाने के लिए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 218 में कहा गया है कि हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए भी यही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को ‘प्रमाणित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद द्वारा कार्यवाही शुरू की जाती है और इसके दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश देते हैं। दरअसल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाभियोग का आधार और प्रक्रिया को उच्च स्तर का रखा गया है।
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968’ में विस्तृत रूप से बताई गई है। इस अधिनियम में जज को पद से हटाने के उद्देश्य से कार्यवाही आरंभ करने के लिए सबसे पहला चरण सदस्यों की संख्या बताई गई। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे।
अध्यक्ष या सभापति सांसदों या संबंधित लोगों से परामर्श कर सकते हैं और नोटिस से संबंधित प्रासंगिक आरोपों की जाँच करते हैं। इसके आधार पर वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति (जो भी इसे प्राप्त करते हैं) संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे।
इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देता है। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाता है।
रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाता है और सदन में बहस होती है। प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होना चाहिए। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या के का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए।
यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस दौरान अगर संसद भंग हो जाती है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो महाभियोग प्रस्ताव विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की ‘आंतरिक जाँच प्रक्रिया’ क्या होती है?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के अलावा भी शिकायत की जा सकती हैं। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को चिट्ठी लिखकर या अन्य माध्यमों से संपर्क करके जाँच की माँग की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के सीजे एएम भट्टाचार्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोपों के बाद 1995 में एक आंतरिक तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई।
सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।
साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।
इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।
अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।
समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।
यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।
यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

वो जज, जिस पर चला था पहली बार महाभियोग

भारत में आज तक 6 बार जजों को हटाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इनमें से किसी को हटाया नहीं जा सका। सभी ने या तो खुद त्याग-पत्र दे दिया या फिर आरोप खारिज हो गए। इन 6 में से सिर्फ जस्टिस रामास्वामी और जस्टिस सेन के मामले में ही जाँच समिति ने आरोपों को सही पाया था। इनमें से 5 जजों पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे, जबकि एक में यौन कदाचार के आरोप लगे थे।
जस्टिस वीरा रामास्वामी (जी. रामास्वामी) भारत के पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें महाभियोग के जरिए हटाने का प्रयास किया गया था। रामास्वामी का निधन 8 मार्च 2025 को 96 साल की उम्र में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया। वी. रामास्वामी का के खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालाँकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। रामास्वामी को सन 1971 में मद्रास हाई कोर्ट में जज बनाया गया था। इस असामान्य कदम के कारण काफी बवाल हुआ था। यह विवाद उनके कार्यकाल में आगे भी चलता रहा।
रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया। उन्होंने अपने फायदे के लिए सरकारी वाहनों एवं संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया। उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आधिकारिक आवास में महंगे फर्नीचर, कालीन, एयरकंडिशन सिस्टम सहित अन्य विलासिता वाले सामान खरीदे।
इसको लेकर सन 1993 में जमकर राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था। उनके खिलाफ महाभियोग की माँग उठने लगी। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी अपनी मंजूरी दी थी। हालाँकि, रामास्वामी को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। आरोपों की समीक्षा करने के बाद तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें मामले के सुलझने तक सेवा से दूर रहने की सलाह दी।
उन्हें 18 जुलाई 1990 को आधिकारिक पत्र मिला और उन्होंने तुरंत 23 जुलाई 1990 से छह सप्ताह की छुट्टी माँग ली। तथ्यों का सत्यापन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक कमिटी गठित की। इस कमिटी ने कहा कि उसे अनुचित व्यवहार का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के 108 सदस्यों ने 9वीं लोकसभा के अध्यक्ष से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की।
तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के सहयोगी भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों ने लोकसभा में इस महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद तत्कालीन स्पीकर रबि राय ने 12 मार्च 1991 को समिति गठित की। समिति ने पाया कि रामास्वामी ने सार्वजनिक धन का उपयोग निजी फायदे के लिए किया और वैधानिक नियमों की अवहेलना की।
इस समिति ने रामास्वामी को 14 में से 11 आरोपों में दोषी ठहराया। वहीं, रामास्वामी ने स्पीकर द्वारा गठित समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया। 10 मई 1993 को समिति द्वारा यह निर्धारित किए जाने के बाद कि आरोपों में दम है, प्रस्ताव को चर्चा के लिए लोकसभा में लाया गया। हालाँकि, उस समय की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के कई नेता रामास्वामी के समर्थन में आ गए।
इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में 401 सांसदों में से सिर्फ 196 ने मतदान किया। कॉन्ग्रेस और कुछ अन्य दलों के 205 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में हुए मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस तरह यह प्रस्ताव गिर गया और वे हटाए जाने से बच गए। इस तरह वे अपना कार्यकाल पूरा होने तक आगे भी काम जज के रूप में काम करते रहे। आखिरकार 8 मार्च 2025 को उनका निधन हो गया।
कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।
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वो जज, जिनके खिलाफ CBI कोर्ट में लंबित है मामला

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी लगा था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा था। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।
उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।
बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने बालाकृष्णन के फैसले को पलट दिया और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। साल 2011 में जस्टिस यादव जिस दिन सेवानिवृत्त हो रहे थे, उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। आज 14 साल बाद भी यह मामला स्पेशल CBI कोर्ट में लंबित है।

मोदी को बदनाम करने के लिए अवनी डायस ने डॉक्यूमेंट्री में भारत के संविधान को लेकर बोला झूठ, अपनी ‘पत्रकार’ की करतूत ABC News ने कबूली; बीजेपी क्यों नहीं ABC News और इसकी पत्रकार पर कार्यवाही करती?

कहते हैं आदमी के मरने के बाद लकीर पीटने से कुछ नहीं होता, यह बात भारत की जनता पर शत-प्रतिशत लागू होती है। जो शिक्षित होते हुए भी अनपढ़ों की तरह व्यवहार करती है। 2024 लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को हराने संविधान को लेकर कितनी भ्रांतियों फैलाई गयी। लेकिन शिक्षित भी अनपढ़ बन उन दुष्प्रचार का शिकार हो गया। क्या मेरी आयु(+) वालों को नहीं मालूम कि कांग्रेस ने संविधान में इतने अधिक संशोधन किये कि प्रस्तावना तक बदल दी। क्या संविधान निर्माताओं ने ऐसी प्रस्तावना लिखी थी? यूपीए काल में सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री से अधिक अधिकार क्यों दिए? सोनिया की इजाजत के बिना मनमोहन सिंह में किसी फाइल पर साइन करने की हिम्मत नहीं थी? सोनिया एक सांसद थी किस अधिकार से किसी भी कार्यक्रम में प्रथम पंक्ति में मंत्रिमंडल के साथ बैठती थी? मोदी सरकार ने संविधान से इन असंवैधानिक बातों को निकालकर क्या गलत किया था? और जो नेता ऐसी तर्कहीन बातों को संविधान से निकाले जाने पर देश में आग लगने की बात कहे, क्या ऐसा कोई नेता एक भी वोट का हक़दार है? 

I.N.D.I.गठबंधन को समर्थन करने वालों, अपनी भावी पीढ़ी की चिंता करो और इस I.N.D.I.गठबंधन से जितनी अधिक दूरी बना सकते हो बनाओ, जरा सोंचों: देश का संविधान तब खतरे में नहीं था, जब बहुमत के नशे में कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियों ने Muslim Waqf Board बनाया था, जब बहुमत के नशे में Minority Commission बना था, तब खतरे में नहीं था जब Muslim Personal Law Board बना दिया था, तब खतरे में नहीं था जब Places of Worship Act बनाया था, तब संविधान खतरे में नहीं था जब Anti-Communal Violence Act बनाया था, ये तो बीजेपी की मेहरबानी से पास नहीं हुआ और 2014 चुनाव हो गया। इस Act के अनुसार दंगा चाहे मुसलमान ने किया हो कसूरवार हिन्दू ही, सजा हिन्दू को, हिन्दू की संपत्ति कुर्क कर मुसलमान को दे दी जाएगी, यानि कांग्रेस और इसके समर्थक पार्टियां जिसे I.N.D.I.गठबंधन कहते हैं भारत को इस्लामिक देश नहीं मुल्क बनाने की तैयारी कर दी थी।   

इमरजेंसी में जनता ने क्या-क्या अत्याचार नहीं हुए, आज की युवा पीढ़ी को नहीं मालूम। अपनी वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति या transfer करवाने या रुकवाने के लिए कर्मचारी को नसबंदी के 2 केस देने होते थे, जो कर्मचारी को झूठे फर्जी केस का प्रमाण लेने के लिए 50-50 रूपए यानि दो केस के 100 रूपए देकर प्राप्त करने होते थे। 

फिल्म "आंधी" को बैन कर दिया था, अभिनेता-निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार की बहुचर्चित फिल्म "रोटी कपडा और मकान" का बहुचर्चित गीत " हाय महंगाई तू कहाँ से आयी..." को बैन कर दिया था। इतना ही नहीं, किसी कार्यक्रम में गायक किशोर कुमार ने गाने से मना करने पर रेडियो पर किशोर के गानों को बैन कर दिया था। फिल्म "किस्सा कुर्सी का" सेंसर से पास नहीं होने दिया। मारधार दिखाई जाने वाली फिल्मों को सेंसर पास नहीं करता था, लेकिन गाँधी परिवार के करीबी अमिताभ बच्चन अभिनीत मारधार वाली फिल्म "शोले" पास हो गयी।      


बाप(राजीव गाँधी) कह रहा है कि अगर संविधान बदलने की जरूरत होगी तो हम बार बार संविधान बदलेंगे, हमारे पूर्वजों ने भी कई बार संविधान बदला है और  बेटा(राहुल गाँधी) कह रहा है कि अगर संविधान बदला तो देश में आग लगा देंगे समझ नहीं आता कहां लोचा हो गया है। 

एबीसी की ‘पत्रकार’ अवनी दास के फैलाए फेक न्यूज पर ऑपइंडिया की रिपोर्ट के 2 सप्ताह बाद आखिरकार एबीसी न्यूज ने मान लिया कि उसकी कथित ‘पत्रकार’ अवनी डायस ने भारत के संविधान के बारे में दर्शकों को गुमराह किया है। अब एबीसी न्यूज ने अपनी सफाई दी है।

27 जून 2024 को एबीसी न्यूज ने स्वीकार किया कि अवनी डायस ने ‘भारत की आजादी के साथ ही ‘सेकुलर’ शब्द संविधान का हिस्सा है’ का जो दावा किया है, वो झूठा है। एबीसी न्यूज ने अवनी दास के फेक न्यूज पर सफाई देते हुए कहा कि ‘नरेंद्र मोदी पर बने डॉक्यूमेंट्री, जिसे 5 जून को पब्लिश किया गया था, उसमें ‘भारत के मूल संविधान में सेकुलर’ होने का दावा गलत था।’

अपनी इज्जत बचाने के क्रम में एबीसी न्यूज ने लिखा, ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1960 के दशक के दौरान पुष्टि की थी कि धर्मनिरपेक्षता भारत के 1950 के संविधान की एक बुनियादी विशेषता है, इस शब्द को 1976 में एक संवैधानिक संशोधन में जोड़ा गया, जिससे भारत का वर्णन “संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य” से बदलकर “संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” हो गया।’

मामला कैसे शुरू हुआ?

इस विवाद की शुरुआत 5 जून को हुई थी, जब एक तरफ पीएम मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ भारत विरोधी शक्तियाँ भारत सरकार और खासकर मोदी सरकार को बदनाम करने के प्रयास में लगातार जुटे हुए थे। इन्हीं प्रयासों में एक है ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (एबीसी) की कथित ‘पत्रकार’ अवनी डायस द्वारा झूठ फैलाने का प्रयास, जिसमें अवनि ने 5 जून 2024 को भारत के संविधान के बारे में फर्जी बातें प्रसारित की।
अवनी डायस ने कुछ समय पहले ही ये फर्जी खबर फैलाई थी कि ‘निगेटिव रिपोर्टिंग’ की वजह से भारत सरकार ने उनका वीजा रद्द कर दिया है, जबकि वो दावा फर्जी निकला था। इस बार अवनि ने दावा किया है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ भारतीय संविधान का अहम हिस्सा है, वो भी अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद यानी 1947 से। अवनी ने ‘नरेंद्र मोदी से पहले के भारत की कहानी’ हेडलाइन के साथ एक वीडियो बनाकर ये बताने की कोशिश की कि भारत में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की धर्मनिरपेक्षता किस तरह के खतरे में है।
अपने वीडियो के 9.19 मिनट पर अवनी डायस ने कहा, “आपको बता दें कि जब 1947 में अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भारत की स्थापना हुई थी, तो इसके संविधान में लिखा गया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसका मतलब है कि धर्म के आधार पर देश में सभी को आजादी होनी चाहिए।” अवनी ने दावा किया कि भारत के संविधान में सेक्युलर शब्द पेज नंबर 33 पर बड़े अक्षरों में लिखा है।
हालाँकि अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही ‘पत्रकार’ अवनी ये भूल गई कि भारत का संविधान 1947 में लागू नहीं हुआ और जब भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तब सेक्युलर शब्द उस संविधान का हिस्सा ही नहीं था। बता दें कि भारत का संविधान 1947 में नहीं, बल्कि तीन साल बाद 1950 में लागू हुआ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा 1976 में (आपातकाल के काले दिनों के दौरान) बनाया गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संसद को दरकिनार कर संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल करने के लिए 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया था। अवनी डायस के दावों के विपरीत, संविधान यह बताने के लिए नहीं लिखा गया था कि भारत एक ‘धर्मनिरपेक्ष देश’ है। पूरे वीडियो में एबीसी न्यूज के ‘पत्रकार’ ने वैश्विक स्तर पर देश की छवि को धूमिल करने के लिए अटकलों, अनुमानों और मान्यताओं पर भरोसा किया।

पहले भी विवादों में रही हैं अवनी डायस

इसी साल अप्रैल में अवनी डायस ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर दावा किया था कि मोदी सरकार ने उनका वीजा नहीं बढ़ाया, जिसकी वजह से उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अवनी ने दावा किया कि ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग सरकार को पसंद नहीं आ रही थी। हालाँकि ये पूरी तरह से झूठ था, क्योंकि उन्होंने जैसे ही वीजा के लिए अप्लाई किया, उनका वीजा 2 माह के लिए बढ़ा दिया गया। इसके बावजूद एबीसी न्यूज ने एक आर्टिकल प्रकाशित किया और दावा किया कि भारत के विदेश मंत्रालय ने फोन करके अवनी को सूचित किया था कि उनका वीजा नहीं बढ़ाया जा रहा।
खैर, इस प्रोपेगेंडा से इतर अवनी डायस से जुड़ा एक और मामला भी है। उसने कनाडा में हरदीप निज्जर की हत्या को भारत से जोड़ने की कोशिश करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिस पर भारत सरकार रोक लगा चुकी है और यू-ट्यूब पर पर भी उसके मामले में नोटिस दिख रहा है। दरअसल, यो डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से गलत थी, बल्कि भारत के संवेदनशील सीमाई इलाकों में गलत तरीके से फिल्माई गई थी। उन लोकेशन पर शूट करने के लिए गलत तरीके से अनुमति हासिल की गई थी, जिसका बीएसएफ ने भी विरोध किया था।

पहले भी भारत को लेकर प्रोपेगेंडा फैलाती रही हैं अवनि डायस

अवनी डायस भारत विरोधी, सनातन विरोधी लेखों के लिए जानी जाती है। उसने कई बार प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की, लेकिन हर बार एक्सपोज होती रही। इसी साल मार्च में अवनी डायस ने ब्रिसबेस में स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर पर खालिस्तानी कट्टरपंथियों के हमले को नकारते हुए कट्टरपंथियों को क्लीनचिट देने की कोशिश की थी। उन्हें इसे हिंदू समूहों का ही हमला करार दे दिया था। उनके दावों को खुद ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने एक्सपोज कर दिया था। एक फेसबुक पोस्ट में ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने अवनी डायस और उनकी साथी नाओमी सेल्वारत्नम को ‘ब्राउन सिपाही’ की संज्ञा दी थी।

संविधान से सेकुलर और सोशलिस्ट शब्द गायब : कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी का दावा- नए संसद में एंट्री के समय मिली कॉपी में नहीं थे ये शब्द

 (फोटो साभार: द हिंदू इंडिया टुडे)
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने संविधान को लेकर एक बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि 19 सितंबर 2023 को सांसदों को संविधान की जो प्रति दी गई उसमें से ‘सेकुलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्द गायब हैं।
यदि यह बात सत्य है तो इसका अर्थ है कि दिया गया संविधान आपातकाल से पूर्व का है, जिसे पुनः प्रकाशित कर वितरित किया गया है। क्योकि ये शब्द आपातकाल में तुष्टिकरण के चलते जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने विपक्ष को जेलों में भर दिया था, तब ये शब्द संविधान में डाल जनता विशेषकर हिन्दुओं को पागल बनाया जाता रहा। 

लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता चौधरी ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया, “आज हमें जो नया संविधान दिया गया, जिस संविधान को हाथ में लेकर प्रवेश (नए संसद भवन) किए, उसकी प्रस्तावना में ‘सोशलिस्ट सेकुलर’ शब्द नहीं हैं। हम जानते हैं कि ये शब्द 1976 में एक संशोधन के बाद जोड़े गए थे, लेकिन अगर आज कोई हमें संविधान देता है और उसमें ये शब्द नहीं हैं, तो यह चिंता का विषय है।”

अधीर रंजन चौधरी ने इसको लेकर सत्ताधारी बीजेपी की मंशा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि ये सब कुछ बहुत सोच समझ कर किया गया है। बड़ी चतुराई से किया गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा वाले बार-बार मौक़ा खोज रहे थे, लेकिन पहले ऐसा नहीं कर पाए थे। अब सरकार में बैठे लोग कहेंगे कि जब दिया था तो यही था, अब इसे मुद्दा क्यों बना रहे हो।

कांग्रेस सांसद चौधरी का यह भी कहना है कि उन्होंने इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की। लेकिन उनको मौका नहीं दिया गया। उनके अनुसार उन्होंने इससे राहुल गाँधी को भी अवगत करवा दिया है।

अभी संसद का विशेष सत्र चल रहा है। 19 सितंबर से सदन की कार्यवाही नए संसद में शुरू हो गई है। पुराने से नए संसद भवन में प्रवेश करने से पहले सांसदों ने संविधान के साथ मार्च किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुराने संसद का नाम ‘संविधान सदन’ रखने का प्रस्ताव दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 20 सितंबर को विशेष सत्र के दौरान तीसरे दिन महिला आरक्षण बिल पर भी चर्चा होने की संभावना है। 19 सितम्बर को सरकार ने लोकसभा में यह बिल पेश किया था।

यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर झूठी भ्रांतियां फैला रहे संविधान की शपथ लेने वाले

भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले राजनेता क्या राष्ट्र को बताएंगे कि क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड देश अथवा जन विरोध में है? जनता में झूठी भ्रांतियां फ़ैलाने वाले बतायें विश्व में ऐसा कौन-सा देश है जहां ये कानून नहीं? क्यों नहीं भारत में अब तक ये कानून लागू हुआ? क्यों इतने वर्ष लग गए? आखिर जनता में भ्रांतियां फैलाकर संविधान का क्यों अपमान कर रहे हैं? देश संविधान के अनुसार चलेगा या तुम्हारी मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के अनुसार? आखिर मुस्लिम तुष्टिकरण करते कब तक भारतीय मुस्लिम समाज को बलि का बकरा बनाते रहोगे? जिस दिन यही मुस्लिम समाज वास्तविकता जान उन्हें अपमानित किये जाने का कारण पूछेगा, तुम्हे कहीं छिपने को भी जगह नहीं मिलेगी, और वह दिन शायद ज्यादा दूर नहीं। क्योकि नूपुर शर्मा विवाद के बाद से यही बात जोर पकड़ने लगी है। नूपुर की असली वीडियो देखने के बाद मुस्लिम देश भी भारतीय मुसलमान की मानसिकता पर अचंभित हैं।    
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) इन दिनों सुर्खियों में है। भारतीय संविधान में यूनिफॉर्म सिविल कोड का साफ-साफ जिक्र है, उसे लागू करने के लिए अब मोदी सरकार प्रतिबद्ध है। उत्तराखंड के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा सरकारों ने यूसीसी को अपने राज्यों में लागू करने की दिशा में कदम पहले ही बढ़ा दिए हैं। यूसीसी कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसे लेकर अब तक 60 लाख से ज्यादा सुझाव लॉ कमीशन के पास आ चुके हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में मोदी सरकार की तेजी के बीच अब सोशल मीडिया पर अनर्गल भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं कि इसे लागू होना चाहिए या नहीं ? और इसके लागू होने पर किसको, क्या फायदा होने वाला है? वर्ग विशेष को क्या नुकसान होने वाला है? जबकि हकीकत यह है कि देश को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में यह बेहद मजबूत कदम साबित होगा। एक्सपर्ट बताते हैं कि यूसीसी मोटे तौर पर महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें लेकर समानता पर फोकस्ड है। खासतौर से महिलाओं को सुदृढ़ और मजबूत बनाने की ओर ध्यान दिया जा रहा है। चाहे वे किसी भी समुदाय से हों। इसमें महिलाओं की धार्मिक मान्यताओं, उनके पहनावे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। सिर्फ आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से उन्हें मजबूत करने वाले कानूनों के दायरे में उन्हें लाया जाएगा।

अजब-गजब कुतर्क…यूसीसी आया तो हम पर भी ड्रेस में थोपा जाएगा धोती-कुर्ता
प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने जब से यूसीसी के बारे में बोला है, सोशल मीडिया पर #UniformCivilCode ट्रेंड कर रहा है। न्यूज चैनलों पर विश्लेषण हो रहा है कि यह कितना जरूरी है और इससे क्या कुछ बदल जाएगा। इन सबके बीच सोशल मीडिया पर ऐसी-ऐसी भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं, जिसे देखकर आप सिर पकड़ लेंगे। यूसीसी लागू होने से पहले ही बगैर जाने लोग सवाल उठा रहे हैं कि हिंदू और मुस्लिमों को एक ही तरह से शादी करनी होगी? क्या महिलाओं की शादी के लिए निर्धारित उम्र में बदलाव आ जाएगा? राज्यों को अपने हिसाब से ही यूसीसी के प्रावधानों में बदलाव का अधिकार होगा? यूसीसी से लिव-इन को कानूनी मान्यता मिल जाएगी? ऐसी न जाने कितनी कपोल-कल्पित बातें हैं। यूसीसी पर वायरल एक वीडियो में तो एक शख्स कहता है कि कानून बनाने से पहले आम जनता को शिक्षित किया जाए कि देखिए आपके लिए ये चीज है। वह आगे कहता है, ‘जैसे UC… ड्रेस का है मतलब एक ही जैसा ड्रेस पहनेंगे। जब आएगा तो…अगर मान लीजिए धोती-कुर्ता ड्रेस बना तो हम पर भी थोपा जाएगा, तो हम क्या धोती-कुर्ता पहनेंगे?’ वीडियो देखकर साफ लग रहा है कि इस शख्स ने यूसीसी में पहले शब्द यूनिफॉर्म का मतलब ड्रेस निकाला है।

लेबनान में अभिनेत्री ने हिजाब न पहनने पर वेश्या कहे जाने पर एक लाइव टीवी कार्यक्रम के दौरान एक मौलवी की पिटाई कर दी। लेबनान जो कभी ईसाई बहुल राज्य था, अचानक जनसांख्यिकीय परिवर्तन के बाद अब इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा शासित है। दुनिया भर में 'पोशाक पहनने के अधिकार' की वकालत करने वाली नारीवादियों को इसे देखना चाहिए।

यूनिफार्म सिविल कोड से जुड़े ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब जो भ्रांतियां हैं वो दूर हो सकें….

किसी भी धर्म के लोगों के लिए धार्मिक पहनावे पर कोई पाबंदी नहीं लगेगी
भ्रांति: यूसीसी को लेकर इस तरह की दावे सोशल मीडिया पर किए जा रहे हैं कि इसके लागू होने के बाद मुस्लिमों को भी अग्नि के फेरे लेकर निकाह करना होगा। ईसाइयों को भी शादी के तौर तरीकों को बदलना पड़ेगा। शवों को दफनाने की जगह जलाना होगा। दाढ़ी रखने और कुर्ता-पायजामा पहनने पर पाबंदी लगेगी।
हकीकत : यूसीसी का किसी भी धर्म की धार्मिक मान्यताओं, पहनावे या पूजा-पाठ पर कोई असर नहीं होगा। बुरका और गाउन दोनों पहनने में कोई परहेज नहीं होगा। यूसीसी लागू होने से किसी भी धर्म की धार्मिक मान्यताओं, पहनावे या पूजा-पाठ पर कोई असर नहीं होगा। यूसीसी का मतलब यह कतई नहीं है कि सभी धर्मों की रस्में, रीति-रिवाज एक जैसे हो जाएंगे। इसका सीधा सा अर्थ ये है कि जिस तरह चोरी, डकैती, लूट, हत्या या दुष्कर्म जैसे मामलों में सभी के लिए एक कानून लागू होता है। ठीक उसी तरह शादी, तलाक, संपत्ति पर अधिकार, उसका बंटवारा, गार्जियनशिप, गोद लेना, गुजारा भत्ता वगैरह के लिए सभी पर एक कानून लागू होगा।

यूसीसी में लिव-इन-रिलेशनशिप को कानूनी जामा नहीं पहनाया जाएगा
भ्रांति: यूसीसी में लिव-इन को कानूनी जामा पहनाने के साथ ही शादी की उम्र बदली जाएगी
हकीकत : विशेषज्ञों के मुताबिक यह तय है कि लिव इन रिलेशनशिप जैसे कंसेप्ट को यूसीसी के तहत नहीं लिया जाएगा। लिव-इन को कोई कानूनी जामा नहीं पहनाया जाएगा। अबतक इस मसले को कंसीडरेशन में नहीं लिया गया है। लिव इन को वैध करने की भी इस कानून के तहत कोई योजना नहीं है। जहां तक शादी की उम्र का सवाल है तो इसको सभी समुदायों के लिए एक समान किया जा सकता है। इसमें पुरुषों की उम्र 21 ही रहेगी। मगर महिलाओं की उम्र को 18 से बढ़ाकर 21 साल की जा सकती है। वहीं, शादी का रजिस्ट्रेशन वर्तमान की ही तरह जरूरी होगा। इसे और सख्त और सुनिश्चित करने का मसौदा तैयार हो रहा है।

आदिवासी समुदाय की प्रैक्टिसेज के साथ भी छेड़छाड़ नहीं की जाएगी
भ्रांति: आदिवासी समुदायों को सदियों से जारी अपनी परंपराएं बदलनी होंगी
हकीकत: विशेषज्ञ बताते हैं कि आदिवासियों को संविधान में जो संरक्षण प्राप्त है। उन्हें ज्यों का त्यों रखा जाएगा। सभी जनजातियों का संरक्षण यथावत रखेंगे। आदिवासी समुदाय और उनकी प्रैक्टिसेज के साथ यूसीसी में छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। यूसीसी के कानूनों से ट्राइब्ल्स को छूट मिलेगी। उनकी प्रैक्टिसेज पर किसी प्रकार से यूसीसी से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि उनकी स्वेच्छा रहेगी कि यूसीसी की प्रैक्टिस को वे अडॉप्ट करना चाहते हैं या नहीं। संविधान के आर्टिकल 371 के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इसे लेकर यह तर्क भी रखे गए हैं कि ट्राइबल्स में प्रोग्रेसिव प्रैक्टिसेज हैं, उनकी परम्पराएं प्रगतिशील विचारों की हैं, ऐसे में उन्हें छेड़ने की जरूरत नहीं है।

50 से ज्यादा देशों ने पॉलिगैमी बैन, भारत कैसे पिछड़ा रह सकता है
भ्रांति: मुस्लिम वोट बैंक के लिए बहू-पत्नी प्रथा को जारी रखा जाएगा
हकीकत: जानकारों का तर्क है कि 50 से ज्यादा देशों ने पॉलिगैमी को बैन किया हुआ है। ऐसे में भारत कैसे पिछड़ा रह सकता है। सूत्रों का कहना है कि पॉलिगैमी या बहू-पत्नी प्रथा को पूरी तरह से यूसीसी में बैन कर दिया जाएगा। यह फिर चाहे किसी भी धर्म या प्रैक्टिस की वजह से हो, मगर इसे बैन कर दिया जाएगा। जहां तक बाल विवाह और विधवा विवाह का सवाल है तो इससे संबंधित जो कानून अभी बने हैं, वो उसी तरह चलते रहेंगे। चाइल्ड मैरिज एक्ट यथावत काम करेगा। इसे और मजबूती से लागू करने की पैरवी की जाएगी। विधवा या तलाकशुदाओं की शादी को लेकर फिलहाल जो कानून बने हुए हैं, उसी अनुसार यूसीसी में भी सभी के लिए वही कानून मान्य होंगे। विधवा या तलाकशुदा महिलाएं शादी कर सकेंगी।

यूसीसी में महिलाओं को सुदृढ़ और मजबूत बनाने पर पूरा फोकस
भ्रांति: महिलाओं की मान्यताओं के साथ छेड़छाड़ करेगा नया कानून
हकीकत: यूनिफॉर्म सिविल कोड की हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यूसीसी में खासतौर से महिलाओं को सुदृढ़ और मजबूत बनाने की ओर ध्यान दिया जा रहा है। यूसीसी के एक्सपर्ट बताते हैं कि पहले फेज में यूसीसी मोटे तौर पर महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें लेकर समानता पर फोकस्ड है। चाहे वे किसी भी समुदाय से हों। इसमें महिलाओं की धार्मिक मान्यताओं, उनके पहनावे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। सिर्फ आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से उन्हें मजबूत करने वाले कानूनों के दायरे में उन्हें लाया जाएगा। सभी धर्म की महिलाओं को गार्जियनशिप अधिकारों की मजबूती मिलेगी। संभावना है कि फिलहाल महिलाओं को जो एक सीमा तक गार्जियनशिप का अधिकार मिलता है, उसमें उन्हें पुरुषों के साथ बराबरी का हक मिले। गार्जियनशिप के नजरिए से बहुत बड़ा कदम होगा। गार्जियनशिप, अडॉप्शन में वुमन को बराबरी के राइट मिलेंगे। इसके अलावा अभी जो अधिकार हिंदू महिलाओं को मिल रहा है, वो दूसरे धर्म के महिलाओं को भी मिलेगा। पुश्तैनी जमीन में जहां भी बराबर का हक नहीं दिया जाता है वहां बराबर का हक मिलने लगेगा।

आधी आबादी को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से सशक्तिकरण
देश में पर्सनल लॉज को लेकर समानता लाने के लिए इसे बनाने की तैयारी है। संविधान के आर्टिकल 44 में इसका जिक्र है। इसमें भारतीय नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात कही गई। बीजेपी के कोर इश्यूज में शामिल यूसीसी के लागू होने से देश में लैंगिक समानता कायम होगी। इस कोड के जरिए देश में सभी जाति और धर्म की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पीएम मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद बीजेपी संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाते हुए अनुच्छेद 370 को हटाने और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के वादे को पूरा कर चुकी है। अब उसके लिए तीन बड़े वादों में से सिर्फ यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा ही बचा है, जिसे लागू करने के लिए केंद्र गंभीरता से मंथन कर रहा है। जानकार मानते हैं कि जिस प्रकार से कई समुदायों में महिलाओं के साथ असमानता है। उस असमानता को दूर करते हुए देश की आधी आबादी को आर्थिक, सामाजिक, और शैक्षिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिए यह लाया जाएगा। पर्सनल लॉज से जुड़े कायदों में एकरूपता होगी। यूसीसी किसी भी व्यक्ति को धार्मिक रूप से किसी चीज के लिए बाध्य नहीं करेगा। इसका मकसद सिर्फ महिलाओं से जुड़े कानूनों में यूनिफॉरमिटी लाना होगा। किसी की भी धार्मिक मान्यताओं के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी।

कौन तैयार कर रहा है यूसीसी का ड्राफ्ट, क्या रहेगी इसकी प्रक्रिया
यूसीसी का ड्राफ्ट भारत का लॉ कमीशन तैयार कर रहा है। यूसीसी लागू करने के लिए लॉ कमीशन की ओर से देशभर से सुझाव मांगे गए। अब तक देश के अलग-अलग तबके और हिस्से से लाखों सुझाव लॉ कमीशन को मिले हैं। इसके बाद कमीशन इन सुझाव पर गौर करेगा। सुझावों के आधार बैठकें की जाएगी। इसमें स्टेकहोल्डर्स, धर्मगुरु, बुद्धिजीवी सहित तमाम महत्वपूर्ण श्रेणी के लोग होंगे। उनसे चर्चा की जाएगी। इसके बाद इसका ड्राफ्ट तैयार कर सरकार को भेज दिया जाएगा। सरकार फिर इसे अपने तरीके से बिल के रूप में लोकसभा, राज्यसभा में पेश कर कानून बनाएगी। यूसीसी का ड्राफ्ट विशेष तौर से लॉ कमीशन के चेयरमैन जस्टिस रितुराज अवस्थी, लॉ कमीशन के सदस्य जस्टिस केटी संकरन और प्रोफेसर आनंद पालीवाल तैयार कर रहे हैं। इनके अलावा लॉ कमीशन से जुड़े अन्य अस्थाई सदस्य और विशेषज्ञ शामिल हैं। जानकार बताते हैं कि यूसीसी क्रिमिनल लॉ, एडमिनिस्ट्रेशन लॉ, गर्वनेंस लॉ और लैंड लॉ को नहीं छेड़ेगा। फिलहाल यूसीसी में जिन चीजों को शामिल करने की बात चल रही है उनमें यूसीसी को सिर्फ पर्सनल लॉ तक ही सीमित रखा गया है।

धारा-370 और राम मंदिर के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर बढ़े कदम
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि धारा-370 और राम मंदिर के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर मोदी सरकार ने कदम बढ़ा दिए हैं। पहले दोनों अहम वादे बीजेपी पूरा कर चुकी है। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार यूसीसी को लाना चाहती है। संविधान के भाग चार में जिस यूनिफॉर्म सिविल कोड का जिक्र किया गया है, उसे अब लागू करने के लिए बीजेपी कटिबद्ध है। इसी दिशा में भाजपा शासित कुछ राज्य सरकारों ने कदम बढ़ा दिए हैं। उत्तराखंड की पहल के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक की सरकारों ने यूनिफॉर्म सिविल कोड अपने राज्यों में लागू करने के लिए एक्सपर्ट कमेटियों का गठन करके ड्राफ्ट की तैयारियां शुरू कर दी हैं। बीजेपी के कोर इश्यूज में शामिल यूनिफॉर्म सिविल कोड के लागू होने से देश में लैंगिक समानता कायम होगी। इस कोड के जरिए देश में सभी जाति और धर्म की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पीएम मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद बीजेपी संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाते हुए अनुच्छेद 370 को हटाने और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के वादे को पूरा कर चुकी है। अब उसके लिए तीन बड़े वादों में से सिर्फ यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा ही बचा है, जिसे लागू करने के लिए राज्यों के साथ केंद्र भी गंभीरता से मंथन कर रहा है।

तीन तलाक पर कानून बनने के बाद यूसीसी की उम्मीद बढ़ी भारतीय जनता पार्टी काफी वर्षों से समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्ष में है। पहली बार 1989 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में समान नागरिक संहिता को जगह दी थी। तभी से इस पर बहस हो रही है। 2014 और 2019 के घोषणापत्र में भी बीजेपी ने इसे शामिल किया। बीजेपी ने दिल्ली में अप्रैल 2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में पार्टी मुख्यालय में इस संकल्प पत्र को जारी किया। ऐसे में पिछले पांच साल से देश का एक बड़ा तबका समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग कर रहा है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में मुस्लिम समाज में एक बार में तीन तलाक बोल कर शादी को खत्म करने की परंपरा (तलाक-ए-बिद्दत) पर ऐतिहासिक फैसला देते हुए इसे असंवैधानिक बताया। इसके बाद जुलाई 2019 में संसद से तीन तलाक के दंश से छुटकारा देने के लिए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून बना। इसके जरिए तीन तलाक को अवैध मानते हुए अपराध माना गया। तीन तलाक पर संसद से कानून के बनने के बाद सियासी हल्कों से लेकर आम लोगों के बीच यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने पर बहस तेज हो गई।

बात बात पर संविधान की बात करने वाले समान नागरिक संहिता पर क्यों हो जाते हैं खामोश?

 


स्वदेश कुमार, उगता भारत 

देश के बंटवारे के समय जिन दो-तीन प्रतिशत मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि वे लोकतांत्रिक देश हिंदुस्तान में रहना ज्यादा पसंद करेंगे। उन्हें हिंदुस्तान की गंगा जमुनी संस्कृति से प्यार है। यह उनका मादरे वतन है। उन्हीं मुसलमानों की जब देश में आबादी बढ़ी तो उनकी सोच भी बदल गई। अब यह दबाव की राजनीति करने लगे हैं। लोकतंत्र की जगह शरीयत की बात करते हैं। अब लोकतंत्र और भारत का संविधान इनके लिए कोई मायने नहीं रखता है। सरकार को किसी भी फैसले से रोकने के लिए यह लोग देश का सांप्रदायिक माहौल खराब हो जाने की बात करने लगते हैं। सीएए, एनआरसी जैसे कानून बनाने की सरकार की मंशा के खिलाफ जगह-जगह आंदोलन करते हैं, जबकि इन कानूनों का भारत में रहने वाले किसी वर्ग या कौम से कोई संबंध नहीं होता है। यह कानून पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के संबंध में बनाया जा रहा है। 

जो काम 1947 में आज़ादी मिलने के बाद होना था, अगर अब हो रहा है, उस पर हिन्दू-मुसलमान कर अशांति फ़ैलाने का प्रयास कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बात बात पर संविधान की बात करने वाले CAA विरोध में हिन्दुत्व के लिए आपत्तिजनक शब्द(देखिए संलग्न चित्र) इस्तेमाल होने पर क्यों चुप रहे? सबसे ज्यादा शर्म उन हिन्दुओं को आनी चाहिए, जो हिन्दुत्व के विरुद्ध घोर आपत्तिजनक शब्द बोले जाने पर इस विरोध में शामिल रहे। काश, इसी तरह की बात इस्लाम के विरुद्ध बोल दी होती, नारेबाजों का जनाजा निकलने के साथ-साथ CAA विरोध भी ख़त्म हो गया होता। कोसते होंगे उनके पूर्वज कि हमारी संताने हिन्दुत्व विरोधियों के साथ क्यों खड़ी हैं? दूसरे, इनका संविधान प्रेम हिन्दुओं की गैर-मौजूदगी में कही जाती थी कि जब तक हिंदुस्तान इस्लामिक नहीं बन जाता हाथ में तिरंगा थामो, भारत माता की जय बोलो। संविधान की शपथ लेने वाले इनके किसी समर्थक ने विरोध नहीं किया,क्यों? देखिए अब तक लगभग 3 लाख से अधिक पाठकों पढ़ा गया लेख, जो इनके दोगलेपन को उजागर करता है:-

सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असल....

इसी दबाव की राजनीति के अगले चरण में समान नागरिक संहिता का भी मुस्लिम संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। इन लोगों को उन राजनीतिक दलों का भी समर्थन मिल रहा है जो इनके वोट बैंक के सहारे अपनी राजनीति चमकाते हैं। इसमें कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दल भी शामिल हैं। इसी क्रम में सपा के दिग्गज नेता आजम खान, समाजवादी पार्टी के सांसद शफीक उर रहमान वर्क और डॉ. एसटी हसन समान नागरिक संहिता के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह लोग एक सुर में चिल्ला रहे हैं कि समान नागरिक संहिता कानून भाजपा का चुनावी हथकंडा है। भाजपा समाज में दूरियां बढ़ाने के लिए यह कानून लाना चाहती है लेकिन हम मुसलमान शरीयत को ही मानेंगे। इस प्रकार के कानून को स्वीकार नहीं करेंगे। सपा सांसदों ने अपने बयान में कहा कि आखिर समान नागरिक संहिता कानून लाने की जरूरत क्यों पड़ी। इसका मुख्य कारण 2024 का चुनाव है। भाजपा हिंदू मुसलमान के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए यह सब कर रही है। 1400 से अधिक साल पहले मुसलमानों में शरीयत के अनुसार पैतृक संपत्ति में लड़कियों को उनका हक दिया जाता है।

कुराने पाक के हुक्म पर मुसलमान शरीयत के अनुसार काम करता है। इससे कोई मुसलमान समझौता नहीं करेगा। सवाल उठाया कि आखिर दूसरे लोगों को शरीयत से क्या परेशानी है। दूसरी शादी भी मजबूरी में लोग करते हैं। किसी की पत्नी बीमार हो गई या बच्चे नहीं हो रहे हैं। इस मामले में पहली पत्नी की इजाजत ली जाती है। इसमें एक संस्कार छिपा होता है। सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि आजकल लिव इन रिलेशनशिप को सरकार ने मान्यता दे दी है। क्या यही हिंदुस्तानी संस्कृति है। कुरान ने जो हुक्म दिया है। उसी को मुसलमान मानेंगे। इस मामले में किसी मौलाना की भी नहीं चलेगी। इसी प्रकार वक्फ की संपत्ति का मामला है। कानून बनने पर संविधान की धारा 29 और 30 को भी देखना पड़ेगा।

बहरहाल, बंटवारे के समय लोकतंत्र की दुहाई देकर जो मुसलमान यहां रुक गए थे, उनको यह जान और समझ लेना जरूरी है कि समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष (सेक्युलर) कानून होता है जो सभी पंथ के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है। दूसरे शब्दों में, अलग-अलग पंथों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ की मूल भावना है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के वैसे समूह से है जो देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी पंथ, क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी पंथ, जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। इस कानून के बनने से केवल मुसलमानों को ही नहीं अन्य धर्म के लोगों को भी देश हित में कुछ समझौते करने पड़ेंगे जो बदलते समय के हिसाब से जरूरी भी है। जब अन्य धर्मों के लोग समान नागरिक संहिता पर हो हल्ला नहीं कर रहे तो मुसलमानों को भी समझना होगा कि यह देश की बात है। देश से बड़ा कोई मजहब नहीं होता। विश्व के अधिकतर देशों में ऐसे कानून हैं। समान नागरिक संहिता से संचालित पन्थनिरपेक्ष देशों की संख्या बहुत अधिक है। अमेरिका, आयरलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान, इजिप्ट जैसे कई देश हैं जिन्होंने समान नागरिक संहिता को लागू किया है।

भारत का संविधान, संविधान सभा और गणतंत्र

डॉ राकेश कुमार आर्य

डॉक्टर अंबेडकर के बारे में यह बात बड़ी प्रमुखता से स्थापित की गई है कि उन्होंने भारत का संविधान बनाया था। जबकि यह बात सिरे से ही गलत है। जिसे उन्होंने स्वयं ने ही अपने जीवन काल में भरी पार्लियामेंट के भीतर खारिज कर दिया था। वे नहीं चाहते थे कि देश में बाबा छाप संविधान के नाम से किसी पुस्तक को पुकारा जाए और उसके आधार पर शासन चले। एक बार उन्होंने संसद में ही यह भी कह दिया था कि यदि उनका बस चले तो वह इस संविधान को जलाने वाले पहले व्यक्ति होंगे। इसका कारण केवल एक था कि वह इस संविधान के अनेक प्रावधानों से सहमत और संतुष्ट नहीं थे। उनका चिंतन निश्चित रूप से बहुत उत्कृष्ट था।

इसके उपरांत भी उन्होंने भारत की संविधान सभा में रहकर और प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाबा साहब किसी भी प्रकार के धार्मिक तुष्टीकरण के खिलाफ थे। उन्होंने देश में सांप्रदायिक एकता, सद्भाव और शांति स्थापित करने के लिए यह भी लिखा है कि देश के मदरसों को यदि बंद कर दिया जाए तो देश में शांति स्थापित हो जाएगी, पर आज मीम और भीम के नाम पर जो लोग देश विरोधी आंदोलन को खड़ा करने की सोच रहे हैं, वे इस तर्कपूर्ण तथ्य को पचा नहीं पाते हैं।

प्रत्येक गणतंत्र दिवस प्रतिवर्ष हमें अपने संविधान, अपनी संविधान सभा और संविधान सभा के सम्मानित सदस्यों के बारे में कुछ सोचने व समझने की प्रेरणा देता है। 1946 में भारत की संविधान सभा का गठन भारतीय संविधान के निर्माण के लिए किया गया था। ग्रेट ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के पश्चात भारत की संविधान सभा के सदस्य ही प्रथम संसद के सदस्य बने, अर्थात 1952 की 13 मई तक संविधान सभा के सदस्यों के माध्यम से ही देश का शासन चलता रहा।
1952 में देश के संविधान के प्रावधानों के अनुसार देश में पहले आम चुनाव आयोजित किए गए थे। यदि हम भारतीय संविधान सभा के गठन और उसकी कार्यप्रणाली से संबंधित तथ्यों का अवलोकन करें तो पता चलता है कि कैबिनेट मिशन की संस्तुतियों के आधार पर भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन जुलाई 1946 ई० में किया गया। संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी, जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि एवं 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे।
मिशन योजना के अनुसार जुलाई, 1946 ई० में संविधान सभा का चुनाव हुआ। कुल 389 सदस्यों में से प्रांतों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों के लिये चुनाव हुए। इसमें कांग्रेस को 208, मुस्लिम लीग को 73 स्थान एवं 15 अन्य दलों के तथा स्वतंत्र उम्मीदवार निर्वाचित हुए। 9 दिसंबर 1946 ई० को संविधान सभा की प्रथम बैठक नई दिल्ली स्थित काउंसिल चैम्बर के पुस्तकालय भवन में हुई। सभा के सबसे वरिष्ठ और वयोवृद्ध सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। अंग्रेजों के संकेत पर देश विभाजन के लिए काम कर रही मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया और पाकिस्तान के लिए सर्वथा अलग संविधान सभा की मांग प्रारम्भ कर दी। मुस्लिम लीग का ही अनुकरण कर रहे हैदराबाद के निजाम ने संविधान सभा का बहिष्कार करने का निर्णय लिया था।
यही कारण रहा कि हैदराबाद रियासत के प्रतिनिधि संविधान सभा में सम्मिलित नहीं हुए थे। प्रांतों या देसी रियासतों को उनकी जनसंख्या के आधार पर संविधान सभा में प्रतिनिधित्व दिया गया था।साधारणतः 10 लाख की जनसंख्या पर एक स्थान का आवंटन किया गया था। अंग्रेजों ने भारतवासियों के मध्य विभाजन की रेखा को और थोड़ा सा स्पष्ट करने के लिए यह व्यवस्था की थी कि प्रांतों का प्रतिनिधित्व मुख्यतः तीन समुदायों – मुस्लिम सिख तथा साधारण – की जनसंख्या के आधार पर विभाजित किया जाए। संविधान सभा में ब्रिटिश प्रान्तों के 296 प्रतिनिधियों का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर किया गया- 213 सामान्य, 79 मुसलमान तथा 4 सिख। संविधान सभा के सदस्यों में अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की संख्या 33 थी । महिलाओं को समानता की दृष्टि से देखने का ढिंढोरा पीटने वाले अंग्रेजों ने संविधान सभा में महिला सदस्यों की संख्या 12 नियत की थी ।11 दिसंबर 1946 ई. को डॉ सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में संपन्न हुई संविधानसभा की बैठक में डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
संविधान सभा की कार्यवाही 13 दिसंबर 1946 ई. को जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत किए गए उद्देश्य प्रस्ताव के साथ प्रारम्भ हुई। उद्देश्य प्रस्तावों में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने स्वतंत्र देश के स्वतंत्र संविधान के उद्देश्यों को स्पष्ट किया था। 22 जनवरी 1947 ई. को उद्देश्य प्रस्ताव की स्वीकृति के पश्चात संविधान सभा ने संविधान निर्माण हेतु अनेक समितियां नियुक्त कीं। इनमें प्रमुख थीं – वार्ता समिति, संघ संविधान समिति, प्रांतीय संविधान समिति, संघ शक्ति समिति, प्रारूप समिति। बी. एन. राव द्वारा प्रस्तुत किए गए संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श करने के लिए संविधान सभा द्वारा 29 अगस्त 1947 को एक संकल्प पारित करके प्रारूप समिति का गठन किया गया तथा इसके अध्यक्ष के रूप में डॉ भीमराव अम्बेडकर को चुना गया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान के मूल स्वरूप की संरचना श्री बी0 एन0 राव के मस्तिष्क की उपज थी। उसी मूलभूत ढांचे पर आगे का भवन तैयार करने का काम इस प्रारूप समिति ने संभाला। इसके उपरांत भी जो लोग यह भ्रम पाले हुए हैं कि भारतीय संविधान की रचना डॉ आंबेडकर ने की थी, वह स्वयं तो भ्रांति का शिकार हैं ही साथ ही देश की युवा पीढ़ी को भी भ्रांति का शिकार बना रहे हैं। संविधान की इस प्रारूप समिति के सदस्यों की संख्या सात थी, जो इस प्रकार है: 1.डॉ. भीमराव अम्बेडकर (अध्यक्ष) 2. एन. गोपाल स्वामी आयंगर 3. अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर 4. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी 5. सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला 6. एन. माधव राव (बी.एल. मित्र के स्थान पर) 7. डी. पी. खेतान (1948 ई. में इनकी मृत्यु के बाद टी. टी. कृष्माचारी को सदस्य बनाया गया). संविधान सभा में अम्बेडकर का निर्वाचन पश्चिम बंगाल से हुआ था ।
अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग को देश के बंटवारे के लिए पहले दिन से ही तैयार करना आरंभ कर दिया था, अब उन्होंने कांग्रेस को भी देश के बंटवारे के लिए तैयार कर लिया था। 3 जून, 1947 ई. की योजना के अनुसार देश का बंटवारा हो जाने पर भारतीय संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 324 नियत की गई, जिसमें 235 स्थान प्रांतों के लिय और 89 स्थान देसी राज्यों के लिए थे। देश-विभाजन के पश्चात संविधान सभा का पुनर्गठन 31 अक्टूबर, 1947 ई. को किया गया और 31 दिसंबर 1947 ई. को संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 289 थीं, जिसमें प्रांतीय सदस्यों की संख्या एवं देसी रियासतों के सदस्यों की संख्या 70 थी।
प्रारूप समिति ने संविधान के प्रारूप पर विचार- विमर्श करने के बाद 21 फरवरी 1948 ई. को संविधान सभा को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया । संविधान सभा में संविधान का प्रथम वाचन 4 नवंबर से 9 नवंबर 1948 ई. तक चला । संविधान का दूसरा वाचन 15 नवंबर 1948 ई० को प्रारम्भ हुआ, जो 17 अक्टूबर, 1949 ई० तक चला। संविधान सभा में संविधान का तीसरा वाचन 14 नवंबर 1949 ई० को प्रारम्भ हुआ जो 26 नवंबर 1949 ई० तक चला और संविधान सभा द्वारा संविधान को पारित कर दिया गया। इस समय संविधान सभा के 284 सदस्य उपस्थित थे । 26 नवंबर 1949 की यह तिथि ही भारतीय संविधान के पूर्ण हो जाने की तिथि है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में कुल 2 वर्ष, 11 महीना और 18 दिन लगे ।इस कार्य पर लगभग 6.4 करोड़ रुपये खर्च हुए । संविधान के प्रारूप पर कुल 114 दिन बहस हुई । जिस में अनेक सदस्यों ने अपने अपने बहुमूल्य विचार देकर संविधान को भारतीय जनता की अपेक्षाओं के अनुकूल और अनुरूप बनाने के लिए प्रयास किया। संविधान को जब 26 नवंबर, 1949 ई० को संविधान सभा द्वारा पारित किया गया, तब इसमें कुल 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं । वर्तमान समय में संविधान में 25 भाग, 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियां हैं । संविधान के कुछ अनुच्छेदों में से 15 अर्थात 5, 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 367, 372, 380, 388, 391, 392 तथा 393 अनुच्छेदों को 26 नवंबर 1949 ई० को ही परिवर्तित कर दिया गया; जबकि शेष अनुच्छेदों को 26 जनवरी 1950 ई० को लागू किया गया।
संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी, 1950 ई० को हुई और उसी दिन संविधान सभा के द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया ।कैबिनेट मिशन के सदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स, लार्ड पेंथिक लारेंस तथा ए० बी० एलेक्ज़ेंडर थे । 26 जुलाई, 1947 ई० को गवर्नर जनरल ने पाकिस्तान के लिए पृथक संविधान सभा की स्थापना की घोषणा की ।हमारे देश के संविधान की प्रस्तावना बहुत महत्वपूर्ण है। जिसमें लिखा है कि- ‘हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न , समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 /11/ 1949 ई0( मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी सम्वत दो हजार छः विक्रमी ) को एतद्द्वारा संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’
हमारे संविधान के निर्माण में सन 1857 की क्रांति के पश्चात महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र से लेकर 1935 तक के भारत सरकार अधिनियम के कई अधिनियमों ने विशेष भूमिका निभाई थी। 1857 की क्रांति के कुछ समय पश्चात ही हिंदू पैट्रियट में लिखकर श्री हरिश्चंद्र मुखर्जी ने भारतीय संसद की मांग रखने का सराहनीय प्रयास किया था। जब हम अपने संविधान के वर्तमान स्वरूप की कहानी को पढ़ना आरंभ करते हैं तो हरिश्चंद्र मुखर्जी कि वह मांग भी इसमें महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा था कि — ” भारत की जनता को स्वार्थी वर्ग के विधायन और अत्याचार से मुक्ति मिलनी चाहिए। हमारे जो देशवासी राजनीति में रुचि लेते हैं और विधान परिषद में भारतीय सदस्यों के प्रवेश के लिए आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं इस विचार का लक्ष्य संकीर्ण है, और अपूर्ण भी ।हम यह नहीं चाहते हैं कि विद्यमान परिषद में कुछ स्वतंत्र सदस्यों को प्रवेश मिले , हम तो भारतीय संसद चाहते हैं।’भारतीय संविधान के निर्माण में भारतीय परिषद अधिनियम 1860 , भारतीय परिषद अधिनियम 1892 , मार्ले मिंटो सुधार 1909 , भारतीय परिषद अधिनियम 1909 , भारत शासन अधिनियम 1919, साइमन कमीशन और भारत सरकार अधिनियम 1935 का भी विशेष योगदान रहा।आज हम अपने इसी संविधान का 73 वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं । हमारे गणतंत्र को इस संविधान के अनुसार चलते हुए 73 वर्ष का समय हो चुका है । आज हमें देखना यह है कि हम संविधान की मूल भावना के अनुरूप अपने देश का निर्माण कर पाए हैं या नहीं ?
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं 'भारत को समझो' अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है)
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